भारति, जय, विजय करे! प्रश्न उत्तर — कक्षा 9 हिंदी गंगा
‘भारति, जय, विजय करे!’ में निराला भारत की प्रकृति, कृषि और ज्ञान-संस्कृति का काव्यात्मक गुणगान करते हैं। कक्षा 9 गंगा के इस अध्याय के भावार्थ, अभ्यास-उत्तर, समास, अलंकार और गतिविधियों के नमूने यहाँ पढ़ें।
स्रोत: NCERT गंगा, कक्षा 9, प्रथम संस्करण मार्च 2026, पृष्ठ 166–175। खुले प्रश्नों, अनुभवों और रचनात्मक कार्यों के उत्तर नमूने हैं; अपने विचार जोड़ें। यह स्वतंत्र अध्ययन-सहायिका है, NCERT की आधिकारिक उत्तरमाला नहीं।
- कवि परिचय – सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’
- कविता (मूल पाठ)
- भावार्थ
- शब्दार्थ
- मेरे उत्तर मेरे तर्क
- अर्थ और भाव
- मेरी समझ मेरे विचार
- कविता का सौंदर्य
- आज के भारत से संबंध
- विविध रंग भारत के — रचनात्मक गतिविधियाँ
- व्याकरण की बात
- मिलकर लें शपथ — वन और प्रकृति संरक्षण
- भाषा संगम और विस्तार
- अतिरिक्त प्रश्न
- अभ्यास MCQ & अभिकथन-कारण
- अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
कवि परिचय – सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’
सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ का जन्म सन् 1899 में बंगाल के महिषादल में हुआ। वे मूलतः गढ़ाकोला (उन्नाव), उत्तर प्रदेश के निवासी थे। उनकी औपचारिक शिक्षा नौवीं तक महिषादल में ही हुई; उन्होंने स्वाध्याय से संस्कृत, बांग्ला और अंग्रेजी का ज्ञान अर्जित किया। उनकी प्रमुख काव्य-रचनाएँ हैं – अनामिका, परिमल, गीतिका, कुकुरमुत्ता और नए पत्ते। उपन्यास, कहानी, आलोचना और निबंध-लेखन में भी उनकी ख्याति अविस्मरणीय है। छायावादी रचनाकारों में उन्होंने सबसे पहले मुक्त छंद का प्रयोग किया। उनकी रचनाओं में दार्शनिकता, विद्रोह, क्रांति, प्रेम की तरलता तथा प्रकृति का विराट एवं उदात्त चित्र मिलता है; उपेक्षितों और पीड़ितों के प्रति उनमें गहरी सहानुभूति है। निराला का निधन सन् 1961 में हुआ।
कविता (मूल पाठ)
कनक-शस्य-कमलधरे!
लंका पदतल शतदल,
गर्जितोर्मि सागर-जल
धोता शुचि चरण युगल
स्तव कर बहु-अर्थ-भरे!
तरु-तृण-वन-लता वसन,
अंचल में खचित सुमन;
गंगा ज्योतिर्जल-कण
धवल धार हार गले।
मुकुट शुभ्र हिम-तुषार,
प्राण प्रणव ओंकार,
ध्वनित दिशाएँ उदार,
शतमुख-शतरव-मुखरे!
भावार्थ
कवि भारतमाता की विजय की कामना करते हुए उन्हें संबोधित करता है – हे भारति! आपकी जय हो, आप सदा विजयिनी हों! आप सोने जैसी फसलें (कनक-शस्य) और कमल धारण करने वाली, धन-धान्य से संपन्न भूमि हैं। आपके चरणों में लंका (श्रीलंका) कमल (शतदल) के समान सुशोभित है और गरजती लहरों वाला सागर अपने जल से आपके दोनों पवित्र चरणों को धोता है, मानो अनेक अर्थों से भरी स्तुति कर रहा हो।
वृक्ष, तृण, वन और लताएँ आपके वस्त्र हैं तथा आँचल में जड़े फूल रत्नों के समान शोभा देते हैं। गंगा की ज्योतिर्मय जलधारा आपके गले में पहने श्वेत हार के समान चमकती है। हिम-तुषार से ढका (हिमालय) आपका उज्ज्वल मुकुट है। आपके प्राणों में ओंकार (प्रणव) की पवित्र ध्वनि बसी है, जिससे सभी दिशाएँ उदारतापूर्वक गूँज उठी हैं; सैकड़ों मुख और सैकड़ों स्वरों से यह भूमि मुखरित (ध्वनित) हो रही है।
इस प्रकार कवि भारत को एक चेतन देवी के रूप में चित्रित करता है, जिसकी प्रकृति-संपदा उसके वस्त्राभूषण हैं और जो ज्ञान, संस्कृति एवं आध्यात्मिकता का गौरवपूर्ण केंद्र है। कविता भारत की भौगोलिक सुंदरता, कृषि-संपन्नता, विविधता और आध्यात्मिक महिमा का ओजपूर्ण गुणगान करती है।

हिमालय को मुकुट, गंगा को हार और लंका को चरणों का कमल कहना काव्य-कल्पना है। इससे किसी आधुनिक देश की सीमा या राजनीतिक स्थिति का दावा नहीं निकलता। श्रीलंका स्वतंत्र देश है।
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| भारति/भारती | भारतमाता; सरस्वती, वाणी |
| कनक | सोना |
| शस्य | फसल, अन्न, खेती |
| पदतल | तलवा, पैरों के नीचे |
| शतदल | कमल (सौ दलों वाला) |
| गर्जितोर्मि | गरजती तरंगें/लहरें |
| शुचि | पवित्र, शुद्ध, निर्मल |
| युगल | जोड़ा, युग्म |
| स्तव | स्तुति, प्रशंसा |
| तरु | वृक्ष, पेड़ |
| तृण | तिनका, घास |
| लता | बेल, वल्लरी |
| वसन | वस्त्र, आवरण |
| अंचल | आँचल, छोर, किनारा |
| खचित | जड़ा हुआ, अंकित |
| सुमन | पुष्प, फूल |
| ज्योतिर्जल | प्रकाशमय जल |
| धवल / शुभ्र | श्वेत, उज्ज्वल, चमकीला |
| हिम / तुषार | बर्फ, पाला |
| प्रणव / ओंकार | ‘ओम्’ मंत्र की ध्वनि |
| उदार | दानशील, विशाल |
| शतमुख | सौ मुख |
| शतरव | सैकड़ों स्वर/ध्वनियाँ |
| मुखर / मुखरे | शब्द/ध्वनि करता हुआ, गुंजायमान |
मेरे उत्तर मेरे तर्क
निम्नलिखित प्रश्नों के सटीक उत्तर चुनिए और यह भी बताइए कि आपको ये उत्तर उपयुक्त क्यों लगते हैं।
1. “भारति, जय, विजयकरे” कविता में विशेष रूप से—
(क) भारत की भौगोलिक संरचना की प्रशस्ति की गई है।
(ख) भारत की सांस्कृतिक विविधता बताई गई है।
(ग) भारत के ज्ञान, प्रकृति और संपन्नता की प्रशंसा की गई है।
(घ) भारत के खनिज पदार्थों के बारे में बताया गया है।
2. “कनक-शस्य-कमल धरे” पंक्ति का भावार्थ है—
(क) भारत की धन-धान्य संपन्नता
(ख) भारत की नदियों का सौंदर्य
(ग) भारत के लोक-जीवन की सुंदरता
(घ) भारत की सैन्य शक्ति और औद्योगिक विकास
3. समस्त विश्व में भारत के महत्व का उद्घोष करने वाली पंक्तियाँ हैं—
(क) गंगा ज्योतिर्जल-कण/ धवल धार हार गले
(ख) गर्जितोर्मि सागर-जल/ धोता शुचि चरण युगल
(ग) भारति, जय, विजयकरे/ कनक-शस्य-कमलधरे!
(घ) ध्वनित दिशाएँ उदार/ शतमुख-शतरव-मुखरे!
4. कविता की भाषा और शैली किस विशेषता से संपन्न है?
(क) सरल, बोल-चाल की भाषा
(ख) संस्कृतनिष्ठ और समासयुक्त
(ग) सरस और हास्य-व्यंग्यपूर्ण
(घ) संवादात्मक और विश्लेषणात्मक
5. भारत के वस्त्रों में ‘तरु-तृण-वन-लता’ और गले में ‘गंगा-धारा’ को चित्रित कर कवि किस प्रकार की चेतना का संदेश देते हैं?
(क) पर्यावरणीय और सांस्कृतिक
(ख) राष्ट्रीयता और देशप्रेम
(ग) ऐतिहासिक और भौगोलिक
(घ) सामाजिक और राजनीतिक
अर्थ और भाव
(क) “लंका पदतल शतदल, गर्जितोर्मि सागर-जल, धोता शुचि चरण युगल!”
(ख) “प्राण प्रणव ओंकार, ध्वनित दिशाएँ उदार, शतमुख-शतरव-मुखरे!”
मेरी समझ मेरे विचार
1. कविता में कवि की किस भावना की अभिव्यक्ति मिलती है?
2. कविता में भारत के प्राकृतिक सौंदर्य का वर्णन किस प्रकार किया गया है? क्या आप मानते हैं कि प्रकृति का संरक्षण करना भी देशप्रेम का काम है? क्यों?
3. “कनक-शस्य-कमलधरे!” पंक्ति भारतभूमि की किन-किन विशेषताओं की ओर संकेत कर रही है?
4. “मुकुट शुभ्र हिम-तुषार” पंक्ति में हिमालय को भारत का मुकुट बताया गया है, क्यों?
कविता का सौंदर्य
| विशेषता | कविता की पंक्ति |
|---|---|
| प्रकृति का मानवीकरण | “धोता शुचि चरण युगल” (सागर का भारत के चरण धोना); “मुकुट शुभ्र हिम-तुषार” |
| आलंकारिक प्रयोग | “गंगा ज्योतिर्जल-कण/ धवल धार हार गले” (रूपक); “शतमुख-शतरव-मुखरे” (अनुप्रास) |
| समस्त/सामासिक पद का प्रयोग | “कनक-शस्य-कमलधरे”, “गर्जितोर्मि”, “हिम-तुषार” |
| संस्कृतनिष्ठ भाषा प्रयोग | “प्राण प्रणव ओंकार”; “स्तव कर बहु-अर्थ-भरे” |
आज के भारत से संबंध
1. आज के भारत का नया चित्र कैसा बनाएँगे?
नमूना विचार: मैं खेतों और प्रकृति के साथ वैज्ञानिक प्रयोगशालाएँ, पुस्तकालय, विभिन्न भाषाओं में पढ़ते बच्चे, कुशल कारीगर और सहयोग करते नागरिक दिखाऊँगा/दिखाऊँगी। महिलाओं की भागीदारी, दिव्यांगजनों की पहुँच, स्वच्छ ऊर्जा और अलग-अलग समुदायों की साझेदारी भी रखूँगा/रखूँगी। यह प्रगति के साथ समान अवसर और प्रकृति-संरक्षण की आकांक्षा व्यक्त करेगा।
2. “शतमुख-शतरव-मुखरे!” और विविधता में एकता
अनेक मुखों और स्वरों का बिंब विभिन्न भाषाओं, पर्वों, लोककलाओं और विचारों के साथ रहने की याद दिलाता है। अलग उत्सव मनाने पर भी एक-दूसरे की परंपराओं का सम्मान, सहभागिता और सहयोग हमें जोड़ते हैं। एकता का अर्थ सभी की पहचान एक जैसी कर देना नहीं, विविधताओं के बीच सम्मानपूर्ण संबंध बनाना है।
3. प्रकृति, संस्कृति और ज्ञान-परंपरा पर संक्षिप्त लेख — नमूना
देश की शक्ति के तीन आधार: नदियाँ, वन और मिट्टी भोजन, जल और जीवन का आधार हैं। लोककलाएँ, भाषाएँ तथा सामुदायिक परंपराएँ हमारी स्मृति और परस्पर जुड़ाव को मजबूत करती हैं। ज्ञान-परंपरा प्रश्न पूछने, अनुभव से सीखने और नए समाधान खोजने की प्रेरणा देती है। देश को सुदृढ़ करने के लिए प्राकृतिक संसाधनों का जिम्मेदार उपयोग, सांस्कृतिक विविधता का सम्मान और वैज्ञानिक दृष्टि आवश्यक हैं। पुराने ज्ञान को प्रमाण और नए अनुभवों की कसौटी पर परखकर आगे बढ़ाना भी इसी जिम्मेदारी का भाग है।
4. प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन से नदियों व हिमालय पर प्रभाव
बिना उपचार का सीवेज, औद्योगिक बहाव और कचरा नदी के जल तथा जलीय जीवन को नुकसान पहुँचा सकते हैं। हिमालय क्षेत्र में बढ़ता तापमान हिम और हिमनदों को प्रभावित कर रहा है; इससे जल की मौसमी उपलब्धता और कुछ बाढ़-संबंधी जोखिम बदल सकते हैं। सभी स्थानों पर प्रभाव एक जैसा नहीं होता। अपशिष्ट-उपचार, नदी-तटों का संरक्षण और जलवायु-अनुकूल योजना जरूरी हैं।
तथ्य-स्रोत: राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन — प्रदूषण के स्रोत; ICIMOD — हिम, जल और समाज का अध्ययन। कविता का “धवल हार” नदी को स्वच्छ रखने की प्रेरणा दे सकता है; वह आज की जल-गुणवत्ता की माप नहीं है।
विविध रंग भारत के — रचनात्मक गतिविधियाँ
समूह-प्रस्तुति, पोस्टर या कोलाज की योजना
पाँच भाग बनाइए—भाषाएँ, लोककलाएँ, भोजन, वस्त्र और प्रकृति। हर समूह एक क्षेत्र के दो उदाहरण खोजे, चित्र का स्रोत और छोटा परिचय दे। एक राज्य को एक ही पोशाक या समुदाय तक सीमित न करें। अंतिम पृष्ठ पर लिखें: “अलग परंपराएँ, समान सम्मान।” अपने सहपाठियों से तथ्य और उच्चारण की जाँच कराएँ।
1. अपने राज्य के प्रतीकों से भारत की सज्जा
उत्तर प्रदेश पर आधारित नमूना: बनारसी बुनाई से प्रेरित वस्त्र, चिकनकारी का किनारा, गंगा-यमुना की लहरों का आभूषण और खेतों के सुनहरे रंग चुन सकता/सकती हूँ। ये केवल चुने हुए उदाहरण हैं, पूरे राज्य की विविधता का पूर्ण चित्र नहीं। अपने राज्य की वास्तविक कला, पुष्प और वस्त्र के आधार पर उत्तर बदलें।
2. डाक टिकट, पोस्टर या पुस्तक-आवरण
नमूना डिजाइन: शीर्षक “प्रकृति से समृद्ध भारत”; ऊपर हिमाच्छादित पर्वत, बीच में नदी, किनारे वन और सामने किसान की फसल। पुस्तक ज्ञान का और जुड़े हाथ सहयोग का संकेत दें। नीचे छोटा नारा: “प्रकृति सँवारें, भविष्य सँवारें।” प्रतीकों के चयन का कारण साथ लिखें। डाक टिकट जैसा चित्र हो तो उसे शैक्षिक नमूना लिखें।
3. नदी की यात्रा — कल्पित यात्रा-वृत्तांत
हिमालय से सागर तक: मैं अपनी कल्पना-यात्रा गोमुख के निकट गंगोत्री हिमनद से निकलने वाली भागीरथी के साथ शुरू करता/करती हूँ। देवप्रयाग में भागीरथी और अलकनंदा मिलती हैं; यहाँ से नदी गंगा कहलाती है। ऋषिकेश और हरिद्वार के बाद मैदानों का विस्तार दिखता है। प्रयागराज में यमुना का संगम, वाराणसी के घाट, बिहार के उपजाऊ मैदान और रास्ते में मिलती स्थानीय भाषाएँ तथा लोकजीवन यात्रा को समृद्ध बनाते हैं।
बंगाल पहुँचकर नदी-तंत्र कई धाराओं में बँटता है। मेरी कल्पित यात्रा भागीरथी–हुगली की दिशा से गंगासागर तक जाती है, जहाँ सागर का विस्तार स्वागत करता है। गंगा की मुख्य धारा पद्मा के नाम से बांग्लादेश में भी आगे बढ़ती है और अन्य नदियों से मिलकर बंगाल की खाड़ी तक पहुँचती है। इसलिए पूरी गंगा को केवल कोलकाता होकर बहने वाली एक ही धारा कहना सही नहीं।
यह वास्तविक यात्रा का दावा नहीं, भूगोल पर आधारित रचनात्मक नमूना है। मार्ग का स्रोत: राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन — गंगा का प्रवाह-पथ। स्थानीय भाषाओं और सांस्कृतिक अनुभवों के उदाहरण अपनी खोज से जोड़ें।
व्याकरण की बात
बहुभाषी देश हमारा — संवाद का नमूना
नागरिक: भारत, तुम्हारी अनेक भाषाएँ मुझे साथ रहना सिखाती हैं।
भारत: दूसरे की भाषा का सम्मान करना सीखो।
नागरिक: मैं जल बचाऊँगा/बचाऊँगी और कचरा नदी में नहीं डालूँगा/डालूँगी।
भारत: प्रकृति और मनुष्यों की देखभाल से ही मेरा भविष्य सँवरेगा।
यह हिंदी में कल्पित संवाद है। अपनी मातृभाषा में दूसरा रूप लिखें और उस भाषा के जानकार से स्वाभाविकता जाँचें।
मातृभाषा में कविता — हिंदी नमूना और भावार्थ
नदी, पहाड़, खेतों से अपना देश सँवरता है,
अलग-अलग भाषाओं में अपनापन झरता है।
मेहनत, सीख और प्रेम से मिलकर राह बनाएँ,
धरती और मनुष्य दोनों का सम्मान निभाएँ।
भावार्थ: देश की सुंदरता प्रकृति, विविधता और साझा श्रम में है। इन्हें सँवारना हमारा काम है। यदि हिंदी आपकी मातृभाषा नहीं है तो अपनी भाषा में मौलिक पंक्तियाँ लिखकर उनका हिंदी भावार्थ दें।
समास – समस्त पद एवं विग्रह
| समस्त पद | समास-विग्रह | समास का नाम |
|---|---|---|
| शतदल | सौ हैं दल जिसके (वह) = कमल | बहुव्रीहि समास |
| ज्योतिर्जल | ज्योति (के समान) जल | कर्मधारय समास |
| शतमुख | सौ हैं मुख जिसके (वह) | बहुव्रीहि समास |
| सागरजल | सागर का जल | तत्पुरुष समास |
अलंकार
मिलकर लें शपथ — वन और प्रकृति संरक्षण
अधिनियमों की जानकारी जुटाने के लिए उनके आधिकारिक पाठ में नाम, वर्ष और उद्देश्य नोट करें। उदाहरण:
| अधिनियम | अध्ययन के लिए मुख्य विषय |
|---|---|
| वन (संरक्षण एवं संवर्धन) अधिनियम, 1980 | वनभूमि के गैर-वन उपयोग और संरक्षण से संबंधित प्रावधान; पुराना नाम वन (संरक्षण) अधिनियम था। |
| वन्य जीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 | वन्य जीवों तथा संरक्षित क्षेत्रों का संरक्षण। |
| पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 | पर्यावरण की सुरक्षा और सुधार का व्यापक ढाँचा। |
स्रोत: वन-संबंधी अधिनियम का आधिकारिक पाठ; पर्यावरण और वन्य जीव संरक्षण पर संसदीय उत्तर। नए संशोधनों की जानकारी शिक्षक की सहायता से जाँचें।
कक्षा की शपथ: हम वनस्पतियों और जीवों को नुकसान नहीं पहुँचाएँगे, कचरा निर्धारित स्थान पर डालेंगे, कागज और पानी का समझदारी से उपयोग करेंगे तथा लगाए पौधों की नियमित देखभाल करेंगे।
भाषा संगम और विस्तार
शस्य के रूप: हिंदी में फसल/उपज, संस्कृत में शस्यम्, मराठी में पीक और बांग्ला में फसल पुस्तक में दिए उदाहरण हैं। अपनी भाषा का शब्द जोड़ें। “कनक-शस्य-कमलधरे” का सरल भाव है—सोने जैसी फसलों और कमल को धारण करने वाली भारतभूमि। इसका स्वाभाविक मातृभाषा-रूप स्वयं तैयार करें।
मैथिलीशरण गुप्त का ‘जय जय भारतमाता’
दिए अंश में हिमालय भारत के विशाल हृदय के रूप में आता है और उसके जलस्रोत हरियाली देते हैं। निराला हिमालय को मुकुट और गंगा को हार कहते हैं। दोनों में देशप्रेम और प्रकृति से जीवन का संबंध है, पर प्रतीक अलग हैं। गुप्त की पूरी कविता पुस्तकालय से पढ़कर तुलना बढ़ाएँ।
खोजबीन
देशप्रेम की एक अन्य कविता चुनकर कवि, स्रोत और मुख्य भाव लिखें तथा कक्षा में वाचन करें। निराला की ‘वर दे, वीणावादिनि वर दे!’ पढ़ते समय संस्कृतनिष्ठ शब्दों और संगीतात्मकता की तुलना करें। अलंकार दोहराने के लिए रैदास के पद और समास के लिए क्या लिखूँ? के अभ्यास देखें।
अतिरिक्त प्रश्न
अति लघु उत्तरीय
1. ‘भारति, जय, विजयकरे!’ कविता के रचयिता कौन हैं?
2. कवि ने भारत की गंगा को किसके रूप में चित्रित किया है?
3. छायावादी कवियों में मुक्त छंद का सबसे पहले प्रयोग किसने किया?
लघु उत्तरीय
4. कवि ने भारत के किन-किन प्राकृतिक उपादानों को उसके वस्त्राभूषण के रूप में दर्शाया है?
5. “प्राण प्रणव ओंकार” पंक्ति का आशय स्पष्ट कीजिए।
दीर्घ उत्तरीय
6. ‘भारति, जय, विजयकरे!’ कविता की प्रमुख विशेषताएँ लिखिए।
अभ्यास MCQ & अभिकथन-कारण
1. कविता में भारतमाता के चरण किससे धुलते हैं?
(क) गंगा के जल से
(ख) गरजती लहरों वाले सागर के जल से
(ग) वर्षा के जल से
(घ) झरने के जल से
2. कविता में हिमालय को क्या कहा गया है?
(क) हार
(ख) वस्त्र
(ग) मुकुट
(घ) आँचल
3. ‘शस्य’ शब्द का अर्थ है—
(क) सोना
(ख) फसल/अन्न
(ग) कमल
(घ) वस्त्र
4. कविता किस भाव की रचना है?
(क) विरह
(ख) हास्य
(ग) देशप्रेम
(घ) श्रृंगार
अभिकथन-कारण – नीचे अभिकथन (A) और कारण (R) दिए गए हैं। सही विकल्प चुनिए—
(क) A और R दोनों सही, R, A की सही व्याख्या है। (ख) A और R दोनों सही, पर R, A की सही व्याख्या नहीं। (ग) A सही, R गलत। (घ) A गलत, R सही।
1. अभिकथन (A): कविता में भारत को एक देवी के रूप में चित्रित किया गया है।
कारण (R): कवि ने प्रकृति-उपादानों को भारतमाता के वस्त्राभूषण के रूप में प्रस्तुत किया है।
2. अभिकथन (A): कविता की भाषा सरल बोल-चाल की भाषा है।
कारण (R): इसमें ‘कनक-शस्य-कमलधरे’ जैसे संस्कृतनिष्ठ एवं सामासिक पद प्रयुक्त हुए हैं।
3. अभिकथन (A): “मुकुट शुभ्र हिम-तुषार” में रूपक अलंकार है।
कारण (R): यहाँ हिमालय में मुकुट का अभेद आरोप किया गया है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
‘भारति, जय, विजयकरे!’ कविता के कवि कौन हैं?
इस देशप्रेमपूर्ण कविता के कवि छायावादी रचनाकार सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ हैं।
कविता का मुख्य भाव क्या है?
भारत की विजय की कामना तथा उसकी प्रकृति, कृषि, संस्कृति और ज्ञान-परंपरा का गौरवगान।
कवि ने गंगा और हिमालय को क्या कहा है?
गंगा को भारतमाता के गले का श्वेत हार और हिमालय को उसका उज्ज्वल हिम-मुकुट कहा है।
कविता की भाषा-शैली कैसी है?
संस्कृतनिष्ठ, समासयुक्त, लयात्मक एवं चित्रात्मक; इसमें अनुप्रास और रूपक अलंकारों का सुंदर प्रयोग है।
