NCERT Solutions for Class 10 Hindi (Kshitij 2) अध्याय 10: एक कहानी यह भी (मन्नू भंडारी) – प्रश्न-उत्तर, सार एवं शब्दार्थ (NCERT 2026–27)

यह पृष्ठ कक्षा 10 हिंदी की पुस्तक क्षितिज भाग 2 (गद्य खंड) के अध्याय 10 ‘एक कहानी यह भी’ (लेखिका – मन्नू भंडारी) का पूरा एवं प्रामाणिक समाधान प्रस्तुत करता है। यहाँ पाठ्यपुस्तक के सभी प्रश्न-अभ्यास के उत्तर, सार, लेखिका-परिचय, कठिन शब्दार्थ, अतिरिक्त प्रश्न, MCQ तथा परीक्षा-युक्तियाँ दी गई हैं।

कक्षा: 10 विषय: हिंदी पुस्तक: क्षितिज भाग 2 (गद्य खंड) अध्याय: 10 लेखिका: मन्नू भंडारी विधा: आत्मकथ्य (संस्मरण) सत्र: 2026–27

लेखिका परिचय – मन्नू भंडारी

मन्नू भंडारी का जन्म सन् 1931 में मध्य प्रदेश के भानपुरा गाँव में हुआ था, किंतु उनकी आरंभिक शिक्षा-दीक्षा राजस्थान के अजमेर शहर में हुई। बाद में उन्होंने हिंदी में एम.ए. किया और दिल्ली के मिरांडा हाउस कॉलेज में अध्यापन कार्य किया। सन् 2021 में उनका देहांत हुआ। स्वातंत्र्योत्तर हिंदी कथा-साहित्य की वे प्रमुख हस्ताक्षर मानी जाती हैं। उनकी प्रमुख रचनाएँ हैं – एक प्लेट सैलाब, मैं हार गई, यही सच है, त्रिशंकु (कहानी-संग्रह); आपका बंटी, महाभोज (उपन्यास)। उन्होंने फ़िल्म एवं टेलीविजन धारावाहिकों के लिए पटकथाएँ भी लिखीं तथा एक कहानी यह भी नाम से आत्मकथ्य का प्रकाशन किया। उनकी रचनाओं में भाषा और शिल्प की सादगी, प्रामाणिक अनुभूति तथा स्त्री-मन से जुड़ी संवेदनाएँ विशेष रूप से मिलती हैं। उन्हें हिंदी अकादमी का शिखर सम्मान सहित अनेक पुरस्कार प्राप्त हुए।

पाठ का सार

‘एक कहानी यह भी’ मन्नू भंडारी का आत्मकथात्मक संस्मरण है, जिसमें उन्होंने सिलसिलेवार आत्मकथा न लिखकर अपने लेखकीय जीवन से जुड़े व्यक्तियों और घटनाओं को याद किया है। इस संकलित अंश में मुख्यतः उनके किशोर जीवन, उनके पिताजी तथा उनकी कॉलेज की प्राध्यापिका शीला अग्रवाल का व्यक्तित्व उभरकर आता है, जिन्होंने उनके लेखकीय व्यक्तित्व के निर्माण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

लेखिका का जन्म भानपुरा में हुआ, पर उनकी यादें अजमेर के ब्रह्मपुरी मोहल्ले के उस दो-मंज़िले मकान से जुड़ी हैं, जहाँ ऊपरी मंज़िल पर पिताजी का ‘साम्राज्य’ था और नीचे भाई-बहनों के साथ बेपढ़ी-लिखी, सहनशील माँ रहती थीं। पिताजी इंदौर में प्रतिष्ठित, कांग्रेस तथा समाज-सुधार से जुड़े और दानशील व्यक्ति थे, किंतु एक बड़े आर्थिक झटके के बाद अजमेर आकर वे शक्की, अहंवादी और क्रोधी हो गए थे। यश की प्रबल लालसा उनके जीवन की धुरी थी।

लेखिका स्वयं को काली और दुबली मानती थीं; गोरी, स्वस्थ बहन सुशीला से बार-बार तुलना ने उनके मन में गहरी हीन-भावना की ग्रंथि पैदा कर दी थी। पिताजी चाहते थे कि वे रसोई (‘भटियारखाना’) से दूर रहकर घर में होने वाली राजनीतिक बहसों में बैठें, सुनें और देश की स्थिति समझें। दसवीं तक वे बिना विशेष समझ के बहसें सुनती और किताबें पढ़ती रहीं।

फ़र्स्ट इयर में हिंदी की प्राध्यापिका शीला अग्रवाल से परिचय ने उनके जीवन की दिशा बदल दी। उन्होंने न केवल लेखिका को चुन-चुनकर अच्छी पुस्तकें पढ़ाईं, बल्कि देश की स्थितियों में सक्रिय भागीदारी की ओर प्रेरित किया। सन् 1946–47 के स्वाधीनता आंदोलन में लेखिका ने जुलूस, हड़ताल, भाषण और नारेबाजी में बढ़-चढ़कर भाग लिया, जिससे पिताजी से वैचारिक टकराव बढ़ता गया। अंततः जब डॉ. अंबालाल जैसे प्रतिष्ठित व्यक्ति ने उनके भाषण की प्रशंसा की तो पिताजी का असंतोष गर्व में बदल गया। पाठ का समापन 15 अगस्त 1947 की स्वतंत्रता-प्राप्ति को ‘शताब्दी की सबसे बड़ी उपलब्धि’ कहकर होता है। इस प्रकार यह आत्मकथ्य एक साधारण लड़की के असाधारण बनने के आरंभिक पड़ावों को बहुत सहजता और ईमानदारी से प्रकट करता है।

मूलभाव / केंद्रीय विचार

इस आत्मकथ्य का मूलभाव यह है कि व्यक्ति का व्यक्तित्व उसके परिवेश, परिवार और कुछ विशेष व्यक्तियों के प्रभाव से गढ़ा जाता है। पिता की खूबियाँ और कमजोरियाँ दोनों लेखिका के व्यक्तित्व के ताने-बाने में गुँथी हैं, तो शीला अग्रवाल ने उन्हें पठन से सक्रिय सामाजिक भागीदारी की ओर मोड़ा। पाठ यह भी दर्शाता है कि स्वतंत्रता आंदोलन ने एक छोटे शहर की किशोरी को भी अछूता नहीं छोड़ा और उसके भीतर आत्मविश्वास, ओज तथा संगठन-क्षमता जगा दी। साथ ही यह ‘पड़ोस-कल्चर’ के महत्त्व और हीन-भावना से उबरने के संघर्ष को भी उजागर करता है।

कठिन शब्द-अर्थ

शब्दअर्थ
अहंवादीघमंडी, अहंकारी
भग्नावशेषखंडहर, टूटे-फूटे हिस्से
विस्फारितऔर अधिक फैलना (बढ़ना)
आक्रांतकष्टग्रस्त, घिरा हुआ
निषिद्धजिस पर रोक लगाई गई हो
वर्चस्वप्रभुत्व, दबदबा
भटियारखाना(यहाँ) रसोई के लिए प्रयुक्त तिरस्कारपूर्ण शब्द
हीन-भाव / ग्रंथिस्वयं को दूसरों से तुच्छ मानने की मानसिक गाँठ
दरियादिलीउदारता, दानशीलता
संवेदनशीलभावुक, दूसरों के दुख-सुख को अनुभव करने वाला
विश्वासघातभरोसे को तोड़ना, धोखा देना
शक्कीसंदेह करने वाला, शंकालु
नवाबी आदतेंशान-शौकत भरी, विलासितापूर्ण आदतें
महत्त्वाकांक्षाबड़ा बनने या ऊँचा पद पाने की प्रबल इच्छा
यश-लिप्सानाम-प्रसिद्धि पाने की तीव्र लालसा
सहिष्णुतासहनशीलता
प्रतिच्छायाप्रतिबिंब, परछाईं
हुड़दंगशोरगुल, उपद्रव, हंगामा
प्रभात-फेरीसवेरे निकाला जाने वाला जुलूस (देशभक्ति-गीत गाते हुए)
लावा(यहाँ) जोश एवं आवेश से उबलता रक्त

पाठ्यपुस्तक के प्रश्न-अभ्यास के उत्तर

प्रश्न-अभ्यास

1. लेखिका के व्यक्तित्व पर किन-किन व्यक्तियों का किस रूप में प्रभाव पड़ा?

उत्तरलेखिका के व्यक्तित्व पर मुख्यतः दो व्यक्तियों का गहरा प्रभाव पड़ा –(क) पिताजी का प्रभाव: पिताजी की यश-लालसा, स्वाभिमान और ‘कुछ विशिष्ट बनकर जीने’ की प्रेरणा ने लेखिका को महत्त्वाकांक्षी और आत्म-सजग बनाया। किंतु बहन सुशीला से बार-बार तुलना तथा उनके शक्की-क्रोधी स्वभाव ने लेखिका के मन में हीन-भावना की ग्रंथि भी पैदा कर दी, जिससे वे लंबे समय तक उबर नहीं पाईं।(ख) शीला अग्रवाल का प्रभाव: कॉलेज की प्राध्यापिका शीला अग्रवाल ने उन्हें साहित्य की दुनिया से परिचित कराया, चुन-चुनकर अच्छी पुस्तकें पढ़ाईं और मात्र पठन को सोच-विचार तथा बहस में बदला। उन्होंने ही लेखिका को घर की चारदीवारी से निकालकर स्वाधीनता आंदोलन की सक्रिय भागीदारी की ओर प्रेरित किया।(ग) माँ का प्रभाव: माँ के त्याग और सहनशीलता ने लेखिका को संवेदनशील बनाया, यद्यपि उनका असहाय त्याग कभी लेखिका का आदर्श नहीं बन सका।

2. इस आत्मकथ्य में लेखिका के पिता ने रसोई को ‘भटियारखाना’ कहकर क्यों संबोधित किया है?

उत्तरलेखिका के पिता प्रगतिशील विचारों के व्यक्ति थे और चाहते थे कि उनकी बेटी रसोई के संकुचित दायरे तक सीमित न रहकर पढ़ाई, बहस और देश-दुनिया की बातों में रुचि ले।उनके अनुसार रसोई में दिन भर लगे रहना लड़की की क्षमता और प्रतिभा को ‘भट्ठी में झोंकना’ था, अर्थात् उसकी प्रतिभा को नष्ट करना था।इसी कारण उन्होंने तिरस्कारपूर्वक रसोई को ‘भटियारखाना’ कहा, ताकि लेखिका रसोई से दूर रहकर अपने व्यक्तित्व का विकास कर सके।

3. वह कौन-सी घटना थी जिसके बारे में सुनने पर लेखिका को न अपनी आँखों पर विश्वास हो पाया और न अपने कानों पर?

उत्तरएक दिन लेखिका चौपड़ पर भाषण देकर देर रात घर लौटीं तो उन्हें डर था कि पिताजी क्रोधित होंगे, क्योंकि वे लड़कियों के जुलूस-हड़ताल में भाग लेने को ठीक नहीं मानते थे।परंतु घर पहुँचने पर अजमेर के प्रतिष्ठित डॉ. अंबालाल वहाँ बैठे थे, जिन्होंने बड़ी गर्मजोशी से लेखिका का स्वागत किया और उनके भाषण की धुआँधार प्रशंसा करते हुए पिताजी को बधाई दी।पिताजी का चेहरा संतोष से गर्व में बदल रहा था। जो पिता दोपहर तक क्रोध से भभक रहे थे, वही अब गर्व से फूले नहीं समा रहे थे – यह परिवर्तन देखकर लेखिका को न अपनी आँखों पर और न अपने कानों पर विश्वास हो पाया।

4. लेखिका की अपने पिता से वैचारिक टकराहट को अपने शब्दों में लिखिए।

उत्तरलेखिका के पिता एक ओर चाहते थे कि उनकी बेटी पढ़े-लिखे, बहसों में बैठे और देश की स्थितियों को समझे, परंतु दूसरी ओर उनकी अपनी सामाजिक छवि और ‘इज़्ज़त’ को लेकर वे अत्यंत सजग थे।जब लेखिका शीला अग्रवाल की प्रेरणा से स्वाधीनता आंदोलन में सक्रिय हुईं – नारे लगाने, हड़तालें करवाने और लड़कों के साथ शहर की सड़कें नापने लगीं – तो पिताजी के लिए अपनी सारी आधुनिकता के बावजूद इसे सहन करना कठिन हो गया।पिता ‘अपनी दी हुई आज़ादी’ की सीमा में ही बेटी को रखना चाहते थे, जबकि लेखिका किसी की दी हुई सीमित आज़ादी स्वीकार करने को तैयार नहीं थीं। इस प्रकार आधुनिकता बनाम सामाजिक छवि और स्वतंत्रता बनाम नियंत्रण को लेकर दोनों में लगातार वैचारिक टकराहट चलती रही, जो लेखिका के राजेंद्र (यादव) से विवाह तक बनी रही।

5. इस आत्मकथ्य के आधार पर स्वाधीनता आंदोलन के परिदृश्य का चित्रण करते हुए उसमें मन्नू जी की भूमिका को रेखांकित कीजिए।

उत्तरस्वाधीनता आंदोलन का परिदृश्य: सन् 1942 के आंदोलन के बाद सारा देश खौल रहा था। सन् 1946–47 के दिनों में प्रभात-फेरियाँ, हड़तालें, जुलूस और भाषण हर शहर का चरित्र बन गए थे। अजमेर में भी क्रांतिकारियों और देशभक्त शहीदों के रोमानी आकर्षण से युवा-मन आक्रांत रहता था; आज़ाद हिंद फौज के मुकदमे के विरोध में कॉलेजों-स्कूलों में हड़तालें हुईं और विद्यार्थी-वर्ग चौपड़ जैसे चौराहों पर एकत्र होकर भाषणबाज़ी करता था।मन्नू जी की भूमिका: लेखिका ने शीला अग्रवाल की जोशीली बातों से प्रेरित होकर इस आंदोलन में सक्रिय भागीदारी की। वे हाथ उठा-उठाकर नारे लगातीं, हड़तालें करवातीं, जुलूसों का नेतृत्व करतीं और लड़कों के साथ शहर की सड़कें नापती थीं।चौपड़ पर बिना किसी झिझक के उनके धुआँधार भाषण देने का उत्साह, ओज और संगठन-क्षमता देखते ही बनती थी। प्रिंसिपल तक यह कहकर परेशान थीं कि ‘तीन लड़कियों के इशारे पर सारा कॉलेज चल रहा है।’ इस प्रकार छोटे शहर की एक युवा होती लड़की ने स्वाधीनता-संग्राम में पूरे जोश और साहस के साथ अपनी भागीदारी निभाई।

रचना और अभिव्यक्ति

6. लेखिका ने बचपन में अपने भाइयों के साथ गिल्ली डंडा तथा पतंग उड़ाने जैसे खेल भी खेले किंतु लड़की होने के कारण उनका दायरा घर की चारदीवारी तक सीमित था। क्या आज भी लड़कियों के लिए स्थितियाँ ऐसी ही हैं या बदल गई हैं, अपने परिवेश के आधार पर लिखिए।

उत्तरआज की स्थितियाँ पहले की तुलना में काफी बदल गई हैं, यद्यपि परिवर्तन हर स्थान पर समान नहीं है।आज लड़कियाँ शिक्षा, खेल, सेना, विज्ञान, राजनीति और अंतरिक्ष तक हर क्षेत्र में आगे बढ़ रही हैं। मेरे अपने परिवेश में लड़कियाँ साइकिल चलाती हैं, खेल प्रतियोगिताओं में भाग लेती हैं और घर से बाहर पढ़ने भी जाती हैं।फिर भी कुछ परिवारों और ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी लड़कियों पर अनेक बंधन हैं और सुरक्षा को लेकर उनका दायरा सीमित कर दिया जाता है। अतः स्थिति बदली अवश्य है, पर पूर्ण समानता के लिए अभी और प्रयास आवश्यक हैं। (विद्यार्थी अपने परिवेश के अनुसार लिखें।)

7. मनुष्य के जीवन में आस-पड़ोस का बहुत महत्त्व होता है। परंतु महानगरों में रहने वाले लोग प्रायः ‘पड़ोस कल्चर’ से वंचित रह जाते हैं। इस बारे में अपने विचार लिखिए।

उत्तरआस-पड़ोस मनुष्य के सामाजिक जीवन का महत्त्वपूर्ण आधार है; सुख-दुख में पड़ोसी ही सबसे पहले काम आते हैं और उनसे अपनापन, सहयोग व सुरक्षा की भावना मिलती है।लेखिका के अनुसार पहले घर की दीवारें पूरे मोहल्ले तक फैली रहती थीं और कई पड़ोसी परिवार का हिस्सा ही बन जाते थे।किंतु महानगरों में फ्लैट-संस्कृति, व्यस्त जीवन और ‘अपनी ज़िंदगी खुद जीने’ के आधुनिक दबाव ने लोगों को इस परंपरागत ‘पड़ोस-कल्चर’ से काट दिया है, जिससे वे संकुचित, असहाय और असुरक्षित होते जा रहे हैं।मेरे विचार से हमें व्यस्तता के बावजूद पड़ोसियों से मेल-जोल बनाए रखना चाहिए, क्योंकि अच्छे पड़ोसी जीवन को सरल, सुरक्षित और सहयोगपूर्ण बनाते हैं।

8. लेखिका द्वारा पढ़े गए उपन्यासों की सूची बनाइए और उन उपन्यासों को अपने पुस्तकालय में खोजिए।

उत्तरपाठ के अनुसार लेखिका द्वारा पढ़े गए (अथवा उल्लिखित) प्रमुख उपन्यास इस प्रकार हैं –(क) सुनीता – जैनेंद्र कुमार(ख) त्यागपत्र – जैनेंद्र कुमार(ग) शेखर: एक जीवनी – अज्ञेय(घ) नदी के द्वीप – अज्ञेय(ङ) चित्रलेखा – भगवतीचरण वर्माइनके अतिरिक्त लेखिका शरत्, प्रेमचंद, यशपाल आदि की रचनाएँ भी पढ़ती थीं। (यह व्यावहारिक कार्य है – विद्यार्थी इन पुस्तकों को अपने विद्यालय/सार्वजनिक पुस्तकालय में खोजें।)

9. आप भी अपने दैनिक अनुभवों को डायरी में लिखिए।

उत्तरयह विद्यार्थी द्वारा स्वयं करने योग्य रचनात्मक कार्य है। प्रतिदिन की प्रमुख घटनाओं, अनुभवों और भावनाओं को सरल भाषा में अपनी डायरी में लिखें।नमूना (एक पंक्ति): “आज विद्यालय में वार्षिक खेल-दिवस मनाया गया। मैंने दौड़ में भाग लिया और द्वितीय स्थान प्राप्त किया; इस सफलता से मन बहुत प्रसन्न रहा।”डायरी में तिथि, दिन तथा अपने सच्चे भाव लिखें – इससे लेखन-क्षमता और आत्म-अभिव्यक्ति दोनों बढ़ती हैं।

भाषा-अध्ययन

10. इस आत्मकथ्य में मुहावरों का प्रयोग करके लेखिका ने रचना को रोचक बनाया है। रेखांकित मुहावरों को ध्यान में रखकर कुछ और वाक्य बनाएँ—(क) इस बीच पिता जी के एक निहायत दकियानूसी मित्र ने घर आकर अच्छी तरह पिता जी की लू उतारी।(ख) वे तो आग लगाकर चले गए और पिता जी सारे दिन भभकते रहे।(ग) बस अब यही रह गया है कि लोग घर आकर थू-थू करके चले जाएँ।(घ) पत्र पढ़ते ही पिता जी आग-बबूला।

उत्तर(क) लू उतारना (अर्थ – खूब डाँटना/भली-भाँति खबर लेना): अध्यापक ने देर से आने पर छात्र की अच्छी तरह लू उतार दी।(ख) भभकना (अर्थ – क्रोध से उबल पड़ना): अपना अपमान सुनकर वह दिन भर भभकता रहा।(ग) थू-थू करना (अर्थ – निंदा/भर्त्सना करना): बेईमानी पकड़े जाने पर सारे मोहल्ले में उसकी थू-थू होने लगी।(घ) आग-बबूला होना (अर्थ – अत्यधिक क्रोधित होना): बेटे की शरारत देखकर पिताजी आग-बबूला हो गए।

अतिरिक्त प्रश्न

लघु उत्तरीय प्रश्न (5)

1. लेखिका मन्नू भंडारी का जन्म कब और कहाँ हुआ था?

उत्तरमन्नू भंडारी का जन्म सन् 1931 में मध्य प्रदेश के भानपुरा गाँव में हुआ था, यद्यपि उनकी आरंभिक शिक्षा अजमेर में हुई।

2. लेखिका के मन में हीन-भावना की ग्रंथि कैसे उत्पन्न हुई?

उत्तरलेखिका साँवली और दुबली थीं। गोरा रंग पिताजी की कमजोरी था, इसलिए वे बार-बार लेखिका की तुलना गोरी, स्वस्थ और हँसमुख बहन सुशीला से करते और उसकी प्रशंसा करते थे।इसी निरंतर तुलना ने लेखिका के मन में गहरी हीन-भावना की ग्रंथि पैदा कर दी, जिससे वे नाम-सम्मान पाने के बाद भी उबर नहीं पाईं।

3. शीला अग्रवाल कौन थीं और उन्होंने लेखिका के लिए क्या किया?

उत्तरशीला अग्रवाल लेखिका के कॉलेज में हिंदी की प्राध्यापिका थीं।उन्होंने लेखिका को चुन-चुनकर अच्छी साहित्यिक पुस्तकें पढ़ाईं, पठन को बहस-विचार में बदला और घर की चारदीवारी से निकालकर उन्हें स्वाधीनता आंदोलन की सक्रिय भागीदारी की ओर प्रेरित किया।

4. लेखिका के पिता का स्वभाव अजमेर आने के बाद क्यों बदल गया?

उत्तरइंदौर में पिताजी प्रतिष्ठित और दानशील व्यक्ति थे, परंतु एक बड़े आर्थिक झटके के कारण उन्हें अजमेर आना पड़ा।गिरती आर्थिक स्थिति, अपनों के विश्वासघात और टूटती प्रतिष्ठा ने उन्हें शक्की, अहंवादी और क्रोधी बना दिया, जिससे उनके व्यक्तित्व के सकारात्मक पहलू दबते चले गए।

5. पाठ में 9 वर्षीय शिवांक की डायरी क्यों दी गई है?

उत्तर9 वर्षीय शिवांक की डायरी का एक पन्ना नमूने के तौर पर दिया गया है, ताकि विद्यार्थी यह समझ सकें कि डायरी में अपने दैनिक अनुभवों और भावनाओं को किस प्रकार सहज, सरल और सच्ची भाषा में लिखा जाता है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (3)

6. ‘एक कहानी यह भी’ पाठ के आधार पर लेखिका के पिता के व्यक्तित्व की विशेषताएँ लिखिए।

उत्तरलेखिका के पिता बहुआयामी एवं अंतर्विरोधी व्यक्तित्व के स्वामी थे। इंदौर में वे प्रतिष्ठित, समाज-सुधारक, शिक्षाप्रेमी और अत्यंत दानशील व्यक्ति थे, जिन्होंने अनेक विद्यार्थियों को घर में रखकर पढ़ाया।वे एक ओर बेहद कोमल और संवेदनशील थे तो दूसरी ओर क्रोधी और अहंवादी। यश-लिप्सा उनके जीवन की धुरी थी और वे चाहते थे कि व्यक्ति समाज में नाम, सम्मान व प्रतिष्ठा अर्जित करे।अजमेर आने के बाद आर्थिक संकट और विश्वासघात ने उन्हें शक्की एवं चिड़चिड़ा बना दिया। वे प्रगतिशील विचारों के थे और बेटी को पढ़ने-समझने की प्रेरणा देते थे, किंतु अपनी सामाजिक छवि के प्रति इतने सजग थे कि बेटी की आधुनिकता उन्हें असहज कर देती थी। इस प्रकार उनका व्यक्तित्व गुण और कमजोरियों का मिश्रण था।

7. इस आत्मकथ्य में लेखिका ने अपनी माँ का चित्रण किस रूप में किया है? पिता और माँ के व्यक्तित्व की तुलना कीजिए।

उत्तरलेखिका ने अपनी माँ को बेपढ़ी-लिखी, अत्यंत धैर्यवान और सहनशील स्त्री के रूप में चित्रित किया है, जिनमें धरती से भी अधिक धैर्य था।माँ पिता की हर ज़्यादती को अपना ‘प्राप्य’ और बच्चों की हर माँग को अपना ‘फ़र्ज़’ समझकर सहज भाव से स्वीकार कर लेती थीं। उन्होंने जीवन भर केवल दिया ही दिया, अपने लिए कभी कुछ नहीं माँगा।तुलना: पिता क्रोधी, अहंवादी, यश के लालची और बाहरी दुनिया से जुड़े थे, जबकि माँ शांत, त्यागमयी, सहनशील और घर तक सीमित थीं। भाई-बहनों का सारा लगाव (सहानुभूति से उपजा) माँ के साथ था, फिर भी उनका असहाय त्याग कभी लेखिका का आदर्श नहीं बन सका – अर्थात् लेखिका माँ के प्रति स्नेह रखते हुए भी उनकी विवशता-भरी सहनशीलता को आदर्श नहीं मानतीं।

8. पाठ के आधार पर बताइए कि स्वतंत्रता आंदोलन ने लेखिका के व्यक्तित्व को किस प्रकार प्रभावित और परिवर्तित किया?

उत्तरस्वतंत्रता आंदोलन ने एक संकोची, हीन-भावना से ग्रस्त लड़की को आत्मविश्वासी और साहसी युवती में बदल दिया।शीला अग्रवाल की प्रेरणा से लेखिका पठन से सक्रिय भागीदारी की ओर बढ़ीं। आंदोलन के जोश ने उनकी रगों में बहते रक्त को मानो लावा बना दिया, जिससे सारे निषेध, वर्जनाएँ और भय ध्वस्त हो गए।वे नारे लगातीं, हड़तालें करवातीं, जुलूसों का नेतृत्व करतीं और निडर होकर भाषण देतीं। इस सक्रियता ने उनके भीतर ओज, संगठन-क्षमता और विरोध करने की शक्ति जगाई और पिता से टकराकर अपने अस्तित्व को पहचानने का साहस दिया। इस प्रकार आंदोलन ने उनके व्यक्तित्व को नई दिशा और दृढ़ता प्रदान की।

अभ्यास MCQ & अभिकथन-कारण

1. ‘एक कहानी यह भी’ पाठ की विधा क्या है?

(क) कहानी

(ख) आत्मकथ्य (संस्मरण)

(ग) निबंध

(घ) रेखाचित्र

उत्तर(ख) आत्मकथ्य (संस्मरण)।

2. लेखिका का जन्म किस स्थान पर हुआ था?

(क) अजमेर

(ख) इंदौर

(ग) भानपुरा (मध्य प्रदेश)

(घ) दिल्ली

उत्तर(ग) भानपुरा (मध्य प्रदेश)।

3. लेखिका के पिता रसोई को किस नाम से पुकारते थे?

(क) भंडारगृह

(ख) भटियारखाना

(ग) पाकशाला

(घ) रसोईघर

उत्तर(ख) भटियारखाना।

4. लेखिका को साहित्य की दुनिया से किसने परिचित कराया?

(क) उनके पिता

(ख) उनकी माँ

(ग) शीला अग्रवाल

(घ) डॉ. अंबालाल

उत्तर(ग) शीला अग्रवाल।

5. लेखिका के मन में हीन-भावना का मुख्य कारण क्या था?

(क) पढ़ाई में कमजोर होना

(ख) गोरी बहन सुशीला से बार-बार तुलना

(ग) गरीबी

(घ) माँ की डाँट

उत्तर(ख) गोरी बहन सुशीला से बार-बार तुलना।

6. लेखिका के अनुसार उनके पिता के जीवन की सबसे बड़ी दुर्बलता क्या थी?

(क) यश-लिप्सा

(ख) कंजूसी

(ग) आलस्य

(घ) भीरुता

उत्तर(क) यश-लिप्सा (यश-कामना)।

7. चौपड़ पर भाषण देने पर किसने घर आकर पिताजी को बधाई दी?

(क) शीला अग्रवाल

(ख) प्रिंसिपल

(ग) डॉ. अंबालाल

(घ) राजेंद्र यादव

उत्तर(ग) डॉ. अंबालाल।

8. पाठ के अंत में किस तिथि को ‘शताब्दी की सबसे बड़ी उपलब्धि’ कहा गया है?

(क) 26 जनवरी 1950

(ख) 15 अगस्त 1947

(ग) 2 अक्तूबर 1869

(घ) 14 अगस्त 1947

उत्तर(ख) 15 अगस्त 1947।

9. लेखिका ने अज्ञेय का कौन-सा उपन्यास पढ़ा, जिसने उनके मन को बहुत बाँधा?

(क) सुनीता

(ख) चित्रलेखा

(ग) नदी के द्वीप

(घ) त्यागपत्र

उत्तर(ग) नदी के द्वीप।

10. लेखिका की माँ का मुख्य गुण क्या था?

(क) क्रोध

(ख) महत्त्वाकांक्षा

(ग) धैर्य एवं सहनशीलता (त्याग)

(घ) वाक्पटुता

उत्तर(ग) धैर्य एवं सहनशीलता (त्याग)।
उत्तर-कुंजी: 1-(ख), 2-(ग), 3-(ख), 4-(ग), 5-(ख), 6-(क), 7-(ग), 8-(ख), 9-(ग), 10-(ग)।

अभिकथन-कारण – नीचे अभिकथन (A) और कारण (R) दिए गए हैं। सही विकल्प चुनिए—
(क) A और R दोनों सही, R, A की सही व्याख्या है। (ख) A और R दोनों सही, पर R, A की सही व्याख्या नहीं। (ग) A सही, R गलत। (घ) A गलत, R सही।

1. अभिकथन (A): लेखिका के पिता ने रसोई को ‘भटियारखाना’ कहा।

कारण (R): वे चाहते थे कि उनकी बेटी रसोई तक सीमित न रहकर पढ़ाई और बहसों में रुचि ले।

उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है।

2. अभिकथन (A): शीला अग्रवाल ने लेखिका के लेखकीय व्यक्तित्व को गढ़ने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

कारण (R): शीला अग्रवाल लेखिका की सगी बहन थीं।

उत्तर(ग) A सही है, पर R गलत है – शीला अग्रवाल लेखिका की कॉलेज की हिंदी-प्राध्यापिका थीं, बहन नहीं।

3. अभिकथन (A): लेखिका के मन में हीन-भावना की ग्रंथि उत्पन्न हो गई थी।

कारण (R): पिताजी बार-बार उनकी तुलना गोरी एवं स्वस्थ बहन सुशीला से करते थे।

उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है।

4. अभिकथन (A): स्वाधीनता आंदोलन में लेखिका की सक्रियता से पिताजी से वैचारिक टकराव बढ़ा।

कारण (R): पिताजी पूर्णतः रूढ़िवादी थे और बेटी की किसी भी प्रकार की शिक्षा के विरुद्ध थे।

उत्तर(ग) A सही है, पर R गलत है – पिताजी प्रगतिशील थे और बेटी को पढ़ाई-बहस की प्रेरणा देते थे; टकराव उनकी सामाजिक छवि के प्रति सजगता के कारण था।

5. अभिकथन (A): चौपड़ पर लेखिका के भाषण के बाद पिताजी का असंतोष गर्व में बदल गया।

कारण (R): प्रतिष्ठित डॉ. अंबालाल ने घर आकर लेखिका के भाषण की प्रशंसा की और पिताजी को बधाई दी।

उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है।
अभिकथन-कारण उत्तर-कुंजी: 1-(क), 2-(ग), 3-(क), 4-(ग), 5-(क)।

परीक्षा-युक्तियाँ एवं सामान्य गलतियाँ

परीक्षा-युक्तियाँ

  • पाठ की विधा (आत्मकथ्य) और लेखिका मन्नू भंडारी का नाम सही याद रखें – यह बहुधा पूछा जाता है।
  • पिता, माँ और शीला अग्रवाल के व्यक्तित्व के 3–4 गुण बिंदुवार लिखें; उत्तर में पाठ से उदाहरण अवश्य जोड़ें।
  • स्वाधीनता आंदोलन वाले प्रश्न में परिदृश्य (प्रभात-फेरी, हड़ताल, जुलूस) और मन्नू जी की भूमिका – दोनों भाग अलग-अलग लिखें।
  • भाषा-अध्ययन में मुहावरे का अर्थ लिखकर ही नया वाक्य बनाएँ, ताकि पूरे अंक मिलें।

सामान्य गलतियाँ

  • शीला अग्रवाल को लेखिका की बहन समझ लेना – वे कॉलेज की प्राध्यापिका थीं।
  • स्वतंत्रता की तिथि 15 अगस्त 1947 की जगह कोई अन्य तिथि लिख देना।
  • पिता को केवल नकारात्मक या केवल सकारात्मक रूप में दिखाना – उनका व्यक्तित्व गुण-दोष दोनों का मिश्रण था।
  • आत्मकथ्य को ‘कहानी’ (काल्पनिक) समझना – यह लेखिका के अपने जीवन का वास्तविक संस्मरण है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

‘एक कहानी यह भी’ पाठ की लेखिका कौन हैं?

इस आत्मकथ्य की लेखिका प्रसिद्ध कथाकार मन्नू भंडारी हैं, जिनकी प्रमुख रचनाओं में ‘आपका बंटी’ और ‘महाभोज’ शामिल हैं।

शीला अग्रवाल कौन थीं?

शीला अग्रवाल लेखिका के कॉलेज में हिंदी की प्राध्यापिका थीं, जिन्होंने लेखिका को साहित्य से परिचित कराया और स्वाधीनता आंदोलन में सक्रिय भागीदारी के लिए प्रेरित किया।

पिताजी ने रसोई को ‘भटियारखाना’ क्यों कहा?

वे चाहते थे कि उनकी बेटी रसोई के संकुचित दायरे तक सीमित न रहकर पढ़ाई और देश-दुनिया की बातों में रुचि ले; इसीलिए उन्होंने तिरस्कारपूर्वक रसोई को ‘भटियारखाना’ कहा।

प्रश्न NCERT क्षितिज भाग 2 पुस्तक से ज्यों-के-त्यों लिए गए हैं; उत्तर ClearStudy द्वारा मौलिक रूप से तैयार एवं जाँचे गए हैं।

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