NCERT Solutions for Class 10 Hindi (Kshitij 2) अध्याय 9: लखनवी अंदाज़ – प्रश्न-उत्तर, सार एवं शब्दार्थ (NCERT 2026–27)

यह पृष्ठ कक्षा 10 हिंदी की पुस्तक क्षितिज भाग 2 (गद्य खंड) के अध्याय 9 ‘लखनवी अंदाज़’ (लेखक – यशपाल) का पूरा एवं सटीक समाधान देता है – प्रश्न-अभ्यास के उत्तर, पाठ का सार, शब्द-संपदा, अतिरिक्त प्रश्न, MCQ तथा अभिकथन-कारण सहित।

कक्षा: 10 विषय: हिंदी पुस्तक: क्षितिज भाग 2 (गद्य) अध्याय: 9 लेखक: यशपाल विधा: व्यंग्य निबंध / कथा सत्र: 2026–27

लेखक परिचय – यशपाल

यशपाल का जन्म सन् 1903 में पंजाब के फ़िरोज़पुर छावनी में हुआ था। उन्होंने प्रारंभिक शिक्षा काँगड़ा में ग्रहण करने के बाद लाहौर के नेशनल कॉलेज से बी.ए. किया, जहाँ उनका परिचय भगत सिंह और सुखदेव से हुआ। स्वाधीनता संग्राम की क्रांतिकारी धारा से जुड़ाव के कारण वे जेल भी गए। सन् 1976 में उनका निधन हुआ। यशपाल यथार्थवादी शैली के विशिष्ट रचनाकार माने जाते हैं; उनकी रचनाओं में आम आदमी के सरोकार, सामाजिक विषमता, राजनैतिक पाखंड और रूढ़ियों के विरुद्ध मुखर स्वर मिलता है। ज्ञानदान, तर्क का तूफ़ान, पिंजरे की उड़ान, फूलो का कुर्ता उनके प्रसिद्ध कहानी-संग्रह हैं तथा झूठा सच भारत-विभाजन की त्रासदी का मार्मिक दस्तावेज़ है। दिव्या, अमिता, देशद्रोही, पार्टी कामरेड उनके अन्य प्रमुख उपन्यास हैं। भाषा की स्वाभाविकता और सजीवता उनकी रचनागत विशेषता है।

पाठ का सार

‘लखनवी अंदाज़’ यशपाल द्वारा रचित एक व्यंग्यात्मक रचना है। लेखक ने यह रचना यह सिद्ध करने के लिए लिखी थी कि बिना कथ्य (विचार, घटना और पात्र) के भी कहानी लिखी जा सकती है। साथ ही यह उस पतनशील सामंती वर्ग पर तीखा कटाक्ष है, जो वास्तविकता से बेख़बर रहकर एक बनावटी और दिखावटी जीवन-शैली का आदी हो चुका है।

लेखक एक नई कहानी के विषय में सोचने तथा खिड़की से प्राकृतिक दृश्य देखने के उद्देश्य से सेकंड क्लास का टिकट लेकर मुफ़स्सिल की पैसेंजर ट्रेन के एक छोटे, खाली-से दिखने वाले डिब्बे में चढ़ जाते हैं। वहाँ उन्हें लखनऊ की नवाबी नस्ल के एक सफ़ेदपोश सज्जन सुविधा से पालथी मारे बैठे मिलते हैं। उनके सामने दो ताज़े-चिकने खीरे तौलिये पर रखे थे। लेखक के अचानक चढ़ने से नवाब साहब के एकांत चिंतन में विघ्न पड़ता है और उनके चेहरे पर असंतोष झलकता है।

कुछ देर बाद नवाब साहब लेखक को खीरे का ‘शौक फ़रमाने’ का निमंत्रण देते हैं, परंतु लेखक यह भाँपकर कि वे केवल शराफ़त का गुमान बनाए रखना चाहते हैं, विनम्रता से मना कर देते हैं। इसके बाद नवाब साहब बड़ी सावधानी और नफ़ासत से खीरों को धोते हैं, छीलते हैं, फाँकों को करीने से सजाते हैं तथा उन पर जीरा-मिला नमक और लाल मिर्च बुरकते हैं। फिर वे एक-एक फाँक उठाकर केवल सूँघते हैं, मुँह में पानी भर जाने पर घूँट उतारते हैं और फाँक को बिना खाए ही खिड़की के बाहर फेंकते जाते हैं। सारी फाँकें फेंकने के बाद वे गर्व से लेखक की ओर देखते हैं, मानो कह रहे हों कि यही खानदानी रईसों का तरीका है।

अंत में नवाब साहब डकार लेकर कहते हैं कि खीरा लज़ीज़ तो होता है, पर मेदे पर बोझ डाल देता है। तभी लेखक के ज्ञान-चक्षु खुल जाते हैं और वे पहचान जाते हैं कि ये नई कहानी के लेखक हैं। उन्हें समझ आता है कि जैसे खीरे की सुगंध और स्वाद की कल्पना मात्र से डकार आ सकती है, वैसे ही बिना विचार, घटना और पात्रों के, केवल लेखक की इच्छा-मात्र से ‘नई कहानी’ क्यों नहीं बन सकती। इस प्रकार लेखक ने आडंबर और बनावटीपन पर सूक्ष्म व्यंग्य किया है।

पाठ का मूल भाव

इस रचना का मूल भाव दो स्तरों पर चलता है –

(1) सामाजिक व्यंग्य: नवाब साहब के माध्यम से लेखक उस पतनशील सामंती (नवाबी) संस्कृति पर कटाक्ष करते हैं, जिसके पास वास्तविक वैभव तो नहीं रहा, पर दिखावे और झूठी शान का अभिमान अब भी बना हुआ है। खीरा खाने की लालसा होते हुए भी केवल ‘रईसी’ दिखाने के लिए उसे सूँघकर फेंक देना इसी बनावटीपन का प्रतीक है।

(2) साहित्यिक व्यंग्य: लेखक उस समय की कुछ ‘नई कहानियों’ पर भी व्यंग्य करते हैं जो कथ्य (विचार, घटना, पात्र) से रहित होती थीं – जैसे खीरे की कल्पना मात्र से डकार आना, वैसे ही कथ्य के बिना केवल इच्छा से ‘कहानी’ गढ़ लेना।

शब्द-संपदा (कठिन शब्द-अर्थ)

शब्दअर्थ
मुफ़स्सिलकेंद्रस्थ नगर के इर्द-गिर्द के स्थान
सफ़ेदपोशभद्र व्यक्ति, सभ्य दिखने वाला
किफ़ायतमितव्ययता, समझदारी से (कम खर्च में) उपयोग करना
आदाब-अर्ज़अभिवादन का एक ढंग
गुमानभ्रम, घमंड
एहतियातसावधानी
बुरकना(नमक-मिर्च आदि) छिड़कना
स्फुरणफड़कना, हिलना
प्लावितपानी से भर जाना
पनियातीरसीली, पानी से भरी हुई
मेदाआमाशय, पाचन-ग्रंथि
तसलीमसम्मान में (नमन/अभिवादन)
सिर ख़म करनासिर झुकाना
तहज़ीबशिष्टता, सभ्यता
नफ़ासतस्वच्छता, सुघड़पन
नज़ाकतकोमलता, नज़ुकपन
नफ़ीसबढ़िया, उम्दा
एब्सट्रैक्टसूक्ष्म, अमूर्त (जिसका भौतिक अस्तित्व न हो)
सकीलआसानी से न पचने वाला, भारी
रसास्वादनरस का आस्वाद लेना, स्वाद का आनंद
लज़ीज़स्वादिष्ट
कनखियों सेतिरछी नज़र से, चुपके से

पाठ्यपुस्तक के प्रश्न-अभ्यास के उत्तर

नीचे NCERT क्षितिज पुस्तक के ‘प्रश्न-अभ्यास’ के प्रश्न ज्यों-के-त्यों दिए गए हैं और प्रत्येक का परीक्षा-उपयोगी उत्तर दिया गया है।

1. लेखक को नवाब साहब के किन हाव-भावों से महसूस हुआ कि वे उनसे बातचीत करने के लिए तनिक भी उत्सुक नहीं हैं?

उत्तरलेखक के अचानक डिब्बे में चढ़ जाने पर नवाब साहब की आँखों में एकांत चिंतन में विघ्न पड़ने का असंतोष दिखाई दिया।उन्होंने लेखक के साथ बैठने या बातचीत करने में कोई उत्साह नहीं दिखाया और चुपचाप खिड़की से बाहर देखते रहे।वे बार-बार खिड़की से बाहर झाँककर स्थिति पर गौर करते रहे, मानो लेखक की उपस्थिति को टालना चाहते हों।इन्हीं उदासीन हाव-भावों से लेखक ने अनुभव किया कि नवाब साहब उनसे बातचीत करने में तनिक भी रुचि नहीं रखते।

2. नवाब साहब ने बहुत ही यत्न से खीरा काटा, नमक-मिर्च बुरका, अंततः सूँघकर ही खिड़की से बाहर फेंक दिया। उन्होंने ऐसा क्यों किया होगा? उनका ऐसा करना उनके कैसे स्वभाव को इंगित करता है?

उत्तरनवाब साहब किसी सफ़ेदपोश (लेखक) के सामने खीरे जैसी साधारण वस्तु खाते हुए अपनी ‘खानदानी रईसी’ को कम होते नहीं देखना चाहते थे, इसलिए खीरा खाने के स्थान पर केवल उसकी सुगंध और स्वाद की कल्पना से ही संतुष्ट होकर उसे बाहर फेंक दिया।उनके मन में खाने की इच्छा तो थी (मुँह में पानी भी आया), पर झूठी शान बनाए रखने के लिए उन्होंने आत्म-संयम का दिखावा किया।उनका ऐसा करना उनके आडंबरप्रिय, दिखावटी और बनावटी स्वभाव को इंगित करता है – वे वास्तविकता से कटे हुए, झूठी शान-शौकत के आदी पतनशील सामंती वर्ग के प्रतिनिधि हैं।

3. बिना विचार, घटना और पात्रों के भी क्या कहानी लिखी जा सकती है। यशपाल के इस विचार से आप कहाँ तक सहमत हैं?

उत्तरमैं यशपाल के इस विचार से पूर्णतः सहमत नहीं हूँ। यशपाल ने यह बात व्यंग्य के रूप में कही है, उसे शाब्दिक रूप से सही मानना उचित नहीं।किसी भी सशक्त कहानी का आधार उसका कथ्य होता है – विचार, घटनाक्रम और पात्र ही कहानी को जीवंत, रोचक और सार्थक बनाते हैं।इनके अभाव में रचना केवल शब्दों का खोखला ढाँचा बनकर रह जाएगी, जिसका कोई संदेश या प्रभाव नहीं होगा – ठीक वैसे ही जैसे खीरे की कल्पना मात्र से पेट नहीं भरता।अतः बिना कथ्य के कोई सार्थक कहानी संभव नहीं; लेखक ने स्वयं इसी ओर व्यंग्यपूर्वक संकेत किया है।

4. आप इस निबंध को और क्या नाम देना चाहेंगे?

उत्तरइस निबंध को निम्नलिखित में से कोई उपयुक्त नाम दिया जा सकता है –(क) नवाबी ठाठ / झूठी शान(ख) दिखावे का खीरा(ग) खानदानी रईसी(घ) बनावटी जीवन-शैली / आडंबरमेरी दृष्टि में सबसे उपयुक्त नाम ‘झूठी शान’ या ‘दिखावे का खीरा’ होगा, क्योंकि पूरा निबंध दिखावे और बनावटीपन पर व्यंग्य करता है। (विद्यार्थी अपनी पसंद का तर्कसंगत नाम चुन सकते हैं।)

रचना और अभिव्यक्ति

5. (क) नवाब साहब द्वारा खीरा खाने की तैयारी करने का एक चित्र प्रस्तुत किया गया है। इस पूरी प्रक्रिया को अपने शब्दों में व्यक्त कीजिए।

उत्तरनवाब साहब ने पहले खिड़की से बाहर देखकर दृढ़ निश्चय किया, फिर खीरों के नीचे रखा तौलिया झाड़कर सामने बिछा लिया।सीट के नीचे से लोटा उठाकर दोनों खीरों को खिड़की के बाहर धोया और तौलिये से पोंछ लिया।जेब से चाकू निकालकर दोनों खीरों के सिर काटे और उन्हें गोदकर झाग निकाला।फिर बहुत एहतियात से खीरों को छीलकर फाँकों को करीने से तौलिये पर सजाते गए।फाँकों पर जीरा-मिला नमक और लाल मिर्च की सुर्खी बुरकी।अंत में एक-एक फाँक उठाकर सूँघते, स्वाद के आनंद में पलकें मूँदते, मुँह में आया पानी का घूँट उतारते और फाँक को बिना खाए ही खिड़की के बाहर फेंकते गए।

5. (ख) किन-किन चीज़ों का रसास्वादन करने के लिए आप किस प्रकार की तैयारी करते हैं?

उत्तर (संभावित)यह विद्यार्थी का व्यक्तिगत अनुभव है। उत्तर इस प्रकार लिखा जा सकता है –आम, अमरूद, ककड़ी आदि फलों का रसास्वादन करने के लिए मैं पहले उन्हें अच्छी तरह धोता हूँ, छीलता हूँ और साफ़ बर्तन में काटकर रखता हूँ।कुछ फलों पर स्वादानुसार नमक या चाट-मसाला छिड़कता हूँ, ताकि उनका स्वाद और बढ़ जाए।भोजन का रसास्वादन शांति और स्वच्छता से बैठकर करना मुझे अधिक आनंद देता है।

6. खीरे के संबंध में नवाब साहब के व्यवहार को उनकी सनक कहा जा सकता है। आपने नवाबों की और भी सनकों और शौक के बारे में पढ़ा-सुना होगा। किसी एक के बारे में लिखिए।

उत्तर (संभावित)नवाबों की अनेक सनकें और शौक प्रसिद्ध रहे हैं। एक उदाहरण –कहा जाता है कि कुछ नवाब अपनी झूठी शान दिखाने के लिए मेहमानों के सामने असली नोट जलाकर सिगरेट या हुक्का सुलगाते थे, ताकि अपनी अमीरी का प्रदर्शन कर सकें।इसी प्रकार लखनऊ के कुछ नवाब केवल दिखावे के लिए बहुमूल्य वस्त्र और अलंकार पहनते, घंटों आईने के सामने सजते-सँवरते तथा अदब-कायदे की बारीकियों में ही पूरा समय बिता देते थे।ऐसी सनकें वास्तविक उपयोगिता से रहित, केवल आडंबर और झूठी शान का प्रतीक थीं। (विद्यार्थी अपने पढ़े-सुने किसी एक उदाहरण को लिख सकते हैं।)

7. क्या सनक का कोई सकारात्मक रूप हो सकता है? यदि हाँ तो ऐसी सनकों का उल्लेख कीजिए।

उत्तरहाँ, सनक का सकारात्मक रूप भी हो सकता है। जब कोई धुन या लगन किसी रचनात्मक एवं उपयोगी कार्य से जुड़ जाती है, तो वह सकारात्मक सनक बन जाती है।जैसे – स्वच्छता की सनक, समय की पाबंदी की सनक, पढ़ाई या किसी कला (संगीत, चित्रकला, खेल) में पूर्णता पाने की धुन।पर्यावरण-संरक्षण के लिए पेड़ लगाने की सनक, पुस्तकें या ज्ञानवर्धक वस्तुएँ संग्रह करने का शौक, अथवा किसी समाज-सेवा में निरंतर लगे रहने की लगन।ऐसी सनकें व्यक्ति को अनुशासित बनाती हैं और समाज के लिए लाभकारी होती हैं।

भाषा-अध्ययन

8. निम्नलिखित वाक्यों में से क्रियापद छाँटकर क्रिया-भेद भी लिखिए—

उत्तर (क) एक सफ़ेदपोश सज्जन बहुत सुविधा से पालथी मारे बैठे थे। — क्रियापद: बैठे थे; क्रिया-भेद: अकर्मक क्रिया (कर्म की आवश्यकता नहीं)। (ख) नवाब साहब ने संगति के लिए उत्साह नहीं दिखाया। — क्रियापद: दिखाया; क्रिया-भेद: सकर्मक क्रिया (कर्म ‘उत्साह’)। (ग) ठाली बैठे, कल्पना करते रहने की पुरानी आदत है। — क्रियापद: है; क्रिया-भेद: अकर्मक क्रिया (घ) अकेले सफ़र का वक्त काटने के लिए ही खीरे खरीदे होंगे। — क्रियापद: खरीदे होंगे; क्रिया-भेद: सकर्मक क्रिया (कर्म ‘खीरे’)। (ङ) दोनों खीरों के सिर काटे और उन्हें गोदकर झाग निकाला। — क्रियापद: काटे, निकाला; क्रिया-भेद: दोनों सकर्मक क्रिया (कर्म ‘सिर’, ‘झाग’)। (च) नवाब साहब ने सतृष्ण आँखों से नमक-मिर्च के संयोग से चमकती खीरे की फाँकों की ओर देखा। — क्रियापद: देखा; क्रिया-भेद: सकर्मक क्रिया (छ) नवाब साहब खीरे की तैयारी और इस्तेमाल से थककर लेट गए। — क्रियापद: लेट गए; क्रिया-भेद: अकर्मक क्रिया (ज) जेब से चाकू निकाला। — क्रियापद: निकाला; क्रिया-भेद: सकर्मक क्रिया (कर्म ‘चाकू’)।

अतिरिक्त प्रश्न

लघु उत्तरीय प्रश्न (लगभग 30–40 शब्द)

1. लेखक ने सेकंड क्लास का टिकट क्यों लिया, जबकि उन्हें दूर नहीं जाना था?

उत्तरलेखक भीड़ से बचकर एकांत में नई कहानी के विषय में सोचना तथा खिड़की से प्राकृतिक दृश्य देखना चाहते थे। इसी सुविधा के लिए दाम अधिक होने पर भी उन्होंने सेकंड क्लास का टिकट ले लिया।

2. नवाब साहब के सामने क्या रखा था और वे किस मुद्रा में बैठे थे?

उत्तरनवाब साहब लखनऊ की नवाबी नस्ल के सफ़ेदपोश सज्जन थे, जो बहुत सुविधा से पालथी मारे बैठे थे। उनके सामने एक बर्थ पर दो ताज़े-चिकने खीरे तौलिये पर रखे हुए थे।

3. लेखक ने नवाब साहब का खीरा खाने का निमंत्रण क्यों ठुकरा दिया?

उत्तरलेखक भाँप गए कि नवाब साहब केवल अपनी शराफ़त का गुमान बनाए रखने के लिए उन्हें भी मामूली लोगों की हरकत में शामिल करना चाहते हैं। आत्म-सम्मान बनाए रखने के लिए उन्होंने विनम्रता से ‘शुक्रिया’ कहकर निमंत्रण ठुकरा दिया।

4. नवाब साहब के अनुसार खीरा कैसा होता है?

उत्तरनवाब साहब के अनुसार खीरा लज़ीज़ (स्वादिष्ट) तो होता है, परंतु सकील अर्थात् भारी एवं देर से पचने वाला होता है, जो नामुराद मेदे (आमाशय) पर बोझ डाल देता है।

5. खीरे की कल्पना मात्र से डकार आने पर लेखक के मन में कौन-सा विचार आया?

उत्तरलेखक ने सोचा कि जब खीरे की सुगंध और स्वाद की कल्पना मात्र से पेट भर जाने का डकार आ सकता है, तो बिना विचार, घटना और पात्रों के, लेखक की इच्छा मात्र से ‘नई कहानी’ क्यों नहीं बन सकती – यही व्यंग्य का मर्म है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (लगभग 100–120 शब्द)

6. ‘लखनवी अंदाज़’ पाठ के माध्यम से लेखक ने पतनशील सामंती वर्ग पर किस प्रकार व्यंग्य किया है? स्पष्ट कीजिए।

उत्तरयशपाल ने नवाब साहब के पात्र के माध्यम से उस पतनशील सामंती (नवाबी) वर्ग पर तीखा व्यंग्य किया है, जिसके पास वास्तविक वैभव अब नहीं रहा, फिर भी झूठी शान और दिखावे का अभिमान बना हुआ है।नवाब साहब किफ़ायत के कारण सेकंड क्लास में सफ़र करते हैं, पर किसी सफ़ेदपोश के सामने मँझले दर्जे में सफ़र करते दिखना उन्हें गवारा नहीं।खीरा खाने की प्रबल इच्छा होते हुए भी, केवल अपनी ‘खानदानी रईसी’ दिखाने के लिए वे उसे सूँघकर खिड़की से बाहर फेंक देते हैं।यह व्यवहार दिखावे, बनावटीपन और वास्तविकता से कटे रहने की प्रवृत्ति का प्रतीक है। लेखक संकेत देते हैं कि ऐसी परजीवी संस्कृति आज भी कहीं-न-कहीं दिखाई देती है।

7. इस पाठ का साहित्यिक व्यंग्य क्या है? ‘नई कहानी’ पर यशपाल के व्यंग्य को समझाइए।

उत्तरसामाजिक व्यंग्य के साथ-साथ इस पाठ में एक सूक्ष्म साहित्यिक व्यंग्य भी है। यशपाल यह सिद्ध करना चाहते थे कि बिना कथ्य (विचार, घटना और पात्र) के कहानी नहीं लिखी जा सकती।उस समय कुछ ‘नई कहानियाँ’ ऐसी लिखी जा रही थीं, जो ठोस कथ्य से रहित और केवल शिल्प या भाव के सहारे खड़ी होती थीं।नवाब साहब का खीरे को केवल सूँघकर, स्वाद की कल्पना से ही संतुष्ट हो जाना और डकार लेना – इसी खोखलेपन का प्रतीक है।लेखक व्यंग्यपूर्वक कहते हैं कि जैसे केवल कल्पना से पेट नहीं भरता, वैसे ही कथ्य के बिना सार्थक कहानी नहीं बनती। इस प्रकार पाठ दोनों स्तरों पर मारक व्यंग्य रचता है।

8. नवाब साहब और लेखक के स्वभाव की तुलना कीजिए।

उत्तरनवाब साहब दिखावटी, आडंबरप्रिय और झूठी शान के आदी हैं। वे वास्तविकता से कटे हुए, मितव्ययी होते हुए भी रईसी का गुमान बनाए रखना चाहते हैं और खीरा खाने की इच्छा को भी दबाकर बनावटी संयम का प्रदर्शन करते हैं।लेखक यथार्थवादी, सूक्ष्म-दृष्टि वाले और स्वाभिमानी हैं। वे आडंबर से दूर रहते हैं तथा कनखियों से नवाब साहब के व्यवहार का निरीक्षण कर उसकी असलियत भाँप लेते हैं।नवाब साहब बाहरी दिखावे में जीते हैं, जबकि लेखक भीतरी सच्चाई और तर्क को महत्त्व देते हैं। इस विरोधाभास के माध्यम से ही पूरे पाठ का व्यंग्य उभरता है।

बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQ)

1. ‘लखनवी अंदाज़’ पाठ के लेखक कौन हैं?

(क) प्रेमचंद

(ख) यशपाल

(ग) रामवृक्ष बेनीपुरी

(घ) महावीरप्रसाद द्विवेदी

उत्तर(ख) यशपाल।

2. यशपाल का जन्म कहाँ हुआ था?

(क) लखनऊ

(ख) लाहौर

(ग) फ़िरोज़पुर छावनी (पंजाब)

(घ) वाराणसी

उत्तर(ग) फ़िरोज़पुर छावनी (पंजाब)।

3. लेखक ने किस श्रेणी (क्लास) का टिकट लिया था?

(क) फर्स्ट क्लास

(ख) सेकंड क्लास

(ग) थर्ड क्लास

(घ) जनरल

उत्तर(ख) सेकंड क्लास।

4. नवाब साहब के सामने क्या रखा हुआ था?

(क) दो आम

(ख) दो ताज़े खीरे

(ग) मिठाई का डिब्बा

(घ) फलों की टोकरी

उत्तर(ख) दो ताज़े खीरे।

5. नवाब साहब ने खीरे की फाँकों पर क्या बुरका?

(क) केवल चीनी

(ख) जीरा-मिला नमक और लाल मिर्च

(ग) चाट मसाला और नींबू

(घ) काली मिर्च

उत्तर(ख) जीरा-मिला नमक और लाल मिर्च।

6. नवाब साहब ने खीरे की फाँकों का अंततः क्या किया?

(क) मज़े से खा लिया

(ख) लेखक को दे दिया

(ग) केवल सूँघकर खिड़की के बाहर फेंक दिया

(घ) तौलिये में बाँध लिया

उत्तर(ग) केवल सूँघकर खिड़की के बाहर फेंक दिया।

7. नवाब साहब के अनुसार खीरा मेदे पर क्या प्रभाव डालता है?

(क) पाचन में सहायता करता है

(ख) हल्का और सुपाच्य है

(ग) सकील है, मेदे पर बोझ डाल देता है

(घ) कोई प्रभाव नहीं डालता

उत्तर(ग) सकील है, मेदे पर बोझ डाल देता है।

8. यशपाल यह सिद्ध करने के लिए रचना लिखना चाहते थे कि—

(क) कहानी केवल कथ्य से ही बनती है

(ख) बिना कथ्य के भी कहानी लिखी जा सकती है

(ग) कहानी में पात्र अनिवार्य हैं

(घ) कहानी केवल कल्पना से नहीं बनती

उत्तर(ख) बिना कथ्य के भी कहानी लिखी जा सकती है (यह बात उन्होंने व्यंग्य रूप में कही)।

9. ‘लखनवी अंदाज़’ मुख्यतः किस वर्ग पर व्यंग्य है?

(क) किसान वर्ग

(ख) मध्यम वर्ग

(ग) पतनशील सामंती/नवाबी वर्ग

(घ) मज़दूर वर्ग

उत्तर(ग) पतनशील सामंती/नवाबी वर्ग।

10. ‘मुफ़स्सिल’ शब्द का अर्थ है—

(क) रेलवे स्टेशन

(ख) केंद्रस्थ नगर के इर्द-गिर्द के स्थान

(ग) बड़ा शहर

(घ) गाँव का बाज़ार

उत्तर(ख) केंद्रस्थ नगर के इर्द-गिर्द के स्थान।
उत्तर-कुंजी: 1-(ख), 2-(ग), 3-(ख), 4-(ख), 5-(ख), 6-(ग), 7-(ग), 8-(ख), 9-(ग), 10-(ख)।

अभिकथन-कारण

निर्देश – नीचे अभिकथन (A) और कारण (R) दिए गए हैं। सही विकल्प चुनिए—
(क) A और R दोनों सही, R, A की सही व्याख्या है। (ख) A और R दोनों सही, पर R, A की सही व्याख्या नहीं। (ग) A सही, R गलत। (घ) A गलत, R सही।

1. अभिकथन (A): नवाब साहब ने खीरा खाए बिना ही खिड़की के बाहर फेंक दिया।

कारण (R): वे लेखक के सामने अपनी खानदानी रईसी और झूठी शान बनाए रखना चाहते थे।

उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है।

2. अभिकथन (A): लेखक ने नवाब साहब का खीरा खाने का निमंत्रण स्वीकार कर लिया।

कारण (R): लेखक भूख से व्याकुल थे और खीरा खाना चाहते थे।

उत्तर(घ) A गलत है – लेखक ने निमंत्रण विनम्रता से ठुकरा दिया था; R भी संदर्भ के अनुकूल नहीं।

3. अभिकथन (A): ‘लखनवी अंदाज़’ एक व्यंग्यात्मक रचना है।

कारण (R): इसमें पतनशील सामंती वर्ग के दिखावे और बनावटीपन पर कटाक्ष किया गया है।

उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है।

4. अभिकथन (A): यशपाल यथार्थवादी शैली के विशिष्ट रचनाकार माने जाते हैं।

कारण (R): उनकी रचनाओं में आम आदमी के सरोकार, सामाजिक विषमता और राजनैतिक पाखंड का चित्रण मिलता है।

उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है।

5. अभिकथन (A): खीरे की कल्पना मात्र से नवाब साहब को डकार आ गई।

कारण (R): खीरा वास्तव में खाने से ही पेट भरता है, कल्पना से नहीं।

उत्तर(ख) A और R दोनों सही हैं, पर R, A की सही व्याख्या नहीं करता – डकार वास्तविक तृप्ति का नहीं, दिखावे/कल्पना का परिणाम थी।
उत्तर-कुंजी (A-R): 1-(क), 2-(घ), 3-(क), 4-(क), 5-(ख)।

परीक्षा-युक्तियाँ व सामान्य गलतियाँ

परीक्षा-युक्तियाँ

  • लेखक का नाम यशपाल और जन्म-स्थान फ़िरोज़पुर छावनी (पंजाब), जन्म 1903, निधन 1976 अवश्य याद रखें।
  • पाठ का दोहरा व्यंग्य – (1) पतनशील सामंती/नवाबी वर्ग पर तथा (2) कथ्यहीन ‘नई कहानी’ पर – दोनों उत्तरों में स्पष्ट करें।
  • खीरा खाने की पूरी प्रक्रिया (धोना → छीलना → नमक-मिर्च बुरकना → सूँघना → फेंकना) क्रम से लिखें – यह अक्सर पूछा जाता है।
  • उत्तर में ‘दिखावा’, ‘बनावटीपन’, ‘झूठी शान’, ‘आडंबर’ जैसे मूल बिंदु अवश्य आएँ।
  • शब्दार्थ (मुफ़स्सिल, सकील, नफ़ासत, मेदा आदि) रटें – ये MCQ और अर्थ-स्पष्टीकरण में काम आते हैं।

सामान्य गलतियाँ

  • लेखक को प्रेमचंद या किसी अन्य का लिखना – पाठ के लेखक यशपाल हैं।
  • यह सोच लेना कि नवाब साहब ने खीरा सचमुच खाया – उन्होंने केवल सूँघकर फेंक दिया।
  • केवल सामाजिक व्यंग्य लिखकर साहित्यिक व्यंग्य (नई कहानी वाला) छोड़ देना।
  • यह मान लेना कि लेखक ने खीरा खाने का निमंत्रण स्वीकार किया – उन्होंने मना कर दिया था।
  • उर्दू-शब्दों की अशुद्ध वर्तनी (नफ़ासत, नज़ाकत, मेदा, सकील) लिखना।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

‘लखनवी अंदाज़’ पाठ के लेखक कौन हैं?

इस व्यंग्यात्मक रचना के लेखक यशपाल हैं, जो यथार्थवादी शैली के विशिष्ट रचनाकार माने जाते हैं।

नवाब साहब ने खीरा खाने के बजाय क्यों फेंक दिया?

वे लेखक (सफ़ेदपोश) के सामने अपनी खानदानी रईसी और झूठी शान बनाए रखना चाहते थे, इसलिए खीरा खाने की इच्छा होते हुए भी उसे केवल सूँघकर खिड़की के बाहर फेंक दिया।

इस पाठ का मूल व्यंग्य क्या है?

पाठ में दोहरा व्यंग्य है – एक ओर दिखावटी, पतनशील सामंती (नवाबी) वर्ग पर, और दूसरी ओर कथ्य (विचार, घटना, पात्र) से रहित ‘नई कहानी’ पर।

प्रश्न NCERT क्षितिज पुस्तक से ज्यों-के-त्यों लिए गए हैं; उत्तर ClearStudy द्वारा मौलिक रूप से तैयार एवं जाँचे गए हैं।

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