NCERT Solutions for Class 10 Sanskrit (Shemushi) पाठः 5: सुभाषितानि

This page gives the complete solution for Class 10 Sanskrit Shemushi (शेमुषी द्वितीयो भागः) Chapter 5 ‘सुभाषितानि’ – a संग्रह (anthology) of ten सुभाषित (well-spoken verses) culled from various Sanskrit ग्रन्थ – with the मूल श्लोक, श्लोक-अन्वयः, original हिन्दी भावार्थ, शब्दार्थ, and exam-ready answers to every question of the अभ्यासः, along with extra questions, MCQs, अभिकथन-कारण (Assertion-Reason) and FAQs (NCERT 2026–27).

कक्षा / Class: 10 विषय / Subject: Sanskrit (संस्कृत) पुस्तक / Book: Shemushi 2 (शेमुषी द्वितीयो भागः) पाठः / Chapter: 5 पाठ-नाम: सुभाषितानि सत्र / Session: 2026–27

पाठ का अवलोकन (Chapter Overview)

शेमुषी (द्वितीयो भागः) कक्षा 10 का पञ्चम पाठ ‘सुभाषितानि’ विभिन्न संस्कृत-ग्रन्थों से संकलित दस सुभाषितों का संग्रह है। संस्कृत-साहित्य में जिन पद्यों के द्वारा सार्वभौम सत्य को बड़े मार्मिक एवं अर्थगाम्भीर्ययुक्त ढंग से प्रकट किया जाता है, उन्हें सुभाषित कहते हैं। ये अर्थगाम्भीर्ययुक्त, छन्दोबद्ध एवं प्रेरणात्मक रचनाएँ हैं। इस पाठ के दस श्लोकों में परिश्रम का महत्त्व, क्रोध का दुष्प्रभाव, समान-स्वभाव वालों की मित्रता, सभी वस्तुओं की उपयोगिता, बुद्धि की विशेषता तथा महापुरुषों की समानता आदि अनेक विषयों पर सुन्दर ढंग से प्रकाश डाला गया है। ये सुभाषित जीवन में सदाचरण, परिश्रम एवं सद्बुद्धि की प्रेरणा देते हैं।

पाठ-परिचय / प्रसंग

‘सुभाषित’ शब्द दो पदों से बना है – सु (अच्छा/उत्तम) + भाषित (कहा हुआ), अर्थात् ‘उत्तम रीति से कहा गया वचन’। प्रस्तुत पाठ में दिये गये दस सुभाषित संस्कृत के अनेक नीति-ग्रन्थों से संकलित हैं। इनमें मनुष्य के जीवन को सन्मार्ग पर ले जाने वाले अनेक उपदेश निहित हैं – आलस्य मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है तथा उद्यम सबसे बड़ा बन्धु है; गुणी ही गुण को पहचानता है; अकारण द्वेष करने वाले मन को कोई सन्तुष्ट नहीं कर सकता; बुद्धिमान् व्यक्ति संकेत-मात्र से ज्ञान प्राप्त कर लेता है; क्रोध मनुष्य का प्रथम शत्रु है जो शरीर का ही नाश करता है; समान-स्वभाव एवं समान-व्यसन वालों में ही मित्रता होती है; तथा फल-छाया से युक्त बड़े वृक्ष का आश्रय लेना चाहिए। इस प्रकार ये सुभाषित नीति एवं व्यवहार-कुशलता के अमूल्य रत्न हैं।

मूल पाठ (श्लोकाः)

(प्रस्तुतः पाठः विविधग्रन्थात् सङ्कलितानां दशसुभाषितानां सङ्ग्रहः वर्तते। संस्कृतसाहित्ये सार्वभौमं सत्यं प्रकाशयितुम् अर्थगाम्भीर्ययुता पद्यमयी प्रेरणात्मिका रचना सुभाषितम् इति कथ्यते। अयं पाठांशः परिश्रमस्य महत्त्वम्, क्रोधस्य दुष्प्रभावः, सामाजिकमहत्त्वम्, सर्वेषां वस्तूनाम् उपादेयता, बुद्धेः वैशिष्ट्यम् इत्यादीन् विषयान् प्रकाशयति।)

आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः ।
नास्त्युद्यमसमो बन्धुः कृत्वा यं नावसीदति ॥१॥

गुणी गुणं वेत्ति न वेत्ति निर्गुणो,
    बली बलं वेत्ति न वेत्ति निर्बलः ।
पिको वसन्तस्य गुणं न वायसः,
    करी च सिंहस्य बलं न मूषकः ॥२॥

निमित्तमुद्दिश्य हि यः प्रकुप्यति,
    ध्रुवं स तस्यापगमे प्रसीदति ।
अकारणद्वेषि मनस्तु यस्य वै,
    कथं जनस्तं परितोषयिष्यति ॥३॥

उदीरितोऽर्थः पशुनापि गृह्यते,
    हयाश्च नागाश्च वहन्ति बोधिताः ।
अनुक्तमप्यूहति पण्डितो जनः,
    परेङ्गितज्ञानफला हि बुद्धयः ॥४॥

क्रोधो हि शत्रुः प्रथमो नराणां,
    देहस्थितो देहविनाशनाय ।
यथास्थितः काष्ठगतो हि वह्निः,
    स एव वह्निर्दहते शरीरम् ॥५॥

मृगा मृगैः सङ्गमनुव्रजन्ति,
    गावश्च गोभिः तुरगास्तुरङ्गैः ।
मूर्खाश्च मूर्खैः सुधियः सुधीभिः,
    समान-शील-व्यसनेषु सख्यम् ॥६॥

सेवितव्यो महावृक्षः फलच्छायासमन्वितः ।
यदि दैवात् फलं नास्ति छाया केन निवार्यते ॥७॥

अमन्त्रमक्षरं नास्ति, नास्ति मूलमनौषधम् ।
अयोग्यः पुरुषः नास्ति योजकस्तत्र दुर्लभः ॥८॥

सम्पत्तौ च विपत्तौ च महतामेकरूपता ।
उदये सविता रक्तो रक्तश्चास्तमये तथा ॥९॥

विचित्रे खलु संसारे नास्ति किञ्चिन्निरर्थकम् ।
अश्वश्चेद् धावने वीरः भारस्य वहने खरः ॥१०॥
— विविध-संस्कृत-ग्रन्थेभ्यः सङ्कलितानि सुभाषितानि

श्लोक-अन्वयः एवं भावार्थः

श्लोकः 1

अन्वयःमनुष्याणां शरीरस्थः महान् शत्रुः आलस्यम् (अस्ति)। उद्यमसमः बन्धुः न अस्ति, यं कृत्वा (मनुष्यः) न अवसीदति।
भावार्थःमनुष्यों के शरीर में स्थित सबसे बड़ा शत्रु आलस्य है। उद्यम (परिश्रम) के समान कोई बन्धु नहीं है, जिसे करके मनुष्य कभी दुःखी नहीं होता अर्थात् सफल हो जाता है। तात्पर्य यह है कि परिश्रम ही सच्चा मित्र है और आलस्य सबसे बड़ा शत्रु।

श्लोकः 2

अन्वयःगुणी गुणं वेत्ति, निर्गुणः (गुणं) न वेत्ति; बली बलं वेत्ति, निर्बलः (बलं) न वेत्ति; वसन्तस्य गुणं पिकः (वेत्ति), वायसः न (वेत्ति); सिंहस्य बलं करी (वेत्ति), मूषकः न।
भावार्थःगुणवान् व्यक्ति ही गुण को जानता-पहचानता है, गुणहीन नहीं; बलवान् ही बल को जानता है, निर्बल नहीं। वसन्त ऋतु के गुण को कोयल पहचानती है, कौआ नहीं; सिंह के बल को हाथी जानता है, चूहा नहीं। तात्पर्य यह कि समान योग्यता वाला ही दूसरे की योग्यता का सच्चा मूल्यांकन कर सकता है।

श्लोकः 3

अन्वयःयः निमित्तम् उद्दिश्य प्रकुप्यति, सः तस्य (निमित्तस्य) अपगमे ध्रुवं प्रसीदति। यस्य मनः अकारणद्वेषि (अस्ति), जनः तं कथं परितोषयिष्यति?
भावार्थःजो किसी कारण को लेकर क्रोधित होता है, वह उस कारण के समाप्त हो जाने पर निश्चित ही प्रसन्न हो जाता है। परन्तु जिसका मन बिना किसी कारण के ही द्वेष करता है, उसे लोग किस प्रकार सन्तुष्ट कर सकते हैं? अर्थात् अकारण द्वेषी को सन्तुष्ट करना असम्भव है।

श्लोकः 4

अन्वयःपशुना अपि उदीरितः अर्थः गृह्यते, हयाः नागाः च बोधिताः (भारं) वहन्ति। पण्डितः जनः अनुक्तम् अपि ऊहति, बुद्धयः हि परेङ्गितज्ञानफलाः।
भावार्थःकहे हुए अर्थ (बात) को तो पशु भी समझ लेता है; घोड़े और हाथी भी सिखाये जाने पर भार ढोते हैं। किन्तु विद्वान् व्यक्ति बिना कहे हुए को भी समझ लेता है (अनुमान कर लेता है), क्योंकि बुद्धि का फल तो दूसरों के संकेत (इशारे) को जान लेना ही है। तात्पर्य यह कि सच्ची बुद्धिमानी संकेत से ही सब समझ लेने में है।

श्लोकः 5

अन्वयःनराणां देहविनाशनाय प्रथमः शत्रुः देहस्थितः क्रोधः। यथा काष्ठगतः स्थितः वह्निः काष्ठम् एव दहते, (तथैव शरीरस्थः क्रोधः) शरीरं दहते।
भावार्थःमनुष्यों के शरीर का नाश करने वाला प्रथम शत्रु शरीर में ही स्थित क्रोध है। जैसे लकड़ी में स्थित (छिपी) आग उसी लकड़ी को जला देती है, वैसे ही शरीर में स्थित क्रोध शरीर को ही जला डालता है। तात्पर्य यह कि क्रोध आत्मघाती है, इससे मनुष्य का अपना ही विनाश होता है।

श्लोकः 6

अन्वयःमृगाः मृगैः सह, गावः च गोभिः सह, तुरगाः तुरङ्गैः सह, मूर्खाः मूर्खैः सह, सुधियः सुधीभिः सह सङ्गम् अनुव्रजन्ति। समान-शील-व्यसनेषु सख्यम् (भवति)।
भावार्थःहिरण हिरणों के साथ, गायें गायों के साथ, घोड़े घोड़ों के साथ, मूर्ख मूर्खों के साथ तथा विद्वान् विद्वानों के साथ ही संगति करते हुए चलते हैं। तात्पर्य यह कि समान स्वभाव एवं समान आदतों (व्यसनों) वालों में ही मित्रता होती है।

श्लोकः 7

अन्वयःफलच्छायासमन्वितः महावृक्षः सेवितव्यः। दैवात् यदि फलं नास्ति, (तर्हि वृक्षस्य) छाया केन निवार्यते?
भावार्थःफल और छाया से युक्त बड़े वृक्ष का आश्रय लेना चाहिए। यदि दुर्भाग्यवश उसमें फल न भी हो, तो भी उसकी छाया को कौन रोक सकता है? तात्पर्य यह कि महान् पुरुष का आश्रय कभी निष्फल नहीं जाता; एक लाभ न मिले तो दूसरा लाभ अवश्य मिलता है।

श्लोकः 8

अन्वयःअमन्त्रम् अक्षरं नास्ति, अनौषधं मूलं नास्ति, अयोग्यः पुरुषः नास्ति; तत्र योजकः दुर्लभः।
भावार्थःकोई भी अक्षर ऐसा नहीं है जो मन्त्र न बन सके, कोई भी जड़ (मूल) ऐसी नहीं जो औषधि न हो, तथा कोई भी पुरुष ऐसा नहीं जो किसी काम के योग्य न हो। दुर्लभ तो केवल योजक (सही ढंग से जोड़ने/प्रयोग करने वाला) है। तात्पर्य यह कि संसार में सब कुछ उपयोगी है, बस उसका सही उपयोग करने वाला विरला होता है।

श्लोकः 9

अन्वयःसम्पत्तौ च विपत्तौ च महताम् एकरूपता (भवति)। यथा सविता उदये रक्तः (भवति), तथा एव अस्तमये च रक्तः (भवति)।
भावार्थःमहापुरुषों की सम्पत्ति (सुख) तथा विपत्ति (दुःख) दोनों ही दशाओं में समानता (एकरूपता) बनी रहती है। जैसे सूर्य उदय के समय लाल रहता है, वैसे ही अस्त के समय भी लाल रहता है। तात्पर्य यह कि श्रेष्ठ पुरुष सुख-दुःख दोनों में अपना स्वभाव एक-सा बनाये रखते हैं।

श्लोकः 10

अन्वयःविचित्रे संसारे खलु किञ्चित् निरर्थकं नास्ति। अश्वः चेत् धावने वीरः, (तर्हि) खरः भारस्य वहने (वीरः अस्ति)।
भावार्थःइस विचित्र संसार में निश्चित ही कोई वस्तु निरर्थक (व्यर्थ) नहीं है। यदि घोड़ा दौड़ने में श्रेष्ठ (वीर) है, तो गधा भार ढोने में श्रेष्ठ है। तात्पर्य यह कि प्रत्येक प्राणी एवं वस्तु का अपना-अपना महत्त्व एवं उपयोग है।

शब्दार्थाः (Word Meanings)

शब्दः (Sanskrit)अर्थः (हिन्दी)Meaning (English)
अवसीदतिदुःख का अनुभव करता है, दुःखी होता हैFeels hurt / suffers
वेत्तिजानता है, पहचानता हैKnows
वायसःकौआ (काकः)Crow
करीहाथी (गजः)Elephant
निमित्तम्कारणCause / purpose
प्रकुप्यतिअत्यधिक क्रोध करता हैGets very angry
ध्रुवम्निश्चित रूप सेCertainly
अपगमेसमाप्त होने परAt the end / on removal
प्रसीदतिप्रसन्न होता हैBecomes pleased
परितोषयिष्यतिसन्तुष्ट करेगाWill satisfy
उदीरितःकहा हुआ, उक्तSaid / uttered
गृह्यतेग्रहण/प्राप्त किया जाता हैIs grasped / accepted
हयाःघोड़े (अश्वाः)Horses
नागाःहाथी (गजाः, हस्तिनः)Elephants
ऊहतिअनुमान/निर्धारण करता हैInfers / assumes
परेङ्गितज्ञानफलाःदूसरों के संकेत/इशारे को समझ लेना ही जिनका फल हैWhose fruit is grasping others’ signs
पण्डितःविद्वान्, बुद्धिमान्Scholar / wise person
वह्निःअग्नि, आगFire
दहतेजलाता हैBurns
अनुव्रजन्तिपीछे-पीछे जाते हैं, अनुसरण करते हैंFollow
तुरगाःघोड़े (अश्वाः)Horses
सुधियःविद्वान्, बुद्धिमान् लोगLearned people
व्यसनेषुआदतों मेंIn habits / addictions
सख्यम्मित्रता, मैत्रीFriendship
सेवितव्यःआश्रय लेने योग्यShould be resorted to
निवार्यतेरोका जाता हैIs prevented / warded off
अमन्त्रम्मन्त्रहीन, बिना मन्त्र काWithout a sacred formula
मूलम्जड़Root
अनौषधम्औषधि-रहितNon-medicinal
योजकः(सही ढंग से) जोड़ने वाला, प्रयोक्ताOne who applies / connector
सवितासूर्यThe sun
खरःगधा (गर्दभः)Donkey

अभ्यासः के उत्तर

1. एकपदेन उत्तरं लिखत —

(क) मनुष्याणां महान् रिपुः कः?

उत्तरआलस्यम्।

(ख) गुणी किं वेत्ति?

उत्तरगुणम्।

(ग) केषां सम्पत्तौ च विपत्तौ च महताम् एकरूपता?

उत्तरमहताम् (महापुरुषाणाम्)।

(घ) पशुना अपि कीदृशः गृह्यते?

उत्तरउदीरितः (अर्थः)।

(ङ) उदयसमये अस्तसमये च कः रक्तः भवति?

उत्तरसविता (सूर्यः)।

2. अधोलिखितानां प्रश्नानाम् उत्तराणि संस्कृतभाषया लिखत —

(क) केन समः बन्धुः नास्ति?

उत्तरउद्यमेन समः बन्धुः नास्ति। (उद्यमसमः बन्धुः नास्ति।)

(ख) वसन्तस्य गुणं कः जानाति?

उत्तरवसन्तस्य गुणं पिकः जानाति (वेत्ति)।

(ग) बुद्धयः कीदृश्यः भवन्ति?

उत्तरबुद्धयः परेङ्गितज्ञानफलाः भवन्ति। (बुद्धेः फलम् अन्येषाम् इङ्गितस्य ज्ञानम् अस्ति।)

(घ) नराणां प्रथमः शत्रुः कः?

उत्तरनराणां प्रथमः शत्रुः क्रोधः अस्ति।

(ङ) सुधियः सख्यं केन सह भवति?

उत्तरसुधियः सख्यं सुधीभिः सह भवति। (विद्वांसः विद्वद्भिः सह मैत्रीं कुर्वन्ति।)

(च) अस्माभिः कीदृशः वृक्षः सेवितव्यः?

उत्तरअस्माभिः फलच्छायासमन्वितः महावृक्षः सेवितव्यः।

3. अधोलिखिते अन्वयद्वये रिक्तस्थानपूर्तिं कुरुत —

उत्तर (क) यः निमित्तम् उद्दिश्य प्रकुप्यति, तस्य अपगमे सः ध्रुवं प्रसीदति। यस्य मनः अकारणद्वेषि अस्ति, जनः तं कथं परितोषयिष्यति? (ख) विचित्रे संसारे खलु किञ्चित् निरर्थकम् नास्ति। अश्वः चेत् धावने वीरः, खरः भारस्य वहने (वीरः) (भवति)।

4. अधोलिखितानां वाक्यानां कृते समानार्थकान् श्लोकांशान् पाठात् चित्वा लिखत —

(क) विद्वान् स एव भवति यः अनुक्तम् अपि तथ्यं जानाति।

उत्तरअनुक्तमप्यूहति पण्डितो जनः।

(ख) मनुष्यः समस्वभावैः जनैः सह मित्रतां करोति।

उत्तरसमान-शील-व्यसनेषु सख्यम्।

(ग) परिश्रमं कुर्वाणः नरः कदापि दुःखं न प्राप्नोति।

उत्तरनास्त्युद्यमसमो बन्धुः कृत्वा यं नावसीदति।

(घ) महान्तः जनाः सर्वदैव समप्रकृतयः भवन्ति।

उत्तरसम्पत्तौ च विपत्तौ च महतामेकरूपता।

5. यथानिर्देशं परिवर्तनं विधाय वाक्यानि रचयत —

(क) गुणी गुणं जानाति। (बहुवचने)

उत्तरगुणिनः गुणं जानन्ति।

(ख) पशुः उदीरितम् अर्थं गृह्णाति। (कर्मवाच्ये)

उत्तरपशुना उदीरितः अर्थः गृह्यते।

(ग) मृगाः मृगैः सह अनुव्रजन्ति। (एकवचने)

उत्तरमृगः मृगेण सह अनुव्रजति।

(घ) कः छायां निवारयति? (कर्मवाच्ये)

उत्तरकेन छाया निवार्यते?

(ङ) तेन एव वह्निना शरीरं दह्यते। (कर्तृवाच्ये)

उत्तरसः एव वह्निः शरीरं दहति।

6. (अ) सन्धिं / सन्धिविच्छेदं कुरुत —

उत्तर (क) न + अस्ति + उद्यमसमः → नास्त्युद्यमसमः (ख) तस्य + अपगमे → तस्यापगमे (ग) अनुक्तम् + अपि + ऊहति → अनुक्तमप्यूहति (घ) गावः + च → गावश्च (ङ) न + अस्ति → नास्ति (च) रक्तः + च + अस्तमये → रक्तश्चास्तमये (छ) योजकः + तत्र → योजकस्तत्र

6. (आ) समस्तपदं / विग्रहं लिखत —

पदम्विग्रहः / समस्तपदम् (उत्तर)
(क) उद्यमसमःउद्यमेन समः
(ख) शरीरे स्थितःशरीरस्थः
(ग) निर्बलःनिर्गतं बलं यस्मात् सः
(घ) देहस्य विनाशनायदेहविनाशनाय
(ङ) महावृक्षःमहान् च असौ वृक्षः
(च) समानं शीलं व्यसनं येषां तेषुसमान-शील-व्यसनेषु
(छ) अयोग्यःन योग्यः

7. (अ) अधोलिखितानां पदानां विलोमपदानि पाठात् चित्वा लिखत —

उत्तर (क) प्रसीदति × प्रकुप्यति (ख) मूर्खः × सुधीः (पण्डितः) (ग) बली × निर्बलः (घ) सुलभः × दुर्लभः (ङ) सम्पत्तौ × विपत्तौ (च) अस्तमये × उदये (छ) सार्थकम् × निरर्थकम्

7. (आ) संस्कृतेन वाक्यप्रयोगं कुरुत —

उत्तर (नमूना) (क) वायसः – वायसः वृक्षस्य शाखायाम् उपविशति। (ख) निमित्तम् – सः अल्पनिमित्तम् उद्दिश्य क्रुध्यति। (ग) सूर्यः – सूर्यः पूर्वदिशायाम् उदेति। (घ) पिकः – वसन्ते पिकः मधुरं कूजति। (ङ) वह्निः – वह्निः काष्ठं दहति।

परियोजनाकार्यम् —

(क) उद्यमस्य महत्त्वं वर्णयत। पञ्चश्लोकान् लिखत। अथवा – काचित् कथा या भवद्भिः पठिता स्यात्, यस्याम् उद्यमस्य महत्त्वं वर्णितम्, तां स्वभाषया लिखत।

मार्गदर्शनम्उद्यम (परिश्रम) के महत्त्व पर परिश्रम-सम्बन्धी पाँच सुप्रसिद्ध श्लोक लिखिए, जैसे – (1) ‘उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः। न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः॥’ (2) ‘आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः…॥’ (इसी पाठ का प्रथम श्लोक) (3) ‘उद्योगिनं पुरुषसिंहमुपैति लक्ष्मीः…॥’ (4) ‘काकचेष्टा बकोध्यानं श्वाननिद्रा तथैव च…॥’ (5) ‘न दैवमपि सञ्चिन्त्य त्यजेदुद्योगमात्मनः…॥’ अथवा – ‘कूर्म एवं खरगोश’ (कच्छप-शशक) जैसी प्रसिद्ध कथा अपनी भाषा में लिखिए, जिसमें निरन्तर परिश्रम करने वाला कछुआ आलसी खरगोश को दौड़ में हरा देता है – यही उद्यम का महत्त्व सिद्ध करता है।

(ख) निमित्तमुद्दिश्य यः प्रकुप्यति ध्रुवं स तस्यापगमे प्रसीदति। यदि भवता कदापि ईदृशः अनुभवः कृतः तर्हि स्वीकृतभाषया लिखत।

मार्गदर्शनम्अपने जीवन का कोई ऐसा अनुभव अपनी भाषा में लिखिए जहाँ किसी कारणवश आपको क्रोध आया हो और बाद में उस कारण के दूर हो जाने पर आप प्रसन्न हो गये हों। उदाहरण – “एक बार मेरा प्रिय मित्र मुझसे बिना बताये दूसरों के साथ खेलने चला गया, जिससे मुझे क्रोध आया। किन्तु जब मुझे ज्ञात हुआ कि वह मेरे लिए ही उपहार लाने गया था, तब मेरा क्रोध समाप्त हो गया और मैं प्रसन्न हो गया।” इस प्रकार अपना मौलिक अनुभव लिखें।

अतिरिक्त प्रश्न (Extra Questions)

लघु उत्तरीय प्रश्न (30–40 शब्द)

1. ‘सुभाषित’ किसे कहते हैं?

उत्तरसंस्कृत-साहित्य में जिन पद्यों के द्वारा सार्वभौम (सर्वत्र मान्य) सत्य को बड़े मार्मिक एवं अर्थगाम्भीर्ययुक्त ढंग से प्रकट किया जाता है, उन्हें सुभाषित कहते हैं। ‘सु’ (उत्तम) + ‘भाषित’ (कहा हुआ) – अर्थात् भली-भाँति कहा गया प्रेरणादायक वचन।

2. क्रोध को मनुष्य का प्रथम शत्रु क्यों कहा गया है?

उत्तरक्रोध शरीर में ही स्थित रहता है और लकड़ी में छिपी आग की भाँति शरीर को ही जला डालता है। जैसे लकड़ी में उत्पन्न अग्नि उसी लकड़ी का नाश करती है, वैसे ही क्रोध मनुष्य के अपने ही शरीर एवं विवेक का विनाश कर देता है; इसी कारण इसे प्रथम (आत्मघाती) शत्रु कहा गया है।

3. श्लोक के अनुसार मित्रता किनमें होती है?

उत्तरमित्रता समान स्वभाव (शील) एवं समान आदतों (व्यसनों) वालों में ही होती है। जैसे हिरण हिरणों के साथ, गायें गायों के साथ, घोड़े घोड़ों के साथ, मूर्ख मूर्खों के साथ तथा विद्वान् विद्वानों के साथ ही संगति करते हैं।

4. ‘अमन्त्रमक्षरं नास्ति’ श्लोक का मुख्य भाव क्या है?

उत्तरइस श्लोक का भाव यह है कि संसार में कोई भी वस्तु निरर्थक नहीं है – कोई अक्षर मन्त्र बनने योग्य न हो, कोई जड़ औषधि न हो, या कोई पुरुष अयोग्य हो – ऐसा नहीं है। केवल उन सबका सही उपयोग करने वाला ‘योजक’ ही दुर्लभ है।

5. महापुरुषों की तुलना सूर्य से क्यों की गई है?

उत्तरजैसे सूर्य उदय एवं अस्त दोनों समयों में समान रूप से लाल (रक्त) रहता है, वैसे ही महापुरुष सम्पत्ति (सुख) तथा विपत्ति (दुःख) दोनों दशाओं में अपना स्वभाव एक-सा (समान) बनाये रखते हैं। इसी समता (एकरूपता) के कारण उनकी तुलना सूर्य से की गई है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (100–120 शब्द)

6. ‘सुभाषितानि’ पाठ से क्या-क्या शिक्षाएँ मिलती हैं? अपने शब्दों में लिखिए।

उत्तर‘सुभाषितानि’ पाठ के दस श्लोक जीवन की अनेक मूल्यवान् शिक्षाएँ देते हैं। प्रथम शिक्षा यह है कि आलस्य सबसे बड़ा शत्रु तथा उद्यम (परिश्रम) सबसे बड़ा मित्र है। दूसरी शिक्षा है कि गुणी ही गुण को पहचानता है। तीसरी, अकारण द्वेष करने वाले को कोई सन्तुष्ट नहीं कर सकता।पाठ बताता है कि बुद्धिमान् संकेत-मात्र से ही सब समझ लेता है; क्रोध आत्मघाती है, अतः इसका त्याग करना चाहिए; मित्रता समान-स्वभाव वालों में ही होती है; तथा महान् पुरुष का आश्रय कभी निष्फल नहीं जाता। साथ ही, संसार में कोई वस्तु निरर्थक नहीं है – प्रत्येक का अपना उपयोग है – और श्रेष्ठ पुरुष सुख-दुःख दोनों में समान रहते हैं। इस प्रकार ये सुभाषित परिश्रम, सद्बुद्धि, संयम एवं समता का उपदेश देते हैं।

7. ‘सेवितव्यो महावृक्षः…’ श्लोक का भावार्थ लिखकर बताइए कि इससे क्या जीवन-शिक्षा मिलती है।

उत्तरइस श्लोक में कवि कहते हैं कि फल एवं छाया से युक्त बड़े वृक्ष का आश्रय लेना चाहिए। यदि दुर्भाग्यवश उस वृक्ष में फल न भी हो, तो भी उसकी शीतल छाया को कौन रोक सकता है? अर्थात् छाया का लाभ तो अवश्य मिलेगा।इससे यह जीवन-शिक्षा मिलती है कि हमें सदा किसी महान्, समर्थ एवं उदार व्यक्ति का आश्रय लेना चाहिए। महापुरुष का सान्निध्य कभी पूर्णतया निष्फल नहीं जाता – यदि एक प्रकार का लाभ न मिले, तो दूसरे प्रकार का लाभ अवश्य प्राप्त होता है। यहाँ ‘महावृक्ष’ महान् पुरुष का तथा ‘फल-छाया’ उससे प्राप्त होने वाले विविध लाभों का प्रतीक है। अतः हमें सत्संगति एवं श्रेष्ठ आश्रय का सदा आदर करना चाहिए।

8. श्लोक 2 ‘गुणी गुणं वेत्ति…’ में निहित भाव को उदाहरणों सहित स्पष्ट कीजिए।

उत्तरइस श्लोक का मूल भाव यह है कि किसी की योग्यता का सच्चा मूल्यांकन समान योग्यता वाला ही कर सकता है। गुणवान् व्यक्ति ही गुण को पहचानता है, गुणहीन नहीं; बलवान् ही बल को जानता है, निर्बल नहीं।कवि इसे प्राकृतिक उदाहरणों से स्पष्ट करते हैं – वसन्त ऋतु की मधुरता एवं गुण को कोयल पहचानती है, कौआ नहीं; तथा सिंह के अपार बल को हाथी जानता है, छोटा-सा चूहा नहीं। तात्पर्य यह कि गुणों का आदर एवं पहचान सुयोग्य, गुणग्राही व्यक्ति ही कर सकता है। अयोग्य या ईर्ष्यालु व्यक्ति दूसरे के गुणों की उपेक्षा कर देता है। अतः हमें गुणग्राही एवं विवेकशील बनना चाहिए।

MCQ & अभिकथन-कारण

1. मनुष्याणां शरीरस्थः महान् रिपुः कः?

(क) क्रोधः

(ख) आलस्यम्

(ग) लोभः

(घ) मोहः

उत्तर(ख) आलस्यम्।

2. वसन्तस्य गुणं कः जानाति?

(क) वायसः

(ख) मूषकः

(ग) पिकः

(घ) करी

उत्तर(ग) पिकः (कोयल)।

3. ‘करी’ पदस्य अर्थः कः?

(क) सिंहः

(ख) गजः (हाथी)

(ग) अश्वः

(घ) मूषकः

उत्तर(ख) गजः (हाथी)।

4. नराणां प्रथमः शत्रुः कः कथितः?

(क) आलस्यम्

(ख) क्रोधः

(ग) निर्धनता

(घ) अज्ञानम्

उत्तर(ख) क्रोधः। (क्रोधो हि शत्रुः प्रथमो नराणाम्)

5. सख्यं केषु भवति?

(क) विषमशीलेषु

(ख) धनिकेषु

(ग) समान-शील-व्यसनेषु

(घ) बलिषु एव

उत्तर(ग) समान-शील-व्यसनेषु।

6. उदये अस्तमये च कः रक्तः भवति?

(क) चन्द्रः

(ख) सविता (सूर्यः)

(ग) मेघः

(घ) गगनम्

उत्तर(ख) सविता (सूर्यः)।

7. ‘खरः’ पदस्य अर्थः कः?

(क) अश्वः

(ख) गर्दभः (गधा)

(ग) उष्ट्रः

(घ) वृषभः

उत्तर(ख) गर्दभः (गधा)।

8. पण्डितः जनः किम् अपि ऊहति?

(क) उक्तम्

(ख) अनुक्तम्

(ग) लिखितम्

(घ) श्रुतम्

उत्तर(ख) अनुक्तम्। (अनुक्तमप्यूहति पण्डितो जनः)

9. कीदृशः वृक्षः सेवितव्यः?

(क) शुष्कः

(ख) निष्फलः

(ग) फलच्छायासमन्वितः

(घ) कण्टकयुक्तः

उत्तर(ग) फलच्छायासमन्वितः महावृक्षः।

10. श्लोकानुसारं किं दुर्लभम्?

(क) अक्षरम्

(ख) मूलम्

(ग) पुरुषः

(घ) योजकः

उत्तर(घ) योजकः। (अयोग्यः पुरुषः नास्ति, योजकस्तत्र दुर्लभः)
उत्तर-कुंजी: 1-(ख), 2-(ग), 3-(ख), 4-(ख), 5-(ग), 6-(ख), 7-(ख), 8-(ख), 9-(ग), 10-(घ)

अभिकथन-कारण – नीचे अभिकथन (A) और कारण (R) दिए गए हैं। सही विकल्प चुनिए—
(क) A और R दोनों सही, R, A की सही व्याख्या है। (ख) A और R दोनों सही, पर R, A की सही व्याख्या नहीं। (ग) A सही, R गलत। (घ) A गलत, R सही।

1. अभिकथन (A): आलस्य मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है।

कारण (R): उद्यम (परिश्रम) के समान कोई बन्धु नहीं है, जिसे करके मनुष्य कभी दुःखी नहीं होता।

उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है।

2. अभिकथन (A): क्रोध मनुष्य का प्रथम शत्रु है।

कारण (R): क्रोध बाहरी शत्रु है जो दूसरों को ही हानि पहुँचाता है, स्वयं को नहीं।

उत्तर(ग) A सही है, किन्तु R गलत है – क्रोध शरीर में ही स्थित रहकर लकड़ी की आग की भाँति अपने ही शरीर को जला डालता है।

3. अभिकथन (A): गुणी ही गुण को पहचानता है।

कारण (R): वसन्त के गुण को कोयल पहचानती है, कौआ नहीं।

उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या (उदाहरण द्वारा) करता है।

4. अभिकथन (A): संसार में कोई वस्तु निरर्थक नहीं है।

कारण (R): घोड़ा दौड़ने में श्रेष्ठ है तो गधा भार ढोने में श्रेष्ठ है।

उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है।

5. अभिकथन (A): महापुरुष सम्पत्ति एवं विपत्ति दोनों में एक-समान रहते हैं।

कारण (R): सूर्य उदय एवं अस्त दोनों समय लाल (रक्त) रहता है।

उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या (उपमा द्वारा) करता है।
अभिकथन-कारण उत्तर-कुंजी: 1-(क), 2-(ग), 3-(क), 4-(क), 5-(क)

परीक्षा-युक्तियाँ एवं सामान्य गलतियाँ

परीक्षा-युक्तियाँ (Exam Tips)

  • दसों श्लोक उनके अन्वय एवं भावार्थ सहित कण्ठस्थ करें – श्लोक-पूर्ति, अन्वय एवं भावार्थ के प्रश्न प्रायः यहीं से आते हैं।
  • प्रत्येक श्लोक का केन्द्रीय भाव एक पंक्ति में याद रखें (1-आलस्य, 2-गुणग्राहिता, 3-अकारण द्वेष, 4-बुद्धि, 5-क्रोध, 6-समान संगति, 7-महान् का आश्रय, 8-उपयोगिता, 9-समता, 10-सबकी सार्थकता)।
  • कठिन शब्दों के पर्याय याद रखें – वायसः=काकः, करी/नागः=गजः, हयः/तुरगः=अश्वः, सविता=सूर्यः, खरः=गर्दभः, सुधीः=विद्वान्।
  • ‘एकपदेन उत्तरम्’ में एक ही पद लिखें तथा ‘संस्कृतभाषया’ पूछे जाने पर पूरा वाक्य संस्कृत में लिखें।
  • सन्धि, समास, वाच्य-परिवर्तन एवं विलोम-पद के प्रश्नों का नियमित अभ्यास करें।

सामान्य गलतियाँ (Common Mistakes)

  • श्लोकों का क्रम एवं संख्या (॥१॥ … ॥१०॥) बदल देना।
  • पर्यायवाची शब्दों में भ्रम – ‘करी’ को सिंह तथा ‘खर’ को घोड़ा समझ लेना।
  • क्रोध को बाह्य शत्रु मान लेना, जबकि श्लोक में वह ‘देहस्थितः’ (शरीर में स्थित) आत्मघाती शत्रु है।
  • संयुक्ताक्षर एवं विसर्ग-सन्धि में भूल – ‘रक्तश्चास्तमये’, ‘नास्त्युद्यमसमो’ शुद्ध लिखें।
  • वाच्य-परिवर्तन में कर्ता एवं कर्म की विभक्ति गलत लगाना।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

शेमुषी कक्षा 10 का पाँचवाँ पाठ ‘सुभाषितानि’ किस विषय पर आधारित है?

यह पाठ विभिन्न संस्कृत-ग्रन्थों से संकलित दस सुभाषितों (नीति-पद्यों) का संग्रह है। इनमें परिश्रम का महत्त्व, क्रोध का दुष्प्रभाव, समान-स्वभाव वालों की मित्रता, सभी वस्तुओं की उपयोगिता तथा बुद्धि की विशेषता जैसे जीवनोपयोगी विषयों पर प्रकाश डाला गया है।

‘सुभाषित’ का क्या अर्थ है?

‘सु’ (उत्तम) + ‘भाषित’ (कहा हुआ) = उत्तम रीति से कहा गया वचन। ये अर्थगाम्भीर्ययुक्त, छन्दोबद्ध एवं प्रेरणात्मक पद्य होते हैं जो सार्वभौम सत्य को मार्मिक ढंग से प्रकट करते हैं।

क्रोध को शरीर का नाश करने वाला प्रथम शत्रु क्यों कहा गया है?

क्योंकि क्रोध शरीर में ही स्थित रहता है और लकड़ी में छिपी आग की भाँति उसी लकड़ी (शरीर) को जला डालता है। अतः क्रोध आत्मघाती है, यह मनुष्य के अपने ही विवेक एवं शरीर का विनाश कर देता है।

श्लोक, अन्वय, शब्दार्थ एवं अभ्यासः के प्रश्न NCERT शेमुषी (द्वितीयो भागः) पुस्तक से ज्यों-के-त्यों लिए गए हैं; भावार्थ एवं उत्तर ClearStudy द्वारा मौलिक रूप से तैयार किए गए हैं।

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