Class 6 Sanskrit Deepakam Chapter 1 Solutions (NCERT 2026–27) – वयं वर्णमालां पठामः
This page gives the complete solution for Class 6 Sanskrit Deepakam (दीपकम्) Chapter 1 ‘वयं वर्णमालां पठामः’ – the introductory varṇamālā (alphabet) lesson, covering स्वराः and व्यञ्जनानि, अनुनासिक-स्वराः, गुणिताक्षराणि (मात्रा-संयोजन), the six उच्चारण-स्थानानि (places of articulation) of the पाणिनीय-शिक्षा, the शब्दार्थ table, and original, exam-ready answers to every question of the अभ्यास (वयम् अभ्यासं कुर्मः) along with grammar tables, extra questions, MCQs, अभिकथन-कारण and FAQs.
- पाठ का अवलोकन (Chapter Overview)
- पाठ-परिचय / प्रसंग
- मूल पाठ – वर्णमाला (स्वराः, व्यञ्जनानि)
- वर्ण-वर्गीकरण एवं व्याख्या (अन्वय)
- सार (Hindi Summary)
- शब्दार्थ (वयं शब्दार्थान् जानीमः)
- अभ्यासः (वयम् अभ्यासं कुर्मः)
- अत्र इदम् अवधेयम् (व्याकरण-तालिकाः)
- योग्यताविस्तरः & परियोजनाकार्यम्
- अतिरिक्त प्रश्न (Extra Questions)
- MCQ & अभिकथन-कारण
- परीक्षा-सुझाव एवं सामान्य त्रुटियाँ
- अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
पाठ का अवलोकन (Chapter Overview)
दीपकम् कक्षा 6 का प्रथम पाठ ‘वयं वर्णमालां पठामः’ संस्कृत-वर्णमाला (Devanagari alphabet) का परिचयात्मक पाठ है। इसमें बताया गया है कि वर्ण दो प्रकार के होते हैं – स्वराः (vowels) तथा व्यञ्जनानि (consonants)। स्वर पुनः समानाक्षर एवं सन्ध्यक्षर भेद से, तथा व्यञ्जन स्पर्श (वर्ग्य), अन्तःस्थ, ऊष्म एवं अयोगवाह भेद से विभक्त हैं। पाठ में अनुनासिक-स्वर, व्यञ्जनों में ‘अ’ का योजन, गुणिताक्षर (मात्रा-संयोजन) तथा संयुक्ताक्षर भी सिखाए गए हैं। अन्त में योग्यताविस्तरः के अन्तर्गत आस्य (मुख-नासिका) के छह उच्चारण-स्थान – कण्ठः, तालु, मूर्धा, दन्तः, ओष्ठः एवं नासिका – तथा पाणिनीय-शिक्षा के सूत्र दिए गए हैं। पाठ का उद्देश्य छात्रों को वर्णों का शुद्ध उच्चारण एवं वर्गीकरण सिखाना है।
पाठ-परिचय / प्रसंग
संस्कृत-भाषा सीखने का प्रथम सोपान वर्णमाला है। जैसे भवन की नींव सुदृढ़ हो तो भवन सुदृढ़ रहता है, वैसे ही वर्णों का शुद्ध ज्ञान एवं उच्चारण ही शुद्ध संस्कृत-अध्ययन का आधार है। प्राचीन भारतीय वैयाकरणों ने प्रत्येक वर्ण के उच्चारण-स्थान (place of articulation) का सूक्ष्म विश्लेषण किया है, जो पाणिनीय-शिक्षा में सूत्रबद्ध है। यह पाठ उसी वैज्ञानिक परम्परा का सरल परिचय देता है – स्वर-व्यञ्जन का भेद, मात्रा-संयोजन से गुणिताक्षर बनना, तथा कण्ठ से नासिका तक छह स्थानों से वर्णों की उत्पत्ति।
मूल पाठ – वर्णमाला (स्वराः, व्यञ्जनानि)
(पुस्तक के मूल पाठ का सार-रूप; वर्ण ज्यों-के-त्यों शुद्ध देवनागरी में।)
(१) स्वराः – स्वराणाम् उच्चारणं स्वतन्त्ररूपेण भवति ।
समानाक्षराणि (ह्रस्व/दीर्घ): अ आ, इ ई, उ ऊ, ऋ ॠ, ऌ ।
सन्ध्यक्षराणि (केवल दीर्घ): ए, ऐ, ओ, औ ।
अ + इ = ए ; अ + उ = ओ ; अ + ए = ऐ ; अ + ओ = औ ।
अनुनासिक-स्वराः: अँ आँ इँ ईँ उँ ऊँ ऌँ एँ ऐँ ओँ औँ ।
(२) व्यञ्जनानि – व्यञ्जनोच्चारणे स्वरस्य सहायता अपेक्षिता; अतः सर्वत्र ‘अ’-योजनम् ।
क् + अ = क ; ख् + अ = ख ; ग् + अ = ग ; घ् + अ = घ ।
— दीपकम्, पाठः १ (वयं वर्णमालां पठामः)
वर्ण-वर्गीकरण एवं व्याख्या (अन्वय)
पाठ में दी गई वर्णमाला का व्यवस्थित वर्गीकरण इस प्रकार है –
1. व्यञ्जनानां चत्वारः भेदाः
| भेदः | वर्णाः | विवरणम् (हिन्दी) |
|---|---|---|
| स्पर्शाः / वर्ग्याः | क ख ग घ ङ · च छ ज झ ञ · ट ठ ड ढ ण · त थ द ध न · प फ ब भ म | पाँच वर्ग (क-वर्ग, च-वर्ग, ट-वर्ग, त-वर्ग, प-वर्ग), कुल 25 वर्ण |
| अन्तःस्थाः | य र ल व | ‘अर्ध-स्वर’ भी कहलाते हैं |
| ऊष्म-वर्णाः | श ष स ह | उच्चारण में मुख से उष्ण वायु निकलती है |
| अयोगवाहौ | अं (अनुस्वारः), अः (विसर्गः) | यहाँ ‘अ’ पहले जुड़ता है, बाद में नहीं |
2. गुणिताक्षराणि (मात्रा-संयोजन)
व्यञ्जन के साथ स्वर के संयोग से गुणिताक्षर बनते हैं। प्रत्येक स्वर का एक मात्रा-चिह्न होता है – आ = ा, इ = ि, ई = ी, उ = ु, ऊ = ू, ऋ = ृ, ए = े, ऐ = ै, ओ = ो, औ = ौ। यथा – क् + आ = का, क् + इ = कि, क् + ई = की, क् + उ = कु, क् + ए = के, क् + ओ = को, क् + औ = कौ।
3. आस्ये षट् उच्चारण-स्थानानि (Six places of articulation)
| उच्चारण-स्थानम् | वर्णाः | अंग्रेज़ी |
|---|---|---|
| १. कण्ठः | अ आ, क ख ग घ ङ, ह, विसर्गः (अः) | Throat |
| २. तालु | इ ई, च छ ज झ ञ, य, श | Palate |
| ३. मूर्धा | ऋ, ट ठ ड ढ ण, र, ष | Hard palate / roof |
| ४. दन्तः | ऌ, त थ द ध न, ल, स | Teeth |
| ५. ओष्ठः | उ ऊ, प फ ब भ म | Lips |
| ६. नासिका | अनुस्वारः (अं), ङ ञ ण न म (स्वस्थानेन सह) | Nose |
विशेष – ए, ऐ कण्ठ-तालव्य; ओ, औ कण्ठोष्ठ्य; व दन्त्योष्ठ्य वर्ण है (दो-दो स्थानों से उच्चारित)।
सार (Hindi Summary)
‘वयं वर्णमालां पठामः’ पाठ संस्कृत-वर्णमाला से परिचय कराता है। वर्ण दो प्रकार के होते हैं – स्वर एवं व्यञ्जन। स्वरों का उच्चारण स्वतन्त्र रूप से होता है। स्वर दो प्रकार के हैं – समानाक्षर (अ आ, इ ई, उ ऊ, ऋ ॠ, ऌ) तथा सन्ध्यक्षर (ए, ऐ, ओ, औ), जो दो स्वरों के मेल (सन्धि) से बनते हैं; जैसे अ + इ = ए, अ + उ = ओ। मुख के साथ नासिका से उच्चारित स्वर अनुनासिक-स्वर कहलाते हैं (अँ, आँ आदि)।
व्यञ्जनों के उच्चारण में किसी स्वर की सहायता आवश्यक होती है, इसलिए वर्णमाला में हर व्यञ्जन के साथ ‘अ’ जोड़ा जाता है (क् + अ = क)। व्यञ्जन के चार भेद हैं – स्पर्श (पाँच वर्ग के 25 वर्ण), अन्तःस्थ (य र ल व), ऊष्म (श ष स ह) तथा अयोगवाह (अं, अः)। व्यञ्जन के साथ विभिन्न स्वरों की मात्रा जोड़ने से गुणिताक्षर बनते हैं, जैसे क, का, कि, की, कु, के, को, कौ।
पाठ के अन्त में ‘योग्यताविस्तरः’ में बताया गया है कि आस्य (मुख एवं नासिका) में वर्णों के उत्पन्न होने के छह स्थान हैं – कण्ठ, तालु, मूर्धा, दन्त, ओष्ठ एवं नासिका। पाणिनीय-शिक्षा के सूत्रों के अनुसार प्रत्येक वर्ग के वर्ण इन्हीं स्थानों से उच्चारित होते हैं; जैसे ‘अकुहविसर्जनीयाः कण्ठ्याः’, ‘इचुयशास्तालव्याः’ आदि। इस प्रकार यह पाठ वर्णों का वर्गीकरण एवं शुद्ध उच्चारण सिखाकर संस्कृत-अध्ययन की सुदृढ़ नींव रखता है।
शब्दार्थ (वयं शब्दार्थान् जानीमः)
पुस्तक की ‘वयं शब्दार्थान् जानीमः’ तालिका से ज्यों-के-त्यों।
| शब्दः | अर्थः (संस्कृत) | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|---|
| पित्राज्ञा | पितुः आदेशः | पिता का आदेश | Father’s order |
| लाकृतिः | ‘ऌ’-वर्णस्य आकृतिः | ‘ऌ’-वर्ण का रूप | Shape of letter ‘ऌ’ |
| एकैकः | प्रत्येकम् | हर एक | Each one |
| अजः | छागः | बकरा | Goat |
| वधूः | परिणीता | विवाहिता नारी | Married woman |
| मातॄणम् | मातुः ऋणम् | माता का ऋण | Indebtedness to Mother |
| कॢप्तम् | कल्पितम् | माना हुआ | Supposed |
| ऌकारः | ‘ऌ’-वर्णः | ‘ऌ’ वर्ण | Letter ‘ऌ’ |
| ओम् | प्रणवः | एकाक्षर ब्रह्म | Name of Brahma |
| औषधम् | भेषजम् | औषध | Medicine |
| जिह्वा | रसना | जीभ | Tongue |
| नामधेयम् | नाम | नाम | Name |
| भगिनी | स्वसा | बहन | Sister |
| भ्राता | अनुजः / अग्रजः | भाई | Brother |
| पितामही | पितुः माता | दादी | Paternal Grandmother |
| पितामहः | पितुः पिता | दादा | Paternal Grandfather |
| मातामही | मातुः माता | नानी | Maternal Grandmother |
| मातामहः | मातुः पिता | नाना | Maternal Grandfather |
| सुश्रीः | कुमारी | कुमारी | Miss |
| श्रीः | लक्ष्मीः, सुन्दरता | लक्ष्मी, सौन्दर्य | Goddess of prosperity |
| उपाधिः | विशिष्टता | विशेषता | Title |
| प्रथम-नाम | मुख्यं नाम | पहला नाम | First Name |
| मध्य-नाम | मध्यवर्ति नाम | बीच का नाम | Middle Name |
| अन्त्य-नाम | अन्तिम-नाम | अन्तिम नाम | Last Name |
| कुल-नाम | कुलस्य गोत्रस्य वंशस्य वा नाम | कुल/गोत्र का नाम | Family Name |
अभ्यासः (वयम् अभ्यासं कुर्मः)
1. कस्य चित्रम् ? वदन्तु लिखन्तु च —
(पुस्तक में दिए चित्रों के नाम संस्कृत में बोलकर लिखने हैं। प्रथम चित्र का उत्तर पुस्तक में ‘गणेशः’ दिया गया है। सम्भावित उत्तर –)
2. चित्रं पश्यन्तु । पिट्टकातः समुचितान् वर्णसमूहान् चित्वा रिक्तस्थानानि पूरयन्तु —
पिट्टका (शब्द-मञ्जूषा): क्का · त्रि · ण्डः · ञ्चुः · क्षः · ङ्क · ङ्खः · न्ताः · न्द्रः · ष्ट
3. प्रथम-वर्णेन पदं वदन्तु लिखन्तु च —
(दिए गए प्रथम वर्ण से आरम्भ होने वाले दो-दो पद लिखिए। उदाहरण – अ → अग्निः, अस्त्रम् ; न → नदी, नौका।)
| प्रथम-वर्णः | पदम् १ | पदम् २ |
|---|---|---|
| अ | अग्निः | अस्त्रम् |
| क | कमलम् | करः |
| च | चन्द्रः | चषकः |
| प | पुस्तकम् | पत्रम् |
| र | रथः | रविः |
| इ | इन्दुः | इक्षुः |
| न | नदी | नौका |
| म | मयूरः | मातुलः |
| ह | हस्ती | हरिः |
| त | तरुः | तटः |
| व | वनम् | वायुः |
| श | शशकः | शिशुः |
4. स्व-परिवारस्य सदस्यानां पूर्ण-नामानि लिखन्तु —
(अपने परिवार के सदस्यों के पूरे नाम उपाधि सहित लिखिए। उदाहरण-स्वरूप नमूना तालिका –)
| सम्बन्धः | उपाधिः | प्रथम-नाम | मध्य-नाम | अन्त्य-नाम / कुल-नाम |
|---|---|---|---|---|
| माता | श्रीमती | सीता | — | शर्मा |
| पिता | श्रीमान् | रमेशः | कुमारः | शर्मा |
| भगिनी | सुश्रीः | रीता | — | शर्मा |
| भ्राता | श्रीमान् | अमितः | — | शर्मा |
| पितामही | श्रीमती | गायत्री | — | शर्मा |
| पितामहः | श्रीमान् | मोहनः | — | शर्मा |
| मातामही | श्रीमती | कमला | — | वर्मा |
| मातामहः | श्रीमान् | सुरेशः | — | वर्मा |
नोट – यह नमूना है; छात्र अपने वास्तविक परिवार के नाम लिखें। मध्य-नाम न हो तो रिक्त छोड़ें; केवल प्रथमाक्षर (Initial) न लिखकर पूरा कुल-नाम लिखें।
5. कक्षायाः शिक्षिकाणां शिक्षकाणां च पूर्ण-नामानि लिखन्तु —
6. मित्राणां पूर्ण-नामानि लिखन्तु —
अत्र इदम् अवधेयम् (व्याकरण-तालिकाः)
पाठ में निम्नलिखित व्याकरण-बिन्दु ध्यानपूर्वक समझने योग्य हैं।
1. स्वर-भेदाः (समानाक्षर / सन्ध्यक्षर)
| भेदः | ह्रस्वः | दीर्घः |
|---|---|---|
| समानाक्षराणि | अ | आ |
| इ | ई | |
| उ | ऊ | |
| ऋ | ॠ | |
| ऌ | – (दीर्घ नहीं) | |
| सन्ध्यक्षराणि | – (ह्रस्व नहीं) | ए |
| – | ऐ | |
| – | ओ | |
| – | औ |
‘ऌ’ का दीर्घ रूप नहीं होता; सन्ध्यक्षरों (ए, ऐ, ओ, औ) के ह्रस्व रूप नहीं होते – इति पाणिनीय-शिक्षा।
2. सन्ध्यक्षर-निर्माणम् (स्वर-सन्धि)
| सन्धिः | परिणामः |
|---|---|
| अ + इ | ए |
| अ + उ | ओ |
| अ + ए | ऐ |
| अ + ओ | औ |
3. पाणिनीय-शिक्षा-सूत्राणि (उच्चारण-स्थानानि)
| सूत्रम् | उच्चारण-स्थानम् |
|---|---|
| अकुहविसर्जनीयाः कण्ठ्याः | अ आ, क ख ग घ ङ, ह, अः → कण्ठः |
| इचुयशास्तालव्याः | इ ई, च छ ज झ ञ, य, श → तालु |
| ऋटुरषामूर्धन्याः | ऋ, ट ठ ड ढ ण, र, ष → मूर्धा |
| ऌतुलसा दन्त्याः | ऌ, त थ द ध न, ल, स → दन्तः |
| उपूपध्मानीया ओष्ठ्याः | उ ऊ, प फ ब भ म → ओष्ठः |
| ङञणनमाः नासिकास्थानाः | ङ ञ ण न म → स्वस्थानेन सह नासिका |
| ए ऐ कण्ठतालव्यौ | ए, ऐ → कण्ठ + तालु |
| ओ औ कण्ठोष्ठ्यौ | ओ, औ → कण्ठ + ओष्ठ |
| वकारो दन्त्योष्ठ्यः | व → दन्त + ओष्ठ |
| अनुस्वारयमा नासिक्याः | अनुस्वारः (अं) → नासिका |
योग्यताविस्तरः & परियोजनाकार्यम्
योग्यताविस्तरः (ज्ञान-विस्तार)
वर्णों का उच्चारण मुख (Mouth) एवं नासिका (Nose) से होता है; दोनों आस्य (Head) में स्थित हैं। आस्य में सामान्यतः छह उच्चारण-स्थान होते हैं – मुख में पाँच (कण्ठ, तालु, मूर्धा, दन्त, ओष्ठ) तथा नासिका में एक। इन्हीं छह स्थानों से सभी वर्णों की उत्पत्ति होती है, जिसे पाणिनीय-शिक्षा के सूत्रों द्वारा ऊपर तालिका में दर्शाया गया है।
| उच्चारण-स्थानम् | उदाहरण-वर्णाः |
|---|---|
| १. कण्ठ्याः | अ आ, क ख ग घ ङ, ह, अः |
| २. तालव्याः | इ ई, च छ ज झ ञ, य, श |
| ३. मूर्धन्याः | ऋ, ट ठ ड ढ ण, र, ष |
| ४. दन्त्याः | ऌ, त थ द ध न, ल, स |
| ५. ओष्ठ्याः | उ ऊ, प फ ब भ म |
| ६. नासिक्याः | अं, ङ ञ ण न म |
परियोजनाकार्यम् (Project Work)
1. चित्राणि ध्यानेन पश्यन्तु । पक्षिणां पशूनां च ध्वनीनां मात्राः लिखन्तु ।
2. नामान्त्याक्षरी क्रीडा कुर्वन्तु ।
अतिरिक्त प्रश्न (Extra Questions)
लघु उत्तरीय प्रश्न (30–40 शब्द)
1. वर्ण कितने प्रकार के होते हैं?
2. समानाक्षर एवं सन्ध्यक्षर स्वर किसे कहते हैं?
3. व्यञ्जनों के चार भेद कौन-से हैं?
4. अनुनासिक-स्वर किसे कहते हैं?
5. आस्य में वर्णों के कितने उच्चारण-स्थान हैं? नाम लिखिए।
दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (100–120 शब्द)
6. संस्कृत-वर्णमाला में स्वर एवं व्यञ्जन का वर्गीकरण विस्तार से समझाइए।
7. वर्णों के छह उच्चारण-स्थानों को पाणिनीय-शिक्षा के सूत्रों सहित समझाइए।
8. गुणिताक्षर किसे कहते हैं? उदाहरण देकर समझाइए।
MCQ & अभिकथन-कारण
1. वर्ण कितने प्रकार के होते हैं?
(क) एक
(ख) दो (स्वर एवं व्यञ्जन)
(ग) तीन
(घ) चार
2. इनमें से सन्ध्यक्षर स्वर कौन-सा है?
(क) अ
(ख) इ
(ग) ऐ
(घ) उ
3. ‘अ + उ’ की सन्धि से कौन-सा स्वर बनता है?
(क) ए
(ख) ओ
(ग) ऐ
(घ) औ
4. ‘य र ल व’ किस प्रकार के व्यञ्जन हैं?
(क) स्पर्श
(ख) अन्तःस्थ
(ग) ऊष्म
(घ) अयोगवाह
5. ऊष्म-वर्ण कौन-से हैं?
(क) क ख ग घ
(ख) य र ल व
(ग) श ष स ह
(घ) अं अः
6. अयोगवाह वर्ण कौन-से हैं?
(क) ए ऐ
(ख) अं (अनुस्वार) एवं अः (विसर्ग)
(ग) ओ औ
(घ) ङ ञ
7. ‘क ख ग घ ङ’ का उच्चारण-स्थान क्या है?
(क) तालु
(ख) कण्ठ
(ग) मूर्धा
(घ) ओष्ठ
8. ‘प फ ब भ म’ का उच्चारण-स्थान कौन-सा है?
(क) दन्त
(ख) तालु
(ग) ओष्ठ
(घ) नासिका
9. आस्य में वर्णों के कुल कितने उच्चारण-स्थान हैं?
(क) चार
(ख) पाँच
(ग) छह
(घ) सात
10. किस स्वर का दीर्घ रूप नहीं होता?
(क) अ
(ख) इ
(ग) ऌ
(घ) उ
अभिकथन-कारण – नीचे अभिकथन (A) और कारण (R) दिए गए हैं। सही विकल्प चुनिए—
(क) A और R दोनों सही, R, A की सही व्याख्या है। (ख) A और R दोनों सही, पर R, A की सही व्याख्या नहीं। (ग) A सही, R गलत। (घ) A गलत, R सही।
1. अभिकथन (A): व्यञ्जनों के उच्चारण में स्वर की सहायता आवश्यक होती है।
कारण (R): इसीलिए वर्णमाला में प्रत्येक व्यञ्जन के साथ ‘अ’ स्वर जोड़ा जाता है (क् + अ = क)।
2. अभिकथन (A): ‘ए, ऐ, ओ, औ’ सन्ध्यक्षर स्वर हैं।
कारण (R): इन सन्ध्यक्षरों के ह्रस्व रूप भी होते हैं।
3. अभिकथन (A): ‘ङ ञ ण न म’ का उच्चारण नासिका से भी होता है।
कारण (R): ये स्वस्थान के साथ नासिका-स्थान से भी उच्चारित होते हैं (नासिकास्थानाः)।
4. अभिकथन (A): व्यञ्जन के साथ स्वर-मात्रा जोड़ने से गुणिताक्षर बनते हैं।
कारण (R): क् + आ = का, क् + इ = कि – इस प्रकार गुणिताक्षर बनते हैं।
5. अभिकथन (A): ‘व’ दन्त्योष्ठ्य वर्ण है।
कारण (R): इसका उच्चारण केवल कण्ठ-स्थान से होता है।
परीक्षा-सुझाव एवं सामान्य त्रुटियाँ
परीक्षा-सुझाव (Exam Tips)
- स्वर एवं व्यञ्जन का वर्गीकरण (समानाक्षर/सन्ध्यक्षर; स्पर्श/अन्तःस्थ/ऊष्म/अयोगवाह) तालिका सहित याद रखें।
- छह उच्चारण-स्थान एवं उनके पाणिनीय-शिक्षा-सूत्र (अकुहविसर्जनीयाः कण्ठ्याः आदि) कण्ठस्थ करें।
- गुणिताक्षर (क, का, कि, की…) एवं मात्रा-चिह्न शुद्ध लिखने का अभ्यास करें।
- स्वर-सन्धि के सूत्र याद रखें – अ + इ = ए, अ + उ = ओ, अ + ए = ऐ, अ + ओ = औ।
- शब्दार्थ-तालिका के कठिन शब्द (पित्राज्ञा, लाकृतिः, मातॄणम्, कॢप्तम्) शुद्ध मात्रा सहित याद करें।
सामान्य त्रुटियाँ (Common Mistakes)
- ‘ऌ’ का दीर्घ रूप लिख देना – इसका दीर्घ रूप नहीं होता।
- सन्ध्यक्षर (ए, ऐ, ओ, औ) के ह्रस्व रूप मान लेना – इनके ह्रस्व रूप नहीं होते।
- व्यञ्जन के उच्चारण-स्थान में भ्रम (जैसे प-वर्ग को कण्ठ्य कह देना – वह ओष्ठ्य है)।
- अनुस्वार (अं) एवं विसर्ग (अः) को स्वर मान लेना – ये अयोगवाह व्यञ्जन-वर्ण हैं।
- मात्रा-चिह्न (ि, ी, ु, ू) की दिशा/स्थान की अशुद्धि।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
दीपकम् कक्षा 6 का पहला पाठ ‘वयं वर्णमालां पठामः’ किस विषय पर है?
यह पाठ संस्कृत-वर्णमाला (alphabet) पर है। इसमें स्वर एवं व्यञ्जन का वर्गीकरण, अनुनासिक-स्वर, गुणिताक्षर (मात्रा-संयोजन) तथा छह उच्चारण-स्थान सिखाए गए हैं।
संस्कृत में वर्ण कितने प्रकार के होते हैं?
वर्ण दो प्रकार के होते हैं – स्वर (स्वतन्त्र उच्चारण वाले) एवं व्यञ्जन (जिनके उच्चारण में स्वर की सहायता आवश्यक है)।
वर्णों के कितने उच्चारण-स्थान होते हैं?
आस्य (मुख एवं नासिका) में छह उच्चारण-स्थान होते हैं – कण्ठ, तालु, मूर्धा, दन्त, ओष्ठ एवं नासिका। पाणिनीय-शिक्षा के सूत्र बताते हैं कि कौन-से वर्ण किस स्थान से उच्चारित होते हैं।
वर्णमाला, शब्दार्थ-तालिका, प्रश्न एवं अभ्यास-शीर्षक NCERT दीपकम् पुस्तक से ज्यों-के-त्यों लिए गए हैं; व्याख्या, सार एवं उत्तर ClearStudy द्वारा मौलिक रूप से तैयार किए गए हैं। (चित्र-आधारित अभ्यास के नमूना-उत्तर पुस्तक के चित्रों के अनुसार समायोजित करें।)
