NCERT Solutions for Class 10 Sanskrit (Shemushi) पाठः 3: शिशुलालनम्
This page gives the complete solution for Class 10 Sanskrit Shemushi (शेमुषी द्वितीयो भागः) Chapter 3 ‘शिशुलालनम्’ – a नाटकांश (dramatic excerpt) edited from the fifth अङ्क of the famous Sanskrit play कुन्दमाला by नाटककार दिङ्नागः, depicting श्रीराम’s tender affection (शिशुवात्सल्य) for his sons लव and कुश – with its मूल नाटकांश-प्रसंग, original सार (Hindi summary), श्लोकों का अन्वय एवं भावार्थ, शब्दार्थ, and exam-ready answers to every question of the अभ्यासः along with extra questions, MCQs, अभिकथन-कारण and FAQs (NCERT 2026–27).
पाठ का अवलोकन (Chapter Overview)
शेमुषी (द्वितीयो भागः) कक्षा 10 का तृतीय पाठ ‘शिशुलालनम्’ संस्कृत के प्रसिद्ध नाटक कुन्दमाला के पञ्चम अङ्क से सम्पादित एक नाटकांश (गद्य-प्रधान, बीच-बीच में पद्य-सहित) है। इस नाटक के रचयिता प्रसिद्ध नाटककार दिङ्नागः हैं। इस अंश में श्रीराम अपने दोनों पुत्रों लव एवं कुश को सिंहासन पर बैठाना चाहते हैं, किन्तु दोनों विनयपूर्वक मना कर देते हैं। सिंहासनारूढ़ राम उनके रूप-लावण्य को देखकर मुग्ध हो जाते हैं और उन्हें अपनी गोद में बैठा लेते हैं। पाठ में शिशु-वात्सल्य (शिशुलालन) का अत्यन्त मनोहारी वर्णन हुआ है। संवाद के माध्यम से ज्ञात होता है कि लव-कुश की माता का नाम देवी (सीता) तथा गुरु महर्षि वाल्मीकि हैं – और राम के हृदय में अपने अनजाने पुत्रों के प्रति सहज स्नेह उमड़ पड़ता है।
पाठ-परिचय / नाट्य-प्रसंग
यह पाठ संस्कृत-वाङ्मय के प्रसिद्ध नाटक ‘कुन्दमाला’ के पञ्चम अङ्क से सम्पादित किया गया है। इसके रचयिता प्रसिद्ध नाटककार दिङ्नागः हैं। दिङ्नाग ने इस नाटक में रामकथा के करुण एवं अवसादपूर्ण उत्तरार्ध की नाटकीय सम्भावनाओं को मौलिकता से साकार किया है; इसी कथानक पर प्रसिद्ध नाटककार भवभूति का उत्तररामचरित भी आश्रित है। कुन्दमाला के छहों अङ्कों का दृश्य-विधान वाल्मीकि के तपोवन के परिसर में ही केन्द्रित है। प्रस्तुत नाटकांश में विदूषक के साथ कुशल-लव (कुश एवं लव) श्रीराम के समीप आते हैं। उनके स्पर्श-सुख से अभिभूत होकर राम उन्हें अपने सिंहासन पर, अपनी गोद में बिठाकर लाड़ करते हैं। बीच-बीच में राम पुत्रों से उनके कुल, माता एवं गुरु का परिचय पूछते हैं; इसी संवाद में सीता-वियोग की करुणा भी झलकती है।
सार (Hindi Summary)
‘शिशुलालनम्’ नाटकांश में श्रीराम के पुत्र-वात्सल्य का हृदयस्पर्शी चित्रण हुआ है। दृश्य के आरम्भ में सिंहासन पर बैठे श्रीराम के समीप विदूषक द्वारा मार्ग दिखाए जाते हुए दोनों तपस्वी बालक कुश एवं लव आते हैं। वे राम के निकट जाकर प्रणाम करते हैं और महाराज की कुशल पूछते हैं। राम उनके दर्शन से स्वयं को कुशल अनुभव करते हैं तथा उन्हें आलिंगनबद्ध कर लेते हैं और कहते हैं कि यह स्पर्श हृदय को छू लेने वाला है। राम उन दोनों को अपने आसन पर बैठाना चाहते हैं, किन्तु दोनों बालक ‘राजासन पर बैठना उचित नहीं’ कहकर अति शालीनतापूर्वक मना कर देते हैं।
राम कहते हैं कि व्यवधान (आड़) रखकर बैठने से चरित्र की कोई हानि नहीं; अतः वे बालकों को कुछ अन्तर पर सिंहासन पर बिठा लेते हैं। फिर इसी प्रसंग में वे यह श्लोक कहते हैं कि “गुणों में महान् व्यक्तियों के लिए भी छोटी अवस्था के कारण बालक लाड़ के योग्य ही होता है; जैसे चन्द्रमा भी बाल-भाव के कारण ही शिव के मस्तक का आभूषण बनता है।” तत्पश्चात् राम बालकों के सौन्दर्य से कौतूहल-वश उनसे उनके वंश, पिता, माता एवं गुरु के विषय में पूछते हैं। दोनों बालक बताते हैं कि वे सूर्य-चन्द्र के समान क्षत्रिय-कुल के हैं, परस्पर सहोदर (जुड़वाँ) भाई हैं तथा उनके नाम लव एवं कुश हैं और उनके गुरु भगवान् वाल्मीकि हैं, जिन्होंने उपनयन का उपदेश दिया।
जब राम पिता का नाम पूछते हैं, तब बालक कहते हैं कि इस तपोवन में पिता का नाम कोई नहीं लेता; किन्तु माता क्रुद्ध होने पर उन्हें ‘निरनुक्रोश के पुत्रो’ (निर्दय के बेटो) कहकर डाँटती हैं। यह सुनकर राम मन-ही-मन व्यथित हो जाते हैं कि उनके अपराध के कारण ही वह तपस्विनी (सीता) अपनी सन्तान को इन क्रोधपूर्ण कठोर वचनों से फटकारती है। संवाद के अन्त में ज्ञात होता है कि बालकों की माता के दो नाम हैं – तपोवनवासी ‘देवी’ कहते हैं और भगवान् वाल्मीकि ‘वधू’ कहते हैं। तभी नेपथ्य से वाल्मीकि का दूत रामायण-गान के लिए बुलाता है; राम मुनि-नियोग का आदर करते हुए सभी को विदा देकर प्रस्थान करते हैं। इस प्रकार पाठ शिशु-स्नेह की कोमलता एवं विछोह की करुणा दोनों को साथ-साथ प्रकट करता है।
श्लोकों का अन्वय एवं भावार्थ
श्लोकः 1
व्रजति हिमकरोऽपि बालभावात् पशुपति-मस्तक-केतकच्छदत्वम् ॥
अन्वयः – गुणमहताम् अपि वयोऽनुरोधात् शिशुजनः लालनीयः एव भवति। बालभावात् हिमकरः अपि पशुपति-मस्तक-केतकच्छदत्वं व्रजति।
भावार्थः – अत्यधिक गुणवान् (महान्) लोगों के लिए भी छोटी अवस्था के कारण बालक लाड़-प्यार के योग्य ही होता है। (इसका प्रमाण यह है कि) चन्द्रमा भी बाल-भाव (बालचन्द्र रूप) के कारण ही शिव के मस्तक का आभूषण बनकर, केतकी (केवड़े) के पुष्प से बने आभूषण की भाँति सुशोभित होता है। तात्पर्य यह कि बालक चाहे कितना ही गुणी क्यों न हो, उसकी अल्प आयु के कारण उससे स्नेह एवं लाड़ करना स्वाभाविक है।
श्लोकः 2
गिरां सन्दर्भोऽयं प्रथममवतीर्णो वसुमतीम् ।
कथा चेयं श्लाघ्या सरसिरुहनाभस्य नियतं
पुनाति श्रोतारं रमयति च सोऽयं परिकरः ॥
अन्वयः – भवन्तौ गायन्तौ, पुराणः व्रतनिधिः कविः अपि, वसुमतीं प्रथमम् अवतीर्णः गिरां अयं सन्दर्भः, सरसिरुहनाभस्य च इयं श्लाघ्या कथा, सः च अयं परिकरः नियतं श्रोतारं पुनाति रमयति च।
भावार्थः – भगवान् वाल्मीकि द्वारा रचित पुराणपुरुष (विष्णु) की कथा कुश एवं लव द्वारा श्रीराम को सुनायी जानी थी। उसी की सूचना देते हुए, नेपथ्य से कुश और लव को बिना समय नष्ट किए अपने कर्तव्य के पालन का निर्देश दिया जाता है। दोनों राम से आज्ञा लेकर जाना चाहते हैं, तब श्रीराम उपर्युक्त श्लोक के माध्यम से उस रचना का सम्मान करते हुए कहते हैं – आप दोनों (कुश और लव) इस कथा का गान करने वाले हैं, तपोनिधि पुराण मुनि (वाल्मीकि) इस रचना के कवि हैं, यह धरती पर प्रथम बार अवतरित होने वाला स्पष्ट वाणी का काव्य है और इसकी कथा कमलनाभ विष्णु से सम्बद्ध है; इस प्रकार निश्चय ही यह संयोग श्रोताओं को पवित्र एवं आनन्दित करने वाला है।
शब्दार्थाः (Word-meanings)
| शब्दः (Sanskrit) | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| पितामहः | पिता के पिता, दादा | Grandfather |
| सहस्रदीधितिः | सूर्य | The sun |
| कण्ठाश्लेषः | गले लगाना | Embrace / hug |
| परिष्वज्य | आलिंगन करके | Having embraced |
| विचिन्त्य | विचार करके | Having considered |
| अध्यासितुम् | बैठने के लिए | To sit (upon) |
| सव्यवधानम् | आड़/व्यवधान सहित | With obstruction |
| अध्यास्यताम् | बैठिए, आसीन हों | Be seated |
| अलमतिदाक्षिण्येन | अत्यधिक कुशलता/शिष्टाचार रहने दें | Leave aside excessive politeness |
| अङ्कम् | गोद | Lap |
| हिमकरः | चन्द्रमा | The moon |
| पशुपतिः | शिव | Lord Shiva |
| स्वगतम् | मन ही मन | Aside (to oneself) |
| समानाभिजनौ | एक ही कुल में उत्पन्न | Of the same family |
| संवृत्तौ | हो गए | Became |
| प्रतिवचनम् | उत्तर | Reply / answer |
| सोदर्यौ | सहोदर, सगे (जुड़वाँ) भाई | Real / twin brothers |
| शरीरसन्निवेशः | शरीर की बनावट | Body structure |
| उदात्तरम्यः | अत्यन्त मनोहर | Lofty and charming |
| समुदाचारः | शिष्टाचार | Good etiquette |
| उपनयनोपदेशेन | उपनयन-संस्कार की दीक्षा के कारण | By the sacred-thread teaching |
| नामधेयम् | नाम | Name |
| निरनुक्रोशः | निर्दय, दयारहित | Unkind / merciless |
| भणति | कहता है | Says |
| अम्बा | माता | Mother |
| प्रकृतिस्था | स्वाभाविक/सामान्य मनःस्थिति में | In a normal state |
| अधिक्षिपति | फटकारती है | Snubs / rebukes |
| निर्भर्त्सयति | धमकाती/डाँटती है | Scolds |
| स्वापत्यम् | अपनी सन्तान को | One’s own offspring |
| उपाध्यायदूतः | गुरु (वाल्मीकि) का दूत | The teacher’s messenger |
अभ्यासः के उत्तर (Textbook Solutions)
1. एकपदेन उत्तरं लिखत —
(क) कुशलवौ कम् उपसृत्य प्रणमतः ?
(ख) तपोवनवासिनः कुशस्य मातरं केन नाम्ना आह्वयन्ति ?
(ग) वयोऽनुरोधात् कः लालनीयः भवति ?
(घ) केन सम्बन्धेन वाल्मीकिः लवकुशयोः गुरुः ?
(ङ) कुत्र लवकुशयोः पितुः नाम न व्यवह्रियते ?
2. अधोलिखितानां प्रश्नानाम् उत्तराणि संस्कृतभाषया लिखत —
(क) रामाय कुशलवयोः कण्ठाश्लेषस्य स्पर्शः कीदृशः आसीत् ?
(ख) रामः लवकुशौ कुत्र उपवेशयितुम् कथयति ?
(ग) बालभावात् हिमकरः कुत्र विराजते ?
(घ) कुशलवयोः वंशस्य कर्ता कः ?
(ङ) कुशलवयोः मातरं वाल्मीकिः केन नाम्ना आह्वयति ?
3. रेखाङ्कितेषु पदेषु विभक्तिं तत्कारणं च उदाहरणानुसारं निर्दिशत —
यथा – राजन्! अलम् अतिदाक्षिण्येन। → विभक्तिः: तृतीया | तत्कारणम्: ‘अलम्’ योगे
| वाक्यम् (रेखाङ्कित पदम्) | विभक्तिः | तत्कारणम् |
|---|---|---|
| (क) रामः लवकुशौ आसनार्धम् उपवेशयति। | द्वितीया | कर्म-कारके (अधिकरण-भावे) द्वितीया |
| (ख) धिक् माम् एवंभूतम्। | द्वितीया | ‘धिक्’ योगे द्वितीया |
| (ग) अटव्यवहितम् अध्यास्यतां सिंहासनम्। | द्वितीया | ‘अध्यास्’ (कर्म) के योग में द्वितीया |
| (घ) अलम् अतिविस्तरेण। | तृतीया | ‘अलम्’ योगे तृतीया |
| (ङ) रामम् उपसृत्य प्रणम्य च। | द्वितीया | ‘उप’-उपसर्गपूर्वक ‘सृ’ (कर्म) के योग में द्वितीया |
4. यथानिर्देशम् उत्तरत —
(क) ‘जानाम्यहं तस्य नामधेयम्’ अस्मिन् वाक्ये कर्तृपदं किम् ?
(ख) ‘किं कुपिता एवं भणति उत प्रकृतिस्था’ – अस्मात् वाक्यात् ‘हर्षिता’ इति पदस्य विपरीतार्थकपदं चित्वा लिखत।
(ग) विदूषकः (उपसृत्य) ‘आज्ञापयतु भवान्!’ अत्र भवान् इति पदं कस्मै प्रयुक्तम् ?
(घ) ‘तस्मादङ्क-व्यवहितम् अध्यास्यतां सिंहासनम्’ – अत्र क्रियापदं किम् ?
(ङ) ‘वयसस्तु न किञ्चिदन्तरम्’ – अत्र ‘आयुषः’ इत्यर्थे किं पदं प्रयुक्तम् ?
5. अधोलिखितानि वाक्यानि कः कं प्रति कथयति —
| वाक्यम् | कः (वक्ता) | कं प्रति (श्रोता) |
|---|---|---|
| (क) सव्यवधानं न चारित्रलोपाय। | रामः | लवकुशौ (प्रति) |
| (ख) किं कुपिता एवं भणति, उत प्रकृतिस्था? | विदूषकः | कुशम् (प्रति) |
| (ग) जानाम्यहं तस्य नामधेयम्। | कुशः | रामम् (प्रति) |
| (घ) तस्या द्वे नामनी। | लवः | विदूषकम् (प्रति) |
| (ङ) वयस्य! अपूर्वं खलु नामधेयम्। | रामः | विदूषकम् (प्रति) |
6. (अ) मञ्जूषातः पर्यायद्वयं चित्वा पदानां समक्षं लिखत —
मञ्जूषा: शिवः, शिष्टाचारः, शशी, चन्द्रशेखरः, सुतः, इदानीम्, अधुना, पुत्रः, सूर्यः, सदाचारः, निशाकरः, भानुः
| पदम् | पर्यायद्वयम् (उत्तरम्) |
|---|---|
| (क) हिमकरः | शशी, निशाकरः |
| (ख) सम्प्रति | इदानीम्, अधुना |
| (ग) समुदाचारः | शिष्टाचारः, सदाचारः |
| (घ) पशुपतिः | शिवः, चन्द्रशेखरः |
| (ङ) तनयः | सुतः, पुत्रः |
| (च) सहस्रदीधितिः | सूर्यः, भानुः |
6. (आ) विशेषण-विशेष्यपदानि योजयत —
यथा – श्लाघ्या → कथा
7. (क) अधोलिखितपदेषु सन्धिं कुरुत —
| पदम् | सन्धिः (उत्तरम्) |
|---|---|
| (क) द्वयोः + अपि | द्वयोरपि |
| (ख) द्वौ + अपि | द्वावपि |
| (ग) कः + अत्र | कोऽत्र |
| (घ) अनभिज्ञः + अहम् | अनभिज्ञोऽहम् |
| (ङ) इति + आत्मानम् | इत्यात्मानम् |
7. (ख) अधोलिखितपदेषु विच्छेदं कुरुत —
| पदम् | विच्छेदः (उत्तरम्) |
|---|---|
| (क) अहमप्येतयोः | अहम् + अपि + एतयोः |
| (ख) वयोऽनुरोधात् | वयः + अनुरोधात् |
| (ग) समानाभिजनौ | समान + अभिजनौ |
| (घ) खल्वेतत् | खलु + एतत् |
अतिरिक्त प्रश्न (Extra Questions)
लघु उत्तरीय प्रश्न (30–40 शब्द)
1. ‘शिशुलालनम्’ पाठ किस नाटक से सम्पादित है तथा इसके रचयिता कौन हैं?
2. राम लव-कुश को सिंहासन पर बैठाना क्यों चाहते हैं और बालक क्या करते हैं?
3. श्लोक ‘भवति शिशुजनो…’ में चन्द्रमा का दृष्टान्त किसलिए दिया गया है?
4. राम स्वगत रूप से व्यथित क्यों हो जाते हैं?
5. नाटकांश के अन्त में राम सबको विदा क्यों कर देते हैं?
दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (100–120 शब्द)
6. ‘शिशुलालनम्’ पाठ में निहित वात्सल्य-भाव का वर्णन कीजिए।
7. लव-कुश के कुल, माता एवं गुरु का परिचय इस नाटकांश के आधार पर लिखिए।
MCQ & अभिकथन-कारण
1. ‘शिशुलालनम्’ पाठ किस नाटक से लिया गया है?
(क) उत्तररामचरितम्
(ख) कुन्दमाला
(ग) अभिज्ञानशाकुन्तलम्
(घ) स्वप्नवासवदत्तम्
2. कुन्दमाला नाटक के रचयिता कौन हैं?
(क) भवभूतिः
(ख) कालिदासः
(ग) दिङ्नागः
(घ) भासः
3. यह नाटकांश कुन्दमाला के किस अङ्क से सम्पादित है?
(क) प्रथम अङ्क
(ख) तृतीय अङ्क
(ग) पञ्चम अङ्क
(घ) षष्ठ अङ्क
4. ‘हिमकरः’ पद का अर्थ है—
(क) सूर्यः
(ख) चन्द्रः
(ग) अग्निः
(घ) वायुः
5. लव एवं कुश परस्पर किस सम्बन्ध से जुड़े हैं?
(क) पितृ-पुत्रौ
(ख) गुरु-शिष्यौ
(ग) सोदर्यौ (यमलौ)
(घ) मित्रे
6. लव-कुश के गुरु कौन हैं?
(क) वसिष्ठः
(ख) वाल्मीकिः
(ग) विश्वामित्रः
(घ) भरद्वाजः
7. क्रुद्ध होने पर माता बालकों को क्या कहकर डाँटती है?
(क) निरनुक्रोशस्य पुत्रौ
(ख) महाराजस्य पुत्रौ
(ग) तपस्विनः पुत्रौ
(घ) देवस्य पुत्रौ
8. लव-कुश के वंश के कर्ता (मूलपुरुष) कौन हैं?
(क) चन्द्रः
(ख) इन्द्रः
(ग) सहस्रदीधितिः (सूर्यः)
(घ) ब्रह्मा
9. भगवान् वाल्मीकि बालकों की माता को किस नाम से बुलाते हैं?
(क) देवी
(ख) वधूः
(ग) सीता
(घ) जनकात्मजा
10. नेपथ्य से बालकों को किसलिए बुलाया जाता है?
(क) भोजनार्थम्
(ख) रामायणगानाय
(ग) क्रीडार्थम्
(घ) युद्धाय
अभिकथन-कारण – नीचे अभिकथन (A) और कारण (R) दिए गए हैं। सही विकल्प चुनिए—
(क) A और R दोनों सही, R, A की सही व्याख्या है। (ख) A और R दोनों सही, पर R, A की सही व्याख्या नहीं। (ग) A सही, R गलत। (घ) A गलत, R सही।
1. अभिकथन (A): राम लव-कुश को अपनी गोद में बैठा लेते हैं।
कारण (R): वे बालकों के रूप-लावण्य एवं हृदयग्राही स्पर्श से मुग्ध हो जाते हैं।
2. अभिकथन (A): बालक राजासन पर बैठने से इनकार कर देते हैं।
कारण (R): राजासन पर बैठना उचित नहीं है, यह सोचकर वे शालीनतावश मना करते हैं।
3. अभिकथन (A): श्लोक में चन्द्रमा को शिव के मस्तक का आभूषण कहा गया है।
कारण (R): चन्द्रमा बाल-भाव (बालचन्द्र) के कारण ही शिव के मस्तक की शोभा बनता है।
4. अभिकथन (A): राम स्वगत रूप से अत्यन्त व्यथित हो जाते हैं।
कारण (R): बालक सूर्यवंशी क्षत्रिय-कुल के हैं।
5. अभिकथन (A): नाटकांश के अन्त में राम सबको विदा कर देते हैं।
कारण (R): नेपथ्य से गुरु वाल्मीकि का दूत रामायण-गान के लिए बालकों को बुलाता है।
परीक्षा-युक्तियाँ एवं सामान्य गलतियाँ
परीक्षा-युक्तियाँ (Exam Tips)
- दोनों श्लोक (‘भवति शिशुजनो…’ एवं ‘भवन्तौ गायन्तौ…’) अन्वय एवं भावार्थ-सहित कण्ठस्थ करें – भावार्थ एवं अन्वय के प्रश्न इन्हीं से आते हैं।
- पात्र-परिचय याद रखें – राम, विदूषक, कुश एवं लव; और ‘कः कं प्रति कथयति’ प्रश्नों का अभ्यास करें।
- शब्दार्थ हिन्दी एवं अंग्रेज़ी दोनों में याद करें – हिमकरः, पशुपतिः, सोदर्यौ, निरनुक्रोशः आदि।
- विभक्ति-निर्देश में ‘अलम्’ (तृतीया) एवं ‘धिक्’ (द्वितीया) के योग का नियम याद रखें।
- सन्धि-विच्छेद का अभ्यास करें – वयः+अनुरोधात् = वयोऽनुरोधात्, खलु+एतत् = खल्वेतत् आदि।
सामान्य गलतियाँ (Common Mistakes)
- नाटककार को गलती से कालिदास या भवभूति लिख देना – रचयिता दिङ्नाग हैं (नाटक – कुन्दमाला)।
- हिमकरः (चन्द्रमा) एवं सहस्रदीधितिः (सूर्य) के अर्थ आपस में बदल देना।
- माता के दोनों नाम भूल जाना – तपोवनवासी ‘देवी’, वाल्मीकि ‘वधू’ कहते हैं।
- संयुक्ताक्षर अशुद्ध लिखना – ‘सिंहासनम्’, ‘कण्ठाश्लेषः’, ‘निरनुक्रोशः’ शुद्ध लिखें।
- ‘एकपदेन उत्तरम्’ में एक ही शब्द लिखें तथा संस्कृत-वाक्य वाले उत्तरों में सही विभक्ति का प्रयोग करें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
शेमुषी कक्षा 10 का तृतीय पाठ ‘शिशुलालनम्’ किस नाटक से लिया गया है और इसके रचयिता कौन हैं?
यह पाठ संस्कृत के प्रसिद्ध नाटक ‘कुन्दमाला’ के पञ्चम अङ्क से सम्पादित नाटकांश है, जिसके रचयिता प्रसिद्ध नाटककार दिङ्नाग हैं। इसमें श्रीराम के शिशु-वात्सल्य (पुत्र-स्नेह) का मनोहारी वर्णन है।
‘शिशुलालनम्’ पाठ का मुख्य भाव क्या है?
पाठ का मुख्य भाव शिशु-वात्सल्य है। श्रीराम अपने अनजाने पुत्रों लव-कुश को देखकर स्नेह से अभिभूत हो जाते हैं और उन्हें अपनी गोद में बैठा लेते हैं। साथ ही माता के ‘निरनुक्रोश के पुत्रो’ कहने के संकेत से सीता-वियोग की करुणा भी झलकती है।
लव-कुश की माता एवं गुरु कौन हैं?
लव-कुश के गुरु भगवान् वाल्मीकि हैं (उपनयन-संस्कार के उपदेश के कारण)। उनकी माता के दो नाम हैं – तपोवनवासी उन्हें ‘देवी’ कहते हैं और भगवान् वाल्मीकि उन्हें ‘वधू’ कहते हैं। वे सूर्यवंशी क्षत्रिय-कुल के सहोदर (जुड़वाँ) भाई हैं।
नाटकांश, श्लोक एवं अभ्यासः के प्रश्न NCERT शेमुषी (द्वितीयो भागः) पुस्तक से ज्यों-के-त्यों लिए गए हैं; सार, भावार्थ एवं उत्तर ClearStudy द्वारा मौलिक रूप से तैयार किए गए हैं।
