NCERT Solutions for Class 10 Sanskrit (Shemushi) पाठः 5: सुभाषितानि
This page gives the complete solution for Class 10 Sanskrit Shemushi (शेमुषी द्वितीयो भागः) Chapter 5 ‘सुभाषितानि’ – a संग्रह (anthology) of ten सुभाषित (well-spoken verses) culled from various Sanskrit ग्रन्थ – with the मूल श्लोक, श्लोक-अन्वयः, original हिन्दी भावार्थ, शब्दार्थ, and exam-ready answers to every question of the अभ्यासः, along with extra questions, MCQs, अभिकथन-कारण (Assertion-Reason) and FAQs (NCERT 2026–27).
पाठ का अवलोकन (Chapter Overview)
शेमुषी (द्वितीयो भागः) कक्षा 10 का पञ्चम पाठ ‘सुभाषितानि’ विभिन्न संस्कृत-ग्रन्थों से संकलित दस सुभाषितों का संग्रह है। संस्कृत-साहित्य में जिन पद्यों के द्वारा सार्वभौम सत्य को बड़े मार्मिक एवं अर्थगाम्भीर्ययुक्त ढंग से प्रकट किया जाता है, उन्हें सुभाषित कहते हैं। ये अर्थगाम्भीर्ययुक्त, छन्दोबद्ध एवं प्रेरणात्मक रचनाएँ हैं। इस पाठ के दस श्लोकों में परिश्रम का महत्त्व, क्रोध का दुष्प्रभाव, समान-स्वभाव वालों की मित्रता, सभी वस्तुओं की उपयोगिता, बुद्धि की विशेषता तथा महापुरुषों की समानता आदि अनेक विषयों पर सुन्दर ढंग से प्रकाश डाला गया है। ये सुभाषित जीवन में सदाचरण, परिश्रम एवं सद्बुद्धि की प्रेरणा देते हैं।
पाठ-परिचय / प्रसंग
‘सुभाषित’ शब्द दो पदों से बना है – सु (अच्छा/उत्तम) + भाषित (कहा हुआ), अर्थात् ‘उत्तम रीति से कहा गया वचन’। प्रस्तुत पाठ में दिये गये दस सुभाषित संस्कृत के अनेक नीति-ग्रन्थों से संकलित हैं। इनमें मनुष्य के जीवन को सन्मार्ग पर ले जाने वाले अनेक उपदेश निहित हैं – आलस्य मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है तथा उद्यम सबसे बड़ा बन्धु है; गुणी ही गुण को पहचानता है; अकारण द्वेष करने वाले मन को कोई सन्तुष्ट नहीं कर सकता; बुद्धिमान् व्यक्ति संकेत-मात्र से ज्ञान प्राप्त कर लेता है; क्रोध मनुष्य का प्रथम शत्रु है जो शरीर का ही नाश करता है; समान-स्वभाव एवं समान-व्यसन वालों में ही मित्रता होती है; तथा फल-छाया से युक्त बड़े वृक्ष का आश्रय लेना चाहिए। इस प्रकार ये सुभाषित नीति एवं व्यवहार-कुशलता के अमूल्य रत्न हैं।
मूल पाठ (श्लोकाः)
(प्रस्तुतः पाठः विविधग्रन्थात् सङ्कलितानां दशसुभाषितानां सङ्ग्रहः वर्तते। संस्कृतसाहित्ये सार्वभौमं सत्यं प्रकाशयितुम् अर्थगाम्भीर्ययुता पद्यमयी प्रेरणात्मिका रचना सुभाषितम् इति कथ्यते। अयं पाठांशः परिश्रमस्य महत्त्वम्, क्रोधस्य दुष्प्रभावः, सामाजिकमहत्त्वम्, सर्वेषां वस्तूनाम् उपादेयता, बुद्धेः वैशिष्ट्यम् इत्यादीन् विषयान् प्रकाशयति।)
नास्त्युद्यमसमो बन्धुः कृत्वा यं नावसीदति ॥१॥
गुणी गुणं वेत्ति न वेत्ति निर्गुणो,
बली बलं वेत्ति न वेत्ति निर्बलः ।
पिको वसन्तस्य गुणं न वायसः,
करी च सिंहस्य बलं न मूषकः ॥२॥
निमित्तमुद्दिश्य हि यः प्रकुप्यति,
ध्रुवं स तस्यापगमे प्रसीदति ।
अकारणद्वेषि मनस्तु यस्य वै,
कथं जनस्तं परितोषयिष्यति ॥३॥
उदीरितोऽर्थः पशुनापि गृह्यते,
हयाश्च नागाश्च वहन्ति बोधिताः ।
अनुक्तमप्यूहति पण्डितो जनः,
परेङ्गितज्ञानफला हि बुद्धयः ॥४॥
क्रोधो हि शत्रुः प्रथमो नराणां,
देहस्थितो देहविनाशनाय ।
यथास्थितः काष्ठगतो हि वह्निः,
स एव वह्निर्दहते शरीरम् ॥५॥
मृगा मृगैः सङ्गमनुव्रजन्ति,
गावश्च गोभिः तुरगास्तुरङ्गैः ।
मूर्खाश्च मूर्खैः सुधियः सुधीभिः,
समान-शील-व्यसनेषु सख्यम् ॥६॥
सेवितव्यो महावृक्षः फलच्छायासमन्वितः ।
यदि दैवात् फलं नास्ति छाया केन निवार्यते ॥७॥
अमन्त्रमक्षरं नास्ति, नास्ति मूलमनौषधम् ।
अयोग्यः पुरुषः नास्ति योजकस्तत्र दुर्लभः ॥८॥
सम्पत्तौ च विपत्तौ च महतामेकरूपता ।
उदये सविता रक्तो रक्तश्चास्तमये तथा ॥९॥
विचित्रे खलु संसारे नास्ति किञ्चिन्निरर्थकम् ।
अश्वश्चेद् धावने वीरः भारस्य वहने खरः ॥१०॥
— विविध-संस्कृत-ग्रन्थेभ्यः सङ्कलितानि सुभाषितानि
श्लोक-अन्वयः एवं भावार्थः
श्लोकः 1
श्लोकः 2
श्लोकः 3
श्लोकः 4
श्लोकः 5
श्लोकः 6
श्लोकः 7
श्लोकः 8
श्लोकः 9
श्लोकः 10
शब्दार्थाः (Word Meanings)
| शब्दः (Sanskrit) | अर्थः (हिन्दी) | Meaning (English) |
|---|---|---|
| अवसीदति | दुःख का अनुभव करता है, दुःखी होता है | Feels hurt / suffers |
| वेत्ति | जानता है, पहचानता है | Knows |
| वायसः | कौआ (काकः) | Crow |
| करी | हाथी (गजः) | Elephant |
| निमित्तम् | कारण | Cause / purpose |
| प्रकुप्यति | अत्यधिक क्रोध करता है | Gets very angry |
| ध्रुवम् | निश्चित रूप से | Certainly |
| अपगमे | समाप्त होने पर | At the end / on removal |
| प्रसीदति | प्रसन्न होता है | Becomes pleased |
| परितोषयिष्यति | सन्तुष्ट करेगा | Will satisfy |
| उदीरितः | कहा हुआ, उक्त | Said / uttered |
| गृह्यते | ग्रहण/प्राप्त किया जाता है | Is grasped / accepted |
| हयाः | घोड़े (अश्वाः) | Horses |
| नागाः | हाथी (गजाः, हस्तिनः) | Elephants |
| ऊहति | अनुमान/निर्धारण करता है | Infers / assumes |
| परेङ्गितज्ञानफलाः | दूसरों के संकेत/इशारे को समझ लेना ही जिनका फल है | Whose fruit is grasping others’ signs |
| पण्डितः | विद्वान्, बुद्धिमान् | Scholar / wise person |
| वह्निः | अग्नि, आग | Fire |
| दहते | जलाता है | Burns |
| अनुव्रजन्ति | पीछे-पीछे जाते हैं, अनुसरण करते हैं | Follow |
| तुरगाः | घोड़े (अश्वाः) | Horses |
| सुधियः | विद्वान्, बुद्धिमान् लोग | Learned people |
| व्यसनेषु | आदतों में | In habits / addictions |
| सख्यम् | मित्रता, मैत्री | Friendship |
| सेवितव्यः | आश्रय लेने योग्य | Should be resorted to |
| निवार्यते | रोका जाता है | Is prevented / warded off |
| अमन्त्रम् | मन्त्रहीन, बिना मन्त्र का | Without a sacred formula |
| मूलम् | जड़ | Root |
| अनौषधम् | औषधि-रहित | Non-medicinal |
| योजकः | (सही ढंग से) जोड़ने वाला, प्रयोक्ता | One who applies / connector |
| सविता | सूर्य | The sun |
| खरः | गधा (गर्दभः) | Donkey |
अभ्यासः के उत्तर
1. एकपदेन उत्तरं लिखत —
(क) मनुष्याणां महान् रिपुः कः?
(ख) गुणी किं वेत्ति?
(ग) केषां सम्पत्तौ च विपत्तौ च महताम् एकरूपता?
(घ) पशुना अपि कीदृशः गृह्यते?
(ङ) उदयसमये अस्तसमये च कः रक्तः भवति?
2. अधोलिखितानां प्रश्नानाम् उत्तराणि संस्कृतभाषया लिखत —
(क) केन समः बन्धुः नास्ति?
(ख) वसन्तस्य गुणं कः जानाति?
(ग) बुद्धयः कीदृश्यः भवन्ति?
(घ) नराणां प्रथमः शत्रुः कः?
(ङ) सुधियः सख्यं केन सह भवति?
(च) अस्माभिः कीदृशः वृक्षः सेवितव्यः?
3. अधोलिखिते अन्वयद्वये रिक्तस्थानपूर्तिं कुरुत —
4. अधोलिखितानां वाक्यानां कृते समानार्थकान् श्लोकांशान् पाठात् चित्वा लिखत —
(क) विद्वान् स एव भवति यः अनुक्तम् अपि तथ्यं जानाति।
(ख) मनुष्यः समस्वभावैः जनैः सह मित्रतां करोति।
(ग) परिश्रमं कुर्वाणः नरः कदापि दुःखं न प्राप्नोति।
(घ) महान्तः जनाः सर्वदैव समप्रकृतयः भवन्ति।
5. यथानिर्देशं परिवर्तनं विधाय वाक्यानि रचयत —
(क) गुणी गुणं जानाति। (बहुवचने)
(ख) पशुः उदीरितम् अर्थं गृह्णाति। (कर्मवाच्ये)
(ग) मृगाः मृगैः सह अनुव्रजन्ति। (एकवचने)
(घ) कः छायां निवारयति? (कर्मवाच्ये)
(ङ) तेन एव वह्निना शरीरं दह्यते। (कर्तृवाच्ये)
6. (अ) सन्धिं / सन्धिविच्छेदं कुरुत —
6. (आ) समस्तपदं / विग्रहं लिखत —
| पदम् | विग्रहः / समस्तपदम् (उत्तर) |
|---|---|
| (क) उद्यमसमः | उद्यमेन समः |
| (ख) शरीरे स्थितः | शरीरस्थः |
| (ग) निर्बलः | निर्गतं बलं यस्मात् सः |
| (घ) देहस्य विनाशनाय | देहविनाशनाय |
| (ङ) महावृक्षः | महान् च असौ वृक्षः |
| (च) समानं शीलं व्यसनं येषां तेषु | समान-शील-व्यसनेषु |
| (छ) अयोग्यः | न योग्यः |
7. (अ) अधोलिखितानां पदानां विलोमपदानि पाठात् चित्वा लिखत —
7. (आ) संस्कृतेन वाक्यप्रयोगं कुरुत —
परियोजनाकार्यम् —
(क) उद्यमस्य महत्त्वं वर्णयत। पञ्चश्लोकान् लिखत। अथवा – काचित् कथा या भवद्भिः पठिता स्यात्, यस्याम् उद्यमस्य महत्त्वं वर्णितम्, तां स्वभाषया लिखत।
(ख) निमित्तमुद्दिश्य यः प्रकुप्यति ध्रुवं स तस्यापगमे प्रसीदति। यदि भवता कदापि ईदृशः अनुभवः कृतः तर्हि स्वीकृतभाषया लिखत।
अतिरिक्त प्रश्न (Extra Questions)
लघु उत्तरीय प्रश्न (30–40 शब्द)
1. ‘सुभाषित’ किसे कहते हैं?
2. क्रोध को मनुष्य का प्रथम शत्रु क्यों कहा गया है?
3. श्लोक के अनुसार मित्रता किनमें होती है?
4. ‘अमन्त्रमक्षरं नास्ति’ श्लोक का मुख्य भाव क्या है?
5. महापुरुषों की तुलना सूर्य से क्यों की गई है?
दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (100–120 शब्द)
6. ‘सुभाषितानि’ पाठ से क्या-क्या शिक्षाएँ मिलती हैं? अपने शब्दों में लिखिए।
7. ‘सेवितव्यो महावृक्षः…’ श्लोक का भावार्थ लिखकर बताइए कि इससे क्या जीवन-शिक्षा मिलती है।
8. श्लोक 2 ‘गुणी गुणं वेत्ति…’ में निहित भाव को उदाहरणों सहित स्पष्ट कीजिए।
MCQ & अभिकथन-कारण
1. मनुष्याणां शरीरस्थः महान् रिपुः कः?
(क) क्रोधः
(ख) आलस्यम्
(ग) लोभः
(घ) मोहः
2. वसन्तस्य गुणं कः जानाति?
(क) वायसः
(ख) मूषकः
(ग) पिकः
(घ) करी
3. ‘करी’ पदस्य अर्थः कः?
(क) सिंहः
(ख) गजः (हाथी)
(ग) अश्वः
(घ) मूषकः
4. नराणां प्रथमः शत्रुः कः कथितः?
(क) आलस्यम्
(ख) क्रोधः
(ग) निर्धनता
(घ) अज्ञानम्
5. सख्यं केषु भवति?
(क) विषमशीलेषु
(ख) धनिकेषु
(ग) समान-शील-व्यसनेषु
(घ) बलिषु एव
6. उदये अस्तमये च कः रक्तः भवति?
(क) चन्द्रः
(ख) सविता (सूर्यः)
(ग) मेघः
(घ) गगनम्
7. ‘खरः’ पदस्य अर्थः कः?
(क) अश्वः
(ख) गर्दभः (गधा)
(ग) उष्ट्रः
(घ) वृषभः
8. पण्डितः जनः किम् अपि ऊहति?
(क) उक्तम्
(ख) अनुक्तम्
(ग) लिखितम्
(घ) श्रुतम्
9. कीदृशः वृक्षः सेवितव्यः?
(क) शुष्कः
(ख) निष्फलः
(ग) फलच्छायासमन्वितः
(घ) कण्टकयुक्तः
10. श्लोकानुसारं किं दुर्लभम्?
(क) अक्षरम्
(ख) मूलम्
(ग) पुरुषः
(घ) योजकः
अभिकथन-कारण – नीचे अभिकथन (A) और कारण (R) दिए गए हैं। सही विकल्प चुनिए—
(क) A और R दोनों सही, R, A की सही व्याख्या है। (ख) A और R दोनों सही, पर R, A की सही व्याख्या नहीं। (ग) A सही, R गलत। (घ) A गलत, R सही।
1. अभिकथन (A): आलस्य मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है।
कारण (R): उद्यम (परिश्रम) के समान कोई बन्धु नहीं है, जिसे करके मनुष्य कभी दुःखी नहीं होता।
2. अभिकथन (A): क्रोध मनुष्य का प्रथम शत्रु है।
कारण (R): क्रोध बाहरी शत्रु है जो दूसरों को ही हानि पहुँचाता है, स्वयं को नहीं।
3. अभिकथन (A): गुणी ही गुण को पहचानता है।
कारण (R): वसन्त के गुण को कोयल पहचानती है, कौआ नहीं।
4. अभिकथन (A): संसार में कोई वस्तु निरर्थक नहीं है।
कारण (R): घोड़ा दौड़ने में श्रेष्ठ है तो गधा भार ढोने में श्रेष्ठ है।
5. अभिकथन (A): महापुरुष सम्पत्ति एवं विपत्ति दोनों में एक-समान रहते हैं।
कारण (R): सूर्य उदय एवं अस्त दोनों समय लाल (रक्त) रहता है।
परीक्षा-युक्तियाँ एवं सामान्य गलतियाँ
परीक्षा-युक्तियाँ (Exam Tips)
- दसों श्लोक उनके अन्वय एवं भावार्थ सहित कण्ठस्थ करें – श्लोक-पूर्ति, अन्वय एवं भावार्थ के प्रश्न प्रायः यहीं से आते हैं।
- प्रत्येक श्लोक का केन्द्रीय भाव एक पंक्ति में याद रखें (1-आलस्य, 2-गुणग्राहिता, 3-अकारण द्वेष, 4-बुद्धि, 5-क्रोध, 6-समान संगति, 7-महान् का आश्रय, 8-उपयोगिता, 9-समता, 10-सबकी सार्थकता)।
- कठिन शब्दों के पर्याय याद रखें – वायसः=काकः, करी/नागः=गजः, हयः/तुरगः=अश्वः, सविता=सूर्यः, खरः=गर्दभः, सुधीः=विद्वान्।
- ‘एकपदेन उत्तरम्’ में एक ही पद लिखें तथा ‘संस्कृतभाषया’ पूछे जाने पर पूरा वाक्य संस्कृत में लिखें।
- सन्धि, समास, वाच्य-परिवर्तन एवं विलोम-पद के प्रश्नों का नियमित अभ्यास करें।
सामान्य गलतियाँ (Common Mistakes)
- श्लोकों का क्रम एवं संख्या (॥१॥ … ॥१०॥) बदल देना।
- पर्यायवाची शब्दों में भ्रम – ‘करी’ को सिंह तथा ‘खर’ को घोड़ा समझ लेना।
- क्रोध को बाह्य शत्रु मान लेना, जबकि श्लोक में वह ‘देहस्थितः’ (शरीर में स्थित) आत्मघाती शत्रु है।
- संयुक्ताक्षर एवं विसर्ग-सन्धि में भूल – ‘रक्तश्चास्तमये’, ‘नास्त्युद्यमसमो’ शुद्ध लिखें।
- वाच्य-परिवर्तन में कर्ता एवं कर्म की विभक्ति गलत लगाना।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
शेमुषी कक्षा 10 का पाँचवाँ पाठ ‘सुभाषितानि’ किस विषय पर आधारित है?
यह पाठ विभिन्न संस्कृत-ग्रन्थों से संकलित दस सुभाषितों (नीति-पद्यों) का संग्रह है। इनमें परिश्रम का महत्त्व, क्रोध का दुष्प्रभाव, समान-स्वभाव वालों की मित्रता, सभी वस्तुओं की उपयोगिता तथा बुद्धि की विशेषता जैसे जीवनोपयोगी विषयों पर प्रकाश डाला गया है।
‘सुभाषित’ का क्या अर्थ है?
‘सु’ (उत्तम) + ‘भाषित’ (कहा हुआ) = उत्तम रीति से कहा गया वचन। ये अर्थगाम्भीर्ययुक्त, छन्दोबद्ध एवं प्रेरणात्मक पद्य होते हैं जो सार्वभौम सत्य को मार्मिक ढंग से प्रकट करते हैं।
क्रोध को शरीर का नाश करने वाला प्रथम शत्रु क्यों कहा गया है?
क्योंकि क्रोध शरीर में ही स्थित रहता है और लकड़ी में छिपी आग की भाँति उसी लकड़ी (शरीर) को जला डालता है। अतः क्रोध आत्मघाती है, यह मनुष्य के अपने ही विवेक एवं शरीर का विनाश कर देता है।
श्लोक, अन्वय, शब्दार्थ एवं अभ्यासः के प्रश्न NCERT शेमुषी (द्वितीयो भागः) पुस्तक से ज्यों-के-त्यों लिए गए हैं; भावार्थ एवं उत्तर ClearStudy द्वारा मौलिक रूप से तैयार किए गए हैं।
