Class 6 Sanskrit Deepakam Chapter 2 Solutions (NCERT 2026–27) – संयुक्त-व्यञ्जनानि
This page gives the complete solution for Class 6 Sanskrit Deepakam (दीपकम्) Chapter 2 ‘संयुक्त-व्यञ्जनानि’ – a grammar (वर्ण) lesson on conjunct consonants (क्ष, त्र, ज्ञ, द्य …). It includes the मूल पाठ explanation, सार, शब्दार्थ from the book, and original, exam-ready solutions to every exercise of the lesson – वर्ण-वियोगः (letter-segmentation), वर्ण-संयोगः (letter-combination) and परियोजनाकार्यम् – along with extra questions, MCQs, अभिकथन-कारण and FAQs.
- पाठ का अवलोकन (Chapter Overview)
- पाठ-परिचय / प्रसंग
- मूल पाठ (संयुक्त-व्यञ्जन-निर्माणम्)
- सार (Hindi Summary)
- शब्दार्थ (वयं शब्दार्थान् जानीमः)
- अभ्यासः (वर्ण-वियोगः, वर्ण-संयोगः)
- अत्र इदम् अवधेयम् (व्याकरण-तालिकाः)
- परियोजनाकार्यम्
- अतिरिक्त प्रश्न (Extra Questions)
- MCQ & अभिकथन-कारण
- परीक्षा-सुझाव एवं सामान्य त्रुटियाँ
- अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
पाठ का अवलोकन (Chapter Overview)
दीपकम् कक्षा 6 का द्वितीय पाठ ‘संयुक्त-व्यञ्जनानि’ एक वर्ण-परिचय (व्याकरण) पाठ है। इसमें यह बताया गया है कि जब दो अथवा अनेक व्यञ्जन-वर्णों का मेल होता है, तब संयुक्त-व्यञ्जन बनते हैं – जैसे क्ष, त्र, ज्ञ, द्य आदि। पाठ में यह स्पष्ट किया गया है कि संयुक्त-व्यञ्जन कोई नए वर्ण नहीं हैं, अपितु पृथक्-पृथक् व्यञ्जन-वर्णों के मेल की एक विशिष्ट लेखन-शैली मात्र हैं, तथा इनमें मिलने वाला स्वर इनमें अन्तर्भूत (छिपा) नहीं रहता। पाठ का केन्द्रीय उद्देश्य छात्रों को वर्ण-वियोग (वर्ण-विश्लेषण) एवं वर्ण-संयोग (वर्ण-संश्लेषण) का अभ्यास कराना तथा शुद्ध-वर्तनी की नींव दृढ़ करना है।
पाठ-परिचय / प्रसंग
संस्कृत में प्रत्येक व्यञ्जन के साथ ‘अ’ स्वर अन्तर्निहित रहता है (यथा क् + अ = क)। जब किसी व्यञ्जन में स्वर नहीं मिलता और वह अगले व्यञ्जन से सीधे जुड़ जाता है, तब हलन्त (्) के साथ संयुक्त-व्यञ्जन बनता है। यह पाठ छात्रों को संयुक्त-व्यञ्जनों के निर्माण, उनके वर्ण-वियोग (किसी पद को उसके मूल वर्णों में अलग करना) तथा वर्ण-संयोग (वर्णों को जोड़कर पद बनाना) का अभ्यास कराता है। यह पाठ पूर्णतया अभ्यास-प्रधान है, अतः इसमें श्लोक/कथा के स्थान पर उदाहरण एवं अभ्यास दिए गए हैं।
मूल पाठ (संयुक्त-व्यञ्जन-निर्माणम्)
(पाठ में दिए गए उदाहरण, ज्यों-के-त्यों।)
द्वयोः बहूनां वा व्यञ्जन-वर्णानां मेलनेन संयुक्त-व्यञ्जनानि भवन्ति –
| संयुक्त-व्यञ्जनम् | वर्ण-निर्माणम् | उदाहरण-पदम् |
|---|---|---|
| क्ष | क् + ष् + अ | कक्षा = क् + अ + क् + ष् + आ |
| त्र | त् + र् + अ | पत्रम् = प् + अ + त् + र् + अ + म् |
| ज्ञ | ज् + ञ् + अ | ज्ञानम् = ज् + ञ् + आ + न् + अ + म् |
| द्य | द् + य् + अ | विद्या = व् + इ + द् + य् + आ |
एवं सर्वेषां व्यञ्जनानां – सर्वैः व्यञ्जनैः सह मेलनं सम्भवति । तेन बहुविधानि संयुक्त-व्यञ्जनानि भवन्ति, यथा – क्य (चाणक्यः), क्र (क्रमः), द्म (पद्मम्), र्ण (अर्णवः), न्द्र (इन्द्रः), ष्ट्र (उष्ट्रः), न्त्र (मन्त्रः), ष्ठ्य (ओष्ठ्यः), न्ध्य (सन्ध्या) इत्यादि ।
* एतानि संयुक्त-व्यञ्जनानि नवीनाः वर्णाः न सन्ति, अपितु पृथक्-पृथक् संयुक्त-व्यञ्जन-वर्णानां विशिष्टा लेखन-शैली एव । एतैः सह आगतः स्वरः संयुक्त-व्यञ्जनेषु अन्तर्भूतः नास्ति ।
सार (Hindi Summary)
‘संयुक्त-व्यञ्जनानि’ पाठ संस्कृत-व्याकरण की एक मूलभूत इकाई है। इसमें बताया गया है कि जब दो या अधिक व्यञ्जन-वर्ण आपस में मिलते हैं, तब संयुक्त-व्यञ्जन बनते हैं। जैसे – क् + ष् + अ = क्ष, त् + र् + अ = त्र, ज् + ञ् + अ = ज्ञ, द् + य् + अ = द्य। इन्हें पदों में देखा जा सकता है – कक्षा, पत्रम्, ज्ञानम्, विद्या आदि।
पाठ यह स्पष्ट करता है कि सभी व्यञ्जनों का परस्पर मेल सम्भव है, जिससे अनेक प्रकार के संयुक्त-व्यञ्जन (क्य, क्र, द्म, र्ण, न्द्र, ष्ट्र, न्त्र आदि) बनते हैं। एक महत्त्वपूर्ण बात यह बताई गई है कि संयुक्त-व्यञ्जन कोई नए वर्ण नहीं हैं; ये केवल पृथक् व्यञ्जन-वर्णों के मेल की एक विशेष लेखन-शैली हैं, तथा इनके साथ आने वाला स्वर इनमें छिपा हुआ नहीं रहता (वह अलग से दिखाया जाता है)।
पाठ में मुख्यतः दो अभ्यास हैं – वर्ण-वियोगः (किसी पद को उसके मूल वर्णों में तोड़कर लिखना, जैसे अजः = अ + ज् + अ + ः) तथा वर्ण-संयोगः (दिए गए वर्णों को जोड़कर पद बनाना, जैसे द् + आ + श् + अ + र् + अ + थ् + इ + ः = दाशरथिः)। साथ ही ‘वयं शब्दार्थान् जानीमः’ के अन्तर्गत कठिन शब्दों के अर्थ दिए गए हैं और अन्त में ‘परियोजनाकार्यम्’ के रूप में संयुक्त-व्यञ्जन-पदों का संग्रह करने का कार्य दिया गया है। संक्षेप में, यह पाठ शुद्ध-वर्तनी, उच्चारण एवं संस्कृत-लेखन की दृढ़ नींव रखता है।
शब्दार्थ (वयं शब्दार्थान् जानीमः)
| शब्दः (Sanskrit) | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| अर्णवः | समुद्र, सागर | Sea / Ocean |
| उष्ट्रः | ऊँट (क्रमेलकः) | Camel |
| बाह्यम् | बाहरी, बाहर स्थित | External |
| ग्रहणम् | स्वीकार करना / पकड़ना, धारण | Taking / holding |
| वज्रम् | इन्द्र का शस्त्र / हीरा | Indra’s weapon / Diamond |
| द्रष्टा | देखने वाला | Spectator / Seer |
| ब्रह्म | परमात्मा, परमेश्वर | Ultimate Reality / Supreme God |
| देवाः | संसार की पूजनीय शक्तियाँ एवं विभूतियाँ | Divine forces & powers of the Universe |
| ऋषिः | तपस्वी, मन्त्रद्रष्टा | Sage / Seer |
| प्रगतिः | विकास, उन्नति | Development |
| ब्रह्मचारी | विद्या व संयम-व्रत रखने वाला | Celibate |
| जाह्नवी | जह्नु ऋषि की पुत्री – गङ्गा | Rishi Jahnu’s daughter – Ganga |
| सप्तर्षिः | सात महान् ऋषियों का समूह | Group of Seven Great Sages |
| ढक्का | ढोल, डंका, नगाड़ा (डमरुः) | Drum |
| वित्तम् | धन / पैसे | Money / prosperity |
| पङ्कजम् | कमल (पद्मम्) | Lotus |
| सन्धिः | दो वर्णों का मेल | Joining of two letters |
| संयमः | आत्म-नियन्त्रण, आत्मानुशासन | Self-control |
| राष्ट्रम् | राष्ट्र / देश | Nation |
| मत्स्यः | मछली (मीनः) | Fish |
| स्वस्तिकः | शुभ चिह्न, मङ्गल-चिह्न | Auspicious symbol |
| सङ्गणकम् | सङ्गणक-यन्त्र, कम्प्यूटर | Computer |
| कन्दुकः | गेंद (गेन्दुकः) | Ball |
अभ्यासः (वर्ण-वियोगः एवं वर्ण-संयोगः)
1. वर्ण-वियोगः (मूल वर्णों में पृथक् कीजिए)
(रिक्त-स्थान वाले पदों का वर्ण-वियोग; पाठ में दिए गए हल-सहित उदाहरण भी सम्मिलित हैं।)
2. संयुक्त-व्यञ्जन-पदानां वर्ण-वियोगः
(संयुक्त-व्यञ्जन से युक्त पदों का वर्ण-वियोग; पाठ-दत्त हल-सहित उदाहरण भी सम्मिलित।)
| संयुक्त-व्यञ्जनम् – पदम् | वर्ण-वियोगः (उत्तर) |
|---|---|
| क्य – वाक्यम् | व् + आ + क् + य् + अ + म् |
| न्य – मूर्धन्यः | म् + ऊ + र् + ध् + अ + न् + य् + अ + ः |
| व्य – तालव्यः | त् + आ + ल् + अ + व् + य् + अ + ः |
| ह्य – बाह्यम् | ब् + आ + ह् + य् + अ + म् |
| क्र – क्रीडा | क् + र् + ई + ड् + आ |
| ग्र – ग्रहणम् | ग् + र् + अ + ह् + अ + ण् + अ + म् |
| ज्र – वज्रः | व् + अ + ज् + र् + अ + ः |
| द्र – द्रष्टा | द् + र् + अ + ष् + ट् + आ |
| प्र – प्रगतिः | प् + र् + अ + ग् + अ + त् + इ + ः |
| ब्र – ब्रह्म | ब् + र् + अ + ह् + म् + अ |
| ह्म – ब्रह्मचारी | ब् + र् + अ + ह् + म् + अ + च् + आ + र् + ई |
| ह्न – जाह्नवी | ज् + आ + ह् + न् + अ + व् + ई |
| ध्व – ध्वनिः | ध् + व् + अ + न् + इ + ः |
| स्व – सरस्वती | स् + अ + र् + अ + स् + व् + अ + त् + ई |
| र्ण – वर्णः | व् + अ + र् + ण् + अ + ः |
| र्म – कर्म | क् + अ + र् + म् + अ |
| र्ष – सप्तर्षिः | स् + अ + प् + त् + अ + र् + ष् + इ + ः |
| क्क – ढक्का | ढ् + अ + क् + क् + आ |
| त्त – वित्तम् | व् + इ + त् + त् + अ + म् |
| द्ध – सिद्धार्थः | स् + इ + द् + ध् + आ + र् + थ् + अ + ः |
| द्म – पद्मम् | प् + अ + द् + म् + अ + म् |
| ब्द – शब्दः | श् + अ + ब् + द् + अ + ः |
| ङ्क – पङ्कजम् | प् + अ + ङ् + क् + अ + ज् + अ + म् |
| ञ्ज – व्यञ्जनम् | व् + य् + अ + ञ् + ज् + अ + न् + अ + म् |
| ण्ठ – कण्ठः | क् + अ + ण् + ठ् + अ + ः |
| न्ध – सन्धिः | स् + अ + न् + ध् + इ + ः |
| म्भ – प्रारम्भः | प् + र् + आ + र् + अ + म् + भ् + अ + ः |
| स्क – सँस्कर्ता | स् + अँ + स् + क् + अ + र् + त् + आ |
| स्क – काँस्कान् | क् + आँ + स् + क् + आ + न् |
| स्मिँ – कस्मिँश्चिद् | क् + अ + स् + म् + इँ + श् + च् + इ + द् |
| ंय – संयमः | स् + अ + ं + य् + अ + म् + अ + ः |
| ंव – संवादः | स् + अ + ं + व् + आ + द् + अ + ः |
| ंस – हंसः | ह् + अ + ं + स् + अ + ः |
| ःख – दुःखम् | द् + उ + ः + ख् + अ + म् |
| ःक – प्रातःकालः | प् + र् + आ + त् + अ + ः + क् + आ + ल् + अ + ः |
| न्द्र – इन्द्रः | इ + न् + द् + र् + अ + ः |
| न्त्र – मन्त्री | म् + अ + न् + त् + र् + ई |
| ष्ट्र – राष्ट्रम् | र् + आ + ष् + ट् + र् + अ + म् |
| ण्ठ्य – कण्ठ्यः | क् + अ + ण् + ठ् + य् + अ + ः |
| न्त्य – दन्त्यः | द् + अ + न् + त् + य् + अ + ः |
| त्स्य – मत्स्यः | म् + अ + त् + स् + य् + अ + ः |
| ष्ठ्य – ओष्ठ्यः | ओ + ष् + ठ् + य् + अ + ः |
| न्ध्य – सन्ध्यक्षरम् | स् + अ + न् + ध् + य् + अ + क् + ष् + अ + र् + अ + म् |
| ंस्क – संस्कृतम् | स् + अ + ं + स् + क् + ऋ + त् + अ + म् |
| ष्ट्य – धाष्ट्र्यम् | ध् + आ + र् + ष् + ट् + य् + अ + म् |
| र्त्स्न्य – कार्त्स्न्यम् | क् + आ + र् + त् + स् + न् + य् + अ + म् |
3. वर्ण-संयोगः (वर्णों को जोड़कर पद बनाइए)
(दिए गए वर्णों के संयोग से बनने वाला पद; पाठ-दत्त हल-सहित उदाहरण भी सम्मिलित।)
| वर्ण-समूहः | संयुक्त-पदम् (उत्तर) |
|---|---|
| द् + आ + श् + अ + र् + अ + थ् + इ + ः | दाशरथिः |
| ह् + इ + म् + आ + ल् + अ + य् + अ + ः | हिमालयः |
| क् + ऋ + ष् + ण् + अ + ः | कृष्णः |
| न् + अ + र् + ए + न् + द् + र् + अ + ः | नरेन्द्रः |
| म् + अ + ञ् + ज् + उ + ल् + अ + ः | मञ्जुलः |
| प् + उ + ष् + क् + अ + र् + अ + ः | पुष्करः |
| क् + उ + क् + क् + उ + ट् + अ + ः | कुक्कुटः |
| स् + व् + अ + स् + त् + इ + क् + अ + ः | स्वस्तिकः |
| श् + इ + क् + ष् + अ + क् + अ + ः | शिक्षकः |
| स् + अ + ङ् + ग् + अ + ण् + अ + क् + अ + म् | सङ्गणकम् |
| क् + अ + न् + द् + उ + क् + अ + ः | कन्दुकः |
| ध् + आ + र् + ष् + ट् + य् + अ + म् | धाष्ट्र्यम् |
| क् + आ + र् + त् + स् + न् + य् + अ + म् | कार्त्स्न्यम् |
अत्र इदम् अवधेयम् (व्याकरण-तालिकाः)
संयुक्त-व्यञ्जन से सम्बन्धित निम्नलिखित बिन्दु ध्यान देने योग्य हैं।
1. संयुक्त-व्यञ्जन-निर्माणम्
दो या अधिक व्यञ्जनों के मेल से संयुक्त-व्यञ्जन बनते हैं। प्रथम व्यञ्जन हलन्त (्) रूप में रहता है तथा अन्तिम व्यञ्जन के साथ स्वर जुड़ता है।
| संयुक्त-व्यञ्जनम् | घटक-वर्णाः | उदाहरणम् |
|---|---|---|
| क्ष | क् + ष् | कक्षा, क्षत्रियः |
| त्र | त् + र् | पत्रम्, मित्रम् |
| ज्ञ | ज् + ञ् | ज्ञानम्, यज्ञः |
| श्र | श् + र् | श्रमः, श्रीः |
2. वर्ण-वियोगः एवं वर्ण-संयोगः
| प्रक्रिया | अर्थः | उदाहरणम् |
|---|---|---|
| वर्ण-वियोगः | पद को मूल वर्णों में अलग करना (विश्लेषण) | विद्या = व् + इ + द् + य् + आ |
| वर्ण-संयोगः | वर्णों को जोड़कर पद बनाना (संश्लेषण) | क् + अ + क् + ष् + आ = कक्षा |
ध्यातव्यम् – प्रत्येक व्यञ्जन में ‘अ’ स्वर स्वतः अन्तर्निहित रहता है; हलन्त (्) लगाने पर वह स्वर हट जाता है (यथा क = क् + अ, किन्तु क् केवल व्यञ्जन)।
परियोजनाकार्यम् (Project Work)
प्रथम-पाठद्वयं विहाय अस्मिन् पुस्तके आगतानां दशानां संयुक्त-व्यञ्जन-पदानां संग्रहणं कुर्वन्तु । तेषां वर्ण-वियोगम् अपि कुर्वन्तु ।
अतिरिक्त प्रश्न (Extra Questions)
लघु उत्तरीय प्रश्न (30–40 शब्द)
1. संयुक्त-व्यञ्जन किसे कहते हैं? एक उदाहरण दीजिए।
2. वर्ण-वियोग एवं वर्ण-संयोग में क्या अन्तर है?
3. क्या संयुक्त-व्यञ्जन नए वर्ण हैं? स्पष्ट कीजिए।
4. ‘ज्ञानम्’ एवं ‘पत्रम्’ का वर्ण-वियोग कीजिए।
पत्रम् = प् + अ + त् + र् + अ + म्।
5. प्रत्येक व्यञ्जन में कौन-सा स्वर स्वतः रहता है? हलन्त लगाने पर क्या होता है?
दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (100–120 शब्द)
6. संयुक्त-व्यञ्जन क्या हैं? चार उदाहरण देकर इनके निर्माण को समझाइए।
7. वर्ण-वियोग एवं वर्ण-संयोग के अभ्यास का संस्कृत-लेखन में क्या महत्त्व है?
8. पाठ में आए किन्हीं पाँच संयुक्त-व्यञ्जन-पदों का अर्थ-सहित परिचय दीजिए।
MCQ & अभिकथन-कारण
1. संयुक्त-व्यञ्जन किसके मेल से बनते हैं?
(क) दो या अधिक स्वरों के
(ख) दो या अधिक व्यञ्जनों के
(ग) स्वर एवं अनुस्वार के
(घ) केवल विसर्ग के
2. ‘क्ष’ किन वर्णों के मेल से बनता है?
(क) क् + ष्
(ख) क् + श्
(ग) ख् + ष्
(घ) च् + छ्
3. ‘ज्ञ’ का सही वर्ण-निर्माण है—
(क) ज् + न्
(ख) ज् + ञ्
(ग) य् + ज्
(घ) ज् + ण्
4. ‘विद्या’ का सही वर्ण-वियोग है—
(क) व् + इ + द् + य् + आ
(ख) व् + ई + द् + य् + अ
(ग) व + इ + द + या
(घ) व् + य् + इ + द् + आ
5. प्रत्येक व्यञ्जन में स्वतः कौन-सा स्वर अन्तर्निहित रहता है?
(क) इ
(ख) उ
(ग) अ
(घ) आ
6. ‘पत्रम्’ में प्रयुक्त संयुक्त-व्यञ्जन कौन-सा है?
(क) क्ष
(ख) त्र
(ग) ज्ञ
(घ) द्य
7. वर्ण-संयोग का अर्थ है—
(क) पद को वर्णों में अलग करना
(ख) वर्णों को जोड़कर पद बनाना
(ग) स्वर हटाना
(घ) मात्रा गिनना
8. ‘उष्ट्रः’ शब्द का अर्थ है—
(क) हाथी
(ख) ऊँट
(ग) घोड़ा
(घ) सिंह
9. क् + अ + क् + ष् + आ के संयोग से कौन-सा पद बनता है?
(क) कक्षा
(ख) क्षमा
(ग) कक्ष
(घ) कक्षम्
10. हलन्त (्) चिह्न का क्या कार्य है?
(क) स्वर जोड़ना
(ख) व्यञ्जन से ‘अ’ स्वर हटाना
(ग) विसर्ग लगाना
(घ) अनुस्वार लगाना
अभिकथन-कारण – नीचे अभिकथन (A) और कारण (R) दिए गए हैं। सही विकल्प चुनिए—
(क) A और R दोनों सही, R, A की सही व्याख्या है। (ख) A और R दोनों सही, पर R, A की सही व्याख्या नहीं। (ग) A सही, R गलत। (घ) A गलत, R सही।
1. अभिकथन (A): संयुक्त-व्यञ्जन दो या अधिक व्यञ्जनों के मेल से बनते हैं।
कारण (R): क् + ष् + अ के मेल से ‘क्ष’ संयुक्त-व्यञ्जन बनता है।
2. अभिकथन (A): संयुक्त-व्यञ्जन वर्णमाला के नए वर्ण हैं।
कारण (R): ये पृथक् व्यञ्जन-वर्णों के मेल की विशिष्ट लेखन-शैली मात्र हैं।
3. अभिकथन (A): प्रत्येक व्यञ्जन में ‘अ’ स्वर स्वतः अन्तर्निहित रहता है।
कारण (R): हलन्त (्) लगाने पर व्यञ्जन से ‘अ’ स्वर हट जाता है।
4. अभिकथन (A): वर्ण-वियोग एवं वर्ण-संयोग परस्पर विपरीत प्रक्रियाएँ हैं।
कारण (R): वर्ण-वियोग में पद को वर्णों में तोड़ा जाता है, जबकि वर्ण-संयोग में वर्णों को जोड़कर पद बनाया जाता है।
5. अभिकथन (A): ‘ज्ञानम्’ का वर्ण-वियोग ज् + ञ् + आ + न् + अ + म् है।
कारण (R): ‘ज्ञ’ संयुक्त-व्यञ्जन ज् एवं ञ् के मेल से बनता है।
परीक्षा-सुझाव एवं सामान्य त्रुटियाँ
परीक्षा-सुझाव (Exam Tips)
- प्रमुख संयुक्त-व्यञ्जन (क्ष, त्र, ज्ञ, श्र, द्य, र्ण, ष्ट्र, न्द्र) उनके घटक-वर्णों सहित याद रखें।
- वर्ण-वियोग में हलन्त (्) एवं स्वर-मात्रा का ध्यान रखें – प्रत्येक व्यञ्जन को हलन्त रूप में लिखें।
- वर्ण-संयोग में वर्णों का सही क्रम रखें; अन्तिम विसर्ग (ः) एवं अनुस्वार (ं) न भूलें।
- र-कार (र्) पूर्व-स्थित होने पर रेफ (र्ण, र्म) तथा पश्च-स्थित होने पर पादयुक्त (क्र, प्र) रूप पहचानें।
- शब्दार्थ (अर्णवः, उष्ट्रः, राष्ट्रम्, सङ्गणकम् आदि) हिन्दी एवं अंग्रेज़ी दोनों में याद रखें।
सामान्य त्रुटियाँ (Common Mistakes)
- व्यञ्जन को हलन्त के बिना लिख देना (क लिखना, जबकि वर्ण-वियोग में क् चाहिए)।
- संयुक्त-व्यञ्जन में अन्तर्निहित स्वर को भूल जाना अथवा गलत स्वर लगाना।
- र-कार (रेफ) की स्थिति में भ्रम – र्ण में र् पहले, क्र में र् बाद में आता है।
- अनुस्वार (ं) एवं विसर्ग (ः) को वर्ण-वियोग में छोड़ देना।
- ‘क्ष’ को ‘क् + श्’ मान लेना – यह ‘क् + ष्’ से बनता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
दीपकम् कक्षा 6 पाठ 2 ‘संयुक्त-व्यञ्जनानि’ में क्या पढ़ाया गया है?
इस पाठ में संयुक्त-व्यञ्जनों (क्ष, त्र, ज्ञ, द्य आदि) का परिचय, उनका निर्माण, तथा वर्ण-वियोग (पद को वर्णों में तोड़ना) एवं वर्ण-संयोग (वर्णों को जोड़कर पद बनाना) का अभ्यास कराया गया है।
क्या संयुक्त-व्यञ्जन नए वर्ण होते हैं?
नहीं। संयुक्त-व्यञ्जन नए वर्ण नहीं हैं; ये केवल पृथक् व्यञ्जन-वर्णों के मेल की एक विशिष्ट लेखन-शैली हैं। इनके साथ आने वाला स्वर इनमें छिपा नहीं रहता।
‘कक्षा’ एवं ‘विद्या’ का वर्ण-वियोग क्या है?
कक्षा = क् + अ + क् + ष् + आ। विद्या = व् + इ + द् + य् + आ।
पाठ, उदाहरण एवं अभ्यास-शीर्षक NCERT दीपकम् पुस्तक से ज्यों-के-त्यों लिए गए हैं; वर्ण-वियोग/संयोग के हल, सार एवं अन्य उत्तर ClearStudy द्वारा मौलिक रूप से तैयार किए गए हैं।
