NCERT Solutions for Class 10 Hindi (Kshitij 2) अध्याय 1: सूरदास के पद – प्रश्न-उत्तर, सार एवं व्याख्या (NCERT 2026–27)
यह पृष्ठ कक्षा 10 हिंदी की पुस्तक क्षितिज भाग 2 (काव्य खंड) के अध्याय 1 ‘सूरदास के पद’ (कवि – सूरदास) का पूरा समाधान देता है। ये चार पद सूरसागर के भ्रमरगीत से लिए गए हैं, जिनमें गोपियों के विरह, अनन्य प्रेम और वाक्-चातुर्य का सजीव चित्रण है। यहाँ पुस्तक के प्रश्न-अभ्यास के सभी उत्तर परीक्षा-उपयोगी शैली में दिए गए हैं।
कक्षा: 10विषय: हिंदीपुस्तक: क्षितिज भाग 2 (काव्य खंड)अध्याय: 1कवि: सूरदासविधा: पद (भ्रमरगीत)सत्र: 2026–27
सूरदास का जन्म सन् 1478 के आस-पास माना जाता है। एक मान्यता के अनुसार उनका जन्म मथुरा के निकट रुनकता (रेणुका क्षेत्र) में हुआ, जबकि दूसरी मान्यता के अनुसार उनका जन्म-स्थान दिल्ली के पास सीही माना जाता है। वे महाप्रभु वल्लभाचार्य के शिष्य थे और अष्टछाप के कवियों में सर्वाधिक प्रसिद्ध हैं। वे मथुरा और वृंदावन के बीच गऊघाट पर रहते थे तथा श्रीनाथ जी के मंदिर में भजन-कीर्तन करते थे। सन् 1583 में पारसौली में उनका निधन हुआ। उनके तीन ग्रंथ – सूरसागर, साहित्य लहरी और सूरसारावली – प्रसिद्ध हैं, जिनमें सूरसागर सर्वाधिक लोकप्रिय हुआ। सूर ‘वात्सल्य’ और ‘शृंगार’ के श्रेष्ठ कवि माने जाते हैं। उनकी कविता में ब्रजभाषा का निखरा हुआ रूप मिलता है।
पदों का भावार्थ (मूलभाव)
यहाँ सूरसागर के भ्रमरगीत से चार पद लिए गए हैं। कृष्ण के मथुरा जाने के बाद उद्धव गोपियों को निर्गुण ब्रह्म एवं योग का उपदेश देने आते हैं, परंतु गोपियाँ ज्ञान-मार्ग के स्थान पर प्रेम-मार्ग को श्रेष्ठ मानती हैं। भ्रमर के बहाने वे उद्धव पर व्यंग्य-बाण छोड़ती हैं।
पद 1 – “ऊधौ, तुम हौ अति बड़भागी”: गोपियाँ व्यंग्य करती हैं कि उद्धव बड़े भाग्यवान हैं, क्योंकि कृष्ण के समीप रहकर भी वे प्रेम-बंधन से अछूते (अनुरागहीन) रह गए। जैसे कमल का पत्ता जल में रहकर भी भीगता नहीं और जल के बीच रखी तेल की गागर पर बूँद नहीं ठहरती, वैसे ही उद्धव प्रेम-नदी में पैर ही नहीं डुबो पाए।
पद 2 – “मन की मन ही माँझ रही”: गोपियाँ कहती हैं कि उनके मन की अभिलाषाएँ मन में ही रह गईं। कृष्ण के लौट आने की आशा पर वे विरह सह रही थीं, परंतु अब योग का शुष्क संदेश सुन-सुनकर विरहिणी गोपियाँ और भी अधिक जल रही हैं। मर्यादा भी न रही।
पद 3 – “हमारैं हरि हारिल की लकरी”: गोपियाँ अपने अनन्य प्रेम में दृढ़ विश्वास प्रकट करती हैं – उनके लिए कृष्ण हारिल पक्षी की लकड़ी के समान हैं, जिसे उन्होंने मन, कर्म और वचन से हृदय में कसकर पकड़ रखा है। उन्हें योग का संदेश कड़वी ककड़ी जैसा लगता है; यह ‘व्याधि’ उन्हें ही दीजिए जिनका मन चंचल हो।
पद 4 – “हरि हैं राजनीति पढ़ि आए”: गोपियाँ ताना मारती हैं कि कृष्ण अब राजनीति पढ़ आए हैं, इसीलिए वे प्रत्यक्ष आने के बजाय योग-संदेश भिजवा रहे हैं। अंत में वे उद्धव को राजधर्म याद दिलाती हैं कि सच्चा राजधर्म वही है जिससे प्रजा न सताई जाए।
पाठ का सार
क्षितिज के प्रथम पाठ में सूरदास रचित सूरसागर के ‘भ्रमरगीत’ से चार पद संकलित हैं। श्रीकृष्ण मथुरा जाने के बाद स्वयं न लौटकर अपने मित्र उद्धव के माध्यम से गोपियों के पास संदेश भेजते हैं। उद्धव ज्ञानी हैं और निर्गुण ब्रह्म तथा योग के द्वारा गोपियों की विरह-वेदना शांत करने का प्रयास करते हैं। किंतु गोपियाँ ज्ञान-मार्ग के बजाय सगुण प्रेम-मार्ग को श्रेष्ठ मानती हैं, इसलिए उन्हें उद्धव का शुष्क योग-संदेश तनिक भी नहीं भाता।
पहले पद में गोपियाँ उद्धव को व्यंग्यपूर्वक ‘बड़भागी’ कहती हैं, क्योंकि कृष्ण के निकट रहकर भी वे प्रेम से अछूते रह गए – ठीक जल में रहते कमल-पत्र और जल में रखी तेल की गागर की भाँति। दूसरे पद में गोपियाँ अपनी पीड़ा प्रकट करती हैं कि कृष्ण के लौटने की आशा में जीती रहीं, पर अब योग का संदेश सुनकर उनकी विरहाग्नि और भड़क उठी है तथा उनकी मर्यादा भी नहीं रही।
तीसरे पद में गोपियाँ अपने एकनिष्ठ प्रेम पर दृढ़ रहती हैं। उनके लिए कृष्ण ‘हारिल की लकड़ी’ के समान हैं, जिन्हें उन्होंने मन-कर्म-वचन से हृदय में कसकर थाम रखा है; सोते-जागते, दिन-रात वे ‘कान्ह-कान्ह’ ही रटती रहती हैं। योग का उपदेश उन्हें कड़वी ककड़ी जैसा लगता है, जिसे वे चंचल-मन वालों के लिए ही उपयुक्त मानती हैं। चौथे पद में गोपियाँ ताना देती हैं कि कृष्ण अब राजनीति पढ़ आए हैं, तभी उन्होंने प्रत्यक्ष आने के बजाय योग-संदेश भिजवाया। अंत में वे उद्धव को राजधर्म की याद दिलाती हैं कि सच्चा राजधर्म वही है जिससे प्रजा न सताई जाए। इस प्रकार गोपियाँ अपने वाक्-चातुर्य से ज्ञानी उद्धव को निरुत्तर कर देती हैं, और सूरदास इन पदों के माध्यम से सगुण भक्ति, अनन्य प्रेम तथा लोकधर्मिता की प्रतिष्ठा करते हैं।
कठिन शब्द-अर्थ (शब्द-संपदा)
शब्द
अर्थ
बड़भागी
भाग्यवान
अपरस
अलिप्त, नीरस, अछूता
तगा
धागा, बंधन
पुरइनि पात
कमल का पत्ता
दागी
दाग, धब्बा
माहँ
में
प्रीति-नदी
प्रेम की नदी
पाउँ
पैर
बोरयौ
डुबोया
परागी
मुग्ध होना
गुर चाँटी ज्यौं पागी
जिस प्रकार चींटी गुड़ में लिपटती है, उसी प्रकार हम भी कृष्ण के प्रेम में अनुरक्त हैं
अधार
आधार
आवन
आगमन
बिथा
व्यथा
बिरहिनि
वियोग में जीने वाली
बिरह दही
विरह की आग में जल रही हैं
गुहारि
रक्षा के लिए पुकारना
धीर
धैर्य
मरजादा
मर्यादा, प्रतिष्ठा
हारिल
हारिल एक पक्षी है जो अपने पैरों में सदैव एक लकड़ी लिए रहता है, उसे छोड़ता नहीं
जक री
रटती रहती हैं
ब्याधि
रोग, पीड़ा पहुँचाने वाली वस्तु
करी
भोगा
मन चकरी
जिनका मन स्थिर नहीं रहता
मधुकर
भौंरा (उद्धव के लिए गोपियों द्वारा प्रयुक्त संबोधन)
पठाए
भेजा
पर हित
दूसरों के कल्याण के लिए
अनीति
अन्याय
पाठ्यपुस्तक के प्रश्न-अभ्यास के उत्तर
1. गोपियों द्वारा उद्धव को भाग्यवान कहने में क्या व्यंग्य निहित है?
उत्तरगोपियाँ उद्धव को व्यंग्यपूर्वक ‘बड़भागी’ (भाग्यवान) कहती हैं। उनका आशय यह है कि उद्धव कृष्ण के इतने समीप रहकर भी उनके प्रेम-बंधन से अछूते रह गए।जैसे जल में रहकर भी कमल का पत्ता गीला नहीं होता और जल में रखी तेल की गागर पर पानी की बूँद नहीं ठहरती, वैसे ही उद्धव कृष्ण के निकट रहते हुए भी प्रेम-रस से वंचित रहे।व्यंग्य यह है कि जो प्रेम के सुख से ही वंचित रह गया, वह वास्तव में अभागा है; गोपियाँ ऊपर से उसे भाग्यवान कहकर भीतर से उसकी प्रेम-शून्यता पर चोट करती हैं।
2. उद्धव के व्यवहार की तुलना किस-किस से की गई है?
उत्तरगोपियों ने उद्धव के प्रेम-रहित (निर्लिप्त) व्यवहार की तुलना दो उदाहरणों से की है –(क) कमल के पत्ते से, जो जल में रहकर भी जल से अछूता रहता है और उस पर पानी का दाग नहीं लगता।(ख) जल में रखी तेल की गागर से, जिस पर पानी की बूँद ठहर ही नहीं पाती।इन दोनों उदाहरणों से गोपियाँ बताती हैं कि उद्धव कृष्ण के सान्निध्य में रहकर भी प्रेम से बिलकुल अप्रभावित (निर्लिप्त) रहे।
3. गोपियों ने किन-किन उदाहरणों के माध्यम से उद्धव को उलाहने दिए हैं?
उत्तरगोपियों ने अनेक सुंदर उदाहरणों के माध्यम से उद्धव को उलाहने (शिकायतें) दिए हैं –(क) कमल का पत्ता – जल में रहकर भी न भीगने वाला।(ख) तेल की गागर – जल में रहकर भी जिस पर बूँद न ठहरे।(ग) हारिल पक्षी की लकड़ी – अपने प्रेम की दृढ़ता दिखाने के लिए।(घ) गुड़ से लिपटी चींटी – अपने अनुराग की गहराई बताने के लिए।(ङ) कड़वी ककड़ी – योग-संदेश को इसके समान बताकर।इन उदाहरणों से गोपियाँ उद्धव की प्रेम-शून्यता पर व्यंग्य करती और अपने प्रेम की श्रेष्ठता सिद्ध करती हैं।
4. उद्धव द्वारा दिए गए योग के संदेश ने गोपियों की विरहाग्नि में घी का काम कैसे किया?
उत्तरगोपियाँ कृष्ण के लौट आने की आशा के सहारे अपनी विरह-वेदना सह रही थीं; यही आशा उनके जीने का आधार थी।वे चाहती थीं कि कृष्ण स्वयं आकर उनकी विरह-पीड़ा को शांत करें, परंतु कृष्ण ने आने के बजाय उद्धव के द्वारा योग का शुष्क संदेश भेज दिया।इस संदेश ने गोपियों की आशा को तोड़ दिया और उनकी विरह-वेदना और भी बढ़ गई। जैसे जलती हुई आग में घी डालने से वह और भड़क उठती है, वैसे ही योग के संदेश ने उनकी विरहाग्नि को और प्रचंड कर दिया।
5. ‘मरजादा न लही’ के माध्यम से कौन-सी मर्यादा न रहने की बात की जा रही है?
उत्तर‘मरजादा न लही’ का अर्थ है – मर्यादा का न रह पाना।गोपियाँ कहती हैं कि वे विरह सहते हुए भी अब तक अपनी मर्यादा बनाए हुए थीं और धैर्य से कृष्ण के लौटने की प्रतीक्षा कर रही थीं।किंतु कृष्ण ने स्वयं न आकर योग का संदेश भेजकर उनकी प्रेम-मर्यादा की रक्षा नहीं की। यहाँ संकेत है कि प्रेम में जो मर्यादा (प्रतिष्ठा/भरोसा) बनी रहनी चाहिए थी, वह कृष्ण की उपेक्षा के कारण नहीं रह पाई।
6. कृष्ण के प्रति अपने अनन्य प्रेम को गोपियों ने किस प्रकार अभिव्यक्त किया है?
उत्तरगोपियाँ अपने एकनिष्ठ (अनन्य) प्रेम को अनेक रूपों में व्यक्त करती हैं –वे कहती हैं कि उनके लिए कृष्ण ‘हारिल की लकड़ी’ के समान हैं, जिन्हें उन्होंने मन, कर्म और वचन से हृदय में कसकर पकड़ रखा है।सोते-जागते, स्वप्न में, दिन-रात वे केवल ‘कान्ह-कान्ह’ ही रटती रहती हैं।वे अपने प्रेम की तुलना गुड़ से लिपटी चींटी से करती हैं, जो गुड़ को छोड़ नहीं पाती। इस प्रकार उनका प्रेम पूर्णतः कृष्ण को समर्पित और अटूट है।
7. गोपियों ने उद्धव से योग की शिक्षा कैसे लोगों को देने की बात कही है?
उत्तरगोपियाँ उद्धव से कहती हैं कि योग की शिक्षा उन लोगों को दी जानी चाहिए जिनका मन चंचल और अस्थिर है (‘जिनके मन चकरी’)।उनका कहना है कि जिनका मन एक स्थान पर टिकता ही नहीं, घूमता रहता है, उन्हें ही इस योग रूपी ‘व्याधि’ (रोग) की आवश्यकता है।गोपियों का मन तो पूरी तरह कृष्ण में एकाग्र है, इसलिए उन्हें योग की कोई आवश्यकता नहीं। यह कथन उनके दृढ़ और एकनिष्ठ प्रेम को प्रकट करता है।
8. प्रस्तुत पदों के आधार पर गोपियों का योग-साधना के प्रति दृष्टिकोण स्पष्ट करें।
उत्तरगोपियों का योग-साधना के प्रति दृष्टिकोण नकारात्मक और अस्वीकारपूर्ण है। वे सगुण-प्रेम की उपासक हैं, इसलिए निर्गुण योग उन्हें व्यर्थ और नीरस लगता है।वे योग के संदेश को ‘कड़वी ककड़ी’ और ‘व्याधि’ (रोग) के समान मानती हैं, जो उन्हें बिलकुल पसंद नहीं आता।उनका मन कृष्ण में स्थिर है, अतः वे योग को उन्हीं के लिए उपयुक्त मानती हैं जिनका मन चंचल हो। उनके अनुसार प्रेम-मार्ग ही ज्ञान-मार्ग से श्रेष्ठ है।
9. गोपियों के अनुसार राजा का धर्म क्या होना चाहिए?
उत्तरगोपियों के अनुसार राजा का धर्म यह है कि वह अपनी प्रजा का हित करे और किसी को भी सताए नहीं।वे कहती हैं – “राज धरम तौ यहै ‘सूर’, जो प्रजा न जाहिं सताए” अर्थात् सच्चा राजधर्म वही है जिससे प्रजा को कष्ट न पहुँचे।परोक्ष रूप से वे कृष्ण को संकेत देती हैं कि प्रजा (गोपियों) को विरह में तड़पाना राजधर्म के विरुद्ध है; राजा को सबका कल्याण करना चाहिए।
10. गोपियों को कृष्ण में ऐसे कौन-से परिवर्तन दिखाई दिए जिनके कारण वे अपना मन वापस पा लेने की बात कहती हैं?
उत्तरगोपियों को लगता है कि कृष्ण पहले बड़े चतुर थे, परंतु अब उन्होंने ‘गुरु-ग्रंथ’ (राजनीति-शास्त्र) पढ़कर अपनी बुद्धि और भी बढ़ा ली है।इसी बढ़ी हुई बुद्धि (राजनीति) के कारण कृष्ण ने स्वयं आने के बजाय योग का संदेश भिजवा दिया, जो उनके बदले हुए व्यवहार का प्रमाण है।गोपियाँ व्यंग्य करती हैं कि अब कृष्ण ‘भले लोग’ बन गए हैं जो दूसरों के हित के लिए घूमते हैं; अतः जो प्रेम (मन) कृष्ण चुराकर ले गए थे, अब वे उसे वापस पा लेना चाहती हैं।
11. गोपियों ने अपने वाक्चातुर्य के आधार पर ज्ञानी उद्धव को परास्त कर दिया, उनके वाक्चातुर्य की विशेषताएँ लिखिए।
उत्तरगोपियों के वाक्चातुर्य की प्रमुख विशेषताएँ इस प्रकार हैं –(क) व्यंग्यपूर्ण भाषा – उद्धव को ‘बड़भागी’ और कृष्ण को ‘राजनीति पढ़ि आए’ कहकर वे तीखा व्यंग्य करती हैं।(ख) तर्कशीलता – वे ठोस उदाहरणों (कमल-पत्ता, तेल की गागर, हारिल की लकड़ी) से अपनी बात सिद्ध करती हैं।(ग) उलाहना एवं चुटीलापन – उनकी बातों में मीठी चुभन और तीखापन एक साथ हैं।(घ) आत्मविश्वास एवं दृढ़ता – वे अपने प्रेम-मार्ग पर अडिग रहकर ज्ञानी उद्धव को निरुत्तर कर देती हैं।इन्हीं गुणों के कारण गोपियाँ बिना किसी शास्त्र-ज्ञान के भी ज्ञानी उद्धव को परास्त कर देती हैं।
12. संकलित पदों को ध्यान में रखते हुए सूर के भ्रमरगीत की मुख्य विशेषताएँ बताइए।
उत्तरसूर के भ्रमरगीत की मुख्य विशेषताएँ इस प्रकार हैं –(क) इसमें गोपियों के विरह, अनन्य प्रेम और वाक्-चातुर्य का सजीव चित्रण है।(ख) इसमें सगुण प्रेम-भक्ति की निर्गुण ज्ञान-योग पर श्रेष्ठता दिखाई गई है।(ग) भाषा ब्रजभाषा है, जो सरस, मधुर एवं भावपूर्ण है।(घ) इसमें व्यंग्य, उपालंभ (उलाहना) तथा अनेक सुंदर उदाहरणों (दृष्टांत) का प्रयोग हुआ है।(ङ) अनुप्रास, उपमा एवं दृष्टांत जैसे अलंकारों का स्वाभाविक प्रयोग है तथा संगीतात्मकता विद्यमान है। अंत में लोकधर्मिता एवं राजधर्म का संकेत भी मिलता है।
रचना और अभिव्यक्ति
13. गोपियों ने उद्धव के सामने तरह-तरह के तर्क दिए हैं, आप अपनी कल्पना से और तर्क दीजिए।
उत्तर (कल्पना)कुछ संभावित तर्क इस प्रकार दिए जा सकते हैं –(क) जो प्रेम की पीड़ा को स्वयं न जानता हो, वह दूसरों की विरह-वेदना कैसे समझ सकता है?(ख) जिस मन में पहले से ही कृष्ण बसे हों, वहाँ निर्गुण ब्रह्म के लिए स्थान कहाँ?(ग) जब रोग प्रेम का है तो उसकी औषधि भी प्रेम ही होगी, योग नहीं।(घ) सच्चा हितैषी संदेश भिजवाने के बजाय स्वयं आकर पीड़ा बाँटता है। (विद्यार्थी अपने तर्क भी जोड़ सकते हैं।)
14. उद्धव ज्ञानी थे, नीति की बातें जानते थे; गोपियों के पास ऐसी कौन-सी शक्ति थी जो उनके वाक्चातुर्य में मुखरित हो उठी?
उत्तरगोपियों के पास कृष्ण के प्रति अनन्य, सच्चे और एकनिष्ठ प्रेम की शक्ति थी।यही प्रेम-शक्ति उनके आत्मविश्वास, तर्क और वाणी में मुखर होकर प्रकट हुई।उद्धव के पास केवल शास्त्रीय ज्ञान और नीति की बातें थीं, परंतु अनुभूति का अभाव था; जबकि गोपियों की वाणी में हृदय की सच्ची अनुभूति बोल रही थी।इसी प्रेम-बल और भाव-प्रवणता के कारण उनका वाक्चातुर्य ज्ञानी उद्धव पर भारी पड़ा।
15. गोपियों ने यह क्यों कहा कि हरि अब राजनीति पढ़ आए हैं? क्या आपको गोपियों के इस कथन का विस्तार समकालीन राजनीति में नज़र आता है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तरगोपियों ने व्यंग्य में कहा कि कृष्ण अब राजनीति पढ़ आए हैं, क्योंकि उन्होंने स्वयं आकर प्रेम निभाने के बजाय कूटनीतिपूर्वक उद्धव के द्वारा योग का संदेश भिजवा दिया – अर्थात् सीधी बात के बजाय चालाकी का सहारा लिया।हाँ, इस कथन का विस्तार आज की राजनीति में भी दिखाई देता है। आज भी कई नेता प्रजा (जनता) से सीधे न मिलकर बीच के माध्यमों, बहानों और कूटनीतिक चालों का सहारा लेते हैं तथा वादे पूरे करने के बजाय बातों में उलझा देते हैं।गोपियों का संकेत है कि राजनीति में चतुराई आ जाने पर सच्चे संबंध और जनहित पीछे छूट जाते हैं – यह बात आज भी प्रासंगिक है।
अतिरिक्त प्रश्न
लघु उत्तरीय प्रश्न (30–40 शब्द)
1. भ्रमरगीत में ‘भ्रमर’ (भौंरा) किसका प्रतीक है और क्यों?
उत्तरभ्रमरगीत में ‘भ्रमर’ उद्धव का प्रतीक है। जैसे भौंरा एक फूल से दूसरे फूल पर मँडराता रहता है और कहीं स्थिर नहीं रहता, वैसे ही उद्धव का मन प्रेम में कहीं ठहरा नहीं। गोपियाँ भौंरे के बहाने उद्धव की चंचलता एवं प्रेम-शून्यता पर व्यंग्य करती हैं।
2. गोपियाँ कृष्ण को ‘हारिल की लकड़ी’ क्यों कहती हैं?
उत्तरहारिल पक्षी अपने पैरों में सदैव एक लकड़ी थामे रहता है और उसे कभी नहीं छोड़ता। गोपियाँ कहती हैं कि उनके लिए कृष्ण भी हारिल की लकड़ी के समान एकमात्र सहारा हैं, जिन्हें उन्होंने मन-कर्म-वचन से हृदय में कसकर पकड़ रखा है और किसी भी दशा में नहीं छोड़ सकतीं।
3. गोपियों को योग का संदेश ‘कड़वी ककड़ी’ जैसा क्यों लगता है?
उत्तरगोपियाँ सगुण प्रेम की उपासक हैं और कृष्ण के साकार रूप से प्रेम करती हैं। उद्धव का निर्गुण-योग संदेश उन्हें नीरस, शुष्क और अरुचिकर लगता है; इसलिए वे उसे कड़वी ककड़ी के समान बताती हैं, जिसे ग्रहण करना कठिन और अप्रिय है।
4. सूरदास किस भक्ति-धारा के कवि थे और उनकी भाषा कौन-सी थी?
उत्तरसूरदास कृष्णभक्ति शाखा (सगुण भक्ति) के प्रमुख कवि थे और अष्टछाप के कवियों में सर्वाधिक प्रसिद्ध थे। उनकी रचनाओं की भाषा ब्रजभाषा है, जिसमें माधुर्य, सरसता और लोकगीतों की मधुर लय का निखरा हुआ रूप मिलता है।
5. इन पदों में गोपियाँ किस मार्ग को श्रेष्ठ मानती हैं – ज्ञान-मार्ग या प्रेम-मार्ग? संक्षेप में लिखिए।
उत्तरइन पदों में गोपियाँ प्रेम-मार्ग (भक्ति-मार्ग) को ज्ञान-मार्ग (योग) से श्रेष्ठ मानती हैं। वे निर्गुण ब्रह्म एवं योग को व्यर्थ बताकर सगुण कृष्ण के प्रति अपने अनन्य प्रेम पर अडिग रहती हैं और उद्धव के ज्ञान-उपदेश को अस्वीकार कर देती हैं।
दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (100–120 शब्द)
1. भ्रमरगीत के माध्यम से सूरदास ने सगुण भक्ति की श्रेष्ठता किस प्रकार सिद्ध की है? सोदाहरण समझाइए।
उत्तरभ्रमरगीत में सूरदास ने गोपियों के माध्यम से सगुण प्रेम-भक्ति को निर्गुण ज्ञान-योग से श्रेष्ठ सिद्ध किया है। उद्धव गोपियों को निर्गुण ब्रह्म एवं योग का उपदेश देकर उनकी विरह-वेदना शांत करना चाहते हैं, परंतु गोपियाँ इसे पूरी तरह अस्वीकार कर देती हैं।वे कमल-पत्ते और तेल की गागर के उदाहरण देकर बताती हैं कि निर्लिप्तता प्रेम का अभाव है, सौभाग्य नहीं। ‘हारिल की लकड़ी’ के दृष्टांत से वे अपने एकनिष्ठ प्रेम की दृढ़ता प्रकट करती हैं और योग को ‘कड़वी ककड़ी’ तथा ‘व्याधि’ कहकर ठुकरा देती हैं।अंत में वे अपने वाक्-चातुर्य से ज्ञानी उद्धव को निरुत्तर कर देती हैं। इस प्रकार सूर सिद्ध करते हैं कि हृदय की सच्ची प्रेम-भक्ति शुष्क ज्ञान से कहीं अधिक सरस, सजीव और श्रेष्ठ है।
2. इन पदों के आधार पर गोपियों के चरित्र की विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
उत्तरइन पदों में गोपियाँ अनेक गुणों से युक्त सजीव पात्र के रूप में सामने आती हैं। सबसे पहले वे कृष्ण के प्रति अनन्य, एकनिष्ठ और अटूट प्रेम रखने वाली हैं – उनका मन पूरी तरह कृष्ण में रमा हुआ है।दूसरे, वे अत्यंत वाक्-चतुर एवं तर्कशील हैं; ठोस उदाहरणों और तीखे व्यंग्य से वे ज्ञानी उद्धव को परास्त कर देती हैं। तीसरे, उनमें गहरी भाव-प्रवणता और विरह-वेदना है, जिसे वे मार्मिकता से व्यक्त करती हैं।साथ ही वे आत्मविश्वासी, स्वाभिमानी और अपने प्रेम-मार्ग पर अडिग हैं। अंत में राजधर्म की बात कहकर वे अपनी विवेकशीलता एवं लोकधर्मिता भी प्रकट करती हैं। इस प्रकार गोपियाँ प्रेम, बुद्धि और भावना का सुंदर समन्वय प्रस्तुत करती हैं।
3. “राज धरम तौ यहै ‘सूर’, जो प्रजा न जाहिं सताए” – इस पंक्ति का भाव स्पष्ट करते हुए इसकी वर्तमान प्रासंगिकता बताइए।
उत्तरइस पंक्ति में सूरदास गोपियों के माध्यम से सच्चे राजधर्म की व्याख्या करते हैं। उनके अनुसार राजा का सबसे बड़ा धर्म यही है कि वह अपनी प्रजा का हित करे और किसी को न सताए।परोक्ष रूप से गोपियाँ कृष्ण पर व्यंग्य करती हैं कि प्रजारूपी गोपियों को विरह में तड़पाना राजधर्म के विरुद्ध है; शासक को सबका कल्याण करना चाहिए।यह विचार आज भी पूरी तरह प्रासंगिक है। लोकतंत्र में भी शासक एवं प्रशासन का कर्तव्य जनता की भलाई करना है, उसे कष्ट देना नहीं। जो शासन जनता की पीड़ा का ध्यान रखता है, वही श्रेष्ठ माना जाता है। इस प्रकार यह पंक्ति युगों-युगों तक के लिए सुशासन का आदर्श प्रस्तुत करती है।
अभ्यास MCQ
1. क्षितिज भाग 2 के ये चार पद सूरदास की किस रचना से लिए गए हैं?
(क) साहित्य लहरी
(ख) सूरसारावली
(ग) सूरसागर (भ्रमरगीत)
(घ) सूरपचीसी
उत्तर(ग) सूरसागर (भ्रमरगीत)।
2. गोपियाँ उद्धव को किस नाम से व्यंग्यपूर्वक संबोधित करती हैं?
(क) बड़भागी / मधुकर
(ख) कान्ह
(ग) हारिल
(घ) नंदनंदन
उत्तर(क) बड़भागी / मधुकर।
3. उद्धव गोपियों को किसका उपदेश देने आए थे?
(क) सगुण भक्ति का
(ख) निर्गुण ब्रह्म एवं योग का
(ग) कर्मकांड का
(घ) राजनीति का
उत्तर(ख) निर्गुण ब्रह्म एवं योग का।
4. गोपियाँ अपने प्रेम की तुलना किससे करती हैं?
(क) कमल के पत्ते से
(ख) गुड़ से लिपटी चींटी से
(ग) तेल की गागर से
(घ) कड़वी ककड़ी से
उत्तर(ख) गुड़ से लिपटी चींटी से।
5. ‘हारिल की लकड़ी’ का प्रयोग किसके लिए किया गया है?
(क) उद्धव के लिए
(ख) योग के लिए
(ग) कृष्ण के लिए
(घ) गोपियों के लिए
उत्तर(ग) कृष्ण के लिए।
6. गोपियों को योग का संदेश किसके समान लगता है?
(क) मीठे फल के
(ख) कड़वी ककड़ी के
(ग) अमृत के
(घ) शीतल जल के
उत्तर(ख) कड़वी ककड़ी के।
7. गोपियों के अनुसार योग की शिक्षा किन्हें देनी चाहिए?
(क) जिनका मन कृष्ण में स्थिर है
(ख) जिनका मन चंचल/अस्थिर है
(ग) सभी भक्तों को
(घ) केवल उद्धव को
उत्तर(ख) जिनका मन चंचल/अस्थिर है।
8. योग के संदेश ने गोपियों की विरहाग्नि पर क्या प्रभाव डाला?
नीचे अभिकथन (A) और कारण (R) दिए गए हैं। सही विकल्प चुनिए— (क) A और R दोनों सही, R, A की सही व्याख्या है। (ख) A और R दोनों सही, पर R, A की सही व्याख्या नहीं। (ग) A सही, R गलत। (घ) A गलत, R सही।
1. अभिकथन (A): गोपियों ने उद्धव को ‘बड़भागी’ कहा।
कारण (R): उद्धव कृष्ण के समीप रहकर भी प्रेम-बंधन से अछूते रह गए।
उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही (व्यंग्यपूर्ण) व्याख्या करता है।
2. अभिकथन (A): गोपियों को उद्धव का योग-संदेश अच्छा लगा।
कारण (R): गोपियाँ निर्गुण ब्रह्म की उपासिका थीं।
उत्तर(घ) A गलत है – योग-संदेश गोपियों को कड़वी ककड़ी जैसा लगा; R भी असत्य है, क्योंकि गोपियाँ सगुण प्रेम की उपासिका थीं।
3. अभिकथन (A): गोपियों के लिए कृष्ण ‘हारिल की लकड़ी’ के समान हैं।
कारण (R): वे कृष्ण को मन, कर्म और वचन से अपना एकमात्र सहारा मानती हैं।
उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है।
4. अभिकथन (A): गोपियाँ कहती हैं कि हरि अब राजनीति पढ़ आए हैं।
कारण (R): कृष्ण ने स्वयं आने के बजाय कूटनीतिपूर्वक उद्धव द्वारा योग-संदेश भिजवाया।
उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है।
5. अभिकथन (A): गोपियाँ योग की शिक्षा चंचल-मन वालों को देने की बात कहती हैं।
कारण (R): गोपियों का मन कृष्ण में पूरी तरह एकाग्र एवं स्थिर है।
उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है।