NCERT Solutions for Class 10 Sanskrit (Shemushi) पाठः 3: शिशुलालनम्

This page gives the complete solution for Class 10 Sanskrit Shemushi (शेमुषी द्वितीयो भागः) Chapter 3 ‘शिशुलालनम्’ – a नाटकांश (dramatic excerpt) edited from the fifth अङ्क of the famous Sanskrit play कुन्दमाला by नाटककार दिङ्नागः, depicting श्रीराम’s tender affection (शिशुवात्सल्य) for his sons लव and कुश – with its मूल नाटकांश-प्रसंग, original सार (Hindi summary), श्लोकों का अन्वय एवं भावार्थ, शब्दार्थ, and exam-ready answers to every question of the अभ्यासः along with extra questions, MCQs, अभिकथन-कारण and FAQs (NCERT 2026–27).

कक्षा (Class): 10 विषय (Subject): संस्कृत (Sanskrit) पुस्तक (Book): Shemushi 2 (शेमुषी द्वितीयो भागः) पाठः (Chapter): 3 पाठ-नाम: शिशुलालनम् सत्र (Session): 2026–27

पाठ का अवलोकन (Chapter Overview)

शेमुषी (द्वितीयो भागः) कक्षा 10 का तृतीय पाठ ‘शिशुलालनम्’ संस्कृत के प्रसिद्ध नाटक कुन्दमाला के पञ्चम अङ्क से सम्पादित एक नाटकांश (गद्य-प्रधान, बीच-बीच में पद्य-सहित) है। इस नाटक के रचयिता प्रसिद्ध नाटककार दिङ्नागः हैं। इस अंश में श्रीराम अपने दोनों पुत्रों लव एवं कुश को सिंहासन पर बैठाना चाहते हैं, किन्तु दोनों विनयपूर्वक मना कर देते हैं। सिंहासनारूढ़ राम उनके रूप-लावण्य को देखकर मुग्ध हो जाते हैं और उन्हें अपनी गोद में बैठा लेते हैं। पाठ में शिशु-वात्सल्य (शिशुलालन) का अत्यन्त मनोहारी वर्णन हुआ है। संवाद के माध्यम से ज्ञात होता है कि लव-कुश की माता का नाम देवी (सीता) तथा गुरु महर्षि वाल्मीकि हैं – और राम के हृदय में अपने अनजाने पुत्रों के प्रति सहज स्नेह उमड़ पड़ता है।

पाठ-परिचय / नाट्य-प्रसंग

यह पाठ संस्कृत-वाङ्मय के प्रसिद्ध नाटक ‘कुन्दमाला’ के पञ्चम अङ्क से सम्पादित किया गया है। इसके रचयिता प्रसिद्ध नाटककार दिङ्नागः हैं। दिङ्नाग ने इस नाटक में रामकथा के करुण एवं अवसादपूर्ण उत्तरार्ध की नाटकीय सम्भावनाओं को मौलिकता से साकार किया है; इसी कथानक पर प्रसिद्ध नाटककार भवभूति का उत्तररामचरित भी आश्रित है। कुन्दमाला के छहों अङ्कों का दृश्य-विधान वाल्मीकि के तपोवन के परिसर में ही केन्द्रित है। प्रस्तुत नाटकांश में विदूषक के साथ कुशल-लव (कुश एवं लव) श्रीराम के समीप आते हैं। उनके स्पर्श-सुख से अभिभूत होकर राम उन्हें अपने सिंहासन पर, अपनी गोद में बिठाकर लाड़ करते हैं। बीच-बीच में राम पुत्रों से उनके कुल, माता एवं गुरु का परिचय पूछते हैं; इसी संवाद में सीता-वियोग की करुणा भी झलकती है।

सार (Hindi Summary)

‘शिशुलालनम्’ नाटकांश में श्रीराम के पुत्र-वात्सल्य का हृदयस्पर्शी चित्रण हुआ है। दृश्य के आरम्भ में सिंहासन पर बैठे श्रीराम के समीप विदूषक द्वारा मार्ग दिखाए जाते हुए दोनों तपस्वी बालक कुश एवं लव आते हैं। वे राम के निकट जाकर प्रणाम करते हैं और महाराज की कुशल पूछते हैं। राम उनके दर्शन से स्वयं को कुशल अनुभव करते हैं तथा उन्हें आलिंगनबद्ध कर लेते हैं और कहते हैं कि यह स्पर्श हृदय को छू लेने वाला है। राम उन दोनों को अपने आसन पर बैठाना चाहते हैं, किन्तु दोनों बालक ‘राजासन पर बैठना उचित नहीं’ कहकर अति शालीनतापूर्वक मना कर देते हैं।

राम कहते हैं कि व्यवधान (आड़) रखकर बैठने से चरित्र की कोई हानि नहीं; अतः वे बालकों को कुछ अन्तर पर सिंहासन पर बिठा लेते हैं। फिर इसी प्रसंग में वे यह श्लोक कहते हैं कि “गुणों में महान् व्यक्तियों के लिए भी छोटी अवस्था के कारण बालक लाड़ के योग्य ही होता है; जैसे चन्द्रमा भी बाल-भाव के कारण ही शिव के मस्तक का आभूषण बनता है।” तत्पश्चात् राम बालकों के सौन्दर्य से कौतूहल-वश उनसे उनके वंश, पिता, माता एवं गुरु के विषय में पूछते हैं। दोनों बालक बताते हैं कि वे सूर्य-चन्द्र के समान क्षत्रिय-कुल के हैं, परस्पर सहोदर (जुड़वाँ) भाई हैं तथा उनके नाम लव एवं कुश हैं और उनके गुरु भगवान् वाल्मीकि हैं, जिन्होंने उपनयन का उपदेश दिया।

जब राम पिता का नाम पूछते हैं, तब बालक कहते हैं कि इस तपोवन में पिता का नाम कोई नहीं लेता; किन्तु माता क्रुद्ध होने पर उन्हें ‘निरनुक्रोश के पुत्रो’ (निर्दय के बेटो) कहकर डाँटती हैं। यह सुनकर राम मन-ही-मन व्यथित हो जाते हैं कि उनके अपराध के कारण ही वह तपस्विनी (सीता) अपनी सन्तान को इन क्रोधपूर्ण कठोर वचनों से फटकारती है। संवाद के अन्त में ज्ञात होता है कि बालकों की माता के दो नाम हैं – तपोवनवासी ‘देवी’ कहते हैं और भगवान् वाल्मीकि ‘वधू’ कहते हैं। तभी नेपथ्य से वाल्मीकि का दूत रामायण-गान के लिए बुलाता है; राम मुनि-नियोग का आदर करते हुए सभी को विदा देकर प्रस्थान करते हैं। इस प्रकार पाठ शिशु-स्नेह की कोमलता एवं विछोह की करुणा दोनों को साथ-साथ प्रकट करता है।

श्लोकों का अन्वय एवं भावार्थ

श्लोकः 1

भवति शिशुजनो वयोऽनुरोधाद् गुणमहतामपि लालनीय एव ।
व्रजति हिमकरोऽपि बालभावात् पशुपति-मस्तक-केतकच्छदत्वम् ॥

अन्वयः – गुणमहताम् अपि वयोऽनुरोधात् शिशुजनः लालनीयः एव भवति। बालभावात् हिमकरः अपि पशुपति-मस्तक-केतकच्छदत्वं व्रजति।

भावार्थः – अत्यधिक गुणवान् (महान्) लोगों के लिए भी छोटी अवस्था के कारण बालक लाड़-प्यार के योग्य ही होता है। (इसका प्रमाण यह है कि) चन्द्रमा भी बाल-भाव (बालचन्द्र रूप) के कारण ही शिव के मस्तक का आभूषण बनकर, केतकी (केवड़े) के पुष्प से बने आभूषण की भाँति सुशोभित होता है। तात्पर्य यह कि बालक चाहे कितना ही गुणी क्यों न हो, उसकी अल्प आयु के कारण उससे स्नेह एवं लाड़ करना स्वाभाविक है।

श्लोकः 2

भवन्तौ गायन्तौ कविरपि पुराणो व्रतनिधिर्
गिरां सन्दर्भोऽयं प्रथममवतीर्णो वसुमतीम् ।
कथा चेयं श्लाघ्या सरसिरुहनाभस्य नियतं
पुनाति श्रोतारं रमयति च सोऽयं परिकरः ॥

अन्वयः – भवन्तौ गायन्तौ, पुराणः व्रतनिधिः कविः अपि, वसुमतीं प्रथमम् अवतीर्णः गिरां अयं सन्दर्भः, सरसिरुहनाभस्य च इयं श्लाघ्या कथा, सः च अयं परिकरः नियतं श्रोतारं पुनाति रमयति च।

भावार्थः – भगवान् वाल्मीकि द्वारा रचित पुराणपुरुष (विष्णु) की कथा कुश एवं लव द्वारा श्रीराम को सुनायी जानी थी। उसी की सूचना देते हुए, नेपथ्य से कुश और लव को बिना समय नष्ट किए अपने कर्तव्य के पालन का निर्देश दिया जाता है। दोनों राम से आज्ञा लेकर जाना चाहते हैं, तब श्रीराम उपर्युक्त श्लोक के माध्यम से उस रचना का सम्मान करते हुए कहते हैं – आप दोनों (कुश और लव) इस कथा का गान करने वाले हैं, तपोनिधि पुराण मुनि (वाल्मीकि) इस रचना के कवि हैं, यह धरती पर प्रथम बार अवतरित होने वाला स्पष्ट वाणी का काव्य है और इसकी कथा कमलनाभ विष्णु से सम्बद्ध है; इस प्रकार निश्चय ही यह संयोग श्रोताओं को पवित्र एवं आनन्दित करने वाला है।

शब्दार्थाः (Word-meanings)

शब्दः (Sanskrit)हिन्दी अर्थEnglish meaning
पितामहःपिता के पिता, दादाGrandfather
सहस्रदीधितिःसूर्यThe sun
कण्ठाश्लेषःगले लगानाEmbrace / hug
परिष्वज्यआलिंगन करकेHaving embraced
विचिन्त्यविचार करकेHaving considered
अध्यासितुम्बैठने के लिएTo sit (upon)
सव्यवधानम्आड़/व्यवधान सहितWith obstruction
अध्यास्यताम्बैठिए, आसीन होंBe seated
अलमतिदाक्षिण्येनअत्यधिक कुशलता/शिष्टाचार रहने देंLeave aside excessive politeness
अङ्कम्गोदLap
हिमकरःचन्द्रमाThe moon
पशुपतिःशिवLord Shiva
स्वगतम्मन ही मनAside (to oneself)
समानाभिजनौएक ही कुल में उत्पन्नOf the same family
संवृत्तौहो गएBecame
प्रतिवचनम्उत्तरReply / answer
सोदर्यौसहोदर, सगे (जुड़वाँ) भाईReal / twin brothers
शरीरसन्निवेशःशरीर की बनावटBody structure
उदात्तरम्यःअत्यन्त मनोहरLofty and charming
समुदाचारःशिष्टाचारGood etiquette
उपनयनोपदेशेनउपनयन-संस्कार की दीक्षा के कारणBy the sacred-thread teaching
नामधेयम्नामName
निरनुक्रोशःनिर्दय, दयारहितUnkind / merciless
भणतिकहता हैSays
अम्बामाताMother
प्रकृतिस्थास्वाभाविक/सामान्य मनःस्थिति मेंIn a normal state
अधिक्षिपतिफटकारती हैSnubs / rebukes
निर्भर्त्सयतिधमकाती/डाँटती हैScolds
स्वापत्यम्अपनी सन्तान कोOne’s own offspring
उपाध्यायदूतःगुरु (वाल्मीकि) का दूतThe teacher’s messenger

अभ्यासः के उत्तर (Textbook Solutions)

1. एकपदेन उत्तरं लिखत —

(क) कुशलवौ कम् उपसृत्य प्रणमतः ?

उत्तरम्रामम् (कुशलवौ रामम् उपसृत्य प्रणमतः) ।

(ख) तपोवनवासिनः कुशस्य मातरं केन नाम्ना आह्वयन्ति ?

उत्तरम्देवीति (देवी इति नाम्ना) ।

(ग) वयोऽनुरोधात् कः लालनीयः भवति ?

उत्तरम्शिशुजनः (वयोऽनुरोधात् शिशुजनः लालनीयः भवति) ।

(घ) केन सम्बन्धेन वाल्मीकिः लवकुशयोः गुरुः ?

उत्तरम्उपनयनोपदेशेन (उपनयन-संस्कारदीक्षया) ।

(ङ) कुत्र लवकुशयोः पितुः नाम न व्यवह्रियते ?

उत्तरम्तपोवने (अस्मिन् तपोवने पितुः नाम न व्यवह्रियते) ।

2. अधोलिखितानां प्रश्नानाम् उत्तराणि संस्कृतभाषया लिखत —

(क) रामाय कुशलवयोः कण्ठाश्लेषस्य स्पर्शः कीदृशः आसीत् ?

उत्तरम्रामाय कुशलवयोः कण्ठाश्लेषस्य स्पर्शः हृदयग्राही आसीत् । (अर्थात् वह स्पर्श राम के हृदय को छू लेने वाला, अत्यन्त सुखद था।)

(ख) रामः लवकुशौ कुत्र उपवेशयितुम् कथयति ?

उत्तरम्रामः लवकुशौ सिंहासने (आसनार्धे, स्वसमीपम् अङ्के च) उपवेशयितुम् कथयति । (पूर्णवाक्ये – रामः लवकुशौ अङ्के सिंहासने च उपवेशयितुम् इच्छति।)

(ग) बालभावात् हिमकरः कुत्र विराजते ?

उत्तरम्बालभावात् हिमकरः पशुपतेः मस्तके (शिवस्य शिरसि केतकच्छदरूपेण) विराजते ।

(घ) कुशलवयोः वंशस्य कर्ता कः ?

उत्तरम्कुशलवयोः वंशस्य कर्ता सहस्रदीधितिः (सूर्यः) अस्ति । (अर्थात् वे सूर्यवंशी क्षत्रिय हैं।)

(ङ) कुशलवयोः मातरं वाल्मीकिः केन नाम्ना आह्वयति ?

उत्तरम्कुशलवयोः मातरं वाल्मीकिः वधूः इति नाम्ना आह्वयति ।

3. रेखाङ्कितेषु पदेषु विभक्तिं तत्कारणं च उदाहरणानुसारं निर्दिशत —

यथा – राजन्! अलम् अतिदाक्षिण्येन। → विभक्तिः: तृतीया | तत्कारणम्: ‘अलम्’ योगे

वाक्यम् (रेखाङ्कित पदम्)विभक्तिःतत्कारणम्
(क) रामः लवकुशौ आसनार्धम् उपवेशयति।द्वितीयाकर्म-कारके (अधिकरण-भावे) द्वितीया
(ख) धिक् माम् एवंभूतम्।द्वितीया‘धिक्’ योगे द्वितीया
(ग) अटव्यवहितम् अध्यास्यतां सिंहासनम्।द्वितीया‘अध्यास्’ (कर्म) के योग में द्वितीया
(घ) अलम् अतिविस्तरेण।तृतीया‘अलम्’ योगे तृतीया
(ङ) रामम् उपसृत्य प्रणम्य च।द्वितीया‘उप’-उपसर्गपूर्वक ‘सृ’ (कर्म) के योग में द्वितीया

4. यथानिर्देशम् उत्तरत —

(क) ‘जानाम्यहं तस्य नामधेयम्’ अस्मिन् वाक्ये कर्तृपदं किम् ?

उत्तरम्कर्तृपदम् – अहम् (जानामि क्रियायाः कर्ता) ।

(ख) ‘किं कुपिता एवं भणति उत प्रकृतिस्था’ – अस्मात् वाक्यात् ‘हर्षिता’ इति पदस्य विपरीतार्थकपदं चित्वा लिखत।

उत्तरम्विपरीतार्थकपदम् – कुपिता (हर्षिता × कुपिता) ।

(ग) विदूषकः (उपसृत्य) ‘आज्ञापयतु भवान्!’ अत्र भवान् इति पदं कस्मै प्रयुक्तम् ?

उत्तरम्‘भवान्’ इति पदं रामाय (रामं प्रति) प्रयुक्तम् ।

(घ) ‘तस्मादङ्क-व्यवहितम् अध्यास्यतां सिंहासनम्’ – अत्र क्रियापदं किम् ?

उत्तरम्क्रियापदम् – अध्यास्यताम्

(ङ) ‘वयसस्तु न किञ्चिदन्तरम्’ – अत्र ‘आयुषः’ इत्यर्थे किं पदं प्रयुक्तम् ?

उत्तरम्‘आयुषः’ इत्यर्थे वयसः इति पदं प्रयुक्तम् ।

5. अधोलिखितानि वाक्यानि कः कं प्रति कथयति —

वाक्यम्कः (वक्ता)कं प्रति (श्रोता)
(क) सव्यवधानं न चारित्रलोपाय।रामःलवकुशौ (प्रति)
(ख) किं कुपिता एवं भणति, उत प्रकृतिस्था?विदूषकःकुशम् (प्रति)
(ग) जानाम्यहं तस्य नामधेयम्।कुशःरामम् (प्रति)
(घ) तस्या द्वे नामनी।लवःविदूषकम् (प्रति)
(ङ) वयस्य! अपूर्वं खलु नामधेयम्।रामःविदूषकम् (प्रति)

6. (अ) मञ्जूषातः पर्यायद्वयं चित्वा पदानां समक्षं लिखत —

मञ्जूषा: शिवः, शिष्टाचारः, शशी, चन्द्रशेखरः, सुतः, इदानीम्, अधुना, पुत्रः, सूर्यः, सदाचारः, निशाकरः, भानुः

पदम्पर्यायद्वयम् (उत्तरम्)
(क) हिमकरःशशी, निशाकरः
(ख) सम्प्रतिइदानीम्, अधुना
(ग) समुदाचारःशिष्टाचारः, सदाचारः
(घ) पशुपतिःशिवः, चन्द्रशेखरः
(ङ) तनयःसुतः, पुत्रः
(च) सहस्रदीधितिःसूर्यः, भानुः

6. (आ) विशेषण-विशेष्यपदानि योजयत —

यथा – श्लाघ्या → कथा

उत्तरम् (सही मेलनम्) (1) उदात्तरम्यः → (क) समुदाचारः (2) अतिदीर्घः → (घ) प्रवासः (3) समरूपः → (ङ) कुटुम्बवृत्तान्तः (4) हृदयग्राही → (ख) स्पर्शः (5) कुमारयोः → (ग) कुशलवयोः

7. (क) अधोलिखितपदेषु सन्धिं कुरुत —

पदम्सन्धिः (उत्तरम्)
(क) द्वयोः + अपिद्वयोरपि
(ख) द्वौ + अपिद्वावपि
(ग) कः + अत्रकोऽत्र
(घ) अनभिज्ञः + अहम्अनभिज्ञोऽहम्
(ङ) इति + आत्मानम्इत्यात्मानम्

7. (ख) अधोलिखितपदेषु विच्छेदं कुरुत —

पदम्विच्छेदः (उत्तरम्)
(क) अहमप्येतयोःअहम् + अपि + एतयोः
(ख) वयोऽनुरोधात्वयः + अनुरोधात्
(ग) समानाभिजनौसमान + अभिजनौ
(घ) खल्वेतत्खलु + एतत्

अतिरिक्त प्रश्न (Extra Questions)

लघु उत्तरीय प्रश्न (30–40 शब्द)

1. ‘शिशुलालनम्’ पाठ किस नाटक से सम्पादित है तथा इसके रचयिता कौन हैं?

उत्तर‘शिशुलालनम्’ पाठ संस्कृत के प्रसिद्ध नाटक ‘कुन्दमाला’ के पञ्चम अङ्क से सम्पादित किया गया है। इसके रचयिता प्रसिद्ध नाटककार दिङ्नाग हैं। इसी कथानक पर भवभूति का उत्तररामचरित भी आश्रित है।

2. राम लव-कुश को सिंहासन पर बैठाना क्यों चाहते हैं और बालक क्या करते हैं?

उत्तरराम लव-कुश के रूप-लावण्य एवं हृदयग्राही स्पर्श से मुग्ध होकर उन्हें अपने समीप सिंहासन पर बैठाना चाहते हैं। किन्तु दोनों बालक ‘राजासन पर बैठना उचित नहीं’ कहकर अति शालीनतापूर्वक मना कर देते हैं।

3. श्लोक ‘भवति शिशुजनो…’ में चन्द्रमा का दृष्टान्त किसलिए दिया गया है?

उत्तरइस श्लोक में राम यह सिद्ध करते हैं कि बालक चाहे कितना ही गुणी हो, छोटी अवस्था के कारण वह लाड़ के योग्य ही होता है। उदाहरणस्वरूप, चन्द्रमा भी बाल-भाव के कारण ही शिव के मस्तक का आभूषण बनकर शोभा पाता है।

4. राम स्वगत रूप से व्यथित क्यों हो जाते हैं?

उत्तरजब बालक बताते हैं कि माता क्रुद्ध होकर उन्हें ‘निरनुक्रोश (निर्दय) के पुत्रो’ कहकर डाँटती हैं, तब राम मन-ही-मन व्यथित होते हैं कि उनके अपराध के कारण ही वह तपस्विनी (सीता) अपनी सन्तान को इन क्रोधपूर्ण कठोर वचनों से फटकारती है।

5. नाटकांश के अन्त में राम सबको विदा क्यों कर देते हैं?

उत्तरनेपथ्य से गुरु वाल्मीकि का दूत रामायण-गान के लिए बुलाता है। राम मुनि के नियोग (आदेश) का सम्मान करते हुए कहते हैं कि मुनि का यह कार्य अवश्य सम्माननीय है; अतः वे सभा-सदों एवं बालकों को विदा देकर सब प्रस्थान कर जाते हैं।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (100–120 शब्द)

6. ‘शिशुलालनम्’ पाठ में निहित वात्सल्य-भाव का वर्णन कीजिए।

उत्तर‘शिशुलालनम्’ पाठ शिशु-वात्सल्य का अत्यन्त मनोहारी चित्र प्रस्तुत करता है। श्रीराम जब अपने अनजाने पुत्रों लव एवं कुश को देखते हैं, तब उनके हृदय में सहज स्नेह उमड़ पड़ता है। उनके स्पर्श को राम ‘हृदयग्राही’ कहते हैं और उन्हें आलिंगनबद्ध कर लेते हैं।राम उन्हें सिंहासन पर, अपनी गोद में बैठाना चाहते हैं और श्लोक के माध्यम से कहते हैं कि गुणी होने पर भी छोटी अवस्था के कारण बालक लाड़ के योग्य होता है – जैसे चन्द्रमा बाल-भाव के कारण शिव के मस्तक की शोभा बनता है। इस वात्सल्य के साथ-साथ पाठ में सीता-वियोग की करुणा भी झलकती है, जब राम अपने अपराध के कारण मन-ही-मन व्यथित होते हैं। इस प्रकार पाठ स्नेह एवं करुणा दोनों भावों को सजीव कर देता है।

7. लव-कुश के कुल, माता एवं गुरु का परिचय इस नाटकांश के आधार पर लिखिए।

उत्तरसंवाद के माध्यम से ज्ञात होता है कि लव एवं कुश सहोदर (जुड़वाँ) भाई हैं तथा उनके शरीर की बनावट एवं आयु में कोई अन्तर नहीं है। वे सूर्य-चन्द्र के समान क्षत्रिय-कुल के हैं और उनके वंश के कर्ता सूर्य (सहस्रदीधिति) हैं, अर्थात् वे सूर्यवंशी हैं।उनके गुरु भगवान् वाल्मीकि हैं, जिनसे उनका सम्बन्ध उपनयन-संस्कार के उपदेश के कारण है। उनकी माता के दो नाम हैं – तपोवनवासी उन्हें ‘देवी’ कहते हैं और भगवान् वाल्मीकि उन्हें ‘वधू’ कहते हैं। पिता का नाम वे नहीं जानते, क्योंकि तपोवन में कोई पिता का नाम नहीं लेता; केवल क्रुद्ध होने पर माता उन्हें ‘निरनुक्रोश के पुत्रो’ कहकर डाँटती हैं। यही करुण संकेत राम को व्यथित कर देता है।

MCQ & अभिकथन-कारण

1. ‘शिशुलालनम्’ पाठ किस नाटक से लिया गया है?

(क) उत्तररामचरितम्

(ख) कुन्दमाला

(ग) अभिज्ञानशाकुन्तलम्

(घ) स्वप्नवासवदत्तम्

उत्तर(ख) कुन्दमाला।

2. कुन्दमाला नाटक के रचयिता कौन हैं?

(क) भवभूतिः

(ख) कालिदासः

(ग) दिङ्नागः

(घ) भासः

उत्तर(ग) दिङ्नागः।

3. यह नाटकांश कुन्दमाला के किस अङ्क से सम्पादित है?

(क) प्रथम अङ्क

(ख) तृतीय अङ्क

(ग) पञ्चम अङ्क

(घ) षष्ठ अङ्क

उत्तर(ग) पञ्चम अङ्क।

4. ‘हिमकरः’ पद का अर्थ है—

(क) सूर्यः

(ख) चन्द्रः

(ग) अग्निः

(घ) वायुः

उत्तर(ख) चन्द्रः।

5. लव एवं कुश परस्पर किस सम्बन्ध से जुड़े हैं?

(क) पितृ-पुत्रौ

(ख) गुरु-शिष्यौ

(ग) सोदर्यौ (यमलौ)

(घ) मित्रे

उत्तर(ग) सोदर्यौ (यमलौ)।

6. लव-कुश के गुरु कौन हैं?

(क) वसिष्ठः

(ख) वाल्मीकिः

(ग) विश्वामित्रः

(घ) भरद्वाजः

उत्तर(ख) वाल्मीकिः। (उपनयनोपदेशेन)

7. क्रुद्ध होने पर माता बालकों को क्या कहकर डाँटती है?

(क) निरनुक्रोशस्य पुत्रौ

(ख) महाराजस्य पुत्रौ

(ग) तपस्विनः पुत्रौ

(घ) देवस्य पुत्रौ

उत्तर(क) निरनुक्रोशस्य पुत्रौ। (निरनुक्रोशः = निर्दयः)

8. लव-कुश के वंश के कर्ता (मूलपुरुष) कौन हैं?

(क) चन्द्रः

(ख) इन्द्रः

(ग) सहस्रदीधितिः (सूर्यः)

(घ) ब्रह्मा

उत्तर(ग) सहस्रदीधितिः (सूर्यः)।

9. भगवान् वाल्मीकि बालकों की माता को किस नाम से बुलाते हैं?

(क) देवी

(ख) वधूः

(ग) सीता

(घ) जनकात्मजा

उत्तर(ख) वधूः। (तपोवनवासी ‘देवी’ कहते हैं)

10. नेपथ्य से बालकों को किसलिए बुलाया जाता है?

(क) भोजनार्थम्

(ख) रामायणगानाय

(ग) क्रीडार्थम्

(घ) युद्धाय

उत्तर(ख) रामायणगानाय। (रामायणगानस्य नियोगः)
उत्तर-कुंजी: 1-(ख), 2-(ग), 3-(ग), 4-(ख), 5-(ग), 6-(ख), 7-(क), 8-(ग), 9-(ख), 10-(ख)

अभिकथन-कारण – नीचे अभिकथन (A) और कारण (R) दिए गए हैं। सही विकल्प चुनिए—
(क) A और R दोनों सही, R, A की सही व्याख्या है। (ख) A और R दोनों सही, पर R, A की सही व्याख्या नहीं। (ग) A सही, R गलत। (घ) A गलत, R सही।

1. अभिकथन (A): राम लव-कुश को अपनी गोद में बैठा लेते हैं।

कारण (R): वे बालकों के रूप-लावण्य एवं हृदयग्राही स्पर्श से मुग्ध हो जाते हैं।

उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है।

2. अभिकथन (A): बालक राजासन पर बैठने से इनकार कर देते हैं।

कारण (R): राजासन पर बैठना उचित नहीं है, यह सोचकर वे शालीनतावश मना करते हैं।

उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है।

3. अभिकथन (A): श्लोक में चन्द्रमा को शिव के मस्तक का आभूषण कहा गया है।

कारण (R): चन्द्रमा बाल-भाव (बालचन्द्र) के कारण ही शिव के मस्तक की शोभा बनता है।

उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है।

4. अभिकथन (A): राम स्वगत रूप से अत्यन्त व्यथित हो जाते हैं।

कारण (R): बालक सूर्यवंशी क्षत्रिय-कुल के हैं।

उत्तर(ख) A और R दोनों सही हैं, किन्तु R, A की सही व्याख्या नहीं है – राम तो माता द्वारा ‘निरनुक्रोश के पुत्रो’ कहे जाने के संकेत से व्यथित होते हैं।

5. अभिकथन (A): नाटकांश के अन्त में राम सबको विदा कर देते हैं।

कारण (R): नेपथ्य से गुरु वाल्मीकि का दूत रामायण-गान के लिए बालकों को बुलाता है।

उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है।

परीक्षा-युक्तियाँ एवं सामान्य गलतियाँ

परीक्षा-युक्तियाँ (Exam Tips)

  • दोनों श्लोक (‘भवति शिशुजनो…’ एवं ‘भवन्तौ गायन्तौ…’) अन्वय एवं भावार्थ-सहित कण्ठस्थ करें – भावार्थ एवं अन्वय के प्रश्न इन्हीं से आते हैं।
  • पात्र-परिचय याद रखें – राम, विदूषक, कुश एवं लव; और ‘कः कं प्रति कथयति’ प्रश्नों का अभ्यास करें।
  • शब्दार्थ हिन्दी एवं अंग्रेज़ी दोनों में याद करें – हिमकरः, पशुपतिः, सोदर्यौ, निरनुक्रोशः आदि।
  • विभक्ति-निर्देश में ‘अलम्’ (तृतीया) एवं ‘धिक्’ (द्वितीया) के योग का नियम याद रखें।
  • सन्धि-विच्छेद का अभ्यास करें – वयः+अनुरोधात् = वयोऽनुरोधात्, खलु+एतत् = खल्वेतत् आदि।

सामान्य गलतियाँ (Common Mistakes)

  • नाटककार को गलती से कालिदास या भवभूति लिख देना – रचयिता दिङ्नाग हैं (नाटक – कुन्दमाला)।
  • हिमकरः (चन्द्रमा) एवं सहस्रदीधितिः (सूर्य) के अर्थ आपस में बदल देना।
  • माता के दोनों नाम भूल जाना – तपोवनवासी ‘देवी’, वाल्मीकि ‘वधू’ कहते हैं।
  • संयुक्ताक्षर अशुद्ध लिखना – ‘सिंहासनम्’, ‘कण्ठाश्लेषः’, ‘निरनुक्रोशः’ शुद्ध लिखें।
  • ‘एकपदेन उत्तरम्’ में एक ही शब्द लिखें तथा संस्कृत-वाक्य वाले उत्तरों में सही विभक्ति का प्रयोग करें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

शेमुषी कक्षा 10 का तृतीय पाठ ‘शिशुलालनम्’ किस नाटक से लिया गया है और इसके रचयिता कौन हैं?

यह पाठ संस्कृत के प्रसिद्ध नाटक ‘कुन्दमाला’ के पञ्चम अङ्क से सम्पादित नाटकांश है, जिसके रचयिता प्रसिद्ध नाटककार दिङ्नाग हैं। इसमें श्रीराम के शिशु-वात्सल्य (पुत्र-स्नेह) का मनोहारी वर्णन है।

‘शिशुलालनम्’ पाठ का मुख्य भाव क्या है?

पाठ का मुख्य भाव शिशु-वात्सल्य है। श्रीराम अपने अनजाने पुत्रों लव-कुश को देखकर स्नेह से अभिभूत हो जाते हैं और उन्हें अपनी गोद में बैठा लेते हैं। साथ ही माता के ‘निरनुक्रोश के पुत्रो’ कहने के संकेत से सीता-वियोग की करुणा भी झलकती है।

लव-कुश की माता एवं गुरु कौन हैं?

लव-कुश के गुरु भगवान् वाल्मीकि हैं (उपनयन-संस्कार के उपदेश के कारण)। उनकी माता के दो नाम हैं – तपोवनवासी उन्हें ‘देवी’ कहते हैं और भगवान् वाल्मीकि उन्हें ‘वधू’ कहते हैं। वे सूर्यवंशी क्षत्रिय-कुल के सहोदर (जुड़वाँ) भाई हैं।

नाटकांश, श्लोक एवं अभ्यासः के प्रश्न NCERT शेमुषी (द्वितीयो भागः) पुस्तक से ज्यों-के-त्यों लिए गए हैं; सार, भावार्थ एवं उत्तर ClearStudy द्वारा मौलिक रूप से तैयार किए गए हैं।

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