Class 8 Sanskrit Deepakam Chapter 12 Solutions (NCERT 2026–27) – सम्यग्वर्णप्रयोगेण ब्रह्मलोके महीयते

This page gives the complete solution for Class 8 Sanskrit Deepakam (दीपकम्) Chapter 12 ‘सम्यग्वर्णप्रयोगेण ब्रह्मलोके महीयते’ – a lesson on the importance of correct, clear pronunciation of letters (वर्णोच्चारणम्). It includes the five शिक्षा-श्लोक with their मूल पाठ, सार (Hindi summary), शब्दार्थ, and original, exam-ready answers to every question of the अभ्यास (अभ्यासात् जायते सिद्धिः) along with extra questions, MCQs, अभिकथन-कारण and FAQs.

Class: 8 Subject: Sanskrit Book: Deepakam (दीपकम्) Chapter: 12 पाठ: सम्यग्वर्णप्रयोगेण ब्रह्मलोके महीयते Session: 2026–27

पाठ का अवलोकन (Chapter Overview)

दीपकम् कक्षा 8 का बारहवाँ पाठ ‘सम्यग्वर्णप्रयोगेण ब्रह्मलोके महीयते’ शुद्ध एवं स्पष्ट वर्ण-उच्चारण के महत्त्व पर आधारित है। पाठ का आरम्भ आचार्य एवं छात्रों के एक मनोरम संवाद से होता है, जिसमें आचार्य देव-असुर युद्ध की एक कथा सुनाते हैं। असुरराज वृत्रासुर ने इन्द्र को जीतने के लिए यज्ञ कराया, परन्तु ऋत्विजों ने मन्त्र के एक स्वर को बदल दिया, जिससे ‘इन्द्रशत्रुः’ का अर्थ ही उलट गया और वृत्रासुर के स्थान पर इन्द्र का बल बढ़ गया। इस कथा से सिद्ध होता है कि एक वर्ण या स्वर के परिवर्तन से पूरे शब्द का अर्थ बदल जाता है। इसी सन्दर्भ में पाँच शिक्षा-श्लोक दिए गए हैं, जो बताते हैं कि वर्णों का उच्चारण न तो अस्पष्ट (अव्यक्त) हो और न ही आवश्यकता से अधिक कठोर (पीडित); उत्तम पाठक के छह गुण एवं अधम पाठक के छह दोष भी समझाए गए हैं। शुद्ध उच्चारण करने वाला समाज में सम्मान पाता है।

पाठ-परिचय / प्रसंग

यह पाठ शिक्षा-शास्त्र (छह वेदाङ्गों में से प्रथम वेदाङ्ग, जिसमें वर्णों का उच्चारण, स्वर एवं विराम वर्णित हैं) के सिद्धान्तों पर आधारित है। पाठ में दिए गए श्लोक पाणिनीय-शिक्षा एवं इसी परम्परा के शिक्षा-ग्रन्थों से संकलित हैं। प्रथम श्लोक (‘यद्यपि बहु नाधीषे…’) व्याकरण-अध्ययन की अनिवार्यता बताता है; द्वितीय श्लोक (‘व्याघ्री यथा…’) वर्णोच्चारण को बाघिन के शिशु-वहन से उपमित करता है; तृतीय श्लोक (‘एवं वर्णाः प्रयोक्तव्या…’) यह सिखाता है कि सम्यक् वर्ण-प्रयोग से मनुष्य ब्रह्मलोक में सम्मानित होता है – इसी श्लोक के अन्तिम चरण से पाठ का नाम बना है। चतुर्थ एवं पञ्चम श्लोक उत्तम तथा अधम पाठक के छह-छह गुण/दोष गिनाते हैं।

मूल श्लोकाः

(पाठ में आए पाँच शिक्षा-श्लोक, ज्यों-के-त्यों।)

यद्यपि बहु नाधीषे तथापि पठ पुत्र व्याकरणम् ।
स्वजनः श्वजनो माभूत् सकलं शकलं सकृत् शकृत् ॥ १ ॥

व्याघ्री यथा हरेत् पुत्रान् दंष्ट्राभ्यां न च पीडयेत् ।
भीता पतनभेदाभ्यां तद्वद् वर्णान् प्रयोजयेत् ॥ २ ॥

एवं वर्णाः प्रयोक्तव्या नाव्यक्ता न च पीडिताः ।
सम्यग्वर्णप्रयोगेण ब्रह्मलोके महीयते ॥ ३ ॥

माधुर्यमक्षरव्यक्तिः पदच्छेदस्तु सुस्वरः ।
धैर्यं लयसमर्थं च षडेते पाठका गुणाः ॥ ४ ॥

गीती शीघ्री शिरःकम्पी तथा लिखितपाठकः ।
अनर्थज्ञोऽल्पकण्ठश्च षडेते पाठकाधमाः ॥ ५ ॥ — शिक्षा-श्लोकाः (पाणिनीय-शिक्षा परम्परा)

सार (Hindi Summary)

‘सम्यग्वर्णप्रयोगेण ब्रह्मलोके महीयते’ पाठ का आरम्भ आचार्य एवं छात्रों के संवाद से होता है। छात्र आचार्य से कोई कथा सुनाने का अनुरोध करते हैं। मनोरंजन के लिए आचार्य पहले एक कथा सुनाते हैं – देवों के राजा इन्द्र एवं असुरों के राजा वृत्रासुर के बीच सदा वैरभाव रहता था। अपना बल बढ़ाने एवं इन्द्र को जीतने के लिए वृत्रासुर ने एक यज्ञ कराया, जिसमें आहुति-मन्त्र था – ‘इन्द्रशत्रुर्वर्धस्व’। ऋत्विजों ने सोचा कि यज्ञ पूर्ण होने पर वृत्रासुर बलवान बनकर लोगों को पीड़ित करेगा; अतः उन्होंने मन्त्र के स्वर को बदल दिया। स्वर बदलने से अर्थ ही बदल गया, और वृत्रासुर के स्थान पर इन्द्र का बल बढ़ गया। फलस्वरूप बलवान इन्द्र ने वज्र से वृत्रासुर का वध कर दिया।

इस कथा से आचार्य यह शिक्षा देते हैं कि उच्चारण में एक वर्ण या स्वर की भूल से पूरे शब्द का अर्थ बदल सकता है; इसलिए शुद्ध एवं स्पष्ट उच्चारण आवश्यक है। इसी सन्दर्भ में पाँच शिक्षा-श्लोक दिए गए हैं। प्रथम श्लोक कहता है कि भले ही बहुत न पढ़ सको, पर व्याकरण अवश्य पढ़ो, ताकि ‘स्वजन’ (बन्धु) के स्थान पर ‘श्वजन’ (कुत्ता), ‘सकल’ (पूरा) के स्थान पर ‘शकल’ (टुकड़ा) तथा ‘सकृत्’ (एक बार) के स्थान पर ‘शकृत्’ (विष्ठा) जैसी अर्थ-विपर्यय की भूल न हो।

द्वितीय श्लोक में बाघिन का उदाहरण है – जैसे बाघिन अपने शिशु को दाँतों से इस प्रकार पकड़ती है कि न तो वह उसे काटती है और न गिरने देती है, वैसे ही वर्णों का उच्चारण न अति कठोर हो और न अति शिथिल। तृतीय श्लोक बताता है कि वर्ण न अव्यक्त (अस्पष्ट) हों और न पीडित (अधिक प्रयत्न वाले); सम्यक् वर्ण-प्रयोग करने वाला ब्रह्मलोक में सम्मानित होता है। चतुर्थ श्लोक में उत्तम पाठक के छह गुण – माधुर्य, अक्षर-स्पष्टता, उचित पदच्छेद, सुस्वर, धैर्य एवं लय-सामर्थ्य – गिनाए गए हैं। पञ्चम श्लोक में अधम पाठक के छह दोष – गीती (गाकर पढ़ना), शीघ्री (बहुत तेज़ पढ़ना), शिरःकम्पी (सिर हिलाकर पढ़ना), लिखितपाठक (देख-देख कर पढ़ना), अनर्थज्ञ (अर्थ न जानना) एवं अल्पकण्ठ (धीमे स्वर वाला) – बताए गए हैं। संक्षेप में, यह पाठ शुद्ध, स्पष्ट एवं मधुर उच्चारण की प्रेरणा देता है, जिससे श्रोता वक्ता का भाव ठीक से समझता है और वक्ता समाज में सम्मान पाता है।

शब्दार्थ (Word-meanings)

शब्दः (Sanskrit)हिन्दी अर्थEnglish meaning
ऋत्विजःपुरोहितPriests
अधीषेतुम पढ़ते होYou read / study
स्वजनःबन्धु, अपना व्यक्तिKinsman / relative
श्वजनःकुत्ता (शुनकः)Dog
सकलम्पूरा, सम्पूर्णEntire / whole
शकलम्टुकड़ा, खण्डFragment / piece
सकृत्एक बारOnce
शकृत्विष्ठा (मल)Faeces
अव्यक्ताःअस्पष्ट (कम प्रयत्न वाले)Unclear (under-articulated)
पीडिताःबाधित, पीड़ित (अधिक प्रयत्न वाले)Afflicted (over-articulated)
महीयतेपूजित/सम्मानित होता हैIs honoured / respected
व्याघ्रीबाघिन (स्त्री-व्याघ्र)Tigress
दंष्ट्राभ्याम्दाँतों सेWith the fangs
पीडयेत्कष्ट दे, हिंसा करेMay cause pain
भीताडरी हुई, भय से युक्तAfraid
प्रयोजयेत्उच्चारण/प्रयोग कर सकता हैMay pronounce / apply
माधुर्यम्मिठास, माधुर्यSweetness
अक्षरव्यक्तिःअक्षरों की स्पष्टताClarity of letters
सुस्वरःमधुर/शोभन स्वरPleasant voice
धैर्यम्आत्मविश्वास, धैर्यCourage / self-confidence
शीघ्रीतेज़ गति से पढ़ने वालाFast reader
शिरःकम्पीसिर हिलाकर पढ़ने वालाOne who nods the head while reading
अनर्थज्ञःजो अर्थ नहीं जानताOne who does not understand meaning
अल्पकण्ठःधीमे/दुर्बल स्वर वालाWeak-voiced

अभ्यासः (अभ्यासात् जायते सिद्धिः)

१. पाठे विद्यमानानां श्लोकानाम् उच्चारणं स्मरणं लेखनं च कुरुत ।

उत्तरयह अभ्यास-कार्य है। पाठ में दिए गए पाँचों शिक्षा-श्लोकों (‘यद्यपि बहु नाधीषे…’, ‘व्याघ्री यथा…’, ‘एवं वर्णाः…’, ‘माधुर्यमक्षरव्यक्तिः…’, ‘गीती शीघ्री…’) का शुद्ध, स्पष्ट उच्चारण करते हुए सस्वर पाठ कीजिए, उन्हें कण्ठस्थ कीजिए तथा शुद्ध-शुद्ध लिखकर अभ्यास कीजिए।

२. अधोलिखितानां प्रश्नानाम् एकपदेन उत्तराणि लिखत —

(क) पाठकाः केषां सम्यक् प्रयोगं कुर्युः ?

उत्तरवर्णानाम्

(ख) किम् अवश्यमेव पठनीयम् ?

उत्तरव्याकरणम्

(ग) ब्रह्मलोके केन सम्मानं भवति ?

उत्तरसम्यग्वर्णप्रयोगेण

(घ) अधमाः पाठकाः कति भवन्ति ?

उत्तरषट् (छह) ।

(ङ) धैर्यं केषां गुणः ?

उत्तरपाठकानाम्

३. अधोलिखितानां प्रश्नानाम् पूर्णवाक्येन उत्तराणि लिखत —

(क) व्याघ्री दंष्ट्राभ्यां कान् नयति ?

उत्तरव्याघ्री दंष्ट्राभ्यां स्वपुत्रान् (शिशून्) नयति ।

(ख) वर्णाः कथं प्रयोक्तव्याः ?

उत्तरवर्णाः न अव्यक्ताः न च पीडिताः (अर्थात् न अस्पष्टाः न च अतिकठोराः, अपितु स्पष्टतया स्वाभाविकरूपेण) प्रयोक्तव्याः ।

(ग) पाठकानां षड्-गुणाः के भवन्ति ?

उत्तरपाठकानां षड्-गुणाः – माधुर्यम्, अक्षरव्यक्तिः, पदच्छेदः, सुस्वरः, धैर्यम् लयसमर्थं च भवन्ति ।

(घ) के अधमाः पाठकाः भवन्ति ?

उत्तरगीती, शीघ्री, शिरःकम्पी, लिखितपाठकः, अनर्थज्ञः अल्पकण्ठः च – एते षट् अधमाः पाठकाः भवन्ति ।

(ङ) ‘स्वजनः’ ‘श्वजनः’ च इत्यनयोः अर्थदृष्ट्या कः भेदः ?

उत्तर‘स्वजनः’ इत्यस्य अर्थः बन्धुः (अपना व्यक्ति) अस्ति, परन्तु ‘श्वजनः’ इत्यस्य अर्थः शुनकः (कुत्ता) अस्ति । एकस्य वर्णस्य परिवर्तनेन अर्थः सर्वथा भिन्नः भवति ।

(च) ‘सकलं’ ‘शकलं’ च इत्यनयोः अर्थदृष्ट्या कः भेदः ?

उत्तर‘सकलम्’ इत्यस्य अर्थः सम्पूर्णम् (पूरा) अस्ति, परन्तु ‘शकलम्’ इत्यस्य अर्थः खण्डम् (टुकड़ा) अस्ति । अतः वर्ण-शुद्धिः अत्यावश्यका ।

४. अधोलिखितानि लक्षणानि पाठकस्य गुणाः वा दोषाः वा इति विभजत —

(दिए गए लक्षण: अक्षरव्यक्तिः, शीघ्री, लिखितपाठकः, लयसमर्थम्, अनर्थः, अल्पकण्ठः, माधुर्यम्, गीती, पदच्छेदः, शिरःकम्पी, अनर्थज्ञः, धैर्यम्, सुस्वरः)

गुणाः (उत्तम पाठक)दोषाः (अधम पाठक)
अक्षरव्यक्तिःशीघ्री
लयसमर्थम्लिखितपाठकः
माधुर्यम्अनर्थः / अनर्थज्ञः
पदच्छेदःगीती
धैर्यम्शिरःकम्पी
सुस्वरःअल्पकण्ठः

५. श्लोकानुसारं रिक्तस्थानानि उचितैः शब्दैः पूरयत —

उत्तर (क) भीता पतनभेदाभ्यां तद्वद् वर्णान् प्रयोजयेत् । (ख) धैर्यं लयसमर्थं च षडेते पाठका गुणाः । (ग) गीती शीघ्री शिरःकम्पी तथा लिखितपाठकः । (घ) एवं वर्णाः प्रयोक्तव्या नाव्यक्ता न च पीडिताः (ङ) स्वजनः श्वजनो माभूत् सकलं शकलं सकृत् शकृत् ।

६. अधोलिखितानि वाक्यानि सत्यम् वा असत्यम् वा इति लिखत —

यथा – पदच्छेदः पाठकानां गुणः अस्ति । → सत्यम् ।

उत्तर (क) गानसहितपठनं पाठकानां दोषः भवति । → सत्यम् (गीती दोषः अस्ति) । (ख) माधुर्यं नाम अक्षराणाम् उच्चारणे स्पष्टता अस्ति । → असत्यम् (अक्षरव्यक्तिः नाम स्पष्टता; माधुर्यं नाम मधुरता) । (ग) शकृत् नाम एकवारम् इति अर्थः अस्ति । → असत्यम् (शकृत् नाम विष्ठा; सकृत् नाम एकवारम्) । (घ) अव्यक्ताः वर्णाः प्रयोक्तव्याः भवन्ति । → असत्यम् (वर्णाः न अव्यक्ताः प्रयोक्तव्याः) । (ङ) व्याघ्री यथा पुत्रान् हरति तथा वर्णान् प्रयोजयेत् । → सत्यम्

अत्र इदम् अवधेयम् (वेदाङ्गानि)

पाठ में ‘अत्र इदम् अवधेयम्’ के अन्तर्गत बताया गया है कि ‘शिक्षा-कल्प-व्याकरण-निरुक्त-छन्दः-ज्योतिषम्’ – ये छह वेदाङ्ग हैं। इस पाठ का सम्बन्ध प्रथम वेदाङ्ग ‘शिक्षा’ से है।

वेदाङ्गम्विवरणम् (इसका विषय)
1. शिक्षाशिक्षा-ग्रन्थों में वर्णों के उच्चारण की विधि, स्वर एवं विराम वर्णित हैं।
2. कल्पःकल्प-ग्रन्थों में यज्ञ आदि की क्रिया-विधि का वर्णन है।
3. व्याकरणम्व्याकरण-ग्रन्थों में भाषा के नियम हैं।
4. निरुक्तम्इस शास्त्र में शब्दों की व्युत्पत्ति (मूल) रहती है।
5. छन्दःइस शास्त्र में मात्रा-ताल आदि की दृष्टि से गायन-सम्बद्ध वर्णन है।
6. ज्योतिषम्इस शास्त्र में सूर्य-चन्द्र आदि नक्षत्रों की गति एवं उनके प्रभाव का वर्णन है।

योग्यताविस्तरः & परियोजनाकार्यम्

योग्यताविस्तरः (क) – अक्षर/मात्रा-परिवर्तन से अर्थ-परिवर्तन

एक अक्षर या मात्रा बदलने से शब्द का अर्थ ही बदल जाता है। यथा –

शब्दःअर्थःपरिवर्तित शब्दःपरिवर्तित अर्थः
मित्रम्बन्धुः (मित्र)मित्रःसूर्यः (सूर्य)
फलम्आम्रादिफलम् (फल)पलम्मांसः (मांस)
पुरुषःजनः (व्यक्ति)परुषःकठोरः (कठोर)
अवदानम्योगदानम्अवधानम्एकाग्रता
प्रतिपलम्प्रतिक्षणम्प्रतिफलम्परिणामः
नदतिध्वनिं करोतिनुदतिप्रेरयति
ददातिदानं करोतिदधातिधारणं करोति

योग्यताविस्तरः (ख) – निम्नलिखित श्लोकों का भी स्मरण कीजिए

आलस्यात् मूर्खसंयोगाद् भयाद् रोगनिपीडनात् ।
अत्याशक्त्याच्च मानाच्च षड्भिर्विद्या विनश्यति ॥
(माण्डूक्य-शिक्षा)

जलमभ्यासयोगेन शैलानां कुरुते क्षयम् ।
कर्कशानां मृदुस्पर्शं किमभ्यासात् न साध्यते ? ॥
(याज्ञवल्क्य-शिक्षा)

येषां तीर्थाऽगता विद्या नित्यमभ्यासवर्तिता ।
ते भवन्ति दुराधर्षाः ससिंहाः इव पर्वताः ॥
(माण्डूक्य-शिक्षा)

काकचेष्टो बकध्यानः श्वाननिद्रस्तथैव च ।
अल्पाहारी गृहत्यागी विद्यार्थी पञ्चलक्षणः ॥
(लोकप्रचलित-नीतिश्लोकः)

यथा खनन् खनित्रेण नरो वार्यधिगच्छति ।
तथा गुरुगतां विद्यां शुश्रूषुरधिगच्छति ॥
(याज्ञवल्क्य-शिक्षा)

छन्दः पादौ तु वेदस्य हस्तौ कल्पोऽथ पठ्यते ।
ज्योतिषामयनं चक्षुर्निरुक्तं श्रोत्रमुच्यते ॥
शिक्षा घ्राणं तु वेदस्य मुखं व्याकरणं स्मृतम् ।
तस्मात् साङ्गमधीत्यैव ब्रह्मलोके महीयते ॥
(पाणिनीय-शिक्षा कारिका)

परियोजनाकार्यम् (Project Work)

कक्ष्यायां श्लोकोच्चारण-प्रतियोगितां स्थापयित्वा निर्मित-सूच्यनुगुणम् उच्चारणम् अवलोकनीयम् । अत्र के के गुणाः दोषाः च जाताः इति अधः लिखत ।

मार्गदर्शनम्यह कक्षा-गतिविधि है। कक्षा में श्लोक-उच्चारण की एक प्रतियोगिता आयोजित कीजिए। पाठ में बताए छह गुणों (माधुर्य, अक्षर-स्पष्टता, पदच्छेद, सुस्वर, धैर्य, लय-सामर्थ्य) एवं छह दोषों (गीती, शीघ्री, शिरःकम्पी, लिखितपाठक, अनर्थज्ञ, अल्पकण्ठ) की एक सूची बनाकर, प्रत्येक प्रतिभागी में जो-जो गुण एवं दोष दिखें, उन्हें दो स्तंभों (गुणाः / दोषाः) में लिखिए।

अतिरिक्त प्रश्न (Extra Questions)

लघु उत्तरीय प्रश्न (30–40 शब्द)

1. इस पाठ में आचार्य ने कौन-सी कथा सुनाई और उसका मुख्य भाव क्या है?

उत्तरआचार्य ने इन्द्र एवं वृत्रासुर की कथा सुनाई। वृत्रासुर के यज्ञ-मन्त्र में ऋत्विजों ने एक स्वर बदल दिया, जिससे अर्थ उलट गया और इन्द्र का बल बढ़ा। इससे यह सिद्ध होता है कि एक वर्ण या स्वर के परिवर्तन से शब्द का अर्थ ही बदल जाता है।

2. प्रथम श्लोक में व्याकरण पढ़ने पर बल क्यों दिया गया है?

उत्तरक्योंकि व्याकरण के अभाव में उच्चारण की भूल हो जाती है। तब ‘स्वजन’ (बन्धु) के स्थान पर ‘श्वजन’ (कुत्ता), ‘सकल’ (पूरा) के स्थान पर ‘शकल’ (टुकड़ा) तथा ‘सकृत्’ (एक बार) के स्थान पर ‘शकृत्’ (विष्ठा) जैसी दोषपूर्ण भूलें हो सकती हैं।

3. बाघिन के उदाहरण से वर्णोच्चारण के विषय में क्या सीख मिलती है?

उत्तरजैसे बाघिन अपने शिशु को दाँतों से न तो काटती है और न गिरने देती है, वैसे ही वर्णों का उच्चारण न अति कठोर (पीडित) हो और न अति शिथिल (अव्यक्त); वह स्पष्ट एवं सन्तुलित होना चाहिए।

4. सम्यक् वर्ण-प्रयोग का क्या फल बताया गया है?

उत्तरतृतीय श्लोक के अनुसार जो व्यक्ति वर्णों का सम्यक् (शुद्ध एवं स्पष्ट) प्रयोग करता है, वह ब्रह्मलोक में सम्मानित होता है तथा समाज में भी आदर पाता है, क्योंकि श्रोता उसके भाव को भली प्रकार समझ लेता है।

5. उत्तम पाठक एवं अधम पाठक के कितने-कितने लक्षण बताए गए हैं?

उत्तरउत्तम पाठक के छह गुण – माधुर्य, अक्षर-स्पष्टता, पदच्छेद, सुस्वर, धैर्य एवं लय-सामर्थ्य; तथा अधम पाठक के छह दोष – गीती, शीघ्री, शिरःकम्पी, लिखितपाठक, अनर्थज्ञ एवं अल्पकण्ठ बताए गए हैं।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (100–120 शब्द)

6. इन्द्र एवं वृत्रासुर की कथा अपने शब्दों में लिखिए तथा उससे प्राप्त शिक्षा बताइए।

उत्तरदेवों के राजा इन्द्र एवं असुरों के राजा वृत्रासुर के बीच सदा वैरभाव रहता था। अपना बल बढ़ाने एवं इन्द्र को जीतने के लिए वृत्रासुर ने एक यज्ञ कराया। उसका आहुति-मन्त्र था – ‘इन्द्रशत्रुर्वर्धस्व’। ऋत्विजों ने सोचा कि यज्ञ पूर्ण होने पर वृत्रासुर बलवान बनकर लोगों को पीड़ित करेगा।अतः उन्होंने मन्त्र के स्वर को बदल दिया। स्वर बदलने से मन्त्र का अर्थ ही बदल गया और वृत्रासुर के स्थान पर इन्द्र का बल बढ़ गया। फलस्वरूप बलवान इन्द्र ने वज्र से वृत्रासुर का वध कर दिया। इस कथा से यह शिक्षा मिलती है कि उच्चारण में एक स्वर या वर्ण की भूल से पूरे शब्द का अर्थ बदल सकता है; इसलिए सदा शुद्ध एवं सावधान उच्चारण करना चाहिए।

7. उत्तम पाठक के गुण एवं अधम पाठक के दोषों का वर्णन कीजिए।

उत्तरचतुर्थ श्लोक के अनुसार उत्तम पाठक के छह गुण हैं – (1) माधुर्य (मधुरता से उच्चारण), (2) अक्षरव्यक्ति (अक्षरों की स्पष्टता), (3) पदच्छेद (उचित स्थान पर शब्दों का विभाजन), (4) सुस्वर (श्रवण-योग्य मधुर स्वर), (5) धैर्य (बिना घबराए आत्मविश्वास से पढ़ना) एवं (6) लय-सामर्थ्य (विषय में तल्लीनता)।पञ्चम श्लोक के अनुसार अधम पाठक के छह दोष हैं – (1) गीती (गाकर पढ़ना), (2) शीघ्री (बहुत तेज़ पढ़ना), (3) शिरःकम्पी (सिर हिलाकर पढ़ना), (4) लिखितपाठक (बार-बार देख-देख कर पढ़ना), (5) अनर्थज्ञ (अर्थ न जानना) एवं (6) अल्पकण्ठ (धीमे/दुर्बल स्वर वाला)। इन दोषों को दूर करके ही हम आदर्श पाठक बन सकते हैं।

8. शिक्षा वेदाङ्ग के रूप में इस पाठ का क्या महत्त्व है? वेदाङ्गों का संक्षिप्त परिचय दीजिए।

उत्तरवेद के छह अंग (वेदाङ्ग) हैं – शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द एवं ज्योतिष। इनमें ‘शिक्षा’ प्रथम वेदाङ्ग है, जिसमें वर्णों के शुद्ध उच्चारण, स्वर एवं विराम का विवेचन है। यह पाठ इसी ‘शिक्षा’ शास्त्र पर आधारित है।कल्प में यज्ञादि की क्रिया-विधि, व्याकरण में भाषा के नियम, निरुक्त में शब्दों की व्युत्पत्ति, छन्द में मात्रा-ताल आदि एवं ज्योतिष में नक्षत्रों की गति का वर्णन रहता है। पाणिनीय-शिक्षा की कारिका के अनुसार जो साङ्ग (सभी अंगों सहित) वेद का अध्ययन करता है, वह ब्रह्मलोक में सम्मानित होता है। अतः शुद्ध उच्चारण का यह पाठ वैदिक ज्ञान-परम्परा का मूल आधार है।

MCQ & अभिकथन-कारण

1. इस पाठ का मुख्य विषय क्या है?

(क) यज्ञ-विधि

(ख) शुद्ध वर्ण-उच्चारण

(ग) धन-संचय

(घ) नक्षत्र-गणना

उत्तर(ख) शुद्ध वर्ण-उच्चारण।

2. वृत्रासुर के यज्ञ-मन्त्र में क्या परिवर्तन हुआ?

(क) मन्त्र का पूरा बदल दिया गया

(ख) मन्त्र में एक स्वर बदल दिया गया

(ग) यज्ञ रोक दिया गया

(घ) आहुति नहीं दी गई

उत्तर(ख) मन्त्र में एक स्वर बदल दिया गया।

3. ‘श्वजनः’ शब्द का अर्थ है—

(क) बन्धु

(ख) कुत्ता

(ग) टुकड़ा

(घ) विष्ठा

उत्तर(ख) कुत्ता। (‘स्वजनः’ का अर्थ बन्धु है)

4. ‘सकृत्’ का अर्थ है—

(क) विष्ठा

(ख) एक बार

(ग) पूरा

(घ) टुकड़ा

उत्तर(ख) एक बार। (‘शकृत्’ का अर्थ विष्ठा है)

5. द्वितीय श्लोक में किसका उदाहरण दिया गया है?

(क) सिंह का

(ख) बाघिन (व्याघ्री) का

(ग) हाथी का

(घ) गाय का

उत्तर(ख) बाघिन (व्याघ्री) का।

6. वर्णों का उच्चारण कैसा नहीं होना चाहिए?

(क) स्पष्ट

(ख) स्वाभाविक

(ग) अव्यक्त एवं पीडित

(घ) मधुर

उत्तर(ग) अव्यक्त एवं पीडित।

7. उत्तम पाठक के कितने गुण बताए गए हैं?

(क) चार

(ख) पाँच

(ग) छह

(घ) सात

उत्तर(ग) छह।

8. इनमें से कौन-सा अधम पाठक का दोष नहीं है?

(क) गीती

(ख) शिरःकम्पी

(ग) पदच्छेदः

(घ) अल्पकण्ठः

उत्तर(ग) पदच्छेदः। (यह उत्तम पाठक का गुण है)

9. ‘अक्षरव्यक्तिः’ का अर्थ है—

(क) मधुरता

(ख) अक्षरों की स्पष्टता

(ग) तेज़ पढ़ना

(घ) सिर हिलाना

उत्तर(ख) अक्षरों की स्पष्टता।

10. सम्यक् वर्ण-प्रयोग करने वाला कहाँ सम्मानित होता है?

(क) इन्द्रलोक में

(ख) ब्रह्मलोक में

(ग) पाताललोक में

(घ) यमलोक में

उत्तर(ख) ब्रह्मलोक में।
उत्तर-कुंजी: 1-(ख), 2-(ख), 3-(ख), 4-(ख), 5-(ख), 6-(ग), 7-(ग), 8-(ग), 9-(ख), 10-(ख)

अभिकथन-कारण – नीचे अभिकथन (A) और कारण (R) दिए गए हैं। सही विकल्प चुनिए—
(क) A और R दोनों सही, R, A की सही व्याख्या है। (ख) A और R दोनों सही, पर R, A की सही व्याख्या नहीं। (ग) A सही, R गलत। (घ) A गलत, R सही।

1. अभिकथन (A): वर्णों का उच्चारण शुद्ध एवं स्पष्ट होना चाहिए।

कारण (R): एक वर्ण या स्वर के परिवर्तन से पूरे शब्द का अर्थ बदल जाता है।

उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है।

2. अभिकथन (A): वृत्रासुर अपने ही यज्ञ से मारा गया।

कारण (R): ऋत्विजों ने मन्त्र का स्वर बदल दिया, जिससे फल वृत्रासुर के स्थान पर इन्द्र को मिला।

उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है।

3. अभिकथन (A): ‘सकलम्’ एवं ‘शकलम्’ का अर्थ एक ही है।

कारण (R): ‘सकलम्’ का अर्थ सम्पूर्ण है तथा ‘शकलम्’ का अर्थ टुकड़ा है।

उत्तर(घ) A गलत है, किन्तु R सही है – दोनों शब्दों के अर्थ भिन्न हैं।

4. अभिकथन (A): ‘शिक्षा’ प्रथम वेदाङ्ग है।

कारण (R): शिक्षा-शास्त्र में वर्णों के उच्चारण की विधि, स्वर एवं विराम वर्णित हैं।

उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है।

5. अभिकथन (A): ‘गीती’ उत्तम पाठक का गुण है।

कारण (R): गाकर पढ़ना अधम पाठक का एक दोष है।

उत्तर(घ) A गलत है, किन्तु R सही है – ‘गीती’ गुण नहीं, अपितु दोष है।

परीक्षा-सुझाव एवं सामान्य त्रुटियाँ

परीक्षा-सुझाव (Exam Tips)

  • पाँचों श्लोक कण्ठस्थ करें – श्लोक-लेखन एवं रिक्तस्थान-पूर्ति (प्रश्न 5) प्रायः इन्हीं से आते हैं।
  • अर्थ-विपर्यय वाले युग्म याद रखें – स्वजन/श्वजन, सकल/शकल, सकृत्/शकृत्।
  • उत्तम पाठक के छह गुण एवं अधम पाठक के छह दोष क्रमवार याद करें (प्रश्न 3, 4)।
  • ‘एकपदेन उत्तरम्’ में केवल एक पद (प्रथमा/षष्ठी विभक्ति में) लिखें; ‘पूर्णवाक्येन’ में पूरा वाक्य।
  • छह वेदाङ्गों के नाम क्रम से – शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द, ज्योतिष – याद रखें।

सामान्य त्रुटियाँ (Common Mistakes)

  • ‘माधुर्यम्’ एवं ‘अक्षरव्यक्तिः’ को एक मान लेना – माधुर्य = मधुरता, अक्षरव्यक्ति = स्पष्टता।
  • ‘शकृत्’ (विष्ठा) एवं ‘सकृत्’ (एक बार) के अर्थ उलट देना।
  • ‘गीती’, ‘शीघ्री’ आदि को गुण समझ लेना – ये अधम पाठक के दोष हैं।
  • श्लोक में मात्रा/विसर्ग की अशुद्धि – दंष्ट्राभ्याम्, पीडिताः, सुस्वरः को शुद्ध लिखें।
  • पाठ का सम्बन्ध गलती से ‘कल्प’ या ‘व्याकरण’ से जोड़ देना – यह ‘शिक्षा’ वेदाङ्ग से है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

दीपकम् कक्षा 8 का पाठ 12 ‘सम्यग्वर्णप्रयोगेण ब्रह्मलोके महीयते’ किस विषय पर है?

यह पाठ शुद्ध एवं स्पष्ट वर्ण-उच्चारण के महत्त्व पर है। इसका सम्बन्ध प्रथम वेदाङ्ग ‘शिक्षा’ से है और इसमें पाँच शिक्षा-श्लोक तथा इन्द्र-वृत्रासुर की कथा दी गई है।

‘सम्यग्वर्णप्रयोगेण ब्रह्मलोके महीयते’ का अर्थ क्या है?

इसका अर्थ है – ‘वर्णों के सम्यक् (शुद्ध एवं स्पष्ट) प्रयोग से मनुष्य ब्रह्मलोक में सम्मानित होता है।’ यह तृतीय श्लोक का अन्तिम चरण है, जिससे पाठ का नाम बना है।

उत्तम पाठक एवं अधम पाठक के लक्षण कौन-कौन से हैं?

उत्तम पाठक के छह गुण हैं – माधुर्य, अक्षर-स्पष्टता, पदच्छेद, सुस्वर, धैर्य एवं लय-सामर्थ्य। अधम पाठक के छह दोष हैं – गीती, शीघ्री, शिरःकम्पी, लिखितपाठक, अनर्थज्ञ एवं अल्पकण्ठ।

श्लोक, प्रश्न एवं अभ्यास-शीर्षक NCERT दीपकम् पुस्तक से ज्यों-के-त्यों लिए गए हैं; सार, भावार्थ एवं उत्तर ClearStudy द्वारा मौलिक रूप से तैयार किए गए हैं।

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