Class 9 Sanskrit Sharada Chapter 10 Solutions (NCERT 2026–27) – णमो अरिहन्ताणम्

This page gives the complete solution for Class 9 Sanskrit Sharada (शारदा) Chapter 10 ‘णमो अरिहन्ताणम्’ – a प्रसे lesson on the life of the first जैन-तीर्थङ्कर ॠषभदेव (आदिनाथ) and the प्राकृत नवकार (णमोकार) महामन्त्र – with its मूल पाठ, सार (Hindi summary), शब्दार्थ, original exam-ready answers to every question of the अभ्यास (अभ्यासाद् जायते सिद्धिः), the प्राकृतभाषा व्याकरण-तालिका, extra questions, MCQs, अभिकथन-कारण and FAQs.

Class: 9 Subject: Sanskrit Book: Sharada (शारदा) Chapter: 10 पाठ: णमो अरिहन्ताणम् Session: 2026–27

पाठ का अवलोकन (Chapter Overview)

शारदा कक्षा 9 का दशम पाठ ‘णमो अरिहन्ताणम्’ जैन-परम्परा के प्रथम तीर्थङ्कर ॠषभदेव (आदिनाथ) की जीवन-कथा एवं प्राकृत भाषा में रचित प्रसिद्ध नवकार (णमोकार) महामन्त्र पर आधारित एक सरस गद्य-पाठ है। महाराज नाभि एवं रानी मरुदेवी के पुत्र ॠषभ राजा बनकर प्रजा को कृषि, वस्त्र-निर्माण, गृह-निर्माण आदि अनेक जीवन-कौशल सिखाते हैं और राज्य को सुभिक्ष बनाते हैं। आगे चलकर एक नर्तकी की अकस्मात् मृत्यु देखकर वे संसार की अनित्यता समझकर सर्वस्व त्यागकर तपस्या में लीन हो जाते हैं तथा अन्ततः केवलज्ञान प्राप्त कर ‘आदिनाथ’ कहलाते हैं। पाठ का केन्द्रीय भाव है – अहिंसा, अपरिग्रह, त्याग, परिश्रम एवं ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भावना, जो नवकार महामन्त्र में मूर्त होती है।

पाठ-परिचय / प्रसंग

यह पाठ जैन-सम्प्रदाय की धर्म-परम्परा एवं प्रथम तीर्थङ्कर ॠषभदेव के जीवन-वृत्त पर आधारित संस्कृत गद्य-कथा है। ॠषभदेव को जैन-मत में ‘आदिनाथ’ कहा जाता है, क्योंकि उन्होंने ही मानव-जाति को कृषि, लिपि, कला एवं व्यवसाय का प्रथम उपदेश दिया। उनकी पुत्री ब्राह्मी द्वारा ‘ब्राह्मी-लिपि’ का विकास माना जाता है। पाठ में जैन-धर्म का परम मन्त्र नवकार (णमोकार) महामन्त्र प्राकृत भाषा में दिया गया है, जो पाँच परमेष्ठियों – अरिहन्त, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय एवं समस्त साधुओं – को नमस्कार करता है। पाठ के साथ जैन-दर्शन के प्रमुख सिद्धान्त (अहिंसा, अनेकान्तवाद, स्याद्वाद, अपरिग्रह) तथा प्राकृत भाषा का व्याकरणिक परिचय भी संयोजित है।

मूल पाठ एवं नवकार-महामन्त्र

(पाठ-कथा गद्यात्मक है; नीचे पाठ में आए दो सुभाषित-श्लोक एवं प्राकृत नवकार-महामन्त्र ज्यों-के-त्यों दिए गए हैं।)

प्रजासुखे सुखं राज्ञः प्रजानां च हिते हितम् ।
नात्मप्रियं हितं राज्ञः प्रजानां तु प्रियं हितम् ॥

दैवाधीनं जगत्सर्वं जन्मकर्मशुभावहम् ।
संयोगश्‍च वियोगश्‍च न च दैवात्परं बलम् ॥
— पाठे उद्धृते सुभाषित-श्लोकौ
नवकार-महामन्त्रः (प्राकृतभाषायाम्)
णमो अरिहन्ताणं,
णमो सिद्धाणं,
णमो आयरियाणं,
णमो उवज्झायाणं,
णमो लोए सव्वसाहूणं ॥
— जैनसम्प्रदायस्य परमपावनः णमोकारमन्त्रः

अर्थः (पाठानुसारम्)

नमामि अरिहन्तॄन्, नमामि सिद्धान्, नमामि आचार्यान्, नमामि उपाध्यायान्, नमामि लोके सर्वसाधून् – अर्थात् ‘मैं अरिहन्तों, सिद्धों, आचार्यों, उपाध्यायों एवं लोक के समस्त साधुओं को नमस्कार करता हूँ’। यह पाँच परमेष्ठियों को प्रणाम-समर्पण करने वाला जैन-धर्म का परम-पावन महामन्त्र है।

सार (Hindi Summary)

युगों के आरम्भ में प्रजावत्सल महाराज नाभि राजनीति, युद्ध-तन्त्र एवं प्रशासन में निपुण थे। उनकी पत्नी मरुदेवी बुद्धिमती एवं करुणाशील थीं। इन्हीं के पुत्र ॠषभ सर्वगुण-सम्पन्न, विद्वान् एवं राजनीतिज्ञ थे। समाज में दुर्भिक्ष एवं परस्पर विद्वेष की समस्याएँ उठने पर नाभि ने ॠषभ को राज्यभार सौंप दिया। राजा बनकर ॠषभ ने समस्याओं के मूल कारण – आलस्य, कृषि की उपेक्षा एवं उत्पादन-क्षमता का अभाव – पहचानकर अनेक योजनाएँ बनाईं। उन्होंने प्रजा को कृषि, भोजन-निर्माण, वस्त्र-निर्माण, पशुपालन, पात्र एवं गृह-निर्माण तथा नगर-निर्माण जैसे जीवन-कौशल सिखाए। फलस्वरूप प्रजा सक्रिय एवं आर्थिक रूप से सुदृढ़ हुई और राज्य पुनः सुभिक्ष बन गया।

ॠषभ ने न्यायिक व्यवस्था एवं सुरक्षा को सुदृढ़ कर ‘विनिता’ नगर बसाया तथा प्रजा का प्रेम पाकर ‘ॠषभदेव’ कहलाए। उनके सौ पुत्रों में भरत एवं बाहुबलि तथा दो पुत्रियाँ ब्राह्मी एवं सुन्दरी विख्यात हुईं; ब्राह्मी द्वारा ब्राह्मी-लिपि का विकास माना जाता है। एक दिन राजप्रासाद में नृत्य करती हुई नर्तकी की अकस्मात् मृत्यु देखकर ॠषभदेव का मन विचलित हो गया और उन्होंने अनुभव किया कि संसार में कुछ भी शाश्वत नहीं। तब उन्होंने अपना साम्राज्य पुत्रों में बाँटकर – विनिता भरत को एवं तक्षशिला बाहुबलि को देकर – सर्वस्व त्यागकर वन में तपस्या आरम्भ की।

दीर्घकालीन उपवास के समय उनके प्रपौत्र श्रेयांस ने उन्हें इक्षु-रस पिलाकर उनका वर्ष-तप तोड़ा; वह वैशाख मास की अक्षय-तृतीया का दिन था, जिसे आज भी ‘वर्षतप-पारणा-महोत्सव’ के रूप में मनाया जाता है। अन्ततः प्रयागराज में अक्षयवट के नीचे ॠषभदेव को केवलज्ञान प्राप्त हुआ और वे जैन-धर्म के प्रथम तीर्थङ्कर ‘आदिनाथ’ कहलाए। उन्होंने भिक्षु, भिक्षुणी, श्रावक एवं श्राविका का जो क्रम बनाया वही ‘जैनसङ्घ’ कहलाता है। जैन-धर्म का परम मन्त्र नवकार-महामन्त्र प्राकृत में रचित है, जो पाँच परमेष्ठियों को नमस्कार करता है। पाठ अहिंसा, अनेकान्तवाद, स्याद्वाद एवं अपरिग्रह जैसे जैन-सिद्धान्तों तथा ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भावना का संदेश देता है।

शब्दार्थ (सर्वं शब्देन भासते)

शब्दः (Sanskrit)हिन्दी अर्थEnglish meaning
अचिन्तयत्विचार कियाConsidered / thought
अधीतविद्यःपढ़ा-लिखा, विद्या-सम्पन्नLearned
अनर्घवस्तूनिअनमोल वस्तुएँPrecious items
अनुयायिनःअनुयायी, अनुगामीFollowers
अनेकान्तवादःसत्य के अनेक पक्षों का सिद्धान्तDoctrine of multiplicity of viewpoints
अपरिग्रहःआवश्यकता से अधिक संग्रह न करनाNon-possession
अरिहन्ताणम्अरिहन्तों का (जितशत्रुओं का)Of the Arihantas (conquerors of foes)
आरम्भेआरम्भ मेंAt the beginning
आलस्यम्आलस्य, प्रमादLaziness
इक्षुक्षेत्रम्गन्ने का खेतSugarcane field
उत्पादनक्षमताउत्पादन की क्षमताProductivity
उपवासःनिराहार-व्रत, उपवासFasting
कठोरतपसाकठोर तप सेWith severe penance
करुणाशालिनीदयालु, दयायुक्ताCompassionate
केवलज्ञानम्पूर्ण ज्ञान, कैवल्य-ज्ञानAbsolute knowledge
तीर्थङ्करःधर्म-मार्ग का प्रदर्शकTirthankara
दुर्भिक्षम्अकालFamine
दैवाधीनम्भाग्य के अधीनDependent on fate
नवकारमन्त्रःनवकार (जैन-प्रार्थना) मन्त्रNavkar mantra
निराहारम्भोजन-रहित, निराहारWithout food
विद्वेषःद्वेष, वैरHatred
शाश्‍वतम्शाश्वत, नित्यEternal
शिलालेखाःशिला-लेख, शिलाओं पर लिखे लेखInscriptions
सङ्घःसमूह, संघCommunity / Union

अभ्यासः (अभ्यासाद् जायते सिद्धिः)

1. एकपदेन उत्तरं लिखत —

(क) ॠषभेण निर्मितस्य नगरस्य नाम किम् ?

उत्तरविनिता।

(ख) ॠषभस्य प्रसिद्धे द्वे कन्ये के ?

उत्तरब्राह्मी सुन्दरी च।

(ग) कस्यां लिप्यां नैकानि शास्‍त्राणि लिपिबद्धानि ?

उत्तरब्राह्मीलिप्याम्।

(घ) विनिता नामकं राज्यं ॠषभः कस्मै समर्पितवान् ?

उत्तरभरताय।

(ङ) ॠषभः बाहुबलिने किं राज्यं प्रदत्तवान् ?

उत्तरतक्षशिलाम्।

(च) प्रजाः भिक्षायां कानि वस्तूनि यच्छन्ति स्म ?

उत्तरआभरणानि अनर्घवस्तूनि च।

2. पूर्णवाक्येन प्रश्‍नानाम् उत्तराणि लिखत —

(क) देशे काः समस्याः सन्ति इति ॠषभदेवस्य कल्पना प्राप्‍ता ?

उत्तरॠषभदेवस्य कल्पना प्राप्ता यत् जनानाम् आलस्यं, कृषिकार्ये न्यूनता, प्रजासु उत्पादनक्षमतायाः अभावः च – एताः मूलसमस्याः देशे सन्ति।

(ख) महाराजः केषु कार्येषु प्रजाः प्रशिक्षितवान् ?

उत्तरमहाराजः ॠषभः प्रजाः कृषिकार्ये, विविधपदार्थैः भोजननिर्माणे, तन्तुभिः वस्त्रनिर्माणे, गवाम् अश्‍वादीनां पशूनां पालने, काष्‍ठैः धातुभिः शिलाभिः च गृहोपयोगिवस्तूनां निर्माणे, पात्रनिर्माणे, गृहनिर्माणे नगरनिर्माणे च प्रशिक्षितवान्।

(ग) ॠषभदेवस्य जीवनपरिवर्तिनी घटना का आसीत् ?

उत्तरएकदा राजप्रासादे नृत्यं प्रदर्शयन्ती काचित् नर्तकी सहसा भूमौ पतित्वा मृता। अनया घटनया ॠषभदेवस्य मनः विक्षुब्धम् अभवत् यत् संसारे किमपि शाश्‍वतं नास्ति। एषा एव तस्य जीवनपरिवर्तिनी घटना आसीत्।

(घ) ॠषभदेवस्य दीर्घकालिकस्य उपवासस्य समाप्‍तिः कथम् अभवत् ?

उत्तरॠषभदेवस्य प्रपौत्रः श्रेयांसः प्रपितामहाय पानार्थम् इक्षुरसं दत्तवान्। अनेन इक्षुरसेन तस्य दीर्घकालिकः उपवासः समाप्‍तः अभवत्।

(ङ) ॠषभः कदा कुत्र च केवलज्ञानं प्राप्‍तवान् ?

उत्तरॠषभदेवः फाल्गुनमासस्य कृष्णपक्षे एकादश्यां तिथौ प्रयागराजे अक्षयवटवृक्षस्य अधः केवलज्ञानं प्राप्‍तवान्।

(च) जनानां मार्गदर्शनार्थं कं क्रमं रचितवान् ?

उत्तरजनानां मार्गदर्शनार्थं ॠषभदेवः भिक्षुः, भिक्षुणी, श्रावकः, श्राविका चेति क्रमं रचितवान्। स एव क्रमः ‘जैनसङ्घः’ इति प्रसिद्धः।

3. समस्तपदानि लिखत —

विग्रहवाक्यम्समस्तपदम् (उत्तर)
(क) महान् च असौ राजा चमहाराजः
(ख) प्रजानां सुखम्प्रजासुखम्
(ग) मूलाः समस्याःमूलसमस्याः
(घ) भोजनस्य निर्माणम्भोजननिर्माणम्
(ङ) आर्थिकी स्थितिःआर्थिकस्थितिः
(च) प्राप्‍तः आनन्दः येन सःप्राप्‍तानन्दः
(छ) विधिना लिखितम्विधिलिखितम्
(ज) गृहं गृहं प्रतिप्रतिगृहम्
(झ) ब्राह्मीनामा लिपिःब्राह्मीलिपिः

4. वाक्यानि उदाहरणानुसारं परिवर्तयत —

यथा – जनैः स्वयमेव निर्माणकार्यम् आरब्धम् । → जनाः स्वयमेव निर्माणकार्यम् आरब्धवन्तः ।

(क) महाराजेन राज्यं समर्पितम् ।

उत्तरमहाराजः राज्यं समर्पितवान् ।

(ख) केनापि तत् न चिन्तितम् ।

उत्तरन कोऽपि तत् चिन्तितवान् ।

(ग) ॠषभदेवेन दीर्घकालिकः उपवासः कृतः ।

उत्तरॠषभदेवः दीर्घकालिकम् उपवासं कृतवान् ।

(घ) जनैः जीवनपद्धतिः परिवर्तिता ।

उत्तरजनाः जीवनपद्धतिं परिवर्तितवन्तः ।

(ङ) ॠषभेण योजना कृता ।

उत्तरॠषभः योजनां कृतवान् ।

5. सन्धिं कुरुत —

शब्दौसन्धिः (उत्तर)सन्धि-भेदः
(क) इति + अतःइत्यतःयण्-सन्धिः
(ख) च + इतिचेतिगुण-सन्धिः
(ग) देवस्य + अपिदेवस्यापिसवर्णदीर्घ-सन्धिः
(घ) तथा + एवतथैववृद्धि-सन्धिः
(ङ) इति + एतादृशाःइत्येतादृशाःयण्-सन्धिः
(च) ब्राह्मीद्वारा + एवब्राह्मीद्वारैववृद्धि-सन्धिः
(छ) प्रस्थितः + अयम्प्रस्थितोऽयम्विसर्ग (पूर्वरूप) सन्धिः

अत्र इदम् अवधेयम् (प्राकृतभाषा)

पाठ के साथ ‘अत्र इदम् अवधेयम्’ के अन्तर्गत प्राकृत भाषा का परिचय दिया गया है, जिसे समझना आवश्यक है।

1. प्राकृत भाषाएँ

भारत भाषा-सम्पदा में अत्यन्त समृद्ध है। किसी कालखण्ड में अनेक प्राकृत भाषाएँ सामान्य-जनों के संवाद की माध्यम थीं। प्रमुख प्राकृत भाषाएँ हैं – आर्ष-प्राकृत, मागधी-प्राकृत, शौरसेनी-प्राकृत, महाराष्‍ट्री-प्राकृत, पैशाची-प्राकृत, चूलिका-प्राकृत एवं अपभ्रंश-प्राकृत आदि। जैन-आगम अर्धमागधी में लिखे गए हैं; महाराष्‍ट्री-प्राकृत में महाकवि हाल ने ‘गाथासप्तशती’ की रचना की, तथा शौरसेनी-प्राकृत में अनेक नाट्यग्रन्थ रचे गए। इससे ज्ञात होता है कि प्राकृत केवल संवाद-भाषा नहीं, अपितु उच्चकोटि-साहित्य की वाहिनी भी थी। यदि संस्कृत स्रोतस्विनी नदी है, तो प्राकृत उसका सरल प्रवाह है – दोनों में अविच्छिन्न सम्बन्ध है।

2. संस्कृत-वाक्यानां प्राकृतानुवादः (उदाहरण)

संस्कृतम्प्राकृतम्
(१) अहं विद्यालयं गच्छामि ।अहं विज्जालयं गच्छामि / गच्छमि / गच्छेमि / गच्छं ।
(२) सः जलं पिबति ।सो जलं पिवइ ।
(३) बालकः पद्यं पठति ।बालओ पोत्थं पढइ / पढए / पढदि / पढदे ।
(४) भवान् कुत्र गच्छति ।भवतो कत्थ गच्छउ ।
(५) अहं फलानि खादामि ।अहं फलाइं / फलाणि खामि ।
(६) एतत् मम मित्रम् अस्ति ।एसो मम / मज्झ मित्तो / मित्तं अत्थि ।

ध्यातव्य – नवकार-महामन्त्र भी प्राकृत (अर्धमागधी) में रचित है; अतः इस पाठ में प्राकृत-परिचय विशेष रूप से प्रासंगिक है।

स्वाध्यायान्मा प्रमदः & परियोजनाकार्यम्

स्वाध्यायान्मा प्रमदः – (1) जैनधर्मस्य चतुर्विंशतिः तीर्थङ्कराः

पाठ के साथ जैन-धर्म के चौबीस तीर्थङ्करों के नाम दिए गए हैं, जिन्हें क्रमशः जान लेना उपयोगी है –

क्रमःतीर्थङ्करःक्रमःतीर्थङ्करः
1ॠषभदेवः (आदिनाथः)13विमलनाथः
2अजितनाथः14अनन्तनाथः
3सम्भवनाथः15धर्मनाथः
4अभिनन्दनाथः16शान्तिनाथः
5सुमतिनाथः17कुन्थुनाथः
6पद्मप्रभुः18अरनाथः
7सुपार्श्‍वनाथः19मल्लिनाथः
8चन्द्रप्रभुः20मुनिसुव्रतः
9पुष्पदन्तः (सुविधिनाथः)21नामिनाथः
10शीतलनाथः22नेमिनाथः (अरिष्‍टनेमिः)
11श्रेयांसनाथः23पार्श्‍वनाथः
12वासुपूज्यः24महावीरः (वर्धमानः)

प्रथम तीर्थङ्कर ॠषभदेव (आदिनाथ) ने जगत् में कृषि, लिपि, कला एवं व्यवसाय का आरम्भ किया; चतुर्विंश (24वें) तीर्थङ्कर महावीर (वर्धमान) पञ्चमहाव्रतों के प्रचारक एवं जैन-धर्म के परम महापुरुष हैं।

स्वाध्यायान्मा प्रमदः – (2) जैनधर्मस्य प्रमुखतीर्थस्थानानि

सम्मेतशिखरम् (पारसनाथ पर्वत, झारखण्ड), श्रवणबेलगोल (कर्नाटक), पावापुरी (बिहार), रैवतक/गिरनार पर्वत (गुजरात), शत्रुञ्जय पर्वत – पदलिप्तपुर/पालीताणा (गुजरात), राजगृह (बिहार), अयोध्या एवं काशी/वाराणसी (उत्तर प्रदेश), चम्पापुर – भागलपुर (बिहार), हस्तिनापुर (उत्तर प्रदेश), मिथिला (बिहार), द्वारिका (गुजरात) – ये जैन-धर्म के प्रमुख तीर्थ-स्थान हैं।

परियोजनाकार्यम् – यस्तु क्रियावान् मनुजः स विद्वान् (मार्गदर्शनम्)

1. जैनसम्प्रदायानुसारं भोजनपद्धतिं लिखत । (किं खादन्ति ? कस्मिन् समये खादन्ति ?)

मार्गदर्शनम्जैन-परम्परा में अहिंसा-प्रधान, सात्त्विक एवं शाकाहारी भोजन किया जाता है; प्रायः सूर्यास्त से पूर्व ही भोजन (‘चौविहार’) का विधान है, रात्रि-भोजन का त्याग किया जाता है तथा कन्दमूल आदि से बचा जाता है। अपने आस-पास के जैन-मित्रों/शिक्षकों से जानकारी लेकर इसे लिखें।

2. पञ्चमहाव्रतानि लिखत ।

उत्तरपञ्च महाव्रत हैं – (1) सत्यम्, (2) अहिंसा, (3) अस्तेयम् (अचौर्य), (4) अपरिग्रहः, (5) ब्रह्मचर्यम्। इनका मन, वचन एवं कर्म से पालन कल्याणकारी कहा गया है।

3. णमोकारमहामन्त्र-दिवसस्य विषये किं जानन्ति इत्युपरि कक्षायां वदत ।

मार्गदर्शनम्यह कक्षा-गतिविधि है। बताइए कि प्रतिवर्ष अप्रैल मास के नौवें दिनांक को जैन-जन सामूहिक रूप से नवकार-महामन्त्र का जप करके उत्सव मनाते हैं; इसी कारण उस दिन को ‘नवकार-महामन्त्र-दिवसः’ कहा जाता है। यह मन्त्र ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ के अनुरूप विश्व-शान्ति के लिए करोड़ों लोगों द्वारा गाया जाता है।

4. पञ्चमहाव्रतेषु कस्यापि एकस्य व्रतस्य विषये सहपाठिनां पुरतः आगत्य वदत ।

मार्गदर्शनम्किसी एक व्रत – जैसे अहिंसा – को चुनकर सहपाठियों के समक्ष बोलें: अहिंसा अर्थात् मन, वचन एवं कर्म से किसी प्राणी को कष्ट न देना; यही ‘अहिंसा परमो धर्मः’ का मूल है। एक-दो उदाहरण देकर इसका महत्त्व समझाइए।

अतिरिक्त प्रश्न (Extra Questions)

लघु उत्तरीय प्रश्न (30–40 शब्द)

1. ॠषभ के माता-पिता कौन थे एवं वे कैसे थे?

उत्तरॠषभ के पिता महाराज नाभि थे, जो राजनीति, युद्ध-तन्त्र एवं प्रशासन में निपुण एवं प्रजावत्सल थे। माता मरुदेवी बुद्धिमती एवं करुणाशील थीं। इन्हीं के पुत्र ॠषभ सर्वगुण-सम्पन्न, विद्या-सम्पन्न एवं राजनीतिज्ञ थे।

2. ॠषभ को ‘ॠषभदेव’ क्यों कहा गया?

उत्तरॠषभ ने अपने दक्ष शासन एवं कौशल से प्रजा के जीवन में शान्ति, सुरक्षा एवं न्याय-व्यवस्था स्थापित की तथा समाज का उत्कर्ष किया। प्रजा के हृदय में उच्च स्थान पाकर वे प्रेमपूर्वक ‘राजा ॠषभदेव’ कहलाए।

3. नवकार-महामन्त्र किन्हें नमस्कार करता है?

उत्तरनवकार-महामन्त्र पाँच परमेष्ठियों को नमस्कार करता है – अरिहन्त, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय एवं लोक के समस्त साधु। यह जैन-धर्म का परम-पावन मन्त्र है, जो प्राकृत भाषा में रचित है।

4. ॠषभदेव का दीर्घकालीन उपवास कैसे टूटा?

उत्तरहस्तिनापुर के समीप उनके प्रपौत्र श्रेयांस के इक्षु-क्षेत्र के पास से गुजरते समय श्रेयांस ने प्रपितामह ॠषभदेव को इक्षु-रस पिलाया। इसी से उनका वर्ष-पर्यन्त चला उपवास टूटा; वह दिन वैशाख की अक्षय-तृतीया था।

5. ब्राह्मी-लिपि का सम्बन्ध किससे है?

उत्तरजैन-परम्परा के अनुसार ॠषभदेव की पुत्री ब्राह्मी द्वारा ‘ब्राह्मी-लिपि’ का विकास हुआ माना जाता है। इसी लिपि में अनेक शिला-लेख एवं शास्त्र लिपिबद्ध हुए।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (100–120 शब्द)

6. राजा बनने पर ॠषभदेव ने प्रजा के कल्याण के लिए क्या-क्या कार्य किए?

उत्तरसमाज में दुर्भिक्ष एवं परस्पर विद्वेष की समस्याएँ उठने पर ॠषभ ने राजा बनकर गहन चिन्तन किया। उन्होंने पाया कि जनता का आलस्य, कृषि की उपेक्षा एवं उत्पादन-क्षमता का अभाव ही मूल कारण हैं।इसके निवारण के लिए उन्होंने अनेक योजनाएँ बनाईं और प्रजा को कृषि, विविध पदार्थों से भोजन-निर्माण, तन्तुओं से वस्त्र-निर्माण, गाय-घोड़े आदि पशुओं का पालन, काष्ठ-धातु-शिला से गृहोपयोगी वस्तुओं का निर्माण, पात्र-निर्माण, गृह-निर्माण एवं नगर-निर्माण जैसे जीवन-कौशल सिखाए। फलस्वरूप जनता सक्रिय हुई, उनकी आर्थिक स्थिति सुदृढ़ हुई, कृषि-कार्य प्रचुरता से होने लगे और राज्य पुनः सुभिक्ष बन गया। इस प्रकार ॠषभदेव ने प्रजा को आत्मनिर्भर एवं सुखी बनाया।

7. किस घटना ने ॠषभदेव का जीवन बदल दिया, और उसके बाद उन्होंने क्या किया?

उत्तरएक दिन राजप्रासाद में आयोजित नृत्य-प्रदर्शन में नृत्य करती हुई एक स्वस्थ नर्तकी अकस्मात् भूमि पर गिरकर मर गई। इस घटना से ॠषभदेव का मन विक्षुब्ध हो गया – यदि एक नीरोग स्त्री भी सहसा मर सकती है, तो जीवन क्या है, इसे कैसे जिया जाए? उन्होंने अनुभव किया कि संसार में कुछ भी शाश्वत नहीं।अतः स्थिर सुख की खोज में उन्होंने सर्वस्व त्यागकर भिक्षु-रूप धारण किया। अपना विशाल साम्राज्य पुत्रों में बाँटकर – विनिता भरत को एवं तक्षशिला बाहुबलि को देकर – वे वन में मौन, ध्यान एवं तप में लीन हो गए। कठोर तप एवं दीर्घ उपवास के पश्चात् प्रयागराज में अक्षयवट के नीचे उन्हें केवलज्ञान प्राप्त हुआ और वे प्रथम तीर्थङ्कर ‘आदिनाथ’ कहलाए।

8. जैन-मत के प्रमुख सिद्धान्तों का संक्षेप में वर्णन कीजिए।

उत्तरजैन-मत के प्रमुख सिद्धान्त हैं – अहिंसा परमो धर्मः (मन, वचन एवं कर्म से अहिंसा का पालन), अनेकान्तवाद (सत्य के अनेक पक्ष होते हैं), स्याद्वाद (प्रत्येक कथन सापेक्ष ‘स्यात्’ रूप में ग्राह्य है) तथा अपरिग्रह (आवश्यकता से अधिक संग्रह न करना)।इन दर्शनों के मध्य सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान एवं सम्यक्चरित्र को ‘त्रिरत्न’ कहा जाता है। प्राणिमात्र के हित के लिए पाँच महाव्रत – सत्य, अहिंसा, अस्तेय, अपरिग्रह एवं ब्रह्मचर्य – का आचरण कल्याणकारी बताया गया है। ये सिद्धान्त ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भावना को सशक्त करते हैं।

MCQ & अभिकथन-कारण

1. ॠषभ के पिता का क्या नाम था?

(क) मरुदेवी

(ख) नाभिः

(ग) भरतः

(घ) श्रेयांसः

उत्तर(ख) नाभिः।

2. ॠषभ द्वारा निर्मित नगर का नाम क्या था?

(क) तक्षशिला

(ख) हस्तिनापुर

(ग) विनिता

(घ) प्रयागराज

उत्तर(ग) विनिता।

3. ब्राह्मी-लिपि का विकास किसके द्वारा माना जाता है?

(क) सुन्दरी

(ख) ब्राह्मी

(ग) मरुदेवी

(घ) बाहुबलि

उत्तर(ख) ब्राह्मी।

4. ॠषभदेव को केवलज्ञान कहाँ प्राप्त हुआ?

(क) हस्तिनापुरे

(ख) तक्षशिलायाम्

(ग) प्रयागराजे (अक्षयवटवृक्षस्य अधः)

(घ) पालीताणायाम्

उत्तर(ग) प्रयागराजे (अक्षयवटवृक्षस्य अधः)।

5. ॠषभदेव का दीर्घ उपवास किसने तोड़ा?

(क) भरतः

(ख) बाहुबलिः

(ग) श्रेयांसः (इक्षुरसेन)

(घ) नाभिः

उत्तर(ग) श्रेयांसः (इक्षुरसेन)।

6. नवकार-महामन्त्र किस भाषा में रचित है?

(क) संस्कृत

(ख) प्राकृत

(ग) पालि

(घ) अपभ्रंश

उत्तर(ख) प्राकृत। (अर्धमागधी)

7. ‘अरिहन्ताणम्’ पद का अर्थ है—

(क) सिद्धों का

(ख) आचार्यों का

(ग) अरिहन्तों (जितशत्रुओं) का

(घ) साधुओं का

उत्तर(ग) अरिहन्तों (जितशत्रुओं) का।

8. ॠषभदेव जैन-धर्म के कौन-से तीर्थङ्कर हैं?

(क) अन्तिम (24वें)

(ख) प्रथम (आदिनाथ)

(ग) तेईसवें

(घ) सोलहवें

उत्तर(ख) प्रथम (आदिनाथ)।

9. भिक्षु, भिक्षुणी, श्रावक एवं श्राविका का क्रम किस नाम से प्रसिद्ध है?

(क) जैनसङ्घः

(ख) जैनागमः

(ग) नवकारमन्त्रः

(घ) पञ्चमहाव्रतम्

उत्तर(क) जैनसङ्घः।

10. इनमें से कौन-सा जैन-मत का सिद्धान्त नहीं है?

(क) अहिंसा

(ख) अनेकान्तवाद

(ग) अपरिग्रह

(घ) परिग्रह-संचयः

उत्तर(घ) परिग्रह-संचयः। (जैन-मत तो अपरिग्रह का उपदेश देता है।)
उत्तर-कुंजी: 1-(ख), 2-(ग), 3-(ख), 4-(ग), 5-(ग), 6-(ख), 7-(ग), 8-(ख), 9-(क), 10-(घ)

अभिकथन-कारण – नीचे अभिकथन (A) और कारण (R) दिए गए हैं। सही विकल्प चुनिए—
(क) A और R दोनों सही, R, A की सही व्याख्या है। (ख) A और R दोनों सही, पर R, A की सही व्याख्या नहीं। (ग) A सही, R गलत। (घ) A गलत, R सही।

1. अभिकथन (A): ॠषभदेव को ‘आदिनाथ’ कहा जाता है।

कारण (R): वे जैन-धर्म के प्रथम तीर्थङ्कर हैं, जिन्होंने जगत् में कृषि, लिपि, कला एवं व्यवसाय का आरम्भ किया।

उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है।

2. अभिकथन (A): नवकार-महामन्त्र प्राकृत भाषा में रचित है।

कारण (R): प्राकृत भाषाएँ केवल मनोरंजन के लिए थीं, उनका कोई साहित्य नहीं था।

उत्तर(ग) A सही है, किन्तु R गलत है – प्राकृत उच्चकोटि-साहित्य (गाथासप्तशती, नाट्यग्रन्थ, जैनागम) की भी वाहिनी थी।

3. अभिकथन (A): ॠषभदेव ने सर्वस्व त्यागकर तपस्या आरम्भ की।

कारण (R): नर्तकी की अकस्मात् मृत्यु देखकर उन्होंने अनुभव किया कि संसार में कुछ भी शाश्वत नहीं।

उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है।

4. अभिकथन (A): ॠषभदेव का दीर्घ उपवास इक्षु-रस से समाप्त हुआ।

कारण (R): उनके प्रपौत्र श्रेयांस ने उन्हें इक्षु-रस पिलाया, और वह दिन अक्षय-तृतीया था।

उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है।

5. अभिकथन (A): जैन-मत में अपरिग्रह एक प्रमुख सिद्धान्त है।

कारण (R): अपरिग्रह का अर्थ है आवश्यकता से अधिक संग्रह न करना।

उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है।

परीक्षा-सुझाव एवं सामान्य त्रुटियाँ

परीक्षा-सुझाव (Exam Tips)

  • नवकार-महामन्त्र की पाँचों प्राकृत पंक्तियाँ शुद्ध वर्तनी सहित कण्ठस्थ करें – इस पर प्रायः प्रश्न आता है।
  • कथा के प्रमुख नाम याद रखें – नाभि, मरुदेवी, ॠषभ, भरत, बाहुबलि, ब्राह्मी, सुन्दरी, श्रेयांस।
  • एकपदेन उत्तर में पूरा वाक्य न लिखें, केवल एक पद/शब्द लिखें (यथा – विनिता, भरताय)।
  • समस्तपद एवं सन्धि के नियम (यण्, गुण, वृद्धि, सवर्णदीर्घ, विसर्ग) उदाहरण सहित दोहराएँ।
  • जैन-दर्शन के चार सिद्धान्त एवं पञ्चमहाव्रत अलग-अलग याद रखें, परस्पर न मिलाएँ।

सामान्य त्रुटियाँ (Common Mistakes)

  • ‘णमो’ को ‘नमो’ लिख देना – प्राकृत मन्त्र में ‘ण’ ही शुद्ध है (णमो, अरिहन्ताणं)।
  • विनिता राज्य भरत को एवं तक्षशिला बाहुबलि को – इन्हें परस्पर बदलकर लिख देना।
  • केवलज्ञान का स्थान हस्तिनापुर/पालीताणा बता देना – यह प्रयागराज में अक्षयवट के नीचे हुआ।
  • अपरिग्रह को परिग्रह/संग्रह समझ लेना – अपरिग्रह = अधिक संग्रह न करना।
  • सन्धि-भेद की भूल – ‘तथैव’, ‘ब्राह्मीद्वारैव’ वृद्धि-सन्धि हैं, ‘इत्यतः’ यण्-सन्धि।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

शारदा कक्षा 9 का पाठ 10 ‘णमो अरिहन्ताणम्’ किस विषय पर आधारित है?

यह पाठ जैन-परम्परा के प्रथम तीर्थङ्कर ॠषभदेव (आदिनाथ) की जीवन-कथा एवं प्राकृत भाषा में रचित नवकार (णमोकार) महामन्त्र पर आधारित एक संस्कृत गद्य-पाठ है, जो अहिंसा, अपरिग्रह एवं त्याग का संदेश देता है।

नवकार-महामन्त्र किन्हें नमस्कार करता है?

नवकार-महामन्त्र पाँच परमेष्ठियों – अरिहन्त, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय एवं लोक के समस्त साधु – को नमस्कार करता है। यह जैन-धर्म का परम-पावन मन्त्र है।

ॠषभदेव को केवलज्ञान कब और कहाँ प्राप्त हुआ?

ॠषभदेव को फाल्गुन मास के कृष्ण-पक्ष की एकादशी तिथि को प्रयागराज में अक्षयवट वृक्ष के नीचे केवलज्ञान प्राप्त हुआ, जिसके पश्चात् वे प्रथम तीर्थङ्कर ‘आदिनाथ’ कहलाए।

मूल पाठ, प्राकृत मन्त्र, प्रश्न एवं अभ्यास-शीर्षक NCERT शारदा पुस्तक से ज्यों-के-त्यों लिए गए हैं; सार, भावार्थ एवं उत्तर ClearStudy द्वारा मौलिक रूप से तैयार किए गए हैं।

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