Class 8 Sanskrit Deepakam Appendix 1 — व्याकरणम्
Class 8 Sanskrit Deepakam Appendix 1 व्याकरणम्: उपसर्ग, क्त्वा–ल्यप्–तुमुन्–क्तवतु, 22 धातुओं के रूप, विभक्ति और सन्धि के हिन्दी उदाहरण व अभ्यास।
दीपकम् में 13 मुख्य पाठ हैं। यह परिशिष्ट सहायक संदर्भ सामग्री है; नीचे दिए गए अभ्यास ClearStudy के मौलिक अभ्यास हैं, NCERT के मुद्रित प्रश्न नहीं।
उपसर्गः — धातु के पहले जुड़ने वाला अंश
उपसर्ग धातु या क्रिया के पहले जुड़कर अर्थ बदल सकता है या उसे विशेष अर्थ दे सकता है। गच्छति का अर्थ ‘जाता है’, जबकि आगच्छति का अर्थ ‘आता है’। हर उपसर्ग का हर धातु के साथ एक ही स्थिर अर्थ नहीं होता; पूरे शब्द और वाक्य को देखें।
पुस्तक में दिए 22 उपसर्ग: प्र, परा, अप, सम्, अनु, अव, निस्, निर्, दुस्, दुर्, वि, आङ्, नि, अधि, अपि, अति, सु, उत्, अभि, प्रति, परि, उप। आङ् का प्रयुक्त रूप ‘आ’ दिखाई देता है। निस्/निर् और दुस्/दुर् के रूप अगले वर्ण के अनुसार बदल सकते हैं।
एक से अधिक उपसर्ग भी आ सकते हैं: प्रति + आ + गच्छति → प्रत्यागच्छति (‘वापस आता है’)। संधि के कारण जुड़ने पर रूप बदलता है। पुस्तक के विजयते और विरमति जैसे उदाहरण यह भी बताते हैं कि कुछ धातुओं में उपसर्ग के साथ पद-प्रयोग बदल सकता है; इसे सभी क्रियाओं का नियम न मानें।
प्रत्ययाः — क्त्वा, ल्यप्, तुमुन् और क्तवतु
धातु या शब्द के बाद जुड़ने वाला अंश प्रत्यय है। इस परिशिष्ट में मुख्य रूप से धातु से बनने वाले कृदन्त रूप समझाए गए हैं।
| प्रत्यय | प्रयोग | रूप | मौलिक उदाहरण |
|---|---|---|---|
| क्त्वा | बिना उपसर्ग की धातु; पहली क्रिया पूरी करके दूसरी क्रिया | पठ् → पठित्वा; कृ → कृत्वा | बालकः पुस्तकं पठित्वा लिखति। |
| ल्यप् | उपसर्गयुक्त धातु; क्त्वा के स्थान पर | प्र + नम् → प्रणम्य; आ + नी → आनीय | बालिका गुरुं प्रणम्य पठति। |
| तुमुन् | किस काम के लिए / करने के लिए | गम् → गन्तुम्; कृ → कर्तुम् | सः पठितुं विद्यालयं गच्छति। |
| क्तवतु | कर चुके व्यक्ति का रूप; लिङ्ग-वचन-विभक्ति के अनुसार बदलता है | कृतवान् / कृतवती / कृतवत् | सा कार्यं कृतवती। |
22 धातुओं के रूप — तुलनात्मक सारणी
पृष्ठ 161–162 की धातुओं का क्रम रखा गया है। ल्यप् वाले स्तम्भ में उपसर्ग सहित उदाहरण है; क्तवतु के स्तम्भ में पुल्लिङ्ग, प्रथमा, एकवचन दिया है। मोबाइल पर बड़ी सारणी को दाएँ-बाएँ सरकाएँ।
| धातुः | लट्, प्रथमपुरुष एकवचन | क्त्वा | ल्यप्, उपसर्ग सहित | तुमुन् | क्तवतु |
|---|---|---|---|---|---|
| पठ् | पठति | पठित्वा | प्रपठ्य | पठितुम् | पठितवान् |
| खाद् | खादति | खादित्वा | प्रखाद्य | खादितुम् | खादितवान् |
| हस् | हसति | हसित्वा | विहस्य | हसितुम् | हसितवान् |
| लिख् | लिखति | लिखित्वा | विलिख्य | लेखितुम् | लिखितवान् |
| पा | पिबति | पीत्वा | निपीय | पातुम् | पीतवान् |
| गम् | गच्छति | गत्वा | आगत्य | गन्तुम् | गतवान् |
| त्यज् | त्यजति | त्यक्त्वा | परित्यज्य | त्यक्तुम् | त्यक्तवान् |
| नी | नयति | नीत्वा | आनीय | नेतुम् | नीतवान् |
| कृ | करोति | कृत्वा | अनुकृत्य | कर्तुम् | कृतवान् |
| घ्रा | जिघ्रति | घ्रात्वा | आघ्राय | घ्रातुम् | घ्रातवान् |
| स्था | तिष्ठति | स्थित्वा | प्रस्थाय | स्थातुम् | स्थितवान् |
| नम् | नमति | नत्वा | प्रणम्य | नन्तुम् | नतवान् |
| स्मृ | स्मरति | स्मृत्वा | संस्मृत्य | स्मर्तुम् | स्मृतवान् |
| लुण्ठ् | लुण्ठति | लुण्ठित्वा | विलुण्ठ्य | लुण्ठितुम् | लुण्ठितवान् |
| ज्ञा | जानाति | ज्ञात्वा | विज्ञाय | ज्ञातुम् | ज्ञातवान् |
| क्षाल् | क्षालयति | क्षालयित्वा | प्रक्षाल्य | क्षालयितुम् | क्षालितवान् |
| दा | ददाति | दत्त्वा | प्रदाय | दातुम् | दत्तवान् |
| दृश् | पश्यति | दृष्ट्वा | प्रदृश्य | द्रष्टुम् | दृष्टवान् |
| प्रच्छ् | पृच्छति | पृष्ट्वा | प्रपृच्छ्य | प्रष्टुम् | पृष्टवान् |
| ग्रह् | गृह्णाति | गृहीत्वा | सङ्गृह्य | ग्रहीतुम् | गृहीतवान् |
| वद् | वदति | उदित्वा | प्रोद्य | वदितुम् | उदितवान् |
| क्रीड् | क्रीडति | क्रीडित्वा | प्रक्रीड्य | क्रीडितुम् | क्रीडितवान् |
विभक्तिः — कारक, सम्बन्ध और सम्बोधन
वाक्य में संज्ञा या सर्वनाम का क्रिया तथा दूसरे शब्दों से सम्बन्ध उसके विभक्ति-रूप से समझा जाता है। केवल हिन्दी अनुवाद का एक शब्द देखकर विभक्ति तय न करें।
| विभक्ति / प्रयोग | सम्बन्ध | मौलिक/पुस्तकाधारित उदाहरण | सरल अर्थ |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | कर्ता — कौन? | रामः गच्छति। | राम जाता है। |
| द्वितीया | कर्म — किसे / क्या? | रामः वनं गच्छति। | राम वन जाता है। |
| तृतीया | करण — किस साधन से? | रामः पुष्पकविमानेन गच्छति। | राम पुष्पक विमान से जाता है। |
| चतुर्थी | सम्प्रदान — किसे दिया जाता है? | गुरुः शिष्याय ज्ञानं ददाति। | गुरु शिष्य को ज्ञान देते हैं। |
| पञ्चमी | अपादान — कहाँ से अलग होना? | वृक्षात् पत्रं पतति। | पेड़ से पत्ता गिरता है। |
| षष्ठी | सम्बन्ध — किसका? | रामस्य राजधानी अयोध्या। | राम की राजधानी अयोध्या है। |
| सप्तमी | अधिकरण — कहाँ / किसमें? | छात्राः विद्यालये पठन्ति। | विद्यार्थी विद्यालय में पढ़ते हैं। |
| सम्बोधन | किसी को पुकारना | हे राम! हे सीते! | हे राम! हे सीता! |
छः कारक: कर्तृ, कर्म, करण, सम्प्रदान, अपादान और अधिकरण। षष्ठी सामान्यतः दो शब्दों का सम्बन्ध बताती है, इसलिए इन छः कारकों में नहीं गिनी जाती। सम्बोधन पुकारने का प्रयोग है; उसे आठवाँ कारक न कहें।
उपपदविभक्ति — साथ आए शब्द से विभक्ति
कुछ शब्द अपने साथ प्रयुक्त संज्ञा की विभक्ति निर्धारित करते हैं। नीचे इस पुस्तक में दिए सरल प्रयोग हैं। जैसे सह के साथ पुत्रेण तृतीया है, जबकि नमः के साथ गुरवे चतुर्थी है।
| उपपद | विभक्ति | उदाहरण और अर्थ |
|---|---|---|
| परितः | द्वितीया | ग्रामं परितः — गाँव के चारों ओर |
| उभयतः | द्वितीया | मार्गम् उभयतः — मार्ग के दोनों ओर |
| सह | तृतीया | पुत्रेण सह — पुत्र के साथ |
| अलम् | तृतीया | अलं कोलाहलेन — शोर पर्याप्त है / शोर बंद करो |
| नमः | चतुर्थी | गुरवे नमः — गुरु को नमस्कार |
| बहिः | पञ्चमी | ग्रामाद् बहिः — गाँव के बाहर |
| उपरि | षष्ठी | मन्दिरस्य उपरि — मन्दिर के ऊपर |
| अधः | षष्ठी | वृक्षस्य अधः — वृक्ष के नीचे |
सन्धिः — स्वर और व्यञ्जन के नियम
दो वर्णों के पास आने पर होने वाले वर्ण-परिवर्तन को सन्धि कहते हैं। पुस्तक तीन प्रकार बताती है: स्वर-सन्धि, व्यञ्जन-सन्धि और विसर्ग-सन्धि। इस परिशिष्ट में नीचे दिए स्वर तथा व्यञ्जन नियमों का विवरण है; विसर्ग-सन्धि के विस्तृत नियम यहाँ नहीं दिए गए हैं।
स्वर-सन्धि: अयादि और पूर्वरूप
| नाम | नियम का सार | सही उदाहरण |
|---|---|---|
| अयादि | ए → अय्; ऐ → आय्; ओ → अव्; औ → आव्, आगे स्वर होने पर | शे + अनम् → शयनम् गै + अकः → गायकः भो + अनम् → भवनम् नौ + इकः → नाविकः |
| पूर्वरूप | पदान्त ए/ओ के बाद अ आने पर ए/ओ बना रहता है; लुप्त अ का चिह्न ऽ है | ते + अपि → तेऽपि सर्वे + अपि → सर्वेऽपि नमो + अस्तु → नमोऽस्तु विष्णो + अव → विष्णोऽव |
पूर्वरूप की पदान्त वाली स्थिति को पहचानें; हर ए/ओ + अ पर बिना प्रसंग देखे अयादि न लगाएँ। अवग्रह ‘ऽ’ लुप्त अ को दिखाता है, अलग स्वर नहीं है।
व्यञ्जन-सन्धि: पाँच नियम
| नियम | सरल पहचान | उदाहरण |
|---|---|---|
| श्चुत्व | स् / तवर्ग का श् / चवर्ग के पास आकर सम्बद्ध श् / चवर्ग में बदलना | तत् + चित्रम् → तच्चित्रम् उत् + चारणम् → उच्चारणम् मनस् + चञ्चलम् → मनश्चञ्चलम् |
| जश्त्व | पदान्त वर्गीय वर्ण का स्वर या घोष वर्ण से पहले अपने वर्ग के तीसरे वर्ण में बदलना; पाँचवाँ वर्ण इसमें नहीं | वाक् + अर्थौ → वागर्थौ जगत् + ईशः → जगदीशः दिक् + गजाः → दिग्गजाः |
| अनुस्वार | पदान्त म् के बाद व्यञ्जन आने पर ं | रामम् + वन्दे → रामं वन्दे गृहम् + गच्छ → गृहं गच्छ |
| परसवर्ण | अनुस्वार के बाद वर्गीय व्यञ्जन हो तो उसके वर्ग का अनुनासिक; पदान्त में विकल्प मिलता है | अं + कितः → अङ्कितः कं + पते → कम्पते गृहं + गच्छ → गृहङ्गच्छ / गृहं गच्छ |
| णत्व | एक ही पद में ऋ, र् या ष् के प्रभाव से निश्चित शर्तों में न् → ण् | प्र + नमति → प्रणमति कृष्णः, विष्णुः, वर्णः |
ClearStudy अभ्यास — उत्तर सहित
ये पुनरावृत्ति के लिए बनाए गए मौलिक प्रश्न हैं। पहले स्वयं हल करें, फिर उत्तर देखें।
| प्रश्न | उत्तर और कारण |
|---|---|
| 1. गम् + क्त्वा का रूप लिखिए। | गत्वा। |
| 2. प्र + नम् + ल्यप् का रूप लिखिए। | प्रणम्य। |
| 3. कृ + तुमुन् का रूप लिखिए। | कर्तुम्। |
| 4. सा कार्यं ___। (कृतवान् / कृतवती) | कृतवती; सा स्त्रीलिङ्ग है। |
| 5. गुरवे नमः — गुरवे की विभक्ति? | चतुर्थी; नमः के साथ चतुर्थी। |
| 6. वृक्षात् पत्रं पतति — वृक्षात् का कारक? | अपादान; वृक्षात् पञ्चमी एकवचन है। |
| 7. जगत् + ईशः की सन्धि कीजिए। | जगदीशः — जश्त्व। |
| 8. सर्वेऽपि का विच्छेद कीजिए। | सर्वे + अपि — पूर्वरूप। |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
क्या यह दीपकम् का पाठ 14 है?
नहीं। पुस्तक के 13 मुख्य पाठों के बाद परिशिष्टम् १ — व्याकरणम् है। स्थानीय फाइल hsde114.pdf इसी परिशिष्ट की है।
क्त्वा और ल्यप् में क्या अन्तर है?
बिना उपसर्ग की धातु से सामान्यतः क्त्वा रूप बनता है, जैसे गत्वा। उपसर्गयुक्त धातु में उसी पहले-क्रिया वाले प्रयोग के लिए ल्यप् आता है, जैसे आगत्य। दोनों अव्यय हैं।
क्या षष्ठी विभक्ति एक कारक है?
इस पुस्तक के छः कारकों में षष्ठी नहीं है। षष्ठी सामान्यतः शब्दों का सम्बन्ध दिखाती है, जैसे रामस्य राजधानी।
पठ् की पंक्ति में सम्पूज्य क्यों नहीं दिया गया?
सम्पूज्य सम् + पूज् से बना है, पठ् से नहीं। स्रोत की पंक्ति में यह असंगति है; यहाँ पठ् का उदाहरण प्रपठ्य देकर अन्तर स्पष्ट किया गया है।
मूल पुस्तक का स्रोत: NCERT का आधिकारिक पाठ्यपुस्तक पोर्टल। इस पृष्ठ की व्याख्या और मौलिक अभ्यास ClearStudy के हैं।
