Class 6 Sanskrit Deepakam Chapter 16 Solutions (NCERT 2026–27) – वृक्षाः सत्पुरुषाः इव
This page gives the complete solution for Class 6 Sanskrit Deepakam (दीपकम्) Chapter 16 ‘वृक्षाः सत्पुरुषाः इव’ (षोडशः पाठः) – a lesson made of peropkar-themed सुभाषितानि (subhāṣitāni / niti-verses) that compare trees to noble men, with their मूल पाठ, पदच्छेद, अन्वय, भावार्थ, सार (Hindi summary), शब्दार्थ, and original, exam-ready answers to every question of the अभ्यासः along with the व्याकरण (विभक्ति / लट्-लकार) tables, extra questions, MCQs, अभिकथन-कारण and FAQs.
- पाठ का अवलोकन (Chapter Overview)
- पाठ-परिचय / प्रसंग
- मूल पाठ (सुभाषितानि) + अन्वय
- सार (Hindi Summary)
- शब्दार्थ (Word-meanings)
- अभ्यासः (वयम् अभ्यासं कुर्मः)
- व्याकरण-तालिकाः (विभक्ति / लट्-लकार)
- योग्यताविस्तरः & परियोजनाकार्यम्
- अतिरिक्त प्रश्न (Extra Questions)
- MCQ & अभिकथन-कारण
- परीक्षा-सुझाव एवं सामान्य त्रुटियाँ
- अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
पाठ का अवलोकन (Chapter Overview)
दीपकम् कक्षा 6 का अन्तिम (षोडश) पाठ ‘वृक्षाः सत्पुरुषाः इव’ (वृक्ष सज्जनों के समान हैं) परोपकार के विषय पर आधारित कुछ प्रसिद्ध सुभाषितों (नीति-श्लोकों) का संकलन है। पाठ का आरम्भ एक संवाद से होता है – विद्यालय में पर्यावरण-संरक्षण की एक प्रदर्शनी लगी है, जिसे छात्र देखते हैं तथा शिक्षक के साथ बातचीत करते हैं कि वृक्ष शुद्ध वायु, फल एवं पुष्प देते हैं, इसलिए वे पूज्य हैं। इसी प्रसंग में ‘वृक्ष सत्पुरुष के समान हैं’ भाव वाले सुभाषित गाए जाते हैं। पाठ का केन्द्रीय भाव परोपकार, त्याग एवं प्रकृति-संरक्षण है – जैसे वृक्ष स्वयं धूप में खड़े रहकर दूसरों को छाया देते हैं और अपने फल स्वयं नहीं खाते, वैसे ही सज्जन लोग स्वयं कष्ट सहकर भी दूसरों का हित करते हैं।
पाठ-परिचय / प्रसंग
यह पाठ परोपकार-विषयक सुभाषितों का संग्रह है। ये नीति-श्लोक संस्कृत-साहित्य की उस परम्परा से लिए गए हैं जो वृक्ष, नदी, गौ एवं मेघ जैसे प्रकृति-तत्त्वों को परोपकार का आदर्श मानती है। श्लोकों में बताया गया है कि वृक्ष स्वयं आतप (धूप) में खड़े रहते हैं, परन्तु दूसरों को छाया देते हैं; अपने फल स्वयं नहीं खाते, अपितु दूसरों के लिए देते हैं। इसी प्रकार नदियाँ अपना जल स्वयं नहीं पीतीं और मेघ अपनी वर्षा से उत्पन्न अन्न स्वयं नहीं खाते – क्योंकि सज्जनों की समस्त सम्पदा परोपकार के लिए ही होती है। पाठ का अन्तिम भाग एक रोचक प्रहेलिका (पहेली) तथा संस्कृत-संभाषण का परिशिष्ट है।
मूल पाठ (सुभाषितानि) + अन्वय
(पाठ में दिए गए परोपकार-विषयक सुभाषित, उनके पदच्छेद, अन्वय एवं भावार्थ सहित – ज्यों-के-त्यों।)
फलान्यपि परार्थाय वृक्षाः सत्पुरुषा इव ॥ १ ॥
पदच्छेदः – छायाम् अन्यस्य कुर्वन्ति तिष्ठन्ति स्वयम् आतपे फलानि अपि परार्थाय वृक्षाः सत्पुरुषाः इव ।
अन्वयः – (वृक्षाः) स्वयम् आतपे तिष्ठन्ति (किन्तु) अन्यस्य छायां कुर्वन्ति, फलानि अपि परार्थाय (यच्छन्ति), (अतः) वृक्षाः सत्पुरुषाः इव (सन्ति) ।
भावार्थः – वृक्ष स्वयं सूर्य की धूप में खड़े रहते हैं, परन्तु दूसरों को छाया देते हैं; अपने फल भी स्वयं न खाकर दूसरों के लिए देते हैं। अतः वे सज्जनों के समान हैं, क्योंकि सज्जन भी स्वयं कष्ट सहकर भी दूसरों का हित करते हैं।
दशह्रदसमः पुत्रः दशपुत्रसमो द्रुमः ॥ २ ॥
पदच्छेदः – दशकूपसमा वापी दशवापीसमः ह्रदः दशह्रदसमः पुत्रः दशपुत्रसमः द्रुमः ।
अन्वयः – दशकूपसमा वापी (अस्ति), दशवापीसमः ह्रदः (अस्ति), दशह्रदसमः पुत्रः (अस्ति), दशपुत्रसमः द्रुमः (अस्ति) ।
भावार्थः – दस कुओं के समान एक बावड़ी होती है, दस बावड़ियों के समान एक तालाब, दस तालाबों के समान एक पुत्र तथा दस पुत्रों के समान एक वृक्ष होता है। अर्थात् एक वृक्ष सर्वाधिक उपकारी एवं मूल्यवान् होता है। अतः सबको वृक्षारोपण करना चाहिए।
सुजनस्येव येषां वै विमुखा यान्ति नार्थिनः ॥ ३ ॥
पदच्छेदः – अहो ! एषाम् वरम् जन्म सर्वप्राणि-उपजीवनम् सुजनस्य इव येषाम् वै विमुखाः यान्ति न अर्थिनः ।
अन्वयः – अहो ! एषां सर्वप्राण्युपजीवनं जन्म वरम् (अस्ति) । सुजनस्य इव येषाम् अर्थिनः विमुखाः न यान्ति ।
भावार्थः – अहो ! इन वृक्षों का जन्म श्रेष्ठ है, क्योंकि इनका जीवन समस्त प्राणियों के जीवन का आधार है। जैसे सज्जनों के पास से याचक निराश होकर नहीं लौटते, वैसे ही वृक्षों के पास से भी अर्थी (माँगने वाले) निराश नहीं लौटते; वृक्ष उन्हें फल, पुष्प एवं छाया देते हैं।
परोपकाराय दुहन्ति गावः परोपकारार्थमिदं शरीरम् ॥ ४ ॥
पदच्छेदः – परोपकाराय फलन्ति वृक्षाः परोपकाराय वहन्ति नद्यः परोपकाराय दुहन्ति गावः परोपकारार्थम् इदम् शरीरम् ।
अन्वयः – वृक्षाः परोपकाराय फलन्ति, नद्यः परोपकाराय वहन्ति, गावः परोपकाराय दुहन्ति, परोपकारार्थम् (एव) इदं शरीरम् (अस्ति) ।
भावार्थः – वृक्षों के फल दूसरे खाते हैं, वृक्ष स्वयं नहीं खाते। नदियों के जल का उपयोग भी दूसरे प्राणी ही करते हैं। गाएँ भी दूसरों के लिए ही दूध देती हैं। इसी प्रकार हमारा यह शरीर भी परोपकार के लिए ही है – इसका उपयोग दूसरों के हित में होना चाहिए।
धन्या महीरुहा येषां विमुखा यान्ति नार्थिनः ॥ ५ ॥
पदच्छेदः – पुष्प-पत्र-फल-छाया-मूल-वल्कल-दारुभिः धन्याः महीरुहाः येषाम् विमुखाः यान्ति न अर्थिनः ।
अन्वयः – येषां पुष्प-पत्र-फल-छाया-मूल-वल्कल-दारुभिः अर्थिनः विमुखाः न यान्ति, (ते) महीरुहाः धन्याः (सन्ति) ।
भावार्थः – प्राणी वृक्ष से पुष्प, पत्ते, फल, छाया, मूल (जड़), वल्कल (छाल) एवं काष्ठ (लकड़ी) प्राप्त करते हैं। अर्थात् वृक्ष के पास जो कुछ भी है, वह सब दूसरों के लिए ही है। वृक्ष कभी याचकों को निराश नहीं करते; अतः वे (महीरुह) धन्य हैं।
नादन्ति सस्यं खलु वारिवाहाः परोपकाराय सतां विभूतयः ॥ ६ ॥
पदच्छेदः – पिबन्ति नद्यः स्वयम् एव न अम्भः, स्वयम् न खादन्ति फलानि वृक्षाः । न अदन्ति सस्यम् खलु वारिवाहाः, परोपकाराय सताम् विभूतयः ।
अन्वयः – नद्यः अम्भः स्वयम् एव न पिबन्ति । वृक्षाः अपि फलानि स्वयं न खादन्ति । वारिवाहाः (अपि) सस्यं न अदन्ति खलु । (यतः) सतां विभूतयः परोपकाराय (भवन्ति) ।
भावार्थः – नदियाँ अपना जल स्वयं नहीं पीतीं, अपितु दूसरों के उपयोग के लिए देती हैं। इसी प्रकार वृक्ष भी अपने फल स्वयं नहीं खाते। मेघ भी वर्षा करते हैं, किन्तु वर्षा से उत्पन्न अन्न को स्वयं नहीं खाते। इसी प्रकार सज्जनों की सम्पदा भी परोपकार के लिए ही होती है।
सार (Hindi Summary)
‘वृक्षाः सत्पुरुषाः इव’ पाठ का आरम्भ विद्यालय में आयोजित पर्यावरण-संरक्षण की एक प्रदर्शनी के रोचक प्रसंग से होता है। छात्र प्रदर्शनी देखते हैं और शिक्षक के साथ संवाद करते हैं। एक छात्र बताता है कि उसने जीवविज्ञान की पुस्तक में पढ़ा है कि वृक्ष शुद्ध वायु देते हैं, तो दूसरा बताता है कि उसकी माता कहती हैं कि वृक्ष पूज्य होते हैं। शिक्षक भी पुष्टि करते हैं कि वृक्ष शुद्ध वायु, फल एवं पुष्प – सब कुछ देते हैं, इसलिए वे पूज्य हैं। तभी एक छात्रा ‘वृक्ष सत्पुरुष के समान हैं’ भाव वाला सुभाषित सुनाती है और सब मिलकर गाते हैं।
पाठ में परोपकार-विषयक छह प्रसिद्ध सुभाषित दिए गए हैं। इनका केन्द्रीय भाव यह है कि वृक्ष स्वयं धूप में खड़े रहकर दूसरों को छाया देते हैं और अपने फल स्वयं न खाकर दूसरों के लिए देते हैं – ठीक सज्जनों के समान, जो स्वयं कष्ट सहकर भी दूसरों का हित करते हैं। एक श्लोक में बताया गया है कि एक वृक्ष दस पुत्रों के समान मूल्यवान् है, अतः सबको वृक्षारोपण करना चाहिए। आगे कहा गया है कि वृक्षों के पास से याचक कभी निराश होकर नहीं लौटते, क्योंकि वे पुष्प, पत्ते, फल, छाया, जड़, छाल एवं लकड़ी – सब कुछ देते हैं; इसलिए वे धन्य हैं।
अन्तिम सुभाषितों में नदी, गौ एवं मेघ के उदाहरण देकर समझाया गया है कि नदियाँ अपना जल स्वयं नहीं पीतीं, गाएँ दूसरों के लिए दूध देती हैं और मेघ वर्षा से उत्पन्न अन्न स्वयं नहीं खाते – क्योंकि सज्जनों की समस्त सम्पदा परोपकार के लिए ही होती है। इसी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि हमारा यह शरीर भी परोपकार के लिए है। संक्षेप में, यह पाठ हमें परोपकार, त्याग, उदारता एवं प्रकृति-संरक्षण (वृक्षारोपण) की प्रेरणा देता है।
शब्दार्थ (Word-meanings)
| शब्दः (Sanskrit) | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| आतपे | धूप में (सूर्यताप में) | In the sunlight |
| परार्थाय | दूसरों के उपकार के लिए | For the sake of others |
| सत्पुरुषाः | सज्जन लोग | Noble men |
| छायाम् | छाया को | Shade |
| द्रुमः | पेड़, वृक्ष | Tree |
| वापी | बावड़ी | Stepwell |
| ह्रदः | तालाब / झील | Pond / Lake |
| वरम् | श्रेष्ठ | Best |
| अर्थिनः | याचक (प्राप्त करने के इच्छुक) | Beggars / those wishing to receive |
| विमुखाः | निराश होकर लौटे हुए | Disappointed / turning away |
| वहन्ति | बहती हैं | Flow |
| दुहन्ति | दूध देती हैं | Yield milk |
| महीरुहाः | वृक्ष (पृथ्वी से उगने वाले) | Trees |
| वल्कलम् | पेड़ की छाल | Bark of tree |
| दारुभिः | लकड़ियों से (काष्ठ से) | By wood |
| अम्भः | पानी (जल) | Water |
| सस्यम् | अन्न, फसल | Crop / grain |
| वारिवाहाः | बादल (मेघ) | Clouds |
| विभूतयः | समृद्धियाँ, सम्पदाएँ | Prosperity / riches |
| सताम् | सज्जनों की | Of the noble ones |
अभ्यासः (वयम् अभ्यासं कुर्मः)
1. पाठे लिखितानि सुभाषितानि सस्वरं पठन्तु, अवगच्छन्तु, लिखन्तु स्मरन्तु च ।
2. पाठस्य आधारेण अधोलिखितानां प्रश्नानाम् उत्तराणि एकपदेन लिखन्तु —
(क) वृक्षाः स्वयं कुत्र तिष्ठन्ति ?
(ख) परोपकाराय काः वहन्ति ?
(ग) दशवापीसमः कः भवति ?
(घ) सत्पुरुषाः इव के सन्ति ?
(ङ) अर्थिनः केभ्यः विमुखाः न यान्ति ?
(च) वृक्षाः स्वयं कानि न खादन्ति ?
3. पाठस्य आधारेण अधोलिखितानां प्रश्नानाम् उत्तराणि पूर्णवाक्येन लिखन्तु —
(क) नद्यः किं न पिबन्ति ?
(ख) वृक्षाः अस्मभ्यं किं किं यच्छन्ति ?
(ग) इदं शरीरं किमर्थम् अस्ति ?
(घ) दशपुत्रसमः कः भवति ?
(ङ) केषां विभूतयः परोपकाराय भवन्ति ?
(च) अन्यस्य छायां के कुर्वन्ति ?
4. पिट्टकातः उचितानि पदानि चित्वा रिक्तस्थानानि पूरयन्तु —
पिट्टका (शब्द-मञ्जूषा): तिष्ठन्ति, सुजनस्येव, विभूतयः, वृक्षाः, फलानि, दशपुत्रसमः, परोपकारार्थम्
5. उदाहरणानुसारम् अधोलिखितेषु वाक्येषु स्थूलाक्षरपदानां विभक्तिं निर्दिशन्तु —
यथा – वृक्षाः अन्यस्य कृते छायां कुर्वन्ति । → द्वितीया विभक्तिः ।
| वाक्यम् (स्थूल/रेखाङ्कित पद मोटे अक्षरों में) | विभक्तिः (उत्तर) |
|---|---|
| (क) वृक्षाः अन्यस्य कृते छायां कुर्वन्ति । | द्वितीया विभक्तिः |
| (ख) वृक्षाः परार्थाय फलानि यच्छन्ति । | चतुर्थी विभक्तिः |
| (ग) वृक्षाः सत्पुरुषाः इव सन्ति । | प्रथमा विभक्तिः |
| (घ) द्रुमः दशसन्तानसमः भवति । | प्रथमा विभक्तिः |
| (ङ) वृक्षः प्राणिभ्यः काष्ठानि यच्छति । | चतुर्थी विभक्तिः |
| (च) नद्यः जलं स्वयमेव न पिबन्ति । | द्वितीया विभक्तिः |
| (छ) सज्जनानां सङ्गतिं करोतु । | षष्ठी विभक्तिः |
6. अधोलिखितानां पदानां द्विवचने बहुवचने च रूपाणि लिखन्तु —
| पदम् (एकवचनम्) | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
|---|---|---|
| (क) वृक्षः | वृक्षौ | वृक्षाः |
| (ख) मेघः | मेघौ | मेघाः |
| (ग) ह्रदः | ह्रदौ | ह्रदाः |
| (घ) सत्पुरुषः | सत्पुरुषौ | सत्पुरुषाः |
| (ङ) छाया | छाये | छायाः |
| (च) वापी | वाप्यौ | वाप्यः |
| (छ) नदी | नद्यौ | नद्यः |
| (ज) शरीरम् | शरीरे | शरीराणि |
| (झ) पुष्पम् | पुष्पे | पुष्पाणि |
7. अधोलिखितानां पदानां परस्परं समुचितं मेलनं कृत्वा ‘कः किं ददाति’ इति लिखन्तु —
यथा – वृक्षः शुद्धं वायुं ददाति ।
| कः (देने वाला) | किम् (देय वस्तु) | वाक्यम् (उत्तर) |
|---|---|---|
| (क) वृक्षः | शुद्धं वायुम् | वृक्षः शुद्धं वायुं ददाति । |
| (ख) गौः | दुग्धम् | गौः दुग्धं ददाति । |
| (ग) सूर्यः | प्रकाशम् | सूर्यः प्रकाशं ददाति । |
| (घ) नदी | जलम् | नदी जलं ददाति । |
| (ङ) अग्निः | तापम् | अग्निः तापं ददाति । |
| (च) शिक्षकः | विद्याम् | शिक्षकः विद्यां ददाति । |
8. अधोलिखितानां क्रियापदानां लट्लकारे प्रथमपुरुषस्य रूपाणि लिखन्तु —
यथा – कुर्वन्ति → करोति (एकवचनम्), कुरुतः (द्विवचनम्), कुर्वन्ति (बहुवचनम्) ।
| क्रियापदम् | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
|---|---|---|---|
| कुर्वन्ति | करोति | कुरुतः | कुर्वन्ति |
| तिष्ठन्ति | तिष्ठति | तिष्ठतः | तिष्ठन्ति |
| फलन्ति | फलति | फलतः | फलन्ति |
| यान्ति | याति | यातः | यान्ति |
| पिबन्ति | पिबति | पिबतः | पिबन्ति |
| खादन्ति | खादति | खादतः | खादन्ति |
व्याकरण-तालिकाः (विभक्ति / लट्-लकार)
इस पाठ के अभ्यास से जुड़े महत्त्वपूर्ण व्याकरण-बिन्दु संक्षेप में नीचे दिए गए हैं।
1. कारक एवं विभक्ति (इस पाठ में प्रयुक्त)
| विभक्तिः | कारक/अर्थ | पाठ का उदाहरण |
|---|---|---|
| प्रथमा | कर्ता | वृक्षाः सत्पुरुषाः इव सन्ति |
| द्वितीया | कर्म | छायां कुर्वन्ति; जलं न पिबन्ति |
| चतुर्थी | सम्प्रदान / प्रयोजन | परार्थाय; प्राणिभ्यः; परोपकाराय |
| षष्ठी | सम्बन्ध | सज्जनानां सङ्गतिः; सतां विभूतयः |
| सप्तमी | अधिकरण | आतपे तिष्ठन्ति |
2. अकारान्त पुल्लिङ्ग शब्द – ‘वृक्ष’ (प्रथमा विभक्ति)
| वचनम् | रूपम् |
|---|---|
| एकवचनम् | वृक्षः |
| द्विवचनम् | वृक्षौ |
| बहुवचनम् | वृक्षाः |
3. लट्-लकारः (वर्तमानकाल) – ‘पठ्’ धातु (परस्मैपद)
| पुरुषः | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
|---|---|---|---|
| प्रथमपुरुषः | पठति | पठतः | पठन्ति |
| मध्यमपुरुषः | पठसि | पठथः | पठथ |
| उत्तमपुरुषः | पठामि | पठावः | पठामः |
पाठ के क्रियापद (तिष्ठति, फलति, याति, पिबति, खादति आदि) इसी प्रकार लट्-लकार में चलते हैं; ‘कुर्वन्ति’ (कृ-धातु, तनादिगण) के रूप – करोति/कुरुतः/कुर्वन्ति।
योग्यताविस्तरः & परियोजनाकार्यम्
योग्यताविस्तरः (प्रहेलिका / पहेली)
पाठ के अन्त में एक रोचक प्रहेलिका (पहेली) दी गई है – इसे पढ़कर उत्तर बताइए:
त्वग्वस्त्रधारी न च सिद्धयोगी जलं च बिभ्रन्न घटो न मेघः ॥
परियोजनाकार्यम् (Project Work)
1. विद्यालयं गृहं वा परितः विद्यमानानां पञ्च-पादपानां (वृक्षाणां) संरक्षणं कुर्वन्तु ।
2. अन्तर्जालस्य साहाय्येन परोपकारविषये दश-सुभाषितानां संग्रहणं कुर्वन्तु ।
अतिरिक्त प्रश्न (Extra Questions)
लघु उत्तरीय प्रश्न (30–40 शब्द)
1. इस पाठ का मुख्य विषय क्या है?
2. पाठ के आरम्भ में दिए गए संवाद का प्रसंग क्या है?
3. वृक्षों की तुलना सत्पुरुषों से क्यों की गई है?
4. ‘दशपुत्रसमो द्रुमः’ से क्या तात्पर्य है?
5. नदी, गौ एवं मेघ का उदाहरण किस भाव को स्पष्ट करता है?
दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (100–120 शब्द)
6. ‘वृक्षाः सत्पुरुषाः इव’ पाठ का केन्द्रीय संदेश अपने शब्दों में लिखिए।
7. पाठ में वृक्षों के परोपकारी स्वभाव का वर्णन सुभाषितों के आधार पर कीजिए।
8. परोपकार का जीवन में क्या महत्त्व है? पाठ के आधार पर समझाइए।
MCQ & अभिकथन-कारण
1. इस पाठ का मुख्य विषय क्या है?
(क) युद्धम्
(ख) परोपकारः
(ग) धनसञ्चयः
(घ) क्रीडा
2. वृक्षाः स्वयं कहाँ खड़े रहते हैं?
(क) छायायाम्
(ख) जले
(ग) आतपे
(घ) गृहे
3. ‘द्रुमः’ शब्द का अर्थ है—
(क) तालाब
(ख) वृक्ष
(ग) बादल
(घ) नदी
4. एक वृक्ष किसके समान मूल्यवान् बताया गया है?
(क) दश कूपानां समः
(ख) दश वापीनां समः
(ग) दश पुत्राणां समः
(घ) दश ह्रदानां समः
5. परोपकार के लिए कौन बहती हैं?
(क) वृक्षाः
(ख) नद्यः
(ग) गावः
(घ) मेघाः
6. ‘वारिवाहाः’ शब्द का अर्थ है—
(क) नदियाँ
(ख) वृक्ष
(ग) बादल (मेघ)
(घ) गाएँ
7. वृक्ष अपने फल किसके लिए देते हैं?
(क) स्वयं खाने के लिए
(ख) दूसरों के लिए (परार्थाय)
(ग) सञ्चय के लिए
(घ) किसी के लिए नहीं
8. ‘महीरुहाः’ पद किसके लिए प्रयुक्त हुआ है?
(क) नदियों के लिए
(ख) वृक्षों के लिए
(ग) पर्वतों के लिए
(घ) बादलों के लिए
9. ‘परोपकारार्थम् इदं शरीरम्’ का भाव है—
(क) यह शरीर भोग के लिए है
(ख) यह शरीर परोपकार के लिए है
(ग) यह शरीर धन के लिए है
(घ) यह शरीर विश्राम के लिए है
10. पाठ के आरम्भ में विद्यालय में किसकी प्रदर्शनी लगी थी?
(क) विज्ञान की
(ख) चित्रकला की
(ग) पर्यावरण-संरक्षण की
(घ) पुस्तकों की
अभिकथन-कारण – नीचे अभिकथन (A) और कारण (R) दिए गए हैं। सही विकल्प चुनिए—
(क) A और R दोनों सही, R, A की सही व्याख्या है। (ख) A और R दोनों सही, पर R, A की सही व्याख्या नहीं। (ग) A सही, R गलत। (घ) A गलत, R सही।
1. अभिकथन (A): वृक्षों की तुलना सत्पुरुषों से की गई है।
कारण (R): वृक्ष स्वयं धूप में खड़े रहकर दूसरों को छाया देते हैं और अपने फल दूसरों के लिए देते हैं।
2. अभिकथन (A): नदियाँ अपना जल स्वयं नहीं पीतीं।
कारण (R): सज्जनों की समस्त सम्पदा परोपकार के लिए ही होती है।
3. अभिकथन (A): एक वृक्ष दस पुत्रों के समान मूल्यवान् होता है।
कारण (R): वृक्ष केवल लकड़ी ही प्रदान करते हैं, अन्य कोई लाभ नहीं देते।
4. अभिकथन (A): वृक्षों के पास से याचक निराश होकर नहीं लौटते।
कारण (R): वृक्ष पुष्प, पत्ते, फल, छाया, मूल, वल्कल एवं काष्ठ – सब कुछ देते हैं।
5. अभिकथन (A): यह शरीर परोपकार के लिए है।
कारण (R): वृक्ष, नदी, गौ एवं मेघ की भाँति मनुष्य की सम्पदा भी दूसरों के हित के लिए ही होनी चाहिए।
परीक्षा-सुझाव एवं सामान्य त्रुटियाँ
परीक्षा-सुझाव (Exam Tips)
- सभी सुभाषित कण्ठस्थ करें – श्लोक-पूर्ति एवं रिक्तस्थान-पूर्ति के प्रश्न प्रायः इन्हीं से आते हैं।
- शब्दार्थ (आतपे, परार्थाय, द्रुमः, अर्थिनः, वारिवाहाः, विभूतयः आदि) हिन्दी एवं अंग्रेज़ी दोनों में याद रखें।
- एकपदेन उत्तर वाले प्रश्नों में केवल एक उपयुक्त पद ही लिखें; पूर्णवाक्येन वाले में पूरा वाक्य।
- विभक्ति-निर्देश में कारक (प्रथमा, द्वितीया, चतुर्थी, षष्ठी, सप्तमी) का ध्यान रखें।
- लट्-लकार में एकवचन-द्विवचन-बहुवचन के रूप (तिष्ठति/तिष्ठतः/तिष्ठन्ति आदि) सही लिखें।
सामान्य त्रुटियाँ (Common Mistakes)
- सन्धि-विच्छेद की भूल – ‘फलान्यपि’ = फलानि + अपि; ‘नार्थिनः’ = न + अर्थिनः।
- ‘द्रुमः’ एवं ‘ह्रदः’ का अर्थ बदल देना – द्रुमः = वृक्ष, ह्रदः = तालाब।
- मात्रा एवं विसर्ग की अशुद्धि – वृक्षाः, नद्यः, विभूतयः को शुद्ध लिखें।
- ‘वारिवाहाः’ को नदी समझ लेना – इसका अर्थ है मेघ (बादल)।
- द्विवचन-बहुवचन के रूप मिलाना (यथा – वृक्षौ/वृक्षाः, नद्यौ/नद्यः)।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
दीपकम् कक्षा 6 का पाठ 16 ‘वृक्षाः सत्पुरुषाः इव’ किस विषय पर आधारित है?
यह पाठ परोपकार के विषय पर आधारित सुभाषितों (नीति-श्लोकों) का संकलन है, जिनमें वृक्षों की तुलना सज्जनों (सत्पुरुषों) से की गई है, क्योंकि वृक्ष स्वयं कष्ट सहकर भी दूसरों का हित करते हैं।
‘परोपकाराय फलन्ति वृक्षाः’ का अर्थ क्या है?
इसका अर्थ है – ‘वृक्ष दूसरों के उपकार के लिए फलते हैं’। वृक्ष अपने फल स्वयं नहीं खाते, अपितु दूसरों के लिए देते हैं; इसी प्रकार नदियाँ, गाएँ एवं मेघ भी परोपकार के लिए ही अपनी सम्पदा अर्पित करते हैं।
एक वृक्ष को कितने पुत्रों के समान मूल्यवान् बताया गया है?
पाठ के अनुसार एक वृक्ष (द्रुमः) दस पुत्रों के समान मूल्यवान् एवं उपकारी होता है – ‘दशपुत्रसमो द्रुमः’। इसी कारण सभी को वृक्षारोपण करना चाहिए।
मूल पाठ, श्लोक, प्रश्न एवं अभ्यास-शीर्षक NCERT दीपकम् पुस्तक से ज्यों-के-त्यों लिए गए हैं; अन्वय, सार, भावार्थ एवं उत्तर ClearStudy द्वारा मौलिक रूप से तैयार किए गए हैं।
