NCERT Solutions for Class 10 Hindi (कृतिका 2) अध्याय 1: माता का अँचल – प्रश्न-उत्तर, सार एवं शब्दार्थ (NCERT 2026–27)

यह पृष्ठ कक्षा 10 हिंदी की पूरक पाठ्यपुस्तक कृतिका (भाग 2) के अध्याय 1 ‘माता का अँचल’ (लेखक – शिवपूजन सहाय) का पूरा समाधान देता है – पाठ का सार, शब्दार्थ, पाठ्यपुस्तक के सभी प्रश्न-अभ्यास के उत्तर, अतिरिक्त प्रश्न, MCQ तथा अभिकथन-कारण।

कक्षा: 10 विषय: हिंदी पुस्तक: कृतिका (भाग 2) अध्याय: 1 लेखक: शिवपूजन सहाय विधा: संस्मरण/उपन्यास-अंश सत्र: 2026–27

लेखक परिचय – शिवपूजन सहाय

शिवपूजन सहाय का जन्म सन् 1893 में बिहार के शाहाबाद (अब भोजपुर) जिले के उनवाँस गाँव में हुआ था। वे हिंदी के प्रतिष्ठित कथाकार, संपादक और गद्य-शिल्पी थे। उन्होंने अध्यापन और पत्रकारिता से जीवन आरंभ किया तथा मतवाला, माधुरी, गंगा, हिमालय, बालक आदि अनेक पत्र-पत्रिकाओं का संपादन किया। उनकी भाषा में ग्रामीण जीवन की सहजता, आंचलिक शब्दों की मिठास और चित्रात्मकता मिलती है। देहाती दुनिया उनका प्रसिद्ध आंचलिक उपन्यास है, जिसे हिंदी का पहला आंचलिक उपन्यास माना जाता है; प्रस्तुत पाठ ‘माता का अँचल’ इसी उपन्यास का एक अंश है। उनकी रचनाओं में बिहार के ग्रामीण जीवन, वहाँ के रीति-रिवाज़ और बाल-मनोविज्ञान का जीवंत चित्रण मिलता है। हिंदी-सेवा के लिए उन्हें पद्मभूषण से सम्मानित किया गया। सन् 1963 में उनका निधन हुआ।

पाठ का सार

‘माता का अँचल’ शिवपूजन सहाय के आंचलिक उपन्यास देहाती दुनिया का एक अंश है, जिसमें तीस के दशक के ग्रामीण जीवन और बाल-मन का सजीव चित्रण हुआ है। पाठ का नायक एक छोटा बालक है, जिसका असली नाम तारकेश्वरनाथ है, पर पिता उसे प्यार से ‘भोलानाथ’ कहकर पुकारते हैं। वह अपने पिता (बाबू जी) से बहुत जुड़ा हुआ है; माँ से उसका नाता केवल दूध पीने तक का है।

बाबू जी प्रातः उठकर स्नान-पूजा करते और बालक को भी साथ नहलाकर माथे पर त्रिपुंड एवं भभूत लगा देते, जिससे वह ‘बम-भोला’ जैसा दिखने लगता। पूजा-पाठ के बाद वे राम-नाम लिखते, आटे की गोलियों में राम-नाम लपेटकर गंगा की मछलियों को खिलाते और बालक को कंधे पर बिठाए घूमते। कभी कुश्ती लड़ते, कभी झूला झुलाते और भोजन के समय तरह-तरह के पशु-पक्षियों के नाम लेकर कौर बनाकर खिलाते। मइया कहती कि पिता बच्चे को ठीक से नहीं खिलाते।

बालक अपने हमजोलियों के साथ तरह-तरह के नाटक खेलता था – मिठाई की दुकान लगाना, घरौंदा बनाना, बारात का जुलूस निकालना, खेती करना और तुकबंदी गाना। बच्चों की यह दुनिया भोली, स्वाभाविक और कल्पना से भरी थी। एक दिन आँधी-वर्षा के बाद बाग में बिच्छू निकल आए और बच्चों ने बूढ़े मूसन तिवारी को चिढ़ाया, जिस पर वे उन्हें खदेड़ने लगे।

अंत में टीले पर चूहों के बिल से पानी उलीचते समय एक साँप निकल आया। डर के मारे बच्चे बेतहाशा भागे, गिरे-पड़े और लहूलुहान हो गए। भयभीत बालक दौड़कर घर पहुँचा। उस समय बाबू जी ओसारे में हुक्का पी रहे थे और उन्होंने उसे पुकारा भी, पर बालक उनकी अनसुनी कर सीधे मइया की गोद में जा छिपा। माँ उसे काँपता देख रो पड़ी, उसके घावों पर हल्दी थोपी और प्यार से सहलाने लगी। बाबू जी ने भी दौड़कर उसे अपनी गोद में लेना चाहा, पर बालक ने माँ के अँचल की – प्रेम और शांति के चँदोवे की – छाया नहीं छोड़ी। इस प्रकार पाठ यह मार्मिक सत्य उद्घाटित करता है कि संकट के क्षण में बच्चे को सबसे सुरक्षित आश्रय माँ का अँचल ही लगता है।

मूलभाव

पाठ का मूलभाव यह है कि बालक का जुड़ाव चाहे पिता से कितना ही गहरा क्यों न हो, विपत्ति और भय के क्षण में उसे माँ की गोद और अँचल ही सबसे सुरक्षित शरण-स्थल लगते हैं। साथ ही यह पाठ तीस के दशक की ग्राम्य-संस्कृति, बच्चों के भोले खेल-तमाशे और माता-पिता के निश्छल वात्सल्य का जीवंत एवं मार्मिक चित्र प्रस्तुत करता है।

कठिन शब्द-अर्थ

शब्दअर्थ
अँचलसाड़ी का छोर, आँचल
मृदंगएक प्रकार का वाद्य यंत्र, ढोलक
तड़केप्रभात, सवेरा, भोर
ललाटमाथा
त्रिपुंडएक प्रकार का तिलक जिसमें ललाट पर तीन आड़ी या अर्धचंद्राकार रेखाएँ बनाई जाती हैं
भभूतराख, विभूति (शिव-भक्तों द्वारा शरीर पर लगाई जाने वाली)
निहारनाध्यान से देखना, ताकना
उतानपीठ के बल लेटना
साननामिलाना, लपेटना, गूँधना
अफर जानाभरपेट से अधिक खा लेना
ठौरस्थान, अवसर
महतारीमाता, माँ
चँदोवाछोटा शामियाना, चँदवा
ज्योनारभोज, दावत
जीमनाभोजन करना
ओहारपरदे के लिए डाला हुआ कपड़ा
अमोलाआम का उगता हुआ पौधा
कसोरामिट्टी का बना छिछला कटोरा
अँटईकुत्ते के शरीर में चिपके रहने वाले छोटे कीड़े, किलनी
चिरौरीदीनतापूर्वक की जाने वाली प्रार्थना, विनती
रजेरी (रहरी)अरहर
ओसाराबरामदा
अमनिया करनासाफ़, शुद्ध करना (अनाज बीनना)
बेतहाशाबदहवास होकर, बहुत तेजी से
लहूलुहानखून से लथपथ

पाठ्यपुस्तक के प्रश्न-अभ्यास के उत्तर

नीचे NCERT कृतिका (भाग 2) के ‘प्रश्न-अभ्यास’ के सभी प्रश्न ज्यों-के-त्यों दिए गए हैं; प्रत्येक का उत्तर परीक्षा-उपयोगी हिंदी में दिया गया है।

1. प्रस्तुत पाठ के आधार पर यह कहा जा सकता है कि बच्चे का अपने पिता से अधिक जुड़ाव था, फिर भी विपदा के समय वह पिता के पास न जाकर माँ की शरण लेता है। आपकी समझ से इसकी क्या वजह हो सकती है?

उत्तरयद्यपि बालक दिन-भर पिता के साथ खेलता, घूमता और उन्हीं से जुड़ा रहता था, फिर भी संकट के क्षण में वह माँ की गोद में ही गया।इसका कारण यह है कि पिता का प्रेम खेल, मनोरंजन और बाहरी दुनिया से जुड़ा था, जबकि माँ का प्रेम सुरक्षा, ममता और भावनात्मक संबल से जुड़ा है।भय और पीड़ा के समय बालक को जिस वात्सल्य और आत्मीय सुरक्षा की आवश्यकता होती है, वह माँ के अँचल में ही मिलती है। माँ की कोमलता और ममतामयी छाया उसे सबसे सुरक्षित आश्रय जान पड़ती है, इसलिए वह स्वाभाविक रूप से माँ की शरण में चला जाता है।

2. आपके विचार से भोलानाथ अपने साथियों को देखकर सिसकना क्यों भूल जाता है?

उत्तरबच्चों का मन बहुत चंचल और खेल-प्रिय होता है; उनका दुख और रुलाई क्षणिक होती है।भोलानाथ को जब अपने खेल के साथी दिखाई देते हैं, तो उसका ध्यान रोने से हटकर खेल-तमाशों की ओर चला जाता है।साथियों के साथ खेलने, हँसने और तरह-तरह के नाटक करने का आकर्षण इतना प्रबल होता है कि वह अपनी सिसकी, डाँट या मार-पीट सब भूल जाता है। यही बाल-स्वभाव की सहजता और निश्छलता है।

3. आपने देखा होगा कि भोलानाथ और उसके साथी जब-तब खेलते-खाते समय किसी न किसी प्रकार की तुकबंदी करते हैं। आपको यदि अपने खेलों आदि से जुड़ी तुकबंदी याद हो तो लिखिए।

उत्तर (संभावित)यह विद्यार्थी के अपने अनुभव पर आधारित प्रश्न है। पाठ में “जब खाएगा बड़े-बड़े कौर, तब पाएगा दुनिया में ठौर” तथा “राम जी की चिरई, राम जी का खेत, खा लो चिरई भर-भर पेट” जैसी तुकबंदियाँ आई हैं।अपने खेलों से जुड़ी कुछ तुकबंदियाँ इस प्रकार लिखी जा सकती हैं –“अक्कड़-बक्कड़ बम्बे बो, अस्सी-नब्बे पूरे सौ।”“पोशम्पा भई पोशम्पा, डाकू ने क्या किया।”“चंदा मामा दूर के, पुए पकाएँ बूर के।” (विद्यार्थी अपने क्षेत्र की तुकबंदियाँ भी जोड़ सकते हैं।)

4. भोलानाथ और उसके साथियों के खेल और खेलने की सामग्री आपके खेल और खेलने की सामग्री से किस प्रकार भिन्न है?

उत्तरभोलानाथ और उसके साथी प्रकृति और घर-आँगन की वस्तुओं से ही खेल और खिलौने बना लेते थे – धूल की मेड़, तिनकों का छप्पर, मिट्टी के बर्तन, ठीकरों के बटखरे, कागज़ की मिठाई की दुकान और रस्सी से बँधा काठ का घोड़ा।उनके खेल कल्पना-प्रधान थे, जैसे – घरौंदा बनाना, बारात निकालना, खेती करना, मिठाई की दुकान लगाना।इसके विपरीत आज के खेलों में बने-बनाए, बाज़ार से खरीदे खिलौने, क्रिकेट-बैट, साइकिल, वीडियो गेम और मोबाइल जैसे आधुनिक साधन अधिक हैं।उनके खेल सामूहिक, स्वाभाविक और प्रकृति के निकट थे, जबकि आज के अनेक खेल व्यक्तिगत, इलेक्ट्रॉनिक और घर के भीतर तक सीमित हो गए हैं।

5. पाठ में आए ऐसे प्रसंगों का वर्णन कीजिए जो आपके दिल को छू गए हों।

उत्तरपाठ के कई प्रसंग हृदय को छू जाते हैं –(क) बाबू जी का बालक को नहलाकर माथे पर त्रिपुंड लगाना और प्यार से ‘भोलानाथ’ पुकारना।(ख) पशु-पक्षियों के नाम लेकर कौर बनाकर खिलाना और मइया का यह कहना कि बच्चे को भर-मुँह कौर खिलाना चाहिए।(ग) बाबू जी का बालक के साथ कुश्ती लड़ना, बनावटी रोना रोना और चूमना।(घ) सबसे मार्मिक प्रसंग वह है जब भयभीत, लहूलुहान बालक दौड़कर माँ की गोद में छिप जाता है, माँ रो पड़ती है, उसके घावों पर हल्दी थोपती है और बालक पिता की गोद में जाने के बजाय माँ के अँचल की छाया नहीं छोड़ता। यह प्रसंग माँ के वात्सल्य को अत्यंत मार्मिक रूप में प्रस्तुत करता है।

6. इस उपन्यास अंश में तीस के दशक की ग्राम्य संस्कृति का चित्रण है। आज की ग्रामीण संस्कृति में आपको किस तरह के परिवर्तन दिखाई देते हैं।

उत्तरतीस के दशक की ग्राम्य संस्कृति में सामूहिकता, सादगी और प्रकृति से जुड़ाव था – बच्चे प्राकृतिक वस्तुओं से खेलते, लोग गंगा-स्नान, पूजा-पाठ और पारंपरिक रीति-रिवाज़ों में जीते थे।आज की ग्रामीण संस्कृति में अनेक परिवर्तन दिखाई देते हैं –(क) बिजली, मोबाइल, टी.वी., इंटरनेट और मशीनों का आगमन हुआ है।(ख) खेती में ट्रैक्टर, थ्रेशर जैसे आधुनिक उपकरणों का प्रयोग बढ़ा है।(ग) बच्चों के पारंपरिक सामूहिक खेलों का स्थान मोबाइल और वीडियो गेम ने ले लिया है।(घ) शिक्षा, यातायात और संचार के साधन सुलभ हुए हैं, पर साथ ही पारस्परिक सादगी, मेल-जोल और प्राकृतिक जीवन कुछ घटा है।

7. पाठ पढ़ते-पढ़ते आपको भी अपने माता-पिता का लाड़-प्यार याद आ रहा होगा। अपनी इन भावनाओं को डायरी में अंकित कीजिए।

उत्तर (नमूना डायरी)दिनांक: ……..   समय: रात्रि 9 बजेआज ‘माता का अँचल’ पाठ पढ़ते-पढ़ते मेरा मन अपने बचपन की ओर लौट गया। मुझे याद आया कि बीमार पड़ने पर माँ रात-रात भर मेरे पास जागती थीं और मेरे माथे पर हाथ फेरती थीं।पिता जी मुझे कंधे पर बिठाकर मेले ले जाते, मेरी छोटी-छोटी ज़िदें पूरी करते और गिरने पर तुरंत गोद में उठा लेते थे।आज समझ में आता है कि माता-पिता का यह निश्छल प्रेम ही जीवन की सबसे बड़ी पूँजी है। मैं ईश्वर से प्रार्थना करता हूँ कि उनका स्नेह-छाया सदा मुझ पर बनी रहे। (विद्यार्थी अपनी भावनाएँ स्वयं जोड़ें।)

8. यहाँ माता-पिता का बच्चे के प्रति जो वात्सल्य व्यक्त हुआ है उसे अपने शब्दों में लिखिए।

उत्तरपिता का वात्सल्य – बाबू जी बालक को नहलाकर तिलक लगाते, कंधे पर बिठाकर घुमाते, उसके साथ कुश्ती लड़ते, झूला झुलाते और तरह-तरह के नाम लेकर कौर बनाकर खिलाते थे। उनका प्रेम खेल और दुलार से भरा था।माता का वात्सल्य – मइया बालक को भर-पेट खिलाने की ज़िद करती, तेल-उबटन लगाकर सजाती और संकट के समय उसे गोद में छिपाकर रो पड़ती तथा उसके घावों पर हल्दी थोपती थी। उसका प्रेम सुरक्षा, ममता और त्याग से भरा था।इस प्रकार दोनों का वात्सल्य अपने-अपने ढंग से बालक को घेरे रहता है, पर माँ का अँचल संकट के समय सबसे बड़ा आश्रय बन जाता है।

9. माता का अँचल शीर्षक की उपयुक्तता बताते हुए कोई अन्य शीर्षक सुझाइए।

उत्तर‘माता का अँचल’ शीर्षक पूर्णतः उपयुक्त है, क्योंकि पूरा पाठ अंत में इसी भाव पर केंद्रित होता है कि विपत्ति के समय बालक पिता को छोड़कर माँ के अँचल की शरण लेता है।माँ का अँचल प्रेम, ममता, सुरक्षा और शांति का प्रतीक है; पाठ का मर्म इसी एक बिंदु पर आकर ठहरता है, इसलिए यह शीर्षक सार्थक है।अन्य संभावित शीर्षक – ‘बचपन की दुनिया’, ‘माँ की ममता’, ‘भोलानाथ’ अथवा ‘मातृ-प्रेम’।

10. बच्चे माता-पिता के प्रति अपने प्रेम को कैसे अभिव्यक्त करते हैं?

उत्तरबच्चे अपने प्रेम को निश्छल और सहज ढंग से प्रकट करते हैं –वे माता-पिता के साथ खेलने, उनकी गोद में बैठने, उनके साथ लिपटने और रूठने-मनाने के द्वारा अपना स्नेह जताते हैं।पाठ में भोलानाथ बाबू जी के साथ कुश्ती लड़कर, उनकी मूँछें नोचकर, माथे पर भभूत लगाने के लिए ज़िद करके अपना प्रेम प्रकट करता है।संकट के समय माँ की गोद में छिपकर और उसका अँचल न छोड़कर वह माँ के प्रति अपने गहरे विश्वास और प्रेम को व्यक्त करता है। इस प्रकार बच्चों का प्रेम शब्दों से नहीं, अपने स्वाभाविक व्यवहार से प्रकट होता है।

11. इस पाठ में बच्चों की जो दुनिया रची गई है वह आपके बचपन की दुनिया से किस तरह भिन्न है?

उत्तरपाठ में बच्चों की दुनिया प्रकृति, गाँव और कल्पना से जुड़ी हुई है – वे धूल-मिट्टी, तिनके, ठीकरे और काठ से खिलौने बनाते, घरौंदा-दुकान-बारात जैसे सामूहिक खेल खेलते और खुले मैदानों, बागों तथा नदी-किनारे घूमते थे।मेरे बचपन की दुनिया कुछ भिन्न है – इसमें स्कूल, बने-बनाए खिलौने, टी.वी., मोबाइल और कुछ इलेक्ट्रॉनिक खेल अधिक हैं तथा खेलने के खुले स्थान कम हो गए हैं।उनकी दुनिया में सामूहिकता, स्वतंत्रता और प्रकृति से निकटता अधिक थी, जबकि आज का बचपन अधिक सुविधा-संपन्न होते हुए भी कुछ सीमित और घर के भीतर तक सिमटा हुआ है। (विद्यार्थी अपने अनुभव के अनुसार लिखें।)

12. फणीश्वरनाथ रेणु और नागार्जुन की आंचलिक रचनाओं को पढ़िए।

उत्तर (पठन-कार्य)यह विद्यार्थी के स्वाध्याय और पठन के लिए दिया गया कार्य है। फणीश्वरनाथ रेणु एवं नागार्जुन आंचलिक साहित्य के प्रमुख रचनाकार हैं।फणीश्वरनाथ रेणु – उपन्यास मैला आँचल, परती परिकथा तथा कहानी मारे गए गुलफाम (तीसरी कसम) पढ़ी जा सकती है।नागार्जुन – उपन्यास बलचनमा, रतिनाथ की चाची तथा उनकी ग्रामीण जीवन से जुड़ी कविताएँ पढ़ी जा सकती हैं।इन रचनाओं को पढ़ने से आंचलिक भाषा, ग्रामीण जीवन और लोक-संस्कृति की गहरी समझ विकसित होगी।

अतिरिक्त प्रश्न

लघु उत्तरीय (अतिरिक्त)

1. पाठ के बालक का असली नाम क्या था और पिता उसे किस नाम से पुकारते थे?

उत्तरबालक का असली नाम तारकेश्वरनाथ था, पर पिता (बाबू जी) उसे बड़े प्यार से ‘भोलानाथ’ कहकर पुकारते थे।

2. बाबू जी प्रतिदिन पूजा-पाठ के बाद क्या करते थे?

उत्तरपूजा-पाठ के बाद बाबू जी राम-नाम लिखते, आटे की गोलियों में राम-नाम लपेटकर गंगा की मछलियों को खिलाते और लौटते समय बालक को झुके पेड़ों की डालों पर बिठाकर झूला झुलाते थे।

3. मइया बच्चे को खिलाने के विषय में बाबू जी से क्या कहती थी?

उत्तरमइया कहती थी कि बाबू जी चार-चार दाने के कौर देते हैं, इससे बच्चा थोड़ा खाकर ही समझ लेता है कि पेट भर गया; बच्चे को तो भर-मुँह कौर खिलाना चाहिए, तभी पेट भरता है।

4. बाग में आँधी-वर्षा के बाद बच्चे क्यों डरकर भागे?

उत्तरवर्षा बंद होते ही बाग में बहुत-से बिच्छू निकल आए, जिन्हें देखकर बच्चे डरकर भाग चले। इसी बीच बैजू ने बूढ़े मूसन तिवारी को चिढ़ाया, तो वे बच्चों को खदेड़ने लगे।

5. टीले पर खेलते समय कौन-सी घटना घटी जिससे बच्चे लहूलुहान हो गए?

उत्तरटीले पर चूहों के बिल से पानी उलीचते समय अचानक एक साँप निकल आया। डर के मारे बच्चे बेतहाशा भागे; कोई औंधा गिरा, किसी का सिर फूटा, किसी के दाँत टूटे और सबके पैरों के तलवे काँटों से छलनी होकर लहूलुहान हो गए।

दीर्घ उत्तरीय (अतिरिक्त)

6. ‘माता का अँचल’ पाठ के आधार पर माँ के वात्सल्य की मार्मिकता का वर्णन कीजिए।

उत्तरपाठ के अंत में माँ का वात्सल्य अत्यंत मार्मिक रूप में प्रकट होता है। जब डरा और घायल बालक दौड़कर माँ की गोद में छिप जाता है, तो माँ अपना सारा काम छोड़ देती है।बच्चे को भय से काँपता देखकर माँ ज़ोर से रो पड़ती है, अधीर होकर उसके भय का कारण पूछती है, उसे बार-बार अपने अँचल से पोंछती और चूमती है।वह झटपट हल्दी पीसकर उसके घावों पर थोपती है और प्रेम से उसे गले लगा लेती है। बालक केवल धीमे स्वर में “साँ–स–साँ” कहते हुए माँ के अँचल में दुबकता रहता है।जब बाबू जी उसे अपनी गोद में लेना चाहते हैं, तब भी बालक माँ के अँचल की छाया नहीं छोड़ता। यह प्रसंग सिद्ध करता है कि संकट के समय माँ का अँचल ही बालक के लिए सबसे सुरक्षित और शांतिदायक आश्रय है।

7. प्रस्तुत पाठ में तीस के दशक की ग्राम्य-संस्कृति किस प्रकार उभरकर आती है? सोदाहरण लिखिए।

उत्तरपाठ में तीस के दशक की ग्राम्य-संस्कृति का सजीव चित्र मिलता है। गाँव का जीवन सरल, प्रकृति से जुड़ा और सामूहिक था।बाबू जी का तड़के उठकर गंगा-स्नान, पूजा-पाठ और मछलियों को राम-नामी गोलियाँ खिलाना तत्कालीन धार्मिक जीवन को दर्शाता है।बच्चों का घरौंदा बनाना, मिठाई की दुकान लगाना, बारात निकालना और खेती का खेल खेलना ग्रामीण रीति-रिवाज़ों एवं सामूहिक खेलों का परिचय देता है।मिट्टी के बर्तन, धूल की मेड़, तिनकों के छप्पर, बैलगाड़ी और मेले जैसी बातें उस समय के सादगी-भरे ग्रामीण जीवन और लोक-संस्कृति को जीवंत कर देती हैं।

8. इस पाठ के आधार पर बाल-मनोविज्ञान की विशेषताएँ स्पष्ट कीजिए।

उत्तरपाठ बाल-मनोविज्ञान का सुंदर चित्रण करता है। बच्चों का मन चंचल, कल्पनाशील और खेल-प्रिय होता है।भोलानाथ का दुख और रुलाई क्षणिक है – साथियों को देखते ही वह सिसकना भूलकर खेल में लग जाता है।बच्चे प्रकृति की साधारण वस्तुओं से ही कल्पना के सहारे खेल और खिलौने रच लेते हैं तथा हर खेल में नाटकीयता एवं तुकबंदी का आनंद लेते हैं।भय के क्षण में बच्चे सबसे अधिक सुरक्षा माँ की गोद में अनुभव करते हैं। इस प्रकार पाठ बाल-स्वभाव की सहजता, निश्छलता और मातृ-प्रेम पर निर्भरता को सूक्ष्मता से उजागर करता है।

बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQ)

1. ‘माता का अँचल’ पाठ के लेखक कौन हैं?

(क) प्रेमचंद

(ख) शिवपूजन सहाय

(ग) फणीश्वरनाथ रेणु

(घ) नागार्जुन

उत्तर(ख) शिवपूजन सहाय।

2. पाठ के बालक का असली नाम क्या था?

(क) भोलानाथ

(ख) बैजू

(ग) तारकेश्वरनाथ

(घ) मूसन

उत्तर(ग) तारकेश्वरनाथ।

3. बालक अपनी माता को किस नाम से पुकारता था?

(क) माँ

(ख) मइया

(ग) महतारी

(घ) अम्मा

उत्तर(ख) मइया।

4. बाबू जी पूजा के बाद किसे आटे की गोलियाँ खिलाते थे?

(क) पक्षियों को

(ख) गाय को

(ग) गंगा की मछलियों को

(घ) कुत्तों को

उत्तर(ग) गंगा की मछलियों को।

5. ‘त्रिपुंड’ का अर्थ है–

(क) एक प्रकार का वाद्य यंत्र

(ख) ललाट पर तीन आड़ी रेखाओं वाला तिलक

(ग) एक प्रकार का भोजन

(घ) पूजा का बर्तन

उत्तर(ख) ललाट पर तीन आड़ी या अर्धचंद्राकार रेखाओं वाला तिलक।

6. बालक के माथे पर बाबू जी क्या लगाते थे, जिससे वह ‘बम-भोला’ बन जाता था?

(क) रोली

(ख) चंदन

(ग) भभूत

(घ) हल्दी

उत्तर(ग) भभूत।

7. बच्चों को बूढ़े मूसन तिवारी को किसने चिढ़ाया?

(क) भोलानाथ ने

(ख) बैजू ने

(ग) बाबू जी ने

(घ) मइया ने

उत्तर(ख) बैजू ने।

8. टीले पर पानी उलीचते समय बच्चों के सामने क्या निकल आया?

(क) बिच्छू

(ख) चूहा

(ग) साँप

(घ) कुत्ता

उत्तर(ग) साँप।

9. भयभीत होकर भागने पर बालक अंत में किसकी गोद में जा छिपा?

(क) बाबू जी की

(ख) मइया की

(ग) बैजू की

(घ) गुरु जी की

उत्तर(ख) मइया की।

10. माँ ने बालक के घावों पर क्या लगाया?

(क) तेल

(ख) भभूत

(ग) हल्दी

(घ) चंदन

उत्तर(ग) हल्दी।
उत्तर-कुंजी: 1–(ख), 2–(ग), 3–(ख), 4–(ग), 5–(ख), 6–(ग), 7–(ख), 8–(ग), 9–(ख), 10–(ग)।

अभिकथन-कारण

निर्देश – नीचे अभिकथन (A) और कारण (R) दिए गए हैं। सही विकल्प चुनिए—
(क) A और R दोनों सही, R, A की सही व्याख्या है। (ख) A और R दोनों सही, पर R, A की सही व्याख्या नहीं। (ग) A सही, R गलत। (घ) A गलत, R सही।

1. अभिकथन (A): विपत्ति के समय बालक पिता के पास न जाकर माँ की गोद में जा छिपा।

कारण (R): भय और पीड़ा के क्षण में बालक को माँ का अँचल सबसे सुरक्षित आश्रय लगता है।

उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है।

2. अभिकथन (A): भोलानाथ अपने साथियों को देखकर सिसकना भूल जाता है।

कारण (R): बच्चों का दुख क्षणिक होता है और उनका मन शीघ्र ही खेल की ओर मुड़ जाता है।

उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है।

3. अभिकथन (A): ‘माता का अँचल’ शीर्षक पाठ के लिए पूर्णतः उपयुक्त है।

कारण (R): पाठ में बालक का अधिकांश समय केवल माँ के साथ ही बीतता है।

उत्तर(ग) A सही है, पर R गलत है – बालक का अधिकांश समय पिता के साथ बीतता है; शीर्षक इसलिए उपयुक्त है क्योंकि अंत में संकट के समय वह माँ के अँचल की शरण लेता है।

4. अभिकथन (A): बच्चे प्रकृति और घर-आँगन की साधारण वस्तुओं से ही खेल और खिलौने बना लेते थे।

कारण (R): उस समय गाँव में बने-बनाए आधुनिक खिलौने सहज ही उपलब्ध थे।

उत्तर(ग) A सही है, पर R गलत है – आधुनिक खिलौने उपलब्ध न होने के कारण ही बच्चे कल्पना से प्राकृतिक वस्तुओं के खिलौने बनाते थे।

5. अभिकथन (A): बाबू जी का बालक के प्रति प्रेम खेल और दुलार से भरा हुआ था।

कारण (R): वे बालक के साथ कुश्ती लड़ते, झूला झुलाते और तरह-तरह के नाम लेकर कौर बनाकर खिलाते थे।

उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है।
उत्तर-कुंजी: 1–(क), 2–(क), 3–(ग), 4–(ग), 5–(क)।

परीक्षा-युक्तियाँ एवं सामान्य गलतियाँ

परीक्षा-युक्तियाँ

  • लेखक का नाम शिवपूजन सहाय और पाठ का स्रोत आंचलिक उपन्यास देहाती दुनिया अवश्य याद रखें।
  • पाठ का केंद्रीय भाव – “संकट के समय माँ का अँचल ही सबसे सुरक्षित आश्रय” – हर बड़े प्रश्न में जोड़ें।
  • उत्तर लिखते समय पाठ के प्रसंग (कुश्ती, मछलियों को खिलाना, घरौंदा, साँप वाली घटना) उदाहरण के रूप में दें।
  • आंचलिक शब्दों (मइया, अँचल, ज्योनार, ओसारा) के अर्थ शब्दार्थ-तालिका से याद कर लें।
  • शीर्षक की उपयुक्तता वाले प्रश्न में अन्य शीर्षक सुझाना न भूलें।

सामान्य गलतियाँ

  • लेखक को प्रेमचंद या रेणु लिख देना – यह पाठ शिवपूजन सहाय का है।
  • बालक के असली नाम (तारकेश्वरनाथ) और पुकारू नाम (भोलानाथ) को आपस में मिला देना।
  • यह मान लेना कि बालक का जुड़ाव माँ से अधिक था – वस्तुतः उसका दिन-भर का जुड़ाव पिता से अधिक था।
  • आंचलिक शब्दों का गलत अर्थ या गलत वर्तनी लिखना।
  • व्यक्तिगत/अनुभव-आधारित प्रश्नों (तुकबंदी, डायरी) में उदाहरण न देना।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

‘माता का अँचल’ पाठ के लेखक कौन हैं?

इस पाठ के लेखक शिवपूजन सहाय हैं। यह उनके प्रसिद्ध आंचलिक उपन्यास ‘देहाती दुनिया’ का एक अंश है।

पाठ के बालक का असली नाम क्या था?

बालक का असली नाम तारकेश्वरनाथ था, पर उसके पिता उसे प्यार से ‘भोलानाथ’ कहकर पुकारते थे।

विपत्ति के समय बालक पिता के पास न जाकर माँ की शरण क्यों लेता है?

दिन-भर पिता से जुड़े रहने पर भी, भय और पीड़ा के क्षण में बालक को माँ का अँचल ही सबसे सुरक्षित और ममतामयी आश्रय लगता है, इसलिए वह माँ की गोद में जा छिपता है।

प्रश्न NCERT कृतिका पुस्तक से ज्यों-के-त्यों लिए गए हैं; उत्तर ClearStudy द्वारा मौलिक रूप से तैयार एवं जाँचे गए हैं।

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