Class 8 Sanskrit Deepakam Chapter 2 Solutions — अल्पानामपि वस्तूनां संहतिः कार्यसाधिका

Class 8 Sanskrit Deepakam Chapter 2 solutions: चित्रग्रीव और हिरण्यक की कथा का हिन्दी सार, शब्दार्थ और आठ अभ्यासों के उत्तर पढ़ें। ल्यप्-प्रत्यय, समास, विसर्गसन्धि तथा परियोजनाओं के नमूने समझें।

Class: 8 Subject: Sanskrit Book: Deepakam (दीपकम्) Chapter: 2 पाठ: अल्पानामपि वस्तूनां संहतिः कार्यसाधिका प्रति का पुनर्मुद्रण: 2026–27

पाठ का अवलोकन (Chapter Overview)

दीपकम् कक्षा 8 का द्वितीय पाठ ‘अल्पानामपि वस्तूनां संहतिः कार्यसाधिका’ हितोपदेश ग्रन्थ के मित्रलाभ प्रकरण से लिया गया है। पाठ का आरम्भ एक प्रसंग से होता है, जिसमें उत्तराखण्ड (केदारक्षेत्र) की तीर्थयात्रा पर निकले कुछ मित्र अचानक तीव्र वर्षा, अन्धकार, सेतु-भंग एवं पर्वत-स्खलन में फँस जाते हैं। घबराए हुए साथियों को धैर्य बँधाने के लिए दलनायक हितोपदेश की एक कथा सुनाता है – चित्रग्रीव कपोतराज एवं हिरण्यक मूषकराज की कथा। जाल में फँसे कबूतर बुद्धि एवं संगठन के बल पर जाल सहित उड़ जाते हैं और मित्र हिरण्यक उनके बन्धन काट देता है। कथा का केन्द्रीय भाव है – छोटी एवं निर्बल वस्तुओं का संगठन भी बड़े कार्य सिद्ध कर देता है, अर्थात् ‘एकता में बल है’। इसी प्रेरणा से मित्र संगठित होकर सेतु-निर्माण कर अपने तथा दूसरों के प्राण बचा लेते हैं।

पाठ-परिचय / प्रसंग

यह पाठ ‘हितोपदेश’ ग्रन्थ के मित्रलाभ प्रकरण से संकलित है। ‘हितोपदेश’ के रचयिता पण्डित नारायणशर्मा हैं। इस ग्रन्थ में नीतियुक्त, मूल्ययुक्त वचनों, सुभाषितों एवं रोचक कथाओं का संग्रह है। पुस्तक के ग्रन्थपरिचय के अनुसार ग्रन्थ चार प्रकरणों में विभक्त है – (1) मित्रलाभः (2) सुहृद्भेदः (3) विग्रहः (4) सन्धिः। प्रस्तुत पाठ में एक बाह्य-कथा (तीर्थयात्रियों का प्रसंग) के भीतर अन्तःकथा (कपोत-मूषक कथा) के रूप में यह नीति समझाई गई है कि अल्पानाम् अपि वस्तूनां संहतिः कार्यसाधिका – छोटी वस्तुओं का संगठन भी कार्य-सिद्धि करता है। यह नीति-वचन हितोपदेश (१.३६) का प्रसिद्ध सुभाषित है।

नीति-श्लोकाः (पाठगत)

पाठ और योग्यताविस्तर के नीति-श्लोक; तीसरा श्लोक शीर्षक के पूरे भाव को समझाता है।

वृद्धानां वचनं ग्राह्यमापत्काले ह्युपस्थिते ।
सर्वत्रैवं विचारे तु भोजनेऽप्यप्रवर्तनम् ॥ १ ॥

विपदि धैर्यमथाभ्युदये क्षमा,
सदसि वाक्पटुता युधि विक्रमः ।
यशसि चाभिरुचिर्व्यसनं श्रुतौ
प्रकृतिसिद्धमिदं हि महात्मनाम् ॥ २ ॥

अल्पानामपि वस्तूनां संहतिः कार्यसाधिका ।
तृणैर्गुणत्वमापन्नैर्बध्यन्ते मत्तदन्तिनः ॥
— हितोपदेशः, मित्रलाभः (१.३६)

सार (Hindi Summary)

ग्रीष्मावकाश में विद्यालय के कुछ मित्र पुण्यक्षेत्र-दर्शन के लिए देवभूमि उत्तराखण्ड गए। वर्षा-ऋतु का आरम्भ था। केदारक्षेत्र की चढ़ाई करते समय अचानक तीव्र वर्षा होने लगी, चारों ओर अन्धकार छा गया, नदी के तीव्र जल-वेग से सेतु टूट गया और पर्वत-स्खलन हो गया। सभी भयभीत होकर ईश्वर से रक्षा की प्रार्थना करने लगे। सबकी निराशा देखकर धैर्यवान् नायक ने उन्हें सान्त्वना दी और प्रेरित करते हुए कहा कि विपत्ति के समय धैर्य धारण कर कोई उपाय सोचना चाहिए। उसने हितोपदेश की एक कथा सुनानी आरम्भ की।

गोदावरी के तट पर एक विशाल सेमल का वृक्ष था, जहाँ दूर देश से आकर पक्षी रहते थे। एक दिन एक व्याध (बहेलिया) चावल के दाने बिखेरकर, जाल फैलाकर छिपकर बैठ गया। उसी समय चित्रग्रीव नामक कपोतराज अपने परिवार सहित आकाश-मार्ग से जा रहा था। कुछ कबूतर दानों को देखकर लोभ में आ गए। चित्रग्रीव ने उन्हें समझाया कि निर्जन वन में दानों का होना संदेहास्पद है, अविचारित कर्म नहीं करना चाहिए। किन्तु एक कबूतर ने घमण्ड से उसकी अवज्ञा की, और सभी कबूतर भूमि पर उतरकर दाने खाने लगे तथा जाल में फँस गए।

तब चित्रग्रीव ने सबको धैर्य बँधाया कि एक-दूसरे का तिरस्कार न करके उपाय सोचना चाहिए, क्योंकि ‘छोटी वस्तुओं का संगठन भी कार्य सिद्ध करता है’। उसके आदेश पर सभी कबूतर एकचित्त होकर जाल सहित उड़ गए। व्याध पीछा करता रहा पर थककर लौट गया। फिर चित्रग्रीव अपने मित्र हिरण्यक नामक मूषकराज के पास गया, जिसने पहले आश्रितों के बन्धन काटे, फिर चित्रग्रीव के – इस आश्रित-वात्सल्य से प्रसन्न होकर हिरण्यक ने उसकी प्रशंसा की। सभी कबूतर मुक्त होकर नायक की नीति-शिक्षा की प्रशंसा करते हुए उड़ गए। कथा सुनाकर नायक ने मित्रों को समझाया कि जब बुद्धि एवं संगठन के बल पर आपद्ग्रस्त कबूतरों ने आत्मरक्षा कर ली, तो हम क्यों नहीं कर सकते। प्रेरित होकर सभी ने भय-शोक त्यागकर भगीरथ-प्रयत्न से सेतु-निर्माण किया और अपने तथा दूसरों के प्राण बचाए।

पेड़ की जड़ के पास भूरे चूहे हिरण्यक द्वारा कबूतरों के पैरों के चारों ओर बिछे जाल की रस्सी कुतरने का कथात्मक दृश्य
हितोपदेश-कथा का मौलिक कल्पनात्मक चित्र: चित्रग्रीव के साथी कबूतरों को मुक्त करने में मित्र हिरण्यक सहायता करता है। यह वन्यजीवों के वास्तविक व्यवहार का चित्रण नहीं है।

शब्दार्थ (Word-meanings)

शब्दः (Sanskrit)हिन्दी अर्थEnglish meaning
भग्नःटूट गया, नष्टBroke down
अक्रन्दन्रोये, चिल्लाएThey cried
सविषादम्विषादपूर्वकWith sadness
सम्भूयमिलकरTogether (having united)
तरुःवृक्ष, पेड़Tree
व्याधःलुब्धक, बहेलियाHunter
तण्डुलकणान्चावल के दानों कोRice grains
विकीर्यबिखेरकरHaving scattered
विस्तीर्यफैलाकरHaving spread
प्रच्छन्नःछिपा हुआ, गुप्तHidden / secretly
अवतीर्यउतरकरHaving descended
अवलोक्यदेखकरHaving seen
प्रतीकारःउपाय, प्रतिविधानRemedy
अविचारितम्बिना सोचा हुआNot thought of
एकचित्तीभूयएक मन होकरWith united mind
कापुरुषलक्षणम्कायर पुरुष का लक्षणSign of a coward
तिरस्कुर्वन्तिअनादर/तिरस्कार करते हैं(They) reject / disrespect
विस्मयःआश्चर्यAmazement
विक्रमःअतिपराक्रमValour
उत्पतिताःउड़ गएFlew away
पाशान्बन्धनों कोBonds / snares
प्रत्यभिज्ञायपहचानकरHaving recognized
निःसृत्यनिकलकरComing out
छिनत्तुकाट दें — भवान् के साथ आदरपूर्वक अनुरोधlet him cut / please cut (formal address)
आश्रितवात्सल्येनशरणागतों पर स्नेह सेAffection towards those who take shelter
उपसर्पतिनिकट आता हैApproaches near

अन्य महत्त्वपूर्ण पाठ-शब्द

शब्दःहिन्दी अर्थ
चित्रग्रीवनामाजिसका नाम चित्रग्रीव है
अप्रवर्तनम्प्रवृत्त न होना / आगे न बढ़ना
प्रवृताःलगे हुए
अवलम्ब्यआश्रय लेकर
चिन्त्यताम्विचार किया जाए
आलोच्यविचार करके
त्वरयाशीघ्रता से
मेमेरा — इस प्रसंग में मम
आकर्ण्यसुनकर
प्रहृष्यमाणःआनन्दित होता हुआ
पुलकितःप्रसन्नता से रोमाञ्चित
सत्वरम्बहुत जल्दी
आशङ्क्यशंका करके
अवज्ञाअनादर

अभ्यासः (अभ्यासात् जायते सिद्धिः)

1. अधोलिखितानां प्रश्नानाम् एकपदेन उत्तरं लिखत —

(क) मित्राणि ग्रीष्मावकाशे कुत्र गच्छन्ति ?

उत्तरउत्तराखण्डम् (देवभूमिम्) ।

(ख) सर्वत्र कः प्रसृतः ?

उत्तरअन्धकारः ।

(ग) कः सर्वान् प्रेरयन् अवदत् ?

उत्तरनायकः ।

(घ) कः हितोपदेशस्य कथां श्रावयति ?

उत्तरनायकः ।

(ङ) कपोतराजस्य नाम किम् ?

उत्तरचित्रग्रीवः ।

(च) व्याधः कान् विकीर्य जालं प्रसारितवान् ?

उत्तरतण्डुलकणान् ।

(छ) विपत्काले विस्मयः कस्य लक्षणम् ?

उत्तरकापुरुषस्य (कापुरुषलक्षणम्) ।

(ज) चित्रग्रीवस्य मित्रं हिरण्यकः कुत्र निवसति ?

उत्तरचित्रवने (गण्डकीतीरे चित्रवने) ।

(झ) चित्रग्रीवः हिरण्यकं कथं सम्बोधयति ?

उत्तरसखे (सखे हिरण्यक) इति ।

(ञ) पूर्वं केषां पाशान् छिनत्तु इति चित्रग्रीवः वदति ?

उत्तरमदाश्रितानाम् (आश्रितकपोतानाम्) ।

2. पूर्णवाक्येन उत्तरं लिखत —

(क) यदा केदारक्षेत्रम् आरोहन्तः आसन् किम् अभवत् ?

उत्तरयदा ते केदारक्षेत्रम् आरोहन्तः आसन् तदा लक्ष्यप्राप्तेः पूर्वम् वेगेन वृष्टिः आरब्धा, सर्वत्र अन्धकारः प्रसृतः, नद्याः तीव्रजलवेगेन सेतुः भग्नः, पर्वतस्खलनं च सञ्जातम् ।

(ख) सर्वे उच्चस्वरेण किं प्रार्थयन्त ?

उत्तरसर्वे उच्चस्वरेण ईश्वरं प्रार्थयन्त – ‘हे भगवन् ! रक्ष अस्मान् रक्ष’ इति ।

(ग) असम्भवं कार्यं कथं कर्तुं शक्यते इति नायकः उक्तवान् ?

उत्तरनायकः उक्तवान् यत् – वयम् आत्मविश्वासबलेन सम्भूय (मिलित्वा) इदम् असम्भवम् अपि कार्यम् अवश्यं साधयितुं शक्नुमः ।

(घ) निर्जने वने तण्डुलकणान् दृष्ट्वा चित्रग्रीवः किं निरूपयति ?

उत्तरचित्रग्रीवः निरूपयति यत् – निर्जने वने तण्डुलकणानां सम्भवः कथम् ? कश्चिद् व्याधः अत्र भवेत्, अतः अविचारितं कर्म न कर्तव्यम् ।

(ङ) किं नीतिवचनं प्रसिद्धम् ?

उत्तर‘अल्पानाम् (लघूनाम्) अपि वस्तूनां संहतिः कार्यसाधिका भवति’ इति नीतिवचनं लोकसिद्धम् (प्रसिद्धम्) ।

(च) व्याधात् रक्षां प्राप्तुं चित्रग्रीवः कम् आदेशं दत्तवान् ?

उत्तरचित्रग्रीवः आदेशं दत्तवान् यत् – सर्वैः एकचित्तीभूय जालम् आदाय उड्डीयताम् (सब मिलकर जाल सहित उड़ें) ।

(छ) हिरण्यकः किमर्थं तूष्णीं स्थितः ?

उत्तरहिरण्यकः कपोतानाम् अवपातभयात् (कहीं कोई शत्रु न आ गया हो, इस आशंका से) चकितः सन् तूष्णीं स्थितः ।

(ज) पुलकितः हिरण्यकः चित्रग्रीवं कथं प्रशंसति ?

उत्तरहिरण्यकः प्रशंसति – ‘साधु मित्र साधु ! अनेन आश्रितवात्सल्येन त्वं त्रैलोक्यस्य अपि स्वामित्वं प्राप्तुं योग्यः असि’ इति ।

(झ) कपोताः कथं आत्मरक्षणं कृतवन्तः ?

उत्तरआपद्ग्रस्ताः कपोताः बुद्धिबलेन संघटनसामर्थ्येन च (एकचित्त होकर जाल सहित उड़कर तथा मित्र हिरण्यक से बन्धन कटवाकर) आत्मसंरक्षणं कृतवन्तः ।

(ञ) नायकस्य प्रेरकवचनैः सर्वेऽपि किम् अकुर्वन् ?

उत्तरनायकस्य प्रेरकवचनैः उत्साहिताः सर्वेऽपि भयं शोकं सन्देहं च विहाय सेतुनिर्माणकार्ये संलग्नाः अभवन् (भगीरथ-प्रयत्न से सेतु बनाया) ।

3. अधोलिखितानि वाक्यानि पठित्वा ल्यप्-प्रत्ययान्तेषु परिवर्तयत —

पुस्तक के क्रम में उत्तर(क) छात्रः कक्षां प्रविश्य संस्कृतं पठति।(ख) भक्तः मन्दिरम् आगत्य पूजां करोति।(ग) माता भोजनं निर्माय पुत्राय ददाति।(घ) सुरेशः प्रातः उत्थाय देवं नमति।(ङ) रमा पुस्तकं स्वीकृत्य विद्यालयं गच्छति।(च) अहं गृहम् आगत्य भोजनं करोमि।(छ) तण्डुलकणान् विकीर्य जालं विस्तारयति।(ज) व्याधः तण्डुलकणान् अवलोक्य भूमौ अवतरति।

(क) पुस्तक में हल किया उदाहरण है। (ज) में पुस्तक का कर्ता व्याधः ही रखा गया है। आगत्य, निर्माय, उत्थाय आदि पहली क्रिया के पूर्ण होने का अर्थ देते हैं।

4. उदाहरणानुसारम् उपसर्गयोजनेन क्त्वा-स्थाने ल्यप्-प्रत्ययस्य प्रयोगं कृत्वा पदानि परिवर्तयत —

पुस्तक की उपसर्ग-सूची: सम्, आ, उप, उत्, वि, प्र। उपयुक्त प्रयोगों का एक नमूना नीचे है।

पुस्तक के क्रम में उत्तर(क) छात्रः गृहम् आगत्य भोजनं करोति।(ख) माता वस्त्राणि प्रक्षाल्य पचति।(ग) शिक्षकः श्लोकं विलिख्य पाठयति।(घ) रमा उत्थाय गीतं गायति।(ङ) शिष्यः सर्वदा गुरुं प्रणम्य पठति।(च) लेखकः समालोच्य लिखति।

(क) हल किया उदाहरण है: आ + गम् + ल्यप् → आगत्य। अन्य रूप: प्र + क्षल् → प्रक्षाल्य; वि + लिख् → विलिख्य; उत् + स्था → उत्थाय; प्र + नम् → प्रणम्य; सम् + आ + लोक् → समालोच्य। अंतिम रूप में आलोक् के पहले सम् जोड़ा गया है।

5. पाठे प्रयुक्तेन उपयुक्तपदेन रिक्तस्थानं पूरयत —

उत्तर (क) सर्वैः एकचित्तीभूय जालम् आदाय उड्डीयताम् । (ख) जालापहारकान् तान् अवलोक्य पश्चाद् अधावत् । (ग) अस्माकं मित्रं हिरण्यको नाम मूषकराजः गण्डकीतीरे चित्रवने निवसति । (घ) हिरण्यकः कपोतानाम् अवपातभयात् चकितस्तूष्णीं स्थितः । (ङ) यतोहि विपत्काले विस्मयः एव कापुरुषलक्षणम् ।

6. पाठे प्रयुक्तेन ल्यप्प्रत्ययान्तपदेन सह उपयुक्तं पदं योजयत —

ल्यप्-प्रत्ययान्त पदम्उपयुक्तं पदम् (उत्तर)
(क) विकीर्यतण्डुलकणान्
(ख) विस्तीर्यजालम्
(ग) अवतीर्यभूमौ
(घ) अवलोक्यजालापहारकान्
(ङ) एकचित्तीभूयउड्डीयताम्
(च) प्रत्यभिज्ञायतद्वचनम्

7. समासयुक्तपदेन रिक्तस्थानं पूरयत —

विग्रहःसमासपदम्दत्तं सर्वनामअपेक्षित विभक्तिरूप
(क) गण्डक्याः तीरम्गण्डकीतीरम्तस्मिन्गण्डकीतीरे
(ख) तण्डुलानां कणाःतण्डुलकणाःतान्तण्डुलकणान्
(ग) जालस्य अपहारकाःजालापहारकाःतान्जालापहारकान्
(घ) अवपाताद् भयम्अवपातभयम्तस्मात्अवपातभयात्
(ङ) कापुरुषाणां लक्षणम्कापुरुषलक्षणम्तस्मिन्कापुरुषलक्षणे

इस प्रश्न में समास बनाने के साथ दूसरे रिक्त स्थान में उसका विभक्तिरूप भी लिखना है। तान् के लिए द्वितीया बहुवचन, तस्मात् के लिए पञ्चमी एकवचन और तस्मिन् के लिए सप्तमी एकवचन चाहिए।

8. सार्थकपदं ज्ञात्वा सन्धिविच्छेदं कुरुत —

सन्धिपदम्सन्धिविच्छेदः (उत्तर)
(क) इत्याकर्ण्यइति + आकर्ण्य
(ख) चित्रग्रीवोऽवदत्चित्रग्रीवः + अवदत्
(ग) बालकोऽत्रबालकः + अत्र
(घ) धैर्यमथाभ्युदयेधैर्यम् + अथ + अभ्युदये
(ङ) भोजनेऽप्यप्रवर्तनम्भोजने + अपि + अप्रवर्तनम्
(च) नमस्तेनमः + ते
(छ) उपायश्चिन्तनीयःउपायः + चिन्तनीयः
(ज) व्याधस्तत्रव्याधः + तत्र
(झ) हिरण्यकोऽप्याहहिरण्यकः + अपि + आह
(ञ) मूषकराजो गण्डकीतीरेमूषकराजः + गण्डकी + तीरे
(ट) अतस्त्वाम्अतः + त्वाम्
(ठ) कश्चित्कः + चित्

अभ्यास 8(ञ) में मूषकराजः + गण्डकी + तीरे लिखे गए हैं। मूषकराजः + गण्डकीतीरे में विसर्गसन्धि है; गण्डकीतीरे का आन्तरिक समास-विभाग भी तीसरे स्थान में दिखाया गया है।

अत्र इदम् अवधेयम् (व्याकरण-तालिकाः)

पाठ में ‘अत्र इदम् अवधेयम्’ के अन्तर्गत ल्यप्-प्रत्यय एवं विसर्गसन्धि समझाए गए हैं।

1. ल्यप्-प्रत्ययः (नियम)

जहाँ एक क्रिया की समाप्ति के बाद दूसरी क्रिया होती है, वहाँ पूर्वकालिक क्रिया में धातु से क्त्वा प्रत्यय होता है। किन्तु यदि उस धातु के पूर्व कोई उपसर्ग लगा हो, तो क्त्वा के स्थान पर ल्यप् होता है। ल्यप् में केवल य् शेष रहता है। क्त्वा एवं ल्यप्-प्रत्ययान्त पद अव्यय होते हैं।
यथा – तण्डुलकणान् अवलोक्य (अव+लोक्+ल्यप्) ; धैर्यम् अवलम्ब्य (अव+लम्ब्+ल्यप्) ।

2. ल्यप्-प्रत्ययान्तपदानि (पाठगत-तालिका)

लट्-लकारक्रियाप्रकृति-प्रत्ययविभागःल्यबन्तरूपम्
आगच्छतिआ + गम् + ल्यप्आगत्य / आगम्य
आनयतिआ + नी + ल्यप्आनीय
उत्तिष्ठतिउत् + स्था + ल्यप्उत्थाय
प्रणमतिप्र + नम् + ल्यप्प्रणम्य / प्रणत्य
उपकरोतिउप + कृ + ल्यप्उपकृत्य
निर्दिशतिनिर् + दिश् + ल्यप्निर्दिश्य
निश्चिनोतिनिस् + चि + ल्यप्निश्चित्य
विस्मरतिवि + स्मृ + ल्यप्विस्मृत्य
परिष्करोतिपरि + कृ + ल्यप्परिष्कृत्य
आरभतेआ + रभ् + ल्यप्आरभ्य
स्वीकरोतिस्वी + कृ + ल्यप्स्वीकृत्य
विलिखतिवि + लिख् + ल्यप्विलिख्य
प्रक्षालयतिप्र + क्षल् + ल्यप्प्रक्षाल्य
अपकरोतिअप + कृ + ल्यप्अपकृत्य
अवलोकतेअव + लोक् + ल्यप्अवलोक्य
आशङ्कतेआ + शकि + ल्यप्आशङ्क्य
विकिरतिवि + कॄ + ल्यप्विकीर्य
अवतरतिअव + तॄ + ल्यप्अवतीर्य
विस्तृणातिवि + स्तॄ + ल्यप्विस्तीर्य
अवलम्बतेअव + लम्ब् + ल्यप्अवलम्ब्य
निर्मातिनिर् + मा + ल्यप्निर्माय

3. विसर्गसन्धिः (नियम एवं उदाहरण)

नियमःउदाहरणम्
विसर्ग के बाद च्/छ् हो तो विसर्ग के स्थान पर श्कः + चित् = कश्चित् ; प्रतीकारः + चिन्त्यताम् = प्रतीकारश्चिन्त्यताम्
विसर्ग के बाद त्/थ् हो तो विसर्ग के स्थान पर स्चकितः + तूष्णीम् = चकितस्तूष्णीम् ; नीतिः + तावत् = नीतिस्तावत्
अ-कार से पूर्व विसर्ग, बाद में वर्ग का तृतीय/चतुर्थ/पञ्चम वर्ण या ह य व र ल हो तो (अः) के स्थान पर ओहिरण्यकः + नाम = हिरण्यको नाम ; व्याधः + निवृत्तः = व्याधो निवृत्तः
विसर्ग से पूर्व एवं बाद दोनों ओर अ-कार हो तो (अः) के स्थान पर ओ (तथा बाद का अ लुप्त ‘ऽ’)कुतः + अत्र = कुतोऽत्र ; सः + अस्माकम् = सोऽस्माकम्

योग्यताविस्तरः & परियोजनाकार्यम्

ग्रन्थपरिचयः (योग्यताविस्तरः)

विषयःविवरणम्
पाठस्य स्रोतःहितोपदेशग्रन्थस्य मित्रलाभ प्रकरणम्
ग्रन्थकर्तापण्डितः नारायणशर्मा
ग्रन्थस्य विषयःमूल्ययुक्त-नीतियुक्त वचनानां, सुभाषितानां, कथानां च सङ्ग्रहः
प्रकरणानि (4)(1) मित्रलाभः (2) सुहृद्भेदः (3) विग्रहः (4) सन्धिः
अध्ययन-फलम्छात्रः नीतिविद्यायां संस्कृतभाषायां च निपुणः भवति
अल्पानामपि वस्तूनां संहतिः कार्यसाधिका ।
तृणैर्गुणत्वमापन्नैर्बध्यन्ते मत्तदन्तिनः ॥
— हितोपदेशः (१.३६)

भावार्थः – छोटी एवं निर्बल वस्तुओं का संगठन (संघ/समुदाय) भी लक्ष्य-सिद्धि में सहायक होता है। जैसे घास के तिनकों से बनी रस्सी द्वारा मतवाले हाथी भी बाँध लिए जाते हैं, वैसे ही संगठित होकर छोटे-छोटे प्राणी/लोग भी असम्भव कार्य सिद्ध कर लेते हैं।

(हितोपदेशः १.३२ – भावार्थः) – ‘विपदि धैर्यम्…’ श्लोक में बताया गया है कि महापुरुषों का यह आचरण स्वभाव-सिद्ध होता है – वे विपत्ति में धैर्य, उन्नति में क्षमा, सभा में वाक्-कौशल, युद्ध में पराक्रम, यश में रुचि एवं शास्त्र-श्रवण में अनुराग रखते हैं।

परियोजनाकार्यम् (Project Work)

1. पाठात् अधोलिखितानां क्रियापदानां प्रयोगकौशलं ज्ञात्वा तत्समानानि अन्यानि वाक्यानि रचयत – तिरस्कुर्वन्ति, क्रियताम्, निवसति, आह, छेत्स्यति, सम्भाषसे, अब्रवीत्, उपसर्पति, युज्यते ।

उत्तर (नमूना वाक्य) (क) तिरस्कुर्वन्ति – दुर्जनाः सज्जनं तिरस्कुर्वन्ति । (ख) क्रियताम् – भवता शीघ्रं कार्यं क्रियताम् । (ग) निवसति – मम मित्रं ग्रामे निवसति । (घ) आह – गुरुः शिष्यं हितवचनम् आह । (ङ) छेत्स्यति – मूषकः पाशं दन्तबलेन छेत्स्यति । (च) सम्भाषसे – त्वं किमर्थं न सम्भाषसे ? (छ) अब्रवीत् – नायकः मित्राणि प्रति अब्रवीत् । (ज) उपसर्पति – सेवकः स्वामिनम् उपसर्पति । (झ) युज्यते – सत्कर्म एव सज्जनाय युज्यते ।

2. अनया कथया वयं स्वजीवने कां शिक्षां स्वीकर्तुं शक्नुमः इति अधिकृत्य कक्षायां परिचर्चां कुर्वन्तु ।

मार्गदर्शनम्यह कक्षा-परिचर्चा है। इस कथा से मिलने वाली शिक्षाओं पर चर्चा कीजिए, जैसे – (1) एकता एवं संगठन में बल है, (2) विपत्ति में धैर्य रखकर बुद्धि से उपाय सोचना चाहिए, (3) बड़ों/अनुभवियों की हितकारी सलाह माननी चाहिए, (4) लोभ से बचना चाहिए, तथा (5) सच्चे मित्र विपत्ति में सहायता करते हैं।

यह नीति-कथा है। पर्वतीय संकट में सेतु बनाने का प्रसंग सहयोग की शिक्षा के लिए है; यह वास्तविक आपदा-प्रबन्धन की तकनीकी कार्यविधि नहीं है। नीचे के अतिरिक्त प्रश्न, MCQ और अभिकथन-कारण ClearStudy के अभ्यास हैं।

अतिरिक्त प्रश्न (Extra Questions)

अतिरिक्त लघु प्रश्न — ClearStudy अभ्यास

1. यह पाठ किस ग्रन्थ एवं किस प्रकरण से लिया गया है तथा इसके रचयिता कौन हैं?

उत्तरयह पाठ ‘हितोपदेश’ ग्रन्थ के ‘मित्रलाभ’ प्रकरण से लिया गया है। इसके रचयिता पण्डित नारायणशर्मा हैं। हितोपदेश में नीतियुक्त वचनों, सुभाषितों एवं कथाओं का संग्रह है।

2. पाठ की बाह्य-कथा (फ्रेम-स्टोरी) किस संकट से आरम्भ होती है?

उत्तरकेदारक्षेत्र की चढ़ाई करते समय तीव्र वर्षा होने लगती है, चारों ओर अन्धकार छा जाता है, नदी के तीव्र वेग से सेतु टूट जाता है तथा पर्वत-स्खलन हो जाता है। इसी संकट में फँसकर साथी भयभीत हो जाते हैं।

3. चित्रग्रीव ने कबूतरों को दाने खाने से क्यों मना किया था?

उत्तरचित्रग्रीव ने कहा कि निर्जन वन में चावल के दानों का होना संदेहास्पद है; वहाँ कोई व्याध हो सकता है। अतः बिना सोचे-समझे कोई कार्य नहीं करना चाहिए। किन्तु लोभी कबूतरों ने उसकी बात नहीं मानी।

4. जाल में फँसने पर चित्रग्रीव ने कौन-सा उपाय सुझाया?

उत्तरचित्रग्रीव ने कहा कि एक-दूसरे का तिरस्कार करने के स्थान पर उपाय सोचना चाहिए। ‘छोटी वस्तुओं का संगठन भी कार्य सिद्ध करता है’ – इसलिए सभी कबूतर एकचित्त होकर जाल सहित उड़ जाएँ।

5. हिरण्यक ने पहले किसके बन्धन काटे और चित्रग्रीव ने क्या कहा?

उत्तरचित्रग्रीव ने कहा कि पहले मेरे आश्रितों (साथी कबूतरों) के बन्धन काटो, बाद में मेरे। इस आश्रित-वात्सल्य से प्रसन्न होकर हिरण्यक ने उसकी प्रशंसा की कि ऐसे गुण से वह तीनों लोकों के स्वामित्व के योग्य है।

अतिरिक्त व्याख्यात्मक प्रश्न — ClearStudy अभ्यास

6. ‘अल्पानामपि वस्तूनां संहतिः कार्यसाधिका’ पाठ का केन्द्रीय संदेश अपने शब्दों में लिखिए।

उत्तरइस पाठ का केन्द्रीय संदेश है – संगठन एवं एकता में अपार बल है। छोटी एवं निर्बल वस्तुएँ भी जब मिलकर संगठित हो जाती हैं, तब बड़े-से-बड़े असम्भव कार्य भी सिद्ध हो जाते हैं। जैसे घास के तिनकों से बनी रस्सी से मतवाले हाथी भी बाँध लिए जाते हैं।कथा में जाल में फँसे कबूतर अकेले-अकेले छटपटाकर मर सकते थे, किन्तु बुद्धि एवं संगठन के बल पर वे जाल सहित एक साथ उड़ गए और मित्र हिरण्यक की सहायता से मुक्त हो गए। इसी प्रेरणा से तीर्थयात्री मित्र भी भय त्यागकर मिलकर सेतु बनाते हैं और प्राण बचाते हैं। पाठ यह भी सिखाता है कि विपत्ति में धैर्य रखकर बुद्धि से उपाय खोजना चाहिए।

7. चित्रग्रीव कपोतराज के चरित्र की विशेषताएँ बताइए।

उत्तरचित्रग्रीव कथा का आदर्श नायक है। वह दूरदर्शी एवं विवेकी है – निर्जन वन में दानों को देखकर ही वह संकट भाँप लेता है और साथियों को सावधान करता है। वह धैर्यवान् एवं नेतृत्व-कुशल है – जाल में फँसने पर वह घबराता नहीं, अपितु तिरस्कार के स्थान पर उपाय सुझाता है और सबको संगठित कर जाल सहित उड़ा ले जाता है।उसका सर्वश्रेष्ठ गुण आश्रित-वात्सल्य है – वह हिरण्यक से कहता है कि पहले मेरे आश्रितों के बन्धन काटो, बाद में मेरे। यह त्याग एवं नेतृत्व-धर्म ही उसे महान् बनाता है, जिससे हिरण्यक उसे ‘त्रैलोक्य के स्वामित्व के योग्य’ कहता है। इस प्रकार चित्रग्रीव विवेक, धैर्य, नीति एवं परोपकार का प्रतीक है।

8. ल्यप्-प्रत्यय किसे कहते हैं? क्त्वा एवं ल्यप् में क्या अन्तर है? उदाहरण सहित समझाइए।

उत्तरजब एक क्रिया पूर्ण होने के बाद दूसरी क्रिया की जाती है, तब पूर्वकालिक (पहले होने वाली) क्रिया की धातु में क्त्वा अथवा ल्यप् प्रत्यय लगता है। दोनों के अर्थ समान (‘…कर’) हैं तथा दोनों अव्यय हैं।अन्तर – जब धातु के पूर्व कोई उपसर्ग नहीं होता, तब क्त्वा प्रत्यय लगता है (गम्+क्त्वा = गत्वा, पठ्+क्त्वा = पठित्वा)। किन्तु जब धातु के पूर्व कोई उपसर्ग होता है, तब क्त्वा के स्थान पर ल्यप् लगता है, जिसमें केवल ‘य्’ शेष रहता है – जैसे आ+गम्+ल्यप् = आगत्य, अव+लोक्+ल्यप् = अवलोक्य, वि+कॄ+ल्यप् = विकीर्य, प्र+नम्+ल्यप् = प्रणम्य। यह इस पाठ में पढ़ाया गया सामान्य नियम है। दोनों पूर्वकालिक क्रिया के अव्यय हैं और मुख्य क्रिया के साथ एक ही कर्ता के कार्य बताते हैं।

MCQ & अभिकथन-कारण

1. यह पाठ किस ग्रन्थ से संकलित है?

(क) पञ्चतन्त्रात्

(ख) हितोपदेशात्

(ग) कथासरित्सागरात्

(घ) रामायणात्

उत्तर(ख) हितोपदेशात्। (मित्रलाभ प्रकरण)

2. हितोपदेश के रचयिता कौन हैं?

(क) विष्णुशर्मा

(ख) नारायणशर्मा

(ग) कालिदासः

(घ) भर्तृहरिः

उत्तर(ख) नारायणशर्मा।

3. कपोतराज का नाम क्या था?

(क) हिरण्यकः

(ख) लघुपतनकः

(ग) चित्रग्रीवः

(घ) मन्थरकः

उत्तर(ग) चित्रग्रीवः।

4. हिरण्यक कौन था?

(क) काकः

(ख) मूषकराजः

(ग) व्याधः

(घ) कूर्मः

उत्तर(ख) मूषकराजः (चूहों का राजा)।

5. व्याध ने क्या बिखेरकर जाल फैलाया था?

(क) फलानि

(ख) पुष्पाणि

(ग) तण्डुलकणान्

(घ) जलम्

उत्तर(ग) तण्डुलकणान् (चावल के दाने)।

6. ‘विकीर्य’ पद में कौन-सा प्रत्यय है?

(क) क्त्वा

(ख) ल्यप्

(ग) तुमुन्

(घ) शतृ

उत्तर(ख) ल्यप्। (वि + कॄ + ल्यप्)

7. कबूतर जाल से किस प्रकार बचे?

(क) अकेले-अकेले उड़कर

(ख) एकचित्त होकर जाल सहित उड़कर

(ग) व्याध से प्रार्थना करके

(घ) जाल काटकर

उत्तर(ख) एकचित्त होकर जाल सहित उड़कर।

8. चित्रग्रीव ने हिरण्यक से पहले किसके बन्धन काटने को कहा?

(क) स्वयं के

(ख) अपने आश्रितों (मदाश्रितानाम्) के

(ग) व्याध के

(घ) किसी के नहीं

उत्तर(ख) अपने आश्रितों के।

9. ‘कश्चित्’ का सन्धिविच्छेद है—

(क) कः + चित्

(ख) क + श्चित्

(ग) कश् + चित्

(घ) कः + शित्

उत्तर(क) कः + चित्। (विसर्गसन्धि – विसर्ग के बाद च् होने पर श्)

10. इस पाठ की मुख्य शिक्षा क्या है?

(क) धन-संचय करो

(ख) संगठन एवं एकता में बल है

(ग) अकेले ही कार्य करो

(घ) लोभ करना उचित है

उत्तर(ख) संगठन एवं एकता में बल है।
उत्तर-कुंजी: 1-(ख), 2-(ख), 3-(ग), 4-(ख), 5-(ग), 6-(ख), 7-(ख), 8-(ख), 9-(क), 10-(ख)

अभिकथन-कारण – नीचे अभिकथन (A) और कारण (R) दिए गए हैं। सही विकल्प चुनिए—
(क) A और R दोनों सही, R, A की सही व्याख्या है। (ख) A और R दोनों सही, पर R, A की सही व्याख्या नहीं। (ग) A सही, R गलत। (घ) A गलत, R सही।

1. अभिकथन (A): कबूतर जाल सहित उड़कर व्याध से बच गए।

कारण (R): चित्रग्रीव के नेतृत्व में सभी कबूतरों ने एकचित्त (संगठित) होकर एक साथ उड़ान भरी।

उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है।

2. अभिकथन (A): ‘विकीर्य’ पद में ल्यप्-प्रत्यय है।

कारण (R): जब धातु के पूर्व उपसर्ग हो, तब क्त्वा के स्थान पर ल्यप् होता है।

उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है (वि + कॄ + ल्यप् = विकीर्य)।

3. अभिकथन (A): चित्रग्रीव ने कबूतरों को दाने खाने से रोका।

कारण (R): निर्जन वन में दानों का होना संदेहास्पद था और वहाँ व्याध का जाल हो सकता था।

उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है।

4. अभिकथन (A): हिरण्यक ने पहले चित्रग्रीव का ही बन्धन काटा।

कारण (R): चित्रग्रीव ने आदेश दिया था कि पहले उसके आश्रितों के बन्धन काटे जाएँ, बाद में उसका।

उत्तर(घ) A गलत है, R सही है – हिरण्यक ने पहले आश्रित कबूतरों के बन्धन काटे, चित्रग्रीव के नहीं।

5. अभिकथन (A): विपत्ति के समय आश्चर्यचकित/विमूढ़ हो जाना कायर का लक्षण है।

कारण (R): ‘विपत्काले विस्मयः एव कापुरुषलक्षणम्’ – पाठ में यही कहा गया है।

उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है।

परीक्षा-सुझाव एवं सामान्य त्रुटियाँ

परीक्षा-सुझाव (Exam Tips)

  • पात्रों के नाम एवं भूमिका याद रखें – चित्रग्रीव (कपोतराज), हिरण्यक (मूषकराज), व्याध (बहेलिया)।
  • ल्यप्-प्रत्यय की तालिका (विकीर्य, विस्तीर्य, अवतीर्य, अवलोक्य, अवलम्ब्य, निर्माय) कण्ठस्थ करें – इनसे ल्यप्/क्त्वा का भेद समझने में सहायता मिलती है।
  • विसर्गसन्धि के चारों नियम उदाहरण सहित याद रखें (कश्चित्, चकितस्तूष्णीम्, हिरण्यको नाम, कुतोऽत्र)।
  • दोनों नीति-श्लोक (‘अल्पानामपि…’ एवं ‘विपदि धैर्यम्…’) भावार्थ सहित लिखने का अभ्यास करें।
  • ‘एकपदेन’ प्रश्नों में केवल एक पद, ‘पूर्णवाक्येन’ में पूरा वाक्य लिखें।

सामान्य त्रुटियाँ (Common Mistakes)

  • क्त्वा एवं ल्यप् में भ्रम – उपसर्ग हो तो ल्यप् (आगत्य), उपसर्ग न हो तो क्त्वा (गत्वा)।
  • विसर्गसन्धि में गलत वर्ण – ‘कश्चित्’ में श्, ‘चकितस्तूष्णीम्’ में स् होता है।
  • हिरण्यक को कौआ/कछुआ समझ लेना – वह मूषकराज (चूहों का राजा) है।
  • घटनाक्रम में भूल – पहले आश्रितों के, बाद में चित्रग्रीव के बन्धन कटे।
  • ग्रन्थ एवं रचयिता की भूल – ग्रन्थ हितोपदेश है, रचयिता नारायणशर्मा हैं (विष्णुशर्मा नहीं)।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

दीपकम् कक्षा 8 का दूसरा पाठ ‘अल्पानामपि वस्तूनां संहतिः कार्यसाधिका’ किस ग्रन्थ से लिया गया है?

यह पाठ ‘हितोपदेश’ ग्रन्थ के ‘मित्रलाभ’ प्रकरण से लिया गया है, जिसके रचयिता पण्डित नारायणशर्मा हैं।

‘अल्पानामपि वस्तूनां संहतिः कार्यसाधिका’ का अर्थ क्या है?

इसका अर्थ है – छोटी एवं निर्बल वस्तुओं का संगठन (एकता) भी बड़े कार्य सिद्ध कर देता है। जैसे घास के तिनकों से बनी रस्सी से मतवाले हाथी भी बाँध लिए जाते हैं। संक्षेप में – ‘एकता में बल है’।

कथा के मुख्य पात्र कौन हैं और उन्होंने क्या सिखाया?

मुख्य पात्र हैं – चित्रग्रीव (कपोतराज), हिरण्यक (मूषकराज) एवं व्याध। कथा सिखाती है कि संगठन, बुद्धि एवं सच्ची मित्रता से संकट का उपाय खोजने में सहायता मिलती है, तथा विपत्ति में धैर्य रखना चाहिए।

पाठ्यपुस्तक संदर्भ: NCERT दीपकम्, कक्षा 8, पाठ 2, पृष्ठ 10–23; उपलब्ध प्रति का पुनर्मुद्रण 2026–27। उत्तर और व्याख्याएँ ClearStudy की मौलिक शिक्षण सामग्री हैं; खुली गतिविधियों के उत्तर नमूने हैं। आधिकारिक NCERT पुस्तक पोर्टल।

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