Class 6 Sanskrit Deepakam Chapter 16 Solutions (NCERT 2026–27) – वृक्षाः सत्पुरुषाः इव

This page gives the complete solution for Class 6 Sanskrit Deepakam (दीपकम्) Chapter 16 ‘वृक्षाः सत्पुरुषाः इव’ (षोडशः पाठः) – a lesson made of peropkar-themed सुभाषितानि (subhāṣitāni / niti-verses) that compare trees to noble men, with their मूल पाठ, पदच्छेद, अन्वय, भावार्थ, सार (Hindi summary), शब्दार्थ, and original, exam-ready answers to every question of the अभ्यासः along with the व्याकरण (विभक्ति / लट्-लकार) tables, extra questions, MCQs, अभिकथन-कारण and FAQs.

Class: 6 Subject: Sanskrit Book: Deepakam (दीपकम्) Chapter: 16 (षोडशः पाठः) पाठ: वृक्षाः सत्पुरुषाः इव Session: 2026–27

पाठ का अवलोकन (Chapter Overview)

दीपकम् कक्षा 6 का अन्तिम (षोडश) पाठ ‘वृक्षाः सत्पुरुषाः इव’ (वृक्ष सज्जनों के समान हैं) परोपकार के विषय पर आधारित कुछ प्रसिद्ध सुभाषितों (नीति-श्लोकों) का संकलन है। पाठ का आरम्भ एक संवाद से होता है – विद्यालय में पर्यावरण-संरक्षण की एक प्रदर्शनी लगी है, जिसे छात्र देखते हैं तथा शिक्षक के साथ बातचीत करते हैं कि वृक्ष शुद्ध वायु, फल एवं पुष्प देते हैं, इसलिए वे पूज्य हैं। इसी प्रसंग में ‘वृक्ष सत्पुरुष के समान हैं’ भाव वाले सुभाषित गाए जाते हैं। पाठ का केन्द्रीय भाव परोपकार, त्याग एवं प्रकृति-संरक्षण है – जैसे वृक्ष स्वयं धूप में खड़े रहकर दूसरों को छाया देते हैं और अपने फल स्वयं नहीं खाते, वैसे ही सज्जन लोग स्वयं कष्ट सहकर भी दूसरों का हित करते हैं।

पाठ-परिचय / प्रसंग

यह पाठ परोपकार-विषयक सुभाषितों का संग्रह है। ये नीति-श्लोक संस्कृत-साहित्य की उस परम्परा से लिए गए हैं जो वृक्ष, नदी, गौ एवं मेघ जैसे प्रकृति-तत्त्वों को परोपकार का आदर्श मानती है। श्लोकों में बताया गया है कि वृक्ष स्वयं आतप (धूप) में खड़े रहते हैं, परन्तु दूसरों को छाया देते हैं; अपने फल स्वयं नहीं खाते, अपितु दूसरों के लिए देते हैं। इसी प्रकार नदियाँ अपना जल स्वयं नहीं पीतीं और मेघ अपनी वर्षा से उत्पन्न अन्न स्वयं नहीं खाते – क्योंकि सज्जनों की समस्त सम्पदा परोपकार के लिए ही होती है। पाठ का अन्तिम भाग एक रोचक प्रहेलिका (पहेली) तथा संस्कृत-संभाषण का परिशिष्ट है।

मूल पाठ (सुभाषितानि) + अन्वय

(पाठ में दिए गए परोपकार-विषयक सुभाषित, उनके पदच्छेद, अन्वय एवं भावार्थ सहित – ज्यों-के-त्यों।)

छायामन्यस्य कुर्वन्ति तिष्ठन्ति स्वयमातपे ।
फलान्यपि परार्थाय वृक्षाः सत्पुरुषा इव ॥ १ ॥

पदच्छेदः – छायाम् अन्यस्य कुर्वन्ति तिष्ठन्ति स्वयम् आतपे फलानि अपि परार्थाय वृक्षाः सत्पुरुषाः इव ।

अन्वयः – (वृक्षाः) स्वयम् आतपे तिष्ठन्ति (किन्तु) अन्यस्य छायां कुर्वन्ति, फलानि अपि परार्थाय (यच्छन्ति), (अतः) वृक्षाः सत्पुरुषाः इव (सन्ति) ।

भावार्थः – वृक्ष स्वयं सूर्य की धूप में खड़े रहते हैं, परन्तु दूसरों को छाया देते हैं; अपने फल भी स्वयं न खाकर दूसरों के लिए देते हैं। अतः वे सज्जनों के समान हैं, क्योंकि सज्जन भी स्वयं कष्ट सहकर भी दूसरों का हित करते हैं।

दशकूपसमा वापी दशवापीसमो ह्रदः ।
दशह्रदसमः पुत्रः दशपुत्रसमो द्रुमः ॥ २ ॥

पदच्छेदः – दशकूपसमा वापी दशवापीसमः ह्रदः दशह्रदसमः पुत्रः दशपुत्रसमः द्रुमः ।

अन्वयः – दशकूपसमा वापी (अस्ति), दशवापीसमः ह्रदः (अस्ति), दशह्रदसमः पुत्रः (अस्ति), दशपुत्रसमः द्रुमः (अस्ति) ।

भावार्थः – दस कुओं के समान एक बावड़ी होती है, दस बावड़ियों के समान एक तालाब, दस तालाबों के समान एक पुत्र तथा दस पुत्रों के समान एक वृक्ष होता है। अर्थात् एक वृक्ष सर्वाधिक उपकारी एवं मूल्यवान् होता है। अतः सबको वृक्षारोपण करना चाहिए।

अहो एषां वरं जन्म सर्वप्राण्युपजीवनम् ।
सुजनस्येव येषां वै विमुखा यान्ति नार्थिनः ॥ ३ ॥

पदच्छेदः – अहो ! एषाम् वरम् जन्म सर्वप्राणि-उपजीवनम् सुजनस्य इव येषाम् वै विमुखाः यान्ति न अर्थिनः ।

अन्वयः – अहो ! एषां सर्वप्राण्युपजीवनं जन्म वरम् (अस्ति) । सुजनस्य इव येषाम् अर्थिनः विमुखाः न यान्ति ।

भावार्थः – अहो ! इन वृक्षों का जन्म श्रेष्ठ है, क्योंकि इनका जीवन समस्त प्राणियों के जीवन का आधार है। जैसे सज्जनों के पास से याचक निराश होकर नहीं लौटते, वैसे ही वृक्षों के पास से भी अर्थी (माँगने वाले) निराश नहीं लौटते; वृक्ष उन्हें फल, पुष्प एवं छाया देते हैं।

परोपकाराय फलन्ति वृक्षाः परोपकाराय वहन्ति नद्यः ।
परोपकाराय दुहन्ति गावः परोपकारार्थमिदं शरीरम् ॥ ४ ॥

पदच्छेदः – परोपकाराय फलन्ति वृक्षाः परोपकाराय वहन्ति नद्यः परोपकाराय दुहन्ति गावः परोपकारार्थम् इदम् शरीरम् ।

अन्वयः – वृक्षाः परोपकाराय फलन्ति, नद्यः परोपकाराय वहन्ति, गावः परोपकाराय दुहन्ति, परोपकारार्थम् (एव) इदं शरीरम् (अस्ति) ।

भावार्थः – वृक्षों के फल दूसरे खाते हैं, वृक्ष स्वयं नहीं खाते। नदियों के जल का उपयोग भी दूसरे प्राणी ही करते हैं। गाएँ भी दूसरों के लिए ही दूध देती हैं। इसी प्रकार हमारा यह शरीर भी परोपकार के लिए ही है – इसका उपयोग दूसरों के हित में होना चाहिए।

पुष्प-पत्र-फलच्छाया-मूल-वल्कल-दारुभिः ।
धन्या महीरुहा येषां विमुखा यान्ति नार्थिनः ॥ ५ ॥

पदच्छेदः – पुष्प-पत्र-फल-छाया-मूल-वल्कल-दारुभिः धन्याः महीरुहाः येषाम् विमुखाः यान्ति न अर्थिनः ।

अन्वयः – येषां पुष्प-पत्र-फल-छाया-मूल-वल्कल-दारुभिः अर्थिनः विमुखाः न यान्ति, (ते) महीरुहाः धन्याः (सन्ति) ।

भावार्थः – प्राणी वृक्ष से पुष्प, पत्ते, फल, छाया, मूल (जड़), वल्कल (छाल) एवं काष्ठ (लकड़ी) प्राप्त करते हैं। अर्थात् वृक्ष के पास जो कुछ भी है, वह सब दूसरों के लिए ही है। वृक्ष कभी याचकों को निराश नहीं करते; अतः वे (महीरुह) धन्य हैं।

पिबन्ति नद्यः स्वयमेव नाम्भः स्वयं न खादन्ति फलानि वृक्षाः ।
नादन्ति सस्यं खलु वारिवाहाः परोपकाराय सतां विभूतयः ॥ ६ ॥

पदच्छेदः – पिबन्ति नद्यः स्वयम् एव न अम्भः, स्वयम् न खादन्ति फलानि वृक्षाः । न अदन्ति सस्यम् खलु वारिवाहाः, परोपकाराय सताम् विभूतयः ।

अन्वयः – नद्यः अम्भः स्वयम् एव न पिबन्ति । वृक्षाः अपि फलानि स्वयं न खादन्ति । वारिवाहाः (अपि) सस्यं न अदन्ति खलु । (यतः) सतां विभूतयः परोपकाराय (भवन्ति) ।

भावार्थः – नदियाँ अपना जल स्वयं नहीं पीतीं, अपितु दूसरों के उपयोग के लिए देती हैं। इसी प्रकार वृक्ष भी अपने फल स्वयं नहीं खाते। मेघ भी वर्षा करते हैं, किन्तु वर्षा से उत्पन्न अन्न को स्वयं नहीं खाते। इसी प्रकार सज्जनों की सम्पदा भी परोपकार के लिए ही होती है।

सार (Hindi Summary)

‘वृक्षाः सत्पुरुषाः इव’ पाठ का आरम्भ विद्यालय में आयोजित पर्यावरण-संरक्षण की एक प्रदर्शनी के रोचक प्रसंग से होता है। छात्र प्रदर्शनी देखते हैं और शिक्षक के साथ संवाद करते हैं। एक छात्र बताता है कि उसने जीवविज्ञान की पुस्तक में पढ़ा है कि वृक्ष शुद्ध वायु देते हैं, तो दूसरा बताता है कि उसकी माता कहती हैं कि वृक्ष पूज्य होते हैं। शिक्षक भी पुष्टि करते हैं कि वृक्ष शुद्ध वायु, फल एवं पुष्प – सब कुछ देते हैं, इसलिए वे पूज्य हैं। तभी एक छात्रा ‘वृक्ष सत्पुरुष के समान हैं’ भाव वाला सुभाषित सुनाती है और सब मिलकर गाते हैं।

पाठ में परोपकार-विषयक छह प्रसिद्ध सुभाषित दिए गए हैं। इनका केन्द्रीय भाव यह है कि वृक्ष स्वयं धूप में खड़े रहकर दूसरों को छाया देते हैं और अपने फल स्वयं न खाकर दूसरों के लिए देते हैं – ठीक सज्जनों के समान, जो स्वयं कष्ट सहकर भी दूसरों का हित करते हैं। एक श्लोक में बताया गया है कि एक वृक्ष दस पुत्रों के समान मूल्यवान् है, अतः सबको वृक्षारोपण करना चाहिए। आगे कहा गया है कि वृक्षों के पास से याचक कभी निराश होकर नहीं लौटते, क्योंकि वे पुष्प, पत्ते, फल, छाया, जड़, छाल एवं लकड़ी – सब कुछ देते हैं; इसलिए वे धन्य हैं।

अन्तिम सुभाषितों में नदी, गौ एवं मेघ के उदाहरण देकर समझाया गया है कि नदियाँ अपना जल स्वयं नहीं पीतीं, गाएँ दूसरों के लिए दूध देती हैं और मेघ वर्षा से उत्पन्न अन्न स्वयं नहीं खाते – क्योंकि सज्जनों की समस्त सम्पदा परोपकार के लिए ही होती है। इसी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि हमारा यह शरीर भी परोपकार के लिए है। संक्षेप में, यह पाठ हमें परोपकार, त्याग, उदारता एवं प्रकृति-संरक्षण (वृक्षारोपण) की प्रेरणा देता है।

शब्दार्थ (Word-meanings)

शब्दः (Sanskrit)हिन्दी अर्थEnglish meaning
आतपेधूप में (सूर्यताप में)In the sunlight
परार्थायदूसरों के उपकार के लिएFor the sake of others
सत्पुरुषाःसज्जन लोगNoble men
छायाम्छाया कोShade
द्रुमःपेड़, वृक्षTree
वापीबावड़ीStepwell
ह्रदःतालाब / झीलPond / Lake
वरम्श्रेष्ठBest
अर्थिनःयाचक (प्राप्त करने के इच्छुक)Beggars / those wishing to receive
विमुखाःनिराश होकर लौटे हुएDisappointed / turning away
वहन्तिबहती हैंFlow
दुहन्तिदूध देती हैंYield milk
महीरुहाःवृक्ष (पृथ्वी से उगने वाले)Trees
वल्कलम्पेड़ की छालBark of tree
दारुभिःलकड़ियों से (काष्ठ से)By wood
अम्भःपानी (जल)Water
सस्यम्अन्न, फसलCrop / grain
वारिवाहाःबादल (मेघ)Clouds
विभूतयःसमृद्धियाँ, सम्पदाएँProsperity / riches
सताम्सज्जनों कीOf the noble ones

अभ्यासः (वयम् अभ्यासं कुर्मः)

1. पाठे लिखितानि सुभाषितानि सस्वरं पठन्तु, अवगच्छन्तु, लिखन्तु स्मरन्तु च ।

उत्तरयह अभ्यास-कार्य है। पाठ में दिए गए सभी परोपकार-विषयक सुभाषितों (छायामन्यस्य कुर्वन्ति…, परोपकाराय फलन्ति…, पिबन्ति नद्यः… आदि) को शुद्ध उच्चारण के साथ सस्वर पढ़ें, उनका अर्थ समझें, शुद्ध-शुद्ध लिखें तथा कण्ठस्थ कर लें। पढ़ते समय सन्धि, मात्रा एवं विसर्ग का विशेष ध्यान रखें।

2. पाठस्य आधारेण अधोलिखितानां प्रश्नानाम् उत्तराणि एकपदेन लिखन्तु —

(क) वृक्षाः स्वयं कुत्र तिष्ठन्ति ?

उत्तरआतपे ।

(ख) परोपकाराय काः वहन्ति ?

उत्तरनद्यः ।

(ग) दशवापीसमः कः भवति ?

उत्तरह्रदः ।

(घ) सत्पुरुषाः इव के सन्ति ?

उत्तरवृक्षाः ।

(ङ) अर्थिनः केभ्यः विमुखाः न यान्ति ?

उत्तरवृक्षेभ्यः (महीरुहेभ्यः) ।

(च) वृक्षाः स्वयं कानि न खादन्ति ?

उत्तरफलानि ।

3. पाठस्य आधारेण अधोलिखितानां प्रश्नानाम् उत्तराणि पूर्णवाक्येन लिखन्तु —

(क) नद्यः किं न पिबन्ति ?

उत्तरनद्यः स्वयम् एव अम्भः (जलम्) न पिबन्ति ।

(ख) वृक्षाः अस्मभ्यं किं किं यच्छन्ति ?

उत्तरवृक्षाः अस्मभ्यं पुष्पाणि, पत्राणि, फलानि, छायां, मूलानि, वल्कलानि, काष्ठानि च (शुद्धं वायुम् अपि) यच्छन्ति ।

(ग) इदं शरीरं किमर्थम् अस्ति ?

उत्तरइदं शरीरं परोपकारार्थम् (परोपकाराय एव) अस्ति ।

(घ) दशपुत्रसमः कः भवति ?

उत्तरदशपुत्रसमः द्रुमः (वृक्षः) भवति ।

(ङ) केषां विभूतयः परोपकाराय भवन्ति ?

उत्तरसतां (सज्जनानां) विभूतयः परोपकाराय भवन्ति ।

(च) अन्यस्य छायां के कुर्वन्ति ?

उत्तरअन्यस्य छायां वृक्षाः कुर्वन्ति ।

4. पिट्टकातः उचितानि पदानि चित्वा रिक्तस्थानानि पूरयन्तु —

पिट्टका (शब्द-मञ्जूषा): तिष्ठन्ति, सुजनस्येव, विभूतयः, वृक्षाः, फलानि, दशपुत्रसमः, परोपकारार्थम्

उत्तर यथा – छायामन्यस्य कुर्वन्ति तिष्ठन्ति स्वयमातपे । (क) फलान्यपि परार्थाय वृक्षाः सत्पुरुषा इव । (ख) दशह्रदसमः पुत्रः दशपुत्रसमः द्रुमः । (ग) सुजनस्येव येषां वै विमुखा यान्ति नार्थिनः । (घ) परोपकारार्थम् इदं शरीरम् । (ङ) स्वयं न खादन्ति फलानि वृक्षाः । (च) परोपकाराय सतां विभूतयः (शेष पद ‘तिष्ठन्ति’ उदाहरण-वाक्य में पहले से प्रयुक्त है।)

5. उदाहरणानुसारम् अधोलिखितेषु वाक्येषु स्थूलाक्षरपदानां विभक्तिं निर्दिशन्तु —

यथा – वृक्षाः अन्यस्य कृते छायां कुर्वन्ति । → द्वितीया विभक्तिः ।

वाक्यम् (स्थूल/रेखाङ्कित पद मोटे अक्षरों में)विभक्तिः (उत्तर)
(क) वृक्षाः अन्यस्य कृते छायां कुर्वन्ति ।द्वितीया विभक्तिः
(ख) वृक्षाः परार्थाय फलानि यच्छन्ति ।चतुर्थी विभक्तिः
(ग) वृक्षाः सत्पुरुषाः इव सन्ति ।प्रथमा विभक्तिः
(घ) द्रुमः दशसन्तानसमः भवति ।प्रथमा विभक्तिः
(ङ) वृक्षः प्राणिभ्यः काष्ठानि यच्छति ।चतुर्थी विभक्तिः
(च) नद्यः जलं स्वयमेव न पिबन्ति ।द्वितीया विभक्तिः
(छ) सज्जनानां सङ्गतिं करोतु ।षष्ठी विभक्तिः

6. अधोलिखितानां पदानां द्विवचने बहुवचने च रूपाणि लिखन्तु —

पदम् (एकवचनम्)द्विवचनम्बहुवचनम्
(क) वृक्षःवृक्षौवृक्षाः
(ख) मेघःमेघौमेघाः
(ग) ह्रदःह्रदौह्रदाः
(घ) सत्पुरुषःसत्पुरुषौसत्पुरुषाः
(ङ) छायाछायेछायाः
(च) वापीवाप्यौवाप्यः
(छ) नदीनद्यौनद्यः
(ज) शरीरम्शरीरेशरीराणि
(झ) पुष्पम्पुष्पेपुष्पाणि

7. अधोलिखितानां पदानां परस्परं समुचितं मेलनं कृत्वा ‘कः किं ददाति’ इति लिखन्तु —

यथा – वृक्षः शुद्धं वायुं ददाति ।

कः (देने वाला)किम् (देय वस्तु)वाक्यम् (उत्तर)
(क) वृक्षःशुद्धं वायुम्वृक्षः शुद्धं वायुं ददाति ।
(ख) गौःदुग्धम्गौः दुग्धं ददाति ।
(ग) सूर्यःप्रकाशम्सूर्यः प्रकाशं ददाति ।
(घ) नदीजलम्नदी जलं ददाति ।
(ङ) अग्निःतापम्अग्निः तापं ददाति ।
(च) शिक्षकःविद्याम्शिक्षकः विद्यां ददाति ।

8. अधोलिखितानां क्रियापदानां लट्लकारे प्रथमपुरुषस्य रूपाणि लिखन्तु —

यथा – कुर्वन्ति → करोति (एकवचनम्), कुरुतः (द्विवचनम्), कुर्वन्ति (बहुवचनम्) ।

क्रियापदम्एकवचनम्द्विवचनम्बहुवचनम्
कुर्वन्तिकरोतिकुरुतःकुर्वन्ति
तिष्ठन्तितिष्ठतितिष्ठतःतिष्ठन्ति
फलन्तिफलतिफलतःफलन्ति
यान्तियातियातःयान्ति
पिबन्तिपिबतिपिबतःपिबन्ति
खादन्तिखादतिखादतःखादन्ति

व्याकरण-तालिकाः (विभक्ति / लट्-लकार)

इस पाठ के अभ्यास से जुड़े महत्त्वपूर्ण व्याकरण-बिन्दु संक्षेप में नीचे दिए गए हैं।

1. कारक एवं विभक्ति (इस पाठ में प्रयुक्त)

विभक्तिःकारक/अर्थपाठ का उदाहरण
प्रथमाकर्तावृक्षाः सत्पुरुषाः इव सन्ति
द्वितीयाकर्मछायां कुर्वन्ति; जलं न पिबन्ति
चतुर्थीसम्प्रदान / प्रयोजनपरार्थाय; प्राणिभ्यः; परोपकाराय
षष्ठीसम्बन्धसज्जनानां सङ्गतिः; सतां विभूतयः
सप्तमीअधिकरणआतपे तिष्ठन्ति

2. अकारान्त पुल्लिङ्ग शब्द – ‘वृक्ष’ (प्रथमा विभक्ति)

वचनम्रूपम्
एकवचनम्वृक्षः
द्विवचनम्वृक्षौ
बहुवचनम्वृक्षाः

3. लट्-लकारः (वर्तमानकाल) – ‘पठ्’ धातु (परस्मैपद)

पुरुषःएकवचनम्द्विवचनम्बहुवचनम्
प्रथमपुरुषःपठतिपठतःपठन्ति
मध्यमपुरुषःपठसिपठथःपठथ
उत्तमपुरुषःपठामिपठावःपठामः

पाठ के क्रियापद (तिष्ठति, फलति, याति, पिबति, खादति आदि) इसी प्रकार लट्-लकार में चलते हैं; ‘कुर्वन्ति’ (कृ-धातु, तनादिगण) के रूप – करोति/कुरुतः/कुर्वन्ति।

योग्यताविस्तरः & परियोजनाकार्यम्

योग्यताविस्तरः (प्रहेलिका / पहेली)

पाठ के अन्त में एक रोचक प्रहेलिका (पहेली) दी गई है – इसे पढ़कर उत्तर बताइए:

वृक्षाग्रवासी न च पक्षिराजः त्रिनेत्रधारी न च शूलपाणिः ।
त्वग्वस्त्रधारी न च सिद्धयोगी जलं च बिभ्रन्न घटो न मेघः ॥
उत्तरम्नारिकेलः (नारियल / Coconut) – यह वृक्ष के ऊपर रहता है पर पक्षिराज (गरुड़) नहीं; तीन नेत्र (आँख-समान चिह्न) वाला है पर शिव (शूलपाणि) नहीं; छाल रूपी वस्त्र धारण करता है पर योगी नहीं; जल धारण करता है पर न घड़ा है और न मेघ। अतः उत्तर – नारियल।

परियोजनाकार्यम् (Project Work)

1. विद्यालयं गृहं वा परितः विद्यमानानां पञ्च-पादपानां (वृक्षाणां) संरक्षणं कुर्वन्तु ।

मार्गदर्शनम्यह क्रियात्मक कार्य है। अपने विद्यालय अथवा घर के आस-पास के पाँच वृक्षों/पौधों का चयन कीजिए तथा उन्हें नियमित जल देकर, स्वच्छ रखकर एवं उनकी रक्षा करके उनका संरक्षण कीजिए।

2. अन्तर्जालस्य साहाय्येन परोपकारविषये दश-सुभाषितानां संग्रहणं कुर्वन्तु ।

मार्गदर्शनम्इंटरनेट (अन्तर्जाल) की सहायता से परोपकार-विषयक दस सुभाषितों का संग्रह कीजिए तथा उन्हें अपनी पुस्तिका में सुन्दर अक्षरों में लिखिए। जैसे – ‘परोपकाराय फलन्ति वृक्षाः…’, ‘परोपकारः पुण्याय…’ आदि।

अतिरिक्त प्रश्न (Extra Questions)

लघु उत्तरीय प्रश्न (30–40 शब्द)

1. इस पाठ का मुख्य विषय क्या है?

उत्तरइस पाठ का मुख्य विषय परोपकार है। पाठ में दिए गए सुभाषित बताते हैं कि वृक्ष, नदी, गौ एवं मेघ अपनी सम्पदा स्वयं भोग नहीं करते, अपितु दूसरों के हित में लगाते हैं। अतः वे सज्जनों के समान हैं।

2. पाठ के आरम्भ में दिए गए संवाद का प्रसंग क्या है?

उत्तरविद्यालय में पर्यावरण-संरक्षण की एक प्रदर्शनी लगी है। छात्र उसे देखते हैं तथा शिक्षक के साथ संवाद करते हैं कि वृक्ष शुद्ध वायु, फल एवं पुष्प देते हैं, इसलिए वे पूज्य हैं। तभी एक छात्रा ‘वृक्ष सत्पुरुष के समान हैं’ सुभाषित सुनाती है।

3. वृक्षों की तुलना सत्पुरुषों से क्यों की गई है?

उत्तरवृक्ष स्वयं धूप में खड़े रहकर दूसरों को छाया देते हैं और अपने फल स्वयं नहीं खाते, अपितु दूसरों के लिए देते हैं। इसी प्रकार सज्जन (सत्पुरुष) भी स्वयं कष्ट सहकर दूसरों का हित करते हैं। इसी समानता के कारण वृक्षों की तुलना सत्पुरुषों से की गई है।

4. ‘दशपुत्रसमो द्रुमः’ से क्या तात्पर्य है?

उत्तरइसका तात्पर्य है कि एक वृक्ष दस पुत्रों के समान मूल्यवान् एवं उपकारी होता है। जैसे कुएँ, बावड़ी, तालाब क्रमशः अधिक उपयोगी होते हैं, वैसे ही एक वृक्ष सर्वाधिक उपकारी है। अतः सबको वृक्षारोपण करना चाहिए।

5. नदी, गौ एवं मेघ का उदाहरण किस भाव को स्पष्ट करता है?

उत्तरनदी अपना जल स्वयं नहीं पीती, गौ दूसरों के लिए दूध देती है तथा मेघ वर्षा से उत्पन्न अन्न स्वयं नहीं खाते। ये उदाहरण यह स्पष्ट करते हैं कि सज्जनों की समस्त सम्पदा परोपकार के लिए ही होती है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (100–120 शब्द)

6. ‘वृक्षाः सत्पुरुषाः इव’ पाठ का केन्द्रीय संदेश अपने शब्दों में लिखिए।

उत्तरइस पाठ का केन्द्रीय संदेश परोपकार एवं त्याग है। पाठ में परोपकार-विषयक सुभाषितों के माध्यम से बताया गया है कि वृक्ष स्वयं धूप में खड़े रहकर दूसरों को छाया देते हैं और अपने फल स्वयं न खाकर दूसरों को देते हैं, ठीक सज्जनों की भाँति, जो स्वयं कष्ट सहकर भी दूसरों का हित करते हैं।पाठ यह भी बताता है कि नदियाँ अपना जल स्वयं नहीं पीतीं, गाएँ दूसरों के लिए दूध देती हैं और मेघ वर्षा से उत्पन्न अन्न स्वयं नहीं खाते – क्योंकि सज्जनों की सम्पदा परोपकार के लिए ही होती है। इसी से शिक्षा मिलती है कि हमारा यह शरीर भी परोपकार के लिए है। अतः हमें उदार बनकर, वृक्षारोपण एवं पर्यावरण-संरक्षण करके दूसरों के हित में जीना चाहिए।

7. पाठ में वृक्षों के परोपकारी स्वभाव का वर्णन सुभाषितों के आधार पर कीजिए।

उत्तरपाठ के सुभाषितों में वृक्षों के परोपकारी स्वभाव का सुन्दर वर्णन है। वृक्ष स्वयं आतप (धूप) में खड़े रहते हैं, परन्तु दूसरों को शीतल छाया देते हैं। वे अपने फल स्वयं नहीं खाते, अपितु दूसरों के लिए देते हैं। वृक्षों से प्राणी पुष्प, पत्ते, फल, छाया, जड़, छाल एवं काष्ठ – सब कुछ प्राप्त करते हैं।वृक्षों के पास से कोई याचक कभी निराश होकर नहीं लौटता, ठीक जैसे सज्जनों के पास से। इसीलिए वृक्षों को ‘धन्य महीरुह’ कहा गया है और एक वृक्ष को दस पुत्रों के समान मूल्यवान् बताया गया है। इस प्रकार वृक्ष परोपकार, त्याग एवं उदारता के साक्षात् आदर्श हैं और सज्जनों के समान पूज्य हैं।

8. परोपकार का जीवन में क्या महत्त्व है? पाठ के आधार पर समझाइए।

उत्तरपरोपकार मानव-जीवन का सर्वश्रेष्ठ गुण है। पाठ में वृक्ष, नदी, गौ एवं मेघ के उदाहरणों से बताया गया है कि प्रकृति की प्रत्येक वस्तु दूसरों के हित के लिए ही अपनी सम्पदा अर्पित करती है – वृक्ष छाया एवं फल देते हैं, नदियाँ जल देती हैं, गाएँ दूध देती हैं और मेघ वर्षा करते हैं।इन उदाहरणों से प्रेरणा लेकर मनुष्य को भी अपना तन, मन एवं धन दूसरों के कल्याण में लगाना चाहिए, क्योंकि ‘परोपकारार्थम् इदं शरीरम्’ – यह शरीर परोपकार के लिए ही है। परोपकार से समाज में प्रेम, सहयोग एवं शान्ति बढ़ती है, परोपकारी व्यक्ति यश एवं सम्मान पाता है तथा प्रकृति-संरक्षण (वृक्षारोपण) से समस्त प्राणी-जगत् को लाभ होता है। अतः परोपकार ही जीवन का सच्चा उद्देश्य है।

MCQ & अभिकथन-कारण

1. इस पाठ का मुख्य विषय क्या है?

(क) युद्धम्

(ख) परोपकारः

(ग) धनसञ्चयः

(घ) क्रीडा

उत्तर(ख) परोपकारः।

2. वृक्षाः स्वयं कहाँ खड़े रहते हैं?

(क) छायायाम्

(ख) जले

(ग) आतपे

(घ) गृहे

उत्तर(ग) आतपे। (धूप में)

3. ‘द्रुमः’ शब्द का अर्थ है—

(क) तालाब

(ख) वृक्ष

(ग) बादल

(घ) नदी

उत्तर(ख) वृक्ष।

4. एक वृक्ष किसके समान मूल्यवान् बताया गया है?

(क) दश कूपानां समः

(ख) दश वापीनां समः

(ग) दश पुत्राणां समः

(घ) दश ह्रदानां समः

उत्तर(ग) दश पुत्राणां समः। (दशपुत्रसमो द्रुमः)

5. परोपकार के लिए कौन बहती हैं?

(क) वृक्षाः

(ख) नद्यः

(ग) गावः

(घ) मेघाः

उत्तर(ख) नद्यः। (नदियाँ)

6. ‘वारिवाहाः’ शब्द का अर्थ है—

(क) नदियाँ

(ख) वृक्ष

(ग) बादल (मेघ)

(घ) गाएँ

उत्तर(ग) बादल (मेघ)।

7. वृक्ष अपने फल किसके लिए देते हैं?

(क) स्वयं खाने के लिए

(ख) दूसरों के लिए (परार्थाय)

(ग) सञ्चय के लिए

(घ) किसी के लिए नहीं

उत्तर(ख) दूसरों के लिए (परार्थाय)।

8. ‘महीरुहाः’ पद किसके लिए प्रयुक्त हुआ है?

(क) नदियों के लिए

(ख) वृक्षों के लिए

(ग) पर्वतों के लिए

(घ) बादलों के लिए

उत्तर(ख) वृक्षों के लिए। (पृथ्वी से उगने वाले)

9. ‘परोपकारार्थम् इदं शरीरम्’ का भाव है—

(क) यह शरीर भोग के लिए है

(ख) यह शरीर परोपकार के लिए है

(ग) यह शरीर धन के लिए है

(घ) यह शरीर विश्राम के लिए है

उत्तर(ख) यह शरीर परोपकार के लिए है।

10. पाठ के आरम्भ में विद्यालय में किसकी प्रदर्शनी लगी थी?

(क) विज्ञान की

(ख) चित्रकला की

(ग) पर्यावरण-संरक्षण की

(घ) पुस्तकों की

उत्तर(ग) पर्यावरण-संरक्षण की।
उत्तर-कुंजी: 1-(ख), 2-(ग), 3-(ख), 4-(ग), 5-(ख), 6-(ग), 7-(ख), 8-(ख), 9-(ख), 10-(ग)

अभिकथन-कारण – नीचे अभिकथन (A) और कारण (R) दिए गए हैं। सही विकल्प चुनिए—
(क) A और R दोनों सही, R, A की सही व्याख्या है। (ख) A और R दोनों सही, पर R, A की सही व्याख्या नहीं। (ग) A सही, R गलत। (घ) A गलत, R सही।

1. अभिकथन (A): वृक्षों की तुलना सत्पुरुषों से की गई है।

कारण (R): वृक्ष स्वयं धूप में खड़े रहकर दूसरों को छाया देते हैं और अपने फल दूसरों के लिए देते हैं।

उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है।

2. अभिकथन (A): नदियाँ अपना जल स्वयं नहीं पीतीं।

कारण (R): सज्जनों की समस्त सम्पदा परोपकार के लिए ही होती है।

उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है।

3. अभिकथन (A): एक वृक्ष दस पुत्रों के समान मूल्यवान् होता है।

कारण (R): वृक्ष केवल लकड़ी ही प्रदान करते हैं, अन्य कोई लाभ नहीं देते।

उत्तर(ग) A सही है, किन्तु R गलत है – वृक्ष पुष्प, पत्ते, फल, छाया, जड़, छाल एवं काष्ठ – सब कुछ देते हैं।

4. अभिकथन (A): वृक्षों के पास से याचक निराश होकर नहीं लौटते।

कारण (R): वृक्ष पुष्प, पत्ते, फल, छाया, मूल, वल्कल एवं काष्ठ – सब कुछ देते हैं।

उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है।

5. अभिकथन (A): यह शरीर परोपकार के लिए है।

कारण (R): वृक्ष, नदी, गौ एवं मेघ की भाँति मनुष्य की सम्पदा भी दूसरों के हित के लिए ही होनी चाहिए।

उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है।

परीक्षा-सुझाव एवं सामान्य त्रुटियाँ

परीक्षा-सुझाव (Exam Tips)

  • सभी सुभाषित कण्ठस्थ करें – श्लोक-पूर्ति एवं रिक्तस्थान-पूर्ति के प्रश्न प्रायः इन्हीं से आते हैं।
  • शब्दार्थ (आतपे, परार्थाय, द्रुमः, अर्थिनः, वारिवाहाः, विभूतयः आदि) हिन्दी एवं अंग्रेज़ी दोनों में याद रखें।
  • एकपदेन उत्तर वाले प्रश्नों में केवल एक उपयुक्त पद ही लिखें; पूर्णवाक्येन वाले में पूरा वाक्य।
  • विभक्ति-निर्देश में कारक (प्रथमा, द्वितीया, चतुर्थी, षष्ठी, सप्तमी) का ध्यान रखें।
  • लट्-लकार में एकवचन-द्विवचन-बहुवचन के रूप (तिष्ठति/तिष्ठतः/तिष्ठन्ति आदि) सही लिखें।

सामान्य त्रुटियाँ (Common Mistakes)

  • सन्धि-विच्छेद की भूल – ‘फलान्यपि’ = फलानि + अपि; ‘नार्थिनः’ = न + अर्थिनः।
  • ‘द्रुमः’ एवं ‘ह्रदः’ का अर्थ बदल देना – द्रुमः = वृक्ष, ह्रदः = तालाब।
  • मात्रा एवं विसर्ग की अशुद्धि – वृक्षाः, नद्यः, विभूतयः को शुद्ध लिखें।
  • ‘वारिवाहाः’ को नदी समझ लेना – इसका अर्थ है मेघ (बादल)।
  • द्विवचन-बहुवचन के रूप मिलाना (यथा – वृक्षौ/वृक्षाः, नद्यौ/नद्यः)।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

दीपकम् कक्षा 6 का पाठ 16 ‘वृक्षाः सत्पुरुषाः इव’ किस विषय पर आधारित है?

यह पाठ परोपकार के विषय पर आधारित सुभाषितों (नीति-श्लोकों) का संकलन है, जिनमें वृक्षों की तुलना सज्जनों (सत्पुरुषों) से की गई है, क्योंकि वृक्ष स्वयं कष्ट सहकर भी दूसरों का हित करते हैं।

‘परोपकाराय फलन्ति वृक्षाः’ का अर्थ क्या है?

इसका अर्थ है – ‘वृक्ष दूसरों के उपकार के लिए फलते हैं’। वृक्ष अपने फल स्वयं नहीं खाते, अपितु दूसरों के लिए देते हैं; इसी प्रकार नदियाँ, गाएँ एवं मेघ भी परोपकार के लिए ही अपनी सम्पदा अर्पित करते हैं।

एक वृक्ष को कितने पुत्रों के समान मूल्यवान् बताया गया है?

पाठ के अनुसार एक वृक्ष (द्रुमः) दस पुत्रों के समान मूल्यवान् एवं उपकारी होता है – ‘दशपुत्रसमो द्रुमः’। इसी कारण सभी को वृक्षारोपण करना चाहिए।

मूल पाठ, श्लोक, प्रश्न एवं अभ्यास-शीर्षक NCERT दीपकम् पुस्तक से ज्यों-के-त्यों लिए गए हैं; अन्वय, सार, भावार्थ एवं उत्तर ClearStudy द्वारा मौलिक रूप से तैयार किए गए हैं।

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