Class 8 Sanskrit Deepakam Chapter 11 Solutions — सन्निमित्ते वरं त्यागः (ख-भागः)

Class 8 Sanskrit Deepakam Chapter 11 solutions: वीरवर-कथा का समापन, दो श्लोकों के हिन्दी अर्थ और सात अभ्यासों के उत्तर पढ़ें। प्रश्ननिर्माण, सर्वनाम-सन्दर्भ, सन्धि तथा कर्तृ–कर्म–भाववाच्य समझें।

Class: 8 Subject: Sanskrit Book: Deepakam (दीपकम्) Chapter: 11 पाठ: सन्निमित्ते वरं त्यागः (ख-भागः) प्रति का पुनर्मुद्रण: 2026–27

पाठ का अवलोकन (Chapter Overview)

दीपकम् कक्षा 8 का एकादश पाठ ‘सन्निमित्ते वरं त्यागः (ख-भागः)’ प्रसिद्ध वीरवर-कथा का दूसरा (समापन) भाग है, जो संस्कृत-कथासाहित्य के पिछले पाठ में निर्दिष्ट ‘हितोपदेशः’ की कथा पर आधारित है। यह भाग नाटकीय (संवादात्मक) शैली में लिखा गया है। दशम पाठ (क-भागः) में वीरवर ने राजलक्ष्मी से राजा शूद्रक के दीर्घायु का उपाय जाना था। इस भाग में वीरवर अपने पुत्र शक्तिधर, पत्नी वेदरता एवं पुत्री वीरवती को सारी बात बताता है, और परिवार सहित देवी सर्वमङ्गला को सर्वस्व (पुत्र, स्वयं, पत्नी एवं पुत्री) समर्पित करने को सहर्ष तैयार हो जाता है। यह सब छिपकर देख रहा राजा शूद्रक भी अपना सर्वस्व त्याग करने को उद्यत हो जाता है। प्रसन्न देवी सबको पुनर्जीवित कर देती हैं। पाठ का केन्द्रीय भाव है – श्रेष्ठ कारण (सत्कार्य) के लिए त्याग ही श्रेष्ठ है – स्वामिभक्ति, कर्तव्य, परोपकार एवं निःस्वार्थ बलिदान।

पाठ-परिचय / प्रसंग

यह पाठ संस्कृत की प्रसिद्ध वीरवर-कथा पर आधारित नाट्य-रूपान्तर है। वीरवर राजा शूद्रक का स्वामिभक्त सेवक है। पूर्व-भाग (दशम पाठ) में उसे राजलक्ष्मी से ज्ञात होता है कि राजा की आयु केवल तीन दिन शेष है तथा यदि वीरवर अपनी सर्वप्रिय वस्तु देवी सर्वमङ्गला को समर्पित करे, तो राजा सौ वर्ष जिएगा। इस भाग में वीरवर घर लौटकर अपने पुत्र, पत्नी एवं पुत्री को यह सारी बात बताता है। राजा शूद्रक गुप्त रूप से उनका पीछा करके सब कुछ सुनता एवं देखता है। यह पाठ हमें स्वामिभक्ति, कर्तव्यनिष्ठा एवं श्रेष्ठ उद्देश्य के लिए त्याग की प्रेरणा देता है।

पाठगत श्लोकाः

(पाठ में आए दो श्लोक, ज्यों-के-त्यों।)

धनानि जीवितञ्चैव परार्थे प्राज्ञ उत्सृजेत् ।
सन्निमित्ते वरं त्यागो विनाशे नियते सति ॥ १ ॥

जायन्ते च म्रियन्ते च मादृशाः क्षुद्रजन्तवः ।
अनेन सदृशो लोके न भूतो न भविष्यति ॥ २ ॥ — दीपकम् (कक्षा 8), पाठ ११ – वीरवर-कथा

सार (Hindi Summary)

वीरवर राजा शूद्रक का अत्यन्त स्वामिभक्त सेवक था। पूर्व-भाग में उसे राजलक्ष्मी से ज्ञात हुआ कि राजा का जीवन केवल तीन दिन शेष है, परन्तु यदि वीरवर अपनी सर्वप्रिय वस्तु देवी सर्वमङ्गला को समर्पित कर दे, तो राजा सौ वर्ष तक जीवित रहेगा। इस ख-भाग में वीरवर घर लौटकर सोई हुई पत्नी वेदरता, पुत्र शक्तिधर एवं पुत्री वीरवती को जगाकर सारी बात (राजलक्ष्मी-संवाद) सुनाता है। राजा शूद्रक भी गुप्त रूप से उनके पीछे-पीछे जाकर सारा वार्तालाप सुनता है।

पुत्र शक्तिधर यह सुनकर प्रसन्नता से कहता है कि पिता की सर्वप्रिय वस्तु तो वही (पुत्र) है, अतः स्वामी के जीवन की रक्षा के लिए उसका बलिदान परम प्रशंसनीय है – क्योंकि ‘श्रेष्ठ कारण के लिए धन एवं प्राण का त्याग ही श्रेष्ठ है’। पत्नी एवं पुत्री भी इस कुलोचित कार्य का समर्थन करती हैं। सब देवी सर्वमङ्गला के मन्दिर (आँगन) में जाते हैं। कथा में वीरवर पहले पुत्र और फिर स्वयं का समर्पण करता है; उसके बाद पत्नी और पुत्री भी स्वयं वैसा करती हैं। राजा शूद्रक यह सब अदृश्य रूप से देखता रहता है।

यह देखकर राजा सोचता है कि उसके समान तुच्छ प्राणी तो जन्म-मरण को प्राप्त होते रहते हैं, परन्तु वीरवर जैसा (त्यागी) व्यक्ति न पहले हुआ, न आगे होगा। ऐसे स्वामिभक्त के बिना राज्य एवं जीवन से उसे कोई प्रयोजन नहीं। अतः वह भी अपना सर्वस्व देवी को समर्पित करने उद्यत हो जाता है। प्रसन्न देवी सर्वमङ्गला प्रकट होकर राजा का हाथ पकड़कर उसे रोकती हैं और राजा की प्रार्थना पर वीरवर सहित उसके पुत्र, पत्नी एवं पुत्री को पुनर्जीवित कर देती हैं। सब सकुशल घर लौट आते हैं। अगले दिन राजा वीरवर से रात्रि का समाचार पूछता है; वीरवर विनम्रता से कहता है कि वह स्त्री उसके देखते ही अदृश्य हो गई, और कोई विशेष बात नहीं। राजा अत्यन्त प्रसन्न होकर वीरवर को समस्त कर्णाट-प्रदेश सौंप देता है। इस प्रकार पाठ यह संदेश देता है कि श्रेष्ठ उद्देश्य के लिए किया गया त्याग ही सर्वश्रेष्ठ है।

घर लौटे वीरवर पत्नी वेदरता, पुत्र शक्तिधर और पुत्री वीरवती से संवाद करते हुए
पाठ के आरम्भिक पारिवारिक संवाद का मौलिक कल्पनात्मक चित्र। पात्रों की वेशभूषा और घर कलात्मक पुनर्निर्माण हैं।

शब्दार्थ (Word-meanings)

शब्दः (Sanskrit)हिन्दी अर्थEnglish meaning
आवासम्घरHouse / dwelling
निद्रालसाम्नींद के कारण अलसाई हुई कोTo the one languishing due to sleep
दुहितरम्पुत्री कोDaughter
अवर्णयत्वर्णन कियाDescribed
सानन्दम्प्रसन्नता के साथHappily
विनियोगःनियुक्ति / प्रयोगUtilisation
परमश्लाघ्यःपरम प्रशंसा के योग्यMost appreciable
उत्सृजेत्त्याग देना चाहिएShould sacrifice / give up
सन्निमित्तेअच्छा (श्रेष्ठ) कारण होने परHaving a good cause
वरम्श्रेयस्कर / श्रेष्ठBetter / praiseworthy
आचरितव्यम्आचरण करना चाहिएShould be followed
निस्तारः(ऋण से) मुक्ति, चुकानाRepayment / release
आयतनम्परिसर / आँगनCourtyard / abode
गृह्यताम्स्वीकार करो(May it) be accepted
प्रयोजनम्उद्देश्य / लक्ष्यPurpose
उत्क्षिप्तःऊपर उठाया गयाLifted upward
प्रत्यक्षीभूतयाप्रत्यक्ष रूप से उपस्थित (देवी) के द्वाराBy the one who became manifest
राज्यभङ्गःराज्य का नाशDownfall of the empire
सत्त्वोत्कर्षेणसत्त्वगुण की पराकाष्ठा सेBy excellence of purity (courage)
वात्सल्येनस्नेह / वात्सल्यभाव सेWith affection
प्रासादम्राजभवन / महलPalace
भूपालःराजाKing
क्षुद्रजन्तवःतुच्छ प्राणीLowly creatures

कथा में समर्पण और पुनर्जीवन साहित्यिक–अलौकिक घटनाएँ हैं। वर्तमान जीवन में सेवा, समय, श्रम और साधन साझा करना त्याग की सुरक्षित सीख है; अपने या किसी अन्य के जीवन को हानि पहुँचाना इसका व्यवहारिक आदर्श नहीं है।

अभ्यासः (अभ्यासात् जायते सिद्धिः)

1. निम्नलिखितेषु वाक्येषु रक्तवर्णीयानि स्थूलपदानि आधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत —

(रेखांकित/मोटे पद के आधार पर उपयुक्त प्रश्नवाचक पद लगाकर प्रश्न बनाइए।)

(क) वीरवरो पत्नीं पुत्रं दुहितरञ्च प्राबोधयत् ।

उत्तरकः पत्नीं पुत्रं दुहितरञ्च प्राबोधयत् ?

(ख) ततस्ते सर्वे सर्वमङ्गलाया आयतनं गताः ।

उत्तरततस्ते सर्वे कस्याः आयतनं गताः ?

(ग) वीरवरः वर्तनस्य निस्तारं पुत्रोत्सर्गेण अकरोत् ।

उत्तरवीरवरः वर्तनस्य निस्तारं केन अकरोत् ?

(घ) राजा स्वप्रासादं प्राविशत् ।

उत्तरराजा किम् प्राविशत् ?

(ङ) महीपतिः वीरवराय समग्रकर्णाटप्रदेशम् अयच्छत् ।

उत्तरमहीपतिः कस्मै समग्रकर्णाटप्रदेशम् अयच्छत् ?

2. अधोलिखितान् प्रश्नान् उत्तरत —

(क) वीरवरः किम् अवर्णयत् ?

उत्तरवीरवरः (पत्नीं पुत्रं दुहितरं च प्रबोध्य) अखिलराजलक्ष्मीसंवादम् अवर्णयत् ।

(ख) प्राज्ञः धनानि जीवितञ्च केभ्यः उत्सृजेत् ?

उत्तरप्राज्ञः धनानि जीवितञ्च परार्थे (परेषाम् अर्थाय, परोपकाराय) उत्सृजेत् ।

(ग) केन सदृशः लोके न भूतो न भविष्यति ?

उत्तरअनेन (वीरवरेण) सदृशः लोके न भूतः न भविष्यति च ।

(घ) का अदृश्या अभवत् ?

उत्तर(सा रोदनपरा) राजलक्ष्मीः नारी वीरवरस्य दर्शनात् अदृश्या अभवत् ।

(ङ) सपरिवारः वीरवरः कुत्र गतवान् ?

उत्तरसपरिवारः वीरवरः (देव्याः अनुग्रहेण पुनर्जीवितः सन्) सानन्दं स्वगृहम् गतवान् ।

अभ्यास 1(घ) में स्वप्रासादम् के लिए किम् और (ङ) में वीरवराय के लिए कस्मै आता है। अभ्यास 2(घ) में अन्तिम समाचार की नारी राजलक्ष्मी है; उससे पहले देवी सर्वमङ्गला भी दर्शन देकर अदृश्य होती हैं। उत्तर में प्रसंग स्पष्ट करें।

3. अधोलिखितेषु वाक्येषु रक्तवर्णीयपदानि केभ्यः प्रयुक्तानि इति उदाहरणानुगुणं लिखत —

उदाहरणम् – धन्यः अहम् स्वामिजीवितरक्षार्थं विनियुक्तः । → शक्तिधराय

वाक्यम्रक्तवर्णीयपदं केभ्यः प्रयुक्तम् (उत्तर)
(क) भगवति ! न मे प्रयोजनं राज्येन जीवितेन वा ।शूद्रकाय (राज्ञे) — मे कहने वाला राजा है; भगवति सम्बोधन देवी का है।
(ख) वत्स ! अनेन ते सत्त्वोत्कर्षेण भृत्यवात्सल्येन च परं प्रीतास्मि ।शूद्रकाय (राज्ञे) – देवी राज्ञं प्रति वदति
(ग) धन्याहं यस्या ईदृशो जनको भ्राता च ।वीरवत्यै (वीरवरस्य दुहित्रे)
(घ) तदेतत्परित्यक्तेन मम राज्येनापि किं प्रयोजनम् !शूद्रकाय (राज्ञे)
(ङ) अयम् अपि सपरिवारो जीवतु ।वीरवराय (राजपुत्राय वीरवराय)

4. उदाहरणानुसारं निम्नलिखितानि वाक्यानि अन्वयरूपेण लिखत —

यथा – कृतो मया गृहीतस्वामिवर्तनस्य निस्तारो स्वपुत्रोत्सर्गेण । → गृहीतस्वामिवर्तनस्य निस्तारो मया स्वपुत्रोत्सर्गेण कृतः ।

अन्वयः (उत्तर) (क) नेदानीं राज्यभङ्गस्ते भविष्यति । → इदानीं ते राज्यभङ्गः न भविष्यति । (ख) तेन पातितं स्वशिरः स्वकरस्थखड्गेन । → तेन स्वकरस्थखड्गेन स्वशिरः पातितम् । (ग) तदा ममायुःशेषेणापि जीवतु राजपुत्रो वीरवरः सह पुत्रेण पत्न्या दुहित्रा च । → तदा मम आयुःशेषेण अपि राजपुत्रः वीरवरः पुत्रेण पत्न्या दुहित्रा च सह जीवतु । (घ) तत्क्षणादेव देवी गताऽदर्शनम् । → तत्क्षणात् एव देवी अदर्शनं गता । (ङ) महीपतिस्तस्मै प्रायच्छत् समग्रकर्णाटप्रदेशं राजपुत्राय वीरवराय । → महीपतिः तस्मै राजपुत्राय वीरवराय समग्रकर्णाटप्रदेशं प्रायच्छत् । (च) जायन्ते च म्रियन्ते च मादृशाः क्षुद्रजन्तवः । → मादृशाः क्षुद्रजन्तवः जायन्ते च म्रियन्ते च ।

5. उदाहरणानुगुणम् अधोलिखितानां पदानां पदच्छेदं कुरुत —

यथा – यद्येवमस्मत्कुलोचितम् = यदि-एवम्-अस्मत्-कुलोचितम् ; सत्त्वोत्कर्षेण = सत्त्व-उत्कर्षेण

पदच्छेदः (उत्तर) (क) गृहीतस्वामिवर्तनस्य = गृहीत-स्वामि-वर्तनस्य (ख) निस्तारोपायः = निस्तार-उपायः (ग) गृह्यतामेष = गृह्यताम्-एष (घ) स्वपुत्रोत्सर्गेण = स्व-पुत्र-उत्सर्गेण (ङ) स्वकरस्थखड्गेन = स्व-कर-स्थ-खड्गेन (च) तदेतत्परित्यक्तेन = तत्-एतत्-परित्यक्तेन (छ) स्वशिरश्छेदनार्थमुत्क्षिप्तः = स्व-शिरः-छेदन-अर्थम्-उत्क्षिप्तः (ज) मद्दर्शनाददृश्यताम् = मत्-दर्शनात्-अदृश्यताम् (झ) तत्क्षणादेव = तत्-क्षणात्-एव (ञ) लब्धजीवितः = लब्ध-जीवितः

6. (क) उदाहरणानुगुणं पाठगतानि पदानि अधिकृत्य सन्धियुक्तपदैः रिक्तस्थानानि पूरयत —

यथा – स्व + आवासम् = स्वावासम्

सन्धि (उत्तर) तत् + श्रुत्वा = तच्छ्रुत्वा दुहितरम् + च = दुहितरञ्च धन्यः + अहम् = धन्योऽहम् जीवितम् + च + एव = जीवितञ्चैव विलम्बः + तात = विलम्बस्तात कः + अधुना = कोऽधुना न + आचरितव्यम् = नाचरितव्यम् धन्या + अहम् = धन्याहम् निस्तारः + उपायः = निस्तारोपायः वीरवरः + अवदत् = वीरवरोऽवदत् ततः + असौ = ततोऽसौ ततः + ते = ततस्ते

(ख) निम्नलिखितपदानां सन्धिच्छेदं कुरुत —

सन्धिच्छेदः (उत्तर) शूद्रकोऽपि = शूद्रकः + अपि पुनर्भूपालेन = पुनः + भूपालेन महीपतिस्तस्मै = महीपतिः + तस्मै प्रायच्छत् = प्र + अयच्छत् नृपतिरपि = नृपतिः + अपि सर्वेषामदृश्य = सर्वेषाम् + अदृश्य वार्ताऽन्या = वार्ता + अन्या राज्यभङ्गस्ते = राज्यभङ्गः + ते गतिर्गन्तव्या = गतिः + गन्तव्या इत्युक्त्वा = इति + उक्त्वा नेदानीम् = न + इदानीम् प्रीतास्मि = प्रीता + अस्मि

7. अधोलिखितानि कथनानि कथायाः घटनानुसारं लिखत —

(कथन कथा-घटना के क्रम में लिखिए।)

घटनाक्रमः (उत्तर) (1) (घ) वीरवरो गृहं गत्वा पत्नीं पुत्रं पुत्रीञ्च प्राबोधयत्, सर्वां च वार्ताम् अकथयत् । (2) (ख) पितुः वार्तां श्रुत्वा शक्तिधरः प्रसन्नतया स्वस्य समर्पणार्थं सिद्धः अभवत् । (3) (छ) वीरवरः परिवारेण सह सर्वस्वसमर्पणम् अकरोत् । (4) (क) सर्वं दृष्ट्वा राजा शूद्रकः अपि सर्वस्वसमर्पणार्थं सिद्धः अभवत् । (5) (च) भगवती प्रसन्ना अभवत् । भगवत्याः कृपया सर्वे जीवितवन्तः । (6) (ग) प्रातः राजा वीरवरम् अपृच्छत् ‘ह्यः रात्रौ किम् अभवत्’ ? (7) (ङ) वीरवरेण उक्तम् – स्वामिन् ! न कापि वार्ता । सा नारी अदृश्या अभवत् ।

अत्र इदम् अवधेयम् (वाच्य-तालिकाः)

पाठ में ‘अत्र इदम् अवधेयम्’ के अन्तर्गत वाच्य (Voice) का परिचय दिया गया है। वाच्य तीन प्रकार के होते हैं – (1) कर्तृवाच्यम् (2) कर्मवाच्यम् (3) भाववाच्यम्।

1. कर्तृवाच्यम् (Active Voice)

कर्तृवाच्य में कर्तृपद की प्रथमा विभक्ति होती है तथा क्रियापद कर्तृपद के अनुसार (पुरुष-वचन में) होता है। यदि वाक्य में कर्मपद हो, तो उसकी द्वितीया विभक्ति होती है।

एकवचन/उदाहरणबहुवचन/उदाहरण
बालकः ग्रामं गच्छति ।बालकाः ग्रामं गच्छन्ति ।
त्वं ग्रामं गच्छसि ।यूयं ग्रामं गच्छथ ।
अहं ग्रामं गच्छामि ।वयं ग्रामं गच्छामः ।

2. कर्मवाच्यम् (Passive Voice)

कर्मवाच्य में कर्तृपद की तृतीया विभक्ति, कर्मपद की प्रथमा विभक्ति होती है तथा क्रियापद कर्मपद के अनुसार होता है। पुस्तक लट् के कर्मवाच्य का सरल सूत्र “धातुः + य + आत्मनेपदम्” देती है। वास्तव में धातु में आवश्यक परिवर्तन और आत्मनेपद-प्रत्यय लगते हैं; हर धातु के अक्षर सीधे जोड़ना पर्याप्त नहीं। यथा – गम् + य + ते = गम्यते। एवं – पठ्यते, लिख्यते, खाद्यते।

एकवचन/उदाहरणबहुवचन/उदाहरण
बालकेन ग्रामः गम्यते ।बालकेन ग्रामाः गम्यन्ते ।
त्वया ग्रामः गम्यते ।युष्माभिः ग्रामाः गम्यन्ते ।
मया ग्रामः गम्यते ।अस्माभिः ग्रामाः गम्यन्ते ।

3. भाववाच्यम् (Impersonal Voice)

जब अकर्तृवाच्य वाक्य में कर्मपद का अभाव हो, तब भाववाच्य का प्रयोग होता है। तब कर्तृपद की तृतीया विभक्ति होती है तथा क्रियापद का केवल एक ही अपरिवर्तनीय रूप (प्रथमपुरुष एकवचन) रहता है, जो कर्ता बदलने पर भी नहीं बदलता।

एकवचन/उदाहरणबहुवचन/उदाहरण
बालकेन हस्यते ।बालकैः हस्यते ।
त्वया हस्यते ।युष्माभिः हस्यते ।
मया हस्यते ।अस्माभिः हस्यते ।

ध्यातव्य – पाठ के सामान्य, उपसर्गरहित प्रयोग में कुछ धातुएँ अकर्मक हैं, यथा – हस्, क्रन्द्, स्था, स्ना, शी, भू इत्यादि। इनसे प्रायः भाववाच्य ही बनता है।

योग्यताविस्तरः & परियोजनाकार्यम्

योग्यताविस्तरः (श्लोक एवं सुभाषित)

योग्यताविस्तर में पाठगत दो श्लोकों का पदच्छेद, अन्वय एवं भावार्थ तथा कुछ सुभाषित दिए गए हैं।

धनानि जीवितञ्चैव परार्थे प्राज्ञ उत्सृजेत् ।
सन्निमित्ते वरं त्यागो विनाशे नियते सति ॥ १ ॥
श्लोक 1 – अन्वय एवं भावार्थ पदच्छेदः – धनानि जीवितम् च एव परार्थे प्राज्ञः उत्सृजेत् सन्निमित्ते वरम् त्यागः विनाशे नियते सति । अन्वयः – प्राज्ञः धनानि जीवितम् चैव परार्थे उत्सृजेत् । विनाशे नियते सति सन्निमित्ते त्यागो वरम् । भावार्थः – बुद्धिमान् व्यक्ति को परोपकार के लिए धन एवं जीवन का त्याग करने को तैयार रहना चाहिए। चूँकि शरीर का नाश तो निश्चित ही है, अतः किसी श्रेष्ठ (सत्) कारण के लिए उसका त्याग कर देना ही श्रेष्ठ है।
जायन्ते च म्रियन्ते च मादृशाः क्षुद्रजन्तवः ।
अनेन सदृशो लोके न भूतो न भविष्यति ॥ २ ॥
श्लोक 2 – अन्वय एवं भावार्थ पदच्छेदः – जायन्ते च म्रियन्ते च मादृशाः क्षुद्रजन्तवः अनेन सदृशः लोके न भूतः न भविष्यति । अन्वयः – मादृशाः क्षुद्रजन्तवः जायन्ते च म्रियन्ते च । लोके अनेन सदृशः न भूतः न भविष्यति च । भावार्थः – (राजा सोचता है –) मेरे जैसे तुच्छ प्राणी तो जन्म एवं मृत्यु को प्राप्त होते रहते हैं। किन्तु संसार में वीरवर जैसा (त्यागी एवं स्वामिभक्त) व्यक्ति न पहले हुआ, न आगे होगा।
सुभाषितानि (स्मरणीय) यथा चतुर्भिः कनकं परीक्ष्यते निघर्षण-च्छेदन-ताप-ताडनैः । तथा चतुर्भिः पुरुषः परीक्ष्यते कुलेन शीलेन गुणेन कर्मणा ॥ कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन । मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि ॥ यो हि स्वधर्मनिरतः स तेजस्वी भवेदिह । विना स्वधर्मान्न सुखं स्वधर्मो हि परं तपः ॥

परियोजनाकार्यम् — सरल संस्कृत नाटक का नमूना

पुस्तक में कथा पर नाटक रचकर मंचन का खुला कार्य है। निम्न छोटा रूपान्तरण सुरक्षित सेवा की सीख जोड़ता है; यह पाठ का शब्दशः संवाद नहीं। मूल कथा की चरम घटनाएँ केवल कथावाचक संक्षेप में बताए; शरीर को हानि दिखाने वाला अभिनय या हथियार आवश्यक नहीं।

कथावाचकः: वीरवरः गृहं गत्वा सर्वां वार्ताम् अकथयत्।

वीरवरः: अस्माकं स्वामी सङ्कटे अस्ति। वयं तस्य हितं चिन्तयामः।

शक्तिधरः: पितः! अहम् अपि सेवां कर्तुम् इच्छामि।

वेदरता: परोपकारः उत्तमः। सर्वेषां जीवनं मूल्यवत् अस्ति।

वीरवती: वयं मिलित्वा हितकार्यं कुर्मः।

कथावाचकः: मूलकथायां समर्पणं पुनर्जीवनं च वर्णितम्। ततः सर्वे स्वगृहं गताः।

राजा: वीरवर! तव विनम्रता कर्तव्यनिष्ठा च प्रशंसनीया।

सर्वे: वयं समयेन श्रमेण साधनैः च परोपकारं कुर्मः।

नीचे के अतिरिक्त प्रश्न और MCQ ClearStudy के अभ्यास हैं।

अतिरिक्त प्रश्न (Extra Questions)

अतिरिक्त लघु प्रश्न — ClearStudy अभ्यास

1. यह पाठ किस प्रसिद्ध कथा का कौन-सा भाग है?

उत्तरयह पाठ संस्कृत की प्रसिद्ध वीरवर-कथा का दूसरा (समापन) भाग ‘ख-भागः’ है। पूर्व-भाग (दशम पाठ ‘क-भागः’) में वीरवर राजलक्ष्मी से राजा के दीर्घायु का उपाय जानता है, और इस भाग में परिवार सहित अपना सर्वस्व समर्पित करता है।

2. शक्तिधर ने पिता की बात सुनकर क्या कहा?

उत्तरशक्तिधर ने प्रसन्नता से कहा कि पिता की सर्वप्रिय वस्तु तो वह स्वयं (पुत्र) ही है, अतः स्वामी के जीवन की रक्षा के लिए उसका बलिदान परम प्रशंसनीय है। उसने श्लोक कहा कि श्रेष्ठ कारण के लिए धन एवं प्राण का त्याग ही श्रेष्ठ है।

3. राजा शूद्रक ने सब कुछ देखकर क्या निश्चय किया?

उत्तरवीरवर एवं उसके परिवार का त्याग देखकर राजा शूद्रक ने सोचा कि ऐसे स्वामिभक्त के बिना उसके राज्य एवं जीवन का कोई प्रयोजन नहीं। अतः उसने भी अपना सर्वस्व देवी सर्वमङ्गला को समर्पित करने का निश्चय किया।

4. देवी सर्वमङ्गला ने प्रसन्न होकर क्या किया?

उत्तरदेवी सर्वमङ्गला प्रसन्न होकर प्रत्यक्ष प्रकट हुईं, राजा का हाथ पकड़कर उसे रोका तथा राजा की प्रार्थना पर वीरवर सहित उसके पुत्र, पत्नी एवं पुत्री को पुनर्जीवित कर दिया एवं सबको विजयी होने का आशीर्वाद दिया।

5. अगले दिन राजा के पूछने पर वीरवर ने क्या उत्तर दिया?

उत्तरअगले दिन राजा के पूछने पर वीरवर ने विनम्रता से केवल इतना कहा कि वह रोती हुई स्त्री उसके देखते ही अदृश्य हो गई, और इसके अतिरिक्त कोई विशेष बात नहीं हुई। उसने अपने त्याग का कोई बखान नहीं किया।

अतिरिक्त व्याख्यात्मक प्रश्न — ClearStudy अभ्यास

6. ‘सन्निमित्ते वरं त्यागः’ पाठ का केन्द्रीय संदेश अपने शब्दों में लिखिए।

उत्तरइस पाठ का केन्द्रीय संदेश है – किसी श्रेष्ठ (सत्) उद्देश्य के लिए किया गया त्याग ही सर्वश्रेष्ठ है। वीरवर अपने स्वामी राजा शूद्रक के जीवन की रक्षा के लिए अपने सर्वप्रिय पुत्र, स्वयं, पत्नी एवं पुत्री तक का बलिदान सहर्ष कर देता है।पाठ स्वामिभक्ति, कर्तव्यनिष्ठा, परोपकार एवं निःस्वार्थ त्याग की प्रेरणा देता है। श्लोक स्पष्ट करता है कि शरीर का नाश तो निश्चित है, अतः धन एवं जीवन का प्रयोग परोपकार में करना ही बुद्धिमत्ता है। वीरवर की निःस्वार्थता एवं विनम्रता (वह अपने त्याग का बखान भी नहीं करता) इस पाठ को आदर्शमय बनाती है। अन्ततः उसका त्याग सम्मान एवं समृद्धि (कर्णाट-प्रदेश) के रूप में फलित होता है।

7. वीरवर के चरित्र की विशेषताएँ लिखिए।

उत्तरवीरवर एक आदर्श सेवक है। उसके चरित्र की प्रमुख विशेषताएँ हैं – (1) स्वामिभक्ति – वह स्वामी के प्राणों की रक्षा के लिए अपना सर्वस्व त्यागने को तैयार है। (2) कर्तव्यनिष्ठा – वह राजा से प्राप्त वेतन (वर्तन) का ऋण चुकाने को अपना धर्म मानता है।(3) त्यागशीलता एवं निःस्वार्थता – वह पुत्र, स्वयं, पत्नी एवं पुत्री तक का बलिदान देता है। (4) विनम्रता – राजा के पूछने पर वह अपने महान् त्याग का तनिक भी बखान नहीं करता, केवल इतना कहता है कि वह स्त्री अदृश्य हो गई। (5) धार्मिकता एवं दानशीलता – वह अपने वेतन का बड़ा भाग देवकार्य एवं दरिद्रों में व्यय करता है। इन्हीं गुणों के कारण वह आदर्श-चरित कहलाता है।

8. इस पाठ से हमें कौन-कौन सी शिक्षाएँ मिलती हैं?

उत्तरइस पाठ से अनेक मूल्यवान् शिक्षाएँ मिलती हैं। सर्वप्रथम, श्रेष्ठ उद्देश्य के लिए त्याग ही श्रेष्ठ है – धन एवं प्राण नश्वर हैं, अतः उन्हें परोपकार में लगाना चाहिए। दूसरी शिक्षा है स्वामिभक्ति एवं कर्तव्य-पालन – जिसका अन्न-जल ग्रहण किया हो, उसके प्रति निष्ठा रखनी चाहिए।तीसरी शिक्षा है निःस्वार्थता एवं विनम्रता – सत्कार्य करके उसका अहंकार नहीं करना चाहिए। चौथी शिक्षा है कि सच्चे त्याग एवं सात्त्विकता का सत्कार अवश्य होता है – देवी प्रसन्न होकर सबको जीवनदान देती हैं और राजा वीरवर को समस्त कर्णाट-प्रदेश सौंप देता है। इस प्रकार यह पाठ त्याग, सेवा, कर्तव्य एवं परोपकार के आदर्श प्रस्तुत करता है।

MCQ & अभिकथन-कारण

1. यह पाठ किस कथा का भाग है?

(क) पञ्चतन्त्र की कथा

(ख) वीरवर-कथा

(ग) नल-दमयन्ती कथा

(घ) शकुन्तला कथा

उत्तर(ख) वीरवर-कथा।

2. वीरवर किस राजा का सेवक था?

(क) विक्रमादित्यस्य

(ख) भोजस्य

(ग) शूद्रकस्य

(घ) हर्षस्य

उत्तर(ग) शूद्रकस्य।

3. वीरवर के पुत्र का नाम क्या था?

(क) वीरवती

(ख) शक्तिधरः

(ग) वेदरता

(घ) सर्वमङ्गला

उत्तर(ख) शक्तिधरः।

4. ‘सन्निमित्ते’ पद का अर्थ है—

(क) धन के लिए

(ख) श्रेष्ठ (अच्छा) कारण होने पर

(ग) घर में

(घ) रात्रि में

उत्तर(ख) श्रेष्ठ (अच्छा) कारण होने पर।

5. श्लोक के अनुसार प्राज्ञ को धन एवं जीवन का त्याग किसके लिए करना चाहिए?

(क) स्वार्थाय

(ख) परार्थे

(ग) यशसे

(घ) क्रोधाय

उत्तर(ख) परार्थे (परोपकार के लिए)।

6. किस देवी को सर्वस्व समर्पित किया गया?

(क) सरस्वत्यै

(ख) लक्ष्म्यै

(ग) सर्वमङ्गलायै

(घ) दुर्गायै

उत्तर(ग) सर्वमङ्गलायै।

7. वीरवर की सर्वप्रिय वस्तु क्या था?

(क) धनम्

(ख) स्वपुत्रः (शक्तिधरः)

(ग) खड्गः

(घ) राज्यम्

उत्तर(ख) स्वपुत्रः (शक्तिधरः)।

8. प्रसन्न होकर देवी ने राजा का क्या पकड़ा?

(क) पादम्

(ख) करम् (हाथ)

(ग) खड्गम्

(घ) वस्त्रम्

उत्तर(ख) करम् (हाथ)।

9. प्रसन्न होकर राजा ने वीरवर को क्या दिया?

(क) सुवर्णम्

(ख) समग्रकर्णाटप्रदेशम्

(ग) खड्गम्

(घ) रथम्

उत्तर(ख) समग्रकर्णाटप्रदेशम्। (सम्पूर्ण कर्णाट-प्रदेश)

10. इस पाठ की मुख्य प्रेरणा क्या है?

(क) धन-संचय

(ख) श्रेष्ठ उद्देश्य के लिए त्याग एवं स्वामिभक्ति

(ग) युद्ध

(घ) प्रतिशोध

उत्तर(ख) श्रेष्ठ उद्देश्य के लिए त्याग एवं स्वामिभक्ति।
उत्तर-कुंजी: 1-(ख), 2-(ग), 3-(ख), 4-(ख), 5-(ख), 6-(ग), 7-(ख), 8-(ख), 9-(ख), 10-(ख)

अभिकथन-कारण – नीचे अभिकथन (A) और कारण (R) दिए गए हैं। सही विकल्प चुनिए—
(क) A और R दोनों सही, R, A की सही व्याख्या है। (ख) A और R दोनों सही, पर R, A की सही व्याख्या नहीं। (ग) A सही, R गलत। (घ) A गलत, R सही।

1. अभिकथन (A): वीरवर अपने पुत्र शक्तिधर को देवी को समर्पित करने को तैयार हो गया।

कारण (R): शक्तिधर ही वीरवर की सर्वप्रिय वस्तु था और कथा में राजलक्ष्मी के बताए उपाय को शक्तिधर ने स्वामी के जीवन की रक्षा का कारण माना था।

उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है।

2. अभिकथन (A): राजा शूद्रक भी अपना सर्वस्व त्यागने को उद्यत हो गया।

कारण (R): राजा को धन का लोभ था और वह और अधिक धन पाना चाहता था।

उत्तर(ग) A सही है, किन्तु R गलत है – राजा को धन का लोभ नहीं था; वीरवर जैसे स्वामिभक्त के बिना उसे राज्य एवं जीवन से कोई प्रयोजन नहीं रहा, इसलिए वह त्यागने को उद्यत हुआ।

3. अभिकथन (A): देवी सर्वमङ्गला ने सबको पुनर्जीवित कर दिया।

कारण (R): देवी राजा शूद्रक के सत्त्वोत्कर्ष और अपने सेवक के प्रति वात्सल्य से प्रसन्न हुई थीं।

उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है।

4. अभिकथन (A): अगले दिन वीरवर ने राजा को अपने महान् त्याग का बखान नहीं किया।

कारण (R): वीरवर अत्यन्त विनम्र एवं निःस्वार्थ सेवक था।

उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है।

5. अभिकथन (A): पाठ के अकर्मक प्रयोग में ‘हस्, क्रन्द्, स्था’ आदि धातुओं से प्रायः भाववाच्य बनता है।

कारण (R): ये धातुएँ अकर्मक होती हैं, अतः इनमें कर्म न होने से भाववाच्य का प्रयोग होता है।

उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है।

परीक्षा-सुझाव एवं सामान्य त्रुटियाँ

परीक्षा-सुझाव (Exam Tips)

  • दोनों श्लोक (धनानि जीवितञ्चैव… एवं जायन्ते च म्रियन्ते च…) पदच्छेद, अन्वय एवं भावार्थ सहित कण्ठस्थ करें।
  • तीनों वाच्य (कर्तृ-कर्म-भाव) के लक्षण एवं उदाहरण तालिका सहित याद रखें – इनसे रूपान्तरण का अभ्यास करें।
  • शब्दार्थ (सन्निमित्ते, उत्सृजेत्, निस्तारः, आयतनम्, गृह्यताम्, सत्त्वोत्कर्षेण आदि) हिन्दी एवं अंग्रेज़ी दोनों में याद करें।
  • घटनाक्रम (प्रश्न 7) के लिए कथा को क्रम से समझें – घर लौटना → पुत्र की सहमति → समर्पण → राजा का त्याग → देवी द्वारा जीवनदान → अगले दिन वीरवर का उत्तर।
  • पात्रों के नाम सही याद रखें – वीरवर, पुत्र शक्तिधर, पत्नी वेदरता, पुत्री वीरवती, राजा शूद्रक, देवी सर्वमङ्गला।

सामान्य त्रुटियाँ (Common Mistakes)

  • कर्मवाच्य एवं भाववाच्य में भ्रम – कर्म होने पर कर्मवाच्य, कर्म न होने पर (अकर्मक धातु में) भाववाच्य होता है।
  • कर्मवाच्य/भाववाच्य में कर्ता की तृतीया विभक्ति न लगाना (बालकेन, मया, त्वया)।
  • सन्धि-विच्छेद की भूल – महीपतिस्तस्मै = महीपतिः + तस्मै ; नेदानीम् = न + इदानीम्।
  • पात्रों के नाम में गड़बड़ी – शक्तिधर (पुत्र) को पुत्री समझ लेना।
  • इसे श्लोक-प्रधान पाठ समझना – यह मुख्यतः नाटकीय (संवादात्मक) गद्य-कथा है, जिसमें केवल दो श्लोक हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

दीपकम् कक्षा 8 का पाठ 11 ‘सन्निमित्ते वरं त्यागः (ख-भागः)’ किस पर आधारित है?

यह पाठ संस्कृत की प्रसिद्ध वीरवर-कथा का दूसरा (समापन) भाग है, जो नाटकीय (संवादात्मक) शैली में लिखा गया है। इसमें वीरवर परिवार सहित स्वामी के जीवन की रक्षा हेतु देवी सर्वमङ्गला को सर्वस्व समर्पित कर देता है।

‘सन्निमित्ते वरं त्यागः’ का अर्थ क्या है?

इसका अर्थ है – ‘श्रेष्ठ (अच्छे) कारण के लिए त्याग ही श्रेष्ठ है’। जब विनाश निश्चित ही है, तो बुद्धिमान् को धन एवं जीवन का त्याग परोपकार/सत्कार्य में कर देना ही श्रेयस्कर है।

इस पाठ के मुख्य पात्र कौन-कौन हैं?

मुख्य पात्र हैं – स्वामिभक्त सेवक वीरवर, उसका पुत्र शक्तिधर, पत्नी वेदरता, पुत्री वीरवती, राजा शूद्रक तथा देवी सर्वमङ्गला। अन्त में देवी प्रसन्न होकर सबको पुनर्जीवित कर देती हैं और राजा वीरवर को समस्त कर्णाट-प्रदेश सौंप देता है।

पाठ्यपुस्तक संदर्भ: NCERT दीपकम्, कक्षा 8, पाठ 11, पृष्ठ 124–136; उपलब्ध प्रति का पुनर्मुद्रण 2026–27। उत्तर और व्याख्याएँ ClearStudy की मौलिक शिक्षण सामग्री हैं; खुली गतिविधियों के उत्तर नमूने हैं। आधिकारिक NCERT पुस्तक पोर्टल।

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