NCERT Solutions for Class 10 Sanskrit (Shemushi) पाठः 1: शुचिपर्यावरणम्

This page gives the complete solution for Class 10 Sanskrit Shemushi (शेमुषी, द्वितीयो भागः) Chapter 1 ‘शुचिपर्यावरणम्’ – a melodious गीत (पद्य) by the modern Sanskrit poet हरिदत्त शर्मा, taken from his रचना-संग्रह ‘ललल्लतिका’ – expressing concern over the pollution caused by the machine-driven life of big cities – with its मूल पाठ (seven verses), original सार, श्लोक-भावार्थ, शब्दार्थ, and exam-ready answers to every question of the अभ्यासः along with extra questions, MCQs, अभिकथन-कारण and FAQs (NCERT 2026–27).

कक्षा (Class): 10 विषय (Subject): Sanskrit (संस्कृत) पुस्तक (Book): Shemushi 2 (शेमुषी, द्वितीयो भागः) पाठः (Chapter): 1 पाठ-नाम: शुचिपर्यावरणम् सत्र (Session): 2026–27

पाठ का अवलोकन (Chapter Overview)

शेमुषी (द्वितीयो भागः) कक्षा 10 का प्रथम पाठ ‘शुचिपर्यावरणम्’ एक सुमधुर गीत है, जो आधुनिक संस्कृत-कवि हरिदत्त शर्मा के रचना-संग्रह ‘ललल्लतिका’ से संकलित है। इस गीत में कवि महानगरों की यन्त्र-अधिकता (मशीनों की भरमार) से बढ़ते हुए प्रदूषण पर चिन्ता व्यक्त करता है। कवि कहता है कि यह लौह-चक्र (मशीनों का पहिया) शरीर और मन दोनों का शोषक है तथा इसी कारण वायुमण्डल मलिन हो रहा है। इस कोलाहलपूर्ण नगर-जीवन से दूर वह नदी-निर्झर, वृक्ष-समूह, लतावितान एवं पक्षियों के कलरव से गुञ्जित वन-प्रदेश की ओर जाने की अभिलाषा प्रकट करता है। पाठ का केन्द्रीय भाव यह है कि स्वच्छ पर्यावरण ही जीवन का आधार है तथा शुद्धिकरण (प्रदूषण-निवारण) हमारा परम कर्तव्य है। ‘शुचि पर्यावरणम्’ इस गीत का ध्रुवपद (टेक) है।

कवि-परिचय / पाठ-परिचय

इस गीत के रचयिता प्रोफेसर हरिदत्त शर्मा हैं, जो इलाहाबाद (प्रयागराज) के केन्द्रीय विश्वविद्यालय में संस्कृत के आचार्य रहे हैं। इनके अनेक संस्कृत-काव्य प्रकाशित हो चुके हैं, जैसे – गीतकन्दलिका, त्रिपथगा, उत्कलिका, बालगीताली, आक्रन्दनम् एवं ललल्लतिका आदि। इनकी रचनाओं में समाज की विसंगतियों के प्रति आक्रोश तथा स्वच्छ एवं स्वस्थ वातावरण के प्रति दिशा-निर्देश के भाव प्राप्त होते हैं। प्रस्तुत पाठ ‘शुचिपर्यावरणम्’ इन्हीं के काव्य-संग्रह ललल्लतिका से लिया गया है, जिसमें कवि ने प्रवाहपूर्ण एवं सरस संस्कृत में पर्यावरण-प्रदूषण की समस्या तथा प्रकृति की शरण में लौटने की प्रेरणा को सुन्दर रूप में प्रस्तुत किया है।

मूल पाठ (गीतम्)

(ध्रुवपदम्) — प्रत्येक पद्य के अन्त में ‘शुचि…’ (अर्थात् शुचि पर्यावरणम्) ध्रुवपद के रूप में दोहराया जाता है।

दुर्वहमत्र जीवितं जातं प्रकृतिरेव शरणम् ।
शुचि-पर्यावरणम् ॥

महानगरमध्ये चलदनिशं कालायसचक्रम् ।
मनः शोषयत् तनूः पेषयद् भ्रमति सदा वक्रम् ॥
दुर्दान्तैर्दशनैरमुना स्यान्नैव जनग्रसनम् । शुचि… ॥ १ ॥

कज्जलमलिनं धूमं मुञ्चति शतशकटीयानम् ।
वाष्पयानमाला संधावति वितरन्ती ध्वानम् ॥
यानानां पङ्क्तयो ह्यनन्ताः कठिनं संसरणम् । शुचि… ॥ २ ॥

वायुमण्डलं भृशं दूषितं न हि निर्मलं जलम् ।
कुत्सितवस्तुमिश्रितं भक्ष्यं समलं धरातलम् ॥
करणीयं बहिरन्तर्जगति तु बहु शुद्धीकरणम् । शुचि… ॥ ३ ॥

कञ्चित् कालं नय मामस्मान्नगराद् बहुदूरम् ।
प्रपश्यामि ग्रामान्ते निर्झर-नदी-पयःपूरम् ॥
एकान्ते कान्तारे क्षणमपि मे स्यात् सञ्चरणम् । शुचि… ॥ ४ ॥

हरिततरूणां ललितलतानां माला रमणीया ।
कुसुमावलिः समीरचालिता स्यान्मे वरणीया ॥
नवमालिका रसालं मिलिता रुचिरं सङ्गमनम् । शुचि… ॥ ५ ॥

अयि चल बन्धो! खगकुलकलरवगुञ्जितवनदेशम् ।
पुर-कलरवसम्भ्रमितजनेभ्यो धृतसुखसन्देशम् ॥
चाकचिक्यजालं नो कुर्यात् जीवितरसहरणम् । शुचि… ॥ ६ ॥

प्रस्तरतले लतातरुगुल्मा नो भवन्तु पिष्टाः ।
पाषाणी सभ्यता निसर्गे स्यान्न समाविष्टा ॥
मानवाय जीवनं कामये नो जीवन्मरणम् । शुचि… ॥ ७ ॥
— हरिदत्त शर्मा (‘ललल्लतिका’ तः सङ्कलितम्)

सार (Summary)

‘शुचिपर्यावरणम्’ आधुनिक संस्कृत-कवि हरिदत्त शर्मा द्वारा रचित एक गीत है, जो उनके काव्य-संग्रह ‘ललल्लतिका’ से संकलित है। इस गीत में कवि महानगरों की यन्त्र-बहुलता से उत्पन्न प्रदूषण पर गहरी चिन्ता प्रकट करता है। कवि कहता है कि नगरों में जीवन अत्यन्त दुर्वह (कष्टप्रद) हो गया है, अतः अब प्रकृति ही एकमात्र शरण है और स्वच्छ पर्यावरण ही जीवन का आधार है – यही गीत का ध्रुवपद है।

प्रथम पद्य में कवि मशीनों के लौह-चक्र को तन एवं मन का शोषक एवं पीड़क बताता है, जो भयंकर दाँतों से मानव का ग्रास न ले – ऐसी कामना करता है। द्वितीय पद्य में सैकड़ों मोटर-गाड़ियों एवं रेलगाड़ियों की पंक्तियों द्वारा फैलाए जा रहे काले धुएँ, कोलाहल एवं कठिन आवागमन का चित्रण है। तृतीय पद्य में वायुमण्डल, जल, भोज्य-पदार्थ एवं धरातल सबके दूषित होने की बात कहकर कवि कहता है कि बाहर-भीतर समस्त जगत् का शुद्धिकरण आवश्यक है।

चतुर्थ पद्य में कवि किसी से प्रार्थना करता है कि उसे कुछ समय के लिए नगर से दूर ले चले, जहाँ वह गाँव की सीमा पर निर्झर एवं नदी का जल देख सके तथा एकान्त वन में क्षण भर विचरण कर सके। पञ्चम पद्य में हरे वृक्षों एवं कोमल लताओं की रमणीय माला, वायु से हिलती पुष्पावली तथा आम-वृक्ष से मिली नवमालिका के मनोहर संगम की कामना है। षष्ठ पद्य में कवि अपने मित्र को पक्षियों के कलरव से गुञ्जित वन-प्रदेश की ओर चलने को कहता है तथा कामना करता है कि कृत्रिम चकाचौंध का जाल जीवन-रस का हरण न करे। सप्तम पद्य में कवि चाहता है कि पथरीली (कृत्रिम) सभ्यता के नीचे लता-वृक्ष-गुल्म पिस न जाएँ तथा प्रकृति में पाषाणी सभ्यता समाविष्ट न हो; वह मानव के लिए सच्चा जीवन चाहता है, जीते-जी मरण-तुल्य जीवन नहीं। इस प्रकार यह गीत प्रदूषण-रहित, स्वच्छ एवं प्रकृति-संगत जीवन का सन्देश देता है।

श्लोक-भावार्थ (अन्वय एवं हिन्दी अर्थ)

ध्रुवपदम् — ‘दुर्वहमत्र…शुचि-पर्यावरणम्’

अन्वयः: अत्र जीवितं दुर्वहं जातम्, (अतः) प्रकृतिः एव शरणम्। शुचि-पर्यावरणम् (एव जीवनस्य आधारः)।

भावार्थ: यहाँ (नगर में) जीवन कष्टप्रद हो गया है, इसलिए अब प्रकृति ही एकमात्र शरण है। स्वच्छ पर्यावरण ही (जीवन का आधार है)। यह पंक्ति प्रत्येक पद्य के अन्त में ध्रुवपद (टेक) के रूप में दोहराई जाती है।

प्रथमं पद्यम् — ‘महानगरमध्ये…जनग्रसनम्’

अन्वयः: महानगरमध्ये अनिशं चलत् कालायसचक्रं मनः शोषयत् तनूः पेषयद् वक्रं सदा भ्रमति। अमुना दुर्दान्तैः दशनैः जनग्रसनं न एव स्यात्।

भावार्थ: महानगर के बीच दिन-रात चलता हुआ यह लौह-चक्र (मशीनों का पहिया) मन को सुखाता हुआ तथा शरीरों को पीसता हुआ सदा टेढ़ी चाल से घूमता रहता है। (कवि कामना करता है कि) इसके भयंकर दाँतों से मनुष्य का ग्रास (विनाश) न हो।

द्वितीयं पद्यम् — ‘कज्जलमलिनं…संसरणम्’

अन्वयः: शतशकटीयानं कज्जलमलिनं धूमं मुञ्चति। वाष्पयानमाला ध्वानं वितरन्ती संधावति। यानानां पङ्क्तयः हि अनन्ताः, संसरणं कठिनम्।

भावार्थ: सैकड़ों मोटर-गाड़ियाँ काजल-जैसा मलिन (काला) धुआँ छोड़ती हैं। रेलगाड़ियों की पंक्ति कोलाहल फैलाती हुई दौड़ती है। वाहनों की अनन्त पंक्तियाँ हैं, जिससे आवागमन (चलना-फिरना) कठिन हो गया है।

तृतीयं पद्यम् — ‘वायुमण्डलं…शुद्धीकरणम्’

अन्वयः: वायुमण्डलं भृशं दूषितम्, जलं न हि निर्मलम्, भक्ष्यं कुत्सितवस्तुमिश्रितम्, धरातलं समलम् (अस्ति)। बहिः अन्तः जगति तु बहु शुद्धीकरणं करणीयम्।

भावार्थ: वायुमण्डल अत्यधिक दूषित है, जल निर्मल नहीं है, भोज्य-पदार्थ गन्दी वस्तुओं से मिला हुआ है तथा धरातल भी मलिन (गन्दगी से युक्त) है। अतः बाहर एवं भीतर – समस्त संसार में बहुत शुद्धिकरण किया जाना चाहिए।

चतुर्थं पद्यम् — ‘कञ्चित् कालं…सञ्चरणम्’

अन्वयः: (हे बन्धो!) माम् अस्मात् नगरात् कञ्चित् कालं बहुदूरं नय। ग्रामान्ते निर्झर-नदी-पयःपूरं प्रपश्यामि। एकान्ते कान्तारे क्षणम् अपि मे सञ्चरणं स्यात्।

भावार्थ: (हे मित्र!) मुझे इस नगर से कुछ समय के लिए बहुत दूर ले चलो। मैं गाँव की सीमा पर निर्झर एवं नदी के जल से भरे तालाब (जलाशय) को देखूँ। एकान्त वन में क्षण भर भी मेरा विचरण हो (यही मेरी इच्छा है)।

पञ्चमं पद्यम् — ‘हरिततरूणां…सङ्गमनम्’

अन्वयः: हरिततरूणां ललितलतानां माला रमणीया। समीरचालिता कुसुमावलिः मे वरणीया स्यात्। रसालं मिलिता नवमालिका रुचिरं सङ्गमनम् (अस्ति)।

भावार्थ: हरे वृक्षों एवं कोमल लताओं की माला रमणीय (मनोहर) है। हवा से हिलती हुई फूलों की पंक्ति मेरे लिए वरण करने योग्य (प्रिय) हो। आम-वृक्ष से मिली हुई नवमालिका (बेला) का संगम सुन्दर (रुचिकर) है।

षष्ठं पद्यम् — ‘अयि चल बन्धो!…जीवितरसहरणम्’

अन्वयः: अयि बन्धो! खगकुलकलरवगुञ्जितवनदेशं चल, (यः) पुर-कलरवसम्भ्रमितजनेभ्यः धृतसुखसन्देशम् (अस्ति)। चाकचिक्यजालं जीवितरसहरणं नो कुर्यात्।

भावार्थ: हे मित्र! पक्षियों के समूह के कलरव से गुञ्जित वन-प्रदेश की ओर चलो, जो नगर के कोलाहल से घबराए हुए लोगों के लिए सुख का सन्देश धारण किए हुए है। (मैं चाहता हूँ कि) कृत्रिम चकाचौंध का जाल जीवन-रस का हरण न करे।

सप्तमं पद्यम् — ‘प्रस्तरतले…जीवन्मरणम्’

अन्वयः: प्रस्तरतले लतातरुगुल्माः पिष्टाः नो भवन्तु। निसर्गे पाषाणी सभ्यता समाविष्टा न स्यात्। मानवाय जीवनं कामये, जीवन्मरणं नो (कामये)।

भावार्थ: पत्थरों के नीचे लता, वृक्ष एवं झाड़ियाँ पिस न जाएँ। प्रकृति में पथरीली (कृत्रिम) सभ्यता समाविष्ट (प्रविष्ट) न हो। मैं मनुष्य के लिए (सच्चा) जीवन चाहता हूँ, जीते-जी मरण-तुल्य जीवन नहीं।

शब्दार्थ (Word-meanings)

शब्दः (Sanskrit)हिन्दी अर्थEnglish meaning
दुर्वहम्कठिन, दूभरDifficult / hard to bear
जीवितम्जीवनLife
अनिशम्दिन-रात, निरन्तरDay and night
कालायसचक्रम्लोहे का चक्र (मशीन)Iron wheel / machine
शोषयत्सुखाता हुआDrying up
तनूःशरीर (बहुवचन)Bodies
पेषयत्पीसता हुआGrinding
वक्रम्टेढ़ाCrooked / askew
दुर्दान्तैःभयंकर (दाँतों से)Scary / fierce
दशनैःदाँतों सेBy teeth
जनग्रसनम्मानव-विनाश, निगलनाDevouring of people
कज्जलमलिनम्काजल-सा मलिन (काला)Black as kohl
धूमम्धुआँSmoke
मुञ्चतिछोड़ता हैReleases
शतशकटीयानम्सैकड़ों मोटर-गाड़ियाँHundreds of vehicles
वाष्पयानमालारेलगाड़ियों की पंक्तिRow of trains
ध्वानम्कोलाहल, शोरSound / noise
संसरणम्चलना-फिरना, आवागमनMovement
भृशम्अत्यधिकEnormously
भक्ष्यम्भोज्य पदार्थEatable / food
समलम्मलयुक्त, गन्दगी से युक्तDirty
ग्रामान्तेगाँव की सीमा परAt the village border
पयःपूरम्जल से भरा तालाबPond / water-filled lake
कान्तारेजंगल मेंIn the forest
कुसुमावलिःफूलों की पंक्तिRow of flowers
समीरचालिताहवा से हिलाई गईMoved by the wind
रुचिरम्सुन्दर, मनोहरAttractive
चाकचिक्यजालम्चकाचौंध भरा (कृत्रिम) जालWeb of dazzle
प्रस्तरतलेपत्थरों के नीचेOn the surface of rocks
पाषाणीपथरीलीStony
निसर्गेप्रकृति मेंIn nature

अभ्यासः के उत्तर

1. एकपदेन उत्तरं लिखत —

(क) अत्र जीवितं कीदृशं जातम् ?

उत्तरदुर्वहम्

(ख) अनिशं महानगरमध्ये किं प्रचलति ?

उत्तरकालायसचक्रम्

(ग) कुत्सितवस्तुमिश्रितं किमस्ति ?

उत्तरभक्ष्यम्

(घ) अहं कस्मै जीवनं कामये ?

उत्तरमानवाय

(ङ) केषां माला रमणीया ?

उत्तरहरिततरूणाम् (ललितलतानां च) ।

2. अधोलिखितानां प्रश्नानाम् उत्तराणि संस्कृतभाषया लिखत —

(क) कविः किमर्थं प्रकृतेः शरणम् इच्छति ?

उत्तरमहानगरे प्रदूषणेन जीवितं दुर्वहं जातम्, अतः कविः शुचिपर्यावरणप्राप्त्यर्थं (स्वच्छजीवनार्थम्) प्रकृतेः शरणम् इच्छति ।

(ख) कस्मात् कारणात् महानगरेषु संसरणं कठिनं वर्तते ?

उत्तरमहानगरेषु यानानां पङ्क्तयः अनन्ताः सन्ति, अतः तत्र संसरणं (चलनम्) कठिनं वर्तते ।

(ग) अस्माकं पर्यावरणे किं किं दूषितम् अस्ति ?

उत्तरअस्माकं पर्यावरणे वायुमण्डलं दूषितम्, जलं न निर्मलम्, भक्ष्यं कुत्सितवस्तुमिश्रितम्, धरातलं च समलम् अस्ति ।

(घ) कविः कुत्र सञ्चरणं कर्तुम् इच्छति ?

उत्तरकविः एकान्ते कान्तारे (निर्जने वने) क्षणमपि सञ्चरणं कर्तुम् इच्छति ।

(ङ) स्वस्थजीवनाय कीदृशे वातावरणे भ्रमणीयम् ?

उत्तरस्वस्थजीवनाय प्राकृतिक-वातावरणे (खगकुलकलरवगुञ्जिते हरिततरुलतायुक्ते शुचिवने) भ्रमणीयम् ।

(च) अन्तिमे पद्यांशे कवेः का कामना अस्ति ?

उत्तरअन्तिमे पद्यांशे कवेः कामना अस्ति यत् लतातरुगुल्माः प्रस्तरतले पिष्टाः न भवेयुः, निसर्गे पाषाणी सभ्यता च न समाविशेत्; सः मानवाय सत्यं जीवनं कामयते, न तु जीवन्मरणम् ।

3. सन्धिं / सन्धिविच्छेदं कुरुत —

उत्तर (क) प्रकृतिः + एव = प्रकृतिरेव (ख) स्यात् + + एव = स्यान्नैव (ग) हि + अनन्ताः = ह्यनन्ताः (घ) बहिः + अन्तः + जगति = बहिरन्तर्जगति (ङ) अस्मात् + नगरात् = अस्मान्नगरात् (च) सम् + चरणम् = सञ्चरणम् (छ) धूमम् + मुञ्चति = धूमं मुञ्चति

4. अधोलिखितानाम् अव्ययानां सहायतया रिक्तस्थानानि पूरयत —

मञ्जूषा: भृशम्, यत्र, तत्र, अत्र, अपि, एव, सदा, बहिः

उत्तर (क) इदानीं वायुमण्डलं भृशम् प्रदूषितमस्ति । (ख) अत्र जीवनं दुर्वहम् अस्ति । (ग) प्राकृतिक-वातावरणे क्षणं सञ्चरणम् अपि लाभदायकं भवति । (घ) पर्यावरणस्य संरक्षणम् एव प्रकृतेः आराधना । (ङ) सदा समयस्य सदुपयोगः करणीयः । (च) भूकम्पित-समये बहिः गमनम् एव उचितं भवति । (छ) यत्र हरितिमा तत्र शुचि पर्यावरणम् ।

5. (अ) अधोलिखितानां पदानां पर्यायपदं लिखत —

उत्तर (क) सलिलम् → जलम् / नीरम् / वारि (ख) आम्रम् → रसालम् / सहकारः / आम्रफलम् (ग) वनम् → कान्तारम् / अरण्यम् / विपिनम् (घ) शरीरम् → तनुः / देहः / कायः / वपुः (ङ) कुटिलम् → वक्रम् / जिह्मम् (च) पाषाणः → प्रस्तरः / उपलः / अश्मा

5. (आ) अधोलिखितपदानां विलोमपदानि पाठात् चित्वा लिखत —

उत्तर (क) सुकरम् → दुर्वहम् (ख) दूषितम् → निर्मलम् / शुचि (ग) गृह्णन्ती → वितरन्ती (घ) निर्मलम् → मलिनम् / समलम् / दूषितम् (ङ) दानवाय → मानवाय (च) सान्ताः → अनन्ताः

6. उदाहरणम् अनुसृत्य पाठात् चित्वा च समस्तपदानि समासनाम च लिखत —

यथा – मलेन सहितम् → समलम् (अव्ययीभावः)

विग्रहवाक्यानिसमस्तपदानिसमासनाम
(क) हरिताः च ये तरवः (तेषाम्)हरिततरूणाम्कर्मधारयः
(ख) ललिताः च याः लताः (तासाम्)ललितलतानाम्कर्मधारयः
(ग) नवा मालिकानवमालिकाकर्मधारयः
(घ) धृतः सुखसन्देशः येन (तम्)धृतसुखसन्देशम्बहुव्रीहिः
(ङ) कज्जलम् इव मलिनम्कज्जलमलिनम्कर्मधारयः
(च) दुर्दान्तैः दशनैःदुर्दान्तदशनैःकर्मधारयः

7. रेखाङ्कित-पदम् आधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत —

(क) शकटीयानम् कज्जलमलिनं धूमं मुञ्चति ।

उत्तरकिम् कज्जलमलिनं धूमं मुञ्चति ?

(ख) उद्याने पक्षिणां कलरवं चेतः प्रसादयति ।

उत्तरउद्याने केषां कलरवं चेतः प्रसादयति ?

(ग) पाषाणीसभ्यतायां लतातरुगुल्माः प्रस्तरतले पिष्टाः सन्ति ।

उत्तरपाषाणीसभ्यतायां लतातरुगुल्माः कुत्र पिष्टाः सन्ति ?

(घ) महानगरेषु वाहनानाम् अनन्ताः पङ्क्तयः धावन्ति ।

उत्तरमहानगरेषु वाहनानां कीदृश्यः पङ्क्तयः धावन्ति ?

(ङ) प्रकृत्याः सन्निधौ वास्तविकं सुखं विद्यते ।

उत्तरकस्याः सन्निधौ वास्तविकं सुखं विद्यते ?

अतिरिक्त प्रश्न (Extra Questions)

लघु उत्तरीय प्रश्न (30–40 शब्द)

1. इस गीत के रचयिता कौन हैं तथा यह किस संग्रह से लिया गया है?

उत्तरइस गीत के रचयिता आधुनिक संस्कृत-कवि प्रोफेसर हरिदत्त शर्मा हैं, जो इलाहाबाद केन्द्रीय विश्वविद्यालय में संस्कृत के आचार्य रहे हैं। यह पाठ उनके काव्य-संग्रह ‘ललल्लतिका’ से संकलित है।

2. कवि ‘कालायसचक्रम्’ किसे कहता है और उसका क्या प्रभाव बताता है?

उत्तरकवि महानगरों की मशीनों के लौह-चक्र को ‘कालायसचक्रम्’ कहता है। यह दिन-रात टेढ़ी चाल से घूमता रहता है तथा मनुष्य के मन को सुखाता एवं शरीर को पीसता हुआ उसका शोषण करता है।

3. नगरों में वायु एवं ध्वनि प्रदूषण किससे फैलता है?

उत्तरनगरों में सैकड़ों मोटर-गाड़ियाँ काजल-जैसा काला धुआँ छोड़कर वायु-प्रदूषण फैलाती हैं तथा रेलगाड़ियों एवं वाहनों की अनन्त पंक्तियाँ कोलाहल (शोर) फैलाकर ध्वनि-प्रदूषण उत्पन्न करती हैं।

4. कवि नगर से दूर जाकर क्या-क्या देखना एवं करना चाहता है?

उत्तरकवि नगर से दूर जाकर गाँव की सीमा पर निर्झर एवं नदी के जल से भरे तालाब को देखना चाहता है तथा एकान्त वन में क्षण भर विचरण करना चाहता है, जहाँ हरे वृक्ष, कोमल लताएँ एवं पक्षियों का कलरव हो।

5. इस गीत का ध्रुवपद क्या है और वह क्या सन्देश देता है?

उत्तरइस गीत का ध्रुवपद ‘शुचि पर्यावरणम्’ है। यह सन्देश देता है कि नगर का जीवन दुर्वह हो गया है, अतः अब प्रकृति ही शरण है तथा स्वच्छ (शुचि) पर्यावरण ही सुखी एवं स्वस्थ जीवन का आधार है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (100–120 शब्द)

6. ‘शुचिपर्यावरणम्’ गीत का केन्द्रीय भाव अपने शब्दों में लिखिए।

उत्तरइस गीत का केन्द्रीय भाव पर्यावरण-प्रदूषण के प्रति चिन्ता तथा स्वच्छ पर्यावरण की आवश्यकता है। कवि हरिदत्त शर्मा कहते हैं कि महानगरों में मशीनों के लौह-चक्र, सैकड़ों वाहनों के काले धुएँ एवं कोलाहल के कारण वायु, जल, भोज्य-पदार्थ एवं धरातल सब दूषित हो गए हैं तथा जीवन दुर्वह हो गया है।इस कृत्रिम एवं पथरीली सभ्यता से ऊबकर कवि प्रकृति की शरण में लौटना चाहता है – निर्झर, नदी, हरे वृक्ष, कोमल लताएँ एवं पक्षियों के कलरव से गुञ्जित वन उसे प्रिय हैं। वह चाहता है कि लता-वृक्ष पिस न जाएँ, प्रकृति में पाषाणी सभ्यता प्रवेश न करे तथा मनुष्य को सच्चा जीवन मिले, जीते-जी मरण-तुल्य जीवन नहीं। इस प्रकार गीत ‘शुचि पर्यावरणम्’ का सन्देश देकर प्रकृति-संरक्षण की प्रेरणा जगाता है।

7. प्रदूषण के निवारण के लिए कवि क्या-क्या उपाय सुझाता है? पाठ के आधार पर लिखिए।

उत्तरकवि पाठ में संकेत रूप में प्रदूषण-निवारण के अनेक उपाय सुझाता है। प्रथमतः वह कहता है कि बाहर एवं भीतर – समस्त जगत् का शुद्धिकरण (बहु शुद्धीकरणम्) किया जाना चाहिए, अर्थात् वायु, जल एवं भूमि सबको स्वच्छ रखना आवश्यक है।दूसरे, वह वृक्षों, लताओं एवं वनों के संरक्षण पर बल देता है – उसकी कामना है कि लता-वृक्ष-गुल्म पत्थरों के नीचे पिस न जाएँ तथा प्रकृति में कृत्रिम पाषाणी सभ्यता समाविष्ट न हो। तीसरे, वह यन्त्रों एवं वाहनों की अधिकता पर अंकुश लगाने का संकेत देता है, क्योंकि इन्हीं से धुआँ एवं कोलाहल फैलता है। अन्ततः वह प्रकृति की शरण में लौटकर हरियाली एवं स्वच्छ वातावरण को अपनाने की प्रेरणा देता है, क्योंकि ‘शुचि पर्यावरणम्’ ही जीवन का आधार है।

8. इस गीत में नगर-जीवन एवं ग्राम/वन-जीवन का जो अन्तर दिखाया गया है, उसे स्पष्ट कीजिए।

उत्तरगीत में कवि ने नगर-जीवन एवं प्रकृति (ग्राम/वन) के जीवन में स्पष्ट अन्तर प्रस्तुत किया है। नगर-जीवन यन्त्रों के लौह-चक्र, सैकड़ों वाहनों के काले धुएँ, रेलगाड़ियों के कोलाहल एवं अनन्त भीड़ से भरा है; यहाँ वायु, जल, भोजन एवं भूमि सब दूषित हैं और जीवन दुर्वह तथा कष्टप्रद हो गया है।इसके विपरीत ग्राम एवं वन-जीवन शान्त, स्वच्छ एवं रमणीय है – वहाँ गाँव की सीमा पर निर्झर एवं नदी का निर्मल जल, हरे वृक्ष, कोमल लताएँ, हवा से हिलती पुष्पावली तथा पक्षियों का मधुर कलरव है, जो थके-घबराए मन को सुख का सन्देश देता है। इस प्रकार कवि कृत्रिम चकाचौंध की अपेक्षा प्राकृतिक, शुचि एवं सरल जीवन को श्रेष्ठ मानता है।

MCQ & अभिकथन-कारण

1. ‘शुचिपर्यावरणम्’ पाठ के रचयिता कौन हैं?

(क) कालिदासः

(ख) हरिदत्त शर्मा

(ग) भारविः

(घ) माघः

उत्तर(ख) हरिदत्त शर्मा।

2. यह पाठ कवि के किस रचना-संग्रह से लिया गया है?

(क) त्रिपथगा

(ख) उत्कलिका

(ग) ललल्लतिका

(घ) बालगीताली

उत्तर(ग) ललल्लतिका।

3. ‘कालायसचक्रम्’ का अर्थ है—

(क) सोने का चक्र

(ख) लोहे का चक्र (मशीन)

(ग) समय का चक्र

(घ) जल का चक्र

उत्तर(ख) लोहे का चक्र (मशीन)।

4. महानगरों में संसरण (आवागमन) कठिन क्यों है?

(क) मार्गाणाम् अभावात्

(ख) यानानाम् अनन्ताः पङ्क्तयः सन्ति

(ग) जलस्य अभावात्

(घ) वृक्षाणां बाहुल्यात्

उत्तर(ख) यानानाम् अनन्ताः पङ्क्तयः सन्ति।

5. शतशकटीयानम् कैसा धुआँ छोड़ता है?

(क) श्वेतम्

(ख) निर्मलम्

(ग) कज्जलमलिनम्

(घ) सुगन्धितम्

उत्तर(ग) कज्जलमलिनम्। (काजल-सा काला)

6. कवि किसके लिए (सच्चा) जीवन चाहता है?

(क) दानवाय

(ख) मानवाय

(ग) यन्त्राय

(घ) नगराय

उत्तर(ख) मानवाय।

7. कवि किस स्थान पर क्षण भर विचरण करना चाहता है?

(क) महानगरे

(ख) विपणौ

(ग) एकान्ते कान्तारे

(घ) यन्त्रशालायाम्

उत्तर(ग) एकान्ते कान्तारे। (एकान्त वन में)

8. ‘रसालम्’ शब्द का अर्थ है—

(क) जल

(ख) आम का वृक्ष

(ग) वन

(घ) फूल

उत्तर(ख) आम का वृक्ष।

9. कवि किसकी शरण में जाना चाहता है?

(क) यन्त्रस्य

(ख) नगरस्य

(ग) प्रकृतेः

(घ) धनस्य

उत्तर(ग) प्रकृतेः। (प्रकृतिरेव शरणम्)

10. इस गीत का ध्रुवपद (टेक) क्या है?

(क) दुर्वहं जीवनम्

(ख) शुचि पर्यावरणम्

(ग) कालायसचक्रम्

(घ) पाषाणी सभ्यता

उत्तर(ख) शुचि पर्यावरणम्।
उत्तर-कुंजी: 1-(ख), 2-(ग), 3-(ख), 4-(ख), 5-(ग), 6-(ख), 7-(ग), 8-(ख), 9-(ग), 10-(ख)

अभिकथन-कारण – नीचे अभिकथन (A) और कारण (R) दिए गए हैं। सही विकल्प चुनिए—
(क) A और R दोनों सही, R, A की सही व्याख्या है। (ख) A और R दोनों सही, पर R, A की सही व्याख्या नहीं। (ग) A सही, R गलत। (घ) A गलत, R सही।

1. अभिकथन (A): कवि नगर से दूर प्रकृति की शरण में जाना चाहता है।

कारण (R): महानगर में प्रदूषण के कारण जीवन दुर्वह (कष्टप्रद) हो गया है।

उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है।

2. अभिकथन (A): महानगरों में आवागमन (संसरण) कठिन है।

कारण (R): नगरों में वाहनों की अनन्त पंक्तियाँ दौड़ती रहती हैं।

उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है।

3. अभिकथन (A): इस गीत के रचयिता हरिदत्त शर्मा हैं।

कारण (R): वे केवल हिन्दी-कवि थे तथा संस्कृत में कोई रचना नहीं की।

उत्तर(ग) A सही है, किन्तु R गलत है – हरिदत्त शर्मा आधुनिक संस्कृत-कवि थे और उन्होंने अनेक संस्कृत-काव्य रचे।

4. अभिकथन (A): कवि चाहता है कि वायु, जल एवं भूमि का शुद्धिकरण किया जाए।

कारण (R): पाठ के अनुसार वायुमण्डल, जल, भोज्य-पदार्थ एवं धरातल सब दूषित हो चुके हैं।

उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है।

5. अभिकथन (A): कवि मनुष्य के लिए जीवन्मरण (जीते-जी मरण-तुल्य जीवन) की कामना करता है।

कारण (R): कवि चाहता है कि पाषाणी (कृत्रिम) सभ्यता प्रकृति में समाविष्ट हो जाए।

उत्तर(घ) A गलत है – कवि मनुष्य के लिए सच्चा जीवन चाहता है, जीवन्मरण नहीं; R भी कवि की भावना के विपरीत है (वह पाषाणी सभ्यता का समावेश नहीं चाहता)।

परीक्षा-युक्तियाँ एवं सामान्य गलतियाँ

परीक्षा-युक्तियाँ (Exam Tips)

  • सातों पद्य एवं ध्रुवपद ‘शुचि पर्यावरणम्’ कण्ठस्थ करें – रिक्तस्थान-पूर्ति एवं भावार्थ-लेखन प्रायः इन्हीं से आते हैं।
  • कठिन शब्दों के अर्थ हिन्दी एवं अंग्रेज़ी दोनों में याद करें – कालायसचक्रम्, संसरणम्, कान्तारे, समलम्, रसालम् आदि।
  • सन्धि-विच्छेद में सावधानी रखें – प्रकृतिरेव, स्यान्नैव, ह्यनन्ताः, सञ्चरणम् बार-बार पूछे जाते हैं।
  • समास-विग्रह में कर्मधारय (कज्जलमलिनम्) एवं बहुव्रीहि (धृतसुखसन्देशम्) का अन्तर स्पष्ट रखें।
  • ‘एकपदेन उत्तरम्’ में एक ही शब्द लिखें तथा संस्कृत-भाषा वाले प्रश्नों में पूर्ण वाक्य लिखें।

सामान्य गलतियाँ (Common Mistakes)

  • संयुक्ताक्षर लिखने में भूल – ‘सञ्चरणम्’, ‘पङ्क्तयः’, ‘कुत्सित’ शुद्ध लिखें।
  • ‘मानवाय’ एवं ‘दानवाय’ को आपस में बदल देना (कवि मानव के लिए जीवन चाहता है)।
  • कवि का नाम भूल जाना – रचयिता हरिदत्त शर्मा हैं, संग्रह ‘ललल्लतिका’ है।
  • सन्धि-विच्छेद में गलत पद जोड़ना (जैसे स्यात् + न + एव = स्यान्नैव)।
  • ध्रुवपद को भूल जाना – प्रत्येक पद्य के अन्त में ‘शुचि पर्यावरणम्’ आता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

शेमुषी कक्षा 10 का पहला पाठ ‘शुचिपर्यावरणम्’ किस विधा का है और इसके रचयिता कौन हैं?

यह एक गीत (पद्य) है, जिसकी रचना आधुनिक संस्कृत-कवि प्रोफेसर हरिदत्त शर्मा ने की है। यह उनके काव्य-संग्रह ‘ललल्लतिका’ से संकलित है। इसमें कवि ने महानगरों के प्रदूषण पर चिन्ता व्यक्त करते हुए स्वच्छ पर्यावरण का सन्देश दिया है।

इस गीत का मुख्य भाव एवं ध्रुवपद क्या है?

इस गीत में सात पद्य हैं और इसका ध्रुवपद ‘शुचि पर्यावरणम्’ है। मुख्य भाव यह है कि नगरों की यन्त्र-बहुलता एवं प्रदूषण से जीवन दुर्वह हो गया है, अतः प्रकृति ही शरण है और स्वच्छ पर्यावरण ही सुखी जीवन का आधार है।

कवि महानगर के जीवन से दूर क्यों जाना चाहता है?

क्योंकि महानगर में मशीनों के लौह-चक्र, वाहनों के काले धुएँ एवं कोलाहल से वायु, जल, भोजन एवं भूमि सब दूषित हो गए हैं। इसलिए कवि नदी-निर्झर, हरे वृक्ष, लताओं एवं पक्षियों के कलरव से युक्त शान्त, स्वच्छ वन-प्रदेश की ओर जाना चाहता है।

गीत, श्लोक, प्रश्न एवं अभ्यास-शीर्षक NCERT शेमुषी (द्वितीयो भागः) पुस्तक से ज्यों-के-त्यों लिए गए हैं; सार, भावार्थ एवं उत्तर ClearStudy द्वारा मौलिक रूप से तैयार किए गए हैं।

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