Class 8 Sanskrit Deepakam Chapter 1 Solutions — संगच्छध्वं संवदध्वम्

Class 8 Sanskrit Deepakam Chapter 1 solutions: संगच्छध्वं संवदध्वम् के तीन मन्त्र, पदच्छेद, हिन्दी भावार्थ और छह अभ्यासों के उत्तर पढ़ें। लोट्-लकार, प्रश्ननिर्माण तथा परियोजनाओं के नमूने भी समझें।

Class: 8 Subject: Sanskrit Book: Deepakam (दीपकम्) Chapter: 1 पाठ: संगच्छध्वं संवदध्वम् प्रति का पुनर्मुद्रण: 2026–27

पाठ का अवलोकन (Chapter Overview)

दीपकम् कक्षा 8 का प्रथम पाठ ‘संगच्छध्वं संवदध्वम्’ ऋग्वेद के दशम मण्डल के अन्तिम संज्ञान-सूक्त (जिसे संघटन-सूक्त भी कहते हैं) के तीन प्रसिद्ध मन्त्रों पर आधारित है। पाठ का आरम्भ एक संवाद से होता है, जिसमें विद्यालय के क्रीड़ोत्सव में फुटबॉल (पादकन्दुक-क्रीडा) जीतने वाले छात्र आचार्य को बताते हैं कि उनकी विजय का कारण दल में परस्पर सामञ्जस्य एवं एकता था, जबकि विपक्षी दल में मनोभेद एवं द्वेष था। इसी प्रसंग से आचार्य संघटन-सूक्त के मन्त्रों का सस्वर उच्चारण कराते हैं। पाठ का केन्द्रीय भाव एकता, सहयोग, समान चिन्तन एवं समान संकल्प है – “मिलकर चलो, मिलकर बोलो, मन को एक करो।” यह संदेश परिवार, गण, समाज, राष्ट्र एवं समस्त विश्व के लिए समान रूप से उपयोगी है।

पाठ-परिचय / प्रसंग

यह पाठ ऋग्वेद के दशम मण्डल के अन्तिम (१०.१९१) सूक्त से संकलित है, जो ‘संज्ञान-सूक्त’ अथवा ‘संघटन-सूक्त’ के नाम से प्रसिद्ध है। इसके ऋषि आङ्गिरसः माने जाते हैं। वेद को प्राचीन-भारतीय ज्ञान-परम्परा में ‘साक्षात् ब्रह्म के मुख से निःसृत पवित्रतम दैवी वाणी’ माना जाता है। वेद की चार संहिताएँ हैं – ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद एवं अथर्ववेद। प्रस्तुत पाठ में तीन मन्त्र दिए गए हैं जो मनुष्यों को एकता, परस्पर सहमति एवं समान मन से जीवन जीने की प्रेरणा देते हैं।

मूल मन्त्राः

पुस्तक के तीन मन्त्र पढ़ें। यह ऋग्वेद 10.191 के दूसरे, तीसरे और चौथे मन्त्रों का चयन है; नीचे की 1–3 संख्या इस पाठ में दिए मन्त्रों की है।

ओ३म्
संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम् ।
देवा भागं यथा पूर्वे संजानाना उपासते ॥ १ ॥

समानो मन्त्रः समितिः समानी समानं मनः सह चित्तमेषाम् ।
समानं मन्त्रमभिमन्त्रये वः समानेन वो हविषा जुहोमि ॥ २ ॥

समानी व आकूतिः समाना हृदयानि वः ।
समानमस्तु वो मनो यथा वः सुसहासति ॥ ३ ॥
— ऋग्वेदः, संज्ञान-सूक्तम् (१०.१९१.२–४)

तीनों मन्त्रों का पदच्छेद और सरल भावार्थ

1. पदच्छेद: संगच्छध्वम्, संवदध्वम्, सम्, वः, मनांसि, जानताम्; देवाः, भागम्, यथा, पूर्वे, संजानानाः, उपासते।

भावार्थ: मिलकर आगे बढ़ें, विचारों का आदान-प्रदान करें और एक-दूसरे के मनोभाव समझें। देवों के समन्वय का वैदिक उदाहरण देकर साझा कार्य में सहयोग का संदेश दिया गया है। सहमति बनाने का अर्थ हर व्यक्ति की अलग राय दबाना नहीं है; संवाद और सम्मान से साझा लक्ष्य तक पहुँचना है।

2. पदच्छेद: समानः, मन्त्रः, समितिः, समानी, समानम्, मनः, सह, चित्तम्, एषाम्; समानम्, मन्त्रम्, अभिमन्त्रये, वः, समानेन, वः, हविषा, जुहोमि।

भावार्थ: साथ काम करने वालों में सौहार्दपूर्ण विचार, साझा लक्ष्य और समन्वय हो। ऋषि समान संकल्प के प्रचार और सामूहिक प्रार्थना की बात करते हैं। मन्त्रः यहाँ केवल जप की ध्वनि नहीं, विचार या संकल्प का भाव भी रखता है।

3. पदच्छेद: समानी, वः, आकूतिः, समाना, हृदयानि, वः; समानम्, अस्तु, वः, मनः, यथा, वः, सु, सह, असति।

भावार्थ: सबके संकल्प में सामञ्जस्य हो, हृदय में सौहार्द हो और मन साझा प्रयास में जुड़ें, जिससे संगठन अच्छा बने। यह एकता और शांतिपूर्ण सहजीवन की प्रार्थना है।

सार (Hindi Summary)

‘संगच्छध्वं संवदध्वम्’ पाठ का आरम्भ विद्यालय के क्रीड़ोत्सव के एक रोचक प्रसंग से होता है। फुटबॉल (पादकन्दुक-क्रीडा) में विजयी छात्र अपने आचार्य के पास आते हैं। आचार्य उन्हें बधाई देते हुए विजय का कारण पूछते हैं। छात्र बताते हैं कि उनके दल में परस्पर पूर्ण सामञ्जस्य एवं सहयोग था, जबकि विपक्षी दल में मनोभेद तथा द्वेष-भाव था और वे एक-दूसरे का सहयोग नहीं कर सके। इसी से आचार्य यह शिक्षा देते हैं कि किसी भी कार्य में सफलता के लिए मिलकर काम करना, एकता एवं परस्पर सामञ्जस्य आवश्यक है।

यही संदेश वेद में हजारों वर्ष पूर्व ‘संगच्छध्वं संवदध्वम्’ के रूप में दिया गया है। यह ऋग्वेद के दशम मण्डल के अन्तिम संज्ञान-सूक्त (संघटन-सूक्त) से लिया गया है। आचार्य छात्रों को पाठ में बताई विधि के अनुसार एकाग्रचित्त होकर एवं सम्मिलित स्वर में इन मन्त्रों का सस्वर उच्चारण कराते हैं। तीनों मन्त्रों का मूल भाव एक ही है – हे मनुष्यो! तुम सब मिलकर चलो, एक स्वर में बोलो और अपने मन को परस्पर एक करो। जैसे सृष्टि के आरम्भ में देवगण (अग्नि, वायु, आदित्य आदि ब्रह्माण्डीय शक्तियाँ) अपना-अपना कर्तव्य उत्कृष्ट समन्वय के साथ निभाते थे, वैसे ही मनुष्यों को भी परिवार, समाज एवं राष्ट्र की प्रगति के लिए मिलकर कार्य करना चाहिए।

दूसरे एवं तीसरे मन्त्र में कवि-ऋषि कामना करते हैं कि सबका चिन्तन (मन्त्र) समान हो, सबकी सभा (समिति) एवं लक्ष्य समान हो, मन एवं बुद्धि एकीभूत हों, संकल्प (आकूति) एक हो तथा हृदय सामरस्यपूर्ण हों। ऐसा होने पर ही परिवार, समाज, राष्ट्र एवं समस्त विश्व में सुख, शान्ति एवं मैत्री-भाव बना रहता है। संक्षेप में, यह पाठ हमें एकता, सहयोग, समानता एवं संघटित जीवन की प्रेरणा देता है, जिसमें सुख, शान्ति और मिलकर प्रगति करने की कामना है। यह धार्मिक-साहित्यिक भावार्थ है, स्वास्थ्य या विजय की निश्चित गारंटी नहीं।

विद्यालय के हरे मैदान में तीन विद्यार्थी फुटबॉल का पास देकर मिलकर अभ्यास करते हैं
मौलिक कल्पनात्मक चित्र: पादकन्दुक-क्रीडा में तालमेल और सहयोग पाठ के आरम्भिक संवाद का मुख्य संदेश है।

शब्दार्थ (Word-meanings)

शब्दः (Sanskrit)हिन्दी अर्थEnglish meaning
संगच्छध्वम्मिलकर चलोMay you walk together
संवदध्वम्सहमतिपूर्वक (एक स्वर में) बोलोMay you speak in one voice
समवेतस्वरेणसम्मिलित ध्वनि सेBy chanting in unison
मनांसिमनों कोMinds
जानताम्जानेंMay you know
देवाःसृष्टि की मूलभूत/ब्रह्माण्डीय शक्तियाँCosmic forces & celestial phenomena
संजानानाःएक विचार वाले होकरBeing amicable / of one accord
उपासतेश्रद्धापूर्वक कर्तव्य-निर्वहण करते हैंDevotedly performing (duty)
अभ्युदयम्लौकिक उन्नति, अभिवृद्धिElevation and prosperity
मन्त्रःचिन्तन, विचारContemplation
समितिःसमान सिद्धि/प्राप्ति, सभाCommon resolutions / assembly
वःतुम्हारे (युष्मभ्यम्)For you / your
अभिमन्त्रयेअभिमन्त्रित करके प्रचारित करता हूँ(I) consecrate and propagate
हविषाप्रार्थनापूर्वक / यज्ञाहुति द्वाराBy oblatory prayers
जुहोमिदिव्य यज्ञ-कर्म साधता/ती हूँPerforming Yajña & divine offerings
आकूतिःसंकल्पResolution / intention
हृदयानिहृदय (बहुवचन)Hearts
सु सह असतिसुसंघटित होMay you be well united
संहितामूल वैदिक मन्त्र-पाठOriginal Vedic text
ब्रह्मणासृष्टि के निर्माता (परमात्मा) के द्वाराBy the creator of the universe
निरवहन्निर्वाह कियाTook responsibility

अभ्यासः (अभ्यासात् जायते सिद्धिः)

1. संज्ञानसूक्तं सस्वरं पठत स्मरत लिखत च ।

उत्तरयह अभ्यास-कार्य है। संज्ञान-सूक्त के तीनों मन्त्रों (संगच्छध्वं संवदध्वम्…, समानो मन्त्रः…, समानी व आकूतिः…) को शुद्ध उच्चारण के साथ सस्वर पढ़ें, कण्ठस्थ करें तथा शुद्ध-शुद्ध लिखकर अभ्यास करें। मन्त्र पाठ करते समय सन्धि, मात्रा एवं विसर्ग का विशेष ध्यान रखें।

2. अधोलिखितानां प्रश्नानाम् उत्तराणि पूर्णवाक्येन लिखत —

(क) सर्वेषां मनः कीदृशं भवेत् ?

उत्तरसर्वेषां मनः समानम् (सामञ्जस्ययुतम् एकरूपं) भवेत् ।

(ख) सङ्गच्छध्वं संवदध्वम् इत्यस्य कः अभिप्रायः ?

उत्तरसङ्गच्छध्वं संवदध्वम् इत्यस्य अभिप्रायः अस्ति – मानवाः सर्वे मिलित्वा अग्रे गच्छन्तु, परस्परं सहमतिपूर्वकम् एकस्वरेण वदन्तु च । अर्थात् सबको मिलकर चलना चाहिए तथा एक स्वर में (सहमति से) बोलना चाहिए ।

(ग) सर्वे किं परित्यज्य ऐक्यभावेन जीवेयुः ?

उत्तरसर्वे वैमनस्यं (मनोभेदं द्वेषभावं च) परित्यज्य ऐक्यभावेन जीवेयुः ।

(घ) अस्मिन् पाठे का प्रेरणा अस्ति ?

उत्तरअस्मिन् पाठे एकतायाः परस्परसहयोगस्य सामञ्जस्यस्य च प्रेरणा अस्ति। अयं पाठः ऐक्यभावेन जीवनस्य प्रेरणां ददाति।

3. रेखाङ्कितपदानि आधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत —

(मूल वाक्य में रेखांकित पद के आधार पर उपयुक्त प्रश्नवाचक पद लगाकर प्रश्न बनाइए।)

वाक्यम् (रेखाङ्कित पद मोटे अक्षरों में)प्रश्ननिर्माणम्
(क) परमेश्वरः सर्वत्र व्याप्तः अस्ति ।कः सर्वत्र व्याप्तः अस्ति ?
(ख) वयम् ईश्वरं नमामः ।वयं कं नमामः ?
(ग) वयम् ऐक्यभावेन जीवामः ।वयं कथम् जीवामः ?
(घ) ईश्वरस्य प्रार्थनया शान्तिः प्राप्यते ।कस्य प्रार्थनया शान्तिः प्राप्यते ?
(ङ) अहं समाजाय श्रमं करोमि ।अहं कस्मै श्रमं करोमि ?
(च) अयं पाठः ऋग्वेदात् सङ्कलितः ।अयं पाठः कस्मात् सङ्कलितः ?
(छ) वेदस्य अपरं नाम श्रुतिः ।कस्य अपरं नाम श्रुतिः ?
(ज) मन्त्राः वेदेषु भवन्ति ।मन्त्राः कुत्र भवन्ति ?

प्रश्न मूल पुस्तक में रेखाङ्कित पद के लिए बनाए गए हैं: परमेश्वरः → कः, ईश्वरस्य → कस्य, वेदस्य → कस्य। सर्वत्र या श्रुतिः को रेखाङ्कित मानने पर प्रश्न बदल जाएगा।

4. पट्टिकातः शब्दान् चित्वा अधोलिखितेषु मन्त्रेषु रिक्तस्थानानि पूरयत —

पट्टिका (शब्द-मञ्जूषा): संवदध्वं, समितिः, आकूतिः, भागं, मनः, हृदयानि, जानाना, समानं, मनो, हविषा, सुसहासति, मनांसि

उत्तर (क) सङ्गच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम् ।
देवा भागं यथा पूर्वे सं जानाना उपासते ।
(ख) समानो मन्त्रः समितिः समानी समानं मनः सह चित्तमेषाम् ।
समानं मन्त्रमभिमन्त्रये वः समानेन वो हविषा जुहोमि ।
(ग) समानी व आकूतिः समाना हृदयानि वः ।
समानमस्तु वो मनो यथा वः सुसहासति ।

5. पाठे प्रयुक्तान् शब्दान् भावानुसारं परस्परं योजयत —

(पाठ में प्रयुक्त शब्दों का भाव/अर्थ के अनुसार मिलान कीजिए। स्तंभ ‘क’ के शब्द एवं स्तंभ ‘ख’ के अर्थ नीचे दिए गए हैं।)

स्तंभ ‘क’ (शब्दः)स्तंभ ‘ख’ (दत्त-विकल्पाः)
(क) संगच्छध्वम्सेवन्ते
(ख) संवदध्वम्चित्तम्
(ग) मनःमिलित्वा चलत
(घ) उपासतेसङ्कल्पः
(ङ) वसूनिसमस्तानि
(च) विश्वानिएकस्वरेण वदत
(छ) आकूतिःधनानि
सही मिलान (उत्तर) (क) संगच्छध्वम् → मिलित्वा चलत (मिलकर चलो) (ख) संवदध्वम् → एकस्वरेण वदत (एक स्वर में बोलो) (ग) मनः → चित्तम् (मन/चित्त) (घ) उपासते → सेवन्ते (सेवा/उपासना करते हैं) (ङ) वसूनि → धनानि (धन) (च) विश्वानि → समस्तानि (समस्त/सभी) (छ) आकूतिः → सङ्कल्पः (संकल्प)

6. उदाहरणानुसारेण लट्-लकारस्य वाक्यानि लोट्-लकारेण परिवर्तयत —

यथा – बालिकाः नृत्यन्ति → बालिकाः नृत्यन्तु ।

लट्-लकारः (वर्तमान)लोट्-लकारः (आज्ञार्थ) – उत्तर
(क) बालकाः हसन्तिबालकाः हसन्तु ।
(ख) युवां तत्र गच्छथःयुवां तत्र गच्छतम् ।
(ग) यूयं धावथयूयं धावत ।
(घ) आवां लिखावःआवां लिखाव ।
(ङ) वयं पठामःवयं पठाम ।

अत्र इदम् अवधेयम् (व्याकरण-तालिकाः)

पाठ में ‘अत्र इदम् अवधेयम्’ के अन्तर्गत निम्नलिखित व्याकरण-बिन्दु दिए गए हैं, जिन्हें ध्यानपूर्वक समझना आवश्यक है।

1. ‘सम्’ उपसर्गयुक्त गम्-धातु

सामान्यतया गम्-धातु परस्मैपदी है। किन्तु जब इसमें ‘सम्’ उपसर्ग जुड़ता है, तब इसके आत्मनेपद रूप बनते हैं।
यथा – लट्-लकार में गम्-धातु का परस्मैपद प्रथमपुरुष एकवचन गच्छति है। इस पाठ में सम्-उपसर्गयुक्त आत्मनेपद रूप सङ्गच्छते का अध्ययन है। यह धातु-रूप का परिवर्तन है; केवल ति जोड़ने या दो तैयार शब्द जोड़ने की प्रक्रिया नहीं।

2. गम्-धातोः लोट्-लकारस्य रूपाणि

परस्मैपदम् (गम् → गच्छ)

पुरुषःएकवचनम्द्विवचनम्बहुवचनम्
प्रथमपुरुषःगच्छतुगच्छताम्गच्छन्तु
मध्यमपुरुषःगच्छगच्छतम्गच्छत
उत्तमपुरुषःगच्छानिगच्छावगच्छाम

आत्मनेपदम् (सम् + गम् → संगच्छ)

पुरुषःएकवचनम्द्विवचनम्बहुवचनम्
प्रथमपुरुषःसंगच्छताम्संगच्छेताम्संगच्छन्ताम्
मध्यमपुरुषःसंगच्छस्वसंगच्छेथाम्संगच्छध्वम्
उत्तमपुरुषःसंगच्छैसंगच्छावहैसंगच्छामहै

लोट्-लकार का प्रयोग आज्ञार्थ (यूयम् उत्तिष्ठत), आमन्त्रणार्थ (भवन्तः आगच्छन्तु) तथा आशीर्वादार्थ (आयुष्मान् भव, विजयी भव) में होता है।

3. अस्मद्-युष्मद् शब्दयोः वैकल्पिकरूपाणि

अस्मद्-युष्मद् शब्दों की द्वितीया, चतुर्थी एवं षष्ठी विभक्तियों में वैकल्पिक (दो) रूप बनते हैं।

शब्दः / विभक्तिःपूर्ण रूपवैकल्पिक (लघु) रूप
अस्मद् – द्वितीयाशाधि माम् त्वां प्रपन्नम्शाधि मा त्वा प्रपन्नम्
अस्मद् – चतुर्थीदेहि मह्यं वरदे वरम्देहि मे वरदे वरम्
अस्मद् – षष्ठीत्वमेव सर्वं मम देवदेवत्वमेव सर्वं मे देवदेव
युष्मद् – द्वितीयाअहं त्वां मोक्षयिष्यामिअहं त्वा मोक्षयिष्यामि
युष्मद् – चतुर्थीनमः तुभ्यम् (नमस्तुभ्यम्)नमः ते (नमस्ते)
युष्मद् – षष्ठीशिष्यः तव अहम्शिष्यः ते अहम्

योग्यताविस्तरः & परियोजनाकार्यम्

योग्यताविस्तरः (ज्ञान-विस्तार)

विषयःविवरणम्
वेदाः (4)ऋग्वेदः, यजुर्वेदः, सामवेदः, अथर्ववेदः
ब्राह्मणानिऐतरेयः, शतपथः, सामविधानम्, गोपथः, इत्यादयः
उपनिषदः (प्रसिद्धाः)ईशः, केनः, कठः, प्रश्नः, मुण्डकः, माण्डूक्यः, ऐतरेयः, तैत्तिरीयः, छान्दोग्यः, बृहदारण्यकः, इत्यादयः
उपवेदाःआयुर्वेदः, धनुर्वेदः, गान्धर्ववेदः, अर्थवेदः / स्थापत्यवेदः
षड्-दर्शनानिन्यायः, वैशेषिकम्, साङ्ख्यम्, योगः, पूर्व-मीमांसा, उत्तर-मीमांसा (वेदान्तः)
वेदाङ्गानिशिक्षा, व्याकरणम्, छन्दः, निरुक्तम्, ज्योतिषम्, कल्पः
ऋग्वेदः (पुस्तक का परिचय)पुस्तक में दी मन्त्र-संख्या १०,५५२; विभाजन – (1) मण्डलक्रमः (१० मण्डल, ८५ अनुवाक, १,०२८ सूक्त) (2) अष्टकक्रमः (८ अष्टक, ६४ अध्याय)
पाठस्य आधारःऋग्वेद के दशम मण्डल का अन्तिम (१०.१९१) सूक्त – ‘संज्ञान-सूक्तम्’/‘संघटन-सूक्तम्’

परियोजनाकार्यम् (Project Work)

1. अस्य सूक्तस्य भावार्थं मित्रैः सह मातृभाषया चर्चयत ।

मार्गदर्शनम्यह समूह-गतिविधि है। संज्ञान-सूक्त के भावार्थ – ‘मिलकर चलो, मिलकर बोलो, मन को एक करो’ – पर अपने मित्रों के साथ अपनी मातृभाषा (हिन्दी आदि) में चर्चा कीजिए तथा एकता के लाभों के उदाहरण साझा कीजिए।

2. संज्ञानसूक्तम् इव ऋग्वेदस्य पञ्चानां सूक्तानां नामानि लिखत ।

उत्तर (नमूना)ऋग्वेद के पाँच प्रसिद्ध सूक्त – (1) नासदीय-सूक्तम् (2) पुरुष-सूक्तम् (3) हिरण्यगर्भ-सूक्तम् (4) अक्ष-सूक्तम् (5) नदी-सूक्तम् (अन्य – देवी-सूक्तम्, सरस्वती-सूक्तम् आदि)।

3. संज्ञानसूक्तस्य आधारेण भवत्सु एकतां स्थापयितुं विविधान् उपायान् अध्यापकैः सह आलोचयत ।

मार्गदर्शनम्कक्षा में एकता स्थापित करने के उपायों पर अध्यापक के साथ विचार कीजिए, जैसे – समूह में मिलकर कार्य करना, सबकी बात सुनना एवं सम्मान देना, झगड़े/द्वेष से बचना, सामूहिक खेल एवं प्रोजेक्ट करना तथा एक-दूसरे की सहायता करना।

अतिरिक्त प्रश्न, MCQ और अभिकथन-कारण ClearStudy के पुनरावृत्ति-अभ्यास हैं; वे मूल NCERT अभ्यास से अलग हैं।

अतिरिक्त प्रश्न (Extra Questions)

अतिरिक्त लघु प्रश्न — ClearStudy अभ्यास

1. यह पाठ किस वेद एवं किस सूक्त से लिया गया है?

उत्तरयह पाठ ऋग्वेद के दशम मण्डल के अन्तिम (१०.१९१) सूक्त से लिया गया है, जो ‘संज्ञान-सूक्त’ अथवा ‘संघटन-सूक्त’ के नाम से प्रसिद्ध है। इसके ऋषि आङ्गिरस माने जाते हैं।

2. पाठ के आरम्भ में दिए गए संवाद का मुख्य भाव क्या है?

उत्तरसंवाद में फुटबॉल-विजेता छात्र आचार्य को बताते हैं कि उनके दल की एकता एवं परस्पर सामञ्जस्य ने उन्हें विजय दिलाई, जबकि विपक्षी दल में मनोभेद एवं द्वेष था। इससे यह शिक्षा मिलती है कि सफलता के लिए मिलकर कार्य करना आवश्यक है।

3. प्रथम मन्त्र में देवों का उदाहरण क्यों दिया गया है?

उत्तरपाठ की वैदिक व्याख्या में देवगण का उदाहरण दिया गया है कि जैसे (अग्नि, वायु, आदित्य आदि शक्तियाँ) अपना-अपना कर्तव्य उत्कृष्ट समन्वय एवं एकता से निभाते थे, वैसे ही मनुष्यों को भी मिलकर एवं समान मन से कार्य करना चाहिए।

4. ‘सम्’ उपसर्ग गम्-धातु के रूप को किस प्रकार बदल देता है?

उत्तरगम्-धातु सामान्यतः परस्मैपदी है (गच्छति)। किन्तु ‘सम्’ उपसर्ग जुड़ने पर यह आत्मनेपदी हो जाता है, जैसे – सम् + गम् का यहाँ दिया आत्मनेपद रूप सङ्गच्छते।

5. तीसरे मन्त्र में ऋषि की क्या कामना है?

उत्तरतीसरे मन्त्र में ऋषि कामना करते हैं कि सबका संकल्प (आकूति) समान हो, हृदय सामरस्यपूर्ण हों तथा मन एकरूप हो, ताकि सभी सुसंघटित होकर सुखपूर्वक जीवन जिएँ।

अतिरिक्त व्याख्यात्मक प्रश्न — ClearStudy अभ्यास

6. ‘संगच्छध्वं संवदध्वम्’ पाठ का केन्द्रीय संदेश अपने शब्दों में लिखिए।

उत्तरइस पाठ का केन्द्रीय संदेश एकता एवं सहयोग है। ऋग्वेद के संज्ञान-सूक्त के तीन मन्त्रों के माध्यम से ऋषि मनुष्यों को प्रेरणा देते हैं कि वे मिलकर चलें, एक स्वर में बोलें तथा अपने मन को परस्पर एक करें। जैसे सृष्टि के आरम्भ में देवगण समन्वय एवं एकता से अपना कर्तव्य निभाते थे, वैसे ही मनुष्यों को परिवार, समाज एवं राष्ट्र की प्रगति के लिए मिलकर कार्य करना चाहिए।मन्त्र कामना करते हैं कि सबका चिन्तन, संकल्प, मन एवं हृदय समान हों। मनोभेद एवं द्वेष का त्याग करने पर ही परिवार, समाज एवं विश्व में सुख, शान्ति एवं मैत्री बनी रहती है। पाठ के आरम्भ का खेल-प्रसंग भी यही सिद्ध करता है कि एकता ही विजय एवं समृद्धि का आधार है।

7. पाठ में आए संवाद-प्रसंग के आधार पर एकता एवं सहयोग के महत्त्व को स्पष्ट कीजिए।

उत्तरपाठ का आरम्भ विद्यालय के क्रीड़ोत्सव से होता है। फुटबॉल में विजयी छात्र आचार्य को बताते हैं कि उनकी जीत का कारण दल में परस्पर सामञ्जस्य, समझ एवं सहयोग था। दूसरी ओर विपक्षी दल हार गया क्योंकि उसके खिलाड़ियों में मनोभेद एवं द्वेष-भाव था और वे एक-दूसरे का सहयोग नहीं कर सके।इस प्रसंग से स्पष्ट होता है कि किसी भी कार्य में सफलता केवल व्यक्तिगत कौशल से नहीं, बल्कि सामूहिक एकता एवं सहयोग से मिलती है। यही वेद का संदेश ‘संगच्छध्वं संवदध्वम्’ है – मिलकर चलो एवं मिलकर बोलो। परिवार, विद्यालय, समाज एवं राष्ट्र – सर्वत्र एकता एवं सहयोग ही उन्नति, शान्ति एवं समृद्धि का मूल आधार है।

8. वेद किसे कहते हैं? वेदों एवं उनके अंगों का संक्षिप्त परिचय दीजिए।

उत्तरवेद प्राचीन भारतीय ज्ञान-परम्परा के महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ हैं। इस परम्परा में इन्हें ‘साक्षात् ब्रह्म के मुख से निःसृत दैवी वाणी’ तथा ‘श्रुति’ भी कहा जाता है। वेद चार हैं – ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद एवं अथर्ववेद।वेदों के सहायक ग्रन्थों में ब्राह्मण (ऐतरेय, शतपथ आदि) तथा उपनिषद् (ईश, केन, कठ आदि) आते हैं। चार उपवेद हैं – आयुर्वेद, धनुर्वेद, गान्धर्ववेद एवं स्थापत्यवेद। छह वेदाङ्ग हैं – शिक्षा, व्याकरण, छन्द, निरुक्त, ज्योतिष एवं कल्प, तथा यहाँ दिए छह आस्तिक दर्शन हैं – न्याय, वैशेषिक, साङ्ख्य, योग, पूर्व-मीमांसा एवं उत्तर-मीमांसा। प्रस्तुत पाठ ऋग्वेद के दशम मण्डल के संज्ञान-सूक्त से लिया गया है।

MCQ & अभिकथन-कारण

1. यह पाठ किस वेद से संकलित है?

(क) यजुर्वेदात्

(ख) सामवेदात्

(ग) ऋग्वेदात्

(घ) अथर्ववेदात्

उत्तर(ग) ऋग्वेदात्।

2. इस सूक्त का प्रसिद्ध नाम क्या है?

(क) पुरुष-सूक्तम्

(ख) संज्ञान-सूक्तम् (संघटन-सूक्तम्)

(ग) नासदीय-सूक्तम्

(घ) नदी-सूक्तम्

उत्तर(ख) संज्ञान-सूक्तम् (संघटन-सूक्तम्)।

3. ‘संगच्छध्वम्’ का अर्थ है—

(क) एक स्वर में बोलो

(ख) मिलकर चलो

(ग) मन को जानो

(घ) सेवा करो

उत्तर(ख) मिलकर चलो।

4. इस पाठ में कितने मन्त्र दिए गए हैं?

(क) दो

(ख) तीन

(ग) चार

(घ) पाँच

उत्तर(ख) तीन।

5. ‘सम्’ उपसर्ग जुड़ने पर गम्-धातु किस पद का हो जाता है?

(क) परस्मैपद

(ख) आत्मनेपद

(ग) उभयपद

(घ) कोई परिवर्तन नहीं

उत्तर(ख) आत्मनेपद। (सम् + गम् का यहाँ दिया आत्मनेपद रूप सङ्गच्छते)

6. ‘आकूतिः’ शब्द का अर्थ है—

(क) हृदय

(ख) संकल्प

(ग) धन

(घ) मन्त्र

उत्तर(ख) संकल्प।

7. पाठ के संवाद में छात्रों ने किस खेल में विजय प्राप्त की थी?

(क) कन्दुक-क्रीडा (बास्केटबॉल)

(ख) पादकन्दुक-क्रीडा (फुटबॉल)

(ग) दौड़

(घ) कुश्ती

उत्तर(ख) पादकन्दुक-क्रीडा (फुटबॉल)।

8. यह सूक्त ऋग्वेद के किस मण्डल में है?

(क) प्रथम मण्डल

(ख) सप्तम मण्डल

(ग) दशम (अन्तिम) मण्डल

(घ) नवम मण्डल

उत्तर(ग) दशम (अन्तिम) मण्डल। (सूक्त संख्या १०.१९१)

9. ‘देवाः’ शब्द से यहाँ क्या तात्पर्य है?

(क) केवल मन्दिर की मूर्तियाँ

(ख) ब्रह्माण्डीय/सृष्टि की मूलभूत शक्तियाँ

(ग) राजा-महाराजा

(घ) ऋषि-मुनि

उत्तर(ख) ब्रह्माण्डीय/सृष्टि की मूलभूत शक्तियाँ (अग्नि, वायु, आदित्य आदि)।

10. इस पाठ की मुख्य प्रेरणा क्या है?

(क) धन-संचय

(ख) एकता एवं सहयोग

(ग) प्रतिस्पर्धा एवं द्वेष

(घ) एकान्तवास

उत्तर(ख) एकता एवं सहयोग।
उत्तर-कुंजी: 1-(ग), 2-(ख), 3-(ख), 4-(ख), 5-(ख), 6-(ख), 7-(ख), 8-(ग), 9-(ख), 10-(ख)

अभिकथन-कारण – नीचे अभिकथन (A) और कारण (R) दिए गए हैं। सही विकल्प चुनिए—
(क) A और R दोनों सही, R, A की सही व्याख्या है। (ख) A और R दोनों सही, पर R, A की सही व्याख्या नहीं। (ग) A सही, R गलत। (घ) A गलत, R सही।

1. अभिकथन (A): ‘संगच्छध्वं संवदध्वम्’ पाठ एकता एवं सहयोग का संदेश देता है।

कारण (R): यह पाठ ऋग्वेद के संज्ञान-सूक्त (संघटन-सूक्त) पर आधारित है, जो मिलकर चलने एवं समान मन रखने की प्रेरणा देता है।

उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है।

2. अभिकथन (A): ‘सम्’ उपसर्गयुक्त गम्-धातु के आत्मनेपद रूप बनते हैं।

कारण (R): गम्-धातु सदैव केवल परस्मैपदी ही रहती है, उपसर्ग से कोई परिवर्तन नहीं होता।

उत्तर(ग) A सही है, किन्तु R गलत है – ‘सम्’ उपसर्ग जुड़ने पर गम्-धातु आत्मनेपदी हो जाती है (सङ्गच्छते)।

3. अभिकथन (A): विपक्षी दल खेल में पराजित हो गया।

कारण (R): विपक्षी दल के खिलाड़ियों में परस्पर मनोभेद एवं द्वेष-भाव था और उन्होंने सहयोग नहीं किया।

उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है।

4. अभिकथन (A): यह सूक्त ऋग्वेद के दशम मण्डल का अन्तिम सूक्त है।

कारण (R): पुस्तक के अनुसार दशम मण्डल में १९१ सूक्त हैं और इस सूक्त का क्रमांक १०.१९१ है।

उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है।

5. अभिकथन (A): तीसरे मन्त्र में सबके मन के समान होने की कामना है।

कारण (R): समान मन एवं सामरस्यपूर्ण हृदय से ही संघटन शोभन एवं सुसंगठित बनता है।

उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है।

परीक्षा-सुझाव एवं सामान्य त्रुटियाँ

परीक्षा-सुझाव (Exam Tips)

  • तीनों मन्त्र कण्ठस्थ करें – मन्त्र-लेखन एवं रिक्तस्थान-पूर्ति के अभ्यास में उनकी सहायता मिलेगी।
  • शब्दार्थ (संगच्छध्वम्, संवदध्वम्, आकूतिः, हविषा, उपासते आदि) हिन्दी एवं अंग्रेज़ी दोनों में याद रखें।
  • गम्-धातु लोट्-लकार के परस्मैपद एवं आत्मनेपद दोनों रूप तालिका सहित याद करें।
  • ‘पूर्णवाक्येन उत्तरम्’ वाले प्रश्नों में पूरा वाक्य लिखें, केवल एक शब्द नहीं।
  • प्रश्ननिर्माण में रेखांकित पद के अनुसार सही प्रश्नवाचक शब्द (कः, किम्, कुत्र, कस्मात्, केन) चुनें।

सामान्य त्रुटियाँ (Common Mistakes)

  • सन्धि-विच्छेद की भूल – ‘सुसहासति’ को ‘सु सह असति’ ही पदच्छेद करें।
  • ‘सङ्गच्छते’ को परस्मैपद रूप (सङ्गच्छति) लिख देना – यह आत्मनेपदी है।
  • मात्रा एवं विसर्ग की अशुद्धि – मनांसि, हविषा, आकूतिः को शुद्ध लिखें।
  • लोट्-लकार में पुरुष-वचन का मिलान न करना (यथा – यूयं धावत, आवां लिखाव)।
  • पाठ को गलती से यजुर्वेद/अथर्ववेद से बताना – यह ऋग्वेद के संज्ञान-सूक्त से है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

दीपकम् कक्षा 8 का पहला पाठ ‘संगच्छध्वं संवदध्वम्’ किस वेद से लिया गया है?

यह पाठ ऋग्वेद के दशम मण्डल के अन्तिम (१०.१९१) सूक्त ‘संज्ञान-सूक्त’ (संघटन-सूक्त) से लिया गया है, जिसके ऋषि आङ्गिरस माने जाते हैं।

‘संगच्छध्वं संवदध्वम्’ का अर्थ क्या है?

इसका अर्थ है – ‘मिलकर चलो और एक स्वर में (सहमति से) बोलो’। यह मनुष्यों को एकता, सहयोग एवं समान चिन्तन की प्रेरणा देता है।

इस पाठ में कुल कितने मन्त्र हैं और उनका मुख्य भाव क्या है?

पाठ में तीन मन्त्र हैं। तीनों का मुख्य भाव एक ही है – मनुष्यों को मिलकर चलना, एक स्वर में बोलना, मन-हृदय एवं संकल्प को समान रखना चाहिए, जिससे परिवार, समाज एवं राष्ट्र में सुख, शान्ति एवं समृद्धि बनी रहे।

पाठ्यपुस्तक संदर्भ: NCERT दीपकम्, कक्षा 8, पाठ 1, पृष्ठ 1–9; उपलब्ध प्रति का पुनर्मुद्रण 2026–27। उत्तर और व्याख्याएँ ClearStudy की मौलिक शिक्षण सामग्री हैं; खुली गतिविधियों के उत्तर नमूने हैं। आधिकारिक NCERT पुस्तक पोर्टल।

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