Class 9 Sanskrit Sharada Chapter 6 Solutions (NCERT 2026–27) – मनःपूतं समाचरेत्
This page gives the complete solution for Class 9 Sanskrit Sharada (शारदा) Chapter 6 ‘मनःपूतं समाचरेत्’ – a सुभाषित-संग्रह of eight selected श्लोक drawn from मनुस्मृति, श्रीमद्भगवद्गीता, नीतिशतक, पञ्चतन्त्र, मालविकाग्निमित्र, किरातार्जुनीय आदि ग्रन्थों से, with their मूल पाठ, अन्वय, भावार्थ, सार (Hindi summary), शब्दार्थ, and original, exam-ready answers to every question of the अभ्यास (अभ्यासाद् जायते सिद्धिः) along with extra questions, MCQs, अभिकथन-कारण and FAQs.
- पाठ का अवलोकन (Chapter Overview)
- पाठ-परिचय / प्रसंग
- मूल पाठ (सुभाषितानि)
- सार (Hindi Summary)
- शब्दार्थ (सर्वं शब्देन भासते)
- अभ्यासाद् जायते सिद्धिः
- अत्र इदम् अवधेयम् (श्लोकानाम् अन्वयः)
- स्वाध्यायान्मा प्रमदः & परियोजनाकार्यम्
- अतिरिक्त प्रश्न (Extra Questions)
- MCQ & अभिकथन-कारण
- परीक्षा-सुझाव एवं सामान्य त्रुटियाँ
- अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
पाठ का अवलोकन (Chapter Overview)
शारदा कक्षा 9 का षष्ठ पाठ ‘मनःपूतं समाचरेत्’ एक सुभाषित-संग्रह है, जिसमें विभिन्न प्राचीन-भारतीय ग्रन्थों – मनुस्मृति, श्रीमद्भगवद्गीता, नीतिशतक, पञ्चतन्त्र, मालविकाग्निमित्र, किरातार्जुनीय आदि से चुने हुए आठ नीति-श्लोक संकलित हैं। पाठ का आरम्भ आचार्य एवं छात्रों के संवाद से होता है, जिसमें यह विचार उठाया जाता है कि किसी भी कार्य को करने से पूर्व मन का पवित्र एवं उद्देश्य का उचित होना आवश्यक है – यदि मन ही मलिन हो तो कार्य का फल भी दूषित होगा। इसी से पाठ का शीर्षक ‘मनःपूतं समाचरेत्’ (मन से पवित्र होकर ही आचरण करो) सार्थक होता है। श्लोक हमें पवित्र आचरण, धर्म के दस लक्षण, श्रेष्ठ जनों के अनुकरण, अभ्यास, परिश्रम (पौरुष), विवेकपूर्ण निर्णय एवं गुण-परीक्षण की प्रेरणा देते हैं।
पाठ-परिचय / प्रसंग
यह पाठ किसी एक ग्रन्थ का नहीं, अपितु आठ भिन्न-भिन्न ग्रन्थों से संकलित सुभाषितों का संग्रह है। श्लोक 1 एवं 2 मनुस्मृति (मनु-रचित धर्मशास्त्रीय ग्रन्थ) से, श्लोक 3 श्रीमद्भगवद्गीता (महर्षि व्यास) से, श्लोक 4 सुभाषितरत्नभाण्डागार से, श्लोक 5 भर्तृहरि-रचित नीतिशतक से, श्लोक 6 विष्णुशर्मा-रचित पञ्चतन्त्र (मित्रभेद) से, श्लोक 7 कालिदास-रचित नाटक मालविकाग्निमित्रम् से तथा श्लोक 8 भारवि-रचित महाकाव्य किरातार्जुनीयम् से लिया गया है। ये सूक्तियाँ केवल पठन के लिए नहीं, अपितु जीवन में आचरण के लिए हैं। पाठ की यह विशेषता है कि यह नीति-साहित्य के माध्यम से जीवनमूल्यों को सरल एवं स्मरणीय श्लोक-रूप में प्रस्तुत करता है।
मूल पाठ (सुभाषितानि)
(आठ चयनित सुभाषित-श्लोक, स्रोत-ग्रन्थ सहित, ज्यों-के-त्यों।)
सत्यपूतां वदेत् वाचं मनःपूतं समाचरेत् ॥ १ ॥
(मनुस्मृतिः — ६.४६)
धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः ।
धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम् ॥ २ ॥
(मनुस्मृतिः — ६.९२)
यद्यदाचरति श्रेष्ठः तत्तदेवेतरो जनः ।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते ॥ ३ ॥
(श्रीमद्भगवद्गीता — ३.२१)
अभ्यासेन क्रियाः सर्वाः अभ्यासात् सकलाः कलाः ।
अभ्यासाद् ध्यानमौनादि किमभ्यासस्य दुष्करम् ॥ ४ ॥
(सुभाषितरत्नभाण्डागारः)
प्रारभ्यते न खलु विघ्नभयेन नीचैः प्रारभ्य विघ्नविहता विरमन्ति मध्याः ।
विघ्नैः पुनः पुनरपि प्रतिहन्यमानाः प्रारभ्य चोत्तमजनाः न परित्यजन्ति ॥ ५ ॥
(नीतिशतकम् — २७)
उद्योगिनं पुरुषसिंहमुपैति लक्ष्मीः दैवेन देयमिति कापुरुषा वदन्ति ।
दैवं निहत्य कुरु पौरुषमात्मशक्त्या यत्ने कृते यदि न सिध्यति कोऽत्र दोषः ॥ ६ ॥
(पञ्चतन्त्रम् — मित्रभेदः — १४९)
पुराणमित्येव न साधु सर्वं न चापि काव्यं नवमित्यवद्यम् ।
सन्तः परीक्ष्यान्यतरद्भजन्ते मूढः परप्रत्ययनेयबुद्धिः ॥ ७ ॥
(मालविकाग्निमित्रम् — १.२)
सहसा विदधीत न क्रियामविवेकः परमापदां पदम् ।
वृणते हि विमृश्यकारिणं गुणलुब्धाः स्वयमेव सम्पदः ॥ ८ ॥
(किरातार्जुनीयम् — २.३०)
सार (Hindi Summary)
‘मनःपूतं समाचरेत्’ पाठ का आरम्भ आचार्य एवं छात्रों के एक संवाद से होता है। छात्र पूछते हैं कि किसी कार्य को करने से पहले क्या आवश्यक है। उत्तर मिलता है – कार्य को सोच-विचारकर, पूर्ण मन से एवं उचित विधि से करना चाहिए। आचार्य समझाते हैं कि यदि मन ही मलिन हो और उद्देश्य अनुचित हो, तो कार्य का फल भी दूषित ही होगा। अतः सभी कार्य पवित्र मन से करने चाहिए – यही पाठ का मूल संदेश है। पाठ में संकलित आठ सुभाषित विभिन्न ग्रन्थों से लिए गए हैं और वे वर्तमान युग में भी आचरणीय हैं।
प्रथम श्लोक (मनुस्मृति) उपदेश देता है कि देखकर पैर रखो, वस्त्र से छानकर जल पिओ, सत्य से पवित्र वाणी बोलो और मन से पवित्र होकर आचरण करो। दूसरा श्लोक धर्म के दस लक्षण बताता है – धैर्य, क्षमा, संयम, चोरी न करना, शुचिता, इन्द्रिय-निग्रह, बुद्धि, विद्या, सत्य एवं अक्रोध। तीसरा श्लोक (गीता) कहता है कि श्रेष्ठ पुरुष जो आचरण करता है, सामान्य जन उसी का अनुसरण करते हैं; अतः महान् व्यक्ति को आदर्श आचरण रखना चाहिए। चौथा श्लोक अभ्यास की महिमा गाता है – सभी क्रियाएँ, कलाएँ, यहाँ तक कि ध्यान एवं मौन भी अभ्यास से सिद्ध होते हैं।
पाँचवाँ श्लोक (नीतिशतक) तीन प्रकार के लोगों का वर्णन करता है – नीच विघ्न के भय से कार्य आरम्भ ही नहीं करते, मध्यम आरम्भ करके विघ्न आने पर छोड़ देते हैं, किन्तु उत्तम जन बार-बार बाधित होकर भी कार्य नहीं छोड़ते। छठा श्लोक (पञ्चतन्त्र) कहता है कि लक्ष्मी उद्योगी पुरुष-सिंह को प्राप्त होती है; कायर लोग भाग्य का बहाना बनाते हैं, अतः भाग्य की चिन्ता छोड़कर पुरुषार्थ करो। सातवाँ श्लोक (मालविकाग्निमित्र) विवेक सिखाता है – न तो हर पुराना श्रेष्ठ है और न हर नया दोषपूर्ण; सज्जन परीक्षा करके ही ग्रहण करते हैं। आठवाँ श्लोक (किरातार्जुनीय) सावधान करता है कि बिना विचार किए सहसा कोई कार्य न करो; विवेकपूर्वक कार्य करने वाले को सम्पत्तियाँ स्वयं वरण करती हैं। संक्षेप में, पूरा पाठ पवित्र आचरण, विवेक, परिश्रम एवं धर्ममय जीवन की प्रेरणा देता है।
शब्दार्थ (सर्वं शब्देन भासते)
| शब्दः (Sanskrit) | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| न्यसेत् | स्थापित करे, रखे | Should place |
| पदम् | स्थान / पैर | Place / foot |
| पूतम् | शुद्ध, पवित्र | Cleansed, pure |
| वाचम् | वाणी को | Speech |
| दमः | इन्द्रिय एवं मन को वश में करना | Self-control of senses |
| अस्तेयम् | चोरी न करना | Not stealing |
| शौचम् | पवित्रता, शुचिता | Purity |
| अनुवर्तते | अनुसरण करता है | Follows |
| अभ्यासात् | अभ्यास से | By practice |
| विघ्नविहताः | विघ्नों से हत/बाधित | Struck by obstacles |
| विरमन्ति | (कार्य) छोड़ देते हैं, रुक जाते हैं | Stop, leave off |
| प्रतिहन्यमानाः | बार-बार बाधित होते हुए | Being obstructed |
| उद्योगिनम् | प्रयत्न करने वाले को | Industrious one |
| कापुरुषाः | कायर / अधम लोग | Cowards |
| दैवम् | भाग्य, विधि | Luck / fate |
| निहत्य | अतिक्रमण करके, हटाकर | Having overcome |
| पुराणम् | पुराना, पुरातन | Old |
| अवद्यम् | निम्नस्तरीय, निन्दनीय | Inferior, blameworthy |
| सन्तः | सज्जन लोग | Great / virtuous people |
| परप्रत्ययनेयबुद्धिः | दूसरों के कहने से निर्देशित बुद्धि वाला | One led by others’ opinions |
| मूढः | मूर्ख | Fool |
| विदधीत | करना चाहिए | Should do |
| विमृश्यकारिणम् | विचारकर कार्य करने वाले को | One who acts thoughtfully |
| गुणलुब्धाः | गुण को चाहने वाली | Those desiring good qualities |
| वृणते | वरण करती हैं, आश्रय लेती हैं | Choose, take refuge |
| सम्पदः | सम्पत्तियाँ | Wealth, riches |
| भजन्ते | स्वीकार करते हैं | Accept |
| यत्ने | यत्न / प्रयत्न में | By effort |
अभ्यासाद् जायते सिद्धिः
1. अधः प्रदत्तानां प्रश्नानां पूर्णवाक्येन उत्तरं लिखत —
(क) लोकः कस्य आचरणम् अनुकरोति ?
(ख) कीदृशी वाणी वक्तव्या ?
(ग) लक्ष्मीः कम् उपैति ?
(घ) उत्तमजनाः कार्यं प्रारभ्य किं न कुर्वन्ति ?
(ङ) धर्मस्य लक्षणानि कानि ?
(च) सकलाः कलाः कस्मात् सिध्यन्ति ?
(छ) सम्पदः कं वृणते ?
2. अधोलिखितेषु श्लोकांशेषु रिक्तस्थानानि पूरयत —
3. रेखाङ्कितानि पदानि आधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत —
(मूल वाक्य में रेखांकित पद के आधार पर उपयुक्त प्रश्नवाचक पद लगाकर प्रश्न बनाइए।)
| वाक्यम् (रेखाङ्कित पद मोटे अक्षरों में) | प्रश्ननिर्माणम् |
|---|---|
| (क) नीचैः विघ्नभयेन कार्यं न प्रारभ्यते । | कैः विघ्नभयेन कार्यं न प्रारभ्यते ? |
| (ख) सकलाः कलाः अभ्यासात् सिध्यन्ति । | सकलाः कलाः कस्मात् सिध्यन्ति ? |
| (ग) वस्त्रपूतं जलं पिबेत् । | कीदृशं जलं पिबेत् ? |
| (घ) लक्ष्मीः पुरुषसिंहम् उपैति । | लक्ष्मीः कम् उपैति ? |
| (ङ) सन्तः परीक्ष्य अन्यतरद् भजन्ते । | सन्तः परीक्ष्य किं भजन्ते ? |
| (च) क्रियां सहसा न विदधीत । | क्रियां कथं न विदधीत ? |
4. अधोलिखितं श्लोकं पठित्वा प्रश्नानाम् उत्तराणि लिखत —
दृष्टिपूतं न्यसेत् पादं वस्त्रपूतं जलं पिबेत् ।
सत्यपूतां वदेत् वाचं मनःपूतं समाचरेत् ॥
(क) अस्मिन् श्लोके प्रथमं क्रियापदं किम् ?
(ख) कं न्यसेत् ?
(ग) कीदृशं पादं न्यसेत् ?
(घ) द्वितीयं किं क्रियापदम् अस्ति ?
(ङ) किं पिबेत् ?
(च) कीदृशं जलं पिबेत् ?
(छ) तृतीयं किं क्रियापदम् अस्ति ?
(ज) कां वदेत् ?
(झ) कीदृशीं वाणीं वदेत् ?
(ञ) चतुर्थं किं क्रियापदम् अस्ति ?
(ट) कथं समाचरेत् ?
5. मञ्जूषातः पदानि चित्वा भावार्थेषु रिक्तस्थानानि पूरयत —
मञ्जूषा: बुद्धिः, लक्ष्यं, पुरुषस्य, अभिप्रायं, धीराः, नूतनम्
6. श्लोकानाम् अन्वयेषु रिक्तस्थानानि पूरयत —
7. यथोचितं मेलनं कुरुत —
| श्लोकांशः | स्रोतोग्रन्थः |
|---|---|
| (क) पुराणमित्येव न साधु सर्वम् | १. मनुस्मृतिः |
| (ख) प्रारभ्य चोत्तमजनाः न परित्यजन्ति | २. पञ्चतन्त्रम् |
| (ग) यद्यदाचरति श्रेष्ठः | ३. नीतिशतकम् |
| (घ) धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयम् | ४. मालविकाग्निमित्रम् |
| (ङ) उद्योगिनं पुरुषसिंहमुपैति लक्ष्मीः | ५. श्रीमद्भगवद्गीता |
8. रेखाङ्कितेषु पदेषु सन्धिविच्छेदं कुरुत —
यथा – यो बहून्यपि साधयेत् → बहूनि + अपि
9. अत्र कतिचन विग्रहवाक्यानि दत्तानि सन्ति । तेषां समस्तपदानि पाठात् चित्वा लिखत —
यथा – मनसा पूतं समाचरेत् → मनःपूतम्
| विग्रहवाक्यानि | समस्तपदानि (उत्तर) |
|---|---|
| (क) विघ्नैः विहताः (कार्यात्) विरमन्ति । | विघ्नविहताः |
| (ख) वस्त्रेण पूतं जलं पिबेत् । | वस्त्रपूतम् |
| (ग) पुरुषः सिंहः इव तम् उपैति लक्ष्मीः । | पुरुषसिंहम् |
| (घ) उत्तमाः जनाः न परित्यजन्ति । | उत्तमजनाः |
| (ङ) न विवेकः परमापदां पदम् । | अविवेकः |
अत्र इदम् अवधेयम् (श्लोकानाम् अन्वयः)
पाठ में ‘अत्र इदम् अवधेयम्’ के अन्तर्गत आठ श्लोकों का अन्वय (पदक्रम) दिया गया है, जिससे श्लोक का अर्थ सरलता से समझ में आता है। नीचे प्रत्येक श्लोक का अन्वय एवं संक्षिप्त भावार्थ दिया गया है।
श्लोक 1 (मनुस्मृति ६.४६)
अन्वयः: दृष्टिपूतं पादं न्यसेत्, वस्त्रपूतं जलं पिबेत्, सत्यपूतां वाचं वदेत्, मनःपूतं समाचरेत् ।
भावार्थ: देखकर (मार्ग पर दृष्टि डालकर) पैर रखे, वस्त्र से छानकर जल पिए, सत्य से पवित्र वाणी बोले तथा मन से पवित्र होकर ही आचरण करे।
श्लोक 2 (मनुस्मृति ६.९२)
अन्वयः: धृतिः, क्षमा, दमः, अस्तेयं, शौचम्, इन्द्रियनिग्रहः, धीः, विद्या, सत्यम्, अक्रोधः (च इति) दशकं धर्मलक्षणं (भवति) ।
भावार्थ: धैर्य, क्षमा, संयम, चोरी न करना, पवित्रता, इन्द्रिय-निग्रह, बुद्धि, विद्या, सत्य एवं अक्रोध – ये धर्म के दस लक्षण हैं।
श्लोक 3 (श्रीमद्भगवद्गीता ३.२१)
अन्वयः: श्रेष्ठः यत् यत् आचरति इतरः जनः तत् तत् एव (आचरति) । सः यत् प्रमाणं कुरुते, लोकः तत् अनुवर्तते ।
भावार्थ: श्रेष्ठ पुरुष जो-जो आचरण करता है, सामान्य जन भी वही-वही करते हैं; वह जिसे प्रमाण (आदर्श) मानता है, संसार उसी का अनुसरण करता है।
श्लोक 4 (सुभाषितरत्नभाण्डागार)
अन्वयः: सर्वाः क्रियाः अभ्यासेन (सिध्यन्ति) । सकलाः कलाः अभ्यासात् (सिध्यन्ति) । ध्यानमौनादि (अपि) अभ्यासात् (सिध्यति) । अभ्यासस्य दुष्करं किम् (अस्ति) ?
भावार्थ: सभी क्रियाएँ, समस्त कलाएँ, यहाँ तक कि ध्यान एवं मौन भी अभ्यास से ही सिद्ध होते हैं; फिर अभ्यास के लिए कठिन क्या है?
श्लोक 5 (नीतिशतक २७)
अन्वयः: नीचैः विघ्नभयेन (कार्यं) न प्रारभ्यते खलु । मध्याः (कार्यं) प्रारभ्य विघ्नविहताः (कार्यात्) विरमन्ति । उत्तमजनाः (कार्यं) प्रारभ्य विघ्नैः पुनः पुनः अपि प्रतिहन्यमानाः (कार्यं) न परित्यजन्ति ।
भावार्थ: नीच लोग विघ्न के भय से कार्य आरम्भ ही नहीं करते; मध्यम लोग आरम्भ करके विघ्न आने पर छोड़ देते हैं; किन्तु उत्तम जन बार-बार बाधित होकर भी कार्य नहीं छोड़ते।
श्लोक 6 (पञ्चतन्त्र मित्रभेद १४९)
अन्वयः: लक्ष्मीः उद्योगिनं पुरुषसिंहम् उपैति, दैवेन देयम् इति (तु) कापुरुषाः वदन्ति, दैवं निहत्य पौरुषं कुरु, यत्ने कृते यदि (कार्यं) न सिध्यति, (तर्हि) अत्र कः दोषः (स्यात्) ?
भावार्थ: लक्ष्मी उद्यमी पुरुष-सिंह को प्राप्त होती है; ‘भाग्य से ही मिलता है’ ऐसा तो कायर कहते हैं। भाग्य को छोड़कर अपनी शक्ति से पुरुषार्थ करो; यत्न करने पर भी यदि सफलता न मिले तो इसमें क्या दोष है?
श्लोक 7 (मालविकाग्निमित्र १.२)
अन्वयः: पुराणम् इति सर्वं साधु न (वर्तते), काव्यं नवम् इति अवद्यं न (वर्तते), सन्तः परीक्ष्य अन्यतरत् भजन्ते, मूढः परप्रत्ययनेयबुद्धिः (भवति) ।
भावार्थ: पुराना होने मात्र से सब कुछ श्रेष्ठ नहीं, और नया होने से कोई काव्य निन्दनीय नहीं। सज्जन परीक्षा करके ही दोनों में से उत्तम को ग्रहण करते हैं; मूर्ख तो दूसरों के कहने पर ही चलता है।
श्लोक 8 (किरातार्जुनीय २.३०)
अन्वयः: क्रियां सहसा न विदधीत, अविवेकः परम् आपदां पदम् (भवति), हि गुणलुब्धाः सम्पदः स्वयमेव विमृश्यकारिणं वृणते ।
भावार्थ: कोई भी कार्य बिना विचार किए सहसा न करे, क्योंकि अविवेक ही बड़ी विपत्तियों का घर है। गुणों की अभिलाषिणी सम्पत्तियाँ विचारपूर्वक कार्य करने वाले का स्वयं ही वरण करती हैं।
स्वाध्यायान्मा प्रमदः & परियोजनाकार्यम्
स्वाध्यायान्मा प्रमदः (भारतीय-ज्ञान-परम्परा-सारिणी)
पाठ में दी गई सारिणी से भारतीय-ज्ञान-परम्परा एवं ग्रन्थकर्ताओं (कवि-कालविषयक) का परिचय प्राप्त होता है।
| क्र. सं. | ग्रन्थस्य नाम | भारतीय-ज्ञानपरम्परा-स्थानम् | ग्रन्थकर्ता |
|---|---|---|---|
| १. | रामायणम् | ऐतिहासिकं काव्यम् | महर्षिः वाल्मीकिः |
| २. | मनुस्मृतिः | धर्मशास्त्रीयग्रन्थः | मनुः |
| ३. | श्रीमद्भगवद्गीता | ज्ञानोपदेशः | महर्षिः व्यासः |
| ४. | हठयोगप्रदीपिका | योग-दर्शनम् | स्वात्मारामः |
| ५. | नीतिशतकम् | नीति-साहित्यम् | भर्तृहरिः |
| ६. | पञ्चतन्त्रम् | कथा-साहित्यम् | विष्णुशर्मा |
| ७. | मालविकाग्निमित्रम् | रूपकम् | कालिदासः |
| ८. | किरातार्जुनीयम् | महाकाव्यम् | भारविः |
यस्तु क्रियावान् मनुजः स विद्वान् (परियोजनाकार्यम्)
1. पाठे आगतेषु सुभाषितेषु कानि-कानि जीवनमूल्यानि सन्ति ? तानि जीवनमूल्यानि अधिकृत्य पञ्च पञ्च सुभाषितानि सङ्गृह्णीत । तेषां सन्दर्भग्रन्थानां नामानि अपि लिखत ।
2. दृष्टिपूतं, वस्त्रपूतं, सत्यपूतं च आचरणं कथं भवेत् इति विषये स्वस्य अनुभवं कक्षायां कथयत ।
अतिरिक्त प्रश्न (Extra Questions)
लघु उत्तरीय प्रश्न (30–40 शब्द)
1. ‘मनःपूतं समाचरेत्’ पाठ किस प्रकार का है तथा इसका मूल संदेश क्या है?
2. प्रथम श्लोक (मनुस्मृति) में किन चार बातों का उपदेश है?
3. श्लोक 5 (नीतिशतक) में बताए गए तीन प्रकार के लोग कौन हैं?
4. श्लोक 6 (पञ्चतन्त्र) के अनुसार लक्ष्मी किसे प्राप्त होती है और कायर क्या कहते हैं?
5. श्लोक 8 (किरातार्जुनीय) में किस बात की चेतावनी दी गई है?
दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (100–120 शब्द)
6. ‘मनःपूतं समाचरेत्’ पाठ का केन्द्रीय भाव अपने शब्दों में स्पष्ट कीजिए।
7. इस पाठ में अभ्यास एवं पुरुषार्थ का क्या महत्त्व बताया गया है? सम्बन्धित श्लोकों के आधार पर लिखिए।
8. श्लोक 3 (गीता) एवं श्लोक 7 (मालविकाग्निमित्र) से कौन-से जीवनमूल्य प्राप्त होते हैं?
MCQ & अभिकथन-कारण
1. ‘मनःपूतं समाचरेत्’ पाठ किस प्रकार का है?
(क) एकाङ्क नाटक
(ख) सुभाषित-संग्रह
(ग) कथा
(घ) जीवनी
2. प्रथम एवं द्वितीय श्लोक किस ग्रन्थ से लिए गए हैं?
(क) नीतिशतकात्
(ख) पञ्चतन्त्रात्
(ग) मनुस्मृतेः
(घ) गीतायाः
3. धर्म के कितने लक्षण बताए गए हैं?
(क) पाँच
(ख) सात
(ग) दस
(घ) बारह
4. ‘यद्यदाचरति श्रेष्ठः…’ श्लोक किस ग्रन्थ से है?
(क) श्रीमद्भगवद्गीता
(ख) किरातार्जुनीयम्
(ग) मालविकाग्निमित्रम्
(घ) रामायणम्
5. सकलाः कलाः कस्मात् सिध्यन्ति?
(क) दैवात्
(ख) अभ्यासात्
(ग) धनात्
(घ) भाग्यात्
6. लक्ष्मीः किसके पास जाती है?
(क) कापुरुषं
(ख) आलसिनं
(ग) उद्योगिनं पुरुषसिंहम्
(घ) मूढं
7. श्लोक 5 (नीतिशतक) के अनुसार कौन कार्य आरम्भ ही नहीं करते?
(क) उत्तमजनाः
(ख) मध्याः
(ग) नीचाः
(घ) सन्तः
8. ‘अविवेकः’ किसका घर (पद) कहा गया है?
(क) सम्पदाम्
(ख) परमापदाम्
(ग) सुखानाम्
(घ) गुणानाम्
9. श्लोक 7 के अनुसार सज्जन (सन्तः) क्या करते हैं?
(क) पुराने को ही स्वीकारते हैं
(ख) नये को ही स्वीकारते हैं
(ग) परीक्षा करके श्रेष्ठ को ग्रहण करते हैं
(घ) दूसरों के कहने पर चलते हैं
10. ‘सम्पदः’ किसका वरण करती हैं?
(क) सहसाकारिणम्
(ख) विमृश्यकारिणम्
(ग) मूढम्
(घ) कापुरुषम्
अभिकथन-कारण – नीचे अभिकथन (A) और कारण (R) दिए गए हैं। सही विकल्प चुनिए—
(क) A और R दोनों सही, R, A की सही व्याख्या है। (ख) A और R दोनों सही, पर R, A की सही व्याख्या नहीं। (ग) A सही, R गलत। (घ) A गलत, R सही।
1. अभिकथन (A): मनुष्य को मन से पवित्र होकर ही आचरण करना चाहिए।
कारण (R): यदि मन मलिन हो तो किए गए कार्य का फल भी दूषित होता है।
2. अभिकथन (A): श्रेष्ठ पुरुष का आचरण समाज के लिए आदर्श बन जाता है।
कारण (R): श्रेष्ठ जन जो आचरण करता है, सामान्य जन उसी का अनुसरण करते हैं।
3. अभिकथन (A): अभ्यास से कुछ भी कठिन नहीं रहता।
कारण (R): सभी क्रियाएँ, कलाएँ तथा ध्यान-मौन भी अभ्यास से ही सिद्ध होते हैं।
4. अभिकथन (A): केवल भाग्य पर निर्भर रहना कायरता है।
कारण (R): लक्ष्मी आलसी एवं निरुद्यमी पुरुष को ही प्राप्त होती है।
5. अभिकथन (A): किसी भी कार्य को बिना विचार किए सहसा नहीं करना चाहिए।
कारण (R): अविवेक बड़ी विपत्तियों का घर है, तथा सम्पत्तियाँ विवेकी का ही वरण करती हैं।
परीक्षा-सुझाव एवं सामान्य त्रुटियाँ
परीक्षा-सुझाव (Exam Tips)
- आठों श्लोक उनके स्रोत-ग्रन्थ (मनुस्मृति, गीता, नीतिशतक, पञ्चतन्त्र आदि) के साथ याद रखें – मेलनम् एवं श्लोक-स्रोत के प्रश्न प्रायः आते हैं।
- श्लोक 1 (दृष्टिपूतं…) एवं श्लोक 2 (दशकं धर्मलक्षणम्) कण्ठस्थ करें; इनसे रिक्तस्थान एवं अन्वय के प्रश्न बनते हैं।
- शब्दार्थ संस्कृत, हिन्दी एवं अंग्रेज़ी तीनों में याद रखें (न्यसेत्, अवद्यम्, वृणते, विमृश्यकारिणम् आदि)।
- ‘पूर्णवाक्येन उत्तरम्’ वाले प्रश्नों में पूरा वाक्य लिखें, केवल एक शब्द नहीं।
- सन्धिविच्छेद एवं समस्तपद के नियम (विसर्ग-सन्धि, स्वर-सन्धि, तत्पुरुष/नञ्-समास) अभ्यास करें।
सामान्य त्रुटियाँ (Common Mistakes)
- श्लोकों के स्रोत-ग्रन्थ आपस में मिला देना – श्लोक 3 गीता का है, श्लोक 6 पञ्चतन्त्र का।
- सन्धिविच्छेद की भूल – ‘दमोऽस्तेयम्’ = दमः + अस्तेयम् (विसर्ग-सन्धि), ‘चोत्तमजनाः’ = च + उत्तम + जनाः।
- ‘अविवेकः’ का विग्रह – न विवेकः = अविवेकः (नञ्-तत्पुरुष); इसे ‘विवेकः’ न समझें।
- मात्रा एवं विसर्ग की अशुद्धि – न्यसेत्, वाचम्, वृणते, सम्पदः को शुद्ध लिखें।
- लक्ष्मी के विषय में उलटा अर्थ – वह उद्यमी को मिलती है, आलसी/कायर को नहीं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
शारदा कक्षा 9 का छठा पाठ ‘मनःपूतं समाचरेत्’ किस प्रकार का पाठ है?
यह एक सुभाषित-संग्रह है, जिसमें मनुस्मृति, श्रीमद्भगवद्गीता, नीतिशतक, पञ्चतन्त्र, मालविकाग्निमित्र एवं किरातार्जुनीय आदि ग्रन्थों से आठ चयनित नीति-श्लोक संकलित हैं। इसका मूल संदेश पवित्र मन से आचरण करना है।
‘मनःपूतं समाचरेत्’ का अर्थ क्या है?
इसका अर्थ है – ‘मन से पवित्र होकर ही आचरण करो’। यदि मन मलिन हो तो कार्य का फल भी दूषित होता है, अतः हर कार्य शुद्ध मन एवं उचित उद्देश्य से करना चाहिए।
धर्म के दस लक्षण कौन-से हैं?
मनुस्मृति के श्लोक के अनुसार धर्म के दस लक्षण हैं – धृति (धैर्य), क्षमा, दम (संयम), अस्तेय (चोरी न करना), शौच (पवित्रता), इन्द्रिय-निग्रह, धी (बुद्धि), विद्या, सत्य एवं अक्रोध।
श्लोक, अन्वय-शीर्षक, प्रश्न एवं अभ्यास-शीर्षक NCERT शारदा पुस्तक से ज्यों-के-त्यों लिए गए हैं; सार, भावार्थ एवं उत्तर ClearStudy द्वारा मौलिक रूप से तैयार किए गए हैं।
