Class 8 Sanskrit Deepakam Chapter 3 Solutions (NCERT 2026–27) – सुभाषितरसं पीत्वा जीवनं सफलं कुरु

This page gives the complete solution for Class 8 Sanskrit Deepakam (दीपकम्) Chapter 3 ‘सुभाषितरसं पीत्वा जीवनं सफलं कुरु’ – a collection of eight famous नीति-सुभाषितानि (moral verses) along with their मूल श्लोक, सार (Hindi summary), शब्दार्थ, and original, exam-ready answers to every question of the अभ्यास (अभ्यासात् जायते सिद्धिः) along with the सन्धि-समास grammar table, extra questions, MCQs, अभिकथन-कारण and FAQs.

Class: 8 Subject: Sanskrit Book: Deepakam (दीपकम्) Chapter: 3 पाठ: सुभाषितरसं पीत्वा जीवनं सफलं कुरु Session: 2026–27

पाठ का अवलोकन (Chapter Overview)

दीपकम् कक्षा 8 का तृतीय पाठ ‘सुभाषितरसं पीत्वा जीवनं सफलं कुरु’ आठ चुने हुए नीति-सुभाषितों (श्रेष्ठ वचनों) का संकलन है। पाठ का आरम्भ पितामही एवं पौत्र के एक रोचक संवाद से होता है, जिसमें बालक नीतिश्लोक सुनने की इच्छा प्रकट करता है। पितामही समझाती हैं कि ‘सुष्ठु भाषितानि’ अर्थात् सुन्दर एवं हितकारी वचन ही सुभाषित कहलाते हैं, जो सदा जनहित में होते हैं। इन सुभाषितों के पठन से आदर्श मानव-जीवन के निर्माण की प्रेरणा मिलती है। ये आठ श्लोक भारतभूमि की महिमा, गुणग्राहकता, सत्पुरुषों की नम्रता, मनुष्य की परीक्षा के चार आधार, मनुष्य को सुशोभित करने वाले आठ गुण, सच्ची सभा एवं सत्य का स्वरूप, दुर्जन-संग का त्याग तथा भाग्य के साथ पुरुषार्थ की अनिवार्यता – इन नीति-विषयों पर प्रकाश डालते हैं।

पाठ-परिचय / प्रसंग

यह पाठ संस्कृत-साहित्य के विभिन्न नीति-ग्रन्थों एवं पुराणों से चुने गए आठ सुभाषितों (नीति-श्लोकों) का संग्रह है। ‘सुभाषित’ शब्द का अर्थ है – ‘सुष्ठु भाषितम्’ अर्थात् भली प्रकार से कहा गया, शोभन एवं हितकारी वचन। सुभाषित जीवन के व्यवहार, कर्तव्य-अकर्तव्य एवं आदर्श-मानवजीवन के निर्माण का स्पष्ट मार्गदर्शन करते हैं। पाठ का संवाद-अंश पितामही एवं पौत्र के बीच होता है, जिसके पश्चात् आठ नीति-श्लोक क्रमशः दिए गए हैं। इन श्लोकों के योग्यताविस्तरः भाग में विष्णुपुराण, महाभारत, भर्तृहरि, हितोपदेश एवं चाणक्यनीति जैसे प्रमुख नीति-स्रोतों का परिचय भी दिया गया है। पाठ का केन्द्रीय भाव है – सुभाषितरूपी अमृत-रस का पान करके अपने जीवन को सफल बनाना।

मूल सुभाषितानि (श्लोकाः)

(पाठ में संकलित आठ नीति-सुभाषित, ज्यों-के-त्यों।)

गायन्ति देवाः किल गीतकानि धन्यास्तु ते भारतभूमिभागे ।
स्वर्गापवर्गास्पदमार्गभूते भवन्ति भूयः पुरुषाः सुरत्वात् ॥ १ ॥

गुणी गुणं वेत्ति न वेत्ति निर्गुणः बली बलं वेत्ति न वेत्ति निर्बलः ।
पिको वसन्तस्य गुणं न वायसः करी च सिंहस्य बलं न मूषकः ॥ २ ॥

भवन्ति नम्रास्तरवः फलोद्गमैः नवाम्बुभिर्दूरविलम्बिनो घनाः ।
अनुद्धताः सत्पुरुषाः समृद्धिभिः स्वभाव एवैष परोपकारिणाम् ॥ ३ ॥

यथा चतुर्भिः कनकं परीक्ष्यते निघर्षणच्छेदनतापताडनैः ।
तथा चतुर्भिः पुरुषः परीक्ष्यते कुलेन शीलेन गुणेन कर्मणा ॥ ४ ॥

अष्टौ गुणाः पुरुषं दीपयन्ति प्रज्ञा च कौल्यं च दमः श्रुतं च ।
पराक्रमश्चाबहुभाषिता च दानं यथाशक्ति कृतज्ञता च ॥ ५ ॥

न सा सभा यत्र न सन्ति वृद्धाः वृद्धा न ते ये न वदन्ति धर्मम् ।
धर्मः स नो यत्र न सत्यमस्ति सत्यं न तद्यच्छलमभ्युपैति ॥ ६ ॥

दुर्जनेन समं सख्यं प्रीतिं चापि न कारयेत् ।
उष्णो दहति चाङ्गारः शीतः कृष्णायते करम् ॥ ७ ॥

यथा ह्येकेन चक्रेण न रथस्य गतिर्भवेत् ।
एवं पुरुषकारेण विना दैवं न सिध्यति ॥ ८ ॥ — सुभाषितानि (नीति-श्लोक-सङ्ग्रहः)

सार (Hindi Summary)

‘सुभाषितरसं पीत्वा जीवनं सफलं कुरु’ पाठ पितामही एवं पौत्र के संवाद से आरम्भ होता है। बालक नीतिश्लोक सुनने की इच्छा प्रकट करता है, तब पितामही समझाती हैं कि सुन्दर एवं हितकारी वचन ही ‘सुभाषित’ कहलाते हैं। इनके पठन से आदर्श मानव-जीवन के निर्माण की प्रेरणा मिलती है और जो व्यक्ति इन्हें पढ़कर अपने जीवन-व्यवहार में लागू करता है, वह अनेक लाभ प्राप्त करता है।

इसके पश्चात् आठ नीति-सुभाषित दिए गए हैं। प्रथम श्लोक भारतभूमि की महिमा बताता है – देवता भी इस पुण्यभूमि में जन्म लेने के लिए लालायित रहते हैं। द्वितीय श्लोक में गुणग्राहकता का भाव है – गुणी ही गुण को पहचानता है, जैसे कोयल वसन्त के गुण को जानती है, कौआ नहीं; और हाथी सिंह के बल को जानता है, चूहा नहीं। तृतीय श्लोक में सत्पुरुषों की स्वाभाविक नम्रता का चित्रण है – जैसे फलों से लदे वृक्ष एवं जल से भरे बादल झुक जाते हैं, वैसे ही सज्जन समृद्धि में भी अभिमान नहीं करते। चतुर्थ श्लोक बताता है कि जैसे सोने की परीक्षा घिसने, काटने, तपाने एवं पीटने – इन चार उपायों से होती है, वैसे ही मनुष्य की परीक्षा कुल, शील, गुण एवं कर्म से होती है।

पंचम श्लोक में मनुष्य को सुशोभित करने वाले आठ गुण बताए गए हैं – प्रज्ञा, कुलीनता, इन्द्रिय-संयम, शास्त्रज्ञान, पराक्रम, मितभाषिता, यथाशक्ति दान एवं कृतज्ञता। षष्ठ श्लोक में सच्ची सभा एवं सच्चे सत्य का स्वरूप बताया गया है – वही सभा सार्थक है जहाँ ज्ञानवृद्ध जन हों और धर्मानुकूल सत्य ही बोला जाए। सप्तम श्लोक दुर्जन के संग का त्याग सिखाता है – जैसे अंगारा गरम होने पर जलाता है और ठण्डा होने पर भी हाथ काला कर देता है, वैसे ही दुर्जन सदा हानि ही पहुँचाता है। अष्टम श्लोक भाग्य के साथ पुरुषार्थ की अनिवार्यता बताता है – जैसे एक पहिए से रथ नहीं चलता, वैसे ही पुरुषार्थ के बिना केवल भाग्य से कार्य सिद्ध नहीं होता। संक्षेप में, यह पाठ हमें गुणग्राहकता, नम्रता, सच्चरित्रता, परिश्रम एवं सत्संगति की प्रेरणा देता है।

शब्दार्थ (Word-meanings)

शब्दः (Sanskrit)हिन्दी अर्थEnglish meaning
गायन्तिगाते हैंSing
किलनिश्चय सेIndeed / certainly
धन्याःप्रशंसनीय, भाग्यशालीPraiseworthy / blessed
अपवर्गःमोक्ष, निर्वाणLiberation
भूयःबार-बार, पुनःOver and over again
सुरत्वात्देवत्व सेFrom divinity
वेत्तिजानता हैKnows
निर्गुणःगुणहीनWithout virtue
बलीबलवानPowerful
निर्बलःबलहीनWeak
पिकःकोयलCuckoo
वायसःकौआCrow
करीहाथीElephant
नम्राःझुके हुए, विनम्रBent / polite
तरवःवृक्षTrees
फलोद्गमैःफलों के भार सेWith weight of fruits
घनाःबादलClouds
अनुद्धताःअभिमान से रहितWithout arrogance
कनकम्सोना, स्वर्णGold
परीक्ष्यतेपरीक्षा की जाती हैIs tested
कौल्यम्कुलीनताNoble birth
दमःइन्द्रिय-संयमControl over senses
श्रुतम्शास्त्रज्ञानKnowledge of scriptures
अबहुभाषितामितभाषिता (कम एवं सार्थक बोलना)Speaking less but meaningfully
छलम्कपटCheating / deceit
दुर्जनेनदुष्ट व्यक्ति सेWith a wicked person
अङ्गारःअंगाराCharcoal / ember
कृष्णायतेकाला करता हैBlackens
दैवम्भाग्यLuck / fate
पुरुषकारेणपुरुषार्थ से, परिश्रम सेBy human effort
सिध्यतिसिद्ध होता है, फलता हैIs accomplished

अभ्यासः (अभ्यासात् जायते सिद्धिः)

1. पाठस्य आधारेण अधोलिखितानां प्रश्नानाम् उत्तराणि एकपदेन लिखत —

(क) गीतानि के गायन्ति ?

उत्तरदेवाः ।

(ख) कः बलं न वेत्ति ?

उत्तरनिर्बलः ।

(ग) कः वसन्तस्य गुणं वेत्ति ?

उत्तरपिकः ।

(घ) मूषकः कस्य बलं न वेत्ति ?

उत्तरसिंहस्य ।

(ङ) फलोद्गमैः के नम्राः भवन्ति ?

उत्तरतरवः ।

(च) केन समं सख्यं न करणीयम् ?

उत्तरदुर्जनेन ।

(छ) केन विना दैवं न सिध्यति ?

उत्तरपुरुषकारेण (विना) ।

2. पाठस्य आधारेण अधोलिखितानां प्रश्नानाम् उत्तराणि पूर्णवाक्येन लिखत —

(क) तरवः कदा नम्राः भवन्ति ?

उत्तरतरवः फलोद्गमैः (फलानां भारेण) नम्राः भवन्ति । अर्थात् वृक्ष फलों के भार से झुक जाते हैं ।

(ख) समृद्धिभिः के अनुद्धताः भवन्ति ?

उत्तरसमृद्धिभिः सत्पुरुषाः अनुद्धताः भवन्ति । अर्थात् सज्जन व्यक्ति समृद्धि (धन-वैभव) पाकर भी अभिमान नहीं करते ।

(ग) सत्पुरुषाणां स्वभावः कीदृशः भवति ?

उत्तरसत्पुरुषाणां स्वभावः नम्रः परोपकारी च भवति । ते समृद्धौ अपि अनुद्धताः (निरभिमानाः) भूत्वा सदैव परोपकाराय यतन्ते ।

(घ) सत्यम् कदा सत्यम् न भवति ?

उत्तरयत् सत्यं छलम् अभ्युपैति (कपटयुक्तं भवति), तत् सत्यं सत्यं न भवति । अर्थात् छल-कपट से युक्त वचन वास्तव में सत्य नहीं होता ।

(ङ) दैवं कदा न सिध्यति ?

उत्तरपुरुषकारेण विना (पुरुषार्थस्य अभावे) दैवं न सिध्यति । अर्थात् परिश्रम के बिना केवल भाग्य से कार्य सिद्ध नहीं होता ।

3. स्तम्भयोः मेलनं कुरुत —

(स्तम्भ ‘अ’ की उक्ति को स्तम्भ ‘आ’ के सही भावार्थ से मिलाइए।)

(अ) उक्तिः(आ) भावार्थः – सही मेलनम्
(क) गायन्ति देवाः किल गीतकानिभारतभूमेः माहात्म्यवर्णनम्
(ख) गुणी गुणं वेत्तिसज्जनः एव गुणानां मर्मज्ञः
(ग) भवन्ति नम्राः तरवः फलोद्गमैःसत्पुरुषाणां स्वाभाविकी नम्रता
(घ) यथा चतुर्भिः कनकं परीक्ष्यतेसुवर्णं चतुर्भिः प्रकारैः परीक्ष्यते
(ङ) अष्टौ गुणाः पुरुषं दीपयन्तिप्रज्ञा, दमः, दानं, कृतज्ञता इत्यादयः
(च) दुर्जनेन समं सख्यं न कारयेत्दुष्टसङ्गः उष्णाङ्गारसदृशः
(छ) एकेन चक्रेण न रथस्य गतिःकेवलं दैवं प्रयत्नं विना असिद्धम्

4. अधः प्रदत्तमञ्जूषातः पदानि चित्वा रिक्तस्थानानि पूरयत —

मञ्जूषा: फलोद्गमैः, गुणं, कृतज्ञता, सिध्यति, श्रुतम्, शीलेन

उत्तर (क) गुणी गुणं वेत्ति न वेत्ति निर्गुणः । (ख) भवन्ति नम्राः तरवः फलोद्गमैः (ग) पुरुषः परीक्ष्यते कुलेन, शीलेन, गुणेन, कर्मणा । (घ) गुणाः पुरुषं दीपयन्ति – प्रज्ञा, कौल्यं, दमः, श्रुतम् (ङ) दानं यथाशक्ति कृतज्ञता च । (च) एवं पुरुषकारेण विना दैवं न सिध्यति

5. समुचितं विकल्पं चिनुत —

(क) “गायन्ति देवाः किल गीतकानि” – इत्यस्य श्लोकस्य मुख्यविषयः कः ?
(i) वसन्तस्य सौन्दर्यम्   (ii) भारतभूमेः गौरवम्   (iii) कर्मणां फलम्   (iv) दानस्य प्रभावः

उत्तर(ii) भारतभूमेः गौरवम् ।

(ख) “गुणी गुणं वेत्ति” – इत्यत्र कः गुणं न जानाति ?
(i) गुणी   (ii) निर्गुणः   (iii) पिकः   (iv) बली

उत्तर(ii) निर्गुणः ।

(ग) “पिको वसन्तस्य गुणं न वायसः” – इत्यस्य तात्पर्यं किम् ?
(i) पिकः मधुरं गायति न वायसः   (ii) सुजन एव गुणं जानाति   (iii) वायसः अपि सरसं गानं करोति   (iv) वसन्तः निर्गुणः अस्ति

उत्तर(ii) सुजन एव गुणं जानाति ।

(घ) “भवन्ति नम्राः तरवः फलोद्गमैः” – इत्यस्य अर्थः कः ?
(i) वृक्षाणां कठोरता   (ii) सत्पुरुषाणाम् उन्नतिः   (iii) फलयुक्ताः वृक्षाः नम्राः भवन्ति   (iv) परोपकारिणां दुर्बलता

उत्तर(iii) फलयुक्ताः वृक्षाः नम्राः भवन्ति ।

(ङ) “न सा सभा यत्र न सन्ति वृद्धाः” – इत्यत्र सभायाः महत्त्वं किम् ?
(i) सभा मनोरञ्जनाय भवति   (ii) सभा धनसम्पत्तिं प्रदातुं शक्नोति   (iii) धर्मोपदेशाय ज्ञानवृद्धाः जनाः आवश्यकाः   (iv) सभा केवलं राजकार्यार्थं भवति

उत्तर(iii) धर्मोपदेशाय ज्ञानवृद्धाः जनाः आवश्यकाः ।

(च) दुर्जनेन सह सख्यं किमर्थं न कार्यम् ?
(i) सः मित्रं भवति   (ii) सः धनं ददाति   (iii) सः शिक्षां ददाति   (iv) सः उष्णाङ्गारवद् हानिकरः भवति

उत्तर(iv) सः उष्णाङ्गारवद् हानिकरः भवति ।

अत्र इदम् अवधेयम् (व्याकरण-तालिका)

संस्कृत श्लोकों में प्रत्येक पद्य में चार चरण (पादचतुष्टयम्) होते हैं तथा वे छन्दोबद्ध-सस्वर गायन-शैली में होते हैं। श्लोकों में सन्धि एवं समासयुक्त पद आते हैं। पाठ में ‘अत्र इदम् अवधेयम्’ के अन्तर्गत निम्नलिखित सन्धि-समास के उदाहरण दिए गए हैं।

पदम्विग्रहः / सन्धि-विच्छेदःप्रकारः
नम्रास्तरवःनम्राः + तरवःविसर्ग-सन्धिः
अभ्युपैतिअभि + उप + एतियण्/वृद्धि-सन्धिः
अनुद्धताःन उद्धताःनञ् तत्पुरुषसमासः
यथाशक्तिशक्तिम् अनतिक्रम्यअव्ययीभावः

योग्यताविस्तरः & परियोजनाकार्यम्

योग्यताविस्तरः (नीति-ग्रन्थ-परिचयः)

ग्रन्थःविवरणम्
विष्णुपुराणम्प्रसिद्ध अठारह पुराणों में से एक। इसमें प्रायः सात हजार से अधिक श्लोक हैं। इसमें भगवान् विष्णु एवं उनके अवतारों का वर्णन है तथा भारतवर्ष की महिमा का प्रामाणिक वर्णन मिलता है।
महाभारतम्संस्कृत-साहित्य का इतिहास-ग्रन्थ, जो पाँचवें वेद के रूप में स्वीकृत है। इसमें एक लाख से अधिक श्लोक हैं, अतः इसका दूसरा नाम ‘शतसाहस्री-संहिता’ है। इसमें अठारह पर्व हैं।
भर्तृहरिःसंस्कृत-काव्य-वाङ्मय के महान् कवि एवं नीतिशास्त्र-विशारद। उनकी रचनाएँ – नीतिशतकम्, शृङ्गारशतकम् एवं वैराग्यशतकम् भारतीय ज्ञान-परम्परा का पोषण करती हैं।
हितोपदेशःपण्डित नारायण द्वारा संकलित कथा-ग्रन्थ। इसमें विविध कथाएँ एवं नीति-श्लोक हैं। यह चार भागों में विभक्त है – मित्रलाभः, सुहृद्भेदः, विग्रहः, सन्धिः ।
चाणक्यनीतिःआचार्य चाणक्य के नीति-श्लोक माणिक्य के समान मूल्यवान हैं। बालकों के चरित्र-निर्माण एवं आदर्श-मानवजीवन की प्रतिष्ठा के लिए ये अत्यन्त उपयोगी हैं।

परियोजनाकार्यम् (Project Work)

1. अन्तर्जालात् पुस्तकेभ्यश्च विंशतिसुभाषितानां सङ्ग्रहं कुरुत ।

मार्गदर्शनम्यह संग्रह-कार्य है। इंटरनेट एवं पुस्तकों से बीस सुन्दर सुभाषितों (नीति-श्लोकों) को खोजकर एक सूची बनाइए। प्रत्येक सुभाषित का स्रोत (हितोपदेश, चाणक्यनीति, भर्तृहरि आदि) एवं भावार्थ भी संक्षेप में लिखें।

2. किमपि नीतिवाक्यम् अधिकृत्य पञ्चवाक्यानि संस्कृतेन लिखत ।

उत्तर (नमूना)नीतिवाक्यम् – ‘उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः’ इति अधिकृत्य – (1) परिश्रमेण एव कार्याणि सिध्यन्ति । (2) केवलेन मनोरथेन किमपि न लभ्यते । (3) सिंहः अपि निद्रालुः सन् मृगान् न प्राप्नोति । (4) अतः वयं सर्वे परिश्रमं कुर्याम । (5) परिश्रमी जनः एव सफलः भवति ।

3. पाठे आगतानि सुभाषितानि कण्ठस्थीकृत्य कक्षायां श्रावयत ।

मार्गदर्शनम्यह कण्ठस्थीकरण-गतिविधि है। पाठ के आठों सुभाषितों को शुद्ध उच्चारण एवं सही छन्द-लय के साथ कण्ठस्थ कीजिए तथा कक्षा में सस्वर सुनाइए।

अतिरिक्त प्रश्न (Extra Questions)

लघु उत्तरीय प्रश्न (30–40 शब्द)

1. ‘सुभाषित’ का अर्थ क्या है तथा इसके पठन से क्या लाभ है?

उत्तर‘सुष्ठु भाषितानि’ अर्थात् सुन्दर एवं हितकारी वचन ही सुभाषित कहलाते हैं। ये सदा जनहित में होते हैं। इनके पठन से आदर्श मानव-जीवन के निर्माण की प्रेरणा मिलती है तथा कर्तव्य-अकर्तव्य का स्पष्ट मार्गदर्शन प्राप्त होता है।

2. द्वितीय श्लोक में कोयल एवं कौए का उदाहरण क्यों दिया गया है?

उत्तरयह उदाहरण गुणग्राहकता दर्शाने के लिए दिया गया है। कोयल वसन्त ऋतु के आगमन पर मधुर कूजन करती है अर्थात् वसन्त के गुण को पहचानती है, किन्तु कौआ मधुर नहीं गा सकता। इसी प्रकार गुणी व्यक्ति ही गुणों को पहचानता है, गुणहीन नहीं।

3. सोने (कनक) की परीक्षा किन चार उपायों से होती है?

उत्तरसोने की परीक्षा चार उपायों से होती है – (1) निघर्षण (कसौटी पर घिसना), (2) छेदन (काटना), (3) ताप (अग्नि में तपाना) तथा (4) ताडन (पीटना)। इन्हीं से सोने की पूर्ण शुद्धता ज्ञात होती है।

4. मनुष्य को सुशोभित करने वाले आठ गुण कौन-से हैं?

उत्तरमनुष्य को सुशोभित करने वाले आठ गुण हैं – प्रज्ञा (विशेष बुद्धि), कौल्य (कुलीनता), दम (इन्द्रिय-संयम), श्रुत (शास्त्रज्ञान), पराक्रम (साहस), अबहुभाषिता (मितभाषिता), यथाशक्ति दान एवं कृतज्ञता।

5. अष्टम श्लोक में रथ के पहिए का उदाहरण क्या सिखाता है?

उत्तरजैसे केवल एक पहिए से रथ नहीं चल सकता, उसी प्रकार केवल भाग्य से कार्य सिद्ध नहीं होता। पुरुषार्थ (परिश्रम) एवं भाग्य – ये मानव-रूपी रथ के दो पहिए हैं। अतः भाग्य के साथ परिश्रम भी आवश्यक है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (100–120 शब्द)

6. तृतीय श्लोक के आधार पर सत्पुरुषों के स्वभाव का वर्णन कीजिए।

उत्तरतृतीय श्लोक में सत्पुरुषों के स्वाभाविक गुण – नम्रता एवं परोपकार का सुन्दर चित्रण है। कवि प्रकृति से दो उदाहरण देते हैं – जब वृक्षों पर फल लगते हैं, तब वे फलों के भार से झुक जाते हैं; तथा जब बादल नवीन जल से भर जाते हैं, तब वे नीचे झुककर पृथ्वी की ओर आते हैं एवं वर्षा करते हैं।इसी प्रकार सत्पुरुष समृद्धि (धन-वैभव एवं ज्ञान) पाकर भी अभिमान नहीं करते, बल्कि और अधिक विनम्र हो जाते हैं। नम्रता एवं परोपकार ही उनका स्वभाव होता है। वे परोपकार को व्रत के रूप में धारण करते हैं। महर्षि व्यास का कथन है – ‘परोपकारः पुण्याय पापाय परपीडनम्’ अर्थात् परोपकार पुण्य के लिए तथा दूसरों को पीड़ा देना पाप के लिए होता है।

7. ‘दुर्जनेन समं सख्यं न कारयेत्’ – इस श्लोक का भाव स्पष्ट कीजिए।

उत्तरइस सप्तम श्लोक में दुर्जन (दुष्ट व्यक्ति) के संग का त्याग करने की शिक्षा दी गई है। कवि कहते हैं कि दुष्ट व्यक्ति के साथ न मित्रता करनी चाहिए और न ही प्रेम-सम्बन्ध रखना चाहिए, क्योंकि दुर्जन विश्वासयोग्य नहीं होता। उसके मुख पर मधुरता होती है किन्तु हृदय में कपट भरा रहता है।कवि इसे अंगारे के उदाहरण से समझाते हैं – यदि अंगारा गरम है तो वह तपन से हाथ जला देता है, और यदि वह ठण्डा भी हो जाए तब भी हाथ को काला कर देता है। इसी प्रकार दुर्जन सदा ही अनिष्ट करता है अथवा करवाता है। अतः विद्या से अलंकृत होने पर भी दुष्ट व्यक्ति का त्याग कर देना चाहिए। यह श्लोक सत्संगति के महत्त्व एवं कुसंगति के त्याग की प्रेरणा देता है।

8. ‘न सा सभा यत्र न सन्ति वृद्धाः’ – इस श्लोक के आधार पर सच्ची सभा एवं सच्चे सत्य का स्वरूप बताइए।

उत्तरषष्ठ श्लोक में सच्ची सभा एवं सच्चे सत्य का स्वरूप बताया गया है। संसार में अनेक सभाएँ होती हैं जहाँ जन-समुदाय एकत्र होकर बहुत बातें करता है, किन्तु उससे साफल्य नहीं मिलता। कवि के अनुसार वही सभा वास्तव में सफल है जहाँ वयोवृद्ध एवं ज्ञानवृद्ध जन उपस्थित हों।किन्तु वृद्ध वही श्रेष्ठ हैं जो धर्म के विषय में बोलते हैं अर्थात् धर्मानुकूल मार्गदर्शन करते हैं। आगे कवि सत्य का स्वरूप बताते हैं – वही धर्म सच्चा धर्म है जिसमें सत्य हो, और वही सत्य सच्चा सत्य है जो छल-कपट से रहित हो। यदि किसी वचन में छल मिला हो तो वह सत्य कहलाने योग्य नहीं है। इस प्रकार यह श्लोक ज्ञानवृद्धों के सम्मान, धर्मचर्चा एवं निष्कपट सत्य के महत्त्व को रेखांकित करता है।

MCQ & अभिकथन-कारण

1. ‘सुभाषित’ शब्द का अर्थ है—

(क) कठोर वचन

(ख) सुन्दर एवं हितकारी वचन

(ग) व्यर्थ वचन

(घ) झूठे वचन

उत्तर(ख) सुन्दर एवं हितकारी वचन।

2. प्रथम श्लोक में किसकी महिमा का वर्णन है?

(क) स्वर्ग की

(ख) देवताओं की

(ग) भारतभूमि की

(घ) वसन्त ऋतु की

उत्तर(ग) भारतभूमि की।

3. ‘पिकः’ शब्द का अर्थ है—

(क) कौआ

(ख) कोयल

(ग) हाथी

(घ) चूहा

उत्तर(ख) कोयल।

4. फलों के भार से कौन झुक जाते हैं?

(क) बादल

(ख) वृक्ष

(ग) पर्वत

(घ) नदियाँ

उत्तर(ख) वृक्ष (तरवः)।

5. मनुष्य की परीक्षा किन चार आधारों पर होती है?

(क) धन, बल, रूप, आयु

(ख) कुल, शील, गुण, कर्म

(ग) विद्या, यश, सुख, बुद्धि

(घ) निघर्षण, छेदन, ताप, ताडन

उत्तर(ख) कुल, शील, गुण, कर्म।

6. पाँचवें श्लोक के अनुसार मनुष्य को कितने गुण सुशोभित करते हैं?

(क) चार

(ख) छह

(ग) आठ

(घ) दस

उत्तर(ग) आठ। (प्रज्ञा, कौल्य, दम, श्रुत, पराक्रम, अबहुभाषिता, दान, कृतज्ञता)

7. ‘दमः’ शब्द का अर्थ है—

(क) कुलीनता

(ख) इन्द्रिय-संयम

(ग) शास्त्रज्ञान

(घ) पराक्रम

उत्तर(ख) इन्द्रिय-संयम।

8. सप्तम श्लोक में दुर्जन की तुलना किससे की गई है?

(क) सिंह से

(ख) अंगारे से

(ग) मेघ से

(घ) सोने से

उत्तर(ख) अंगारे से (अङ्गारः)।

9. अष्टम श्लोक में मानव-रथ के दो पहिए किन्हें बताया गया है?

(क) धन एवं विद्या

(ख) सुख एवं दुःख

(ग) प्रयत्न (पुरुषार्थ) एवं भाग्य

(घ) कुल एवं शील

उत्तर(ग) प्रयत्न (पुरुषार्थ) एवं भाग्य।

10. ‘अनुद्धताः’ पद का सन्धि-विच्छेद है—

(क) अनु + उद्धताः

(ख) न + उद्धताः

(ग) अन + उद्धताः

(घ) अनुत् + हताः

उत्तर(ख) न + उद्धताः (नञ् तत्पुरुषसमासः)।
उत्तर-कुंजी: 1-(ख), 2-(ग), 3-(ख), 4-(ख), 5-(ख), 6-(ग), 7-(ख), 8-(ख), 9-(ग), 10-(ख)

अभिकथन-कारण – नीचे अभिकथन (A) और कारण (R) दिए गए हैं। सही विकल्प चुनिए—
(क) A और R दोनों सही, R, A की सही व्याख्या है। (ख) A और R दोनों सही, पर R, A की सही व्याख्या नहीं। (ग) A सही, R गलत। (घ) A गलत, R सही।

1. अभिकथन (A): गुणी व्यक्ति ही दूसरों के गुणों को पहचान पाता है।

कारण (R): जैसे कोयल वसन्त के गुण को जानती है, वैसे कौआ नहीं जान पाता।

उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है।

2. अभिकथन (A): सत्पुरुष समृद्धि पाकर भी विनम्र रहते हैं।

कारण (R): फलों से लदे वृक्ष एवं जल से भरे बादल झुक जाते हैं।

उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है (दोनों नम्रता के उदाहरण हैं)।

3. अभिकथन (A): दुर्जन के साथ मित्रता नहीं करनी चाहिए।

कारण (R): दुर्जन सदा विश्वासयोग्य होता है और हित ही करता है।

उत्तर(ग) A सही है, किन्तु R गलत है – दुर्जन विश्वासयोग्य नहीं होता; उसके मुख में माधुर्य पर हृदय में कपट रहता है।

4. अभिकथन (A): केवल भाग्य से कार्य सिद्ध नहीं होता।

कारण (R): जैसे एक ही पहिए से रथ नहीं चल सकता, वैसे ही पुरुषार्थ के बिना दैव सिद्ध नहीं होता।

उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है।

5. अभिकथन (A): वही सभा सच्ची है जहाँ ज्ञानवृद्ध जन धर्म की बात करते हैं।

कारण (R): केवल बहुत-सी बातें करने (बहुभाषण) से सभा को साफल्य प्राप्त होता है।

उत्तर(ग) A सही है, किन्तु R गलत है – केवल बहुभाषण से साफल्य नहीं मिलता; धर्मानुकूल सत्य-वचन ही सभा को सार्थक बनाते हैं।

परीक्षा-सुझाव एवं सामान्य त्रुटियाँ

परीक्षा-सुझाव (Exam Tips)

  • आठों सुभाषित कण्ठस्थ करें – श्लोक-लेखन एवं रिक्तस्थान-पूर्ति के प्रश्न प्रायः इन्हीं से आते हैं।
  • शब्दार्थ (पिकः, वायसः, करी, अनुद्धताः, कनकम्, दमः, श्रुतम्, अङ्गारः आदि) हिन्दी एवं अंग्रेज़ी दोनों में याद रखें।
  • ‘एकपदेन’ वाले प्रश्न में केवल एक शब्द लिखें; ‘पूर्णवाक्येन’ वाले में पूरा वाक्य लिखें।
  • चार उपाय (निघर्षण, छेदन, ताप, ताडन) एवं चार परीक्षा-आधार (कुल, शील, गुण, कर्म) क्रम सहित याद करें।
  • आठ गुणों (प्रज्ञा, कौल्य, दम, श्रुत, पराक्रम, अबहुभाषिता, दान, कृतज्ञता) की सूची पंक्तिबद्ध याद रखें।
  • सन्धि-समास उदाहरण (नम्रास्तरवः, अभ्युपैति, अनुद्धताः, यथाशक्ति) विग्रह सहित याद करें।

सामान्य त्रुटियाँ (Common Mistakes)

  • गुणी एवं निर्गुण में भ्रम – गुण को निर्गुण नहीं, बल्कि गुणी ही पहचानता है।
  • द्वितीय श्लोक में पशु-उदाहरण उलट देना – कोयल वसन्त को, हाथी सिंह के बल को जानता है (कौआ/चूहा नहीं)।
  • ‘अनुद्धताः’ का सन्धि-विच्छेद ‘अनु + उद्धताः’ लिख देना – सही है ‘न + उद्धताः’।
  • आठ गुणों में से कोई छोड़ देना अथवा गलत गुण जोड़ देना।
  • अष्टम श्लोक का भाव – केवल पुरुषार्थ या केवल भाग्य नहीं, दोनों (रथ के दो पहिए) आवश्यक हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

दीपकम् कक्षा 8 का तीसरा पाठ ‘सुभाषितरसं पीत्वा जीवनं सफलं कुरु’ किस विषय पर है?

यह पाठ आठ नीति-सुभाषितों (श्रेष्ठ वचनों) का संकलन है, जो भारतभूमि की महिमा, गुणग्राहकता, सत्पुरुषों की नम्रता, मनुष्य की परीक्षा, आठ गुणों, सच्ची सभा एवं सत्य, दुर्जन-संग के त्याग तथा पुरुषार्थ की अनिवार्यता पर नीति-शिक्षा देते हैं।

मनुष्य की परीक्षा किन चार आधारों पर होती है?

चतुर्थ श्लोक के अनुसार, जैसे सोने की परीक्षा घिसने, काटने, तपाने एवं पीटने से होती है, वैसे ही मनुष्य की परीक्षा चार आधारों – कुल, शील, गुण एवं कर्म से होती है।

अष्टम श्लोक का मुख्य संदेश क्या है?

अष्टम श्लोक बताता है कि जैसे एक पहिए से रथ नहीं चलता, वैसे ही केवल भाग्य से कार्य सिद्ध नहीं होता। पुरुषार्थ (परिश्रम) एवं भाग्य – दोनों मानव-रथ के दो पहिए हैं, अतः भाग्य के साथ परिश्रम भी आवश्यक है।

श्लोक, प्रश्न एवं अभ्यास-शीर्षक NCERT दीपकम् पुस्तक से ज्यों-के-त्यों लिए गए हैं; सार, भावार्थ एवं उत्तर ClearStudy द्वारा मौलिक रूप से तैयार किए गए हैं।

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