Class 8 Sanskrit Deepakam Chapter 3 Solutions — सुभाषितरसं पीत्वा जीवनं सफलं कुरु
Class 8 Sanskrit Deepakam Chapter 3 solutions: आठ नीति-सुभाषितों का हिन्दी सार, शब्दार्थ और पाँच अभ्यासों के पुस्तक-क्रमानुसार उत्तर पढ़ें। सन्धि, समास और परियोजना के नमूने समझें।
- पाठ का अवलोकन (Chapter Overview)
- पाठ-परिचय / प्रसंग
- मूल सुभाषितानि (श्लोकाः)
- सार (Hindi Summary)
- शब्दार्थ (Word-meanings)
- अभ्यासः (अभ्यासात् जायते सिद्धिः)
- अत्र इदम् अवधेयम् (व्याकरण-तालिका)
- योग्यताविस्तरः & परियोजनाकार्यम्
- अतिरिक्त प्रश्न (Extra Questions)
- MCQ & अभिकथन-कारण
- परीक्षा-सुझाव एवं सामान्य त्रुटियाँ
- अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
पाठ का अवलोकन (Chapter Overview)
दीपकम् कक्षा 8 का तृतीय पाठ ‘सुभाषितरसं पीत्वा जीवनं सफलं कुरु’ आठ चुने हुए नीति-सुभाषितों (श्रेष्ठ वचनों) का संकलन है। पाठ का आरम्भ पितामही एवं बालिका के एक रोचक संवाद से होता है, जिसमें बालिका नीतिश्लोक सुनने की इच्छा प्रकट करता है। पितामही समझाती हैं कि ‘सुष्ठु भाषितानि’ अर्थात् सुन्दर एवं हितकारी वचन ही सुभाषित कहलाते हैं, जो सदा जनहित में होते हैं। इन सुभाषितों के पठन से आदर्श मानव-जीवन के निर्माण की प्रेरणा मिलती है। ये आठ श्लोक भारतभूमि की महिमा, गुणग्राहकता, सत्पुरुषों की नम्रता, मनुष्य की परीक्षा के चार आधार, मनुष्य को सुशोभित करने वाले आठ गुण, सच्ची सभा एवं सत्य का स्वरूप, दुर्जन-संग का त्याग तथा भाग्य के साथ पुरुषार्थ की अनिवार्यता – इन नीति-विषयों पर प्रकाश डालते हैं।
पाठ-परिचय / प्रसंग
यह पाठ संस्कृत-साहित्य के विभिन्न नीति-ग्रन्थों एवं पुराणों से चुने गए आठ सुभाषितों (नीति-श्लोकों) का संग्रह है। ‘सुभाषित’ शब्द का अर्थ है – ‘सुष्ठु भाषितम्’ अर्थात् भली प्रकार से कहा गया, शोभन एवं हितकारी वचन। सुभाषित जीवन के व्यवहार, कर्तव्य-अकर्तव्य एवं आदर्श-मानवजीवन के निर्माण का स्पष्ट मार्गदर्शन करते हैं। पाठ का संवाद-अंश पितामही एवं बालिका के बीच होता है, जिसके पश्चात् आठ नीति-श्लोक क्रमशः दिए गए हैं। इन श्लोकों के योग्यताविस्तरः भाग में विष्णुपुराण, महाभारत, भर्तृहरि, हितोपदेश एवं चाणक्यनीति जैसे प्रमुख नीति-स्रोतों का परिचय भी दिया गया है। पाठ का केन्द्रीय भाव है – सुभाषितरूपी अमृत-रस का पान करके अपने जीवन को सफल बनाना।
मूल सुभाषितानि (श्लोकाः)
(पाठ में संकलित आठ नीति-सुभाषित, ज्यों-के-त्यों।)
स्वर्गापवर्गास्पदमार्गभूते भवन्ति भूयः पुरुषाः सुरत्वात् ॥ १ ॥
गुणी गुणं वेत्ति न वेत्ति निर्गुणः बली बलं वेत्ति न वेत्ति निर्बलः ।
पिको वसन्तस्य गुणं न वायसः करी च सिंहस्य बलं न मूषकः ॥ २ ॥
भवन्ति नम्रास्तरवः फलोद्गमैः नवाम्बुभिर्दूरविलम्बिनो घनाः ।
अनुद्धताः सत्पुरुषाः समृद्धिभिः स्वभाव एवैष परोपकारिणाम् ॥ ३ ॥
यथा चतुर्भिः कनकं परीक्ष्यते निघर्षणच्छेदनतापताडनैः ।
तथा चतुर्भिः पुरुषः परीक्ष्यते कुलेन शीलेन गुणेन कर्मणा ॥ ४ ॥
अष्टौ गुणाः पुरुषं दीपयन्ति प्रज्ञा च कौल्यं च दमः श्रुतं च ।
पराक्रमश्चाबहुभाषिता च दानं यथाशक्ति कृतज्ञता च ॥ ५ ॥
न सा सभा यत्र न सन्ति वृद्धाः वृद्धा न ते ये न वदन्ति धर्मम् ।
धर्मः स नो यत्र न सत्यमस्ति सत्यं न तद्यच्छलमभ्युपैति ॥ ६ ॥
दुर्जनेन समं सख्यं प्रीतिं चापि न कारयेत् ।
उष्णो दहति चाङ्गारः शीतः कृष्णायते करम् ॥ ७ ॥
यथा ह्येकेन चक्रेण न रथस्य गतिर्भवेत् ।
एवं पुरुषकारेण विना दैवं न सिध्यति ॥ ८ ॥ — सुभाषितानि (नीति-श्लोक-सङ्ग्रहः)
सार (Hindi Summary)
‘सुभाषितरसं पीत्वा जीवनं सफलं कुरु’ पाठ पितामही एवं बालिका के संवाद से आरम्भ होता है। बालिका नीतिश्लोक सुनने की इच्छा प्रकट करता है, तब पितामही समझाती हैं कि सुन्दर एवं हितकारी वचन ही ‘सुभाषित’ कहलाते हैं। इनके पठन से आदर्श मानव-जीवन के निर्माण की प्रेरणा मिलती है और जो व्यक्ति इन्हें पढ़कर अपने जीवन-व्यवहार में लागू करता है, वह अनेक लाभ प्राप्त करता है।
इसके पश्चात् आठ नीति-सुभाषित दिए गए हैं। प्रथम श्लोक भारतभूमि की महिमा बताता है – देवता भी इस पुण्यभूमि में जन्म लेने के लिए लालायित रहते हैं। द्वितीय श्लोक में गुणग्राहकता का भाव है – गुणी ही गुण को पहचानता है, जैसे कोयल वसन्त के गुण को जानती है, कौआ नहीं; और हाथी सिंह के बल को जानता है, चूहा नहीं। तृतीय श्लोक में सत्पुरुषों की स्वाभाविक नम्रता का चित्रण है – जैसे फलों से लदे वृक्ष एवं जल से भरे बादल झुक जाते हैं, वैसे ही सज्जन समृद्धि में भी अभिमान नहीं करते। चतुर्थ श्लोक बताता है कि जैसे सोने की परीक्षा घिसने, काटने, तपाने एवं पीटने – इन चार उपायों से होती है, वैसे ही मनुष्य की परीक्षा कुल, शील, गुण एवं कर्म से होती है।
पंचम श्लोक में मनुष्य को सुशोभित करने वाले आठ गुण बताए गए हैं – प्रज्ञा, कुलीनता, इन्द्रिय-संयम, शास्त्रज्ञान, पराक्रम, मितभाषिता, यथाशक्ति दान एवं कृतज्ञता। षष्ठ श्लोक में सच्ची सभा एवं सच्चे सत्य का स्वरूप बताया गया है – वही सभा सार्थक है जहाँ ज्ञानवृद्ध जन हों और धर्मानुकूल सत्य ही बोला जाए। सप्तम श्लोक दुर्जन के संग का त्याग सिखाता है – जैसे अंगारा गरम होने पर जलाता है और ठण्डा होने पर भी हाथ काला कर देता है, वैसे ही दुर्जन सदा हानि ही पहुँचाता है। अष्टम श्लोक भाग्य के साथ पुरुषार्थ की अनिवार्यता बताता है – जैसे एक पहिए से रथ नहीं चलता, वैसे ही पुरुषार्थ के बिना केवल भाग्य से कार्य सिद्ध नहीं होता। संक्षेप में, यह पाठ हमें गुणग्राहकता, नम्रता, सच्चरित्रता, परिश्रम एवं सत्संगति की प्रेरणा देता है।
आठों श्लोकों के हिन्दी भावार्थ — ClearStudy व्याख्या
- देवता भारतभूमि में जन्म लेने वालों को धन्य बताते हैं। श्लोक की धार्मिक काव्य-दृष्टि में यह भूमि स्वर्ग तथा मोक्ष के मार्ग का स्थान है और देवता यहाँ फिर मनुष्यरूप में जन्म लेना चाहते हैं।
- गुणवान दूसरे के गुण और बलवान बल को पहचानता है। कोयल–कौआ तथा हाथी–चूहा इस नीति-विचार के काव्यात्मक उदाहरण हैं; इन्हें पशुओं की बुद्धि का वैज्ञानिक मूल्यांकन न मानें।
- फलों से लदे वृक्ष झुकते हैं और जलयुक्त मेघ नीचे झुके दिखाई देते हैं। इसी उपमा से कवि कहते हैं कि परोपकारी सज्जन समृद्धि में भी अहंकार नहीं करते।
- सोना घिसने, काटने, तपाने और पीटने से परखा जाता है। इसी तरह श्लोक मनुष्य के कुल, शील, गुण और कर्म को चार परीक्षा-आधार बताता है। यह प्राचीन नीति-काव्य का कथन है; जन्म या परिवार के आधार पर किसी का मूल्य अथवा सम्मान कम नहीं होता।
- प्रज्ञा, कौल्य, दम, श्रुत, पराक्रम, अबहुभाषिता, यथाशक्ति दान और कृतज्ञता—ये आठ गुण मनुष्य को शोभा देते हैं। कौल्य का पाठगत अर्थ कुलीनता है; व्यवहार में सदाचार और अपने कर्मों का विकास मुख्य है।
- सभा में अनुभवी और ज्ञानवान लोगों का नैतिक मार्गदर्शन होना चाहिए। धर्म में सत्य और सत्य में छल का अभाव आवश्यक है। केवल आयु अधिक होना ज्ञान या सत्यनिष्ठा का प्रमाण नहीं है।
- दुष्ट आचरण से सावधान रहने की शिक्षा है: गरम अंगारा जलाता और ठण्डा अंगारा हाथ काला करता है। अंगारे की उपमा हानिकारक संगति समझाती है।
- एक पहिए से रथ नहीं चलता। उसी उपमा से कहा गया है कि मानव-प्रयत्न के बिना भाग्य फल नहीं देता; केवल भाग्य के भरोसे बैठने के बजाय कर्म करना चाहिए।

शब्दार्थ (Word-meanings)
| शब्दः (Sanskrit) | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| गायन्ति | गाते हैं | Sing |
| किल | निश्चय से | Indeed / certainly |
| धन्याः | प्रशंसनीय, भाग्यशाली | Praiseworthy / blessed |
| अपवर्गः | मोक्ष, निर्वाण | Liberation |
| भूयः | बार-बार, पुनः | Over and over again |
| सुरत्वात् | देवत्व से | From divinity |
| वेत्ति | जानता है | Knows |
| निर्गुणः | गुणहीन | Without virtue |
| बली | बलवान | Powerful |
| निर्बलः | बलहीन | Weak |
| पिकः | कोयल | Cuckoo |
| वायसः | कौआ | Crow |
| करी | हाथी | Elephant |
| नम्राः | झुके हुए, विनम्र | Bent / polite |
| तरवः | वृक्ष | Trees |
| फलोद्गमैः | फलों के भार से | With weight of fruits |
| घनाः | बादल | Clouds |
| अनुद्धताः | अभिमान से रहित | Without arrogance |
| कनकम् | सोना, स्वर्ण | Gold |
| परीक्ष्यते | परीक्षा की जाती है | Is tested |
| कौल्यम् | कुलीनता | Noble birth |
| दमः | इन्द्रिय-संयम | Control over senses |
| श्रुतम् | शास्त्रज्ञान | Knowledge of scriptures |
| अबहुभाषिता | मितभाषिता (कम एवं सार्थक बोलना) | Speaking less but meaningfully |
| छलम् | कपट | Cheating / deceit |
| दुर्जनेन | दुष्ट व्यक्ति से | With a wicked person |
| अङ्गारः | अंगारा | Charcoal / ember |
| कृष्णायते | काला करता है | Blackens |
| दैवम् | भाग्य | Luck / fate |
| पुरुषकारेण | पुरुषार्थ से, परिश्रम से | By human effort |
| सिध्यति | सिद्ध होता है, फलता है | Is accomplished |
अभ्यासः (अभ्यासात् जायते सिद्धिः)
1. पाठस्य आधारेण अधोलिखितानां प्रश्नानाम् उत्तराणि एकपदेन लिखत —
(क) गीतानि के गायन्ति ?
(ख) कः बलं न वेत्ति ?
(ग) कः वसन्तस्य गुणं वेत्ति ?
(घ) मूषकः कस्य बलं न वेत्ति ?
(ङ) फलोद्गमैः के नम्राः भवन्ति ?
(च) केन समं सख्यं न करणीयम् ?
(छ) केन विना दैवं न सिध्यति ?
2. पाठस्य आधारेण अधोलिखितानां प्रश्नानाम् उत्तराणि पूर्णवाक्येन लिखत —
(क) तरवः कदा नम्राः भवन्ति ?
(ख) समृद्धिभिः के अनुद्धताः भवन्ति ?
(ग) सत्पुरुषाणां स्वभावः कीदृशः भवति ?
(घ) सत्यम् कदा सत्यम् न भवति ?
(ङ) दैवं कदा न सिध्यति ?
3. स्तम्भयोः मेलनं कुरुत —
(स्तम्भ ‘अ’ की उक्ति को स्तम्भ ‘आ’ के सही भावार्थ से मिलाइए।)
| (अ) उक्तिः | (आ) भावार्थः – सही मेलनम् |
|---|---|
| (क) गायन्ति देवाः किल गीतकानि | भारतभूमेः माहात्म्यवर्णनम् |
| (ख) गुणी गुणं वेत्ति | सज्जनः एव गुणानां मर्मज्ञः |
| (ग) भवन्ति नम्राः तरवः फलोद्गमैः | सत्पुरुषाणां स्वाभाविकी नम्रता |
| (घ) यथा चतुर्भिः कनकं परीक्ष्यते | सुवर्णं चतुर्भिः प्रकारैः परीक्ष्यते |
| (ङ) अष्टौ गुणाः पुरुषं दीपयन्ति | प्रज्ञा, दमः, दानं, कृतज्ञता इत्यादयः |
| (च) दुर्जनेन समं सख्यं न कारयेत् | दुष्टसङ्गः उष्णाङ्गारसदृशः |
| (छ) एकेन चक्रेण न रथस्य गतिः | केवलं दैवं प्रयत्नं विना असिद्धम् |
4. अधः प्रदत्तमञ्जूषातः पदानि चित्वा रिक्तस्थानानि पूरयत —
मञ्जूषा: फलोद्गमैः, गुणं, कृतज्ञता, सिध्यति, श्रुतम्, शीलेन
5. समुचितं विकल्पं चिनुत —
(क) “गायन्ति देवाः किल गीतकानि” – इत्यस्य श्लोकस्य मुख्यविषयः कः ?
(i) वसन्तस्य सौन्दर्यम् (ii) भारतभूमेः गौरवम् (iii) कर्मणां फलम् (iv) दानस्य प्रभावः
(ख) “गुणी गुणं वेत्ति” – इत्यत्र कः गुणं न जानाति ?
(i) गुणी (ii) निर्गुणः (iii) पिकः (iv) बली
(ग) “पिको वसन्तस्य गुणं न वायसः” – इत्यस्य तात्पर्यं किम् ?
(i) पिकः मधुरं गायति न वायसः (ii) सुजन एव गुणं जानाति (iii) वायसः अपि सरसं गानं करोति (iv) वसन्तः निर्गुणः अस्ति
(घ) “भवन्ति नम्राः तरवः फलोद्गमैः” – इत्यस्य अर्थः कः ?
(i) वृक्षाणां कठोरता (ii) सत्पुरुषाणाम् उन्नतिः (iii) फलयुक्ताः वृक्षाः नम्राः भवन्ति (iv) परोपकारिणां दुर्बलता
(ङ) “न सा सभा यत्र न सन्ति वृद्धाः” – इत्यत्र सभायाः महत्त्वं किम् ?
(i) सभा मनोरञ्जनाय भवति (ii) सभा धनसम्पत्तिं प्रदातुं शक्नोति (iii) धर्मोपदेशाय ज्ञानवृद्धाः जनाः आवश्यकाः (iv) सभा केवलं राजकार्यार्थं भवति
(च) दुर्जनेन सह सख्यं किमर्थं न कार्यम् ?
(i) सः मित्रं भवति (ii) सः धनं ददाति (iii) सः शिक्षां ददाति (iv) सः उष्णाङ्गारवद् हानिकरः भवति
अत्र इदम् अवधेयम् (व्याकरण-तालिका)
संस्कृत श्लोकों में इस पाठ के पद्यों में चार चरण (पादचतुष्टयम्) हैं तथा वे छन्दोबद्ध-सस्वर गायन-शैली में होते हैं। श्लोकों में सन्धि एवं समासयुक्त पद आते हैं। पाठ में ‘अत्र इदम् अवधेयम्’ के अन्तर्गत निम्नलिखित सन्धि-समास के उदाहरण दिए गए हैं।
| पदम् | विग्रहः / सन्धि-विच्छेदः | प्रकारः |
|---|---|---|
| नम्रास्तरवः | नम्राः + तरवः | विसर्ग-सन्धिः |
| अभ्युपैति | अभि + उप + एति | उप + एति → उपैति (वृद्धि); अभि + उपैति → अभ्युपैति (यण्) |
| अनुद्धताः | न उद्धताः | नञ् तत्पुरुषसमासः |
| यथाशक्ति | शक्तिम् अनतिक्रम्य | अव्ययीभावः |
योग्यताविस्तरः & परियोजनाकार्यम्
योग्यताविस्तरः (नीति-ग्रन्थ-परिचयः)
| ग्रन्थः | विवरणम् |
|---|---|
| विष्णुपुराणम् | प्रसिद्ध अठारह पुराणों में से एक। पाठ के ग्रन्थपरिचय में इसके सात हजार से अधिक श्लोक बताए गए हैं। इसमें भगवान् विष्णु एवं उनके अवतारों का वर्णन है तथा भारतवर्ष की महिमा का प्रामाणिक वर्णन मिलता है। |
| महाभारतम् | संस्कृत-साहित्य का इतिहास-ग्रन्थ; पाठ के परिचय में इसे परम्परागत रूप से पंचमवेद कहा गया है। इसमें एक लाख से अधिक श्लोक हैं, अतः इसका दूसरा नाम ‘शतसाहस्री-संहिता’ है। इसमें अठारह पर्व हैं। |
| भर्तृहरिः | संस्कृत-काव्य-वाङ्मय के महान् कवि एवं नीतिशास्त्र-विशारद। उनकी रचनाएँ – नीतिशतकम्, शृङ्गारशतकम् एवं वैराग्यशतकम् भारतीय ज्ञान-परम्परा का पोषण करती हैं। |
| हितोपदेशः | पण्डित नारायण द्वारा संकलित कथा-ग्रन्थ। इसमें विविध कथाएँ एवं नीति-श्लोक हैं। यह चार भागों में विभक्त है – मित्रलाभः, सुहृद्भेदः, विग्रहः, सन्धिः । |
| चाणक्यनीतिः | आचार्य चाणक्य के नीति-श्लोक माणिक्य के समान मूल्यवान हैं। बालकों के चरित्र-निर्माण एवं आदर्श-मानवजीवन की प्रतिष्ठा के लिए ये अत्यन्त उपयोगी हैं। |
परियोजनाकार्यम् (Project Work)
1. अन्तर्जालात् पुस्तकेभ्यश्च विंशतिसुभाषितानां सङ्ग्रहं कुरुत ।
2. किमपि नीतिवाक्यम् अधिकृत्य पञ्चवाक्यानि संस्कृतेन लिखत ।
3. पाठे आगतानि सुभाषितानि कण्ठस्थीकृत्य कक्षायां श्रावयत ।
आगे के अतिरिक्त प्रश्न, MCQ और अभिकथन-कारण ClearStudy के अभ्यास हैं; इन्हें पुस्तक के पाँच अभ्यासों से अलग पढ़ें।
अतिरिक्त प्रश्न (Extra Questions)
अतिरिक्त लघु प्रश्न — ClearStudy अभ्यास
1. ‘सुभाषित’ का अर्थ क्या है तथा इसके पठन से क्या लाभ है?
2. द्वितीय श्लोक में कोयल एवं कौए का उदाहरण क्यों दिया गया है?
3. सोने (कनक) की परीक्षा किन चार उपायों से होती है?
4. मनुष्य को सुशोभित करने वाले आठ गुण कौन-से हैं?
5. अष्टम श्लोक में रथ के पहिए का उदाहरण क्या सिखाता है?
अतिरिक्त व्याख्यात्मक प्रश्न — ClearStudy अभ्यास
6. तृतीय श्लोक के आधार पर सत्पुरुषों के स्वभाव का वर्णन कीजिए।
7. ‘दुर्जनेन समं सख्यं न कारयेत्’ – इस श्लोक का भाव स्पष्ट कीजिए।
8. ‘न सा सभा यत्र न सन्ति वृद्धाः’ – इस श्लोक के आधार पर सच्ची सभा एवं सच्चे सत्य का स्वरूप बताइए।
MCQ & अभिकथन-कारण
1. ‘सुभाषित’ शब्द का अर्थ है—
(क) कठोर वचन
(ख) सुन्दर एवं हितकारी वचन
(ग) व्यर्थ वचन
(घ) झूठे वचन
2. प्रथम श्लोक में किसकी महिमा का वर्णन है?
(क) स्वर्ग की
(ख) देवताओं की
(ग) भारतभूमि की
(घ) वसन्त ऋतु की
3. ‘पिकः’ शब्द का अर्थ है—
(क) कौआ
(ख) कोयल
(ग) हाथी
(घ) चूहा
4. फलों के भार से कौन झुक जाते हैं?
(क) बादल
(ख) वृक्ष
(ग) पर्वत
(घ) नदियाँ
5. मनुष्य की परीक्षा किन चार आधारों पर होती है?
(क) धन, बल, रूप, आयु
(ख) कुल, शील, गुण, कर्म
(ग) विद्या, यश, सुख, बुद्धि
(घ) निघर्षण, छेदन, ताप, ताडन
6. पाँचवें श्लोक के अनुसार मनुष्य को कितने गुण सुशोभित करते हैं?
(क) चार
(ख) छह
(ग) आठ
(घ) दस
7. ‘दमः’ शब्द का अर्थ है—
(क) कुलीनता
(ख) इन्द्रिय-संयम
(ग) शास्त्रज्ञान
(घ) पराक्रम
8. सप्तम श्लोक में दुर्जन की तुलना किससे की गई है?
(क) सिंह से
(ख) अंगारे से
(ग) मेघ से
(घ) सोने से
9. अष्टम श्लोक में मानव-रथ के दो पहिए किन्हें बताया गया है?
(क) धन एवं विद्या
(ख) सुख एवं दुःख
(ग) प्रयत्न (पुरुषार्थ) एवं भाग्य
(घ) कुल एवं शील
10. ‘अनुद्धताः’ पद का समास-विग्रह है—
(क) अनु + उद्धताः
(ख) न + उद्धताः
(ग) अन + उद्धताः
(घ) अनुत् + हताः
अभिकथन-कारण – नीचे अभिकथन (A) और कारण (R) दिए गए हैं। सही विकल्प चुनिए—
(क) A और R दोनों सही, R, A की सही व्याख्या है। (ख) A और R दोनों सही, पर R, A की सही व्याख्या नहीं। (ग) A सही, R गलत। (घ) A गलत, R सही।
1. अभिकथन (A): गुणी व्यक्ति ही दूसरों के गुणों को पहचान पाता है।
कारण (R): जैसे कोयल वसन्त के गुण को जानती है, वैसे कौआ नहीं जान पाता।
2. अभिकथन (A): सत्पुरुष समृद्धि पाकर भी विनम्र रहते हैं।
कारण (R): फलों से लदे वृक्ष एवं जल से भरे बादल झुक जाते हैं।
3. अभिकथन (A): दुर्जन के साथ मित्रता नहीं करनी चाहिए।
कारण (R): दुर्जन सदा विश्वासयोग्य होता है और हित ही करता है।
4. अभिकथन (A): केवल भाग्य से कार्य सिद्ध नहीं होता।
कारण (R): जैसे एक ही पहिए से रथ नहीं चल सकता, वैसे ही पुरुषार्थ के बिना दैव सिद्ध नहीं होता।
5. अभिकथन (A): वही सभा सच्ची है जहाँ ज्ञानवृद्ध जन धर्म की बात करते हैं।
कारण (R): केवल बहुत-सी बातें करने (बहुभाषण) से सभा को साफल्य प्राप्त होता है।
परीक्षा-सुझाव एवं सामान्य त्रुटियाँ
परीक्षा-सुझाव (Exam Tips)
- आठों सुभाषित कण्ठस्थ करें – शब्दार्थ और रिक्तस्थान-पूर्ति का अभ्यास इनके आधार पर करें।
- शब्दार्थ (पिकः, वायसः, करी, अनुद्धताः, कनकम्, दमः, श्रुतम्, अङ्गारः आदि) हिन्दी एवं अंग्रेज़ी दोनों में याद रखें।
- ‘एकपदेन’ वाले प्रश्न में केवल एक शब्द लिखें; ‘पूर्णवाक्येन’ वाले में पूरा वाक्य लिखें।
- चार उपाय (निघर्षण, छेदन, ताप, ताडन) एवं चार परीक्षा-आधार (कुल, शील, गुण, कर्म) क्रम सहित याद करें।
- आठ गुणों (प्रज्ञा, कौल्य, दम, श्रुत, पराक्रम, अबहुभाषिता, दान, कृतज्ञता) की सूची पंक्तिबद्ध याद रखें।
- सन्धि-समास उदाहरण (नम्रास्तरवः, अभ्युपैति, अनुद्धताः, यथाशक्ति) विग्रह सहित याद करें।
सामान्य त्रुटियाँ (Common Mistakes)
- गुणी एवं निर्गुण में भ्रम – गुण को निर्गुण नहीं, बल्कि गुणी ही पहचानता है।
- द्वितीय श्लोक में पशु-उदाहरण उलट देना – कोयल वसन्त को, हाथी सिंह के बल को जानता है (कौआ/चूहा नहीं)।
- ‘अनुद्धताः’ का विग्रह ‘अनु + उद्धताः’ लिख देना – सही है ‘न + उद्धताः’।
- आठ गुणों में से कोई छोड़ देना अथवा गलत गुण जोड़ देना।
- अष्टम श्लोक का प्रमुख संदेश — पुरुषार्थ के बिना भाग्य सिद्ध नहीं होता; इसलिए प्रयत्न आवश्यक है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
दीपकम् कक्षा 8 का तीसरा पाठ ‘सुभाषितरसं पीत्वा जीवनं सफलं कुरु’ किस विषय पर है?
यह पाठ आठ नीति-सुभाषितों (श्रेष्ठ वचनों) का संकलन है, जो भारतभूमि की महिमा, गुणग्राहकता, सत्पुरुषों की नम्रता, मनुष्य की परीक्षा, आठ गुणों, सच्ची सभा एवं सत्य, दुर्जन-संग के त्याग तथा पुरुषार्थ की अनिवार्यता पर नीति-शिक्षा देते हैं।
मनुष्य की परीक्षा किन चार आधारों पर होती है?
चतुर्थ श्लोक के अनुसार, जैसे सोने की परीक्षा घिसने, काटने, तपाने एवं पीटने से होती है, वैसे ही मनुष्य की परीक्षा चार आधारों – कुल, शील, गुण एवं कर्म से होती है।
अष्टम श्लोक का मुख्य संदेश क्या है?
अष्टम श्लोक बताता है कि जैसे एक पहिए से रथ नहीं चलता, वैसे ही केवल भाग्य से कार्य सिद्ध नहीं होता। पुरुषार्थ (परिश्रम) एवं भाग्य – दोनों मानव-रथ के दो पहिए हैं, अतः भाग्य के साथ परिश्रम भी आवश्यक है।
पाठ्यपुस्तक संदर्भ: NCERT दीपकम्, कक्षा 8, पाठ 3, पृष्ठ 24–35; उपलब्ध प्रति का पुनर्मुद्रण 2026–27। उत्तर और व्याख्याएँ ClearStudy की मौलिक शिक्षण सामग्री हैं; खुली गतिविधियों के उत्तर नमूने हैं। आधिकारिक NCERT पुस्तक पोर्टल।
