Class 9 Sanskrit Sharada Chapter 9 Solutions (NCERT 2026–27) – कृतं प्रतिकृतं भूयादेष धर्मः सनातनः

This page gives the complete solution for Class 9 Sanskrit Sharada (शारदा) Chapter 9 ‘कृतं प्रतिकृतं भूयादेष धर्मः सनातनः’ – a dramatic passage on the slaying of the demon बकासुर by Bhīma, taken from the रूपक ‘एकचक्रम्’ of महामहोपाध्याय एन. रङ्गनाथशर्मा (based on the Mahābhārata). You get the मूल पाठ (नाट्य-गद्य एवं श्लोक) verbatim, श्लोकों का भावार्थ, सार (Hindi summary), शब्दार्थ, and original, exam-ready answers to every question of the अभ्यास (अभ्यासाद् जायते सिद्धिः), the grammar boxes, extra questions, MCQs, अभिकथन-कारण and FAQs.

Class: 9 Subject: Sanskrit Book: Sharada (शारदा) Chapter: 9 पाठ: कृतं प्रतिकृतं भूयादेष धर्मः सनातनः Session: 2026–27

पाठ का अवलोकन (Chapter Overview)

शारदा कक्षा 9 का नवम पाठ ‘कृतं प्रतिकृतं भूयादेष धर्मः सनातनः’ महाभारत के प्रसिद्ध बकासुर-वध प्रसंग पर आधारित एक नाट्य-अंश है। यह महामहोपाध्याय श्री एन. रङ्गनाथशर्मा द्वारा रचित संस्कृत-रूपक ‘एकचक्रम्’ के तृतीय एवं चतुर्थ अङ्क से उद्धृत है। पाण्डव अज्ञातवास के समय एकचक्रा-नगरी में एक ब्राह्मण के घर रहते हैं। नगर को प्रतिदिन बकासुर नामक राक्षस के लिए एक मनुष्य भोजन-रूप में भेजना पड़ता है। जब बारी उसी ब्राह्मण-परिवार की आती है, तब उपकार के बदले प्रत्युपकार (‘कृतं प्रतिकृतं भूयात्’ – उपकार का प्रत्युपकार ही सनातन धर्म है) के भाव से प्रेरित होकर माता कुन्ती भीम को राक्षस के पास भेजती हैं। भीम मल्लयुद्ध में बकासुर का वध कर देता है। पाठ का केन्द्रीय भाव है – कृतज्ञता, क्षत्रिय-धर्म (नर-रक्षण), वीरता एवं माता की आज्ञा का पालन।

पाठ-परिचय / प्रसंग

यह पाठ ‘एकचक्रम्’ नामक लघु संस्कृत-रूपक से लिया गया है, जिसके रचयिता महामहोपाध्याय श्री एन. रङ्गनाथशर्मा (जन्म ७.४.१९२६, कर्णाटक – देहत्याग २०१४) हैं। वे व्याकरण-शास्त्र, अलङ्कार-शास्त्र एवं अद्वैत-वेदान्त के निष्णात विद्वान् थे तथा बेङ्गलूरु के चामराजेन्द्र संस्कृत महाविद्यालय में व्याकरण-प्राध्यापक रहे। रामायण एवं महाभारत – ये दोनों प्रसिद्ध इतिहास-ग्रन्थ हैं; महाभारत को आधार बनाकर अनेक ग्रन्थ रचे गए, उन्हीं में यह ‘एकचक्रम्’ रूपक एक है, जिसका कथावस्तु महाभारत में वर्णित बकासुर-वध है। प्रस्तुत पाठ्यांश इसी रूपक के तृतीय एवं चतुर्थ अङ्क से संकलित है। पाठ का शीर्षक स्वयं रूपक के एक श्लोक – ‘कृतं प्रतिकृतं भूयादेष धर्मः सनातनः’ – से लिया गया है।

मूल पाठ (नाट्य-अंश एवं श्लोक)

(NCERT शारदा पुस्तक से नाट्य-अंश एवं श्लोक ज्यों-के-त्यों; संयुक्ताक्षर एवं रिक्त-स्थान शुद्ध किए गए हैं, शब्द-क्रम अपरिवर्तित।)

प्रसंग-भूमिका (अङ्कद्वयस्य पूर्वकथाप्रसङ्गः)

पाण्डवाः एकचक्रनगरे कस्यचित् ब्राह्मणस्य गृहे निवसन्ति। गृहस्वामिनः गृहे रोदनध्वनिं श्रुत्वा तत्र गता पाण्डवानां माता कुन्ती रोदनकारणं पृच्छति। ततः शोकाकुलेन परिवारेण सा ज्ञापिता यत् एकचक्रनगरवासिनां नातिदूरस्थितेन बकनाम्ना असुरेण सह सन्धिनियमानुसारं प्रतिदिनं कश्चित् नगरवासी स्वेच्छया असुरस्य भक्ष्यं भवेत्, तद्दिने पर्यायेण तस्यैव ब्राह्मणपरिवारस्य बलिदानस्य वारः आसीत् इति। तेषां दुःस्थितिं ज्ञात्वा स्वपुत्रेषु एकं बकासुरस्य समीपं प्रेषयामि इति कुन्ती प्रतिज्ञां कृतवती। इमं विषयं ज्ञात्वा ब्राह्मणेन कृतस्य उपकारस्य प्रत्युपकारकालः सन्निहितः इति भावयन् भीमः मृष्टान्न-भाण्डसहितः बकासुरस्य समीपं गन्तुम् उद्युक्तः भवति।

(ततः प्रविशति कुन्ती भीमसेनेन सह)

कुन्ती – पुत्र! किञ्चित् प्रतिश्रुतं मया प्रतिवेशिने ब्राह्मणाय।

भीमः – सम्यगनुष्ठितुम्। आतिथेयः किल तत्र भवान् उपकर्ता वसति प्रदानेन।

कुन्ती – आकर्णय, अस्य एकचक्रस्य पुरस्यादूरवर्तिनि पर्वते वसति बकनामा दैत्यः।

भीमः – श्रुतं तस्य दुरात्मनो वृत्तम्। पर्यायक्रमेण तस्मै बलिमाहरन्ति पौराः।

कुन्ती – श्वः प्रभाते भवत्यस्य विप्रस्य पर्यायः।

भीमः – बाढम्।

कुन्ती – न चैतावत्। मानुषभोजी स राक्षसः श्रूयते। भोज्यसमाहारे मानुषोऽपि तस्मै प्रेषयितव्यः। तस्माद् बालकस्य पिता तपस्वी शोचति।

भीमः – विदितमवशिष्टम्। मत्पुत्रेषु कोऽपि प्रेषयिष्यत इति भवत्या प्रतिश्रुतम्।

कुन्ती – (मौनमवलम्बते)

भीमः – मातः! नास्त्यत्र किमप्यनुशोचितव्यम्। क्षत्रियाण्या यदुचितं तदनुष्ठितम्। युक्तोऽयं प्रतिश्रवः। श्रोत्रियोऽयं प्रतिवेशी प्रत्युपकारमर्हति। पश्य —

भैक्षप्रदानेन चिरं परैरुपकृता वयम् ।
कृतं प्रतिकृतं भूयादेष धर्मः सनातनः ॥
— एकचक्रम् (नाट्यांशे प्रथमः श्लोकः)

भीमः – अहमेव बकासुरमभिगमिष्यामि।

कुन्ती – वत्स भीम! अनुरूपमभिहितं भरतवंशप्रदीपेन मम पुत्रेण। भक्ष्यभोज्यादिकं मृष्टान्नं शकटपूरं पूरयित्वा प्रेषणीयं भवति राक्षसाय। तदेतत् सज्जीक्रियतामिति प्रेरयिष्यामि ब्राह्मणकुटुम्बम्।

भीमः – अहो! प्रियं मे। सज्जीक्रियताम्। अपरमिदं प्रियमनुष्ठितं मे भवत्या। प्रभूतमुपाहरिष्यते भोजनम्।

(ततः प्रविशन्ति युधिष्ठिरादयः)

युधिष्ठिरः – (विलोक्य) अये! हर्षेण उत्फुल्लाक्ष इव वत्सो भीमः।

भीमः – प्रभूतमुपस्थितं मे भोजनम्।

अर्जुनः – स्थाने खलु प्रहर्षः औदरिकस्य।

नकुलः – ओष्ठौ स्फुरतः इवाग्रजस्य।

भीमः – पश्यत, बाहू अपि स्फुरतः।

सहदेवः – अपि हस्तद्वयेन भोक्ष्यसे?

भीमः – तदपि भविष्यति। न केवलं भोजनमुपस्थितम्। आयोधनमपि।

युधिष्ठिरः – आयोधनमिति। केन?

भीमः – बकासुरेण।

युधिष्ठिरः – अम्ब! किमिदानीमुपक्षिप्तम्?

कुन्ती – पुत्रकाः! बकासुरस्य भोजनपरिकल्पनं जानीथ पौराणाम्। तदिदानीं पर्यायपतितं प्रतिवेशिनो ब्राह्मणस्य।

युधिष्ठिरः – ततस्ततः।

कुन्ती – स खल्वेकपुत्रस्तपस्वी भृशं परिदेवयते।

युधिष्ठिरः – ज्ञातमवशिष्टं मातः! न खलु भवत्या अध्यवसितं समर्थये। यस्य वीरस्य भुजबलमाश्रित्य वयं सुखं शेमहे, यच्च चिन्तयन् दुर्योधनो निद्रां न लभते, तस्य भीमस्य प्रेषणं कथं नु त्वया सङ्कल्पितम्?

भीमः – धर्मं विजानता भवता धर्मसङ्ग्रहोऽत्र द्रष्टव्यः। न हि मातुराज्ञा प्रत्यादेशमर्हति।

युधिष्ठिरः – वत्स भीमसेन! बलवान् मानुषभोजी स राक्षसः इति श्रूयते।

भीमः – ततः किम्? राक्षसध्वंसी भीमः स्मर्यते। अलं विशङ्कया। हनिष्यामि तं दुरात्मानम्।

अर्जुनः – धनुर्धरोऽहमनुगमिष्यामि।

भीमः – मा मैवम्। न हि खरदंष्ट्रो मृगाधिपः सहायमपेक्षते।

इमौ हि पीवरौ बाहू सहायौ सहजौ मम ।
बकं विध्वंसयिष्यामि सिंहः क्षुद्रमृगं यथा ॥
— एकचक्रम् (नाट्यांशे द्वितीयः श्लोकः)

(ततः सर्वैरनुज्ञातः बकं हन्तुकामः भीमः प्रस्थितः)

(ततः प्रविशति भक्ष्य-भोज्यादिक-भाण्ड-पूरित-शकटेन सह)

बकः – मानुषापसद, परिवेषय मे भोजनम्।

भीमः – सर्वं परिवेषितं मदीय-जठरस्थाय भगवते हुताशनाय। त्वां धर्मदूषणं हन्तुम् आगतोऽहम्।

बकः – कथं, कः खलु अधर्मः मया सेवितः? (सहासमुदरं परिमृजन्)

भीमः – नरभक्षणम्।

बकः – नरभक्षणं नाम मांसाशिनां राक्षसानां धर्मः।

भीमः – नररक्षणं नाम भूमिपालानां क्षत्रियाणां धर्मः।

बकः – क्षत्रियोऽसि?

भीमः – बाढम्, क्षत्रियोऽस्मि।

रक्षिता साधुलोकानां वरिष्ठो बाहुशालिनाम् ।
निषूदको हिडिम्बस्य मृत्युश्चास्मि भवादृशाम् ॥
— एकचक्रम् (नाट्यांशे तृतीयः श्लोकः)

बकः – अहह! मम मित्रस्य हिडिम्बस्य हन्ता कौन्तेयो भवान्?

भीमसेनः – कामम्! कौन्तेयोऽस्मि भीमसेनः।

बकः – इदमस्ति मे भागधेयम्। चिरान्विष्टो मृगः स्वयमुत्पतितो व्याघ्रगह्वरम्। श्लाघनीयोऽसि मे रिपुः।

भीमसेनः – इदं मे स्वस्त्ययनं यन्मां श्लाघनीयं रिपुं मन्यसे। अनुवर्तस्व ते मित्रं हिडिम्बम्।

बकः – वाचाट! क्षत्रियडिम्भ, गृहाण शस्त्रम्। शातयामि ते दर्पम्।

भीमसेनः – अलं शस्त्रग्रहणविडम्बनेन, त्वन्मस्तकास्थिभिदुरोऽस्ति ममैष मुष्टिः।

(उभौ प्रहरतः। मल्लयुद्धं प्रवर्तते। हतः पतति बकः।)

सार (Hindi Summary)

‘कृतं प्रतिकृतं भूयादेष धर्मः सनातनः’ पाठ महामहोपाध्याय एन. रङ्गनाथशर्मा रचित रूपक ‘एकचक्रम्’ के तृतीय-चतुर्थ अङ्क से लिया गया एक नाट्य-अंश है, जिसका कथावस्तु महाभारत का बकासुर-वध है। अज्ञातवास के समय पाण्डव अपनी माता कुन्ती के साथ एकचक्रा-नगरी में एक ब्राह्मण के घर रह रहे हैं। उस नगरी पर बकासुर नामक राक्षस का आतंक है, जिसके साथ हुई सन्धि के अनुसार प्रतिदिन एक नगरवासी को अन्न से भरी गाड़ी सहित स्वयं भी राक्षस का भोजन बनना पड़ता है।

जब बलि की बारी उसी ब्राह्मण-परिवार की आती है, तब परिवार शोक में डूब जाता है। कुन्ती सोचती हैं कि जिस ब्राह्मण ने उन्हें आश्रय एवं भिक्षा देकर उपकार किया, उसका प्रत्युपकार करना ही धर्म है। अतः वे अपने एक पुत्र को राक्षस के पास भेजने की प्रतिज्ञा करती हैं। भीम सहर्ष यह दायित्व स्वीकार करता है और श्लोक के माध्यम से कहता है – ‘भैक्ष-प्रदान से इन नागरिकों ने चिरकाल तक हम पर उपकार किया है; किए गए उपकार का प्रत्युपकार होना ही सनातन धर्म है।’

युधिष्ठिर आदि भाई भोजन की प्रचुरता देखकर भीम के उत्साह का कारण पूछते हैं। जब युधिष्ठिर को भीम के भेजे जाने का संकल्प ज्ञात होता है, तो वे चिन्तित होते हैं कि जिस भीम के बाहुबल पर वे निश्चिन्त रहते हैं और जिसके भय से दुर्योधन की नींद उड़ी रहती है, उसे राक्षस के पास कैसे भेजा जाए। किन्तु भीम कहता है कि माता की आज्ञा अनुल्लङ्घनीय है तथा वह स्वयं राक्षसों का संहारक है, उसे किसी सहायक की आवश्यकता नहीं। अर्जुन के साथ चलने के प्रस्ताव को भी वह विनम्रता से अस्वीकार कर देता है – ‘तीक्ष्ण दाढ़ों वाला सिंह (मृगाधिप) सहायता की अपेक्षा नहीं करता।’

भीम मृष्टान्न से भरी शकट (गाड़ी) लेकर राक्षस के पास पहुँचता है। बकासुर भोजन परोसने को कहता है, परन्तु भीम स्वयं ही सारा भोजन खा जाता है और राक्षस को धर्म-दूषक कहकर वध करने की घोषणा करता है। दोनों में संवाद होता है – राक्षस नर-भक्षण को अपना धर्म बताता है, तो भीम नर-रक्षण को क्षत्रिय-धर्म कहता है। अन्त में भीम बिना शस्त्र के, केवल अपनी मुट्ठियों से, मल्लयुद्ध में बकासुर का वध कर देता है। इस प्रकार पाठ कृतज्ञता, क्षत्रिय-धर्म, मातृ-आज्ञा-पालन एवं वीरता का सुन्दर सन्देश देता है।

शब्दार्थ (Word-meanings)

(पुस्तक के ‘सर्वं शब्देन भासते’ अनुभाग पर आधारित।)

शब्दः (Sanskrit)हिन्दी अर्थEnglish meaning
अभिहितम्कहा गया, उक्तSaid
आकर्णयसुनोListen
आतिथेयःअतिथि की सेवा करने वालाHost
आयोधनम्युद्धBattle
उत्फुल्लाक्षःविकसित (खिले हुए) नेत्रों वालाOne with wide-open eyes
औदरिकःकेवल पेट भरने वाला, भोजनप्रियOne who just eats / glutton
कामम्निश्चित हीCertainly
जठरस्थायपेट में विद्यमान (के लिए)For what is inside the stomach
निषूदकःविनाशकDestroyer
क्षुद्रमृगम्छोटे पशु कोSmall animal
क्षत्रियाण्याक्षत्रिय की पत्नी सेBy the wife of a Kshatriya
परिदेवयतेविलाप करता हैLaments
परिवेषयतुम परोसो(You) Serve
पीवरौ(दो) स्थूल / पुष्ट(Two) Stout
पौराःनागरिकCitizens
प्रतिवेशीपड़ोसीNeighbour
प्रतिश्रुतम्प्रतिज्ञात, वचन दिया गयाPromised
प्रभूतम्अधिक, प्रचुरAbundant
प्रतिश्रवःवचन, प्रतिज्ञाPromise
प्रत्यादेशम्अवज्ञा, अनुल्लङ्घनDisobedience
बाढम्निश्चित ही, ठीक हैCertainly
मल्लयुद्धम्पहलवानों का युद्धWrestling
मानुषापसदहे निकृष्ट मानव!O human of low cadre!
मृष्टान्नम्स्वादिष्ट भोजनTasty food
वाचाटहे डींग मारने वाले! प्रलापकO boastful one!
विप्रस्यब्राह्मण काOf the Brahmana
विशङ्कयाविशेष संशय सेBy the doubt
व्याघ्रगह्वरम्बाघ का निवास-स्थानTiger-cave
श्रोत्रियःजिसने वेद पढ़ा होOne who has read the Vedas
हनिष्यामिमार दूँगाWill kill
हुताशनायअग्नि को (के लिए)For the fire

अभ्यासः (अभ्यासाद् जायते सिद्धिः)

१. अधः प्रदत्तप्रश्नानाम् उत्तराणि एकपदेन लिखत —

(क) भीमस्य जननी का ?

उत्तरकुन्ती।

(ख) कुन्त्या निश्चितं कः न समर्थयति ?

उत्तरयुधिष्ठिरः।

(ग) पाण्डवानाम् उपकर्ता कः ?

उत्तरब्राह्मणः (प्रतिवेशी विप्रः)।

(घ) कं चिन्तयन् दुर्योधनः निद्रां न लभते ?

उत्तरभीमम्।

(ङ) पाण्डवाः कुत्र निवसन्ति स्म ?

उत्तरएकचक्रनगरे (ब्राह्मणस्य गृहे)।

(च) भरतवंशप्रदीपः कः ?

उत्तरभीमः (भीमसेनः)।

(छ) कः भृशं परिदेवयते ?

उत्तरतपस्वी (एकपुत्रः ब्राह्मणः)।

२. पूर्णवाक्येन उत्तरं लिखत —

(क) “भैक्षप्रदानेन…….. ” इति श्लोकानुसारं सनातनः धर्मः कः ?

उत्तरश्लोकानुसारं कृतस्य उपकारस्य प्रत्युपकारः एव सनातनः धर्मः अस्ति। (‘कृतं प्रतिकृतं भूयात्’ इति।)

(ख) बकनामा दैत्यः कुत्र वसति ?

उत्तरबकनामा दैत्यः एकचक्रस्य पुरस्य अदूरवर्तिनि पर्वते वसति।

(ग) कुन्ती किं प्रतिश्रुतवती ?

उत्तरकुन्ती स्वपुत्रेषु एकं बकासुरस्य समीपं प्रेषयिष्यामि इति प्रतिवेशिने ब्राह्मणाय प्रतिश्रुतवती।

(घ) भीमस्य अग्रजः कः ?

उत्तरभीमस्य अग्रजः युधिष्ठिरः अस्ति।

(ङ) का प्रत्यादेशं न अर्हति ?

उत्तरमातुः आज्ञा प्रत्यादेशं (अवज्ञाम्) न अर्हति।

(च) पौराः बकासुराय कथं बलिम् आहरन्ति ?

उत्तरपौराः पर्यायक्रमेण (बारी-बारी से) बकासुराय बलिम् आहरन्ति।

(छ) क्षत्रियाणां धर्मः कः ?

उत्तरक्षत्रियाणां धर्मः नररक्षणम् (भूमिपालानां प्रजारक्षणम्) अस्ति।

३. अधस्तात् दत्तानि वाक्यानि केन कं प्रति उक्तानि इति निर्दिशत —

यथा – तस्माद् बालकस्य पिता तपस्वी शोचति → केन/कया: कुन्त्या · कं/कां प्रति: भीमम्।

क्र.सं.वाक्यानिकेन / कयाकं / कां प्रति
१.न हि मातुराज्ञा प्रत्यादेशमर्हति।भीमेनयुधिष्ठिरं प्रति
२.न हि खरदंष्ट्रो मृगाधिपः सहायमपेक्षते।भीमेनअर्जुनं प्रति
३.क्षत्रियाण्या यदुचितं तदनुष्ठितम्।भीमेनकुन्तीं प्रति (मातरं प्रति)
४.अपि हस्तद्वयेन भोक्ष्यसे।सहदेवेनभीमं प्रति
५.तस्य भीमस्य प्रेषणं कथं नु त्वया सङ्कल्पितम् ?युधिष्ठिरेणकुन्तीं प्रति (मातरं प्रति)
६.नरभक्षणं नाम मांसाशिनां राक्षसानां धर्मः।बकेनभीमं प्रति

४. रेखाङ्कितपदेषु सन्धिं विभज्य सन्धिनाम लिखत —

यथा – न चैतावत् = च + एतावत् (वृद्धि-सन्धिः)।

रेखाङ्कितपदम्सन्धि-विच्छेदःसन्धि-नाम
(क) सम्यगनुष्ठितम्सम्यक् + अनुष्ठितम्जश्त्व-सन्धिः (व्यञ्जन-सन्धिः)
(ख) पुरस्यादूरवर्तिनिपुरस्य + अदूरवर्तिनिदीर्घ-सन्धिः (सवर्णदीर्घः)
(ग) दुरात्मनो वृत्तम्दुरात्मनः + वृत्तम्विसर्ग-सन्धिः (उत्व/श्चुत्वरहितः – ससजुषो रुः, उकारः)
(घ) मानुषोऽपिमानुषः + अपिविसर्ग-सन्धिः (उत्व-सन्धिः – अतोऽपरः)
(ङ) नास्त्यत्रन + अस्ति + अत्रदीर्घ-सन्धिः + यण्-सन्धिः
(च) यदुचितम्यत् + उचितम्जश्त्व-सन्धिः (व्यञ्जन-सन्धिः)
(छ) खल्वेकपुत्रःखलु + एकपुत्रःयण्-सन्धिः
(ज) कथं नु त्वयाकथम् + नुअनुस्वार-सन्धिः (परसवर्ण/मोऽनुस्वारः)
(झ) धर्मसङ्ग्रहोऽत्रधर्मसङ्ग्रहः + अत्रविसर्ग-सन्धिः (उत्व-सन्धिः)
(ञ) राक्षस इतिराक्षसः + इतिविसर्ग-सन्धिः (विसर्ग-लोपः – अतो रोरप्लुतादप्लुते)

५. पर्यायवाचि-पदानां मेलनं कुरुत —

यथा – पिता – जनकः।

(क-स्तम्भः)(ख-स्तम्भः – विकल्पाः)
(क) आयोधनम्१. ब्राह्मणः
(ख) विप्रः२. जननी
(ग) असुरः३. अग्निः
(घ) अम्ब४. दैत्यः
(ङ) हुताशनः५. युद्धम्
सही मेलनम् (उत्तर) (क) आयोधनम् → ५. युद्धम् (ख) विप्रः → १. ब्राह्मणः (ग) असुरः → ४. दैत्यः (घ) अम्ब → २. जननी (ङ) हुताशनः → ३. अग्निः

६. अधोलिखितानां पदानां विपरीतार्थक-शब्दान् लिखत —

यथा – पीवरः – कृशः।

पदम्विपरीतार्थक-शब्दः (उत्तर)
(क) उपकृतःअपकृतः
(ख) अग्रजस्यअनुजस्य
(ग) उचितम्अनुचितम्
(घ) हर्षःशोकः / विषादः

७. मञ्जूषातः समुचितं विशेषणपदं चित्वा लिखत —

मञ्जूषा – क्षत्रियाणी, शकटपूरं, प्रतिवेशी, खरदंष्ट्रः, जठरस्थः, कौन्तेयः, पीवरौ। यथा – पीवरौ बाहू।

उत्तर (क) शकटपूरं मृष्टान्नम् (ख) प्रतिवेशी ब्राह्मणः (ग) खरदंष्ट्रः मृगाधिपः (घ) कौन्तेयः भीमः (ङ) क्षत्रियाणी कुन्ती (च) जठरस्थः हुताशनः

८. समस्तपदानि लिखत —

यथा – मृष्टम् अन्नं = मृष्टान्नम्

उत्तर (क) वीरस्य भुजयोः बलम् → भुजबलम् (वीरस्य भुजबलम्) (ख) धर्माणां सङ्ग्रहः → धर्मसङ्ग्रहः (ग) मातुः आज्ञा → मातृ-आज्ञा (मातुराज्ञा) (घ) धनुः धरति इति → धनुर्धरः (ङ) मृगाणाम् अधिपः → मृगाधिपः (च) अस्य पुरस्य न दूरे (अदूरे) वर्तते → पुरस्य अदूरवर्ती (अदूरवर्ती)

९. अधोलिखितवाक्यानाम् उचितभावैः सह सम्मेलनं कुरुत —

यथा – प्रभूतमुपस्थितं मे भोजनम् → हर्षः।

वाक्यम्भावः (विकल्पाः)
(क) धनुर्धरोऽहमनुगमिष्यामि।१. हासः
(ख) भीमस्य प्रेषणं कथं नु त्वया सङ्कल्पितम् ?२. निराशा
(ग) अपि हस्तद्वयेन भोक्ष्यसे ?३. ग्लानिः
(घ) हनिष्यामि तं दुरात्मानम्।४. अधिकारः
(ङ) स खल्वेकपुत्रस्तपस्वी भृशं परिदेवयते।५. ओजः
(च) मानुषापसद, परिवेषय मे भोजनम्।६. धैर्यम्
सही सम्मेलनम् (उत्तर) (क) धनुर्धरोऽहमनुगमिष्यामि → ४. अधिकारः (अर्जुन का अधिकारपूर्वक प्रस्ताव) (ख) भीमस्य प्रेषणं कथं नु त्वया सङ्कल्पितम् → २. निराशा (युधिष्ठिर की चिन्ता) (ग) अपि हस्तद्वयेन भोक्ष्यसे → १. हासः (सहदेव का परिहास) (घ) हनिष्यामि तं दुरात्मानम् → ५. ओजः (भीम का ओज/पराक्रम) (ङ) स खल्वेकपुत्रस्तपस्वी भृशं परिदेवयते → ३. ग्लानिः (शोक/करुणा) (च) मानुषापसद, परिवेषय मे भोजनम् → ६. धैर्यम् (बक का दर्प/उद्धत धैर्य)

१०. वाच्यपरिवर्तनं कुरुत —

यथा – (कर्तृवाच्यम्) भवती प्रतिश्रुतवती → (कर्मवाच्यम्) भवत्या प्रतिश्रुतम्।

कर्तृवाच्यम् / कर्मवाच्यम् (प्रदत्त)परिवर्तितरूपम् (उत्तर)
(क) क्षत्रियाण्या अनुष्ठितम्। (कर्मवाच्यम्)क्षत्रियाणी अनुष्ठितवती। (कर्तृवाच्यम्)
(ख) भवत्या सज्जीक्रियताम्। (कर्मवाच्यम्)भवती सज्जीकरोतु। (कर्तृवाच्यम्)
(ग) भवत्या उपक्षिप्तम्। (कर्मवाच्यम्)भवती उपक्षिप्तवती। (कर्तृवाच्यम्)
(घ) त्वया सङ्कल्पितम्। (कर्मवाच्यम्)त्वं सङ्कल्पितवान्। (कर्तृवाच्यम्)
(ङ) भवता धर्मसङ्ग्रहः द्रष्टव्यः। (कर्मवाच्यम्)भवान् धर्मसङ्ग्रहं द्रष्टुम् अर्हति / पश्यतु। (कर्तृवाच्यम्)
(च) पौरजनैः मानुषः प्रेषयितव्यः। (कर्मवाच्यम्)पौरजनाः मानुषं प्रेषयन्तु। (कर्तृवाच्यम्)

अत्र इदम् अवधेयम् (श्लोकानां भावार्थः)

पाठ में दिए गए दोनों मुख्य श्लोकों का ‘श्लोकानां भावार्थः’ इस प्रकार है –

१. भैक्षप्रदानेन चिरं परैरुपकृता वयम्… (प्रथमः श्लोकः)

हम नागरिकों के द्वारा बहुत समय से भिक्षा-प्रदान (आश्रय एवं अन्न) के रूप में उपकृत हैं। इस प्रकार किए गए उपकार का प्रत्युपकार होना चाहिए – यही शाश्वत (सनातन) धर्म है। भीम इस श्लोक से कृतज्ञता एवं कर्तव्य-बोध प्रकट करता है कि जिस ब्राह्मण-परिवार ने उन्हें आश्रय दिया, उसकी रक्षा करना उनका धर्म है।

२. इमौ हि पीवरौ बाहू सहायौ सहजौ मम… (द्वितीयः श्लोकः)

ये दोनों पुष्ट (स्थूल) भुजाएँ ही मेरी सहज (जन्मजात) सहायक हैं। जैसे सिंह किसी तुच्छ वन्य-पशु को (बिना किसी सहायता के) मार डालता है, वैसे ही मैं बक नामक असुर का विनाश कर दूँगा। इस श्लोक से भीम का आत्मविश्वास, पराक्रम एवं वीरता प्रकट होती है – उसे किसी सहायक की आवश्यकता नहीं।

योग्यताविस्तरः & परियोजनाकार्यम्

कविपरिचयः (स्वाध्यायान्मा प्रमदः)

विषयःविवरणम्
कविःविद्वान् एन्. रङ्गनाथशर्मा (महामहोपाध्यायः, विद्यावारिधिः, व्याकरणशास्त्रप्रवीणः)
जननम् / देहत्यागः७.४.१९२६ – २०१४
जन्मस्थानम्नडळल्ली ग्रामः, शिवमोग्ग-मण्डलम्, कर्णाटक-राज्यम्
प्रसिद्ध-कृतयःबाहुबलिविजयम्, एकचक्रम्, कुसुमाञ्जलिः, श्रीशङ्करचरितामृतम् इत्यादयः
विशेषताव्याकरण, अलङ्कारशास्त्र एवं अद्वैत-वेदान्त में निष्णात; चामराजेन्द्र संस्कृत महाविद्यालय (बेङ्गलूरु) में व्याकरण-प्राध्यापक

अमरकोषः (पाठगत-शब्दानां पर्यायाः)

शब्दःअमरकोषोक्ताः पर्यायाः
असुरःअसुरा दैत्य-दैतेयदनुजेन्द्रारिदानवाः
आयोधनम्युद्धमायोधनं जन्यं प्रधनं प्रविदारणम्
तनयःआत्मजस्तनयः सूनुः पुत्रः (स्त्रियां त्वमी – आत्मजा तनया सूनुः दुहिता)

परियोजनाकार्यम् / यस्तु क्रियावान् मनुजः स विद्वान् (Project Work)

1. अस्य रूपकस्य अभिनय-अंशान् ज्ञात्वा स्वशालायाम् अभिनयं कुरुत।

मार्गदर्शनम्यह नाट्य-गतिविधि है। पाठ में आए संवादों (कुन्ती-भीम, भीम-बक आदि) को पात्र बाँटकर शुद्ध उच्चारण के साथ अपनी कक्षा/विद्यालय में अभिनय (मंचन) कीजिए। पात्रों के हाव-भाव एवं संवाद-शैली पर विशेष ध्यान दीजिए।

2. अस्मिन् रूपके विद्यमानानां पात्राणां नामानि विलिख्य तेषां विषये टिप्पणीं लिखत।

उत्तर (नमूना)इस रूपक के प्रमुख पात्र हैं – कुन्ती (पाण्डवों की माता, कृतज्ञ एवं धर्मपरायण), भीम/भीमसेन (बलवान्, वीर, बकासुर का वध करने वाला नायक), युधिष्ठिर (ज्येष्ठ पाण्डव, धर्मनिष्ठ एवं विचारशील), अर्जुन (धनुर्धर), नकुल एवं सहदेव (अनुज पाण्डव), तथा बक/बकासुर (नरभक्षी राक्षस, खलनायक)। प्रत्येक पात्र के विषय में दो-तीन वाक्यों की टिप्पणी अपने शब्दों में लिखिए।

3. विद्यालयस्य ग्रन्थालयं गत्वा महाभारतस्य विविधपात्राणां विषये पठित्वा मित्रैः सह आलोचनां कुरुत।

मार्गदर्शनम्विद्यालय के पुस्तकालय में जाकर महाभारत के विविध पात्रों (युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल, सहदेव, कुन्ती, द्रौपदी, कृष्ण आदि) के विषय में पढ़िए तथा उनके गुणों एवं भूमिका पर अपने मित्रों के साथ चर्चा कीजिए।

अतिरिक्त प्रश्न (Extra Questions)

लघु उत्तरीय प्रश्न (30–40 शब्द)

1. यह पाठ किस रूपक से लिया गया है तथा इसका रचयिता कौन है?

उत्तरयह पाठ ‘एकचक्रम्’ नामक लघु संस्कृत-रूपक के तृतीय एवं चतुर्थ अङ्क से लिया गया है। इसके रचयिता महामहोपाध्याय श्री एन. रङ्गनाथशर्मा हैं। इसका कथावस्तु महाभारत में वर्णित बकासुर-वध है।

2. कुन्ती ने भीम को बकासुर के पास भेजने का संकल्प क्यों किया?

उत्तरजिस ब्राह्मण ने पाण्डवों को आश्रय एवं भिक्षा देकर उपकार किया था, उसी परिवार की बलि की बारी आ गई थी। कुन्ती ने सोचा कि उपकार का प्रत्युपकार करना सनातन धर्म है, अतः उन्होंने अपने एक पुत्र (भीम) को भेजने का संकल्प किया।

3. भीम ने अर्जुन के साथ चलने का प्रस्ताव क्यों अस्वीकार किया?

उत्तरभीम ने कहा कि तीक्ष्ण दाढ़ों वाला सिंह (मृगाधिप) किसी सहायक की अपेक्षा नहीं करता। उसकी अपनी दोनों पुष्ट भुजाएँ ही उसकी सहज सहायक हैं; अतः बकासुर के वध के लिए उसे किसी की सहायता की आवश्यकता नहीं।

4. बक एवं भीम के बीच धर्म को लेकर क्या संवाद हुआ?

उत्तरबक ने नर-भक्षण को मांसाहारी राक्षसों का धर्म बताया। इस पर भीम ने उत्तर दिया कि नर-रक्षण (प्रजा की रक्षा) ही भूमिपालक क्षत्रियों का धर्म है। इसी धर्म-संघर्ष से दोनों में युद्ध आरम्भ हुआ।

5. भीम ने बकासुर का वध किस प्रकार किया?

उत्तरभीम ने बकासुर के लिए लाया गया सारा मृष्टान्न स्वयं खा लिया, फिर बिना शस्त्र के केवल अपनी मुट्ठियों से मल्लयुद्ध करते हुए राक्षस को परास्त किया। अन्त में बकासुर मारा जाकर भूमि पर गिर पड़ा।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (100–120 शब्द)

6. ‘कृतं प्रतिकृतं भूयादेष धर्मः सनातनः’ पाठ का केन्द्रीय संदेश अपने शब्दों में लिखिए।

उत्तरइस पाठ का केन्द्रीय संदेश कृतज्ञता एवं प्रत्युपकार है। पाठ का शीर्षक ही यह सिखाता है कि ‘किए गए उपकार का प्रत्युपकार करना सनातन धर्म है’। जिस ब्राह्मण ने पाण्डवों को आश्रय दिया, संकट के समय उसकी रक्षा करना कुन्ती एवं भीम अपना कर्तव्य मानते हैं।पाठ क्षत्रिय-धर्म (नर-रक्षण), वीरता, आत्मविश्वास एवं माता की आज्ञा के पालन का भी सन्देश देता है। भीम बिना सहायता के, केवल बाहुबल से, राक्षस का वध करके दुष्ट के दमन एवं सज्जन की रक्षा का आदर्श प्रस्तुत करता है। संक्षेप में, यह पाठ हमें कृतज्ञ रहने, कर्तव्य निभाने एवं अन्याय के विरुद्ध साहसपूर्वक खड़े होने की प्रेरणा देता है।

7. भीम के चरित्र की प्रमुख विशेषताओं का वर्णन कीजिए।

उत्तरभीम इस पाठ का नायक है, जिसके चरित्र में अनेक उज्ज्वल गुण दिखाई देते हैं। वह अत्यन्त बलवान् एवं वीर है – अपनी पुष्ट भुजाओं की तुलना सिंह से करता है तथा बिना शस्त्र के बकासुर का वध करता है। वह कृतज्ञ है – ब्राह्मण के उपकार का प्रत्युपकार करना अपना धर्म मानता है।वह मातृभक्त है – ‘माता की आज्ञा अवज्ञा के योग्य नहीं’ कहकर सहर्ष कार्य स्वीकार करता है। वह आत्मविश्वासी एवं निर्भीक है – अर्जुन की सहायता को विनम्रता से अस्वीकार कर देता है। साथ ही वह धर्मनिष्ठ है – नर-रक्षण को क्षत्रिय-धर्म मानकर अधर्मी राक्षस का दमन करता है। इस प्रकार भीम वीरता, कृतज्ञता एवं धर्म का आदर्श है।

8. युधिष्ठिर भीम के प्रेषण से चिन्तित क्यों हुए, और भीम ने उन्हें क्या उत्तर दिया?

उत्तरजब युधिष्ठिर को ज्ञात हुआ कि कुन्ती ने भीम को बकासुर के पास भेजने का संकल्प किया है, तो वे चिन्तित हो उठे। उनका विचार था कि जिस भीम के बाहुबल के आश्रय में सभी पाण्डव सुखपूर्वक रहते हैं, और जिसके भय से दुर्योधन तक की नींद उड़ी रहती है, उस वीर को राक्षस के पास भेजना उचित नहीं।इस पर भीम ने धर्म जानने वाले युधिष्ठिर को समझाया कि यहाँ धर्म का संग्रह (पालन) देखना चाहिए – ब्राह्मण की रक्षा करना धर्म है। साथ ही उसने कहा कि ‘माता की आज्ञा अवज्ञा के योग्य नहीं’। वह स्वयं राक्षसों का संहारक है, अतः किसी भय या संशय की आवश्यकता नहीं; वह निश्चित रूप से उस दुरात्मा का वध करेगा।

MCQ & अभिकथन-कारण

1. यह पाठ किस रूपक से उद्धृत है?

(क) बाहुबलिविजयम्

(ख) एकचक्रम्

(ग) कुसुमाञ्जलिः

(घ) श्रीशङ्करचरितामृतम्

उत्तर(ख) एकचक्रम्।

2. इस रूपक का कथावस्तु किस ग्रन्थ पर आधारित है?

(क) रामायणे

(ख) महाभारते

(ग) भागवते

(घ) पञ्चतन्त्रे

उत्तर(ख) महाभारते (बकासुर-वधः)।

3. पाण्डव किस नगर में ब्राह्मण के घर रहते थे?

(क) हस्तिनापुरे

(ख) इन्द्रप्रस्थे

(ग) एकचक्रनगरे

(घ) वाराणस्याम्

उत्तर(ग) एकचक्रनगरे।

4. ‘कृतं प्रतिकृतं भूयात्’ इति श्लोकानुसारं सनातनः धर्मः कः?

(क) नरभक्षणम्

(ख) उपकारस्य प्रत्युपकारः

(ग) धन-संग्रहः

(घ) युद्धम्

उत्तर(ख) उपकारस्य प्रत्युपकारः।

5. बकासुरस्य वधं कः करोति?

(क) अर्जुनः

(ख) युधिष्ठिरः

(ग) भीमः

(घ) नकुलः

उत्तर(ग) भीमः।

6. भीमेन बकासुरस्य वधः केन कृतः?

(क) धनुषा

(ख) गदया

(ग) मुष्टिभ्याम् (मल्लयुद्धेन)

(घ) खड्गेन

उत्तर(ग) मुष्टिभ्याम् (मल्लयुद्धेन)।

7. ‘मृगाधिपः’ (सिंहः) किसका प्रतीक है?

(क) कुन्त्याः

(ख) भीमस्य

(ग) बकस्य

(घ) युधिष्ठिरस्य

उत्तर(ख) भीमस्य। (भीम स्वयं को सिंह के समान बताता है।)

8. क्षत्रियाणां धर्मः कः?

(क) नरभक्षणम्

(ख) नररक्षणम्

(ग) तपः

(घ) यज्ञः

उत्तर(ख) नररक्षणम्।

9. ‘भरतवंशप्रदीपः’ इति कुन्ती कं संबोधयति?

(क) अर्जुनम्

(ख) युधिष्ठिरम्

(ग) भीमम्

(घ) सहदेवम्

उत्तर(ग) भीमम्।

10. इस रूपक के रचयिता कौन हैं?

(क) कालिदासः

(ख) भासः

(ग) एन्. रङ्गनाथशर्मा

(घ) बाणभट्टः

उत्तर(ग) एन्. रङ्गनाथशर्मा।
उत्तर-कुंजी: 1-(ख), 2-(ख), 3-(ग), 4-(ख), 5-(ग), 6-(ग), 7-(ख), 8-(ख), 9-(ग), 10-(ग)

अभिकथन-कारण – नीचे अभिकथन (A) और कारण (R) दिए गए हैं। सही विकल्प चुनिए—
(क) A और R दोनों सही, R, A की सही व्याख्या है। (ख) A और R दोनों सही, पर R, A की सही व्याख्या नहीं। (ग) A सही, R गलत। (घ) A गलत, R सही।

1. अभिकथन (A): कुन्ती ने भीम को बकासुर के पास भेजने का संकल्प किया।

कारण (R): ब्राह्मण के किए उपकार का प्रत्युपकार करना कुन्ती सनातन धर्म मानती थीं।

उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है।

2. अभिकथन (A): भीम ने अर्जुन के साथ चलने का प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया।

कारण (R): तीक्ष्ण दाढ़ों वाला सिंह (मृगाधिप) किसी सहायक की अपेक्षा नहीं करता।

उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है।

3. अभिकथन (A): युधिष्ठिर भीम के भेजे जाने से चिन्तित हुए।

कारण (R): भीम के बाहुबल के आश्रय में पाण्डव सुखपूर्वक रहते थे तथा उसके भय से दुर्योधन की नींद उड़ी रहती थी।

उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है।

4. अभिकथन (A): भीम ने बकासुर का वध शस्त्र से किया।

कारण (R): दोनों के बीच मल्लयुद्ध हुआ और भीम ने केवल मुट्ठियों से बक को मार डाला।

उत्तर(घ) A गलत है, R सही है – भीम ने शस्त्र से नहीं, बल्कि केवल मुट्ठियों (मल्लयुद्ध) से वध किया।

5. अभिकथन (A): बकासुर ने भीम को श्लाघनीय (प्रशंसनीय) शत्रु माना।

कारण (R): भीम ने बक के मित्र हिडिम्ब का वध किया था, अतः बक ने उसे योग्य प्रतिद्वन्द्वी समझा।

उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है।

परीक्षा-सुझाव एवं सामान्य त्रुटियाँ

परीक्षा-सुझाव (Exam Tips)

  • दोनों श्लोक (‘भैक्षप्रदानेन…’ एवं ‘इमौ हि पीवरौ बाहू…’) कण्ठस्थ करें – भावार्थ एवं श्लोक-पूर्ति के प्रश्न प्रायः इन्हीं से आते हैं।
  • पात्र-आधारित ‘केन कं प्रति उक्तम्’ प्रश्नों के लिए संवाद-क्रम याद रखें (कौन-सा कथन किसने किससे कहा)।
  • शब्दार्थ (आतिथेयः, औदरिकः, परिदेवयते, मानुषापसद, श्रोत्रियः आदि) हिन्दी एवं अंग्रेज़ी दोनों में याद रखें।
  • सन्धि-विच्छेद में विसर्ग-सन्धि (मानुषोऽपि, धर्मसङ्ग्रहोऽत्र, राक्षस इति) तथा यण्/दीर्घ-सन्धि के नियम ध्यान से लागू करें।
  • वाच्य-परिवर्तन में कर्ता की विभक्ति (तृतीया ↔ प्रथमा) एवं क्रिया-रूप का मिलान सावधानी से करें।

सामान्य त्रुटियाँ (Common Mistakes)

  • पाठ को रामायण से जोड़ देना – यह महाभारत के बकासुर-वध पर आधारित है।
  • वध शस्त्र से बताना – भीम ने बक को केवल मुट्ठियों (मल्लयुद्ध) से मारा।
  • संयुक्ताक्षर एवं विसर्ग की अशुद्धि – मृष्टान्नम्, प्रत्युपकारः, क्षत्रियः को शुद्ध लिखें।
  • ‘मातुराज्ञा’ का विच्छेद ‘मातुः + आज्ञा’ तथा ‘मातृ-आज्ञा’ समास – दोनों में भ्रम न करें।
  • पात्रों के संवाद आपस में मिला देना – अर्जुन धनुर्धर, सहदेव परिहास-कर्ता, युधिष्ठिर चिन्तित ज्येष्ठ हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

शारदा कक्षा 9 का नवम पाठ ‘कृतं प्रतिकृतं भूयादेष धर्मः सनातनः’ किस ग्रन्थ/रूपक से लिया गया है?

यह पाठ महामहोपाध्याय एन. रङ्गनाथशर्मा द्वारा रचित संस्कृत-रूपक ‘एकचक्रम्’ के तृतीय एवं चतुर्थ अङ्क से लिया गया है, जिसका कथावस्तु महाभारत का बकासुर-वध है।

‘कृतं प्रतिकृतं भूयादेष धर्मः सनातनः’ का अर्थ क्या है?

इसका अर्थ है – ‘किए गए उपकार का प्रत्युपकार होना ही सनातन (शाश्वत) धर्म है।’ यह पाठ कृतज्ञता, क्षत्रिय-धर्म (नर-रक्षण) एवं वीरता का संदेश देता है।

भीम ने बकासुर का वध कैसे किया?

भीम ने बकासुर के लिए लाया गया सारा मृष्टान्न स्वयं खा लिया और बिना किसी शस्त्र के, केवल अपनी मुट्ठियों से मल्लयुद्ध करते हुए राक्षस का वध कर दिया।

मूल पाठ, श्लोक, प्रश्न एवं अभ्यास-शीर्षक NCERT शारदा पुस्तक से ज्यों-के-त्यों लिए गए हैं; सार, भावार्थ एवं उत्तर ClearStudy द्वारा मौलिक रूप से तैयार किए गए हैं।

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