NCERT Solutions for Class 10 Sanskrit (Shemushi) पाठः 1: शुचिपर्यावरणम्
This page gives the complete solution for Class 10 Sanskrit Shemushi (शेमुषी, द्वितीयो भागः) Chapter 1 ‘शुचिपर्यावरणम्’ – a melodious गीत (पद्य) by the modern Sanskrit poet हरिदत्त शर्मा, taken from his रचना-संग्रह ‘ललल्लतिका’ – expressing concern over the pollution caused by the machine-driven life of big cities – with its मूल पाठ (seven verses), original सार, श्लोक-भावार्थ, शब्दार्थ, and exam-ready answers to every question of the अभ्यासः along with extra questions, MCQs, अभिकथन-कारण and FAQs (NCERT 2026–27).
पाठ का अवलोकन (Chapter Overview)
शेमुषी (द्वितीयो भागः) कक्षा 10 का प्रथम पाठ ‘शुचिपर्यावरणम्’ एक सुमधुर गीत है, जो आधुनिक संस्कृत-कवि हरिदत्त शर्मा के रचना-संग्रह ‘ललल्लतिका’ से संकलित है। इस गीत में कवि महानगरों की यन्त्र-अधिकता (मशीनों की भरमार) से बढ़ते हुए प्रदूषण पर चिन्ता व्यक्त करता है। कवि कहता है कि यह लौह-चक्र (मशीनों का पहिया) शरीर और मन दोनों का शोषक है तथा इसी कारण वायुमण्डल मलिन हो रहा है। इस कोलाहलपूर्ण नगर-जीवन से दूर वह नदी-निर्झर, वृक्ष-समूह, लतावितान एवं पक्षियों के कलरव से गुञ्जित वन-प्रदेश की ओर जाने की अभिलाषा प्रकट करता है। पाठ का केन्द्रीय भाव यह है कि स्वच्छ पर्यावरण ही जीवन का आधार है तथा शुद्धिकरण (प्रदूषण-निवारण) हमारा परम कर्तव्य है। ‘शुचि पर्यावरणम्’ इस गीत का ध्रुवपद (टेक) है।
कवि-परिचय / पाठ-परिचय
इस गीत के रचयिता प्रोफेसर हरिदत्त शर्मा हैं, जो इलाहाबाद (प्रयागराज) के केन्द्रीय विश्वविद्यालय में संस्कृत के आचार्य रहे हैं। इनके अनेक संस्कृत-काव्य प्रकाशित हो चुके हैं, जैसे – गीतकन्दलिका, त्रिपथगा, उत्कलिका, बालगीताली, आक्रन्दनम् एवं ललल्लतिका आदि। इनकी रचनाओं में समाज की विसंगतियों के प्रति आक्रोश तथा स्वच्छ एवं स्वस्थ वातावरण के प्रति दिशा-निर्देश के भाव प्राप्त होते हैं। प्रस्तुत पाठ ‘शुचिपर्यावरणम्’ इन्हीं के काव्य-संग्रह ललल्लतिका से लिया गया है, जिसमें कवि ने प्रवाहपूर्ण एवं सरस संस्कृत में पर्यावरण-प्रदूषण की समस्या तथा प्रकृति की शरण में लौटने की प्रेरणा को सुन्दर रूप में प्रस्तुत किया है।
मूल पाठ (गीतम्)
(ध्रुवपदम्) — प्रत्येक पद्य के अन्त में ‘शुचि…’ (अर्थात् शुचि पर्यावरणम्) ध्रुवपद के रूप में दोहराया जाता है।
शुचि-पर्यावरणम् ॥
महानगरमध्ये चलदनिशं कालायसचक्रम् ।
मनः शोषयत् तनूः पेषयद् भ्रमति सदा वक्रम् ॥
दुर्दान्तैर्दशनैरमुना स्यान्नैव जनग्रसनम् । शुचि… ॥ १ ॥
कज्जलमलिनं धूमं मुञ्चति शतशकटीयानम् ।
वाष्पयानमाला संधावति वितरन्ती ध्वानम् ॥
यानानां पङ्क्तयो ह्यनन्ताः कठिनं संसरणम् । शुचि… ॥ २ ॥
वायुमण्डलं भृशं दूषितं न हि निर्मलं जलम् ।
कुत्सितवस्तुमिश्रितं भक्ष्यं समलं धरातलम् ॥
करणीयं बहिरन्तर्जगति तु बहु शुद्धीकरणम् । शुचि… ॥ ३ ॥
कञ्चित् कालं नय मामस्मान्नगराद् बहुदूरम् ।
प्रपश्यामि ग्रामान्ते निर्झर-नदी-पयःपूरम् ॥
एकान्ते कान्तारे क्षणमपि मे स्यात् सञ्चरणम् । शुचि… ॥ ४ ॥
हरिततरूणां ललितलतानां माला रमणीया ।
कुसुमावलिः समीरचालिता स्यान्मे वरणीया ॥
नवमालिका रसालं मिलिता रुचिरं सङ्गमनम् । शुचि… ॥ ५ ॥
अयि चल बन्धो! खगकुलकलरवगुञ्जितवनदेशम् ।
पुर-कलरवसम्भ्रमितजनेभ्यो धृतसुखसन्देशम् ॥
चाकचिक्यजालं नो कुर्यात् जीवितरसहरणम् । शुचि… ॥ ६ ॥
प्रस्तरतले लतातरुगुल्मा नो भवन्तु पिष्टाः ।
पाषाणी सभ्यता निसर्गे स्यान्न समाविष्टा ॥
मानवाय जीवनं कामये नो जीवन्मरणम् । शुचि… ॥ ७ ॥
— हरिदत्त शर्मा (‘ललल्लतिका’ तः सङ्कलितम्)
सार (Summary)
‘शुचिपर्यावरणम्’ आधुनिक संस्कृत-कवि हरिदत्त शर्मा द्वारा रचित एक गीत है, जो उनके काव्य-संग्रह ‘ललल्लतिका’ से संकलित है। इस गीत में कवि महानगरों की यन्त्र-बहुलता से उत्पन्न प्रदूषण पर गहरी चिन्ता प्रकट करता है। कवि कहता है कि नगरों में जीवन अत्यन्त दुर्वह (कष्टप्रद) हो गया है, अतः अब प्रकृति ही एकमात्र शरण है और स्वच्छ पर्यावरण ही जीवन का आधार है – यही गीत का ध्रुवपद है।
प्रथम पद्य में कवि मशीनों के लौह-चक्र को तन एवं मन का शोषक एवं पीड़क बताता है, जो भयंकर दाँतों से मानव का ग्रास न ले – ऐसी कामना करता है। द्वितीय पद्य में सैकड़ों मोटर-गाड़ियों एवं रेलगाड़ियों की पंक्तियों द्वारा फैलाए जा रहे काले धुएँ, कोलाहल एवं कठिन आवागमन का चित्रण है। तृतीय पद्य में वायुमण्डल, जल, भोज्य-पदार्थ एवं धरातल सबके दूषित होने की बात कहकर कवि कहता है कि बाहर-भीतर समस्त जगत् का शुद्धिकरण आवश्यक है।
चतुर्थ पद्य में कवि किसी से प्रार्थना करता है कि उसे कुछ समय के लिए नगर से दूर ले चले, जहाँ वह गाँव की सीमा पर निर्झर एवं नदी का जल देख सके तथा एकान्त वन में क्षण भर विचरण कर सके। पञ्चम पद्य में हरे वृक्षों एवं कोमल लताओं की रमणीय माला, वायु से हिलती पुष्पावली तथा आम-वृक्ष से मिली नवमालिका के मनोहर संगम की कामना है। षष्ठ पद्य में कवि अपने मित्र को पक्षियों के कलरव से गुञ्जित वन-प्रदेश की ओर चलने को कहता है तथा कामना करता है कि कृत्रिम चकाचौंध का जाल जीवन-रस का हरण न करे। सप्तम पद्य में कवि चाहता है कि पथरीली (कृत्रिम) सभ्यता के नीचे लता-वृक्ष-गुल्म पिस न जाएँ तथा प्रकृति में पाषाणी सभ्यता समाविष्ट न हो; वह मानव के लिए सच्चा जीवन चाहता है, जीते-जी मरण-तुल्य जीवन नहीं। इस प्रकार यह गीत प्रदूषण-रहित, स्वच्छ एवं प्रकृति-संगत जीवन का सन्देश देता है।
श्लोक-भावार्थ (अन्वय एवं हिन्दी अर्थ)
ध्रुवपदम् — ‘दुर्वहमत्र…शुचि-पर्यावरणम्’
अन्वयः: अत्र जीवितं दुर्वहं जातम्, (अतः) प्रकृतिः एव शरणम्। शुचि-पर्यावरणम् (एव जीवनस्य आधारः)।
भावार्थ: यहाँ (नगर में) जीवन कष्टप्रद हो गया है, इसलिए अब प्रकृति ही एकमात्र शरण है। स्वच्छ पर्यावरण ही (जीवन का आधार है)। यह पंक्ति प्रत्येक पद्य के अन्त में ध्रुवपद (टेक) के रूप में दोहराई जाती है।
प्रथमं पद्यम् — ‘महानगरमध्ये…जनग्रसनम्’
अन्वयः: महानगरमध्ये अनिशं चलत् कालायसचक्रं मनः शोषयत् तनूः पेषयद् वक्रं सदा भ्रमति। अमुना दुर्दान्तैः दशनैः जनग्रसनं न एव स्यात्।
भावार्थ: महानगर के बीच दिन-रात चलता हुआ यह लौह-चक्र (मशीनों का पहिया) मन को सुखाता हुआ तथा शरीरों को पीसता हुआ सदा टेढ़ी चाल से घूमता रहता है। (कवि कामना करता है कि) इसके भयंकर दाँतों से मनुष्य का ग्रास (विनाश) न हो।
द्वितीयं पद्यम् — ‘कज्जलमलिनं…संसरणम्’
अन्वयः: शतशकटीयानं कज्जलमलिनं धूमं मुञ्चति। वाष्पयानमाला ध्वानं वितरन्ती संधावति। यानानां पङ्क्तयः हि अनन्ताः, संसरणं कठिनम्।
भावार्थ: सैकड़ों मोटर-गाड़ियाँ काजल-जैसा मलिन (काला) धुआँ छोड़ती हैं। रेलगाड़ियों की पंक्ति कोलाहल फैलाती हुई दौड़ती है। वाहनों की अनन्त पंक्तियाँ हैं, जिससे आवागमन (चलना-फिरना) कठिन हो गया है।
तृतीयं पद्यम् — ‘वायुमण्डलं…शुद्धीकरणम्’
अन्वयः: वायुमण्डलं भृशं दूषितम्, जलं न हि निर्मलम्, भक्ष्यं कुत्सितवस्तुमिश्रितम्, धरातलं समलम् (अस्ति)। बहिः अन्तः जगति तु बहु शुद्धीकरणं करणीयम्।
भावार्थ: वायुमण्डल अत्यधिक दूषित है, जल निर्मल नहीं है, भोज्य-पदार्थ गन्दी वस्तुओं से मिला हुआ है तथा धरातल भी मलिन (गन्दगी से युक्त) है। अतः बाहर एवं भीतर – समस्त संसार में बहुत शुद्धिकरण किया जाना चाहिए।
चतुर्थं पद्यम् — ‘कञ्चित् कालं…सञ्चरणम्’
अन्वयः: (हे बन्धो!) माम् अस्मात् नगरात् कञ्चित् कालं बहुदूरं नय। ग्रामान्ते निर्झर-नदी-पयःपूरं प्रपश्यामि। एकान्ते कान्तारे क्षणम् अपि मे सञ्चरणं स्यात्।
भावार्थ: (हे मित्र!) मुझे इस नगर से कुछ समय के लिए बहुत दूर ले चलो। मैं गाँव की सीमा पर निर्झर एवं नदी के जल से भरे तालाब (जलाशय) को देखूँ। एकान्त वन में क्षण भर भी मेरा विचरण हो (यही मेरी इच्छा है)।
पञ्चमं पद्यम् — ‘हरिततरूणां…सङ्गमनम्’
अन्वयः: हरिततरूणां ललितलतानां माला रमणीया। समीरचालिता कुसुमावलिः मे वरणीया स्यात्। रसालं मिलिता नवमालिका रुचिरं सङ्गमनम् (अस्ति)।
भावार्थ: हरे वृक्षों एवं कोमल लताओं की माला रमणीय (मनोहर) है। हवा से हिलती हुई फूलों की पंक्ति मेरे लिए वरण करने योग्य (प्रिय) हो। आम-वृक्ष से मिली हुई नवमालिका (बेला) का संगम सुन्दर (रुचिकर) है।
षष्ठं पद्यम् — ‘अयि चल बन्धो!…जीवितरसहरणम्’
अन्वयः: अयि बन्धो! खगकुलकलरवगुञ्जितवनदेशं चल, (यः) पुर-कलरवसम्भ्रमितजनेभ्यः धृतसुखसन्देशम् (अस्ति)। चाकचिक्यजालं जीवितरसहरणं नो कुर्यात्।
भावार्थ: हे मित्र! पक्षियों के समूह के कलरव से गुञ्जित वन-प्रदेश की ओर चलो, जो नगर के कोलाहल से घबराए हुए लोगों के लिए सुख का सन्देश धारण किए हुए है। (मैं चाहता हूँ कि) कृत्रिम चकाचौंध का जाल जीवन-रस का हरण न करे।
सप्तमं पद्यम् — ‘प्रस्तरतले…जीवन्मरणम्’
अन्वयः: प्रस्तरतले लतातरुगुल्माः पिष्टाः नो भवन्तु। निसर्गे पाषाणी सभ्यता समाविष्टा न स्यात्। मानवाय जीवनं कामये, जीवन्मरणं नो (कामये)।
भावार्थ: पत्थरों के नीचे लता, वृक्ष एवं झाड़ियाँ पिस न जाएँ। प्रकृति में पथरीली (कृत्रिम) सभ्यता समाविष्ट (प्रविष्ट) न हो। मैं मनुष्य के लिए (सच्चा) जीवन चाहता हूँ, जीते-जी मरण-तुल्य जीवन नहीं।
शब्दार्थ (Word-meanings)
| शब्दः (Sanskrit) | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| दुर्वहम् | कठिन, दूभर | Difficult / hard to bear |
| जीवितम् | जीवन | Life |
| अनिशम् | दिन-रात, निरन्तर | Day and night |
| कालायसचक्रम् | लोहे का चक्र (मशीन) | Iron wheel / machine |
| शोषयत् | सुखाता हुआ | Drying up |
| तनूः | शरीर (बहुवचन) | Bodies |
| पेषयत् | पीसता हुआ | Grinding |
| वक्रम् | टेढ़ा | Crooked / askew |
| दुर्दान्तैः | भयंकर (दाँतों से) | Scary / fierce |
| दशनैः | दाँतों से | By teeth |
| जनग्रसनम् | मानव-विनाश, निगलना | Devouring of people |
| कज्जलमलिनम् | काजल-सा मलिन (काला) | Black as kohl |
| धूमम् | धुआँ | Smoke |
| मुञ्चति | छोड़ता है | Releases |
| शतशकटीयानम् | सैकड़ों मोटर-गाड़ियाँ | Hundreds of vehicles |
| वाष्पयानमाला | रेलगाड़ियों की पंक्ति | Row of trains |
| ध्वानम् | कोलाहल, शोर | Sound / noise |
| संसरणम् | चलना-फिरना, आवागमन | Movement |
| भृशम् | अत्यधिक | Enormously |
| भक्ष्यम् | भोज्य पदार्थ | Eatable / food |
| समलम् | मलयुक्त, गन्दगी से युक्त | Dirty |
| ग्रामान्ते | गाँव की सीमा पर | At the village border |
| पयःपूरम् | जल से भरा तालाब | Pond / water-filled lake |
| कान्तारे | जंगल में | In the forest |
| कुसुमावलिः | फूलों की पंक्ति | Row of flowers |
| समीरचालिता | हवा से हिलाई गई | Moved by the wind |
| रुचिरम् | सुन्दर, मनोहर | Attractive |
| चाकचिक्यजालम् | चकाचौंध भरा (कृत्रिम) जाल | Web of dazzle |
| प्रस्तरतले | पत्थरों के नीचे | On the surface of rocks |
| पाषाणी | पथरीली | Stony |
| निसर्गे | प्रकृति में | In nature |
अभ्यासः के उत्तर
1. एकपदेन उत्तरं लिखत —
(क) अत्र जीवितं कीदृशं जातम् ?
(ख) अनिशं महानगरमध्ये किं प्रचलति ?
(ग) कुत्सितवस्तुमिश्रितं किमस्ति ?
(घ) अहं कस्मै जीवनं कामये ?
(ङ) केषां माला रमणीया ?
2. अधोलिखितानां प्रश्नानाम् उत्तराणि संस्कृतभाषया लिखत —
(क) कविः किमर्थं प्रकृतेः शरणम् इच्छति ?
(ख) कस्मात् कारणात् महानगरेषु संसरणं कठिनं वर्तते ?
(ग) अस्माकं पर्यावरणे किं किं दूषितम् अस्ति ?
(घ) कविः कुत्र सञ्चरणं कर्तुम् इच्छति ?
(ङ) स्वस्थजीवनाय कीदृशे वातावरणे भ्रमणीयम् ?
(च) अन्तिमे पद्यांशे कवेः का कामना अस्ति ?
3. सन्धिं / सन्धिविच्छेदं कुरुत —
4. अधोलिखितानाम् अव्ययानां सहायतया रिक्तस्थानानि पूरयत —
मञ्जूषा: भृशम्, यत्र, तत्र, अत्र, अपि, एव, सदा, बहिः
5. (अ) अधोलिखितानां पदानां पर्यायपदं लिखत —
5. (आ) अधोलिखितपदानां विलोमपदानि पाठात् चित्वा लिखत —
6. उदाहरणम् अनुसृत्य पाठात् चित्वा च समस्तपदानि समासनाम च लिखत —
यथा – मलेन सहितम् → समलम् (अव्ययीभावः)
| विग्रहवाक्यानि | समस्तपदानि | समासनाम |
|---|---|---|
| (क) हरिताः च ये तरवः (तेषाम्) | हरिततरूणाम् | कर्मधारयः |
| (ख) ललिताः च याः लताः (तासाम्) | ललितलतानाम् | कर्मधारयः |
| (ग) नवा मालिका | नवमालिका | कर्मधारयः |
| (घ) धृतः सुखसन्देशः येन (तम्) | धृतसुखसन्देशम् | बहुव्रीहिः |
| (ङ) कज्जलम् इव मलिनम् | कज्जलमलिनम् | कर्मधारयः |
| (च) दुर्दान्तैः दशनैः | दुर्दान्तदशनैः | कर्मधारयः |
7. रेखाङ्कित-पदम् आधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत —
(क) शकटीयानम् कज्जलमलिनं धूमं मुञ्चति ।
(ख) उद्याने पक्षिणां कलरवं चेतः प्रसादयति ।
(ग) पाषाणीसभ्यतायां लतातरुगुल्माः प्रस्तरतले पिष्टाः सन्ति ।
(घ) महानगरेषु वाहनानाम् अनन्ताः पङ्क्तयः धावन्ति ।
(ङ) प्रकृत्याः सन्निधौ वास्तविकं सुखं विद्यते ।
अतिरिक्त प्रश्न (Extra Questions)
लघु उत्तरीय प्रश्न (30–40 शब्द)
1. इस गीत के रचयिता कौन हैं तथा यह किस संग्रह से लिया गया है?
2. कवि ‘कालायसचक्रम्’ किसे कहता है और उसका क्या प्रभाव बताता है?
3. नगरों में वायु एवं ध्वनि प्रदूषण किससे फैलता है?
4. कवि नगर से दूर जाकर क्या-क्या देखना एवं करना चाहता है?
5. इस गीत का ध्रुवपद क्या है और वह क्या सन्देश देता है?
दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (100–120 शब्द)
6. ‘शुचिपर्यावरणम्’ गीत का केन्द्रीय भाव अपने शब्दों में लिखिए।
7. प्रदूषण के निवारण के लिए कवि क्या-क्या उपाय सुझाता है? पाठ के आधार पर लिखिए।
8. इस गीत में नगर-जीवन एवं ग्राम/वन-जीवन का जो अन्तर दिखाया गया है, उसे स्पष्ट कीजिए।
MCQ & अभिकथन-कारण
1. ‘शुचिपर्यावरणम्’ पाठ के रचयिता कौन हैं?
(क) कालिदासः
(ख) हरिदत्त शर्मा
(ग) भारविः
(घ) माघः
2. यह पाठ कवि के किस रचना-संग्रह से लिया गया है?
(क) त्रिपथगा
(ख) उत्कलिका
(ग) ललल्लतिका
(घ) बालगीताली
3. ‘कालायसचक्रम्’ का अर्थ है—
(क) सोने का चक्र
(ख) लोहे का चक्र (मशीन)
(ग) समय का चक्र
(घ) जल का चक्र
4. महानगरों में संसरण (आवागमन) कठिन क्यों है?
(क) मार्गाणाम् अभावात्
(ख) यानानाम् अनन्ताः पङ्क्तयः सन्ति
(ग) जलस्य अभावात्
(घ) वृक्षाणां बाहुल्यात्
5. शतशकटीयानम् कैसा धुआँ छोड़ता है?
(क) श्वेतम्
(ख) निर्मलम्
(ग) कज्जलमलिनम्
(घ) सुगन्धितम्
6. कवि किसके लिए (सच्चा) जीवन चाहता है?
(क) दानवाय
(ख) मानवाय
(ग) यन्त्राय
(घ) नगराय
7. कवि किस स्थान पर क्षण भर विचरण करना चाहता है?
(क) महानगरे
(ख) विपणौ
(ग) एकान्ते कान्तारे
(घ) यन्त्रशालायाम्
8. ‘रसालम्’ शब्द का अर्थ है—
(क) जल
(ख) आम का वृक्ष
(ग) वन
(घ) फूल
9. कवि किसकी शरण में जाना चाहता है?
(क) यन्त्रस्य
(ख) नगरस्य
(ग) प्रकृतेः
(घ) धनस्य
10. इस गीत का ध्रुवपद (टेक) क्या है?
(क) दुर्वहं जीवनम्
(ख) शुचि पर्यावरणम्
(ग) कालायसचक्रम्
(घ) पाषाणी सभ्यता
अभिकथन-कारण – नीचे अभिकथन (A) और कारण (R) दिए गए हैं। सही विकल्प चुनिए—
(क) A और R दोनों सही, R, A की सही व्याख्या है। (ख) A और R दोनों सही, पर R, A की सही व्याख्या नहीं। (ग) A सही, R गलत। (घ) A गलत, R सही।
1. अभिकथन (A): कवि नगर से दूर प्रकृति की शरण में जाना चाहता है।
कारण (R): महानगर में प्रदूषण के कारण जीवन दुर्वह (कष्टप्रद) हो गया है।
2. अभिकथन (A): महानगरों में आवागमन (संसरण) कठिन है।
कारण (R): नगरों में वाहनों की अनन्त पंक्तियाँ दौड़ती रहती हैं।
3. अभिकथन (A): इस गीत के रचयिता हरिदत्त शर्मा हैं।
कारण (R): वे केवल हिन्दी-कवि थे तथा संस्कृत में कोई रचना नहीं की।
4. अभिकथन (A): कवि चाहता है कि वायु, जल एवं भूमि का शुद्धिकरण किया जाए।
कारण (R): पाठ के अनुसार वायुमण्डल, जल, भोज्य-पदार्थ एवं धरातल सब दूषित हो चुके हैं।
5. अभिकथन (A): कवि मनुष्य के लिए जीवन्मरण (जीते-जी मरण-तुल्य जीवन) की कामना करता है।
कारण (R): कवि चाहता है कि पाषाणी (कृत्रिम) सभ्यता प्रकृति में समाविष्ट हो जाए।
परीक्षा-युक्तियाँ एवं सामान्य गलतियाँ
परीक्षा-युक्तियाँ (Exam Tips)
- सातों पद्य एवं ध्रुवपद ‘शुचि पर्यावरणम्’ कण्ठस्थ करें – रिक्तस्थान-पूर्ति एवं भावार्थ-लेखन प्रायः इन्हीं से आते हैं।
- कठिन शब्दों के अर्थ हिन्दी एवं अंग्रेज़ी दोनों में याद करें – कालायसचक्रम्, संसरणम्, कान्तारे, समलम्, रसालम् आदि।
- सन्धि-विच्छेद में सावधानी रखें – प्रकृतिरेव, स्यान्नैव, ह्यनन्ताः, सञ्चरणम् बार-बार पूछे जाते हैं।
- समास-विग्रह में कर्मधारय (कज्जलमलिनम्) एवं बहुव्रीहि (धृतसुखसन्देशम्) का अन्तर स्पष्ट रखें।
- ‘एकपदेन उत्तरम्’ में एक ही शब्द लिखें तथा संस्कृत-भाषा वाले प्रश्नों में पूर्ण वाक्य लिखें।
सामान्य गलतियाँ (Common Mistakes)
- संयुक्ताक्षर लिखने में भूल – ‘सञ्चरणम्’, ‘पङ्क्तयः’, ‘कुत्सित’ शुद्ध लिखें।
- ‘मानवाय’ एवं ‘दानवाय’ को आपस में बदल देना (कवि मानव के लिए जीवन चाहता है)।
- कवि का नाम भूल जाना – रचयिता हरिदत्त शर्मा हैं, संग्रह ‘ललल्लतिका’ है।
- सन्धि-विच्छेद में गलत पद जोड़ना (जैसे स्यात् + न + एव = स्यान्नैव)।
- ध्रुवपद को भूल जाना – प्रत्येक पद्य के अन्त में ‘शुचि पर्यावरणम्’ आता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
शेमुषी कक्षा 10 का पहला पाठ ‘शुचिपर्यावरणम्’ किस विधा का है और इसके रचयिता कौन हैं?
यह एक गीत (पद्य) है, जिसकी रचना आधुनिक संस्कृत-कवि प्रोफेसर हरिदत्त शर्मा ने की है। यह उनके काव्य-संग्रह ‘ललल्लतिका’ से संकलित है। इसमें कवि ने महानगरों के प्रदूषण पर चिन्ता व्यक्त करते हुए स्वच्छ पर्यावरण का सन्देश दिया है।
इस गीत का मुख्य भाव एवं ध्रुवपद क्या है?
इस गीत में सात पद्य हैं और इसका ध्रुवपद ‘शुचि पर्यावरणम्’ है। मुख्य भाव यह है कि नगरों की यन्त्र-बहुलता एवं प्रदूषण से जीवन दुर्वह हो गया है, अतः प्रकृति ही शरण है और स्वच्छ पर्यावरण ही सुखी जीवन का आधार है।
कवि महानगर के जीवन से दूर क्यों जाना चाहता है?
क्योंकि महानगर में मशीनों के लौह-चक्र, वाहनों के काले धुएँ एवं कोलाहल से वायु, जल, भोजन एवं भूमि सब दूषित हो गए हैं। इसलिए कवि नदी-निर्झर, हरे वृक्ष, लताओं एवं पक्षियों के कलरव से युक्त शान्त, स्वच्छ वन-प्रदेश की ओर जाना चाहता है।
गीत, श्लोक, प्रश्न एवं अभ्यास-शीर्षक NCERT शेमुषी (द्वितीयो भागः) पुस्तक से ज्यों-के-त्यों लिए गए हैं; सार, भावार्थ एवं उत्तर ClearStudy द्वारा मौलिक रूप से तैयार किए गए हैं।
