Class 8 Sanskrit Deepakam Chapter 1 Solutions (NCERT 2026–27) – संगच्छध्वं संवदध्वम्
This page gives the complete solution for Class 8 Sanskrit Deepakam (दीपकम्) Chapter 1 ‘संगच्छध्वं संवदध्वम्’ – the three mantras of the Rigvedic ‘संज्ञान-सूक्त’ (संघटन-सूक्त) with their मूल पाठ, सार (Hindi summary), शब्दार्थ, and original, exam-ready answers to every question of the अभ्यास (अभ्यासात् जायते सिद्धिः) along with the धातुरूप / विभक्ति tables, extra questions, MCQs, अभिकथन-कारण and FAQs.
- पाठ का अवलोकन (Chapter Overview)
- पाठ-परिचय / प्रसंग
- मूल मन्त्राः
- सार (Hindi Summary)
- शब्दार्थ (Word-meanings)
- अभ्यासः (अभ्यासात् जायते सिद्धिः)
- अत्र इदम् अवधेयम् (व्याकरण-तालिकाः)
- योग्यताविस्तरः & परियोजनाकार्यम्
- अतिरिक्त प्रश्न (Extra Questions)
- MCQ & अभिकथन-कारण
- परीक्षा-सुझाव एवं सामान्य त्रुटियाँ
- अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
पाठ का अवलोकन (Chapter Overview)
दीपकम् कक्षा 8 का प्रथम पाठ ‘संगच्छध्वं संवदध्वम्’ ऋग्वेद के दशम मण्डल के अन्तिम संज्ञान-सूक्त (जिसे संघटन-सूक्त भी कहते हैं) के तीन प्रसिद्ध मन्त्रों पर आधारित है। पाठ का आरम्भ एक संवाद से होता है, जिसमें विद्यालय के क्रीड़ोत्सव में फुटबॉल (पादकन्दुक-क्रीडा) जीतने वाले छात्र आचार्य को बताते हैं कि उनकी विजय का कारण दल में परस्पर सामञ्जस्य एवं एकता था, जबकि विपक्षी दल में मनोभेद एवं द्वेष था। इसी प्रसंग से आचार्य संघटन-सूक्त के मन्त्रों का सस्वर उच्चारण कराते हैं। पाठ का केन्द्रीय भाव एकता, सहयोग, समान चिन्तन एवं समान संकल्प है – “मिलकर चलो, मिलकर बोलो, मन को एक करो।” यह संदेश परिवार, गण, समाज, राष्ट्र एवं समस्त विश्व के लिए समान रूप से उपयोगी है।
पाठ-परिचय / प्रसंग
यह पाठ ऋग्वेद के दशम मण्डल के अन्तिम (१०.१९१) सूक्त से संकलित है, जो ‘संज्ञान-सूक्त’ अथवा ‘संघटन-सूक्त’ के नाम से प्रसिद्ध है। इसके ऋषि आङ्गिरसः माने जाते हैं। वेद को प्राचीन-भारतीय ज्ञान-परम्परा में ‘साक्षात् ब्रह्म के मुख से निःसृत पवित्रतम दैवी वाणी’ माना जाता है। वेद की चार संहिताएँ हैं – ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद एवं अथर्ववेद। प्रस्तुत पाठ में तीन मन्त्र दिए गए हैं जो मनुष्यों को एकता, परस्पर सहमति एवं समान मन से जीवन जीने की प्रेरणा देते हैं।
मूल मन्त्राः
(ओ३म्) – ऋग्वेद के संज्ञान-सूक्त के तीन प्रसिद्ध मन्त्र, ज्यों-के-त्यों।
संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम् ।
देवा भागं यथा पूर्वे संजानाना उपासते ॥ १ ॥
समानो मन्त्रः समितिः समानी समानं मनः सह चित्तमेषाम् ।
समानं मन्त्रमभिमन्त्रये वः समानेन वो हविषा जुहोमि ॥ २ ॥
समानी व आकूतिः समाना हृदयानि वः ।
समानमस्तु वो मनो यथा वः सुसहासति ॥ ३ ॥
— ऋग्वेदः, संज्ञान-सूक्तम् (१०.१९१)
सार (Hindi Summary)
‘संगच्छध्वं संवदध्वम्’ पाठ का आरम्भ विद्यालय के क्रीड़ोत्सव के एक रोचक प्रसंग से होता है। फुटबॉल (पादकन्दुक-क्रीडा) में विजयी छात्र अपने आचार्य के पास आते हैं। आचार्य उन्हें बधाई देते हुए विजय का कारण पूछते हैं। छात्र बताते हैं कि उनके दल में परस्पर पूर्ण सामञ्जस्य एवं सहयोग था, जबकि विपक्षी दल में मनोभेद तथा द्वेष-भाव था और वे एक-दूसरे का सहयोग नहीं कर सके। इसी से आचार्य यह शिक्षा देते हैं कि किसी भी कार्य में सफलता के लिए मिलकर काम करना, एकता एवं परस्पर सामञ्जस्य आवश्यक है।
यही संदेश वेद में हजारों वर्ष पूर्व ‘संगच्छध्वं संवदध्वम्’ के रूप में दिया गया है। यह ऋग्वेद के दशम मण्डल के अन्तिम संज्ञान-सूक्त (संघटन-सूक्त) से लिया गया है। आचार्य छात्रों को शुद्ध वस्त्र पहनकर, एकाग्रचित्त होकर एवं सम्मिलित स्वर में इन मन्त्रों का सस्वर उच्चारण कराते हैं। तीनों मन्त्रों का मूल भाव एक ही है – हे मनुष्यो! तुम सब मिलकर चलो, एक स्वर में बोलो और अपने मन को परस्पर एक करो। जैसे सृष्टि के आरम्भ में देवगण (अग्नि, वायु, आदित्य आदि ब्रह्माण्डीय शक्तियाँ) अपना-अपना कर्तव्य उत्कृष्ट समन्वय के साथ निभाते थे, वैसे ही मनुष्यों को भी परिवार, समाज एवं राष्ट्र की प्रगति के लिए मिलकर कार्य करना चाहिए।
दूसरे एवं तीसरे मन्त्र में कवि-ऋषि कामना करते हैं कि सबका चिन्तन (मन्त्र) समान हो, सबकी सभा (समिति) एवं लक्ष्य समान हो, मन एवं बुद्धि एकीभूत हों, संकल्प (आकूति) एक हो तथा हृदय सामरस्यपूर्ण हों। ऐसा होने पर ही परिवार, समाज, राष्ट्र एवं समस्त विश्व में सुख, शान्ति एवं मैत्री-भाव बना रहता है। संक्षेप में, यह पाठ हमें एकता, सहयोग, समानता एवं संघटित जीवन की प्रेरणा देता है, जिससे जीवन में प्रसन्नता, उत्साह, आरोग्य, विजय, समृद्धि एवं ज्ञान की प्राप्ति होती है।
शब्दार्थ (Word-meanings)
| शब्दः (Sanskrit) | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| संगच्छध्वम् | मिलकर चलो | May you walk together |
| संवदध्वम् | सहमतिपूर्वक (एक स्वर में) बोलो | May you speak in one voice |
| समवेतस्वरेण | सम्मिलित ध्वनि से | By chanting in unison |
| मनांसि | मनों को | Minds |
| जानताम् | जानें | May you know |
| देवाः | सृष्टि की मूलभूत/ब्रह्माण्डीय शक्तियाँ | Cosmic forces & celestial phenomena |
| संजानानाः | एक विचार वाले होकर | Being amicable / of one accord |
| उपासते | श्रद्धापूर्वक कर्तव्य-निर्वहण करते हैं | Devotedly performing (duty) |
| अभ्युदयम् | लौकिक उन्नति, अभिवृद्धि | Elevation and prosperity |
| मन्त्रः | चिन्तन, विचार | Contemplation |
| समितिः | समान सिद्धि/प्राप्ति, सभा | Common resolutions / assembly |
| वः | तुम्हारे (युष्मभ्यम्) | For you / your |
| अभिमन्त्रये | अभिमन्त्रित करके प्रचारित करता हूँ | (I) consecrate and propagate |
| हविषा | प्रार्थनापूर्वक / यज्ञाहुति द्वारा | By oblatory prayers |
| जुहोमि | दिव्य यज्ञ-कर्म साधता/ती हूँ | Performing Yajña & divine offerings |
| आकूतिः | संकल्प | Resolution / intention |
| हृदयानि | हृदय (बहुवचन) | Hearts |
| सु सह असति | सुसंघटित हो | May you be well united |
| संहिता | मूल वैदिक मन्त्र-पाठ | Original Vedic text |
| ब्रह्मणा | सृष्टि के निर्माता (परमात्मा) के द्वारा | By the creator of the universe |
| निरवहन् | निर्वाह किया | Took responsibility |
अभ्यासः (अभ्यासात् जायते सिद्धिः)
1. संज्ञानसूक्तं सस्वरं पठत स्मरत लिखत च ।
2. अधोलिखितानां प्रश्नानाम् उत्तराणि पूर्णवाक्येन लिखत —
(क) सर्वेषां मनः कीदृशं भवेत् ?
(ख) सङ्गच्छध्वं संवदध्वम् इत्यस्य कः अभिप्रायः ?
(ग) सर्वे किं परित्यज्य ऐक्यभावेन जीवेयुः ?
(घ) अस्मिन् पाठे का प्रेरणा अस्ति ?
3. रेखाङ्कितपदानि आधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत —
(मूल वाक्य में रेखांकित पद के आधार पर उपयुक्त प्रश्नवाचक पद लगाकर प्रश्न बनाइए।)
| वाक्यम् (रेखाङ्कित पद मोटे अक्षरों में) | प्रश्ननिर्माणम् |
|---|---|
| (क) परमेश्वरः सर्वत्र व्याप्तः अस्ति । | परमेश्वरः कुत्र व्याप्तः अस्ति ? |
| (ख) वयम् ईश्वरं नमामः । | वयं कं नमामः ? |
| (ग) वयम् ऐक्यभावेन जीवामः । | वयं केन भावेन (कथं) जीवामः ? |
| (घ) ईश्वरस्य प्रार्थनया शान्तिः प्राप्यते । | कया (केन उपायेन) शान्तिः प्राप्यते ? |
| (ङ) अहं समाजाय श्रमं करोमि । | अहं कस्मै श्रमं करोमि ? |
| (च) अयं पाठः ऋग्वेदात् सङ्कलितः । | अयं पाठः कस्मात् सङ्कलितः ? |
| (छ) वेदस्य अपरं नाम श्रुतिः । | वेदस्य अपरं नाम किम् ? |
| (ज) मन्त्राः वेदेषु भवन्ति । | मन्त्राः कुत्र भवन्ति ? |
4. पट्टिकातः शब्दान् चित्वा अधोलिखितेषु मन्त्रेषु रिक्तस्थानानि पूरयत —
पट्टिका (शब्द-मञ्जूषा): संवदध्वं, समितिः, आकूतिः, भागं, मनः, हृदयानि, जानाना, समानं, मनो, हविषा, सुसहासति, मनांसि
देवा भागं यथा पूर्वे सं जानाना उपासते । (ख) समानो मन्त्रः समितिः समानी समानं मनः सह चित्तमेषाम् ।
समानं मन्त्रमभिमन्त्रये वः समानेन वो हविषा जुहोमि । (ग) समानी व आकूतिः समाना हृदयानि वः ।
समानमस्तु वो मनो यथा वः सुसहासति ।
5. पाठे प्रयुक्तान् शब्दान् भावानुसारं परस्परं योजयत —
(पाठ में प्रयुक्त शब्दों का भाव/अर्थ के अनुसार मिलान कीजिए। स्तंभ ‘क’ के शब्द एवं स्तंभ ‘ख’ के अर्थ नीचे दिए गए हैं।)
| स्तंभ ‘क’ (शब्दः) | स्तंभ ‘ख’ (दत्त-विकल्पाः) |
|---|---|
| (क) संगछध्वम् | सेवन्ते |
| (ख) संवदध्वम् | चित्तम् |
| (ग) मनः | मिलित्वा चलत |
| (घ) उपासते | सङ्कल्पः |
| (ङ) वसूनि | समस्तानि |
| (च) विश्वानि | एकस्वरेण वदत |
| (छ) आकूतिः | धनानि |
6. उदाहरणानुसारेण लट्-लकारस्य वाक्यानि लोट्-लकारेण परिवर्तयत —
यथा – बालिकाः नृत्यन्ति → बालिकाः नृत्यन्तु ।
| लट्-लकारः (वर्तमान) | लोट्-लकारः (आज्ञार्थ) – उत्तर |
|---|---|
| (क) बालकाः हसन्ति | बालकाः हसन्तु । |
| (ख) युवां तत्र गच्छथः | युवां तत्र गच्छतम् । |
| (ग) यूयं धावथ | यूयं धावत । |
| (घ) आवां लिखावः | आवां लिखाव । |
| (ङ) वयं पठामः | वयं पठाम । |
अत्र इदम् अवधेयम् (व्याकरण-तालिकाः)
पाठ में ‘अत्र इदम् अवधेयम्’ के अन्तर्गत निम्नलिखित व्याकरण-बिन्दु दिए गए हैं, जिन्हें ध्यानपूर्वक समझना आवश्यक है।
1. ‘सम्’ उपसर्गयुक्त गम्-धातु
सामान्यतया गम्-धातु परस्मैपदी है। किन्तु जब इसमें ‘सम्’ उपसर्ग जुड़ता है, तब इसके आत्मनेपद रूप बनते हैं।
यथा – गम् + ति = गच्छति । सम् + गच्छति = सङ्गच्छते ।
2. गम्-धातोः लोट्-लकारस्य रूपाणि
परस्मैपदम् (गम् → गच्छ)
| पुरुषः | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
|---|---|---|---|
| प्रथमपुरुषः | गच्छतु | गच्छताम् | गच्छन्तु |
| मध्यमपुरुषः | गच्छ | गच्छतम् | गच्छत |
| उत्तमपुरुषः | गच्छानि | गच्छाव | गच्छाम |
आत्मनेपदम् (सम् + गम् → संगच्छ)
| पुरुषः | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
|---|---|---|---|
| प्रथमपुरुषः | संगच्छताम् | संगच्छेताम् | संगच्छन्ताम् |
| मध्यमपुरुषः | संगच्छस्व | संगच्छेथाम् | संगच्छध्वम् |
| उत्तमपुरुषः | संगच्छै | संगच्छावहै | संगच्छामहै |
लोट्-लकार का प्रयोग आज्ञार्थ (यूयम् उत्तिष्ठत), आमन्त्रणार्थ (भवन्तः आगच्छन्तु) तथा आशीर्वादार्थ (आयुष्मान् भव, विजयी भव) में होता है।
3. अस्मद्-युष्मद् शब्दयोः वैकल्पिकरूपाणि
अस्मद्-युष्मद् शब्दों की द्वितीया, चतुर्थी एवं षष्ठी विभक्तियों में वैकल्पिक (दो) रूप बनते हैं।
| शब्दः / विभक्तिः | पूर्ण रूप | वैकल्पिक (लघु) रूप |
|---|---|---|
| अस्मद् – द्वितीया | शाधि माम् त्वां प्रपन्नम् | शाधि मा त्वा प्रपन्नम् |
| अस्मद् – चतुर्थी | देहि मह्यं वरदे वरम् | देहि मे वरदे वरम् |
| अस्मद् – षष्ठी | त्वमेव सर्वं मम देवदेव | त्वमेव सर्वं मे देवदेव |
| युष्मद् – द्वितीया | अहं त्वां मोक्षयिष्यामि | अहं त्वा मोक्षयिष्यामि |
| युष्मद् – चतुर्थी | नमः तुभ्यम् (नमस्तुभ्यम्) | नमः ते (नमस्ते) |
| युष्मद् – षष्ठी | शिष्यः तव अहम् | शिष्यः ते अहम् |
योग्यताविस्तरः & परियोजनाकार्यम्
योग्यताविस्तरः (ज्ञान-विस्तार)
| विषयः | विवरणम् |
|---|---|
| वेदाः (4) | ऋग्वेदः, यजुर्वेदः, सामवेदः, अथर्ववेदः |
| ब्राह्मणानि | ऐतरेयः, शतपथः, सामविधानम्, गोपथः, इत्यादयः |
| उपनिषदः (प्रसिद्धाः) | ईशः, केनः, कठः, प्रश्नः, मुण्डकः, माण्डूक्यः, ऐतरेयः, तैत्तिरीयः, छान्दोग्यः, बृहदारण्यकः, इत्यादयः |
| उपवेदाः | आयुर्वेदः, धनुर्वेदः, गान्धर्ववेदः, अर्थवेदः / स्थापत्यवेदः |
| षड्-दर्शनानि | न्यायः, वैशेषिकम्, साङ्ख्यम्, योगः, पूर्व-मीमांसा, उत्तर-मीमांसा (वेदान्तः) |
| वेदाङ्गानि | शिक्षा, व्याकरणम्, छन्दः, निरुक्तम्, ज्योतिषम्, कल्पः |
| ऋग्वेदः | मन्त्र-संख्या १०,५५२; विभाजन – (1) मण्डलक्रमः (१० मण्डल, ८५ अनुवाक, १,०२८ सूक्त) (2) अष्टकक्रमः (८ अष्टक, ६४ अध्याय) |
| पाठस्य आधारः | ऋग्वेद के दशम मण्डल का अन्तिम (१०.१९१) सूक्त – ‘संज्ञान-सूक्तम्’/‘संघटन-सूक्तम्’ |
परियोजनाकार्यम् (Project Work)
1. अस्य सूक्तस्य भावार्थं मित्रैः सह मातृभाषया चर्चयत ।
2. संज्ञानसूक्तम् इव ऋग्वेदस्य पञ्चानां सूक्तानां नामानि लिखत ।
3. संज्ञानसूक्तस्य आधारेण भवत्सु एकतां स्थापयितुं विविधान् उपायान् अध्यापकैः सह आलोचयत ।
अतिरिक्त प्रश्न (Extra Questions)
लघु उत्तरीय प्रश्न (30–40 शब्द)
1. यह पाठ किस वेद एवं किस सूक्त से लिया गया है?
2. पाठ के आरम्भ में दिए गए संवाद का मुख्य भाव क्या है?
3. प्रथम मन्त्र में देवों का उदाहरण क्यों दिया गया है?
4. ‘सम्’ उपसर्ग गम्-धातु के रूप को किस प्रकार बदल देता है?
5. तीसरे मन्त्र में ऋषि की क्या कामना है?
दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (100–120 शब्द)
6. ‘संगच्छध्वं संवदध्वम्’ पाठ का केन्द्रीय संदेश अपने शब्दों में लिखिए।
7. पाठ में आए संवाद-प्रसंग के आधार पर एकता एवं सहयोग के महत्त्व को स्पष्ट कीजिए।
8. वेद किसे कहते हैं? वेदों एवं उनके अंगों का संक्षिप्त परिचय दीजिए।
MCQ & अभिकथन-कारण
1. यह पाठ किस वेद से संकलित है?
(क) यजुर्वेदात्
(ख) सामवेदात्
(ग) ऋग्वेदात्
(घ) अथर्ववेदात्
2. इस सूक्त का प्रसिद्ध नाम क्या है?
(क) पुरुष-सूक्तम्
(ख) संज्ञान-सूक्तम् (संघटन-सूक्तम्)
(ग) नासदीय-सूक्तम्
(घ) नदी-सूक्तम्
3. ‘संगच्छध्वम्’ का अर्थ है—
(क) एक स्वर में बोलो
(ख) मिलकर चलो
(ग) मन को जानो
(घ) सेवा करो
4. इस पाठ में कितने मन्त्र दिए गए हैं?
(क) दो
(ख) तीन
(ग) चार
(घ) पाँच
5. ‘सम्’ उपसर्ग जुड़ने पर गम्-धातु किस पद का हो जाता है?
(क) परस्मैपद
(ख) आत्मनेपद
(ग) उभयपद
(घ) कोई परिवर्तन नहीं
6. ‘आकूतिः’ शब्द का अर्थ है—
(क) हृदय
(ख) संकल्प
(ग) धन
(घ) मन्त्र
7. पाठ के संवाद में छात्रों ने किस खेल में विजय प्राप्त की थी?
(क) कन्दुक-क्रीडा (बास्केटबॉल)
(ख) पादकन्दुक-क्रीडा (फुटबॉल)
(ग) दौड़
(घ) कुश्ती
8. यह सूक्त ऋग्वेद के किस मण्डल में है?
(क) प्रथम मण्डल
(ख) सप्तम मण्डल
(ग) दशम (अन्तिम) मण्डल
(घ) नवम मण्डल
9. ‘देवाः’ शब्द से यहाँ क्या तात्पर्य है?
(क) केवल मन्दिर की मूर्तियाँ
(ख) ब्रह्माण्डीय/सृष्टि की मूलभूत शक्तियाँ
(ग) राजा-महाराजा
(घ) ऋषि-मुनि
10. इस पाठ की मुख्य प्रेरणा क्या है?
(क) धन-संचय
(ख) एकता एवं सहयोग
(ग) प्रतिस्पर्धा एवं द्वेष
(घ) एकान्तवास
अभिकथन-कारण – नीचे अभिकथन (A) और कारण (R) दिए गए हैं। सही विकल्प चुनिए—
(क) A और R दोनों सही, R, A की सही व्याख्या है। (ख) A और R दोनों सही, पर R, A की सही व्याख्या नहीं। (ग) A सही, R गलत। (घ) A गलत, R सही।
1. अभिकथन (A): ‘संगच्छध्वं संवदध्वम्’ पाठ एकता एवं सहयोग का संदेश देता है।
कारण (R): यह पाठ ऋग्वेद के संज्ञान-सूक्त (संघटन-सूक्त) पर आधारित है, जो मिलकर चलने एवं समान मन रखने की प्रेरणा देता है।
2. अभिकथन (A): ‘सम्’ उपसर्गयुक्त गम्-धातु के आत्मनेपद रूप बनते हैं।
कारण (R): गम्-धातु सदैव केवल परस्मैपदी ही रहती है, उपसर्ग से कोई परिवर्तन नहीं होता।
3. अभिकथन (A): विपक्षी दल खेल में पराजित हो गया।
कारण (R): विपक्षी दल के खिलाड़ियों में परस्पर मनोभेद एवं द्वेष-भाव था और उन्होंने सहयोग नहीं किया।
4. अभिकथन (A): यह सूक्त ऋग्वेद के दशम मण्डल का अन्तिम सूक्त है।
कारण (R): इसका क्रमांक १०.१९१ है और यह संज्ञान-सूक्त के नाम से प्रसिद्ध है।
5. अभिकथन (A): तीसरे मन्त्र में सबके मन के समान होने की कामना है।
कारण (R): समान मन एवं सामरस्यपूर्ण हृदय से ही संघटन शोभन एवं सुसंगठित बनता है।
परीक्षा-सुझाव एवं सामान्य त्रुटियाँ
परीक्षा-सुझाव (Exam Tips)
- तीनों मन्त्र कण्ठस्थ करें – मन्त्र-लेखन एवं रिक्तस्थान-पूर्ति के प्रश्न प्रायः इन्हीं से आते हैं।
- शब्दार्थ (संगच्छध्वम्, संवदध्वम्, आकूतिः, हविषा, उपासते आदि) हिन्दी एवं अंग्रेज़ी दोनों में याद रखें।
- गम्-धातु लोट्-लकार के परस्मैपद एवं आत्मनेपद दोनों रूप तालिका सहित याद करें।
- ‘पूर्णवाक्येन उत्तरम्’ वाले प्रश्नों में पूरा वाक्य लिखें, केवल एक शब्द नहीं।
- प्रश्ननिर्माण में रेखांकित पद के अनुसार सही प्रश्नवाचक शब्द (कः, किम्, कुत्र, कस्मात्, केन) चुनें।
सामान्य त्रुटियाँ (Common Mistakes)
- सन्धि-विच्छेद की भूल – ‘सुसहासति’ को ‘सु सह असति’ ही पदच्छेद करें।
- ‘सङ्गच्छते’ को परस्मैपद रूप (सङ्गच्छति) लिख देना – यह आत्मनेपदी है।
- मात्रा एवं विसर्ग की अशुद्धि – मनांसि, हविषा, आकूतिः को शुद्ध लिखें।
- लोट्-लकार में पुरुष-वचन का मिलान न करना (यथा – यूयं धावत, आवां लिखाव)।
- पाठ को गलती से यजुर्वेद/अथर्ववेद से बताना – यह ऋग्वेद के संज्ञान-सूक्त से है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
दीपकम् कक्षा 8 का पहला पाठ ‘संगच्छध्वं संवदध्वम्’ किस वेद से लिया गया है?
यह पाठ ऋग्वेद के दशम मण्डल के अन्तिम (१०.१९१) सूक्त ‘संज्ञान-सूक्त’ (संघटन-सूक्त) से लिया गया है, जिसके ऋषि आङ्गिरस माने जाते हैं।
‘संगच्छध्वं संवदध्वम्’ का अर्थ क्या है?
इसका अर्थ है – ‘मिलकर चलो और एक स्वर में (सहमति से) बोलो’। यह मनुष्यों को एकता, सहयोग एवं समान चिन्तन की प्रेरणा देता है।
इस पाठ में कुल कितने मन्त्र हैं और उनका मुख्य भाव क्या है?
पाठ में तीन मन्त्र हैं। तीनों का मुख्य भाव एक ही है – मनुष्यों को मिलकर चलना, एक स्वर में बोलना, मन-हृदय एवं संकल्प को समान रखना चाहिए, जिससे परिवार, समाज एवं राष्ट्र में सुख, शान्ति एवं समृद्धि बनी रहे।
मन्त्र, प्रश्न एवं अभ्यास-शीर्षक NCERT दीपकम् पुस्तक से ज्यों-के-त्यों लिए गए हैं; सार, भावार्थ एवं उत्तर ClearStudy द्वारा मौलिक रूप से तैयार किए गए हैं।
