Class 8 Sanskrit Deepakam Chapter 2 Solutions — अल्पानामपि वस्तूनां संहतिः कार्यसाधिका
Class 8 Sanskrit Deepakam Chapter 2 solutions: चित्रग्रीव और हिरण्यक की कथा का हिन्दी सार, शब्दार्थ और आठ अभ्यासों के उत्तर पढ़ें। ल्यप्-प्रत्यय, समास, विसर्गसन्धि तथा परियोजनाओं के नमूने समझें।
- पाठ का अवलोकन (Chapter Overview)
- पाठ-परिचय / प्रसंग
- नीति-श्लोकाः (पाठगत)
- सार (Hindi Summary)
- शब्दार्थ (Word-meanings)
- अभ्यासः (अभ्यासात् जायते सिद्धिः)
- अत्र इदम् अवधेयम् (व्याकरण-तालिकाः)
- योग्यताविस्तरः & परियोजनाकार्यम्
- अतिरिक्त प्रश्न (Extra Questions)
- MCQ & अभिकथन-कारण
- परीक्षा-सुझाव एवं सामान्य त्रुटियाँ
- अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
पाठ का अवलोकन (Chapter Overview)
दीपकम् कक्षा 8 का द्वितीय पाठ ‘अल्पानामपि वस्तूनां संहतिः कार्यसाधिका’ हितोपदेश ग्रन्थ के मित्रलाभ प्रकरण से लिया गया है। पाठ का आरम्भ एक प्रसंग से होता है, जिसमें उत्तराखण्ड (केदारक्षेत्र) की तीर्थयात्रा पर निकले कुछ मित्र अचानक तीव्र वर्षा, अन्धकार, सेतु-भंग एवं पर्वत-स्खलन में फँस जाते हैं। घबराए हुए साथियों को धैर्य बँधाने के लिए दलनायक हितोपदेश की एक कथा सुनाता है – चित्रग्रीव कपोतराज एवं हिरण्यक मूषकराज की कथा। जाल में फँसे कबूतर बुद्धि एवं संगठन के बल पर जाल सहित उड़ जाते हैं और मित्र हिरण्यक उनके बन्धन काट देता है। कथा का केन्द्रीय भाव है – छोटी एवं निर्बल वस्तुओं का संगठन भी बड़े कार्य सिद्ध कर देता है, अर्थात् ‘एकता में बल है’। इसी प्रेरणा से मित्र संगठित होकर सेतु-निर्माण कर अपने तथा दूसरों के प्राण बचा लेते हैं।
पाठ-परिचय / प्रसंग
यह पाठ ‘हितोपदेश’ ग्रन्थ के मित्रलाभ प्रकरण से संकलित है। ‘हितोपदेश’ के रचयिता पण्डित नारायणशर्मा हैं। इस ग्रन्थ में नीतियुक्त, मूल्ययुक्त वचनों, सुभाषितों एवं रोचक कथाओं का संग्रह है। पुस्तक के ग्रन्थपरिचय के अनुसार ग्रन्थ चार प्रकरणों में विभक्त है – (1) मित्रलाभः (2) सुहृद्भेदः (3) विग्रहः (4) सन्धिः। प्रस्तुत पाठ में एक बाह्य-कथा (तीर्थयात्रियों का प्रसंग) के भीतर अन्तःकथा (कपोत-मूषक कथा) के रूप में यह नीति समझाई गई है कि अल्पानाम् अपि वस्तूनां संहतिः कार्यसाधिका – छोटी वस्तुओं का संगठन भी कार्य-सिद्धि करता है। यह नीति-वचन हितोपदेश (१.३६) का प्रसिद्ध सुभाषित है।
नीति-श्लोकाः (पाठगत)
पाठ और योग्यताविस्तर के नीति-श्लोक; तीसरा श्लोक शीर्षक के पूरे भाव को समझाता है।
सर्वत्रैवं विचारे तु भोजनेऽप्यप्रवर्तनम् ॥ १ ॥
विपदि धैर्यमथाभ्युदये क्षमा,
सदसि वाक्पटुता युधि विक्रमः ।
यशसि चाभिरुचिर्व्यसनं श्रुतौ
प्रकृतिसिद्धमिदं हि महात्मनाम् ॥ २ ॥
अल्पानामपि वस्तूनां संहतिः कार्यसाधिका ।
तृणैर्गुणत्वमापन्नैर्बध्यन्ते मत्तदन्तिनः ॥
— हितोपदेशः, मित्रलाभः (१.३६)
सार (Hindi Summary)
ग्रीष्मावकाश में विद्यालय के कुछ मित्र पुण्यक्षेत्र-दर्शन के लिए देवभूमि उत्तराखण्ड गए। वर्षा-ऋतु का आरम्भ था। केदारक्षेत्र की चढ़ाई करते समय अचानक तीव्र वर्षा होने लगी, चारों ओर अन्धकार छा गया, नदी के तीव्र जल-वेग से सेतु टूट गया और पर्वत-स्खलन हो गया। सभी भयभीत होकर ईश्वर से रक्षा की प्रार्थना करने लगे। सबकी निराशा देखकर धैर्यवान् नायक ने उन्हें सान्त्वना दी और प्रेरित करते हुए कहा कि विपत्ति के समय धैर्य धारण कर कोई उपाय सोचना चाहिए। उसने हितोपदेश की एक कथा सुनानी आरम्भ की।
गोदावरी के तट पर एक विशाल सेमल का वृक्ष था, जहाँ दूर देश से आकर पक्षी रहते थे। एक दिन एक व्याध (बहेलिया) चावल के दाने बिखेरकर, जाल फैलाकर छिपकर बैठ गया। उसी समय चित्रग्रीव नामक कपोतराज अपने परिवार सहित आकाश-मार्ग से जा रहा था। कुछ कबूतर दानों को देखकर लोभ में आ गए। चित्रग्रीव ने उन्हें समझाया कि निर्जन वन में दानों का होना संदेहास्पद है, अविचारित कर्म नहीं करना चाहिए। किन्तु एक कबूतर ने घमण्ड से उसकी अवज्ञा की, और सभी कबूतर भूमि पर उतरकर दाने खाने लगे तथा जाल में फँस गए।
तब चित्रग्रीव ने सबको धैर्य बँधाया कि एक-दूसरे का तिरस्कार न करके उपाय सोचना चाहिए, क्योंकि ‘छोटी वस्तुओं का संगठन भी कार्य सिद्ध करता है’। उसके आदेश पर सभी कबूतर एकचित्त होकर जाल सहित उड़ गए। व्याध पीछा करता रहा पर थककर लौट गया। फिर चित्रग्रीव अपने मित्र हिरण्यक नामक मूषकराज के पास गया, जिसने पहले आश्रितों के बन्धन काटे, फिर चित्रग्रीव के – इस आश्रित-वात्सल्य से प्रसन्न होकर हिरण्यक ने उसकी प्रशंसा की। सभी कबूतर मुक्त होकर नायक की नीति-शिक्षा की प्रशंसा करते हुए उड़ गए। कथा सुनाकर नायक ने मित्रों को समझाया कि जब बुद्धि एवं संगठन के बल पर आपद्ग्रस्त कबूतरों ने आत्मरक्षा कर ली, तो हम क्यों नहीं कर सकते। प्रेरित होकर सभी ने भय-शोक त्यागकर भगीरथ-प्रयत्न से सेतु-निर्माण किया और अपने तथा दूसरों के प्राण बचाए।

शब्दार्थ (Word-meanings)
| शब्दः (Sanskrit) | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| भग्नः | टूट गया, नष्ट | Broke down |
| अक्रन्दन् | रोये, चिल्लाए | They cried |
| सविषादम् | विषादपूर्वक | With sadness |
| सम्भूय | मिलकर | Together (having united) |
| तरुः | वृक्ष, पेड़ | Tree |
| व्याधः | लुब्धक, बहेलिया | Hunter |
| तण्डुलकणान् | चावल के दानों को | Rice grains |
| विकीर्य | बिखेरकर | Having scattered |
| विस्तीर्य | फैलाकर | Having spread |
| प्रच्छन्नः | छिपा हुआ, गुप्त | Hidden / secretly |
| अवतीर्य | उतरकर | Having descended |
| अवलोक्य | देखकर | Having seen |
| प्रतीकारः | उपाय, प्रतिविधान | Remedy |
| अविचारितम् | बिना सोचा हुआ | Not thought of |
| एकचित्तीभूय | एक मन होकर | With united mind |
| कापुरुषलक्षणम् | कायर पुरुष का लक्षण | Sign of a coward |
| तिरस्कुर्वन्ति | अनादर/तिरस्कार करते हैं | (They) reject / disrespect |
| विस्मयः | आश्चर्य | Amazement |
| विक्रमः | अतिपराक्रम | Valour |
| उत्पतिताः | उड़ गए | Flew away |
| पाशान् | बन्धनों को | Bonds / snares |
| प्रत्यभिज्ञाय | पहचानकर | Having recognized |
| निःसृत्य | निकलकर | Coming out |
| छिनत्तु | काट दें — भवान् के साथ आदरपूर्वक अनुरोध | let him cut / please cut (formal address) |
| आश्रितवात्सल्येन | शरणागतों पर स्नेह से | Affection towards those who take shelter |
| उपसर्पति | निकट आता है | Approaches near |
अन्य महत्त्वपूर्ण पाठ-शब्द
| शब्दः | हिन्दी अर्थ |
|---|---|
| चित्रग्रीवनामा | जिसका नाम चित्रग्रीव है |
| अप्रवर्तनम् | प्रवृत्त न होना / आगे न बढ़ना |
| प्रवृताः | लगे हुए |
| अवलम्ब्य | आश्रय लेकर |
| चिन्त्यताम् | विचार किया जाए |
| आलोच्य | विचार करके |
| त्वरया | शीघ्रता से |
| मे | मेरा — इस प्रसंग में मम |
| आकर्ण्य | सुनकर |
| प्रहृष्यमाणः | आनन्दित होता हुआ |
| पुलकितः | प्रसन्नता से रोमाञ्चित |
| सत्वरम् | बहुत जल्दी |
| आशङ्क्य | शंका करके |
| अवज्ञा | अनादर |
अभ्यासः (अभ्यासात् जायते सिद्धिः)
1. अधोलिखितानां प्रश्नानाम् एकपदेन उत्तरं लिखत —
(क) मित्राणि ग्रीष्मावकाशे कुत्र गच्छन्ति ?
(ख) सर्वत्र कः प्रसृतः ?
(ग) कः सर्वान् प्रेरयन् अवदत् ?
(घ) कः हितोपदेशस्य कथां श्रावयति ?
(ङ) कपोतराजस्य नाम किम् ?
(च) व्याधः कान् विकीर्य जालं प्रसारितवान् ?
(छ) विपत्काले विस्मयः कस्य लक्षणम् ?
(ज) चित्रग्रीवस्य मित्रं हिरण्यकः कुत्र निवसति ?
(झ) चित्रग्रीवः हिरण्यकं कथं सम्बोधयति ?
(ञ) पूर्वं केषां पाशान् छिनत्तु इति चित्रग्रीवः वदति ?
2. पूर्णवाक्येन उत्तरं लिखत —
(क) यदा केदारक्षेत्रम् आरोहन्तः आसन् किम् अभवत् ?
(ख) सर्वे उच्चस्वरेण किं प्रार्थयन्त ?
(ग) असम्भवं कार्यं कथं कर्तुं शक्यते इति नायकः उक्तवान् ?
(घ) निर्जने वने तण्डुलकणान् दृष्ट्वा चित्रग्रीवः किं निरूपयति ?
(ङ) किं नीतिवचनं प्रसिद्धम् ?
(च) व्याधात् रक्षां प्राप्तुं चित्रग्रीवः कम् आदेशं दत्तवान् ?
(छ) हिरण्यकः किमर्थं तूष्णीं स्थितः ?
(ज) पुलकितः हिरण्यकः चित्रग्रीवं कथं प्रशंसति ?
(झ) कपोताः कथं आत्मरक्षणं कृतवन्तः ?
(ञ) नायकस्य प्रेरकवचनैः सर्वेऽपि किम् अकुर्वन् ?
3. अधोलिखितानि वाक्यानि पठित्वा ल्यप्-प्रत्ययान्तेषु परिवर्तयत —
(क) पुस्तक में हल किया उदाहरण है। (ज) में पुस्तक का कर्ता व्याधः ही रखा गया है। आगत्य, निर्माय, उत्थाय आदि पहली क्रिया के पूर्ण होने का अर्थ देते हैं।
4. उदाहरणानुसारम् उपसर्गयोजनेन क्त्वा-स्थाने ल्यप्-प्रत्ययस्य प्रयोगं कृत्वा पदानि परिवर्तयत —
पुस्तक की उपसर्ग-सूची: सम्, आ, उप, उत्, वि, प्र। उपयुक्त प्रयोगों का एक नमूना नीचे है।
(क) हल किया उदाहरण है: आ + गम् + ल्यप् → आगत्य। अन्य रूप: प्र + क्षल् → प्रक्षाल्य; वि + लिख् → विलिख्य; उत् + स्था → उत्थाय; प्र + नम् → प्रणम्य; सम् + आ + लोक् → समालोच्य। अंतिम रूप में आलोक् के पहले सम् जोड़ा गया है।
5. पाठे प्रयुक्तेन उपयुक्तपदेन रिक्तस्थानं पूरयत —
6. पाठे प्रयुक्तेन ल्यप्प्रत्ययान्तपदेन सह उपयुक्तं पदं योजयत —
| ल्यप्-प्रत्ययान्त पदम् | उपयुक्तं पदम् (उत्तर) |
|---|---|
| (क) विकीर्य | तण्डुलकणान् |
| (ख) विस्तीर्य | जालम् |
| (ग) अवतीर्य | भूमौ |
| (घ) अवलोक्य | जालापहारकान् |
| (ङ) एकचित्तीभूय | उड्डीयताम् |
| (च) प्रत्यभिज्ञाय | तद्वचनम् |
7. समासयुक्तपदेन रिक्तस्थानं पूरयत —
| विग्रहः | समासपदम् | दत्तं सर्वनाम | अपेक्षित विभक्तिरूप |
|---|---|---|---|
| (क) गण्डक्याः तीरम् | गण्डकीतीरम् | तस्मिन् | गण्डकीतीरे |
| (ख) तण्डुलानां कणाः | तण्डुलकणाः | तान् | तण्डुलकणान् |
| (ग) जालस्य अपहारकाः | जालापहारकाः | तान् | जालापहारकान् |
| (घ) अवपाताद् भयम् | अवपातभयम् | तस्मात् | अवपातभयात् |
| (ङ) कापुरुषाणां लक्षणम् | कापुरुषलक्षणम् | तस्मिन् | कापुरुषलक्षणे |
इस प्रश्न में समास बनाने के साथ दूसरे रिक्त स्थान में उसका विभक्तिरूप भी लिखना है। तान् के लिए द्वितीया बहुवचन, तस्मात् के लिए पञ्चमी एकवचन और तस्मिन् के लिए सप्तमी एकवचन चाहिए।
8. सार्थकपदं ज्ञात्वा सन्धिविच्छेदं कुरुत —
| सन्धिपदम् | सन्धिविच्छेदः (उत्तर) |
|---|---|
| (क) इत्याकर्ण्य | इति + आकर्ण्य |
| (ख) चित्रग्रीवोऽवदत् | चित्रग्रीवः + अवदत् |
| (ग) बालकोऽत्र | बालकः + अत्र |
| (घ) धैर्यमथाभ्युदये | धैर्यम् + अथ + अभ्युदये |
| (ङ) भोजनेऽप्यप्रवर्तनम् | भोजने + अपि + अप्रवर्तनम् |
| (च) नमस्ते | नमः + ते |
| (छ) उपायश्चिन्तनीयः | उपायः + चिन्तनीयः |
| (ज) व्याधस्तत्र | व्याधः + तत्र |
| (झ) हिरण्यकोऽप्याह | हिरण्यकः + अपि + आह |
| (ञ) मूषकराजो गण्डकीतीरे | मूषकराजः + गण्डकी + तीरे |
| (ट) अतस्त्वाम् | अतः + त्वाम् |
| (ठ) कश्चित् | कः + चित् |
अभ्यास 8(ञ) में मूषकराजः + गण्डकी + तीरे लिखे गए हैं। मूषकराजः + गण्डकीतीरे में विसर्गसन्धि है; गण्डकीतीरे का आन्तरिक समास-विभाग भी तीसरे स्थान में दिखाया गया है।
अत्र इदम् अवधेयम् (व्याकरण-तालिकाः)
पाठ में ‘अत्र इदम् अवधेयम्’ के अन्तर्गत ल्यप्-प्रत्यय एवं विसर्गसन्धि समझाए गए हैं।
1. ल्यप्-प्रत्ययः (नियम)
जहाँ एक क्रिया की समाप्ति के बाद दूसरी क्रिया होती है, वहाँ पूर्वकालिक क्रिया में धातु से क्त्वा प्रत्यय होता है। किन्तु यदि उस धातु के पूर्व कोई उपसर्ग लगा हो, तो क्त्वा के स्थान पर ल्यप् होता है। ल्यप् में केवल य् शेष रहता है। क्त्वा एवं ल्यप्-प्रत्ययान्त पद अव्यय होते हैं।
यथा – तण्डुलकणान् अवलोक्य (अव+लोक्+ल्यप्) ; धैर्यम् अवलम्ब्य (अव+लम्ब्+ल्यप्) ।
2. ल्यप्-प्रत्ययान्तपदानि (पाठगत-तालिका)
| लट्-लकारक्रिया | प्रकृति-प्रत्ययविभागः | ल्यबन्तरूपम् |
|---|---|---|
| आगच्छति | आ + गम् + ल्यप् | आगत्य / आगम्य |
| आनयति | आ + नी + ल्यप् | आनीय |
| उत्तिष्ठति | उत् + स्था + ल्यप् | उत्थाय |
| प्रणमति | प्र + नम् + ल्यप् | प्रणम्य / प्रणत्य |
| उपकरोति | उप + कृ + ल्यप् | उपकृत्य |
| निर्दिशति | निर् + दिश् + ल्यप् | निर्दिश्य |
| निश्चिनोति | निस् + चि + ल्यप् | निश्चित्य |
| विस्मरति | वि + स्मृ + ल्यप् | विस्मृत्य |
| परिष्करोति | परि + कृ + ल्यप् | परिष्कृत्य |
| आरभते | आ + रभ् + ल्यप् | आरभ्य |
| स्वीकरोति | स्वी + कृ + ल्यप् | स्वीकृत्य |
| विलिखति | वि + लिख् + ल्यप् | विलिख्य |
| प्रक्षालयति | प्र + क्षल् + ल्यप् | प्रक्षाल्य |
| अपकरोति | अप + कृ + ल्यप् | अपकृत्य |
| अवलोकते | अव + लोक् + ल्यप् | अवलोक्य |
| आशङ्कते | आ + शकि + ल्यप् | आशङ्क्य |
| विकिरति | वि + कॄ + ल्यप् | विकीर्य |
| अवतरति | अव + तॄ + ल्यप् | अवतीर्य |
| विस्तृणाति | वि + स्तॄ + ल्यप् | विस्तीर्य |
| अवलम्बते | अव + लम्ब् + ल्यप् | अवलम्ब्य |
| निर्माति | निर् + मा + ल्यप् | निर्माय |
3. विसर्गसन्धिः (नियम एवं उदाहरण)
| नियमः | उदाहरणम् |
|---|---|
| विसर्ग के बाद च्/छ् हो तो विसर्ग के स्थान पर श् | कः + चित् = कश्चित् ; प्रतीकारः + चिन्त्यताम् = प्रतीकारश्चिन्त्यताम् |
| विसर्ग के बाद त्/थ् हो तो विसर्ग के स्थान पर स् | चकितः + तूष्णीम् = चकितस्तूष्णीम् ; नीतिः + तावत् = नीतिस्तावत् |
| अ-कार से पूर्व विसर्ग, बाद में वर्ग का तृतीय/चतुर्थ/पञ्चम वर्ण या ह य व र ल हो तो (अः) के स्थान पर ओ | हिरण्यकः + नाम = हिरण्यको नाम ; व्याधः + निवृत्तः = व्याधो निवृत्तः |
| विसर्ग से पूर्व एवं बाद दोनों ओर अ-कार हो तो (अः) के स्थान पर ओ (तथा बाद का अ लुप्त ‘ऽ’) | कुतः + अत्र = कुतोऽत्र ; सः + अस्माकम् = सोऽस्माकम् |
योग्यताविस्तरः & परियोजनाकार्यम्
ग्रन्थपरिचयः (योग्यताविस्तरः)
| विषयः | विवरणम् |
|---|---|
| पाठस्य स्रोतः | हितोपदेशग्रन्थस्य मित्रलाभ प्रकरणम् |
| ग्रन्थकर्ता | पण्डितः नारायणशर्मा |
| ग्रन्थस्य विषयः | मूल्ययुक्त-नीतियुक्त वचनानां, सुभाषितानां, कथानां च सङ्ग्रहः |
| प्रकरणानि (4) | (1) मित्रलाभः (2) सुहृद्भेदः (3) विग्रहः (4) सन्धिः |
| अध्ययन-फलम् | छात्रः नीतिविद्यायां संस्कृतभाषायां च निपुणः भवति |
तृणैर्गुणत्वमापन्नैर्बध्यन्ते मत्तदन्तिनः ॥
— हितोपदेशः (१.३६)
भावार्थः – छोटी एवं निर्बल वस्तुओं का संगठन (संघ/समुदाय) भी लक्ष्य-सिद्धि में सहायक होता है। जैसे घास के तिनकों से बनी रस्सी द्वारा मतवाले हाथी भी बाँध लिए जाते हैं, वैसे ही संगठित होकर छोटे-छोटे प्राणी/लोग भी असम्भव कार्य सिद्ध कर लेते हैं।
(हितोपदेशः १.३२ – भावार्थः) – ‘विपदि धैर्यम्…’ श्लोक में बताया गया है कि महापुरुषों का यह आचरण स्वभाव-सिद्ध होता है – वे विपत्ति में धैर्य, उन्नति में क्षमा, सभा में वाक्-कौशल, युद्ध में पराक्रम, यश में रुचि एवं शास्त्र-श्रवण में अनुराग रखते हैं।
परियोजनाकार्यम् (Project Work)
1. पाठात् अधोलिखितानां क्रियापदानां प्रयोगकौशलं ज्ञात्वा तत्समानानि अन्यानि वाक्यानि रचयत – तिरस्कुर्वन्ति, क्रियताम्, निवसति, आह, छेत्स्यति, सम्भाषसे, अब्रवीत्, उपसर्पति, युज्यते ।
2. अनया कथया वयं स्वजीवने कां शिक्षां स्वीकर्तुं शक्नुमः इति अधिकृत्य कक्षायां परिचर्चां कुर्वन्तु ।
यह नीति-कथा है। पर्वतीय संकट में सेतु बनाने का प्रसंग सहयोग की शिक्षा के लिए है; यह वास्तविक आपदा-प्रबन्धन की तकनीकी कार्यविधि नहीं है। नीचे के अतिरिक्त प्रश्न, MCQ और अभिकथन-कारण ClearStudy के अभ्यास हैं।
अतिरिक्त प्रश्न (Extra Questions)
अतिरिक्त लघु प्रश्न — ClearStudy अभ्यास
1. यह पाठ किस ग्रन्थ एवं किस प्रकरण से लिया गया है तथा इसके रचयिता कौन हैं?
2. पाठ की बाह्य-कथा (फ्रेम-स्टोरी) किस संकट से आरम्भ होती है?
3. चित्रग्रीव ने कबूतरों को दाने खाने से क्यों मना किया था?
4. जाल में फँसने पर चित्रग्रीव ने कौन-सा उपाय सुझाया?
5. हिरण्यक ने पहले किसके बन्धन काटे और चित्रग्रीव ने क्या कहा?
अतिरिक्त व्याख्यात्मक प्रश्न — ClearStudy अभ्यास
6. ‘अल्पानामपि वस्तूनां संहतिः कार्यसाधिका’ पाठ का केन्द्रीय संदेश अपने शब्दों में लिखिए।
7. चित्रग्रीव कपोतराज के चरित्र की विशेषताएँ बताइए।
8. ल्यप्-प्रत्यय किसे कहते हैं? क्त्वा एवं ल्यप् में क्या अन्तर है? उदाहरण सहित समझाइए।
MCQ & अभिकथन-कारण
1. यह पाठ किस ग्रन्थ से संकलित है?
(क) पञ्चतन्त्रात्
(ख) हितोपदेशात्
(ग) कथासरित्सागरात्
(घ) रामायणात्
2. हितोपदेश के रचयिता कौन हैं?
(क) विष्णुशर्मा
(ख) नारायणशर्मा
(ग) कालिदासः
(घ) भर्तृहरिः
3. कपोतराज का नाम क्या था?
(क) हिरण्यकः
(ख) लघुपतनकः
(ग) चित्रग्रीवः
(घ) मन्थरकः
4. हिरण्यक कौन था?
(क) काकः
(ख) मूषकराजः
(ग) व्याधः
(घ) कूर्मः
5. व्याध ने क्या बिखेरकर जाल फैलाया था?
(क) फलानि
(ख) पुष्पाणि
(ग) तण्डुलकणान्
(घ) जलम्
6. ‘विकीर्य’ पद में कौन-सा प्रत्यय है?
(क) क्त्वा
(ख) ल्यप्
(ग) तुमुन्
(घ) शतृ
7. कबूतर जाल से किस प्रकार बचे?
(क) अकेले-अकेले उड़कर
(ख) एकचित्त होकर जाल सहित उड़कर
(ग) व्याध से प्रार्थना करके
(घ) जाल काटकर
8. चित्रग्रीव ने हिरण्यक से पहले किसके बन्धन काटने को कहा?
(क) स्वयं के
(ख) अपने आश्रितों (मदाश्रितानाम्) के
(ग) व्याध के
(घ) किसी के नहीं
9. ‘कश्चित्’ का सन्धिविच्छेद है—
(क) कः + चित्
(ख) क + श्चित्
(ग) कश् + चित्
(घ) कः + शित्
10. इस पाठ की मुख्य शिक्षा क्या है?
(क) धन-संचय करो
(ख) संगठन एवं एकता में बल है
(ग) अकेले ही कार्य करो
(घ) लोभ करना उचित है
अभिकथन-कारण – नीचे अभिकथन (A) और कारण (R) दिए गए हैं। सही विकल्प चुनिए—
(क) A और R दोनों सही, R, A की सही व्याख्या है। (ख) A और R दोनों सही, पर R, A की सही व्याख्या नहीं। (ग) A सही, R गलत। (घ) A गलत, R सही।
1. अभिकथन (A): कबूतर जाल सहित उड़कर व्याध से बच गए।
कारण (R): चित्रग्रीव के नेतृत्व में सभी कबूतरों ने एकचित्त (संगठित) होकर एक साथ उड़ान भरी।
2. अभिकथन (A): ‘विकीर्य’ पद में ल्यप्-प्रत्यय है।
कारण (R): जब धातु के पूर्व उपसर्ग हो, तब क्त्वा के स्थान पर ल्यप् होता है।
3. अभिकथन (A): चित्रग्रीव ने कबूतरों को दाने खाने से रोका।
कारण (R): निर्जन वन में दानों का होना संदेहास्पद था और वहाँ व्याध का जाल हो सकता था।
4. अभिकथन (A): हिरण्यक ने पहले चित्रग्रीव का ही बन्धन काटा।
कारण (R): चित्रग्रीव ने आदेश दिया था कि पहले उसके आश्रितों के बन्धन काटे जाएँ, बाद में उसका।
5. अभिकथन (A): विपत्ति के समय आश्चर्यचकित/विमूढ़ हो जाना कायर का लक्षण है।
कारण (R): ‘विपत्काले विस्मयः एव कापुरुषलक्षणम्’ – पाठ में यही कहा गया है।
परीक्षा-सुझाव एवं सामान्य त्रुटियाँ
परीक्षा-सुझाव (Exam Tips)
- पात्रों के नाम एवं भूमिका याद रखें – चित्रग्रीव (कपोतराज), हिरण्यक (मूषकराज), व्याध (बहेलिया)।
- ल्यप्-प्रत्यय की तालिका (विकीर्य, विस्तीर्य, अवतीर्य, अवलोक्य, अवलम्ब्य, निर्माय) कण्ठस्थ करें – इनसे ल्यप्/क्त्वा का भेद समझने में सहायता मिलती है।
- विसर्गसन्धि के चारों नियम उदाहरण सहित याद रखें (कश्चित्, चकितस्तूष्णीम्, हिरण्यको नाम, कुतोऽत्र)।
- दोनों नीति-श्लोक (‘अल्पानामपि…’ एवं ‘विपदि धैर्यम्…’) भावार्थ सहित लिखने का अभ्यास करें।
- ‘एकपदेन’ प्रश्नों में केवल एक पद, ‘पूर्णवाक्येन’ में पूरा वाक्य लिखें।
सामान्य त्रुटियाँ (Common Mistakes)
- क्त्वा एवं ल्यप् में भ्रम – उपसर्ग हो तो ल्यप् (आगत्य), उपसर्ग न हो तो क्त्वा (गत्वा)।
- विसर्गसन्धि में गलत वर्ण – ‘कश्चित्’ में श्, ‘चकितस्तूष्णीम्’ में स् होता है।
- हिरण्यक को कौआ/कछुआ समझ लेना – वह मूषकराज (चूहों का राजा) है।
- घटनाक्रम में भूल – पहले आश्रितों के, बाद में चित्रग्रीव के बन्धन कटे।
- ग्रन्थ एवं रचयिता की भूल – ग्रन्थ हितोपदेश है, रचयिता नारायणशर्मा हैं (विष्णुशर्मा नहीं)।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
दीपकम् कक्षा 8 का दूसरा पाठ ‘अल्पानामपि वस्तूनां संहतिः कार्यसाधिका’ किस ग्रन्थ से लिया गया है?
यह पाठ ‘हितोपदेश’ ग्रन्थ के ‘मित्रलाभ’ प्रकरण से लिया गया है, जिसके रचयिता पण्डित नारायणशर्मा हैं।
‘अल्पानामपि वस्तूनां संहतिः कार्यसाधिका’ का अर्थ क्या है?
इसका अर्थ है – छोटी एवं निर्बल वस्तुओं का संगठन (एकता) भी बड़े कार्य सिद्ध कर देता है। जैसे घास के तिनकों से बनी रस्सी से मतवाले हाथी भी बाँध लिए जाते हैं। संक्षेप में – ‘एकता में बल है’।
कथा के मुख्य पात्र कौन हैं और उन्होंने क्या सिखाया?
मुख्य पात्र हैं – चित्रग्रीव (कपोतराज), हिरण्यक (मूषकराज) एवं व्याध। कथा सिखाती है कि संगठन, बुद्धि एवं सच्ची मित्रता से संकट का उपाय खोजने में सहायता मिलती है, तथा विपत्ति में धैर्य रखना चाहिए।
पाठ्यपुस्तक संदर्भ: NCERT दीपकम्, कक्षा 8, पाठ 2, पृष्ठ 10–23; उपलब्ध प्रति का पुनर्मुद्रण 2026–27। उत्तर और व्याख्याएँ ClearStudy की मौलिक शिक्षण सामग्री हैं; खुली गतिविधियों के उत्तर नमूने हैं। आधिकारिक NCERT पुस्तक पोर्टल।
