Class 7 Sanskrit Deepakam Chapter 12 Solutions — वीराङ्गना पन्नाधाया

Class 7 Sanskrit Deepakam Chapter 12 solutions: कथा का हिन्दी अर्थ, सात अभ्यासों के उत्तर, लङ्-लकार, वचनपरिवर्तन, दीर्घ सन्धि और परियोजना मार्गदर्शन पढ़ें।

Class: 7 Subject: Sanskrit (संस्कृत) Book: Deepakam (दीपकम्) Chapter: 12 (द्वादशः पाठः) पाठः: वीराङ्गना पन्नाधाया प्रति का पुनर्मुद्रण: 2026–27

पाठ का अवलोकन (Chapter Overview)

दीपकम् कक्षा 7 का द्वादश (बारहवाँ) पाठ ‘वीराङ्गना पन्नाधाया’ राजस्थान की एक महान् वीरांगना पन्नाधाया (पन्ना धाय) के अद्वितीय त्याग एवं बलिदान की ऐतिहासिक कथा है। यह भारतभूमि वीरों एवं त्यागियों की भूमि है; मातृभूमि की रक्षा हेतु भारतीयों ने अपना सर्वस्व अर्पित किया है, और इस गणना में महिलाओं का भी प्रभूत योगदान रहा है। पन्नाधाया मेवाड़ के राजकुमार उदयसिंह की धाय (धात्री) थी। दुष्टबुद्धि बनवीर जब उदयसिंह को मारने का षड्यन्त्र रचता है, तब पन्नाधाया राजकुमार के शयनस्थान पर अपने ही पुत्र चन्दन को सुला देती है। बनवीर चन्दन को ही उदयसिंह समझकर मार देता है। इस प्रकार पन्नाधाया अपने पुत्र का बलिदान देकर मेवाड़ के भावी राजा की रक्षा करती है। पाठ का केन्द्रीय भाव है – राष्ट्रहित, कर्तव्यनिष्ठा, शौर्य एवं त्याग व्यक्तिगत स्वार्थ से सर्वोपरि हैं।

पाठ-परिचय / प्रसंग

यह पाठ सोलहवीं शताब्दी (षोडश शतक) के मेवाड़ की ऐतिहासिक घटना पर आधारित गद्य-कथा है। मेवाड़ में महाराणा संग्रामसिंह (राणा साँगा) नामक सुविख्यात महाराज थे, पाठ में जिनके पुत्रों विक्रमादित्य और उदयसिंह का परिचय दिया गया है। पाठ बनवीर को उनके भाई पृथ्वीराज का पुत्र बताता है। बनवीर ने विक्रमादित्य को छल से मारकर मेवाड़ का शासन हड़प लिया और उदयसिंह को भी मारना चाहा। राजकुमार उदयसिंह की धाय पन्नाधाया ने अपने पुत्र चन्दन का बलिदान देकर उदयसिंह की प्राणरक्षा की। आगे चलकर वही उदयसिंह मेवाड़ का राजा बना और उसका पुत्र महाराणा प्रताप भारतीय इतिहास का अमर शौर्य-प्रतीक बना। पाठ अथर्ववेद के ‘माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः’ उद्धरण से आरम्भ होता है।

मूल पाठ एवं अन्वय/भावार्थ

अतिरिक्त प्रश्न, MCQ और अभिकथन-कारण ClearStudy के अभ्यास हैं। मूल पुस्तक भी साथ में पढ़ें।

एषा भारतभूमिः वीराणां त्यागधनानां भूमिः अस्ति । सर्वे भारतीयाः ‘एषा भूमिः अस्माकं माता’ इति वदन्ति । अथर्ववेदे ‘माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः’ इति उक्तम् । मातृभूमेः रक्षणार्थं भारतीयाः सर्वस्वम् अर्पितवन्तः । एतादृशानां भारतीयानां गणनायां महिलानां प्रभूतं योगदानम् अस्ति । त्यागे वीरतायां च महिलाः शत्रुनिबर्हणाः आसन् । एतादृशीषु वीराङ्गनासु राजस्थानस्य पन्नाधाया काचिद् विशिष्टा वीराङ्गना आसीत् । एषा साहसस्य त्यागस्य निष्ठायाः च अद्वितीया मूर्तिः आसीत् । अस्मिन् पाठे तस्याः त्यागस्य पराक्रमस्य च वर्णनं कृतम् । एषा इतिहासस्य स्वर्णिमाक्षरैः लिखिता घटना अस्ति । — अनुच्छेद 1
भावार्थयह भारतभूमि वीरों एवं त्यागियों की भूमि है। सभी भारतीय कहते हैं – ‘यह भूमि हमारी माता है’। अथर्ववेद में कहा गया है – ‘भूमि माता है और मैं पृथ्वी का पुत्र हूँ’। मातृभूमि की रक्षा के लिए भारतीयों ने अपना सर्वस्व अर्पित किया। ऐसे भारतीयों की गणना में महिलाओं का भी अत्यधिक योगदान है। त्याग एवं वीरता में महिलाएँ शत्रुनाशक रही हैं। ऐसी ही वीरांगनाओं में राजस्थान की पन्नाधाया एक विशिष्ट वीरांगना थी। वह साहस, त्याग एवं निष्ठा की अद्वितीय मूर्ति थी। इस पाठ में उसके त्याग एवं पराक्रम का वर्णन किया गया है। यह इतिहास में सुनहरे अक्षरों से लिखी हुई घटना है।
षोडशे शतके मेवाडनगरे महाराणा-सङ्ग्रामसिंहः इति सुविख्यातः महाराजः आसीत् । तस्य द्वौ पुत्रौ विक्रमादित्यः उदयसिंहः च आस्ताम् । महाराणासङ्ग्रामसिंहस्य भ्राता पृथ्वीराजः । बनवीरः पृथ्वीराजस्य अष्टादशसु पुत्रेषु अन्यतमः । सः बनवीरः महाराणासङ्ग्रामसिंहस्य प्रथमं पुत्रं विक्रमादित्यं छलेन मारयित्वा मेवाडस्य शासनम् अकरोत् । ततः परमपि सः दुष्टबुद्धिः अचिन्तयत् यत् – “अहम् एकः एव उत्तराधिकारी भवेयम् । न कोऽपि मम प्रतिस्पर्धी स्यात्” इति । — अनुच्छेद 2
भावार्थसोलहवीं शताब्दी में मेवाड़नगर में महाराणा संग्रामसिंह नामक सुविख्यात महाराज थे। उनके दो पुत्र विक्रमादित्य एवं उदयसिंह थे। महाराणा संग्रामसिंह का भाई पृथ्वीराज था। बनवीर पृथ्वीराज के अठारह पुत्रों में से एक था। उस बनवीर ने महाराणा संग्रामसिंह के प्रथम पुत्र विक्रमादित्य को छल से मारकर मेवाड़ का शासन (हड़प) कर लिया। उसके बाद भी उस दुष्टबुद्धि ने सोचा कि – “मैं ही एकमात्र उत्तराधिकारी बनूँ। कोई भी मेरा प्रतिद्वन्द्वी न रहे।”
अतः कदाचित् रात्रौ सः उदयसिंहं मारयितुं कुतन्त्रम् अरचयत् । तद् ज्ञात्वा पन्नाधाया उदयसिंहस्य शयनस्थाने स्वपुत्रं चन्दनं शायितवती । सा तस्य दुष्परिणामं जानाति स्म । बनवीरः उदयसिंहस्य शयनागारम् आगच्छत् । तत्र सुप्तः चन्दनः एव उदयसिंहः इति मत्वा बनवीरः चन्दनम् अमारयत् । — अनुच्छेद 3
भावार्थइसलिए किसी समय रात में उसने उदयसिंह को मारने के लिए षड्यन्त्र रचा। यह जानकर पन्नाधाया ने उदयसिंह के शयनस्थान पर अपने पुत्र चन्दन को सुला दिया। वह उसके बुरे परिणाम को जानती थी। बनवीर उदयसिंह के शयनकक्ष में आया। वहाँ सोये हुए चन्दन को ही उदयसिंह समझकर बनवीर ने चन्दन को मार दिया।
पन्नाधायायाः निर्णयः अकल्पनीयः आसीत् । ‘व्यक्तिहितं न, राष्ट्रहितम् एव श्रेष्ठम्’ इति सा जानाति स्म । तस्याः पुत्रस्तु दिवङ्गतः, परं सा मेवाडराज्यं बनवीरस्य कुतन्त्रात् अरक्षत् । कालान्तरे सः एव उदयसिंहः युद्धे बनवीरं हत्वा मेवाडराज्यस्य राजा अभवत् । तस्य पुत्रः एव पराक्रमी योद्धा महाराणाप्रतापः । सः प्रतापः शौर्येण भारतीयानां हृदये चिरं स्थानं प्राप्नोत् । कथ्यते एव – “यदि पन्नाधाया स्वपुत्रस्य बलिदानं न अकरिष्यत् तर्हि उदयसिंहः न अभविष्यत् । यदि उदयसिंहः न अभविष्यत् तर्हि महाराणाप्रतापः अपि न अभविष्यत्” । — अनुच्छेद 4
भावार्थपन्नाधाया का निर्णय अकल्पनीय था। वह जानती थी कि – ‘व्यक्तिगत हित नहीं, राष्ट्रहित ही सर्वश्रेष्ठ है’। उसका पुत्र तो स्वर्ग सिधार गया, परन्तु उसने मेवाड़राज्य को बनवीर के षड्यन्त्र से बचा लिया। कालान्तर में वही उदयसिंह युद्ध में बनवीर को मारकर मेवाड़राज्य का राजा बना। उसी का पुत्र पराक्रमी योद्धा महाराणा प्रताप था। वह प्रताप अपने शौर्य से भारतीयों के हृदय में चिरकाल तक स्थान पा गया। कहा भी जाता है – “यदि पन्नाधाया अपने पुत्र का बलिदान न करती तो उदयसिंह न होता; यदि उदयसिंह न होता तो महाराणा प्रताप भी न होता।”
पन्नाधायायाः त्यागः शौर्यं च जगति आचन्द्रार्कं तिष्ठति । भारतीये इतिहासे वीराङ्गनानां गणनासु पन्नाधाया महत्तमं स्थानं प्राप्नोत् । पन्नाधायायाः बलिदानं सर्वान् शौर्यं, राष्ट्रभक्तिं, कर्तव्यनिष्ठां, बलिदानं, विवेकं च शिक्षयति । उच्यते एव —
“यदि पन्नाधाया नाभविष्यत् तर्हि कुतो राणाप्रतापः” — अनुच्छेद 5
भावार्थपन्नाधाया का त्याग एवं शौर्य संसार में जब तक सूर्य एवं चन्द्रमा हैं, तब तक स्थिर रहता है। भारतीय इतिहास में वीरांगनाओं की गणना में पन्नाधाया ने सर्वोच्च स्थान पाया। पन्नाधाया का बलिदान सभी को शौर्य, राष्ट्रभक्ति, कर्तव्यनिष्ठा, त्याग एवं विवेक की शिक्षा देता है। कहा भी जाता है – “यदि पन्नाधाया न होती तो राणा प्रताप कहाँ से होते?”

सार (Hindi Summary)

‘वीराङ्गना पन्नाधाया’ पाठ राजस्थान की एक महान् वीरांगना पन्ना धाय के अद्वितीय बलिदान की ऐतिहासिक कथा है। यह भारतभूमि वीरों एवं त्यागियों की भूमि है, जहाँ मातृभूमि की रक्षा हेतु अनेक भारतीयों ने अपना सर्वस्व न्योछावर किया। इस गौरवशाली परम्परा में महिलाओं का योगदान भी अमूल्य है, और पन्नाधाया उसी त्याग, साहस एवं निष्ठा की अद्वितीय मूर्ति थी।

सोलहवीं शताब्दी में मेवाड़ के महाराणा संग्रामसिंह के दो पुत्र थे – विक्रमादित्य एवं उदयसिंह। उनके भाई पृथ्वीराज के पुत्रों में से एक दुष्टबुद्धि बनवीर ने विक्रमादित्य को छल से मारकर मेवाड़ का शासन हड़प लिया। पूर्ण उत्तराधिकार पाने के लोभ में उसने रात्रि में राजकुमार उदयसिंह को भी मारने का षड्यन्त्र रचा। उदयसिंह की धाय पन्नाधाया को जब इस कुचक्र का पता चला, तो उसने राजकुमार के शयनस्थान पर अपने ही पुत्र चन्दन को सुला दिया। बनवीर ने सोये हुए चन्दन को ही उदयसिंह समझकर मार दिया।

पन्नाधाया का यह निर्णय अकल्पनीय था – उसने ‘व्यक्तिगत हित नहीं, राष्ट्रहित ही सर्वोपरि है’ इस भावना से अपने पुत्र का बलिदान देकर मेवाड़राज्य की रक्षा की। आगे चलकर वही उदयसिंह बनवीर को परास्त कर मेवाड़ का राजा बना और उसका पुत्र महाराणा प्रताप अपने शौर्य से भारतीयों के हृदय में अमर हो गया। पन्नाधाया का त्याग एवं शौर्य जब तक सूर्य-चन्द्र हैं तब तक स्थिर रहेगा। उसका बलिदान हमें शौर्य, राष्ट्रभक्ति, कर्तव्यनिष्ठा, त्याग एवं विवेक की प्रेरणा देता है – “यदि पन्नाधाया न होती तो राणा प्रताप कहाँ से होते?”

कल्पनात्मक मेवाड़ आँगन में साधारण पारम्परिक वस्त्रों वाली पन्ना धाय एक बालक के साथ संरक्षक की भूमिका में
मौलिक ऐतिहासिक कल्पना: पन्ना धाय की संरक्षक-भूमिका। चेहरे, वस्त्र और भवन काल्पनिक हैं; यह प्रमाणित चित्र या ऐतिहासिक घटना का सटीक दृश्य नहीं है।

शब्दार्थ (Word-meanings)

शब्दः (Sanskrit)हिन्दी अर्थEnglish meaning
त्यागधनानाम्बलिदानियों का (त्यागमूर्तियों का)Of people who sacrifice everything
सर्वस्वम्अपना सब कुछOne’s everything
प्रभूतम्अधिक, प्रचुरAbundant
शत्रुनिबर्हणाःशत्रुओं का विनाश करने वालीDestroyers of enemies
वीराङ्गनासुवीर नारियों मेंAmong brave women
साहसस्यसाहस काOf courage
स्वर्णिमाक्षरैःसोने के अक्षरों सेWith golden letters
षोडशे शतकेसोलहवीं शताब्दी मेंIn the sixteenth century
छलेनकपट से, वञ्चना सेBy deception
कुतन्त्रम्षड्यन्त्र, कुचक्रEvil plot
अद्वितीयम्सर्वोत्कृष्ट, अनुपमMatchless
धाया (धात्री)धाय / दाईWet nurse
आस्ताम्दो थेTwo were present
अन्यतमःबहुतों में एकOne of many
दुष्टबुद्धिःदुष्ट बुद्धि वालाEvil minded
प्रतिस्पर्धीप्रतिद्वन्द्वीCompetitor
मारयितुम्मारने के लिएTo kill
कदाचित्कभी, किसी समयSometime
शायितवतीसुलाया (उसने)(She) put to sleep
दुष्परिणामम्अनिष्ट को, बुरे परिणाम कोBad outcome
शयनागारम्सोने के कक्ष कोBedroom
अकल्पनीयः (कल्पनातीतः)चिन्तन से परेBeyond imagination
व्यक्तिहितम्स्वार्थ, निजहितSelf interest
राष्ट्रहितम्राष्ट्र का हित, देशकल्याणNational interest
श्रेष्ठम्सर्वोपरि, शीर्षस्थानीयHighest
कालान्तरेकुछ समय के बादLater on
हत्वामारकरHaving killed
पराक्रमीवीर, विक्रमीValorous
योद्धासैनिक, युद्ध में समर्थWarrior
शौर्येणशूरता सेWith bravery
चिरम्बहुत काल तकFor long time
जगतिसंसार में, विश्व मेंIn the world
आचन्द्रार्कम्जब तक सूर्य और चन्द्र हैंAs long as the sun and moon are there
महत्तमम्बहुतों में श्रेष्ठBest among the greats
पाठ के अन्य शब्दहिन्दी अर्थ
स्वसामर्थ्येनअपने सामर्थ्य से
गणनासुगणनाओं / गिनतियों में

पन्नाधाया उदयसिंह की धात्री (धाय/पालन करने वाली) थी। पाठ में विक्रमादित्य और उदयसिंह का उल्लेख इस कथा के प्रसंग में है; इसे राणा साँगा की सभी सन्तानों की पूरी सूची न मानें। कथा का अध्ययन शौर्य, निष्ठा और कठिन निर्णयों के ऐतिहासिक-साहित्यिक प्रसंग में करें।

अभ्यासः (वयम् अभ्यासं कुर्मः)

अतिरिक्त प्रश्न, MCQ और अभिकथन-कारण ClearStudy के अभ्यास हैं। मूल पुस्तक भी साथ में पढ़ें।

1. अधः प्रदत्तानां प्रश्नानाम् एकपदेन उत्तरं लिखन्तु —

(क) राजस्थानस्य वीराङ्गनासु का सुविख्याता ?

उत्तरपन्नाधाया ।

(ख) उदयसिंहः कस्य पुत्रः ?

उत्तरमहाराणासङ्ग्रामसिंहस्य ।

(ग) बनवीरः कं मारयितुम् कुतन्त्रम् अरचयत् ?

उत्तरउदयसिंहम् ।

(घ) कालान्तरे कः मेवाडस्य राजा अभवत् ?

उत्तरउदयसिंहः ।

(ङ) पन्नाधायायाः निर्णयः कीदृशः आसीत् ?

उत्तरअकल्पनीयः ।

(च) महाराणाप्रतापः केषां हृदये चिरं स्थानं प्राप्नोत् ?

उत्तरभारतीयानाम् ।

2. अधः प्रदत्तानां प्रश्नानां पूर्णवाक्येन उत्तरं लिखन्तु —

(क) पन्नाधाया कस्य अद्वितीयम् उदाहरणम् अस्ति ?

उत्तरपन्नाधाया साहसस्य त्यागस्य निष्ठायाः च अद्वितीयम् उदाहरणम् अस्ति ।

(ख) महाराणासङ्ग्रामसिंहस्य पुत्रौ कौ आस्ताम् ?

उत्तरमहाराणासङ्ग्रामसिंहस्य पुत्रौ विक्रमादित्यः उदयसिंहः च आस्ताम् ।

(ग) दुष्टबुद्धिः बनवीरः किम् अचिन्तयत् ?

उत्तरदुष्टबुद्धिः बनवीरः अचिन्तयत् यत् – “अहम् एकः एव उत्तराधिकारी भवेयम्, न कोऽपि मम प्रतिस्पर्धी स्यात्” इति ।

(घ) बनवीरस्य कुतन्त्रं ज्ञात्वा पन्नाधाया किम् अकरोत् ?

उत्तरबनवीरस्य कुतन्त्रं ज्ञात्वा पन्नाधाया उदयसिंहस्य शयनस्थाने स्वपुत्रं चन्दनं शायितवती ।

(ङ) आचन्द्रार्कं किं तिष्ठति ?

उत्तरआचन्द्रार्कं पन्नाधायायाः त्यागः शौर्यं च (जगति) तिष्ठति ।

(च) पन्नाधायायाः बलिदानं किं शिक्षयति ?

उत्तरपन्नाधायायाः बलिदानं सर्वान् शौर्यं, राष्ट्रभक्तिं, कर्तव्यनिष्ठां, बलिदानं विवेकं च शिक्षयति ।

3. उदाहरणानुसारम् उचितैः पदैः रिक्तस्थानानि पूरयन्तु —

हर पंक्ति में दिए रूप से पुरुष पहचानकर उसी पुरुष के तीन वचन भरें। पंक्तियाँ प्रथम, मध्यम और उत्तम पुरुषों की हैं।

एकवचनम्द्विवचनम्बहुवचनम्
(क)अमिलत्अमिलताम्अमिलन्
(ख)अवदःअवदतम्अवदत
(ग)अखादःअखादतम्अखादत
(घ)अलिखत्अलिखताम्अलिखन्
(ङ)अरक्षम्अरक्षावअरक्षाम
(च)अपिबःअपिबतम्अपिबत
(छ)अपृच्छम्अपृच्छावअपृच्छाम
(ज)अमारयत्अमारयताम्अमारयन्
(झ)अभवम्अभवावअभवाम

संकेत: (ख)–(ग)–(ङ)–(च)–(छ)–(झ) में जिस पुरुष का एक रूप दिया गया है, उसी पुरुष-वचन के क्रम से शेष रिक्तस्थान भरे गए हैं (मध्यमपुरुष/उत्तमपुरुष के अनुसार)।

4. वाक्यानि पठित्वा उदाहरणानुसारं वचनपरिवर्तनं कुर्वन्तु —

यथा – सः शालाम् अगच्छत् → (द्विवचन) तौ शालाम् अगच्छताम् ।

एकवचनम् (मूल वाक्य)द्विवचनम्बहुवचनम्
(क) सः शालाम् अगच्छत् ।तौ शालाम् अगच्छताम् ।ते शालाम् अगच्छन् ।
(ख) बालिका पद्यम् अलिखत् ।बालिके पद्यम् अलिखताम् ।बालिकाः पद्यम् अलिखन् ।
(ग) शिक्षकः अवदत् ।शिक्षकौ अवदताम् ।शिक्षकाः अवदन् ।
(घ) सा चित्रम् अपश्यत् ।ते चित्रम् अपश्यताम् ।ताः चित्रम् अपश्यन् ।
(ङ) त्वम् अक्रीडः ।युवाम् अक्रीडतम् ।यूयम् अक्रीडत ।
(च) त्वं जलम् अनयः ।युवां जलम् अनयतम् ।यूयं जलम् अनयत ।
(छ) अहं मन्दिरम् अगच्छम् ।आवां मन्दिरम् अगच्छाव ।वयं मन्दिरम् अगच्छाम ।
(ज) अहं मधुरम् अखादम् ।आवां मधुरम् अखादाव ।वयं मधुरम् अखादाम ।

5. उदाहरणानुसारं रेखाङ्कितानि पदानि आश्रित्य प्रश्ननिर्माणं कुर्वन्तु —

यथा – महाराणासङ्ग्रामसिंहस्य भ्राता पृथ्वीराजः । → कस्य भ्राता पृथ्वीराजः ?

वाक्यम् (रेखाङ्कित पद मोटे अक्षरों में)प्रश्ननिर्माणम् (उत्तर)
(क) सः अचिन्तयत् ।कः अचिन्तयत् ?
(ख) शयनस्थाने चन्दनं शायितवती ।कुत्र चन्दनं शायितवती ?
(ग) राष्ट्रहितं श्रेष्ठम् ।किं श्रेष्ठम् ?
(घ) बनवीरः चन्दनम् अमारयत् ।बनवीरः कम् अमारयत् ?
(ङ) तस्याः निर्णयः अकल्पनीयः आसीत् ।कस्याः निर्णयः अकल्पनीयः आसीत् ?
(च) उदयसिंहः मेवाडस्य राजा अभवत् ।कः मेवाडस्य राजा अभवत् ?
(छ) मम प्रतिस्पर्धी न स्यात् ।कस्य प्रतिस्पर्धी न स्यात् ?

6. उदाहरणानुसारम् अधः प्रदत्तानां पदानां सन्धिं कुर्वन्तु —

यथा – विद्या + अभ्यासः = विद्याभ्यासः ।

उत्तर (क) मम + अपि = ममापि (दीर्घ सन्धि: अ + अ = आ) (ख) विद्या + अर्थी = विद्यार्थी (दीर्घ सन्धि: आ + अ = आ) (ग) सह + अनुभूतिः = सहानुभूतिः (दीर्घ सन्धि: अ + अ = आ) (घ) कवि + इन्द्रः = कवीन्द्रः (दीर्घ सन्धि: इ + इ = ई) (ङ) गिरि + ईशः = गिरीशः (दीर्घ सन्धि: इ + ई = ई) (च) वेद + अलङ्कारः = वेदालङ्कारः (दीर्घ सन्धि: अ + अ = आ) (छ) दैत्य + अरिः = दैत्यारिः (दीर्घ सन्धि: अ + अ = आ) (ज) सु + उक्तिः = सूक्तिः (दीर्घ सन्धि: उ + उ = ऊ)

अभ्यास 7 केवल काल-परिवर्तन का व्याकरण अभ्यास है। ऐतिहासिक कथा के वाक्य को लट् में बदलना किसी ऐतिहासिक व्यक्ति के आज जीवित होने का दावा नहीं है।

7. उदाहरणानुसारम् अधः प्रदत्तानि वाक्यानि वर्तमानकाले (लट्लकारे) परिवर्तयन्तु —

यथा – पन्नाधाया राज्यम् अरक्षत् । → पन्नाधाया राज्यं रक्षति ।

उत्तर (क) उदयसिंहः वीरः आसीत् । → उदयसिंहः वीरः अस्ति । (ख) अहं तत् सर्वम् अपश्यम् । → अहं तत् सर्वं पश्यामि । (ग) बनवीरः कुतन्त्रम् अकरोत् । → बनवीरः कुतन्त्रं करोति । (घ) त्वं शयनस्थानम् अगच्छः । → त्वं शयनस्थानं गच्छसि । (ङ) ते कथाम् अपठन् । → ते कथां पठन्ति । (च) धात्री उदयसिंहम् अपृच्छत् । → धात्री उदयसिंहं पृच्छति । (छ) वयं शूराः अभवाम । → वयं शूराः भवामः ।

योग्यताविस्तरः (व्याकरण-तालिकाः)

पाठ में ‘योग्यताविस्तरः’ के अन्तर्गत मुख्यतः लङ्-लकार (भूतकाल) का अभ्यास कराया गया है, जिसका प्रयोग बीते हुए समय की क्रिया के लिए होता है।

1. लङ्-लकारः – पठ् धातुः (परस्मैपदम्)

पुरुषःएकवचनम्द्विवचनम्बहुवचनम्
प्रथमपुरुषःअपठत्अपठताम्अपठन्
मध्यमपुरुषःअपठःअपठतम्अपठत
उत्तमपुरुषःअपठम्अपठावअपठाम

वाक्यों में प्रयोग – (प्रथम) बालकः पाठम् अपठत्, बालकौ पाठम् अपठताम्, बालकाः पाठम् अपठन् । (मध्यम) त्वं पाठम् अपठः, युवां पाठम् अपठतम्, यूयं पाठम् अपठत । (उत्तम) अहं पाठम् अपठम्, आवां पाठम् अपठाव, वयं पाठम् अपठाम ।

2. लङ्-लकार के स्थान पर क्तवतु-प्रत्ययान्त पद

सामान्यतः भूतकाल में लङ्-लकार के स्थान पर क्तवतु-प्रत्ययान्त पद का प्रयोग भी किया जाता है (पुंलिङ्ग/स्त्रीलिङ्ग)।

धातुःलट्-लकारः (वर्तमान)लङ्-लकारः (भूत)क्तवतु-प्रत्ययान्त पद
पठ्पठतिअपठत्पठितवान् / पठितवती
लिख्लिखतिअलिखत्लिखितवान् / लिखितवती
खाद्खादतिअखादत्खादितवान् / खादितवती
पा (वर्तमान आधार पिब्)पिबतिअपिबत्पीतवान् / पीतवती
रक्ष्रक्षतिअरक्षत्रक्षितवान् / रक्षितवती
कृकरोतिअकरोत्कृतवान् / कृतवती
भूभवतिअभवत्भूतवान् / भूतवती
मिल्मिलतिअमिलत्मिलितवान् / मिलितवती
चल्चलतिअचलत्चलितवान् / चलितवती
गम् (वर्तमान आधार गच्छ्)गच्छतिअगच्छत्गतवान् / गतवती
नी (वर्तमान आधार नय्)नयतिअनयत्नीतवान् / नीतवती
स्मृस्मरतिअस्मरत्स्मृतवान् / स्मृतवती
त्यज्त्यजतिअत्यजत्त्यक्तवान् / त्यक्तवती
प्रच्छ् (वर्तमान आधार पृच्छ्)पृच्छतिअपृच्छत्पृष्टवान् / पृष्टवती
स्था (वर्तमान आधार तिष्ठ्)तिष्ठतिअतिष्ठत्स्थितवान् / स्थितवती
दृश् (वर्तमान आधार पश्य्)पश्यतिअपश्यत्दृष्टवान् / दृष्टवती
क्रीड्क्रीडतिअक्रीडत्क्रीडितवान् / क्रीडितवती

3. राज्यस्य सप्त अङ्गानि (राज्य के सात अंग)

1. स्वामी   2. अमात्यः   3. सुहृत्   4. कोषः   5. राष्ट्रम्   6. दुर्गम्   7. बलम् — ये सुदृढ़ हों तो राष्ट्र सुदृढ़ होता है।

4. प्राचीन युद्धों के विविध व्यूह

चक्रव्यूहः, गरुडव्यूहः, सर्पव्यूहः, मकरव्यूहः, अर्धचन्द्रव्यूहः, मण्डलव्यूहः, ओरमीव्यूहः, क्रौञ्चव्यूहः, वज्रव्यूहः इत्यादयः व्यूहाः ।

परियोजनाकार्यम् (Project Work)

भारतीयानां वीराङ्गनानां चित्राणि संगृह्य तासां पराक्रमं सारांशरूपेण स्वभाषया लिखन्तु ।

मार्गदर्शनम्यह खुली परियोजना है। पुस्तक के उदाहरणों में भारतीय वीरांगनाएँ – जैसे लक्ष्मीबाई, पद्मावती, कित्तूर रानी चेन्नम्मा, रुद्रमादेवी, झलकारीबाई, रानी हाड़ी आदि – के नाम हैं। प्रमाणित चित्र एकत्र कर उनके पराक्रम को अपनी मातृभाषा में लिखिए। साहित्यिक/लोककथा-आधारित पात्र के लिए परम्परा का नाम लिखें; कल्पना को निश्चित इतिहास न बताएं। हर चित्र का स्रोत दें।

परियोजना का लेखन-ढाँचा — नमूना

नाम: पन्ना धाय। स्थान/प्रसंग: मेवाड़, उदयसिंह की धात्री। पाठ में वर्णित कार्य: संकट में राजकुमार की रक्षा। मेरी सीख: साहस, निष्ठा और कठिन परिस्थिति में विवेक। स्रोत: NCERT दीपकम्, पाठ 12। अन्य वीरांगना पर लिखते समय यही ढाँचा लें और उसके जीवन के विश्वसनीय स्रोत जोड़ें।

अतिरिक्त प्रश्न (Extra Questions)

अतिरिक्त लघु प्रश्न — ClearStudy अभ्यास

1. पन्नाधाया कौन थी?

उत्तरपन्नाधाया राजस्थान (मेवाड़) की एक विशिष्ट वीरांगना थी। वह राजकुमार उदयसिंह की धाय (धात्री) थी तथा साहस, त्याग एवं निष्ठा की अद्वितीय मूर्ति थी।

2. बनवीर ने मेवाड़ का शासन किस प्रकार प्राप्त किया?

उत्तरबनवीर ने महाराणा संग्रामसिंह के प्रथम पुत्र विक्रमादित्य को छल से मारकर मेवाड़ का शासन हड़प लिया। फिर पूर्ण उत्तराधिकार के लोभ में उसने उदयसिंह को भी मारने का षड्यन्त्र रचा।

3. पन्नाधाया ने उदयसिंह की रक्षा कैसे की?

उत्तरबनवीर के कुचक्र को जानकर पन्नाधाया ने उदयसिंह के शयनस्थान पर अपने पुत्र चन्दन को सुला दिया। बनवीर ने सोये हुए चन्दन को ही उदयसिंह समझकर मार दिया, और इस प्रकार उदयसिंह की प्राणरक्षा हो गई।

4. पाठ का आरम्भ किस वेद-वचन से होता है और उसका क्या अर्थ है?

उत्तरपाठ का आरम्भ अथर्ववेद के वचन ‘माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः’ से होता है, जिसका अर्थ है – ‘भूमि माता है और मैं पृथ्वी का पुत्र हूँ’। यह मातृभूमि के प्रति श्रद्धा एवं रक्षा-भाव को व्यक्त करता है।

5. पन्नाधाया का बलिदान हमें क्या शिक्षा देता है?

उत्तरपन्नाधाया का बलिदान हमें शौर्य, राष्ट्रभक्ति, कर्तव्यनिष्ठा, त्याग एवं विवेक की शिक्षा देता है। यह सिखाता है कि व्यक्तिगत हित से राष्ट्रहित सदा श्रेष्ठ है।

अतिरिक्त व्याख्यात्मक प्रश्न — ClearStudy अभ्यास

6. ‘वीराङ्गना पन्नाधाया’ पाठ की कथा अपने शब्दों में लिखिए।

उत्तरसोलहवीं शताब्दी में मेवाड़ के महाराणा संग्रामसिंह के दो पुत्र थे – विक्रमादित्य एवं उदयसिंह। उनके भाई पृथ्वीराज के पुत्रों में से एक दुष्टबुद्धि बनवीर ने विक्रमादित्य को छल से मारकर मेवाड़ का शासन हड़प लिया। पूर्ण उत्तराधिकार पाने के लोभ में उसने उदयसिंह को भी मारने का षड्यन्त्र रचा।उदयसिंह की धाय पन्नाधाया को जब इस कुचक्र का पता चला, तो उसने राजकुमार के शयनस्थान पर अपने ही पुत्र चन्दन को सुला दिया। बनवीर ने सोये हुए चन्दन को उदयसिंह समझकर मार डाला। पन्नाधाया ने अपने पुत्र का बलिदान देकर मेवाड़राज्य की रक्षा की। आगे चलकर वही उदयसिंह बनवीर को परास्त कर राजा बना और उसका पुत्र महाराणा प्रताप अमर वीर बना।

7. पन्नाधाया के त्याग एवं उसके राष्ट्रहित-भाव को स्पष्ट कीजिए।

उत्तरपन्नाधाया का त्याग अकल्पनीय एवं अनुपम था। एक माता के लिए अपने पुत्र का बलिदान देना अत्यन्त कठिन है, परन्तु पन्नाधाया जानती थी कि ‘व्यक्तिगत हित नहीं, राष्ट्रहित ही सर्वोपरि है’। उसने अपने पुत्र चन्दन को उदयसिंह के स्थान पर सुलाकर उसका बलिदान दे दिया, ताकि मेवाड़ का भावी राजा सुरक्षित रहे।उसके इस त्याग के कारण ही उदयसिंह बच सका, जो आगे चलकर मेवाड़ का राजा बना, और उसका पुत्र महाराणा प्रताप भारत का अमर शौर्य-प्रतीक बना। इसलिए कहा जाता है – ‘यदि पन्नाधाया न होती तो राणा प्रताप कहाँ से होते?’ पन्नाधाया का त्याग एवं शौर्य आचन्द्रार्क (जब तक सूर्य-चन्द्र हैं) तब तक संसार में स्थिर रहेगा।

8. लङ्-लकार किसे कहते हैं? पठ् धातु के परस्मैपद रूप लिखिए।

उत्तरलङ्-लकार संस्कृत का वह लकार है जिसका प्रयोग भूतकाल (बीते हुए समय) की क्रिया के लिए होता है, जैसे – बालकः पाठम् अपठत् (बालक ने पाठ पढ़ा)। इसमें धातु के आरम्भ में ‘अ’ (अट्-आगम) जुड़ता है।पठ् धातु (परस्मैपद) के लङ्-लकार रूप – प्रथमपुरुष: अपठत्, अपठताम्, अपठन्; मध्यमपुरुष: अपठः, अपठतम्, अपठत; उत्तमपुरुष: अपठम्, अपठाव, अपठाम। सामान्यतः भूतकाल में इसके स्थान पर क्तवतु-प्रत्ययान्त पद (पठितवान् / पठितवती) का भी प्रयोग होता है।

MCQ & अभिकथन-कारण

1. पन्नाधाया किस प्रदेश की वीरांगना थी?

(क) गुजरातस्य

(ख) राजस्थानस्य

(ग) पञ्जाबस्य

(घ) बङ्गस्य

उत्तर(ख) राजस्थानस्य।

2. महाराणा संग्रामसिंह के कितने पुत्र थे?

(क) एक

(ख) दो

(ग) तीन

(घ) चार

उत्तर(ख) दो (विक्रमादित्यः उदयसिंहः च)।

3. पन्नाधाया उदयसिंह की क्या थी?

(क) माता

(ख) भगिनी

(ग) धाया (धात्री)

(घ) मित्रम्

उत्तर(ग) धाया (धात्री)।

4. पन्नाधाया ने अपने किस पुत्र को शयनस्थान पर सुलाया?

(क) उदयसिंहम्

(ख) विक्रमादित्यम्

(ग) चन्दनम्

(घ) प्रतापम्

उत्तर(ग) चन्दनम्।

5. विक्रमादित्य को छल से किसने मारा?

(क) उदयसिंहः

(ख) बनवीरः

(ग) पृथ्वीराजः

(घ) प्रतापः

उत्तर(ख) बनवीरः।

6. कालान्तर में मेवाड़ का राजा कौन बना?

(क) बनवीरः

(ख) चन्दनः

(ग) उदयसिंहः

(घ) विक्रमादित्यः

उत्तर(ग) उदयसिंहः।

7. उदयसिंह का पराक्रमी पुत्र कौन था?

(क) बनवीरः

(ख) महाराणाप्रतापः

(ग) पृथ्वीराजः

(घ) चन्दनः

उत्तर(ख) महाराणाप्रतापः।

8. पाठ का आरम्भ किस वेद के वचन से होता है?

(क) ऋग्वेदस्य

(ख) सामवेदस्य

(ग) अथर्ववेदस्य

(घ) यजुर्वेदस्य

उत्तर(ग) अथर्ववेदस्य (‘माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः’)।

9. पन्नाधाया के अनुसार किसका हित सर्वश्रेष्ठ है?

(क) व्यक्तिहितम्

(ख) राष्ट्रहितम्

(ग) धनहितम्

(घ) कुलहितम्

उत्तर(ख) राष्ट्रहितम्।

10. ‘अमारयत्’ पद किस लकार का रूप है?

(क) लट्-लकारः

(ख) लोट्-लकारः

(ग) लङ्-लकारः (भूतकाल)

(घ) लृट्-लकारः

उत्तर(ग) लङ्-लकारः (भूतकाल)।
उत्तर-कुंजी: 1-(ख), 2-(ख), 3-(ग), 4-(ग), 5-(ख), 6-(ग), 7-(ख), 8-(ग), 9-(ख), 10-(ग)

अभिकथन-कारण – नीचे अभिकथन (A) और कारण (R) दिए गए हैं। सही विकल्प चुनिए—
(क) A और R दोनों सही, R, A की सही व्याख्या है। (ख) A और R दोनों सही, पर R, A की सही व्याख्या नहीं। (ग) A सही, R गलत। (घ) A गलत, R सही।

1. अभिकथन (A): पन्नाधाया ने अपने पुत्र चन्दन का बलिदान दिया।

कारण (R): वह राजकुमार उदयसिंह की प्राणरक्षा करके मेवाड़राज्य को बनवीर के षड्यन्त्र से बचाना चाहती थी।

उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है।

2. अभिकथन (A): बनवीर ने चन्दन को उदयसिंह समझकर मार दिया।

कारण (R): पन्नाधाया ने उदयसिंह के शयनस्थान पर चन्दन को सुला दिया था।

उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है।

3. अभिकथन (A): बनवीर एक दुष्टबुद्धि व्यक्ति था।

कारण (R): उसने छल से विक्रमादित्य को मारकर मेवाड़ का शासन हड़प लिया और उदयसिंह को भी मारना चाहा।

उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है।

4. अभिकथन (A): महाराणा प्रताप भारतीयों के हृदय में चिरकाल तक स्थान पा गया।

कारण (R): महाराणा प्रताप बनवीर का पुत्र था और उसने पन्नाधाया को मारा था।

उत्तर(ग) A सही है, किन्तु R गलत है – महाराणा प्रताप उदयसिंह का पुत्र था, और उसने शौर्य से यह स्थान पाया।

5. अभिकथन (A): पन्नाधाया का त्याग आचन्द्रार्क संसार में स्थिर रहता है।

कारण (R): उसका बलिदान सभी को शौर्य, राष्ट्रभक्ति, कर्तव्यनिष्ठा एवं विवेक की शिक्षा देता है।

उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है।

परीक्षा-सुझाव एवं सामान्य त्रुटियाँ

परीक्षा-सुझाव (Exam Tips)

  • कथा के पात्रों एवं उनके सम्बन्ध याद रखें – संग्रामसिंह (पिता), विक्रमादित्य व उदयसिंह (पुत्र), पृथ्वीराज (भाई), बनवीर (भतीजा), चन्दन (पन्नाधाया का पुत्र), महाराणा प्रताप (उदयसिंह का पुत्र)।
  • एकपदेन एवं पूर्णवाक्येन उत्तर के अन्तर को समझें – एकपदेन में केवल एक पद, पूर्णवाक्येन में पूरा वाक्य लिखें।
  • लङ्-लकार (अपठत्, अमारयत्, अभवत्) के तीनों पुरुष-वचन रूप तालिका सहित कण्ठस्थ करें।
  • वचनपरिवर्तन में कर्ता एवं क्रिया दोनों का वचन बदलें (सः → तौ → ते; अगच्छत् → अगच्छताम् → अगच्छन्)।
  • सन्धि में दीर्घ-सन्धि (अ/आ + अ/आ = आ; इ/ई + इ/ई = ई; उ/ऊ + उ/ऊ = ऊ) के नियम याद रखें।

सामान्य त्रुटियाँ (Common Mistakes)

  • पन्नाधाया को उदयसिंह की ‘माता’ समझ लेना – वह उसकी ‘धाय (धात्री)’ थी।
  • महाराणा प्रताप को उदयसिंह का भाई/पिता बता देना – वह उदयसिंह का पुत्र था।
  • लङ्-लकार में अट्-आगम (आरम्भ का ‘अ’) छोड़ देना – पठत् नहीं, अपठत्।
  • प्रश्ननिर्माण में रेखांकित पद के अनुसार गलत प्रश्नवाचक पद लगाना (कः, किम्, कुत्र, कस्य, कस्याः)।
  • संयुक्ताक्षर/मात्रा की अशुद्धि – शयनागारम्, कुतन्त्रम्, स्वर्णिमाक्षरैः शुद्ध लिखें।

पाठ्यपुस्तक संदर्भ: NCERT दीपकम्, कक्षा 7, पाठ 12, पृष्ठ 127–136; उपलब्ध प्रति का पुनर्मुद्रण 2026–27। उत्तर और व्याख्याएँ ClearStudy की मौलिक शिक्षण सामग्री हैं; खुली गतिविधियों के उत्तर नमूने हैं। आधिकारिक NCERT पुस्तक पोर्टल।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

दीपकम् कक्षा 7 का पाठ 12 ‘वीराङ्गना पन्नाधाया’ किस पर आधारित है?

यह पाठ राजस्थान (मेवाड़) की वीरांगना पन्नाधाया (पन्ना धाय) के अद्वितीय त्याग एवं बलिदान की ऐतिहासिक कथा पर आधारित है, जिसने अपने पुत्र चन्दन का बलिदान देकर राजकुमार उदयसिंह की रक्षा की।

पन्नाधाया ने राजकुमार उदयसिंह की रक्षा कैसे की?

बनवीर के षड्यन्त्र को जानकर पन्नाधाया ने उदयसिंह के शयनस्थान पर अपने पुत्र चन्दन को सुला दिया। बनवीर ने सोये हुए चन्दन को ही उदयसिंह समझकर मार दिया, और इस प्रकार उदयसिंह बच गया।

पन्नाधाया का बलिदान हमें क्या शिक्षा देता है?

पन्नाधाया का बलिदान हमें शौर्य, राष्ट्रभक्ति, कर्तव्यनिष्ठा, त्याग एवं विवेक की शिक्षा देता है – कि व्यक्तिगत हित से राष्ट्रहित सदा श्रेष्ठ है।

अतिरिक्त प्रश्न, MCQ और अभिकथन-कारण ClearStudy के अभ्यास हैं। मूल पुस्तक भी साथ में पढ़ें।

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