Class 6 Sanskrit Deepakam Chapter 1 Solutions (NCERT 2026–27) – वयं वर्णमालां पठामः

This page gives the complete solution for Class 6 Sanskrit Deepakam (दीपकम्) Chapter 1 ‘वयं वर्णमालां पठामः’ – the introductory varṇamālā (alphabet) lesson, covering स्वराः and व्यञ्जनानि, अनुनासिक-स्वराः, गुणिताक्षराणि (मात्रा-संयोजन), the six उच्चारण-स्थानानि (places of articulation) of the पाणिनीय-शिक्षा, the शब्दार्थ table, and original, exam-ready answers to every question of the अभ्यास (वयम् अभ्यासं कुर्मः) along with grammar tables, extra questions, MCQs, अभिकथन-कारण and FAQs.

Class: 6 Subject: Sanskrit Book: Deepakam (दीपकम्) Chapter: 1 पाठ: वयं वर्णमालां पठामः Session: 2026–27

पाठ का अवलोकन (Chapter Overview)

दीपकम् कक्षा 6 का प्रथम पाठ ‘वयं वर्णमालां पठामः’ संस्कृत-वर्णमाला (Devanagari alphabet) का परिचयात्मक पाठ है। इसमें बताया गया है कि वर्ण दो प्रकार के होते हैं – स्वराः (vowels) तथा व्यञ्जनानि (consonants)। स्वर पुनः समानाक्षर एवं सन्ध्यक्षर भेद से, तथा व्यञ्जन स्पर्श (वर्ग्य), अन्तःस्थ, ऊष्म एवं अयोगवाह भेद से विभक्त हैं। पाठ में अनुनासिक-स्वर, व्यञ्जनों में ‘अ’ का योजन, गुणिताक्षर (मात्रा-संयोजन) तथा संयुक्ताक्षर भी सिखाए गए हैं। अन्त में योग्यताविस्तरः के अन्तर्गत आस्य (मुख-नासिका) के छह उच्चारण-स्थान – कण्ठः, तालु, मूर्धा, दन्तः, ओष्ठः एवं नासिका – तथा पाणिनीय-शिक्षा के सूत्र दिए गए हैं। पाठ का उद्देश्य छात्रों को वर्णों का शुद्ध उच्चारण एवं वर्गीकरण सिखाना है।

पाठ-परिचय / प्रसंग

संस्कृत-भाषा सीखने का प्रथम सोपान वर्णमाला है। जैसे भवन की नींव सुदृढ़ हो तो भवन सुदृढ़ रहता है, वैसे ही वर्णों का शुद्ध ज्ञान एवं उच्चारण ही शुद्ध संस्कृत-अध्ययन का आधार है। प्राचीन भारतीय वैयाकरणों ने प्रत्येक वर्ण के उच्चारण-स्थान (place of articulation) का सूक्ष्म विश्लेषण किया है, जो पाणिनीय-शिक्षा में सूत्रबद्ध है। यह पाठ उसी वैज्ञानिक परम्परा का सरल परिचय देता है – स्वर-व्यञ्जन का भेद, मात्रा-संयोजन से गुणिताक्षर बनना, तथा कण्ठ से नासिका तक छह स्थानों से वर्णों की उत्पत्ति।

मूल पाठ – वर्णमाला (स्वराः, व्यञ्जनानि)

(पुस्तक के मूल पाठ का सार-रूप; वर्ण ज्यों-के-त्यों शुद्ध देवनागरी में।)

वर्णाः द्विविधाः भवन्ति – स्वराः व्यञ्जनानि च

(१) स्वराः – स्वराणाम् उच्चारणं स्वतन्त्ररूपेण भवति ।
समानाक्षराणि (ह्रस्व/दीर्घ): अ आ, इ ई, उ ऊ, ऋ ॠ, ऌ ।
सन्ध्यक्षराणि (केवल दीर्घ): ए, ऐ, ओ, औ ।
अ + इ = ए ; अ + उ = ओ ; अ + ए = ऐ ; अ + ओ = औ ।

अनुनासिक-स्वराः: अँ आँ इँ ईँ उँ ऊँ ऌँ एँ ऐँ ओँ औँ ।

(२) व्यञ्जनानि – व्यञ्जनोच्चारणे स्वरस्य सहायता अपेक्षिता; अतः सर्वत्र ‘अ’-योजनम् ।
क् + अ = क ; ख् + अ = ख ; ग् + अ = ग ; घ् + अ = घ ।
— दीपकम्, पाठः १ (वयं वर्णमालां पठामः)

वर्ण-वर्गीकरण एवं व्याख्या (अन्वय)

पाठ में दी गई वर्णमाला का व्यवस्थित वर्गीकरण इस प्रकार है –

1. व्यञ्जनानां चत्वारः भेदाः

भेदःवर्णाःविवरणम् (हिन्दी)
स्पर्शाः / वर्ग्याःक ख ग घ ङ · च छ ज झ ञ · ट ठ ड ढ ण · त थ द ध न · प फ ब भ मपाँच वर्ग (क-वर्ग, च-वर्ग, ट-वर्ग, त-वर्ग, प-वर्ग), कुल 25 वर्ण
अन्तःस्थाःय र ल व‘अर्ध-स्वर’ भी कहलाते हैं
ऊष्म-वर्णाःश ष स हउच्चारण में मुख से उष्ण वायु निकलती है
अयोगवाहौअं (अनुस्वारः), अः (विसर्गः)यहाँ ‘अ’ पहले जुड़ता है, बाद में नहीं

2. गुणिताक्षराणि (मात्रा-संयोजन)

व्यञ्जन के साथ स्वर के संयोग से गुणिताक्षर बनते हैं। प्रत्येक स्वर का एक मात्रा-चिह्न होता है – आ = ा, इ = ि, ई = ी, उ = ु, ऊ = ू, ऋ = ृ, ए = े, ऐ = ै, ओ = ो, औ = ौ। यथा – क् + आ = का, क् + इ = कि, क् + ई = की, क् + उ = कु, क् + ए = के, क् + ओ = को, क् + औ = कौ।

3. आस्ये षट् उच्चारण-स्थानानि (Six places of articulation)

उच्चारण-स्थानम्वर्णाःअंग्रेज़ी
१. कण्ठःअ आ, क ख ग घ ङ, ह, विसर्गः (अः)Throat
२. तालुइ ई, च छ ज झ ञ, य, शPalate
३. मूर्धाऋ, ट ठ ड ढ ण, र, षHard palate / roof
४. दन्तःऌ, त थ द ध न, ल, सTeeth
५. ओष्ठःउ ऊ, प फ ब भ मLips
६. नासिकाअनुस्वारः (अं), ङ ञ ण न म (स्वस्थानेन सह)Nose

विशेष – ए, ऐ कण्ठ-तालव्य; ओ, औ कण्ठोष्ठ्य; व दन्त्योष्ठ्य वर्ण है (दो-दो स्थानों से उच्चारित)।

सार (Hindi Summary)

‘वयं वर्णमालां पठामः’ पाठ संस्कृत-वर्णमाला से परिचय कराता है। वर्ण दो प्रकार के होते हैं – स्वर एवं व्यञ्जन। स्वरों का उच्चारण स्वतन्त्र रूप से होता है। स्वर दो प्रकार के हैं – समानाक्षर (अ आ, इ ई, उ ऊ, ऋ ॠ, ऌ) तथा सन्ध्यक्षर (ए, ऐ, ओ, औ), जो दो स्वरों के मेल (सन्धि) से बनते हैं; जैसे अ + इ = ए, अ + उ = ओ। मुख के साथ नासिका से उच्चारित स्वर अनुनासिक-स्वर कहलाते हैं (अँ, आँ आदि)।

व्यञ्जनों के उच्चारण में किसी स्वर की सहायता आवश्यक होती है, इसलिए वर्णमाला में हर व्यञ्जन के साथ ‘अ’ जोड़ा जाता है (क् + अ = क)। व्यञ्जन के चार भेद हैं – स्पर्श (पाँच वर्ग के 25 वर्ण), अन्तःस्थ (य र ल व), ऊष्म (श ष स ह) तथा अयोगवाह (अं, अः)। व्यञ्जन के साथ विभिन्न स्वरों की मात्रा जोड़ने से गुणिताक्षर बनते हैं, जैसे क, का, कि, की, कु, के, को, कौ।

पाठ के अन्त में ‘योग्यताविस्तरः’ में बताया गया है कि आस्य (मुख एवं नासिका) में वर्णों के उत्पन्न होने के छह स्थान हैं – कण्ठ, तालु, मूर्धा, दन्त, ओष्ठ एवं नासिका। पाणिनीय-शिक्षा के सूत्रों के अनुसार प्रत्येक वर्ग के वर्ण इन्हीं स्थानों से उच्चारित होते हैं; जैसे ‘अकुहविसर्जनीयाः कण्ठ्याः’, ‘इचुयशास्तालव्याः’ आदि। इस प्रकार यह पाठ वर्णों का वर्गीकरण एवं शुद्ध उच्चारण सिखाकर संस्कृत-अध्ययन की सुदृढ़ नींव रखता है।

शब्दार्थ (वयं शब्दार्थान् जानीमः)

पुस्तक की ‘वयं शब्दार्थान् जानीमः’ तालिका से ज्यों-के-त्यों।

शब्दःअर्थः (संस्कृत)हिन्दी अर्थEnglish meaning
पित्राज्ञापितुः आदेशःपिता का आदेशFather’s order
लाकृतिः‘ऌ’-वर्णस्य आकृतिः‘ऌ’-वर्ण का रूपShape of letter ‘ऌ’
एकैकःप्रत्येकम्हर एकEach one
अजःछागःबकराGoat
वधूःपरिणीताविवाहिता नारीMarried woman
मातॄणम्मातुः ऋणम्माता का ऋणIndebtedness to Mother
कॢप्तम्कल्पितम्माना हुआSupposed
ऌकारः‘ऌ’-वर्णः‘ऌ’ वर्णLetter ‘ऌ’
ओम्प्रणवःएकाक्षर ब्रह्मName of Brahma
औषधम्भेषजम्औषधMedicine
जिह्वारसनाजीभTongue
नामधेयम्नामनामName
भगिनीस्वसाबहनSister
भ्राताअनुजः / अग्रजःभाईBrother
पितामहीपितुः मातादादीPaternal Grandmother
पितामहःपितुः पितादादाPaternal Grandfather
मातामहीमातुः मातानानीMaternal Grandmother
मातामहःमातुः पितानानाMaternal Grandfather
सुश्रीःकुमारीकुमारीMiss
श्रीःलक्ष्मीः, सुन्दरतालक्ष्मी, सौन्दर्यGoddess of prosperity
उपाधिःविशिष्टताविशेषताTitle
प्रथम-नाममुख्यं नामपहला नामFirst Name
मध्य-नाममध्यवर्ति नामबीच का नामMiddle Name
अन्त्य-नामअन्तिम-नामअन्तिम नामLast Name
कुल-नामकुलस्य गोत्रस्य वंशस्य वा नामकुल/गोत्र का नामFamily Name

अभ्यासः (वयम् अभ्यासं कुर्मः)

1. कस्य चित्रम् ? वदन्तु लिखन्तु च —

(पुस्तक में दिए चित्रों के नाम संस्कृत में बोलकर लिखने हैं। प्रथम चित्र का उत्तर पुस्तक में ‘गणेशः’ दिया गया है। सम्भावित उत्तर –)

उत्तर (नमूना) (क) गणेशः (पुस्तक में दिया गया) (ख) मयूरः (मोर) (ग) गजः / हस्ती (हाथी) (घ) कमलम् (कमल) (ङ) घटः (घड़ा) (च) वृक्षः (पेड़) नोट – अपनी पुस्तक के वास्तविक चित्रों के अनुसार नाम लिखें।

2. चित्रं पश्यन्तु । पिट्टकातः समुचितान् वर्णसमूहान् चित्वा रिक्तस्थानानि पूरयन्तु —

पिट्टका (शब्द-मञ्जूषा): क्का · त्रि · ण्डः · ञ्चुः · क्षः · ङ्क · ङ्खः · न्ताः · न्द्रः · ष्ट

उत्तर (क) पङ्कजम्    (पंकज / कमल) (ख) चञ्चुः    (चोंच) (ग) शुक… → शुकः समूह – यहाँ ष्ट योजने ‘शष्ट…’ न; उपयुक्त: शुक (तोता) (घ) वृक्षः    (पेड़) – (क्षः) (ङ) दण्डः    (डंडा) – (ण्डः) (च) चन्द्रः    (चन्द्रमा) – (न्द्रः) (छ) त्रिशूलम्    (त्रिशूल) – (त्रि) (ज) अन्ताः    (अन्त) – (न्ताः) (झ) ढक्का    (ढोल) – (क्का) (ञ) शङ्खः    (शंख) – (ङ्खः) नोट – प्रत्येक चित्र के अनुसार पिट्टका से उपयुक्त संयुक्ताक्षर चुनकर भरें; ऊपर के संयुक्ताक्षर पाठ की पिट्टका से लिए गए हैं।

3. प्रथम-वर्णेन पदं वदन्तु लिखन्तु च —

(दिए गए प्रथम वर्ण से आरम्भ होने वाले दो-दो पद लिखिए। उदाहरण – अ → अग्निः, अस्त्रम् ; न → नदी, नौका।)

प्रथम-वर्णःपदम् १पदम् २
अग्निःअस्त्रम्
कमलम्करः
चन्द्रःचषकः
पुस्तकम्पत्रम्
रथःरविः
इन्दुःइक्षुः
नदीनौका
मयूरःमातुलः
हस्तीहरिः
तरुःतटः
वनम्वायुः
शशकःशिशुः

4. स्व-परिवारस्य सदस्यानां पूर्ण-नामानि लिखन्तु —

(अपने परिवार के सदस्यों के पूरे नाम उपाधि सहित लिखिए। उदाहरण-स्वरूप नमूना तालिका –)

सम्बन्धःउपाधिःप्रथम-नाममध्य-नामअन्त्य-नाम / कुल-नाम
माताश्रीमतीसीताशर्मा
पिताश्रीमान्रमेशःकुमारःशर्मा
भगिनीसुश्रीःरीताशर्मा
भ्राताश्रीमान्अमितःशर्मा
पितामहीश्रीमतीगायत्रीशर्मा
पितामहःश्रीमान्मोहनःशर्मा
मातामहीश्रीमतीकमलावर्मा
मातामहःश्रीमान्सुरेशःवर्मा

नोट – यह नमूना है; छात्र अपने वास्तविक परिवार के नाम लिखें। मध्य-नाम न हो तो रिक्त छोड़ें; केवल प्रथमाक्षर (Initial) न लिखकर पूरा कुल-नाम लिखें।

5. कक्षायाः शिक्षिकाणां शिक्षकाणां च पूर्ण-नामानि लिखन्तु —

उत्तर (मार्गदर्शनम्)अपनी कक्षा की शिक्षिकाओं एवं शिक्षकों के पूरे नाम उपाधि (श्रीमती/श्रीमान्/सुश्रीः), प्रथम-नाम, मध्यम-नाम एवं अन्त्य-नाम के क्रम में तालिका बनाकर लिखें। यह छात्र-आधारित कार्य है।

6. मित्राणां पूर्ण-नामानि लिखन्तु —

उत्तर (मार्गदर्शनम्)अपने मित्रों के पूरे नाम प्रथम-नाम, मध्यम-नाम एवं अन्त्य-नाम के क्रम में लिखें। यह छात्र-आधारित कार्य है; प्रत्येक छात्र के उत्तर भिन्न होंगे।

अत्र इदम् अवधेयम् (व्याकरण-तालिकाः)

पाठ में निम्नलिखित व्याकरण-बिन्दु ध्यानपूर्वक समझने योग्य हैं।

1. स्वर-भेदाः (समानाक्षर / सन्ध्यक्षर)

भेदःह्रस्वःदीर्घः
समानाक्षराणि
– (दीर्घ नहीं)
सन्ध्यक्षराणि– (ह्रस्व नहीं)

‘ऌ’ का दीर्घ रूप नहीं होता; सन्ध्यक्षरों (ए, ऐ, ओ, औ) के ह्रस्व रूप नहीं होते – इति पाणिनीय-शिक्षा।

2. सन्ध्यक्षर-निर्माणम् (स्वर-सन्धि)

सन्धिःपरिणामः
अ + इ
अ + उ
अ + ए
अ + ओ

3. पाणिनीय-शिक्षा-सूत्राणि (उच्चारण-स्थानानि)

सूत्रम्उच्चारण-स्थानम्
अकुहविसर्जनीयाः कण्ठ्याःअ आ, क ख ग घ ङ, ह, अः → कण्ठः
इचुयशास्तालव्याःइ ई, च छ ज झ ञ, य, श → तालु
ऋटुरषामूर्धन्याःऋ, ट ठ ड ढ ण, र, ष → मूर्धा
ऌतुलसा दन्त्याःऌ, त थ द ध न, ल, स → दन्तः
उपूपध्मानीया ओष्ठ्याःउ ऊ, प फ ब भ म → ओष्ठः
ङञणनमाः नासिकास्थानाःङ ञ ण न म → स्वस्थानेन सह नासिका
ए ऐ कण्ठतालव्यौए, ऐ → कण्ठ + तालु
ओ औ कण्ठोष्ठ्यौओ, औ → कण्ठ + ओष्ठ
वकारो दन्त्योष्ठ्यःव → दन्त + ओष्ठ
अनुस्वारयमा नासिक्याःअनुस्वारः (अं) → नासिका

योग्यताविस्तरः & परियोजनाकार्यम्

योग्यताविस्तरः (ज्ञान-विस्तार)

वर्णों का उच्चारण मुख (Mouth) एवं नासिका (Nose) से होता है; दोनों आस्य (Head) में स्थित हैं। आस्य में सामान्यतः छह उच्चारण-स्थान होते हैं – मुख में पाँच (कण्ठ, तालु, मूर्धा, दन्त, ओष्ठ) तथा नासिका में एक। इन्हीं छह स्थानों से सभी वर्णों की उत्पत्ति होती है, जिसे पाणिनीय-शिक्षा के सूत्रों द्वारा ऊपर तालिका में दर्शाया गया है।

उच्चारण-स्थानम्उदाहरण-वर्णाः
१. कण्ठ्याःअ आ, क ख ग घ ङ, ह, अः
२. तालव्याःइ ई, च छ ज झ ञ, य, श
३. मूर्धन्याःऋ, ट ठ ड ढ ण, र, ष
४. दन्त्याःऌ, त थ द ध न, ल, स
५. ओष्ठ्याःउ ऊ, प फ ब भ म
६. नासिक्याःअं, ङ ञ ण न म

परियोजनाकार्यम् (Project Work)

1. चित्राणि ध्यानेन पश्यन्तु । पक्षिणां पशूनां च ध्वनीनां मात्राः लिखन्तु ।

उत्तर पाठ के अनुसार – चाषः (नीलकण्ठ) एक-मात्र (ह्रस्व-स्वर जैसा) बोलता है; वायसः (कौआ) द्वि-मात्र (दीर्घ-स्वर जैसा); शिखी (मयूर) त्रि-मात्र (प्लुत-स्वर जैसा); नकुलः (नेवला) अर्ध-मात्र (व्यञ्जन जैसा) ध्वनि करता है। श्लोक – “चाषस्तु वदते मात्रां द्विमात्रं त्वेव वायसः। शिखी रौति त्रिमात्रं तु नकुलस्त्वर्धमात्रकम्॥”

2. नामान्त्याक्षरी क्रीडा कुर्वन्तु ।

मार्गदर्शनम्कक्षा को दो समूहों में बाँटकर खेलें – एक छात्र अपना नाम बोलता है; उसके नाम के अन्तिम व्यञ्जन-वर्ण (विसर्ग छोड़कर) से आरम्भ होने वाला कोई नया नाम दूसरे समूह का छात्र बोलता है। इस प्रकार क्रमशः खेल चलता रहता है। यह उच्चारण एवं शब्द-ज्ञान बढ़ाने वाली रोचक गतिविधि है।

अतिरिक्त प्रश्न (Extra Questions)

लघु उत्तरीय प्रश्न (30–40 शब्द)

1. वर्ण कितने प्रकार के होते हैं?

उत्तरवर्ण दो प्रकार के होते हैं – स्वराः (vowels) तथा व्यञ्जनानि (consonants)। स्वरों का उच्चारण स्वतन्त्र होता है, जबकि व्यञ्जनों के उच्चारण में स्वर की सहायता आवश्यक होती है।

2. समानाक्षर एवं सन्ध्यक्षर स्वर किसे कहते हैं?

उत्तरवर्णमाला के आदि के सामान्य स्वर (अ आ, इ ई, उ ऊ, ऋ ॠ, ऌ) समानाक्षर कहलाते हैं। दो निश्चित स्वरों की सन्धि से बने नए स्वर (ए, ऐ, ओ, औ) सन्ध्यक्षर कहलाते हैं; जैसे अ + इ = ए।

3. व्यञ्जनों के चार भेद कौन-से हैं?

उत्तरव्यञ्जनों के चार भेद हैं – (1) स्पर्श/वर्ग्य (क-वर्ग आदि पाँच वर्ग, 25 वर्ण), (2) अन्तःस्थ (य र ल व), (3) ऊष्म (श ष स ह), तथा (4) अयोगवाह (अं अनुस्वार एवं अः विसर्ग)।

4. अनुनासिक-स्वर किसे कहते हैं?

उत्तरजो स्वर मुख के साथ नासिका से भी उच्चारित होते हैं, वे अनुनासिक-स्वर कहलाते हैं; जैसे – अँ, आँ, इँ, ईँ, उँ, ऊँ, एँ, ऐँ, ओँ, औँ आदि।

5. आस्य में वर्णों के कितने उच्चारण-स्थान हैं? नाम लिखिए।

उत्तरआस्य में छह उच्चारण-स्थान हैं – (1) कण्ठः, (2) तालु, (3) मूर्धा, (4) दन्तः, (5) ओष्ठः तथा (6) नासिका। इनमें पाँच मुख में एवं एक नासिका में स्थित है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (100–120 शब्द)

6. संस्कृत-वर्णमाला में स्वर एवं व्यञ्जन का वर्गीकरण विस्तार से समझाइए।

उत्तरसंस्कृत-वर्णमाला में वर्ण दो प्रकार के हैं – स्वर एवं व्यञ्जन। स्वर स्वतन्त्र रूप से उच्चारित होते हैं। स्वर दो भेद के हैं – समानाक्षर (अ आ, इ ई, उ ऊ, ऋ ॠ, ऌ) तथा सन्ध्यक्षर (ए, ऐ, ओ, औ), जो दो स्वरों की सन्धि से बनते हैं।व्यञ्जनों के उच्चारण में स्वर की सहायता आवश्यक होती है, इसलिए हर व्यञ्जन के साथ ‘अ’ जोड़ा जाता है (क् + अ = क)। व्यञ्जन के चार भेद हैं – स्पर्श (पाँच वर्ग, 25 वर्ण), अन्तःस्थ (य र ल व), ऊष्म (श ष स ह), तथा अयोगवाह (अं, अः)। व्यञ्जन के साथ स्वर-मात्रा जोड़ने से गुणिताक्षर बनते हैं, जैसे क, का, कि, की, कु, के, को, कौ। यही वर्गीकरण शुद्ध उच्चारण एवं लेखन की नींव है।

7. वर्णों के छह उच्चारण-स्थानों को पाणिनीय-शिक्षा के सूत्रों सहित समझाइए।

उत्तरआस्य (मुख एवं नासिका) में वर्णों के छह उच्चारण-स्थान हैं। पाणिनीय-शिक्षा के सूत्र इन्हें इस प्रकार बताते हैं – ‘अकुहविसर्जनीयाः कण्ठ्याः’ (अ आ, क-वर्ग, ह, विसर्ग – कण्ठ से); ‘इचुयशास्तालव्याः’ (इ ई, च-वर्ग, य, श – तालु से); ‘ऋटुरषामूर्धन्याः’ (ऋ, ट-वर्ग, र, ष – मूर्धा से)।इसी प्रकार ‘ऌतुलसा दन्त्याः’ (ऌ, त-वर्ग, ल, स – दन्त से); ‘उपूपध्मानीया ओष्ठ्याः’ (उ ऊ, प-वर्ग – ओष्ठ से); एवं अनुस्वार आदि नासिका से उच्चारित होते हैं। ए, ऐ कण्ठ-तालव्य, ओ, औ कण्ठोष्ठ्य तथा व दन्त्योष्ठ्य वर्ण है। इस प्रकार प्रत्येक वर्ण का एक निश्चित उच्चारण-स्थान है, जिसका ज्ञान शुद्ध उच्चारण के लिए आवश्यक है।

8. गुणिताक्षर किसे कहते हैं? उदाहरण देकर समझाइए।

उत्तरव्यञ्जन के साथ विभिन्न स्वरों के संयोग (मात्रा-योजन) से बने अक्षर गुणिताक्षर कहलाते हैं। प्रत्येक स्वर का एक मात्रा-चिह्न होता है – आ = ा, इ = ि, ई = ी, उ = ु, ऊ = ू, ऋ = ृ, ए = े, ऐ = ै, ओ = ो, औ = ौ।उदाहरण – क् + अ = क, क् + आ = का, क् + इ = कि, क् + ई = की, क् + उ = कु, क् + ऊ = कू, क् + ए = के, क् + ऐ = कै, क् + ओ = को, क् + औ = कौ। इसी प्रकार च, ट, त, प आदि सभी व्यञ्जनों के गुणिताक्षर बनते हैं। गुणिताक्षरों के ज्ञान से ही शब्दों का शुद्ध लेखन सम्भव होता है।

MCQ & अभिकथन-कारण

1. वर्ण कितने प्रकार के होते हैं?

(क) एक

(ख) दो (स्वर एवं व्यञ्जन)

(ग) तीन

(घ) चार

उत्तर(ख) दो (स्वर एवं व्यञ्जन)।

2. इनमें से सन्ध्यक्षर स्वर कौन-सा है?

(क) अ

(ख) इ

(ग) ऐ

(घ) उ

उत्तर(ग) ऐ। (अ + ए = ऐ)

3. ‘अ + उ’ की सन्धि से कौन-सा स्वर बनता है?

(क) ए

(ख) ओ

(ग) ऐ

(घ) औ

उत्तर(ख) ओ।

4. ‘य र ल व’ किस प्रकार के व्यञ्जन हैं?

(क) स्पर्श

(ख) अन्तःस्थ

(ग) ऊष्म

(घ) अयोगवाह

उत्तर(ख) अन्तःस्थ। (इन्हें ‘अर्ध-स्वर’ भी कहते हैं।)

5. ऊष्म-वर्ण कौन-से हैं?

(क) क ख ग घ

(ख) य र ल व

(ग) श ष स ह

(घ) अं अः

उत्तर(ग) श ष स ह।

6. अयोगवाह वर्ण कौन-से हैं?

(क) ए ऐ

(ख) अं (अनुस्वार) एवं अः (विसर्ग)

(ग) ओ औ

(घ) ङ ञ

उत्तर(ख) अं (अनुस्वार) एवं अः (विसर्ग)।

7. ‘क ख ग घ ङ’ का उच्चारण-स्थान क्या है?

(क) तालु

(ख) कण्ठ

(ग) मूर्धा

(घ) ओष्ठ

उत्तर(ख) कण्ठ। (अकुहविसर्जनीयाः कण्ठ्याः)

8. ‘प फ ब भ म’ का उच्चारण-स्थान कौन-सा है?

(क) दन्त

(ख) तालु

(ग) ओष्ठ

(घ) नासिका

उत्तर(ग) ओष्ठ। (उपूपध्मानीया ओष्ठ्याः)

9. आस्य में वर्णों के कुल कितने उच्चारण-स्थान हैं?

(क) चार

(ख) पाँच

(ग) छह

(घ) सात

उत्तर(ग) छह। (कण्ठ, तालु, मूर्धा, दन्त, ओष्ठ, नासिका)

10. किस स्वर का दीर्घ रूप नहीं होता?

(क) अ

(ख) इ

(ग) ऌ

(घ) उ

उत्तर(ग) ऌ। (‘ऌ’-वर्णस्य दीर्घाः न सन्ति।)
उत्तर-कुंजी: 1-(ख), 2-(ग), 3-(ख), 4-(ख), 5-(ग), 6-(ख), 7-(ख), 8-(ग), 9-(ग), 10-(ग)

अभिकथन-कारण – नीचे अभिकथन (A) और कारण (R) दिए गए हैं। सही विकल्प चुनिए—
(क) A और R दोनों सही, R, A की सही व्याख्या है। (ख) A और R दोनों सही, पर R, A की सही व्याख्या नहीं। (ग) A सही, R गलत। (घ) A गलत, R सही।

1. अभिकथन (A): व्यञ्जनों के उच्चारण में स्वर की सहायता आवश्यक होती है।

कारण (R): इसीलिए वर्णमाला में प्रत्येक व्यञ्जन के साथ ‘अ’ स्वर जोड़ा जाता है (क् + अ = क)।

उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है।

2. अभिकथन (A): ‘ए, ऐ, ओ, औ’ सन्ध्यक्षर स्वर हैं।

कारण (R): इन सन्ध्यक्षरों के ह्रस्व रूप भी होते हैं।

उत्तर(ग) A सही है, किन्तु R गलत है – सन्ध्यक्षरों के ह्रस्व रूप नहीं होते।

3. अभिकथन (A): ‘ङ ञ ण न म’ का उच्चारण नासिका से भी होता है।

कारण (R): ये स्वस्थान के साथ नासिका-स्थान से भी उच्चारित होते हैं (नासिकास्थानाः)।

उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है।

4. अभिकथन (A): व्यञ्जन के साथ स्वर-मात्रा जोड़ने से गुणिताक्षर बनते हैं।

कारण (R): क् + आ = का, क् + इ = कि – इस प्रकार गुणिताक्षर बनते हैं।

उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है।

5. अभिकथन (A): ‘व’ दन्त्योष्ठ्य वर्ण है।

कारण (R): इसका उच्चारण केवल कण्ठ-स्थान से होता है।

उत्तर(ग) A सही है, किन्तु R गलत है – ‘व’ का उच्चारण दन्त एवं ओष्ठ दोनों स्थानों से होता है।

परीक्षा-सुझाव एवं सामान्य त्रुटियाँ

परीक्षा-सुझाव (Exam Tips)

  • स्वर एवं व्यञ्जन का वर्गीकरण (समानाक्षर/सन्ध्यक्षर; स्पर्श/अन्तःस्थ/ऊष्म/अयोगवाह) तालिका सहित याद रखें।
  • छह उच्चारण-स्थान एवं उनके पाणिनीय-शिक्षा-सूत्र (अकुहविसर्जनीयाः कण्ठ्याः आदि) कण्ठस्थ करें।
  • गुणिताक्षर (क, का, कि, की…) एवं मात्रा-चिह्न शुद्ध लिखने का अभ्यास करें।
  • स्वर-सन्धि के सूत्र याद रखें – अ + इ = ए, अ + उ = ओ, अ + ए = ऐ, अ + ओ = औ।
  • शब्दार्थ-तालिका के कठिन शब्द (पित्राज्ञा, लाकृतिः, मातॄणम्, कॢप्तम्) शुद्ध मात्रा सहित याद करें।

सामान्य त्रुटियाँ (Common Mistakes)

  • ‘ऌ’ का दीर्घ रूप लिख देना – इसका दीर्घ रूप नहीं होता।
  • सन्ध्यक्षर (ए, ऐ, ओ, औ) के ह्रस्व रूप मान लेना – इनके ह्रस्व रूप नहीं होते।
  • व्यञ्जन के उच्चारण-स्थान में भ्रम (जैसे प-वर्ग को कण्ठ्य कह देना – वह ओष्ठ्य है)।
  • अनुस्वार (अं) एवं विसर्ग (अः) को स्वर मान लेना – ये अयोगवाह व्यञ्जन-वर्ण हैं।
  • मात्रा-चिह्न (ि, ी, ु, ू) की दिशा/स्थान की अशुद्धि।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

दीपकम् कक्षा 6 का पहला पाठ ‘वयं वर्णमालां पठामः’ किस विषय पर है?

यह पाठ संस्कृत-वर्णमाला (alphabet) पर है। इसमें स्वर एवं व्यञ्जन का वर्गीकरण, अनुनासिक-स्वर, गुणिताक्षर (मात्रा-संयोजन) तथा छह उच्चारण-स्थान सिखाए गए हैं।

संस्कृत में वर्ण कितने प्रकार के होते हैं?

वर्ण दो प्रकार के होते हैं – स्वर (स्वतन्त्र उच्चारण वाले) एवं व्यञ्जन (जिनके उच्चारण में स्वर की सहायता आवश्यक है)।

वर्णों के कितने उच्चारण-स्थान होते हैं?

आस्य (मुख एवं नासिका) में छह उच्चारण-स्थान होते हैं – कण्ठ, तालु, मूर्धा, दन्त, ओष्ठ एवं नासिका। पाणिनीय-शिक्षा के सूत्र बताते हैं कि कौन-से वर्ण किस स्थान से उच्चारित होते हैं।

वर्णमाला, शब्दार्थ-तालिका, प्रश्न एवं अभ्यास-शीर्षक NCERT दीपकम् पुस्तक से ज्यों-के-त्यों लिए गए हैं; व्याख्या, सार एवं उत्तर ClearStudy द्वारा मौलिक रूप से तैयार किए गए हैं। (चित्र-आधारित अभ्यास के नमूना-उत्तर पुस्तक के चित्रों के अनुसार समायोजित करें।)

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