NCERT Solutions for Class 10 Sanskrit (Shemushi) पाठः 7: विचित्रः साक्षी
यह पृष्ठ कक्षा 10 संस्कृत शेमुषी (द्वितीयो भागः) के सप्तम पाठ ‘विचित्रः साक्षी’ का सम्पूर्ण समाधान प्रस्तुत करता है। यह पाठ श्री ओमप्रकाश ठाकुर द्वारा रचित कथा का सम्पादित अंश है, जो बंगसाहित्यकार बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय द्वारा न्यायाधीश के रूप में दिए गए एक निर्णय पर आधारित है। यहाँ पाठ-परिचय, मूल कथा का सार, शब्दार्थ, सम्पूर्ण अभ्यासः के उत्तर (प्रत्येक प्रश्न ज्यों-का-त्यों), 5 लघु + 3 दीर्घ अतिरिक्त प्रश्न, 10 बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQ) सहित उत्तर-कुंजी, 5 अभिकथन-कारण (A-R) तथा FAQ दिए गए हैं (NCERT 2026–27)।
पाठ का अवलोकन (Chapter Overview)
शेमुषी (द्वितीयो भागः) कक्षा 10 का सप्तम पाठ ‘विचित्रः साक्षी’ (अद्भुत गवाह) एक रोचक कथा है। एक निर्धन व्यक्ति अपने रुग्ण पुत्र को देखने पैदल जाते समय रात में किसी गृहस्थ के यहाँ ठहरता है। उसी रात उस घर में चोरी हो जाती है। असली चोर (जो गाँव का आरक्षी ही है) स्वयं ‘चोर-चोर’ चिल्लाकर उस निर्दोष अतिथि को चोर बताकर कारागार में डाल देता है। अगले दिन मार्ग में एक शव मिलता है; न्यायाधीश बंकिमचन्द्र आरक्षी एवं अभियुक्त (अतिथि) दोनों को शव ढोकर न्यायालय लाने का आदेश देते हैं। बोझ ढोते समय आरक्षी अतिथि का उपहास करता है और मञ्जूषा-चोरी की बात फिर दोहरा देता है। न्यायालय में वही शव गवाह बन जाता है – जब अतिथि ने आरक्षी के मार्ग में कहे शब्दों का वर्णन किया, तब न्यायाधीश ने सत्य जान लिया और आरक्षी को दण्ड देकर निर्दोष अतिथि को सम्मानपूर्वक मुक्त कर दिया। पाठ का सन्देश है कि बुद्धि-वैभव से सम्पन्न व्यक्ति प्रमाण के अभाव में भी युक्ति से न्याय कर सकते हैं।
पाठ-परिचय / लेखक-परिचय
प्रस्तुत पाठ श्री ओमप्रकाश ठाकुर द्वारा रचित कथा का सम्पादित अंश है। यह कथा बंगला के प्रसिद्ध साहित्यकार बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय (चटर्जी) द्वारा न्यायाधीश के रूप में दिए गए एक निर्णय पर आधारित है। सत्य-असत्य का निर्णय करने के लिए न्यायकर्ता कभी-कभी ऐसी युक्तियों का प्रयोग करते हैं, जिनसे प्रमाण के बिना भी न्याय हो सके। इस कथा में भी न्यायाधीश ने वैसी ही एक विचित्र युक्ति अपनाई। मूलतः बंकिमचन्द्र हुगली ज़िले में डिप्टी मजिस्ट्रेट रहे थे; उनकी न्यायप्रियता एवं बुद्धिकौशल की अनेक कथाएँ प्रसिद्ध हैं। पाठ सरल एवं प्रवाहपूर्ण संस्कृत-गद्य में लिखा गया है, जिसका केन्द्रीय भाव है – नीति एवं युक्ति का आश्रय लेकर बुद्धिमान व्यक्ति कठिन कार्यों को भी सरलता से सिद्ध कर लेते हैं।
सार एवं भावार्थ (Hindi Summary)
एक निर्धन व्यक्ति ने बहुत परिश्रम करके थोड़ा-सा धन कमाया और उससे अपने पुत्र को एक महाविद्यालय में प्रवेश दिलाने में सफल हुआ। पुत्र वहीं छात्रावास में रहकर अध्ययन में लगा रहा। एक बार पिता को पुत्र की बीमारी का समाचार मिला, तो वह व्याकुल होकर पुत्र को देखने चल पड़ा। धन के अभाव के कारण वह बस छोड़कर पैदल ही चलने लगा। सायंकाल तक भी वह गन्तव्य से दूर था, और ‘रात के अँधेरे में सुनसान स्थान में पैदल यात्रा शुभ नहीं होती’ – यह सोचकर उसने पास के गाँव में किसी गृहस्थ के घर रात बिताने का निश्चय किया। दयालु गृहस्थ ने उसे आश्रय दे दिया।
दैव की गति विचित्र है। उसी रात उस घर में एक चोर घुस आया और वहाँ रखी एक मञ्जूषा (पेटी/सन्दूक) लेकर भाग गया। चोर के पैरों की आहट से जागे हुए अतिथि ने चोर-शंका से उसका पीछा किया और उसे पकड़ भी लिया, परन्तु तभी एक विचित्र घटना घटी – चोर ही ज़ोर-ज़ोर से ‘चोर है, चोर है’ चिल्लाने लगा। उसके तीव्र स्वर से जागे ग्रामवासी अपने घरों से निकलकर वहाँ आ गए और बेचारे अतिथि को ही चोर मानकर भला-बुरा कहने लगे। वस्तुतः वह चोर गाँव का आरक्षी (रक्षक-पुरुष/सिपाही) ही था। उसी क्षण रक्षापुरुष ने उस अतिथि को ‘यही चोर है’ घोषित कर कारागार में डाल दिया।
अगले दिन आरक्षी अतिथि को चोरी के अभियोग में न्यायालय ले गया। न्यायाधीश बंकिमचन्द्र ने दोनों से अलग-अलग विवरण सुना। सारा वृत्तान्त जानकर उन्होंने अतिथि को निर्दोष और आरक्षी को दोषी माना, किन्तु प्रमाण के अभाव में निर्णय नहीं कर सके। तभी एक कर्मचारी ने आकर सूचना दी कि दो कोस की दूरी पर राजमार्ग के पास किसी व्यक्ति का मृत शरीर पड़ा है। न्यायाधीश ने आरक्षी एवं अभियुक्त दोनों को वह शव न्यायालय में लाने का आदेश दिया। आरक्षी हृष्ट-पुष्ट था, अभियुक्त अत्यन्त दुबला। भारी शव ढोते समय आरक्षी ने अतिथि का उपहास किया और कहा – ‘रे दुष्ट! उस दिन तूने मुझे चुराई हुई मञ्जूषा लेने से रोका था; अब अपने कर्म का फल भोग, इस चोरी के अभियोग में तुझे तीन वर्ष का कारादण्ड मिलेगा।’ — ऐसा कहकर वह ज़ोर से हँसा।
न्यायालय में जब न्यायाधीश ने दोनों से घटना के विषय में बोलने को कहा, तब एक आश्चर्य हुआ – वह शव अपना ओढ़ने का वस्त्र हटाकर उठ खड़ा हुआ और न्यायाधीश को प्रणाम कर बोला – ‘मान्यवर! इस आरक्षी ने मार्ग में जो कहा, वही मैं बताता हूँ – तूने मुझे चुराई हुई मञ्जूषा लेने से रोका था, इसलिए अपने कर्म का फल भोग; इस चोरी के अभियोग में तुझे तीन वर्ष का कारादण्ड मिलेगा।’ इस प्रकार वही (शव बना हुआ) व्यक्ति ही इस कथा का ‘विचित्र साक्षी’ था। न्यायाधीश ने आरक्षी को कारादण्ड देकर उस निर्दोष अतिथि को सम्मानपूर्वक मुक्त कर दिया। इसीलिए कहा जाता है – ‘दुष्कराणि अपि कर्माणि मतिवैभवशालिनः। नीतिं युक्तिं समालम्ब्य लीलयैव प्रकुर्वते॥’ अर्थात् बुद्धि-वैभव से सम्पन्न व्यक्ति नीति एवं युक्ति का आश्रय लेकर कठिन कार्यों को भी खेल-खेल में कर लेते हैं।
शब्दार्थ (Word-meanings)
| शब्दः (Sanskrit) | अर्थः (हिन्दी) | Meaning (English) |
|---|---|---|
| भूरि | अत्यधिक, पर्याप्त | Plenty / much |
| उपार्जितवान् | कमाया | Earned |
| निवसन् | रहते हुए | While residing |
| विजने प्रदेशे | एकान्त (सुनसान) स्थान में | In a desolate place |
| शुभावहा | कल्याणकारी | Auspicious / charitable |
| गृही | गृहस्वामी, गृहस्थ | Householder |
| दैवगतिः | भाग्य की लीला | Destiny / fate |
| पलायितः | भाग गया, चला गया | Ran away |
| प्रबुद्धः | जागा हुआ | Awakened |
| अर्थकार्श्येन | धन के अभाव के कारण | Due to scarcity of money |
| पदातिरेव | पैदल ही | On foot only |
| निहिताम् | रखी हुई | Placed / kept |
| अन्वधावत् | पीछे-पीछे दौड़ा | He followed (ran after) |
| क्रोशितुम् | ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाने को | To shout |
| तारस्वरेण | ऊँचे (तीव्र) स्वर से | Loudly |
| अभर्त्सयन् | भला-बुरा कहा, धिक्कारा | They criticized / rebuked |
| चौर्याभियोगे | चोरी के आरोप में | On an allegation of stealing |
| अवगत्य | जानकर | Knowing |
| दोषभाजनम् | दोषी, दोष का पात्र | Culprit |
| उपस्थातुम् | उपस्थित होने को | To be present |
| आरक्षिणम् | सैनिक/रक्षक-पुरुष को | To the guard (policeman) |
| क्रोशद्वयान्तराले | दो कोस की दूरी पर | At a distance of about two miles |
| उपेत्य | पास जाकर | Going near |
| काष्ठपटले | लकड़ी के तख्ते पर | On a wooden board |
| पटाच्छादितम् | कपड़े से ढका हुआ | Covered by cloth |
| कृशकायः | दुर्बल शरीर वाला | Of lean body |
| भारवेदनया | बोझ की पीड़ा से | By the pain of the load |
| क्रन्दनम् | रोना, रुदन | Weeping |
| निशम्य | सुनकर | Listening / hearing |
| मुदितः | प्रसन्न | Happy / pleased |
| चत्वरे | चौराहे पर | At the square / crossroads |
| लप्स्यसे | प्राप्त करोगे | You will get |
| प्रावारकम् | ऊपर ओढ़ा हुआ वस्त्र | Covering cloth / mantle |
| अपसार्य | हटाकर, दूर करके | Removing |
| अभिवाद्य | अभिवादन (प्रणाम) करके | Saluting |
| अध्वनि | मार्ग में, रास्ते में | On the way |
| वारितः | रोका गया | Stopped / prevented |
| मुक्तवान् | छोड़ दिया, मुक्त किया | Released |
| समालम्ब्य | सहारा/आश्रय लेकर | Taking recourse to |
| लीलयैव | खेल-खेल में, अनायास ही | In a flash / effortlessly |
| मतिवैभवशालिनः | बुद्धि-वैभव से सम्पन्न (विद्वान्) | The intellectually gifted |
अभ्यासः के उत्तर (Exercise Solutions)
1. एकपदेन उत्तरं लिखत —
(क) कीदृशे प्रदेशे पदयात्रा न सुखावहा?
(ख) अतिथिः केन प्रबुद्धः?
(ग) कृशकायः कः आसीत्?
(घ) न्यायाधीशः कस्मै कारागारदण्डम् आदिष्टवान्?
(ङ) कं निकषा मृतशरीरम् आसीत्?
2. अधोलिखितानां प्रश्नानाम् उत्तराणि संस्कृतभाषया लिखत —
(क) निर्धनः जनः कथं वित्तम् उपार्जितवान्?
(ख) जनः किमर्थं पदातिः गच्छति?
(ग) प्रसृते निशान्धकारे स किम् अचिन्तयत्?
(घ) वस्तुतः चौरः कः आसीत्?
(ङ) जनस्य क्रन्दनं निशम्य आरक्षी किमुक्तवान्?
(च) मतिवैभवशालिनः दुष्कराणि कार्याणि कथं साधयन्ति?
3. रेखाङ्कितपदमाधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत —
(क) पुत्रं द्रष्टुं सः प्रस्थितः।
(ख) करुणापरो गृही तस्मै आश्रयं प्रायच्छत्।
(ग) चौरस्य पादध्वनिना अतिथिः प्रबुद्धः।
(घ) न्यायाधीशः बंकिमचन्द्रः आसीत्।
(ङ) सः भारवेदनया क्रन्दति स्म।
(च) उभौ शवं चत्वरे स्थापितवन्तौ।
4. यथानिर्देशम् उत्तरत —
(क) ‘आदेशं प्राप्य उभौ अचलताम्’ – अत्र किं कर्तृपदम्?
(ख) ‘एतेन आरक्षिणा अध्वनि यदुक्तं तत् वर्णयामि’ – अत्र ‘मार्गे’ इत्यर्थे किं पदं प्रयुक्तम्?
(ग) ‘करुणापरो गृही तस्मै आश्रयं प्रायच्छत्’ – अत्र ‘तस्मै’ इति सर्वनामपदं कस्मै प्रयुक्तम्?
(घ) ‘ततोऽसौ तौ अग्रिमे दिने उपस्थातुम् आदिष्टवान्’ – अस्मिन् वाक्ये किं क्रियापदम्?
(ङ) ‘दुष्कराण्यपि कर्माणि’ – अत्र विशेष्यपदं किम्?
5. सन्धिं/सन्धिविच्छेदं च कुरुत —
6. अधोलिखितानि पदानि भिन्न-भिन्नप्रत्ययान्तानि सन्ति। तानि पृथक् कृत्वा निर्दिष्टानां प्रत्ययानाम् अधः लिखत —
पदानि – परिश्रम्य, उपार्जितवान्, दापयितुम्, प्रस्थितः, द्रष्टुम्, विहाय, पृष्टवान्, प्रविष्टः, आदाय, क्रोशितुम्, नियुक्तः, नीतवान्, निर्णेतुम्, आदिष्टवान्, समागत्य, मुदितः।
| ल्यप् (Lyap) | क्त (Kta) | क्तवतु (Ktavatu) | तुमुन् (Tumun) |
|---|---|---|---|
| परिश्रम्य | प्रस्थितः | उपार्जितवान् | दापयितुम् |
| विहाय | प्रविष्टः | पृष्टवान् | द्रष्टुम् |
| आदाय | नियुक्तः | नीतवान् | क्रोशितुम् |
| समागत्य | मुदितः | आदिष्टवान् | निर्णेतुम् |
7. (अ) अधोलिखितानि वाक्यानि बहुवचने परिवर्तयत —
(क) सः बसयानं विहाय पदातिरेव गन्तुं निश्चयं कृतवान्।
(ख) चौरः ग्रामे नियुक्तः राजपुरुषः आसीत्।
(ग) कश्चन चौरः गृहाभ्यन्तरं प्रविष्टः।
(घ) अन्येद्युः तौ न्यायालये स्व-स्व-पक्षं स्थापितवन्तौ।
7. (आ) कोष्ठके दत्तेषु पदेषु यथानिर्दिष्टां विभक्तिं प्रयुज्य रिक्तस्थानानि पूरयत —
अतिरिक्त प्रश्न (Extra Questions)
लघु उत्तरीय प्रश्न (30–40 शब्द)
1. इस पाठ के लेखक कौन हैं तथा यह कथा किस पर आधारित है?
2. निर्धन व्यक्ति पैदल यात्रा क्यों कर रहा था?
3. असली चोर कौन था और उसने क्या चालाकी की?
4. इस कथा में ‘विचित्र साक्षी’ कौन है और क्यों?
5. न्यायाधीश ने अन्त में क्या निर्णय दिया?
दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (100–120 शब्द)
6. ‘विचित्रः साक्षी’ कथा का सार अपने शब्दों में लिखिए।
7. न्यायाधीश ने सत्य का पता लगाने के लिए कौन-सी युक्ति अपनाई? यह क्यों सफल रही?
8. इस पाठ से हमें क्या शिक्षा/सन्देश मिलता है?
MCQ & अभिकथन-कारण
1. इस पाठ के रचयिता (लेखक) कौन हैं?
(क) बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय
(ख) श्री ओमप्रकाश ठाकुर
(ग) रवीन्द्रनाथ ठाकुर
(घ) कालिदासः
2. यह कथा किसके द्वारा दिए गए निर्णय पर आधारित है?
(क) बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय
(ख) चाणक्यस्य
(ग) विक्रमादित्यस्य
(घ) तेनालिरामस्य
3. वस्तुतः चोर कौन था?
(क) अतिथिः
(ख) गृहस्वामी
(ग) आरक्षी (रक्षापुरुषः)
(घ) पुत्रः
4. निर्धन व्यक्ति पैदल क्यों चल रहा था?
(क) स्वास्थ्य के लिए
(ख) धन के अभाव (अर्थकार्श्य) के कारण
(ग) मार्ग सुन्दर था
(घ) बस उपलब्ध नहीं थी
5. अतिथि किसकी आहट से जागा?
(क) वायोः
(ख) गृहस्वामिनः
(ग) चौरस्य पादध्वनिना
(घ) ग्रामवासिनाम्
6. न्यायाधीश ने दोनों को क्या लाने का आदेश दिया?
(क) धनम्
(ख) मञ्जूषाम्
(ग) मृतशरीरम् (शवम्)
(घ) साक्षिणम्
7. इस कथा में ‘विचित्र साक्षी’ कौन था?
(क) आरक्षी
(ख) गृहस्थः
(ग) सः शवः (मृत बना व्यक्ति)
(घ) ग्रामवासी
8. आरक्षी ने अतिथि को कितने वर्ष के कारादण्ड की धमकी दी?
(क) एक वर्ष
(ख) दो वर्ष
(ग) तीन वर्ष (वर्षत्रयस्य)
(घ) पाँच वर्ष
9. ‘अध्वनि’ पद का अर्थ है—
(क) घर में
(ख) मार्ग में
(ग) न्यायालय में
(घ) ग्राम में
10. अन्त में न्यायाधीश ने आरक्षी के साथ क्या किया?
(क) ससम्मानं मुक्तवान्
(ख) पुरस्कृतवान्
(ग) कारादण्डम् आदिष्टवान्
(घ) क्षमां कृतवान्
अभिकथन-कारण – नीचे अभिकथन (A) और कारण (R) दिए गए हैं। सही विकल्प चुनिए—
(क) A और R दोनों सही, R, A की सही व्याख्या है। (ख) A और R दोनों सही, पर R, A की सही व्याख्या नहीं। (ग) A सही, R गलत। (घ) A गलत, R सही।
1. अभिकथन (A): निर्धन व्यक्ति बस छोड़कर पैदल ही चल पड़ा।
कारण (R): धन के अभाव (अर्थकार्श्य) के कारण वह वाहन का व्यय नहीं उठा सका।
2. अभिकथन (A): अतिथि को चोर मानकर ग्रामवासियों ने धिक्कारा।
कारण (R): असली चोर आरक्षी ने स्वयं ‘चोर-चोर’ चिल्लाकर अतिथि को चोर घोषित कर दिया था।
3. अभिकथन (A): न्यायाधीश आरम्भ में निर्णय नहीं कर सके।
कारण (R): अतिथि वस्तुतः चोर था, अतः न्यायाधीश संशय में पड़ गए।
4. अभिकथन (A): शव बना व्यक्ति इस कथा का ‘विचित्र साक्षी’ है।
कारण (R): उसने आरक्षी द्वारा मार्ग में कहे शब्दों को न्यायालय में ज्यों-का-त्यों सुना दिया।
5. अभिकथन (A): बुद्धिमान व्यक्ति कठिन कार्य भी सरलता से कर लेते हैं।
कारण (R): वे नीति एवं युक्ति का आश्रय लेकर लीला (खेल) के समान अनायास कार्य सिद्ध करते हैं।
परीक्षा-युक्तियाँ एवं सामान्य गलतियाँ
परीक्षा-युक्तियाँ (Exam Tips)
- कथा का क्रम याद रखें – निर्धन का प्रस्थान → गृहस्थ के घर निवास → चोरी → आरक्षी की चालाकी → न्यायालय → शव-साक्षी → न्याय।
- पात्रों के नाम/भूमिका स्पष्ट रखें – न्यायाधीश बंकिमचन्द्र, लेखक ओमप्रकाश ठाकुर, असली चोर आरक्षी।
- शब्दार्थ हिन्दी एवं अंग्रेज़ी दोनों में याद करें – अध्वनि, क्रोशद्वयान्तराले, प्रावारकम्, अभर्त्सयन् आदि।
- ‘एकपदेन उत्तरम्’ में केवल एक शब्द लिखें (जैसे विजने, पादध्वनिना); प्रश्ननिर्माण में रेखाङ्कित पद के लिए सही प्रश्नवाचक (कं, किम्, कस्य, कुत्र, कया) चुनें।
- सन्धि-विच्छेद याद रखें – पदातिरेव = पदातिः + एव; निशान्धकारे = निशा + अन्धकारे; लीलयैव = लीलया + एव।
सामान्य गलतियाँ (Common Mistakes)
- लेखक एवं निर्णयकर्ता को मिला देना – लेखक ओमप्रकाश ठाकुर हैं, निर्णय बंकिमचन्द्र का है।
- असली चोर को अतिथि समझ लेना – वास्तविक चोर गाँव का आरक्षी था।
- संयुक्ताक्षर लिखने में भूल – ‘मञ्जूषा’, ‘चौर्याभियोगे’, ‘पादध्वनिना’ शुद्ध लिखें।
- प्रत्यय-वर्गीकरण में भूल – ल्यप् (परिश्रम्य, विहाय, आदाय, समागत्य), क्त (प्रस्थितः, प्रविष्टः), क्तवतु (उपार्जितवान्, पृष्टवान्), तुमुन् (द्रष्टुम्, क्रोशितुम्)।
- बहुवचन-परिवर्तन में क्रियापद बदलना भूल जाना (कृतवान् → कृतवन्तः, आसीत् → आसन्)।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
कक्षा 10 संस्कृत शेमुषी पाठ 7 ‘विचित्रः साक्षी’ किस विधा का है और इसके लेखक कौन हैं?
यह एक कथा (गद्य) है। इसके लेखक श्री ओमप्रकाश ठाकुर हैं तथा यह बंगसाहित्यकार बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय द्वारा न्यायाधीश के रूप में दिए गए एक निर्णय पर आधारित है।
इस कथा में ‘विचित्र साक्षी’ कौन है?
इस कथा में ‘विचित्र साक्षी’ वह व्यक्ति है जो शव (मृत-देह) बनकर पड़ा था। वही न्यायालय में जीवित होकर उठा और आरक्षी द्वारा मार्ग में कहे शब्दों को सुनाकर सत्य प्रकट कर देता है।
न्यायाधीश ने अन्त में क्या निर्णय दिया?
सत्य जानकर न्यायाधीश बंकिमचन्द्र ने दोषी आरक्षी को कारादण्ड दिया तथा निर्दोष अतिथि को सम्मानपूर्वक मुक्त कर दिया। पाठ का सन्देश है कि बुद्धिमान व्यक्ति युक्ति से कठिन कार्य भी सहज कर लेते हैं।
पाठ-शीर्षक, अभ्यासः प्रश्न एवं शब्दार्थ NCERT शेमुषी (द्वितीयो भागः) पुस्तक से ज्यों-के-त्यों लिए गए हैं; सार, भावार्थ एवं उत्तर ClearStudy द्वारा मौलिक रूप से तैयार किए गए हैं।
