Class 9 Sanskrit Sharada Chapter 11 Solutions (NCERT 2026–27) – वर्णोच्चारण-शिक्षा (२)
This page gives the complete solution for Class 9 Sanskrit Sharada (शारदा) Chapter 11 ‘वर्णोच्चारण-शिक्षा (२)’ – the grammar/phonetics (शिक्षा) lesson that explains the आभ्यन्तर-प्रयत्न (internal effort) used while pronouncing वर्ण, its five types (स्पृष्ट, ईषत्-स्पृष्ट, ईषद्-विवृत, विवृत, संवृत), and the उच्चारण-स्थान & करण tables of the वर्णमाला. It reproduces the textbook tables and every question of the अभ्यास (अभ्यासाद् जायते सिद्धिः) verbatim, with original, exam-ready answers, along with शब्दार्थ, the पाणिनीय-शिक्षा सूत्र, extra questions, MCQs, अभिकथन-कारण and FAQs.
- पाठ का अवलोकन (Chapter Overview)
- पाठ-परिचय / प्रसंग
- मूल पाठ (आभ्यन्तर-प्रयत्न-विवरणम्)
- सार (Hindi Summary)
- शब्दार्थ – सर्वं शब्देन भासते
- अभ्यासाद् जायते सिद्धिः (Exercises)
- अत्र इदम् अवधेयम् (उच्चारण-स्थान तालिकाः)
- स्वाध्यायान्मा प्रमदः (पाणिनीय-शिक्षा-सूत्राणि)
- अतिरिक्त प्रश्न (Extra Questions)
- MCQ & अभिकथन-कारण
- परीक्षा-सुझाव एवं सामान्य त्रुटियाँ
- अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
पाठ का अवलोकन (Chapter Overview)
शारदा कक्षा 9 का एकादश (ग्यारहवाँ) एवं अन्तिम पाठ ‘वर्णोच्चारण-शिक्षा (२)’ शिक्षा-वेदाङ्ग पर आधारित एक व्याकरण-प्रधान पाठ है, जो शुद्ध उच्चारण की वैज्ञानिक विधि सिखाता है। पूर्व कक्षा में वर्णों की उत्पत्ति के तीन तत्त्वों – स्थानम्, करणम् एवं आभ्यन्तर-प्रयत्नः – में से प्रथम दो (छह स्थान एवं छह करण) पढ़े जा चुके हैं। इस पाठ में तीसरे तत्त्व ‘आभ्यन्तर-प्रयत्न’ का विस्तार से वर्णन है। करण जिस प्रयत्न से स्थान को स्पर्श करता है या उसके समीप जाता है, वही आभ्यन्तर-प्रयत्न कहलाता है। यह पाँच प्रकार का होता है – स्पृष्ट, ईषत्-स्पृष्ट, ईषद्-विवृत, विवृत एवं संवृत। इन्हीं के आधार पर स्पर्श, अन्तःस्थ, ऊष्म, अयोगवाह व्यञ्जन तथा स्वरों का उच्चारण होता है। पाठ में वर्णमाला, उच्चारण-स्थान एवं पाणिनीय-शिक्षा के सूत्र तालिकाओं द्वारा समझाए गए हैं।
पाठ-परिचय / प्रसंग
यह पाठ ‘शिक्षा’ नामक वेदाङ्ग की परम्परा से जुड़ा है। ‘शिक्षा’ वह शास्त्र है जो वर्णों के शुद्ध उच्चारण (स्वर, मात्रा, बल, साम, सन्तान आदि) का निरूपण करता है। प्राचीन आचार्यों ने पाणिनीय-शिक्षा जैसे ग्रन्थों में वर्णोच्चारण के सूत्र दिए हैं, जिनमें से कुछ इस पाठ के अन्त में ‘स्वाध्यायान्मा प्रमदः’ शीर्षक के अन्तर्गत उद्धृत हैं। पाठ का स्वरूप गद्यात्मक (व्याख्यात्मक) है, पद्यात्मक नहीं; इसमें मन्त्र या श्लोक के स्थान पर उच्चारण-विज्ञान की क्रमबद्ध व्याख्या एवं तालिकाएँ हैं। यह पाठ ‘वर्णोच्चारण-शिक्षा (१)’ का अग्रिम भाग है, अतः इसका शीर्षक ‘(२)’ है। इसका उद्देश्य छात्रों को आस्य (मुख) के भीतर वर्णोत्पत्ति की प्रक्रिया समझाकर सुस्पष्ट एवं शुद्ध संस्कृत-उच्चारण में दक्ष बनाना है।
मूल पाठ (आभ्यन्तर-प्रयत्न-विवरणम्)
(यह गद्य-पाठ है। आभ्यन्तर-प्रयत्न के पाँच प्रकारों का मूल विवरण ज्यों-का-त्यों नीचे दिया गया है।)
आस्यस्य अभ्यन्तरे करणं येन प्रयत्नेन स्थानं स्पृशति, स्थानस्य समीपं वा याति, सः प्रयत्नः — ‘आभ्यन्तर-प्रयत्नः’ इति उच्यते । आभ्यन्तर-प्रयत्नः पञ्चविधः भवति —
(१) स्पृष्ट-प्रयत्नः — करणं यदा स्थानं ‘स्पष्ट-रूपेण स्पृशति’, तदा करणस्य ‘स्पृष्ट-प्रयत्नः’ भवति । अनेन स्थाने स्पर्श-व्यञ्जनानि उत्पद्यन्ते ।
(२) ईषत्-स्पृष्ट-प्रयत्नः — करणं यदा स्थानं ‘स्वल्पम् एव स्पृशति’, तदा करणस्य ‘ईषत्-स्पृष्ट-प्रयत्नः’ भवति । अनेन स्थाने अन्तःस्थ-व्यञ्जनानि जायन्ते ।
(३) ईषद्-विवृत-प्रयत्नः — करणं यदा स्थानं न स्पृशति, परन्तु स्थानस्य बहु समीपं याति, तदा ‘लघुः विवरः’ इव स्वल्पः अन्तरालः जायते — तदा ‘ईषद्-विवृत-प्रयत्नः’ भवति । अनेन स्थाने ऊष्म-व्यञ्जनानि, तथा अयोगवाहौ (अनुस्वार-विसर्गौ) अपि जायेते ।
(४) विवृत-प्रयत्नः — करणं यदा स्थानं न स्पृशति, अपितु स्थानस्य किञ्चित् समीपं याति, तदा ‘स्फुटः विवरः’ इव अन्तरालः जायते — तदा ‘विवृत-प्रयत्नः’ भवति । अनेन स्थाने (अ-कारं विहाय) अन्ये सर्वे स्वराः उच्चार्यन्ते ।
(५) संवृत-प्रयत्नः — अ-कारस्य (ह्रस्वस्य) उच्चारणे कण्ठे स्थान-करणयोः मध्ये ‘संकोचः’ भवति, अर्थात् कण्ठः सङ्कुचितः सङ्कीर्णः वा भवति । अयं ‘संकोचः’ / ‘संवृतम्’ इति कथ्यते । केवलं कण्ठ-स्थाने एव, तदपि केवलम् अ-कारस्य उच्चारणार्थम् एव ‘संवृत-प्रयत्नः’ भवति । — शारदा (कक्षा ९), पाठः ११ ‘वर्णोच्चारण-शिक्षा (२)’
सार (Hindi Summary)
इस पाठ में मुख के भीतर वर्णों की उत्पत्ति के तीसरे तत्त्व ‘आभ्यन्तर-प्रयत्न’ का सविस्तार वर्णन है। पूर्व कक्षा में हम छह स्थान (कण्ठ, तालु, मूर्धा, दन्त, ओष्ठ, नासिका) एवं छह करण पढ़ चुके हैं। मुख के भीतर करण जिस प्रयत्न से स्थान को स्पर्श करता है अथवा उसके पास जाता है, उसे आभ्यन्तर-प्रयत्न कहते हैं। यह पाँच प्रकार का होता है।
(1) स्पृष्ट-प्रयत्न – जब करण स्थान को स्पष्ट रूप से स्पर्श करता है; इससे स्पर्श-व्यञ्जन (क् से म् तक के 25 वर्ण) उत्पन्न होते हैं। (2) ईषत्-स्पृष्ट-प्रयत्न – जब करण स्थान को थोड़ा-सा ही स्पर्श करता है; इससे अन्तःस्थ व्यञ्जन (य, र, ल, व) बनते हैं। (3) ईषद्-विवृत-प्रयत्न – जब करण स्थान को छूता नहीं, पर बहुत पास जाकर एक छोटा विवर (अन्तराल) बनता है; इससे ऊष्म व्यञ्जन (श, ष, स, ह) तथा अयोगवाह (अनुस्वार ‘अं’ एवं विसर्ग ‘अः’) उत्पन्न होते हैं।
(4) विवृत-प्रयत्न – जब करण स्थान के कुछ समीप जाकर एक स्फुट (खुला) विवर बनाता है; इससे अ-कार को छोड़कर शेष सभी स्वर उच्चारित होते हैं। (5) संवृत-प्रयत्न – केवल ह्रस्व अ-कार के उच्चारण में कण्ठ में संकोच (संकीर्णता) होता है, इसी को संवृत कहते हैं; यह केवल कण्ठ-स्थान में और केवल अ-कार के लिए ही होता है। उल्लेखनीय है कि आ-कार (दीर्घ) एवं अ३-कार (प्लुत) के उच्चारण में विवृत-प्रयत्न ही होता है, संवृत नहीं। इस प्रकार स्थान, करण एवं आभ्यन्तर-प्रयत्न के सम्यक् ज्ञान एवं बार-बार अभ्यास से प्रत्येक वर्ण एवं समस्त शब्दों का सुस्पष्ट एवं शुद्ध उच्चारण किया जा सकता है। पाठ के अन्त में पाणिनीय-शिक्षा के सूत्र इसी विषय की पुष्टि करते हैं।
शब्दार्थ – सर्वं शब्देन भासते (Word-meanings)
पाठ के ‘सर्वं शब्देन भासते’ शब्दार्थ-कोष्ठक एवं पाठ के कठिन पदों पर आधारित।
| शब्दः (Sanskrit) | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| प्रयत्नः | उच्चारण में प्रयुक्त बल/दबाव | Effort (in speech) |
| अभ्यन्तरम् | अन्दर, भीतर | Inside |
| आभ्यन्तर-प्रयत्नः | आस्य के भीतर करण का स्थान की ओर लगाया बल | Internal effort in articulation |
| स्पृष्टः | स्पर्श किया हुआ | Touched |
| ईषत् | थोड़ा, अल्प | Slightly / little |
| ईषत्-स्पृष्टः | थोड़ा स्पर्श किया हुआ | Slightly touched |
| विवृतः | खुला हुआ, उद्घाटित | Opened |
| विवरः | छिद्र / अन्तराल | Opening / gap |
| ईषद्-विवृतः | थोड़ा खुला हुआ | Slightly opened |
| संवृतः | सिकुड़ा हुआ, अविस्तृत | Constricted / narrow |
| संकोचः | सिकुड़ना, संकीर्णता | Contraction / compression |
| स्थानम् | उच्चारण-स्थल (कण्ठ, तालु आदि) | Place of articulation |
| करणम् | उच्चारण का साधन (जिह्वा, ओष्ठ आदि) | Instrument / articulator |
| आस्यम् | मुख | Mouth |
| स्पर्शाः | स्पर्श-व्यञ्जन (क् से म् तक) | Stop / plosive consonants |
| अन्तःस्थाः | अन्तःस्थ व्यञ्जन (य, र, ल, व) | Semi-vowels |
| ऊष्माणः | ऊष्म व्यञ्जन (श, ष, स, ह) | Sibilants / fricatives |
| अयोगवाहौ | अनुस्वार (अं) एवं विसर्ग (अः) | Anusvāra & Visarga |
| स्वस्थानम् | अपना ही स्थान (जहाँ स्थान ही करण हो) | Same place serving as instrument |
| उच्चार्यन्ते | उच्चारित किए जाते हैं | Are pronounced |
अभ्यासाद् जायते सिद्धिः (Exercises)
1. अधोलिखितप्रश्नानाम् उत्तराणि एकपदेन लिखत —
(क) वर्णानाम् उत्पत्त्यर्थं कति आवश्यकानि तत्त्वानि भवन्ति ?
(ख) कति स्थानानि सन्ति ?
(ग) आभ्यन्तर-प्रयत्नः कतिविधः ?
(घ) करणं यदा स्थानं स्पष्टरूपेण स्पृशति, तदा करणस्य कः प्रयत्नः भवति ?
(ङ) अवर्णस्य कति उपभेदाः सन्ति ?
(च) संवृत-प्रयत्नः कुत्र भवति ?
2. अधोलिखितप्रश्नानाम् उत्तराणि पूर्णवाक्येन लिखत —
(क) आभ्यन्तर-प्रयत्नः कः उच्यते ?
(ख) ईषत्स्पृष्ट-प्रयत्नः कदा भवति ?
(ग) करणस्य विवृत-प्रयत्नेन के स्वराः उच्चार्यन्ते ?
(घ) आभ्यन्तर-प्रयत्नाः कुत्र दृश्यन्ते ?
(ङ) आभ्यन्तर-प्रयत्ने स्वरेषु विशिष्टः स्वरः कः अस्ति ?
3. अधोलिखितानां वर्णानां क–स्तम्भेन सह मेलनं कुरुत —
| क-स्तम्भः (प्रयत्नः) | ख-स्तम्भः (वर्णः) |
|---|---|
| (क) विवृत-प्रयत्नः | (१) व् |
| (ख) स्पृष्ट-प्रयत्नः | (२) श् |
| (ग) ईषत्स्पृष्ट-प्रयत्नः | (३) ॠ |
| (घ) ईषत्विवृत-प्रयत्नः | (४) अ |
| (ङ) संवृत-प्रयत्नः | (५) ध् |
4. अधोलिखितानां वाक्यानाम् उत्तराणि आम्/न इति सन्दर्भानुसारं लिखत —
(क) ‘ई’ वर्णः सन्ध्यक्षरम् अस्ति । (आम् / न)
(ख) ‘ऐ’ वर्णः सन्ध्यक्षरम् अस्ति । (आम् / न)
(ग) ‘झ’ वर्णः स्पर्शः अस्ति । (आम् / न)
(घ) ‘र’ वर्णः स्पर्शेषु परिगण्यते । (आम् / न)
(ङ) ‘य, र, ल, व’ वर्णाः ऊष्माणः सन्ति । (आम् / न)
5. रेखाङ्कितपदानि आधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत —
(मूल वाक्य के रेखांकित/मोटे पद के आधार पर उपयुक्त प्रश्नवाचक पद लगाकर प्रश्न बनाइए।)
| वाक्यम् (रेखाङ्कित पद मोटे अक्षरों में) | प्रश्ननिर्माणम् (उत्तर) |
|---|---|
| (क) स्वराः स्वतन्त्रवर्णाः सन्ति । | स्वराः कीदृशाः (के) वर्णाः सन्ति ? |
| (ख) व्यञ्जनानि अर्धमात्रिकाणि भवन्ति । | व्यञ्जनानि कीदृशानि भवन्ति ? |
| (ग) स्वराणां द्वौ भेदौ भवतः । | स्वराणां कति भेदौ भवतः ? |
| (घ) ह्रस्वस्य उपभेदाः न भवन्ति । | कस्य उपभेदाः न भवन्ति ? |
| (ङ) व्यञ्जनानां चत्वारः भेदाः भवन्ति । | व्यञ्जनानां कति भेदाः भवन्ति ? |
6. वर्णसमुच्चयं पाठात् चित्वा लिखत —
(पाठ की वर्णमाला-तालिका से चुनकर लिखिए।)
अत्र इदम् अवधेयम् (उच्चारण-स्थान तालिकाः)
पाठ में वर्णोच्चारण को तालिकाओं द्वारा समझाया गया है। नीचे आभ्यन्तर-प्रयत्न एवं उच्चारण-स्थान की मुख्य तालिकाएँ मूल पाठ के अनुसार दी गई हैं।
1. आभ्यन्तर-प्रयत्न एवं वर्ण-भेद
| आभ्यन्तर-प्रयत्नः | स्थान-करण की स्थिति | उत्पन्न वर्ण (उदाहरण) |
|---|---|---|
| (१) स्पृष्ट-प्रयत्नः | करण स्थान को स्पष्ट रूप से स्पर्श करता है | स्पर्श-व्यञ्जन (क्…म्) – 25 |
| (२) ईषत्-स्पृष्ट-प्रयत्नः | करण स्थान को थोड़ा-सा स्पर्श करता है | अन्तःस्थ (य, र, ल, व) – 4 |
| (३) ईषद्-विवृत-प्रयत्नः | स्पर्श नहीं, बहुत पास जाकर लघु विवर | ऊष्म (श, ष, स, ह) + अयोगवाह (अं, अः) |
| (४) विवृत-प्रयत्नः | स्पर्श नहीं, कुछ पास जाकर स्फुट विवर | अ को छोड़ शेष सभी स्वर |
| (५) संवृत-प्रयत्नः | कण्ठ में संकोच/संकीर्णता | केवल ह्रस्व अ-कार |
2. वर्णानां द्वौ मुख्य-भेदौ (स्वरः एवं व्यञ्जनम्)
| भेदः | स्वरः | व्यञ्जनम् |
|---|---|---|
| 1. स्वरूप | स्वतन्त्रः वर्णः | परतन्त्रः वर्णः (उच्चारणार्थम् आधार-स्वरः आवश्यकः) |
| 2. मात्रा | एकमात्रः / द्विमात्रः / त्रिमात्रः | अर्धमात्रः नित्यम् |
| 3. आभ्यन्तर-प्रयत्नः | विवृत (21); अ-कारः – संवृत (01) | स्पर्शाः (25) स्पृष्ट; अन्तःस्थाः (04) ईषत्-स्पृष्ट; ऊष्माणः (04) + अयोगवाहौ (02) ईषद्-विवृत |
3. उच्चारण-स्थान एवं करण (स्थान – करण तालिका)
| वर्ण-वर्गः | स्थानम् | करणम् |
|---|---|---|
| 1. कण्ठ्याः (अ आ, ह, अः, कवर्गः) | कण्ठः (पृष्ठ-भागः) | कण्ठः (अग्र-भागः) / स्वस्थानम् |
| 2. तालव्याः (इ ई, च-वर्गः, य, श) | तालु | जिह्वा (जिह्वा-मध्यः) |
| 3. मूर्धन्याः (ऋ ॠ, ट-वर्गः, र, ष) | मूर्धा | जिह्वा (जिह्वा-उपाग्रः) |
| 4. दन्त्याः (ऌ, त-वर्गः, ल, स) | दन्तः | जिह्वा (जिह्वा-अग्रः) |
| 5. ओष्ठ्याः (उ ऊ, प-वर्गः, व) | ओष्ठः | ओष्ठः / स्वस्थानम् |
| 6. नासिक्याः (ङ, ञ, ण, न, म, अं) | नासिका | नासिका / स्वस्थानम् |
सन्ध्यक्षराः – ए, ऐ (कण्ठ-तालु), ओ, औ (कण्ठ-ओष्ठ) द्वि-स्थानी वर्णाः सन्ति ।
स्वाध्यायान्मा प्रमदः (पाणिनीय-शिक्षा-सूत्राणि)
पाठ के अन्त में ‘स्वाध्यायान्मा प्रमदः’ (स्वाध्याय में प्रमाद मत करो) शीर्षक के अन्तर्गत पाणिनीय-शिक्षा के आभ्यन्तर-प्रयत्न-प्रकरण के सूत्र दिए गए हैं। मुख्य सूत्र एवं उनका भाव इस प्रकार है –
| सूत्रम् (पाणिनीय-शिक्षा) | अर्थः / भावः |
|---|---|
| प्रयत्नोऽपि द्विविधः । | (वर्णोच्चारणार्थं) प्रयत्न दो प्रकार का होता है । |
| आभ्यन्तरो बाह्यश्च । | आभ्यन्तर-प्रयत्न एवं बाह्य-प्रयत्न – ये दो प्रकार हैं । |
| स्पृष्ट-करणाः स्पर्शाः । | स्पर्श-व्यञ्जनों के उच्चारण में करण स्पृष्ट-प्रयत्न से स्थान को (स्पष्ट रूप से) छूता है । |
| ईषत्-स्पृष्ट-करणा अन्तःस्थाः । | अन्तःस्थों के उच्चारण में करण ईषत्-स्पृष्ट-प्रयत्न से स्थान को (अल्प) छूता है । |
| ईषद्-विवृत-करणा ऊष्माणः । | ऊष्म व्यञ्जनों के उच्चारण में करण ईषद्-विवृत-प्रयत्न से स्थान के समीप जाता है । |
| विवृत-करणाः स्वराः । | स्वरों के उच्चारण में करण विवृत-प्रयत्न से स्थान की ओर (किञ्चित्) जाता है । |
| संवृतस्त्वकारः । | अ-कार (ह्रस्व) का उच्चारण अपवादरूप से संवृत-प्रयत्न से होता है । |
| इत्येषोऽन्तःप्रयत्नः । | इस प्रकार यह आभ्यन्तर-प्रयत्न का विवेचन है । |
मनोरञ्जक उपमा – अङ्गुलियाँ करण के समान, अङ्गुलि-छिद्र स्थान के समान, तथा अङ्गुलि से छिद्र की ओर किया प्रयत्न आभ्यन्तर-प्रयत्न के समान है।
अतिरिक्त प्रश्न (Extra Questions)
लघु उत्तरीय प्रश्न (30–40 शब्द)
1. वर्णों की उत्पत्ति के तीन तत्त्व कौन-कौन से हैं?
2. स्पृष्ट एवं ईषत्-स्पृष्ट प्रयत्न में क्या अन्तर है?
3. अयोगवाह किसे कहते हैं? वे किस प्रयत्न से बनते हैं?
4. संवृत-प्रयत्न केवल अ-कार में ही क्यों होता है?
5. ऊष्म एवं अन्तःस्थ व्यञ्जन कौन-से हैं?
दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (100–120 शब्द)
6. आभ्यन्तर-प्रयत्न के पाँचों प्रकारों का सोदाहरण वर्णन कीजिए।
7. स्थान, करण एवं आभ्यन्तर-प्रयत्न के ज्ञान का उच्चारण में क्या महत्त्व है?
8. वर्णमाला में स्वर एवं व्यञ्जन के मुख्य भेदों को स्पष्ट कीजिए।
MCQ & अभिकथन-कारण
1. आभ्यन्तर-प्रयत्न कितने प्रकार का होता है?
(क) तीन
(ख) चार
(ग) पाँच
(घ) छह
2. स्पर्श-व्यञ्जन किस प्रयत्न से उत्पन्न होते हैं?
(क) ईषत्-स्पृष्ट
(ख) स्पृष्ट
(ग) विवृत
(घ) संवृत
3. ‘य, र, ल, व’ किस वर्ग के व्यञ्जन हैं?
(क) स्पर्श
(ख) ऊष्म
(ग) अन्तःस्थ
(घ) अयोगवाह
4. ऊष्म व्यञ्जन एवं अयोगवाह किस प्रयत्न से बनते हैं?
(क) स्पृष्ट
(ख) ईषद्-विवृत
(ग) विवृत
(घ) संवृत
5. संवृत-प्रयत्न किस वर्ण के उच्चारण में होता है?
(क) आ-कार
(ख) ह्रस्व अ-कार
(ग) इ-कार
(घ) ए-कार
6. कितने उच्चारण-स्थान होते हैं?
(क) पाँच
(ख) छह
(ग) सात
(घ) आठ
7. ‘श, ष, स, ह’ किस वर्ग के व्यञ्जन हैं?
(क) अन्तःस्थ
(ख) स्पर्श
(ग) ऊष्म
(घ) अयोगवाह
8. विवृत-प्रयत्न से कौन उच्चारित होते हैं?
(क) सभी व्यञ्जन
(ख) अ-कार को छोड़कर शेष सभी स्वर
(ग) केवल अनुस्वार-विसर्ग
(घ) केवल स्पर्श-व्यञ्जन
9. अयोगवाह वर्ण कौन-से हैं?
(क) य, व
(ख) श, ह
(ग) अनुस्वार (अं) एवं विसर्ग (अः)
(घ) क, च
10. पाणिनीय-शिक्षा के अनुसार प्रयत्न कितने प्रकार का होता है?
(क) एक
(ख) दो (आभ्यन्तर एवं बाह्य)
(ग) तीन
(घ) पाँच
अभिकथन-कारण – नीचे अभिकथन (A) और कारण (R) दिए गए हैं। सही विकल्प चुनिए—
(क) A और R दोनों सही, R, A की सही व्याख्या है। (ख) A और R दोनों सही, पर R, A की सही व्याख्या नहीं। (ग) A सही, R गलत। (घ) A गलत, R सही।
1. अभिकथन (A): स्पर्श-व्यञ्जन स्पृष्ट-प्रयत्न से उत्पन्न होते हैं।
कारण (R): स्पृष्ट-प्रयत्न में करण स्थान को स्पष्ट रूप से पूर्णतः स्पर्श करता है।
2. अभिकथन (A): संवृत-प्रयत्न आ-कार एवं अ३-कार दोनों में होता है।
कारण (R): संवृत-प्रयत्न केवल कण्ठ-स्थान में, केवल ह्रस्व अ-कार के लिए होता है।
3. अभिकथन (A): अनुस्वार एवं विसर्ग अयोगवाह कहलाते हैं।
कारण (R): ये ऊष्म व्यञ्जनों के समान ईषद्-विवृत-प्रयत्न से उत्पन्न होते हैं।
4. अभिकथन (A): ‘र’ वर्ण स्पर्श-व्यञ्जन है।
कारण (R): ‘र’ ईषत्-स्पृष्ट-प्रयत्न से उत्पन्न अन्तःस्थ व्यञ्जन है।
5. अभिकथन (A): शुद्ध उच्चारण के लिए स्थान, करण एवं आभ्यन्तर-प्रयत्न का ज्ञान आवश्यक है।
कारण (R): इन तीनों के सम्यक् ज्ञान एवं पुनः-पुनः अभ्यास से ही प्रत्येक वर्ण का शुद्ध उच्चारण सम्भव होता है।
परीक्षा-सुझाव एवं सामान्य त्रुटियाँ
परीक्षा-सुझाव (Exam Tips)
- पाँचों आभ्यन्तर-प्रयत्न एवं उनसे उत्पन्न वर्ण-वर्ग (स्पर्श, अन्तःस्थ, ऊष्म, अयोगवाह, स्वर) तालिका सहित याद रखें – मेलनम् एवं रिक्तस्थान-पूर्ति इन्हीं से आते हैं।
- छह स्थान एवं उनके करण (कण्ठ-कण्ठ, तालु-जिह्वामध्य, मूर्धा-जिह्वाउपाग्र आदि) क्रम से कण्ठस्थ करें।
- संख्याएँ याद रखें – स्पर्श 25, अन्तःस्थ 4, ऊष्म 4, अयोगवाह 2, स्वर 21+1।
- ‘पूर्णवाक्येन उत्तरम्’ वाले प्रश्नों में पूरा वाक्य लिखें, केवल एक पद नहीं।
- पाणिनीय-शिक्षा के सूत्र (विवृत-करणाः स्वराः, संवृतस्त्वकारः आदि) उद्धरण के रूप में याद रखें।
सामान्य त्रुटियाँ (Common Mistakes)
- ‘य, र, ल, व’ को ऊष्म बता देना – ये अन्तःस्थ हैं; ऊष्म तो श, ष, स, ह हैं।
- संवृत-प्रयत्न को आ/अ३ में भी मान लेना – यह केवल ह्रस्व अ-कार में होता है।
- अयोगवाह (अं, अः) को स्वर या स्पर्श मान लेना – ये ईषद्-विवृत से बनते हैं।
- स्थान एवं करण में भ्रम – स्थान उच्चारण-स्थल है, करण उच्चारण-साधन है।
- देवनागरी में मात्रा/विसर्ग की अशुद्धि – आभ्यन्तरः, ईषद्-विवृतः, संवृतः शुद्ध लिखें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
शारदा कक्षा 9 का पाठ 11 ‘वर्णोच्चारण-शिक्षा (२)’ किस विषय पर है?
यह पाठ संस्कृत व्याकरण/शिक्षा-वेदाङ्ग पर आधारित है। इसमें वर्णों के शुद्ध उच्चारण के तीसरे तत्त्व ‘आभ्यन्तर-प्रयत्न’ का विस्तार से वर्णन है, जो पाँच प्रकार का होता है – स्पृष्ट, ईषत्-स्पृष्ट, ईषद्-विवृत, विवृत एवं संवृत।
आभ्यन्तर-प्रयत्न कितने प्रकार का होता है और किससे कौन-से वर्ण बनते हैं?
पाँच प्रकार – स्पृष्ट (स्पर्श-व्यञ्जन), ईषत्-स्पृष्ट (अन्तःस्थ य,र,ल,व), ईषद्-विवृत (ऊष्म श,ष,स,ह एवं अयोगवाह अं,अः), विवृत (अ को छोड़ शेष सभी स्वर), संवृत (केवल ह्रस्व अ-कार)।
संवृत-प्रयत्न केवल किस वर्ण में होता है?
संवृत-प्रयत्न केवल कण्ठ-स्थान में, और केवल ह्रस्व अ-कार के उच्चारण में होता है। इसके दीर्घ (आ) एवं प्लुत (अ३) रूपों में तो विवृत-प्रयत्न ही होता है।
तालिकाएँ, प्रश्न एवं अभ्यास-शीर्षक NCERT शारदा पुस्तक से ज्यों-के-त्यों लिए गए हैं; सार, व्याख्या एवं उत्तर ClearStudy द्वारा मौलिक रूप से तैयार किए गए हैं।
