Class 9 Sanskrit Sharada Chapter 1 Solutions (NCERT 2026–27) – सत्यं शिवं सुन्दरं संस्कृतम्
This page gives the complete solution for Class 9 Sanskrit Sharada (शारदा) Chapter 1 ‘सत्यं शिवं सुन्दरं संस्कृतम्’ – a melodious गीत (काव्य) by पण्डित वासुदेव-द्विवेदी praising the greatness of the संस्कृत language – with its मूल पाठ (six padyas), original सार (Hindi summary), भावार्थ, शब्दार्थ, and exam-ready answers to every question of the अभ्यास (अभ्यासाद् जायते सिद्धिः) along with extra questions, MCQs, अभिकथन-कारण and FAQs (NCERT 2026–27).
- पाठ का अवलोकन (Chapter Overview)
- कवि-काव्य-परिचय / प्रसंग
- मूल पाठ (गीतम्)
- सार (Hindi Summary)
- शब्दार्थ (सर्वं शब्देन भासते)
- अभ्यासः (अभ्यासाद् जायते सिद्धिः)
- अत्र इदम् अवधेयम् (स्वाध्यायान्मा प्रमदः)
- यस्तु क्रियावान् मनुजः (परियोजनाकार्यम्)
- अतिरिक्त प्रश्न (Extra Questions)
- MCQ & अभिकथन-कारण
- परीक्षा-सुझाव एवं सामान्य त्रुटियाँ
- अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
पाठ का अवलोकन (Chapter Overview)
शारदा कक्षा 9 का प्रथम पाठ ‘सत्यं शिवं सुन्दरं संस्कृतम्’ एक सुमधुर गीत है, जिसकी रचना सार्वभौम-संस्कृत-प्रचार-कार्यालय (वाराणसी) के संस्थापक पण्डित वासुदेव-शास्त्री-द्विवेदी ने की है। पाठ के गद्य-प्रसंग में बताया गया है कि संस्कृत भारत देश की सम्पत्ति है, जिसमें भारतीयों का समस्त ज्ञान-वैभव संचित है; संस्कृत के अध्ययन से मनुष्य ‘सुसंस्कृत’ बनता है। इसी विषय को आधार बनाकर कवि ने यह गीत प्रस्तुत किया है। गीत के छह पद्यों में संस्कृत को भारतीय एकता का साधक, ज्ञान-प्रकाश का दर्शक, विश्वबन्धुत्व एवं विश्वशान्ति का संस्थापक, तथा धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष का प्रदाता बताया गया है। पाठ का केन्द्रीय भाव यह है कि संस्कृत भाषा सत्य, शिव (कल्याणकारी) एवं सुन्दर है तथा हमारे पूर्वजों की कीर्ति की द्योतक है।
कवि-काव्य-परिचय / प्रसंग
इस गीत के रचयिता पण्डित वासुदेव-शास्त्री-द्विवेदी महाभाग हैं, जो वाराणसी में स्थित सार्वभौम-संस्कृत-प्रचार-कार्यालय के संस्थापक थे। उन्होंने सरल संस्कृत में अनेक ग्रन्थों की रचना की तथा संस्कृत-प्रचार के लिए विपुल साहित्य प्रकाशित किया। ‘परमार्थसुधा’ नामक संस्कृत-पत्रिका का सम्पादन भी वे करते थे। सुरभारती-सन्देशः, स्वर्गीय-संस्कृत-कवि-सम्मेलनम्, भोजराज्ये संस्कृत-साम्राज्यम् एवं कौत्सस्य गुरुदक्षिणा आदि उनकी सुप्रसिद्ध कृतियाँ हैं। प्रस्तुत गीत में कवि ने सरल एवं प्रवाहपूर्ण भाषा में संस्कृत भाषा की महिमा का गान किया है।
मूल पाठ (गीतम्)
(गद्य-प्रसंग) संस्कृतं भारतदेशस्य सम्पदस्ति। अस्मिन् भारतीयानां ज्ञानवैभवं सञ्चितमस्ति। संस्कृताध्ययनेन मानवः सुसंस्कृतः भवति। भारतीयभाषाणां सुचारुरूपेण अध्ययनार्थं संस्कृतं नितराम् अपेक्षितम् अस्ति। संस्कृताध्ययनेन किं किं साधितं भवति इति विषयम् अधिकृत्य कविना सुन्दरं गीतं प्रस्तुतम्।
भारतीयत्वसम्पादकं संस्कृतम् ।
ज्ञानपुञ्जप्रभादर्शकं संस्कृतम्
सर्वदानन्दसन्दोहदं संस्कृतम् ॥ १ ॥
सर्वमस्तिष्कसंस्कारकं संस्कृतम्
सर्ववाणीपरिष्कारकं संस्कृतम् ।
सत्पथप्रेरणादायकं संस्कृतम्
सद्गुणग्रामसन्धायकं संस्कृतम् ॥ २ ॥
विश्वबन्धुत्वविस्तारकं संस्कृतम्
सर्वभूतैकताकारकं संस्कृतम् ।
सर्वतः शान्तिसंस्थापकं संस्कृतम्
पञ्चशीलप्रतिष्ठापकं संस्कृतम् ॥ ३ ॥
त्यागसन्तोषसेवाव्रतं संस्कृतम्
विश्वकल्याणनिष्ठायुतं संस्कृतम् ।
ज्ञानविज्ञानसम्मेलनं संस्कृतम्
भुक्तिमुक्तिद्वयोद्वेलनं संस्कृतम् ॥ ४ ॥
धर्मकामार्थमोक्षप्रदं संस्कृतम्
ऐहिकामुष्मिकोत्कर्षदं संस्कृतम् ।
कर्मदं ज्ञानदं भक्तिदं संस्कृतम्
सत्यनिष्ठं शिवं सुन्दरं संस्कृतम् ॥ ५ ॥
शब्दलालित्यलीलावनं संस्कृतम्
चारुमाधुर्यधारागृहं संस्कृतम् ।
विश्वचेतश्चमत्कारकं संस्कृतम्
पूर्वजानां यशः स्मारकं संस्कृतम् ॥ ६ ॥
— पण्डितः वासुदेव-शास्त्री-द्विवेदी
सार (Hindi Summary)
‘सत्यं शिवं सुन्दरं संस्कृतम्’ पाठ संस्कृत भाषा की महिमा का गान करने वाला एक सुमधुर गीत है। आरम्भिक गद्य-प्रसंग में बताया गया है कि संस्कृत भारत देश की अमूल्य सम्पत्ति है, जिसमें भारतीयों का समस्त ज्ञान-वैभव संचित है। संस्कृत के अध्ययन से मनुष्य सुसंस्कृत बनता है तथा भारतीय भाषाओं को भली-भाँति समझने के लिए भी संस्कृत अत्यन्त आवश्यक है। इसी भाव को आधार बनाकर कवि ने छह पद्यों का गीत रचा है।
प्रथम पद्य में कवि कहते हैं कि संस्कृत भारतीयों की एकता का साधक, भारतीयता का सम्पादक, ज्ञान-समूह के प्रकाश का दर्शक तथा सदा आनन्द की परम्परा को जन्म देने वाला है। द्वितीय पद्य में संस्कृत को सबके मस्तिष्क को संस्कारित करने वाला, वाणी को परिष्कृत करने वाला, सन्मार्ग की प्रेरणा देने वाला तथा सद्गुणों के समूह को धारण कराने वाला कहा गया है। तृतीय पद्य में संस्कृत को विश्वबन्धुत्व का विस्तारक, समस्त प्राणियों में एकता का बोधक, सर्वत्र शान्ति का संस्थापक तथा पञ्चशील का प्रतिष्ठापक बताया गया है।
चतुर्थ पद्य में संस्कृत को त्याग, सन्तोष एवं सेवा का व्रत, विश्वकल्याण की निष्ठा से युक्त, ज्ञान-विज्ञान का सम्मेलन तथा भोग एवं मोक्ष दोनों को उद्वेलित करने वाला कहा गया है। पञ्चम पद्य में संस्कृत को धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष का प्रदाता, इस लोक एवं परलोक में उत्कर्ष देने वाला, कर्म-ज्ञान-भक्ति का दाता तथा सत्य, शिव (कल्याणकारी) एवं सुन्दर बताया गया है। षष्ठ पद्य में कवि कहते हैं कि संस्कृत शब्दों के लालित्य की क्रीड़ास्थली एवं माधुर्य-रस का शीतल भवन है; इसके श्रवण से समस्त संसार चमत्कृत हो उठता है और यह हमारे पूर्वजों के यश-राशि की द्योतक है। इस प्रकार यह गीत संस्कृत भाषा की सर्वांगीण महत्ता एवं उसके सत्यं-शिवं-सुन्दरम् स्वरूप को प्रकट करता है।
शब्दार्थ (सर्वं शब्देन भासते)
| शब्दः (Sanskrit) | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| साधकम् | सिद्ध करने वाला | Accomplisher |
| सम्पादकम् | सम्पादित/प्राप्त करने वाला | Producer / bestower |
| पुञ्जः | समूह, राशि | Clump / heap |
| प्रभा | प्रकाश, दीप्ति | Light / radiance |
| सन्दोहदम् | समूह/परम्परा देने वाला | Bestower of abundance |
| परिष्कारकम् | शुद्ध/परिष्कृत करने वाला | Refiner |
| सत्पथः | सत्य/उत्तम मार्ग | Noble path |
| सन्धायकम् | धारण/संयोजन कराने वाला | Binder / uniter |
| विस्तारकम् | विस्तार करने वाला | Expander |
| शान्तिसंस्थापकम् | शान्ति की स्थापना करने वाला | Establisher of peace |
| प्रतिष्ठापकम् | प्रतिष्ठित करने वाला | Establisher |
| उद्वेलनम् | उत्थान/उभाड़ करने वाला | Awakener / upliftment |
| ऐहिकम् | इस लोक का, संसार का | Of this world |
| आमुष्मिकम् | परलोक का | Of the other world |
| उत्कर्षदम् | उन्नति को देने वाला | Bestower of excellence |
| कर्मदम् | पुरुषार्थ/सत्कर्म देने वाला | Bestower of righteous action |
| भक्तिदम् | भक्ति को देने वाला | Bestower of Bhakti |
| चारु | सुन्दर, मनोहर | Beautiful |
| माधुर्यधारा | मधुर रस की धारा | Flow of sweetness |
| लीलावनम् | क्रीड़ा का उद्यान | Garden for play |
| स्मारकम् | स्मरण कराने वाला, द्योतक | Memorial / reminder |
अभ्यासः (अभ्यासाद् जायते सिद्धिः)
1. छात्राः मिलित्वा पृथक् पृथक् पञ्चानां छात्राणां लघुसमूहान् निर्माय यति-गति-लयपूर्वकं गीतगानस्य अभ्यासं करिष्यन्ति ।
2. एकपदेन उत्तरं लिखत —
यथा – ज्ञानपुञ्जप्रभादर्शकं किम् ? → संस्कृतम्
(क) संस्कृतं कस्याः साधकम् ?
(ख) सर्वदा संस्कृतं कस्य सन्दोहदम् ?
(ग) संस्कृतं कस्य प्रेरणादायकम् ?
(घ) संस्कृतं कासां परिष्कारकम् ?
(ङ) कस्य विस्तारकं संस्कृतम् ?
3. अधोलिखितप्रश्नानाम् उत्तराणि पूर्णवाक्येन लिखत —
(क) सर्वतः कस्याः संस्थापकं संस्कृतम् ?
(ख) कीदृशं व्रतं संस्कृतम् ?
(ग) कयोः सम्मेलनं संस्कृतम् ?
(घ) संस्कृतं कस्य चमत्कारकम् ?
(ङ) केषां यशः स्मारकं संस्कृतम् ?
4. रिक्तस्थानानि पूरयन्तु —
यथा – सर्वभूतैकता-कारकं संस्कृतम् ।
5. मञ्जूषायाः पदानि उपयुज्य षड् वाक्यानि रचयत —
मञ्जूषा: वाणीपरिष्कारिका, एकता, सर्वतः, सेवा, सुन्दरम्, पूर्वजानाम्, सत्पथे प्रेरयितुम्, विश्वकल्याणाय, त्यागस्य, सन्तोषस्य, विश्वबन्धुत्वविस्तारकम्
यथा – वाणीपरिष्कारिका संस्कृत-भाषा भवति ।
6. अधोलिखितानां समस्तपदानाम् उदाहरणानुसारं विग्रहं कुरुत —
यथा – भारतीयैकतासाधकम् → भारतीयैकतायाः साधकम् ।
| समस्तपदम् | विग्रहः (उत्तर) |
|---|---|
| (क) ज्ञानपुञ्जप्रभादर्शकम् | ज्ञानपुञ्जप्रभायाः दर्शकम् । |
| (ख) सर्ववाणीपरिष्कारकम् | सर्ववाणीनां परिष्कारकम् । |
| (ग) विश्वबन्धुत्वविस्तारकम् | विश्वबन्धुत्वस्य विस्तारकम् । |
| (घ) सर्वभूतैकताकारकम् | सर्वभूतैकतायाः कारकम् । |
| (ङ) शान्तिसंस्थापकम् | शान्तेः संस्थापकम् । |
| (च) ज्ञानविज्ञानसम्मेलनम् | ज्ञानविज्ञानयोः सम्मेलनम् । |
7. प्रदत्तमञ्जूषातः पर्यायपदानि चित्वा रिक्तस्थाने लिखत —
मञ्जूषा: उल्लासः, किरणः, जगत्, अनुपमा, तेजोराशयः, मानम्
8. अधोलिखितानां मेलनं कुरुत —
| स्तम्भ ‘क’ | स्तम्भ ‘ख’ (दत्त-विकल्पाः) |
|---|---|
| (क) भारतीयैकतायाः | १. विस्तारकम् |
| (ख) सत्पथे | २. साधकम् |
| (ग) त्यागसन्तोषसेवारूपम् | ३. दर्शकम् |
| (घ) ज्ञानपुञ्जप्रभायाः | ४. प्रेरणादायकम् |
| (ङ) विश्वबन्धुत्वस्य | ५. व्रतम् |
अत्र इदम् अवधेयम् (स्वाध्यायान्मा प्रमदः)
पाठ के अन्तर्गत ‘स्वाध्यायान्मा प्रमदः’ शीर्षक में ‘पञ्चशीलं किम्?’ इस विषय की जानकारी दी गई है, जो पाठ के तृतीय पद्य ‘पञ्चशीलप्रतिष्ठापकं संस्कृतम्’ से सम्बद्ध है।
पञ्चशीलम् (बौद्ध-धर्मे)
बौद्ध-धर्म में सदाचरण के पालन के लिए पाँच शील (नियम) बताए गए हैं, जिनका आचरण मनुष्यों के लिए अत्यन्त लाभकारी है –
| क्रमः | शीलम् | तात्पर्यम् |
|---|---|---|
| १. | अहिंसा | किसी प्राणी को कष्ट न देना |
| २. | सत्यम् | सदा सत्य बोलना |
| ३. | अस्तेयम् | चोरी न करना |
| ४. | ब्रह्मचर्यम् | संयमपूर्ण जीवन |
| ५. | मादकद्रव्याणां परिहारः | नशीली वस्तुओं का त्याग |
पाठ में संकलित सुभाषित-श्लोक यह बताते हैं कि संस्कृति का मूल संस्कृत है, जो ज्ञान-विज्ञान का सागर है तथा सत्य एवं अहिंसा के गुणों से युक्त भारतीय संस्कृति विश्वबन्धुत्व एवं विश्वशान्ति की शिक्षिका है।
यस्तु क्रियावान् मनुजः (परियोजनाकार्यम्)
1. “संस्कृताधारिता भारतीयैकता” इति एतं विषयम् आधृत्य एका भाषणप्रतियोगिता आयोजनीया ।
2. विश्वबन्धुत्वभावनायाः विकासाय के मार्गाः अवलम्बनीयाः इति विषयमधिकृत्य सहपाठिभिः सह आलोचनां कुरुत ।
अतिरिक्त प्रश्न (Extra Questions)
लघु उत्तरीय प्रश्न (30–40 शब्द)
1. इस गीत के रचयिता कौन हैं तथा वे किस लिए प्रसिद्ध हैं?
2. गद्य-प्रसंग के अनुसार संस्कृत के अध्ययन से क्या होता है?
3. पञ्चम पद्य में संस्कृत को सत्य, शिव एवं सुन्दर क्यों कहा गया है?
4. तृतीय पद्य में संस्कृत के कौन-से चार गुण बताए गए हैं?
5. षष्ठ पद्य में संस्कृत भाषा को किन-किन रूपकों से सजाया गया है?
दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (100–120 शब्द)
6. ‘सत्यं शिवं सुन्दरं संस्कृतम्’ गीत का केन्द्रीय भाव अपने शब्दों में लिखिए।
7. इस गीत के आरम्भिक गद्य-प्रसंग का सार लिखिए तथा बताइए कि कवि ने यह गीत क्यों रचा।
8. पञ्चशील क्या है? इसका संस्कृत भाषा से क्या सम्बन्ध है?
MCQ & अभिकथन-कारण
1. इस गीत के रचयिता कौन हैं?
(क) पण्डित वासुदेव-शास्त्री-द्विवेदी
(ख) कालिदासः
(ग) भारविः
(घ) माघः
2. इस गीत में कुल कितने पद्य हैं?
(क) चार
(ख) पाँच
(ग) छह
(घ) सात
3. संस्कृतं कस्याः साधकम् ?
(क) धनस्य
(ख) भारतीयैकतायाः
(ग) कलहस्य
(घ) आलस्यस्य
4. ‘ऐहिकम्’ शब्द का अर्थ है—
(क) परलोक का
(ख) इस लोक का
(ग) स्वर्ग का
(घ) पाताल का
5. संस्कृतं सर्वतः कस्याः संस्थापकम् ?
(क) अशान्तेः
(ख) कलहस्य
(ग) शान्तेः
(घ) भयस्य
6. किस पद्य में संस्कृत को ‘सत्यं शिवं सुन्दरम्’ कहा गया है?
(क) प्रथमे
(ख) तृतीये
(ग) पञ्चमे
(घ) षष्ठे
7. ‘पञ्चशीलप्रतिष्ठापकम्’ पद किस धर्म के पञ्चशील की ओर संकेत करता है?
(क) जैन-धर्म
(ख) बौद्ध-धर्म
(ग) सिख-धर्म
(घ) पारसी-धर्म
8. ‘चारु’ शब्द का अर्थ है—
(क) कठोर
(ख) सुन्दर
(ग) कुटिल
(घ) मलिन
9. संस्कृतं कस्य चमत्कारकम् ?
(क) ग्रामस्य
(ख) विश्वचेतसः
(ग) धनस्य
(घ) शत्रोः
10. कवि के अनुसार संस्कृत किसके यश का स्मारक है?
(क) राजानाम्
(ख) पूर्वजानाम्
(ग) देवानाम्
(घ) शत्रूणाम्
अभिकथन-कारण – नीचे अभिकथन (A) और कारण (R) दिए गए हैं। सही विकल्प चुनिए—
(क) A और R दोनों सही, R, A की सही व्याख्या है। (ख) A और R दोनों सही, पर R, A की सही व्याख्या नहीं। (ग) A सही, R गलत। (घ) A गलत, R सही।
1. अभिकथन (A): ‘सत्यं शिवं सुन्दरं संस्कृतम्’ गीत संस्कृत भाषा की महिमा का गान करता है।
कारण (R): इसमें संस्कृत को एकता, ज्ञान, शान्ति, सद्गुण एवं मोक्ष का साधन बताया गया है।
2. अभिकथन (A): संस्कृत को विश्वबन्धुत्व का विस्तारक कहा गया है।
कारण (R): संस्कृत केवल एक देश की भाषा होने के कारण किसी भी प्रकार की एकता का साधन नहीं बन सकती।
3. अभिकथन (A): इस गीत के रचयिता पण्डित वासुदेव-शास्त्री-द्विवेदी हैं।
कारण (R): वे वाराणसी के सार्वभौम-संस्कृत-प्रचार-कार्यालय के संस्थापक थे।
4. अभिकथन (A): पञ्चम पद्य में संस्कृत को सत्य, शिव एवं सुन्दर कहा गया है।
कारण (R): संस्कृत धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष प्रदान करती है तथा इस लोक एवं परलोक में उत्कर्ष देती है।
5. अभिकथन (A): ‘पञ्चशीलप्रतिष्ठापकम्’ पद बौद्ध-धर्म के पञ्चशील की ओर संकेत करता है।
कारण (R): बौद्ध-धर्म में अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य एवं मादक-द्रव्य-परिहार रूपी पाँच शील बताए गए हैं।
परीक्षा-सुझाव एवं सामान्य त्रुटियाँ
परीक्षा-सुझाव (Exam Tips)
- छहों पद्य कण्ठस्थ करें – रिक्तस्थान-पूर्ति एवं पद्य-लेखन के प्रश्न प्रायः इन्हीं से आते हैं।
- हर पद्य की अन्तिम पंक्ति में आने वाले गुण (साधकम्, दर्शकम्, संस्थापकम् आदि) को संस्कृत-शब्द से जोड़कर याद रखें।
- शब्दार्थ हिन्दी एवं अंग्रेज़ी दोनों में याद करें – ऐहिकम्/आमुष्मिकम्, चारु, उद्वेलनम् आदि।
- समास-विग्रह में षष्ठी विभक्ति (भारतीयैकतायाः साधकम्) का सही प्रयोग करें।
- ‘एकपदेन उत्तरम्’ में एक ही शब्द लिखें तथा ‘पूर्णवाक्येन उत्तरम्’ में पूरा वाक्य लिखें।
सामान्य त्रुटियाँ (Common Mistakes)
- संयुक्ताक्षर लिखने में भूल – ‘संस्कृतम्’, ‘पुञ्ज’, ‘सञ्चितम्’ शुद्ध लिखें।
- ऐहिकम् एवं आमुष्मिकम् के अर्थों को आपस में बदल देना।
- कवि का नाम भूल जाना – रचयिता पण्डित वासुदेव-शास्त्री-द्विवेदी हैं।
- समास-विग्रह में गलत विभक्ति लगाना (जैसे ‘शान्तिं संस्थापकम्’ के स्थान पर ‘शान्तेः संस्थापकम्’ ही ठीक है)।
- पञ्चशील को बौद्ध-धर्म के स्थान पर अन्य धर्म से जोड़ देना।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
शारदा कक्षा 9 का पहला पाठ ‘सत्यं शिवं सुन्दरं संस्कृतम्’ किस विधा का है और इसके रचयिता कौन हैं?
यह एक गीत (काव्य) है, जिसकी रचना वाराणसी के सार्वभौम-संस्कृत-प्रचार-कार्यालय के संस्थापक पण्डित वासुदेव-शास्त्री-द्विवेदी ने की है। इसमें संस्कृत भाषा की महिमा का गान किया गया है।
इस गीत में कुल कितने पद्य हैं और इसका मुख्य भाव क्या है?
इस गीत में छह पद्य हैं। मुख्य भाव यह है कि संस्कृत भारतीय एकता, ज्ञान-प्रकाश, विश्वशान्ति एवं सद्गुणों का साधन है तथा धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष प्रदान करने के कारण सत्य, शिव एवं सुन्दर है।
संस्कृत को ‘सत्यं शिवं सुन्दरम्’ क्यों कहा गया है?
क्योंकि संस्कृत सत्य पर आधारित (सत्यनिष्ठ), कल्याणकारी (शिव) तथा शब्द-लालित्य एवं माधुर्य से युक्त (सुन्दर) है। यह कर्म, ज्ञान एवं भक्ति प्रदान करती है तथा इस लोक एवं परलोक में उत्कर्ष देती है।
गीत, भावार्थ, प्रश्न एवं अभ्यास-शीर्षक NCERT शारदा पुस्तक से ज्यों-के-त्यों लिए गए हैं; सार एवं उत्तर ClearStudy द्वारा मौलिक रूप से तैयार किए गए हैं।
