NCERT Solutions for Class 10 Sanskrit (Shemushi) पाठः 7: विचित्रः साक्षी

यह पृष्ठ कक्षा 10 संस्कृत शेमुषी (द्वितीयो भागः) के सप्तम पाठ ‘विचित्रः साक्षी’ का सम्पूर्ण समाधान प्रस्तुत करता है। यह पाठ श्री ओमप्रकाश ठाकुर द्वारा रचित कथा का सम्पादित अंश है, जो बंगसाहित्यकार बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय द्वारा न्यायाधीश के रूप में दिए गए एक निर्णय पर आधारित है। यहाँ पाठ-परिचय, मूल कथा का सार, शब्दार्थ, सम्पूर्ण अभ्यासः के उत्तर (प्रत्येक प्रश्न ज्यों-का-त्यों), 5 लघु + 3 दीर्घ अतिरिक्त प्रश्न, 10 बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQ) सहित उत्तर-कुंजी, 5 अभिकथन-कारण (A-R) तथा FAQ दिए गए हैं (NCERT 2026–27)।

कक्षा (Class): 10 विषय (Subject): संस्कृत (Sanskrit) पुस्तक (Book): Shemushi (द्वितीयो भागः) पाठः: 7 – विचित्रः साक्षी विधा: कथा (गद्य) सत्र (Session): 2026–27

पाठ का अवलोकन (Chapter Overview)

शेमुषी (द्वितीयो भागः) कक्षा 10 का सप्तम पाठ ‘विचित्रः साक्षी’ (अद्भुत गवाह) एक रोचक कथा है। एक निर्धन व्यक्ति अपने रुग्ण पुत्र को देखने पैदल जाते समय रात में किसी गृहस्थ के यहाँ ठहरता है। उसी रात उस घर में चोरी हो जाती है। असली चोर (जो गाँव का आरक्षी ही है) स्वयं ‘चोर-चोर’ चिल्लाकर उस निर्दोष अतिथि को चोर बताकर कारागार में डाल देता है। अगले दिन मार्ग में एक शव मिलता है; न्यायाधीश बंकिमचन्द्र आरक्षी एवं अभियुक्त (अतिथि) दोनों को शव ढोकर न्यायालय लाने का आदेश देते हैं। बोझ ढोते समय आरक्षी अतिथि का उपहास करता है और मञ्जूषा-चोरी की बात फिर दोहरा देता है। न्यायालय में वही शव गवाह बन जाता है – जब अतिथि ने आरक्षी के मार्ग में कहे शब्दों का वर्णन किया, तब न्यायाधीश ने सत्य जान लिया और आरक्षी को दण्ड देकर निर्दोष अतिथि को सम्मानपूर्वक मुक्त कर दिया। पाठ का सन्देश है कि बुद्धि-वैभव से सम्पन्न व्यक्ति प्रमाण के अभाव में भी युक्ति से न्याय कर सकते हैं।

पाठ-परिचय / लेखक-परिचय

प्रस्तुत पाठ श्री ओमप्रकाश ठाकुर द्वारा रचित कथा का सम्पादित अंश है। यह कथा बंगला के प्रसिद्ध साहित्यकार बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय (चटर्जी) द्वारा न्यायाधीश के रूप में दिए गए एक निर्णय पर आधारित है। सत्य-असत्य का निर्णय करने के लिए न्यायकर्ता कभी-कभी ऐसी युक्तियों का प्रयोग करते हैं, जिनसे प्रमाण के बिना भी न्याय हो सके। इस कथा में भी न्यायाधीश ने वैसी ही एक विचित्र युक्ति अपनाई। मूलतः बंकिमचन्द्र हुगली ज़िले में डिप्टी मजिस्ट्रेट रहे थे; उनकी न्यायप्रियता एवं बुद्धिकौशल की अनेक कथाएँ प्रसिद्ध हैं। पाठ सरल एवं प्रवाहपूर्ण संस्कृत-गद्य में लिखा गया है, जिसका केन्द्रीय भाव है – नीति एवं युक्ति का आश्रय लेकर बुद्धिमान व्यक्ति कठिन कार्यों को भी सरलता से सिद्ध कर लेते हैं।

सार एवं भावार्थ (Hindi Summary)

एक निर्धन व्यक्ति ने बहुत परिश्रम करके थोड़ा-सा धन कमाया और उससे अपने पुत्र को एक महाविद्यालय में प्रवेश दिलाने में सफल हुआ। पुत्र वहीं छात्रावास में रहकर अध्ययन में लगा रहा। एक बार पिता को पुत्र की बीमारी का समाचार मिला, तो वह व्याकुल होकर पुत्र को देखने चल पड़ा। धन के अभाव के कारण वह बस छोड़कर पैदल ही चलने लगा। सायंकाल तक भी वह गन्तव्य से दूर था, और ‘रात के अँधेरे में सुनसान स्थान में पैदल यात्रा शुभ नहीं होती’ – यह सोचकर उसने पास के गाँव में किसी गृहस्थ के घर रात बिताने का निश्चय किया। दयालु गृहस्थ ने उसे आश्रय दे दिया।

दैव की गति विचित्र है। उसी रात उस घर में एक चोर घुस आया और वहाँ रखी एक मञ्जूषा (पेटी/सन्दूक) लेकर भाग गया। चोर के पैरों की आहट से जागे हुए अतिथि ने चोर-शंका से उसका पीछा किया और उसे पकड़ भी लिया, परन्तु तभी एक विचित्र घटना घटी – चोर ही ज़ोर-ज़ोर से ‘चोर है, चोर है’ चिल्लाने लगा। उसके तीव्र स्वर से जागे ग्रामवासी अपने घरों से निकलकर वहाँ आ गए और बेचारे अतिथि को ही चोर मानकर भला-बुरा कहने लगे। वस्तुतः वह चोर गाँव का आरक्षी (रक्षक-पुरुष/सिपाही) ही था। उसी क्षण रक्षापुरुष ने उस अतिथि को ‘यही चोर है’ घोषित कर कारागार में डाल दिया।

अगले दिन आरक्षी अतिथि को चोरी के अभियोग में न्यायालय ले गया। न्यायाधीश बंकिमचन्द्र ने दोनों से अलग-अलग विवरण सुना। सारा वृत्तान्त जानकर उन्होंने अतिथि को निर्दोष और आरक्षी को दोषी माना, किन्तु प्रमाण के अभाव में निर्णय नहीं कर सके। तभी एक कर्मचारी ने आकर सूचना दी कि दो कोस की दूरी पर राजमार्ग के पास किसी व्यक्ति का मृत शरीर पड़ा है। न्यायाधीश ने आरक्षी एवं अभियुक्त दोनों को वह शव न्यायालय में लाने का आदेश दिया। आरक्षी हृष्ट-पुष्ट था, अभियुक्त अत्यन्त दुबला। भारी शव ढोते समय आरक्षी ने अतिथि का उपहास किया और कहा – ‘रे दुष्ट! उस दिन तूने मुझे चुराई हुई मञ्जूषा लेने से रोका था; अब अपने कर्म का फल भोग, इस चोरी के अभियोग में तुझे तीन वर्ष का कारादण्ड मिलेगा।’ — ऐसा कहकर वह ज़ोर से हँसा।

न्यायालय में जब न्यायाधीश ने दोनों से घटना के विषय में बोलने को कहा, तब एक आश्चर्य हुआ – वह शव अपना ओढ़ने का वस्त्र हटाकर उठ खड़ा हुआ और न्यायाधीश को प्रणाम कर बोला – ‘मान्यवर! इस आरक्षी ने मार्ग में जो कहा, वही मैं बताता हूँ – तूने मुझे चुराई हुई मञ्जूषा लेने से रोका था, इसलिए अपने कर्म का फल भोग; इस चोरी के अभियोग में तुझे तीन वर्ष का कारादण्ड मिलेगा।’ इस प्रकार वही (शव बना हुआ) व्यक्ति ही इस कथा का ‘विचित्र साक्षी’ था। न्यायाधीश ने आरक्षी को कारादण्ड देकर उस निर्दोष अतिथि को सम्मानपूर्वक मुक्त कर दिया। इसीलिए कहा जाता है – ‘दुष्कराणि अपि कर्माणि मतिवैभवशालिनः। नीतिं युक्तिं समालम्ब्य लीलयैव प्रकुर्वते॥’ अर्थात् बुद्धि-वैभव से सम्पन्न व्यक्ति नीति एवं युक्ति का आश्रय लेकर कठिन कार्यों को भी खेल-खेल में कर लेते हैं।

शब्दार्थ (Word-meanings)

शब्दः (Sanskrit)अर्थः (हिन्दी)Meaning (English)
भूरिअत्यधिक, पर्याप्तPlenty / much
उपार्जितवान्कमायाEarned
निवसन्रहते हुएWhile residing
विजने प्रदेशेएकान्त (सुनसान) स्थान मेंIn a desolate place
शुभावहाकल्याणकारीAuspicious / charitable
गृहीगृहस्वामी, गृहस्थHouseholder
दैवगतिःभाग्य की लीलाDestiny / fate
पलायितःभाग गया, चला गयाRan away
प्रबुद्धःजागा हुआAwakened
अर्थकार्श्येनधन के अभाव के कारणDue to scarcity of money
पदातिरेवपैदल हीOn foot only
निहिताम्रखी हुईPlaced / kept
अन्वधावत्पीछे-पीछे दौड़ाHe followed (ran after)
क्रोशितुम्ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाने कोTo shout
तारस्वरेणऊँचे (तीव्र) स्वर सेLoudly
अभर्त्सयन्भला-बुरा कहा, धिक्काराThey criticized / rebuked
चौर्याभियोगेचोरी के आरोप मेंOn an allegation of stealing
अवगत्यजानकरKnowing
दोषभाजनम्दोषी, दोष का पात्रCulprit
उपस्थातुम्उपस्थित होने कोTo be present
आरक्षिणम्सैनिक/रक्षक-पुरुष कोTo the guard (policeman)
क्रोशद्वयान्तरालेदो कोस की दूरी परAt a distance of about two miles
उपेत्यपास जाकरGoing near
काष्ठपटलेलकड़ी के तख्ते परOn a wooden board
पटाच्छादितम्कपड़े से ढका हुआCovered by cloth
कृशकायःदुर्बल शरीर वालाOf lean body
भारवेदनयाबोझ की पीड़ा सेBy the pain of the load
क्रन्दनम्रोना, रुदनWeeping
निशम्यसुनकरListening / hearing
मुदितःप्रसन्नHappy / pleased
चत्वरेचौराहे परAt the square / crossroads
लप्स्यसेप्राप्त करोगेYou will get
प्रावारकम्ऊपर ओढ़ा हुआ वस्त्रCovering cloth / mantle
अपसार्यहटाकर, दूर करकेRemoving
अभिवाद्यअभिवादन (प्रणाम) करकेSaluting
अध्वनिमार्ग में, रास्ते मेंOn the way
वारितःरोका गयाStopped / prevented
मुक्तवान्छोड़ दिया, मुक्त कियाReleased
समालम्ब्यसहारा/आश्रय लेकरTaking recourse to
लीलयैवखेल-खेल में, अनायास हीIn a flash / effortlessly
मतिवैभवशालिनःबुद्धि-वैभव से सम्पन्न (विद्वान्)The intellectually gifted

अभ्यासः के उत्तर (Exercise Solutions)

1. एकपदेन उत्तरं लिखत —

(क) कीदृशे प्रदेशे पदयात्रा न सुखावहा?

उत्तरम्विजने (निशान्धकारे विजने प्रदेशे) ।

(ख) अतिथिः केन प्रबुद्धः?

उत्तरम्पादध्वनिना (चौरस्य पादध्वनिना) ।

(ग) कृशकायः कः आसीत्?

उत्तरम्अभियुक्तः (अतिथिः) ।

(घ) न्यायाधीशः कस्मै कारागारदण्डम् आदिष्टवान्?

उत्तरम्आरक्षिणे

(ङ) कं निकषा मृतशरीरम् आसीत्?

उत्तरम्राजमार्गम् (राजमार्गं निकषा) ।

2. अधोलिखितानां प्रश्नानाम् उत्तराणि संस्कृतभाषया लिखत —

(क) निर्धनः जनः कथं वित्तम् उपार्जितवान्?

उत्तरम्निर्धनः जनः भूरि परिश्रम्य किञ्चित् वित्तम् उपार्जितवान् ।

(ख) जनः किमर्थं पदातिः गच्छति?

उत्तरम्सः जनः अर्थकार्श्येन (धनस्य अभावेन) पीडितः सन् बसयानं विहाय पदातिः एव गच्छति ।

(ग) प्रसृते निशान्धकारे स किम् अचिन्तयत्?

उत्तरम्प्रसृते निशान्धकारे सः अचिन्तयत् यत् — ‘विजने प्रदेशे पदयात्रा न शुभावहा’, इति विचार्य च सः पार्श्वस्थे ग्रामे रात्रिनिवासं कर्तुम् ऐच्छत् ।

(घ) वस्तुतः चौरः कः आसीत्?

उत्तरम्वस्तुतः चौरः ग्रामस्य आरक्षी (रक्षापुरुषः) एव आसीत् ।

(ङ) जनस्य क्रन्दनं निशम्य आरक्षी किमुक्तवान्?

उत्तरम्जनस्य क्रन्दनं निशम्य आरक्षी उक्तवान् — ‘रे दुष्ट! तस्मिन् दिने त्वया अहं चोरितायाः मञ्जूषायाः ग्रहणात् वारितः। इदानीं निजकृत्यस्य फलं भुङ्क्ष्व। अस्मिन् चौर्याभियोगे त्वं वर्षत्रयस्य कारादण्डं लप्स्यसे’ इति ।

(च) मतिवैभवशालिनः दुष्कराणि कार्याणि कथं साधयन्ति?

उत्तरम्मतिवैभवशालिनः नीतिं युक्तिं च समालम्ब्य लीलया एव दुष्कराणि कार्याणि साधयन्ति ।

3. रेखाङ्कितपदमाधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत —

(क) पुत्रं द्रष्टुं सः प्रस्थितः।

उत्तरम्कं द्रष्टुं सः प्रस्थितः?

(ख) करुणापरो गृही तस्मै आश्रयं प्रायच्छत्।

उत्तरम्करुणापरो गृही तस्मै किं प्रायच्छत्?

(ग) चौरस्य पादध्वनिना अतिथिः प्रबुद्धः।

उत्तरम्कस्य पादध्वनिना अतिथिः प्रबुद्धः?

(घ) न्यायाधीशः बंकिमचन्द्रः आसीत्।

उत्तरम्न्यायाधीशः कः आसीत्?

(ङ) सः भारवेदनया क्रन्दति स्म।

उत्तरम्सः कया क्रन्दति स्म?

(च) उभौ शवं चत्वरे स्थापितवन्तौ।

उत्तरम्उभौ शवं कुत्र स्थापितवन्तौ?

4. यथानिर्देशम् उत्तरत —

(क) ‘आदेशं प्राप्य उभौ अचलताम्’ – अत्र किं कर्तृपदम्?

उत्तरम्कर्तृपदम् — उभौ

(ख) ‘एतेन आरक्षिणा अध्वनि यदुक्तं तत् वर्णयामि’ – अत्र ‘मार्गे’ इत्यर्थे किं पदं प्रयुक्तम्?

उत्तरम्अध्वनि

(ग) ‘करुणापरो गृही तस्मै आश्रयं प्रायच्छत्’ – अत्र ‘तस्मै’ इति सर्वनामपदं कस्मै प्रयुक्तम्?

उत्तरम्निर्धनाय जनाय (अतिथये)

(घ) ‘ततोऽसौ तौ अग्रिमे दिने उपस्थातुम् आदिष्टवान्’ – अस्मिन् वाक्ये किं क्रियापदम्?

उत्तरम्क्रियापदम् — आदिष्टवान्

(ङ) ‘दुष्कराण्यपि कर्माणि’ – अत्र विशेष्यपदं किम्?

उत्तरम्विशेष्यपदम् — कर्माणि (विशेषणम् – दुष्कराणि) ।

5. सन्धिं/सन्धिविच्छेदं च कुरुत —

उत्तरम् (क) पदातिरेव = पदातिः + एव (विसर्ग/रुत्व-उत्व सन्धि) (ख) निशान्धकारे = निशा + अन्धकारे (दीर्घ/सवर्ण-दीर्घ सन्धि) (ग) अभि + आगतम् = अभ्यागतम् (यण् सन्धि) (घ) भोजन + अन्ते = भोजनान्ते (दीर्घ/सवर्ण-दीर्घ सन्धि) (ङ) चौरोऽयम् = चौरः + अयम् (विसर्ग/गुण & पूर्वरूप सन्धि) (च) गृह + अभ्यन्तरे = गृहाभ्यन्तरे (दीर्घ/सवर्ण-दीर्घ सन्धि) (छ) लीलयैव = लीलया + एव (वृद्धि सन्धि) (ज) यदुक्तम् = यत् + उक्तम् (जश्त्व/श्चुत्व व्यञ्जन सन्धि) (झ) प्रबुद्धः + अतिथिः = प्रबुद्धोऽतिथिः (विसर्ग/गुण & पूर्वरूप सन्धि)

6. अधोलिखितानि पदानि भिन्न-भिन्नप्रत्ययान्तानि सन्ति। तानि पृथक् कृत्वा निर्दिष्टानां प्रत्ययानाम् अधः लिखत —

पदानि – परिश्रम्य, उपार्जितवान्, दापयितुम्, प्रस्थितः, द्रष्टुम्, विहाय, पृष्टवान्, प्रविष्टः, आदाय, क्रोशितुम्, नियुक्तः, नीतवान्, निर्णेतुम्, आदिष्टवान्, समागत्य, मुदितः।

ल्यप् (Lyap)क्त (Kta)क्तवतु (Ktavatu)तुमुन् (Tumun)
परिश्रम्यप्रस्थितःउपार्जितवान्दापयितुम्
विहायप्रविष्टःपृष्टवान्द्रष्टुम्
आदायनियुक्तःनीतवान्क्रोशितुम्
समागत्यमुदितःआदिष्टवान्निर्णेतुम्

7. (अ) अधोलिखितानि वाक्यानि बहुवचने परिवर्तयत —

(क) सः बसयानं विहाय पदातिरेव गन्तुं निश्चयं कृतवान्।

उत्तरम्ते बसयानं विहाय पदातयः एव गन्तुं निश्चयं कृतवन्तः

(ख) चौरः ग्रामे नियुक्तः राजपुरुषः आसीत्।

उत्तरम्चौराः ग्रामे नियुक्ताः राजपुरुषाः आसन्

(ग) कश्चन चौरः गृहाभ्यन्तरं प्रविष्टः।

उत्तरम्केचन चौराः गृहाभ्यन्तरं प्रविष्टाः

(घ) अन्येद्युः तौ न्यायालये स्व-स्व-पक्षं स्थापितवन्तौ।

उत्तरम्अन्येद्युः ते न्यायालये स्व-स्व-पक्षं स्थापितवन्तः

7. (आ) कोष्ठके दत्तेषु पदेषु यथानिर्दिष्टां विभक्तिं प्रयुज्य रिक्तस्थानानि पूरयत —

उत्तरम् (क) सः गृहात् निष्क्रम्य बहिरगच्छत्। (गृहशब्दे पञ्चमी) (ख) गृहस्थः अतिथये आश्रयं प्रायच्छत्। (अतिथिशब्दे चतुर्थी) (ग) तौ न्यायाधिकारिणम् प्रति प्रस्थितौ। (न्यायाधिकारिन्-शब्दे द्वितीया) (घ) अस्मिन् चौर्याभियोगे त्वं वर्षत्रयस्य कारादण्डं लप्स्यसे। (इदम्-शब्दे सप्तमी) (ङ) चौरस्य पादध्वनिना प्रबुद्धः अतिथिः। (पादध्वनिशब्दे तृतीया)

अतिरिक्त प्रश्न (Extra Questions)

लघु उत्तरीय प्रश्न (30–40 शब्द)

1. इस पाठ के लेखक कौन हैं तथा यह कथा किस पर आधारित है?

उत्तरइस पाठ के लेखक श्री ओमप्रकाश ठाकुर हैं। यह बंगला के प्रसिद्ध साहित्यकार बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय द्वारा न्यायाधीश के रूप में दिए गए एक निर्णय पर आधारित कथा का सम्पादित अंश है।

2. निर्धन व्यक्ति पैदल यात्रा क्यों कर रहा था?

उत्तरवह निर्धन व्यक्ति धन के अभाव (अर्थकार्श्य) के कारण बस आदि वाहन का व्यय वहन नहीं कर सका, इसलिए बस छोड़कर अपने रुग्ण पुत्र को देखने के लिए पैदल ही चल पड़ा था।

3. असली चोर कौन था और उसने क्या चालाकी की?

उत्तरअसली चोर गाँव का आरक्षी (रक्षापुरुष) ही था। मञ्जूषा चुराकर भागते हुए जब अतिथि ने उसका पीछा कर उसे पकड़ा, तब वह स्वयं ही ‘चोर है, चोर है’ चिल्लाकर निर्दोष अतिथि को चोर घोषित कर कारागार में डाल देता है।

4. इस कथा में ‘विचित्र साक्षी’ कौन है और क्यों?

उत्तरयहाँ ‘विचित्र साक्षी’ वह शव (मृत-देह बना हुआ व्यक्ति) है, जिसे न्यायाधीश ने प्रमाण-संग्रह के लिए नियुक्त किया था। वही जीवित होकर उठ खड़ा हुआ और आरक्षी के मार्ग में कहे शब्द सुनाकर सत्य प्रकट कर देता है, इसी कारण वह विचित्र (अद्भुत) गवाह कहलाता है।

5. न्यायाधीश ने अन्त में क्या निर्णय दिया?

उत्तरसत्य जान लेने पर न्यायाधीश ने दोषी आरक्षी को कारादण्ड (कारागार-दण्ड) देने का आदेश दिया तथा निर्दोष अतिथि को सम्मानपूर्वक मुक्त कर दिया।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (100–120 शब्द)

6. ‘विचित्रः साक्षी’ कथा का सार अपने शब्दों में लिखिए।

उत्तरएक निर्धन व्यक्ति अपने रुग्ण पुत्र को देखने पैदल जाते समय रात में किसी गृहस्थ के घर ठहरता है। उसी रात एक चोर वहाँ रखी मञ्जूषा चुराकर भाग जाता है। अतिथि उसका पीछा कर पकड़ लेता है, पर चोर ही ‘चोर-चोर’ चिल्लाकर अतिथि को फँसा देता है; वस्तुतः वह चोर गाँव का आरक्षी था।अगले दिन न्यायाधीश बंकिमचन्द्र दोनों को राजमार्ग के पास पड़ा शव न्यायालय लाने का आदेश देते हैं। बोझ ढोते समय आरक्षी अतिथि का उपहास करता है और मञ्जूषा-चोरी की बात दोहराता है। न्यायालय में वही शव जीवित होकर आरक्षी के शब्दों को दोहरा देता है। इस प्रकार सत्य प्रकट होता है; न्यायाधीश आरक्षी को दण्ड देकर निर्दोष अतिथि को मुक्त कर देते हैं। कथा का सन्देश है – बुद्धिमान व्यक्ति युक्ति से कठिन कार्य भी सहज कर लेते हैं।

7. न्यायाधीश ने सत्य का पता लगाने के लिए कौन-सी युक्ति अपनाई? यह क्यों सफल रही?

उत्तरप्रमाण के अभाव में न्यायाधीश निर्णय नहीं कर पा रहे थे। तभी राजमार्ग के पास एक शव मिलने की सूचना मिली। न्यायाधीश ने आरक्षी एवं अभियुक्त दोनों को वह शव ढोकर न्यायालय लाने का आदेश दिया। वस्तुतः वह शव एक नियुक्त (प्रच्छन्न) व्यक्ति था, जो साक्ष्य जुटाने के लिए मृत बनकर पड़ा था।हृष्ट-पुष्ट आरक्षी ने दुर्बल अतिथि का उपहास करते हुए मार्ग में मञ्जूषा-चोरी की बात स्वयं दोहरा दी। यही गुप्त साक्षी सब सुन रहा था। न्यायालय में उसने उठकर आरक्षी के शब्द ज्यों-के-त्यों सुना दिए, जिससे आरक्षी की दुष्टता प्रमाणित हो गई। इस प्रकार बुद्धि-युक्ति के बल पर प्रमाण के अभाव में भी न्याय सम्भव हुआ – यही इस युक्ति की सफलता का कारण है।

8. इस पाठ से हमें क्या शिक्षा/सन्देश मिलता है?

उत्तरइस पाठ से अनेक शिक्षाएँ मिलती हैं। प्रथम, न्याय प्रमाण पर आधारित होता है, किन्तु बुद्धि-वैभव से सम्पन्न व्यक्ति प्रमाण के अभाव में भी युक्ति का आश्रय लेकर सत्य तक पहुँच सकते हैं – ‘दुष्कराण्यपि कर्माणि मतिवैभवशालिनः नीतिं युक्तिं समालम्ब्य लीलयैव प्रकुर्वते’।द्वितीय, सत्य कभी छिपता नहीं; अपराधी अपनी ही चालाकी से पकड़ा जाता है, जैसे आरक्षी अपने ही शब्दों से दोषी सिद्ध हुआ। तृतीय, न्यायाधीश को धैर्य, विवेक एवं निष्पक्षता से कार्य करना चाहिए। साथ ही, रक्षक के पद पर बैठा व्यक्ति यदि भ्रष्ट हो जाए तो समाज के लिए घातक होता है। इस प्रकार पाठ सत्य, न्याय एवं बुद्धिकौशल की महत्ता का सुन्दर सन्देश देता है।

MCQ & अभिकथन-कारण

1. इस पाठ के रचयिता (लेखक) कौन हैं?

(क) बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय

(ख) श्री ओमप्रकाश ठाकुर

(ग) रवीन्द्रनाथ ठाकुर

(घ) कालिदासः

उत्तर(ख) श्री ओमप्रकाश ठाकुर।

2. यह कथा किसके द्वारा दिए गए निर्णय पर आधारित है?

(क) बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय

(ख) चाणक्यस्य

(ग) विक्रमादित्यस्य

(घ) तेनालिरामस्य

उत्तर(क) बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय।

3. वस्तुतः चोर कौन था?

(क) अतिथिः

(ख) गृहस्वामी

(ग) आरक्षी (रक्षापुरुषः)

(घ) पुत्रः

उत्तर(ग) आरक्षी (रक्षापुरुषः)।

4. निर्धन व्यक्ति पैदल क्यों चल रहा था?

(क) स्वास्थ्य के लिए

(ख) धन के अभाव (अर्थकार्श्य) के कारण

(ग) मार्ग सुन्दर था

(घ) बस उपलब्ध नहीं थी

उत्तर(ख) धन के अभाव (अर्थकार्श्य) के कारण।

5. अतिथि किसकी आहट से जागा?

(क) वायोः

(ख) गृहस्वामिनः

(ग) चौरस्य पादध्वनिना

(घ) ग्रामवासिनाम्

उत्तर(ग) चौरस्य पादध्वनिना।

6. न्यायाधीश ने दोनों को क्या लाने का आदेश दिया?

(क) धनम्

(ख) मञ्जूषाम्

(ग) मृतशरीरम् (शवम्)

(घ) साक्षिणम्

उत्तर(ग) मृतशरीरम् (शवम्)।

7. इस कथा में ‘विचित्र साक्षी’ कौन था?

(क) आरक्षी

(ख) गृहस्थः

(ग) सः शवः (मृत बना व्यक्ति)

(घ) ग्रामवासी

उत्तर(ग) सः शवः (मृत बना व्यक्ति)।

8. आरक्षी ने अतिथि को कितने वर्ष के कारादण्ड की धमकी दी?

(क) एक वर्ष

(ख) दो वर्ष

(ग) तीन वर्ष (वर्षत्रयस्य)

(घ) पाँच वर्ष

उत्तर(ग) तीन वर्ष (वर्षत्रयस्य)।

9. ‘अध्वनि’ पद का अर्थ है—

(क) घर में

(ख) मार्ग में

(ग) न्यायालय में

(घ) ग्राम में

उत्तर(ख) मार्ग में।

10. अन्त में न्यायाधीश ने आरक्षी के साथ क्या किया?

(क) ससम्मानं मुक्तवान्

(ख) पुरस्कृतवान्

(ग) कारादण्डम् आदिष्टवान्

(घ) क्षमां कृतवान्

उत्तर(ग) कारादण्डम् आदिष्टवान् (दण्ड दिया)।
उत्तर-कुंजी: 1-(ख), 2-(क), 3-(ग), 4-(ख), 5-(ग), 6-(ग), 7-(ग), 8-(ग), 9-(ख), 10-(ग)

अभिकथन-कारण – नीचे अभिकथन (A) और कारण (R) दिए गए हैं। सही विकल्प चुनिए—
(क) A और R दोनों सही, R, A की सही व्याख्या है। (ख) A और R दोनों सही, पर R, A की सही व्याख्या नहीं। (ग) A सही, R गलत। (घ) A गलत, R सही।

1. अभिकथन (A): निर्धन व्यक्ति बस छोड़कर पैदल ही चल पड़ा।

कारण (R): धन के अभाव (अर्थकार्श्य) के कारण वह वाहन का व्यय नहीं उठा सका।

उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है।

2. अभिकथन (A): अतिथि को चोर मानकर ग्रामवासियों ने धिक्कारा।

कारण (R): असली चोर आरक्षी ने स्वयं ‘चोर-चोर’ चिल्लाकर अतिथि को चोर घोषित कर दिया था।

उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है।

3. अभिकथन (A): न्यायाधीश आरम्भ में निर्णय नहीं कर सके।

कारण (R): अतिथि वस्तुतः चोर था, अतः न्यायाधीश संशय में पड़ गए।

उत्तर(ग) A सही है, किन्तु R गलत है – न्यायाधीश प्रमाण के अभाव में निर्णय नहीं कर सके; अतिथि निर्दोष था।

4. अभिकथन (A): शव बना व्यक्ति इस कथा का ‘विचित्र साक्षी’ है।

कारण (R): उसने आरक्षी द्वारा मार्ग में कहे शब्दों को न्यायालय में ज्यों-का-त्यों सुना दिया।

उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है।

5. अभिकथन (A): बुद्धिमान व्यक्ति कठिन कार्य भी सरलता से कर लेते हैं।

कारण (R): वे नीति एवं युक्ति का आश्रय लेकर लीला (खेल) के समान अनायास कार्य सिद्ध करते हैं।

उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है।

परीक्षा-युक्तियाँ एवं सामान्य गलतियाँ

परीक्षा-युक्तियाँ (Exam Tips)

  • कथा का क्रम याद रखें – निर्धन का प्रस्थान → गृहस्थ के घर निवास → चोरी → आरक्षी की चालाकी → न्यायालय → शव-साक्षी → न्याय।
  • पात्रों के नाम/भूमिका स्पष्ट रखें – न्यायाधीश बंकिमचन्द्र, लेखक ओमप्रकाश ठाकुर, असली चोर आरक्षी
  • शब्दार्थ हिन्दी एवं अंग्रेज़ी दोनों में याद करें – अध्वनि, क्रोशद्वयान्तराले, प्रावारकम्, अभर्त्सयन् आदि।
  • ‘एकपदेन उत्तरम्’ में केवल एक शब्द लिखें (जैसे विजने, पादध्वनिना); प्रश्ननिर्माण में रेखाङ्कित पद के लिए सही प्रश्नवाचक (कं, किम्, कस्य, कुत्र, कया) चुनें।
  • सन्धि-विच्छेद याद रखें – पदातिरेव = पदातिः + एव; निशान्धकारे = निशा + अन्धकारे; लीलयैव = लीलया + एव।

सामान्य गलतियाँ (Common Mistakes)

  • लेखक एवं निर्णयकर्ता को मिला देना – लेखक ओमप्रकाश ठाकुर हैं, निर्णय बंकिमचन्द्र का है।
  • असली चोर को अतिथि समझ लेना – वास्तविक चोर गाँव का आरक्षी था।
  • संयुक्ताक्षर लिखने में भूल – ‘मञ्जूषा’, ‘चौर्याभियोगे’, ‘पादध्वनिना’ शुद्ध लिखें।
  • प्रत्यय-वर्गीकरण में भूल – ल्यप् (परिश्रम्य, विहाय, आदाय, समागत्य), क्त (प्रस्थितः, प्रविष्टः), क्तवतु (उपार्जितवान्, पृष्टवान्), तुमुन् (द्रष्टुम्, क्रोशितुम्)।
  • बहुवचन-परिवर्तन में क्रियापद बदलना भूल जाना (कृतवान् → कृतवन्तः, आसीत् → आसन्)।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

कक्षा 10 संस्कृत शेमुषी पाठ 7 ‘विचित्रः साक्षी’ किस विधा का है और इसके लेखक कौन हैं?

यह एक कथा (गद्य) है। इसके लेखक श्री ओमप्रकाश ठाकुर हैं तथा यह बंगसाहित्यकार बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय द्वारा न्यायाधीश के रूप में दिए गए एक निर्णय पर आधारित है।

इस कथा में ‘विचित्र साक्षी’ कौन है?

इस कथा में ‘विचित्र साक्षी’ वह व्यक्ति है जो शव (मृत-देह) बनकर पड़ा था। वही न्यायालय में जीवित होकर उठा और आरक्षी द्वारा मार्ग में कहे शब्दों को सुनाकर सत्य प्रकट कर देता है।

न्यायाधीश ने अन्त में क्या निर्णय दिया?

सत्य जानकर न्यायाधीश बंकिमचन्द्र ने दोषी आरक्षी को कारादण्ड दिया तथा निर्दोष अतिथि को सम्मानपूर्वक मुक्त कर दिया। पाठ का सन्देश है कि बुद्धिमान व्यक्ति युक्ति से कठिन कार्य भी सहज कर लेते हैं।

पाठ-शीर्षक, अभ्यासः प्रश्न एवं शब्दार्थ NCERT शेमुषी (द्वितीयो भागः) पुस्तक से ज्यों-के-त्यों लिए गए हैं; सार, भावार्थ एवं उत्तर ClearStudy द्वारा मौलिक रूप से तैयार किए गए हैं।

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