कक्षा 9 हिंदी (गंगा) अध्याय 10 ‘भारति, जय, विजय करे!’ – प्रश्न-उत्तर, भावार्थ एवं व्याख्या (NCERT 2026–27)

यह पृष्ठ कक्षा 9 हिंदी की नई पुस्तक गंगा (काव्य खंड) के अध्याय 10 ‘भारति, जय, विजयकरे!’ (कवि – सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’) का पूरा समाधान देता है – कविता का भावार्थ, शब्दार्थ तथा सभी अभ्यास-प्रश्नों के उत्तर।

कक्षा: 9 विषय: हिंदी पुस्तक: गंगा (काव्य खंड) अध्याय: 10 कवि: सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ विधा: कविता (देशप्रेम) सत्र: 2026–27

कवि परिचय – सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’

सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ का जन्म सन् 1899 में बंगाल के महिषादल में हुआ। वे मूलतः गढ़ाकोला (उन्नाव), उत्तर प्रदेश के निवासी थे। उनकी औपचारिक शिक्षा नौवीं तक महिषादल में ही हुई; उन्होंने स्वाध्याय से संस्कृत, बांग्ला और अंग्रेजी का ज्ञान अर्जित किया। उनकी प्रमुख काव्य-रचनाएँ हैं – अनामिका, परिमल, गीतिका, कुकुरमुत्ता और नए पत्ते। उपन्यास, कहानी, आलोचना और निबंध-लेखन में भी उनकी ख्याति अविस्मरणीय है। छायावादी रचनाकारों में उन्होंने सबसे पहले मुक्त छंद का प्रयोग किया। उनकी रचनाओं में दार्शनिकता, विद्रोह, क्रांति, प्रेम की तरलता तथा प्रकृति का विराट एवं उदात्त चित्र मिलता है; उपेक्षितों और पीड़ितों के प्रति उनमें गहरी सहानुभूति है। निराला का निधन सन् 1961 में हुआ।

कविता (मूल पाठ)

भारति, जय, विजयकरे!
कनक-शस्य-कमलधरे!
लंका पदतल शतदल,
गर्जितोर्मि सागर-जल
धोता शुचि चरण युगल
स्तव कर बहु-अर्थ-भरे!

तरु-तृण-वन-लता वसन,
अंचल में खचित समुन;
गंगा ज्योतिर्जल-कण
धवल धार हार गले।

मुकुट शुभ्र हिम-तुषार,
प्राण प्रणव ओंकार,
ध्वनित दिशाएँ उदार,
शतमुख-शतरव-मुखरे!

भावार्थ

कवि भारतमाता की विजय की कामना करते हुए उन्हें संबोधित करता है – हे भारति! आपकी जय हो, आप सदा विजयिनी हों! आप सोने जैसी फसलें (कनक-शस्य) और कमल धारण करने वाली, धन-धान्य से संपन्न भूमि हैं। आपके चरणों में लंका (श्रीलंका) कमल (शतदल) के समान सुशोभित है और गरजती लहरों वाला सागर अपने जल से आपके दोनों पवित्र चरणों को धोता है, मानो अनेक अर्थों से भरी स्तुति कर रहा हो।

वृक्ष, तृण, वन और लताएँ आपके वस्त्र हैं तथा आँचल में जड़े फूल रत्नों के समान शोभा देते हैं। गंगा की ज्योतिर्मय जलधारा आपके गले में पहने श्वेत हार के समान चमकती है। हिम-तुषार से ढका (हिमालय) आपका उज्ज्वल मुकुट है। आपके प्राणों में ओंकार (प्रणव) की पवित्र ध्वनि बसी है, जिससे सभी दिशाएँ उदारतापूर्वक गूँज उठी हैं; सैकड़ों मुख और सैकड़ों स्वरों से यह भूमि मुखरित (ध्वनित) हो रही है।

इस प्रकार कवि भारत को एक चेतन देवी के रूप में चित्रित करता है, जिसकी प्रकृति-संपदा उसके वस्त्राभूषण हैं और जो ज्ञान, संस्कृति एवं आध्यात्मिकता का गौरवपूर्ण केंद्र है। कविता भारत की भौगोलिक सुंदरता, कृषि-संपन्नता, विविधता और आध्यात्मिक महिमा का ओजपूर्ण गुणगान करती है।

शब्दार्थ

शब्दअर्थ
भारति/भारतीभारतमाता; सरस्वती, वाणी
कनकसोना
शस्यफसल, अन्न, खेती
पदतलतलवा, पैरों के नीचे
शतदलकमल (सौ दलों वाला)
गर्जितोर्मिगरजती तरंगें/लहरें
शुचिपवित्र, शुद्ध, निर्मल
युगलजोड़ा, युग्म
स्तवस्तुति, प्रशंसा
तरुवृक्ष, पेड़
तृणतिनका, घास
लताबेल, वल्लरी
वसनवस्त्र, आवरण
अंचलआँचल, छोर, किनारा
खचितजड़ा हुआ, अंकित
समुनपुष्प, फूल
ज्योतिर्जलप्रकाशमय जल
धवल / शुभ्रश्वेत, उज्ज्वल, चमकीला
हिम / तुषारबर्फ, पाला
प्रणव / ओंकार‘ओम्’ मंत्र की ध्वनि
उदारदानशील, विशाल
शतमुखसौ मुख
शतरवसैकड़ों स्वर/ध्वनियाँ
मुखर / मुखरेशब्द/ध्वनि करता हुआ, गुंजायमान

मेरे उत्तर मेरे तर्क

निम्नलिखित प्रश्नों के सटीक उत्तर चुनिए और यह भी बताइए कि आपको ये उत्तर उपयुक्त क्यों लगते हैं।

1. “भारति, जय, विजयकरे” कविता में विशेष रूप से—

(क) भारत की भौगोलिक संरचना की प्रशस्ति की गई है।

(ख) भारत की सांस्कृतिक विविधता बताई गई है।

(ग) भारत के ज्ञान, प्रकृति और संपन्नता की प्रशंसा की गई है।

(घ) भारत के खनिज पदार्थों के बारे में बताया गया है।

उत्तर(ग) भारत के ज्ञान, प्रकृति और संपन्नता की प्रशंसा की गई है।कविता में कृषि-संपन्नता, प्रकृति-सौंदर्य तथा ओंकार-रूपी आध्यात्मिक ज्ञान – तीनों का गौरवगान है, अतः यही सर्वाधिक उपयुक्त है।

2. “कनक-शस्य-कमल धरे” पंक्ति का भावार्थ है—

(क) भारत की धन-धान्य संपन्नता

(ख) भारत की नदियों का सौंदर्य

(ग) भारत के लोक-जीवन की सुंदरता

(घ) भारत की सैन्य शक्ति और औद्योगिक विकास

उत्तर(क) भारत की धन-धान्य संपन्नता।‘कनक (सोने) जैसी फसलें’ धारण करने वाली भूमि भारत की कृषि-समृद्धि और धन-धान्य की संपन्नता को दर्शाती है।

3. समस्त विश्व में भारत के महत्व का उद्घोष करने वाली पंक्तियाँ हैं—

(क) गंगा ज्योतिर्जल-कण/ धवल धार हार गले

(ख) गर्जितोर्मि सागर-जल/ धोता शुचि चरण युगल

(ग) भारति, जय, विजयकरे/ कनक-शस्य-कमलधरे!

(घ) ध्वनित दिशाएँ उदार/ शतमुख-शतरव-मुखरे!

उत्तर(घ) ध्वनित दिशाएँ उदार/ शतमुख-शतरव-मुखरे!सभी दिशाओं का गूँज उठना और सैकड़ों स्वरों से मुखरित होना भारत की व्यापक महिमा एवं विश्वव्यापी महत्व का उद्घोष करता है।

4. कविता की भाषा और शैली किस विशेषता से संपन्न है?

(क) सरल, बोल-चाल की भाषा

(ख) संस्कृतनिष्ठ और समासयुक्त

(ग) सरस और हास्य-व्यंग्यपूर्ण

(घ) संवादात्मक और विश्लेषणात्मक

उत्तर(ख) संस्कृतनिष्ठ और समासयुक्त।‘कनक-शस्य-कमलधरे’, ‘गर्जितोर्मि’, ‘शतमुख-शतरव’ जैसे सामासिक एवं संस्कृतनिष्ठ शब्द कविता की भाषा-विशेषता हैं।

5. भारत के वस्त्रों में ‘तरु-तृण-वन-लता’ और गले में ‘गंगा-धारा’ को चित्रित कर कवि किस प्रकार की चेतना का संदेश देते हैं?

(क) पर्यावरणीय और सांस्कृतिक

(ख) राष्ट्रीयता और देशप्रेम

(ग) ऐतिहासिक और भौगोलिक

(घ) सामाजिक और राजनीतिक

उत्तर(क) पर्यावरणीय और सांस्कृतिक।प्रकृति (वन-लता, गंगा) को भारत के वस्त्राभूषण के रूप में चित्रित करना पर्यावरण एवं सांस्कृतिक चेतना का संदेश देता है।

अर्थ और भाव

(क) “लंका पदतल शतदल, गर्जितोर्मि सागर-जल, धोता शुचि चरण युगल!”

अर्थ एवं भावअर्थ: भारतमाता के चरणों में लंका (श्रीलंका) कमल (शतदल) के समान सुशोभित है, और गरजती लहरों वाला सागर अपने जल से उनके दोनों पवित्र चरणों को धोता है।भाव: कवि भारत को एक देवी के रूप में चित्रित करता है, जिसके चरणों में सागर श्रद्धापूर्वक जल अर्पित करता है – इससे भारत की भौगोलिक भव्यता और पवित्रता का मानवीकरण होता है।

(ख) “प्राण प्रणव ओंकार, ध्वनित दिशाएँ उदार, शतमुख-शतरव-मुखरे!”

अर्थ एवं भावअर्थ: भारत के प्राणों में ओंकार (प्रणव) की पवित्र ध्वनि बसी है, जिससे सभी दिशाएँ उदारतापूर्वक गूँज उठी हैं; सैकड़ों मुख और सैकड़ों स्वरों से यह भूमि मुखरित है।भाव: भारत आध्यात्मिकता और ज्ञान का केंद्र है, जहाँ अनेक स्वर, विचार एवं संस्कृतियाँ एक साथ गूँजती हैं – यह ‘विविधता में एकता’ का परिचायक है।

मेरी समझ मेरे विचार

1. कविता में कवि की किस भावना की अभिव्यक्ति मिलती है?

उत्तरकविता में कवि की प्रबल देशप्रेम एवं राष्ट्रभक्ति की भावना अभिव्यक्त हुई है।कवि भारत की विजय की कामना करता है और उसकी प्रकृति, कृषि, संस्कृति, ज्ञान एवं संपन्नता का गौरवपूर्ण गुणगान करता है।

2. कविता में भारत के प्राकृतिक सौंदर्य का वर्णन किस प्रकार किया गया है? क्या आप मानते हैं कि प्रकृति का संरक्षण करना भी देशप्रेम का काम है? क्यों?

उत्तरकवि ने भारत के प्राकृतिक सौंदर्य को देवी के वस्त्राभूषण के रूप में चित्रित किया है – वन-लता-तृण उसके वस्त्र, फूल आँचल के रत्न, गंगा श्वेत हार और हिमालय हिम-मुकुट।हाँ, प्रकृति का संरक्षण भी देशप्रेम है, क्योंकि नदी, वन और पर्वत हमारे देश की पहचान, संपदा एवं जीवन-आधार हैं; इनकी रक्षा करना देश की रक्षा करने के समान है।

3. “कनक-शस्य-कमलधरे!” पंक्ति भारतभूमि की किन-किन विशेषताओं की ओर संकेत कर रही है?

उत्तरयह पंक्ति भारतभूमि की कृषि-संपन्नता (सोने जैसी फसलें/धन-धान्य) और उर्वरता की ओर संकेत करती है।साथ ही कमल धारण करने वाली होने से इसकी पवित्रता, सुंदरता तथा श्रम के सौंदर्य का भी बोध होता है।

4. “मुकुट शुभ्र हिम-तुषार” पंक्ति में हिमालय को भारत का मुकुट बताया गया है, क्यों?

उत्तरहिमालय भारत के उत्तर में सबसे ऊँचा, श्वेत हिम से ढका पर्वत है, जो सिर पर सुशोभित मुकुट के समान भारत की शोभा एवं गौरव बढ़ाता है।यह रक्षक के रूप में भी खड़ा है; इसलिए कवि ने उसे भारत का उज्ज्वल मुकुट कहा है।

कविता का सौंदर्य

विशेषताकविता की पंक्ति
प्रकृति का मानवीकरण“धोता शुचि चरण युगल” (सागर का भारत के चरण धोना); “मुकुट शुभ्र हिम-तुषार”
आलंकारिक प्रयोग“गंगा ज्योतिर्जल-कण/ धवल धार हार गले” (रूपक); “शतमुख-शतरव-मुखरे” (अनुप्रास)
समस्त/सामासिक पद का प्रयोग“कनक-शस्य-कमलधरे”, “गर्जितोर्मि”, “हिम-तुषार”
संस्कृतनिष्ठ भाषा प्रयोग“प्राण प्रणव ओंकार”; “स्तव कर बहु-अर्थ-भरे”

व्याकरण की बात

समास – समस्त पद एवं विग्रह

समस्त पदसमास-विग्रहसमास का नाम
शतदलसौ हैं दल जिसके (वह) = कमलबहुव्रीहि समास
ज्योतिर्जलज्योति (के समान) जलकर्मधारय समास
शतमुखसौ हैं मुख जिसके (वह)बहुव्रीहि समास
सागरजलसागर का जलतत्पुरुष समास

अलंकार

उत्तर(क) अनुप्रास अलंकार: “शतमुख-शतरव-मुखरे” (‘श’ की आवृत्ति), “तरु-तृण-वन-लता वसन” (‘त’ की आवृत्ति), “कनक-शस्य-कमलधरे” (‘क’ की आवृत्ति)।(ख) रूपक अलंकार: “मुकुट शुभ्र हिम-तुषार” (हिमालय = मुकुट), “गंगा… हार गले” (गंगा = हार), “लंका पदतल शतदल” (लंका = कमल)। कवि ने हिमालय को मुकुट, गंगा को हार और लंका को कमल मानकर भारत की भव्य छवि चित्रित की है।

अतिरिक्त प्रश्न

अति लघु उत्तरीय

1. ‘भारति, जय, विजयकरे!’ कविता के रचयिता कौन हैं?

उत्तरइस कविता के रचयिता सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ हैं।

2. कवि ने भारत की गंगा को किसके रूप में चित्रित किया है?

उत्तरकवि ने गंगा को भारतमाता के गले के श्वेत (धवल) हार के रूप में चित्रित किया है।

3. छायावादी कवियों में मुक्त छंद का सबसे पहले प्रयोग किसने किया?

उत्तरछायावादी कवियों में मुक्त छंद का सबसे पहले प्रयोग निराला ने किया।

लघु उत्तरीय

4. कवि ने भारत के किन-किन प्राकृतिक उपादानों को उसके वस्त्राभूषण के रूप में दर्शाया है?

उत्तरवृक्ष, तृण, वन और लता को भारत के वस्त्र; आँचल में जड़े फूलों को रत्न; गंगा को श्वेत हार; तथा हिमालय (हिम-तुषार) को उज्ज्वल मुकुट के रूप में दर्शाया है।इस मानवीकरण से भारत की छवि एक सुसज्जित देवी के समान भव्य एवं दिव्य बन जाती है।

5. “प्राण प्रणव ओंकार” पंक्ति का आशय स्पष्ट कीजिए।

उत्तरइसका आशय है कि भारत के प्राणों में ‘ओम्’ (ओंकार/प्रणव) की पवित्र ध्वनि बसी हुई है।यह दर्शाता है कि भारत आध्यात्मिकता, ज्ञान एवं वैदिक संस्कृति का केंद्र है, जिसकी गूँज सभी दिशाओं में फैली है।

दीर्घ उत्तरीय

6. ‘भारति, जय, विजयकरे!’ कविता की प्रमुख विशेषताएँ लिखिए।

उत्तरदेशप्रेम: कविता भारत की विजय की कामना और उसके गौरवगान से ओत-प्रोत है।मानवीकरण: भारत को एक चेतन देवी के रूप में चित्रित किया गया है।प्रकृति-चित्रण: सागर, गंगा, हिमालय, वन-लता आदि का सजीव एवं चित्रात्मक वर्णन।भाषा-शैली: संस्कृतनिष्ठ, समासयुक्त एवं लयात्मक भाषा; अनुप्रास और रूपक अलंकारों का सुंदर प्रयोग।

अभ्यास MCQ & अभिकथन-कारण

1. कविता में भारतमाता के चरण किससे धुलते हैं?

(क) गंगा के जल से

(ख) गरजती लहरों वाले सागर के जल से

(ग) वर्षा के जल से

(घ) झरने के जल से

उत्तर(ख) गरजती लहरों वाले सागर के जल से।

2. कविता में हिमालय को क्या कहा गया है?

(क) हार

(ख) वस्त्र

(ग) मुकुट

(घ) आँचल

उत्तर(ग) मुकुट।

3. ‘शस्य’ शब्द का अर्थ है—

(क) सोना

(ख) फसल/अन्न

(ग) कमल

(घ) वस्त्र

उत्तर(ख) फसल/अन्न।

4. कविता किस भाव की रचना है?

(क) विरह

(ख) हास्य

(ग) देशप्रेम

(घ) श्रृंगार

उत्तर(ग) देशप्रेम।

अभिकथन-कारण – नीचे अभिकथन (A) और कारण (R) दिए गए हैं। सही विकल्प चुनिए—
(क) A और R दोनों सही, R, A की सही व्याख्या है। (ख) A और R दोनों सही, पर R, A की सही व्याख्या नहीं। (ग) A सही, R गलत। (घ) A गलत, R सही।

1. अभिकथन (A): कविता में भारत को एक देवी के रूप में चित्रित किया गया है।

कारण (R): कवि ने प्रकृति-उपादानों को भारतमाता के वस्त्राभूषण के रूप में प्रस्तुत किया है।

उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है।

2. अभिकथन (A): कविता की भाषा सरल बोल-चाल की भाषा है।

कारण (R): इसमें ‘कनक-शस्य-कमलधरे’ जैसे संस्कृतनिष्ठ एवं सामासिक पद प्रयुक्त हुए हैं।

उत्तर(घ) A गलत है (भाषा संस्कृतनिष्ठ एवं समासयुक्त है, सरल बोल-चाल की नहीं), जबकि R सही है।

3. अभिकथन (A): “मुकुट शुभ्र हिम-तुषार” में रूपक अलंकार है।

कारण (R): यहाँ हिमालय में मुकुट का अभेद आरोप किया गया है।

उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

‘भारति, जय, विजयकरे!’ कविता के कवि कौन हैं?

इस देशप्रेमपूर्ण कविता के कवि छायावादी रचनाकार सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ हैं।

कविता का मुख्य भाव क्या है?

भारत की विजय की कामना तथा उसकी प्रकृति, कृषि, संस्कृति और ज्ञान-परंपरा का गौरवगान।

कवि ने गंगा और हिमालय को क्या कहा है?

गंगा को भारतमाता के गले का श्वेत हार और हिमालय को उसका उज्ज्वल हिम-मुकुट कहा है।

कविता की भाषा-शैली कैसी है?

संस्कृतनिष्ठ, समासयुक्त, लयात्मक एवं चित्रात्मक; इसमें अनुप्रास और रूपक अलंकारों का सुंदर प्रयोग है।

कविता एवं प्रश्न NCERT गंगा पुस्तक से ज्यों-के-त्यों लिए गए हैं; भावार्थ एवं उत्तर ClearStudy द्वारा मौलिक रूप से तैयार किए गए हैं।

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