NCERT Solutions for Class 10 Hindi (Kshitij 2) अध्याय 3: आत्मकथ्य – प्रश्न-उत्तर, सार एवं व्याख्या (NCERT 2026–27)

यह पृष्ठ कक्षा 10 हिंदी की पुस्तक क्षितिज भाग 2 (काव्य खंड) के अध्याय 3 ‘आत्मकथ्य’ (कवि – जयशंकर प्रसाद) का पूरा समाधान देता है – कविता का सार, भावार्थ, शब्दार्थ, पाठ्यपुस्तक के प्रश्न-अभ्यास के उत्तर, अतिरिक्त प्रश्न, MCQ एवं अभिकथन-कारण।

कक्षा: 10 विषय: हिंदी पुस्तक: क्षितिज भाग 2 (काव्य खंड) अध्याय: 3 शीर्षक: आत्मकथ्य कवि: जयशंकर प्रसाद सत्र: 2026–27

कवि परिचय – जयशंकर प्रसाद

जयशंकर प्रसाद का जन्म सन् 1889 में काशी (वाराणसी) में हुआ था। काशी के प्रसिद्ध क्वींस कॉलेज में उनकी आरंभिक शिक्षा हुई, परंतु परिस्थितियाँ अनुकूल न होने के कारण वे आठवीं से आगे विद्यालय में नहीं पढ़ सके; बाद में उन्होंने घर पर ही संस्कृत, हिंदी और फ़ारसी का गहन अध्ययन किया। वे छायावादी काव्य-धारा के प्रमुख स्तंभ माने जाते हैं। उनकी प्रमुख काव्य-कृतियाँ हैं – चित्राधार, कानन-कुसुम, झरना, आँसू, लहर और महाकाव्य कामायनी, जिसे आधुनिक हिंदी की श्रेष्ठतम काव्य-कृति माना जाता है और जिस पर उन्हें मंगलाप्रसाद पारितोषिक प्रदान किया गया। वे सफल नाटककार, उपन्यासकार और कहानीकार भी थे – चंद्रगुप्त, स्कंदगुप्त, ध्रुवस्वामिनी आदि उनके नाटक तथा कंकाल, तितली, इरावती उपन्यास हैं। सन् 1937 में उनका निधन हो गया।

कविता का सार

‘आत्मकथ्य’ कविता जयशंकर प्रसाद की छायावादी शैली में रची गई एक मार्मिक रचना है। प्रेमचंद के संपादन में निकलने वाली पत्रिका ‘हंस’ का एक आत्मकथा-विशेषांक निकलना तय हुआ था। प्रसाद जी के मित्रों ने उनसे आग्रह किया कि वे भी अपनी आत्मकथा लिखें, किंतु प्रसाद जी इससे सहमत नहीं थे। इसी असहमति के तर्क से यह कविता जन्मी, जो पहली बार सन् 1932 में ‘हंस’ के आत्मकथा-विशेषांक में प्रकाशित हुई।

कविता के आरंभ में कवि प्रकृति के माध्यम से बताते हैं कि जब मन रूपी भौंरा गुनगुनाकर अपनी कहानी कहता-सा प्रतीत होता है और पत्तियाँ मुरझाकर गिर रही हैं, तब इस अनंत नीले आकाश के नीचे असंख्य जीवन-इतिहास भरे पड़े हैं, जो परस्पर एक-दूसरे का व्यंग्य-भरा उपहास ही करते रहते हैं। ऐसे में अपनी दुर्बलताओं और बीती पीड़ा को सार्वजनिक करना कवि को उचित नहीं लगता।

कवि कहते हैं कि उनका जीवन एक सामान्य व्यक्ति का जीवन है; उसमें ऐसा कुछ भी महान या रोचक नहीं है कि लोग उसे सुनकर वाह-वाह करें। वे सरलता का उपहास नहीं उड़ाना चाहते, न ही अपनी भूलें या दूसरों की प्रवंचना (धोखे) दिखाना चाहते हैं। मधुर चाँदनी रातों और खिलखिलाकर हँसने वाले सुखद क्षणों की उज्ज्वल गाथा वे इसलिए नहीं गा सकते, क्योंकि जिस सुख का स्वप्न उन्होंने देखा था वह आलिंगन में आते-आते मुसकराकर भाग गया – अर्थात् वह कभी प्राप्त ही न हुआ।

उस अधूरे सुख की स्मृति ही थके हुए पथिक के मार्ग का संबल (पाथेय) बन गई है। कवि कहते हैं कि वे अपने इस छोटे-से जीवन की बड़ी-बड़ी कथाएँ अभी क्यों कहें; अच्छा तो यही है कि वे मौन रहकर दूसरों की बातें सुनें। उनकी अपनी मौन व्यथा अभी थककर सोई हुई है, इसलिए अभी आत्मकथा कहने का समय भी नहीं है। इस प्रकार कविता में एक ओर यथार्थ की स्वीकृति है तो दूसरी ओर एक महान कवि की विनम्रता भी झलकती है।

कविता का मूलभाव / भावार्थ

इस कविता का मूलभाव यह है कि प्रसाद जी अपनी आत्मकथा लिखने से विनम्रतापूर्वक इनकार करते हैं। उनका मानना है कि उनका जीवन साधारण है, उसमें कोई असाधारण उपलब्धि नहीं; उल्टे उसमें अभाव, पीड़ा और अधूरे सपनों की कथा है। संसार दूसरों की कमजोरियाँ सुनकर उपहास उड़ाता है, इसलिए अपनी निजी पीड़ा और दुर्बलताओं को उजागर करना कवि को व्यर्थ लगता है। अधूरे रह गए सुख की स्मृति ही उनके जीवन-पथ का सहारा है। कवि “अभी समय भी नहीं” कहकर भविष्य के लिए संभावना भी छोड़ देते हैं। इस प्रकार यह कविता यथार्थ की स्वीकृति, आत्म-विश्लेषण और एक श्रेष्ठ कवि की सहज विनम्रता का सुंदर उदाहरण है।

शब्द-संपदा (शब्दार्थ)

शब्दअर्थ
मधुपभौंरा; यहाँ मन रूपी भौंरा
अनंत-नीलिमाअनंत नीला आकाश, अंतहीन विस्तार
व्यंग्य-मलिनखराब/बुरे ढंग से किया गया व्यंग्य या निंदा
मलिन उपहासमलिन (बुरी) हँसी-मखौल, ओछा मज़ाक
गागर रीतीखाली घड़ा; ऐसा मन जिसमें कोई भाव शेष न हो
प्रवंचनाधोखा, छल, ठगी
विडंबनाविसंगति, उपहासजनक स्थिति
सरलतेसरलता (का संबोधन); भोलापन
मुसक्या करमुसकराकर
अरुण-कपोललाल गाल
मतवालीमस्त, उन्मत्त, नशीली
अनुरागिनी उषाप्रेम से भरी हुई प्रभात-वेला (भोर)
निज सुहागअपना सौभाग्य/श्रृंगार
मधुमायामधुर माया, मीठा मोहजाल
स्मृति पाथेयस्मृति रूपी संबल; मार्ग का सहारा (राह का भोजन)
थके पथिक की पंथाथके हुए राही का रास्ता
सीवन उधेड़नासिलाई खोलना; यहाँ भीतरी रहस्य/पीड़ा प्रकट करना
कंथागुदड़ी; यहाँ अंतर्मन, भीतर का जीवन
आत्म-कथाअपने जीवन की कथा स्वयं लिखना
मौन व्यथाचुपचाप सही गई पीड़ा, अनकही वेदना

पाठ्यपुस्तक के प्रश्न-अभ्यास के उत्तर

सभी प्रश्न NCERT क्षितिज भाग 2 (अध्याय 3 ‘आत्मकथ्य’) से ज्यों-के-त्यों लिए गए हैं; उत्तर ClearStudy द्वारा मौलिक रूप से, परीक्षा-उपयोगी शैली में तैयार किए गए हैं।

1. कवि आत्मकथा लिखने से क्यों बचना चाहता है?

उत्तरकवि आत्मकथा लिखने से इसलिए बचना चाहता है क्योंकि उसका जीवन एक सामान्य व्यक्ति का जीवन है, जिसमें ऐसा कुछ भी महान या रोचक नहीं है जिसे सुनाकर वह वाह-वाही पा सके।उसके जीवन में अभाव, पीड़ा और अधूरे सपनों की कथा है; इन दुर्बलताओं और निजी व्यथा को सार्वजनिक करना वह उचित नहीं समझता।उसे यह भी भय है कि संसार दूसरों की कमजोरियाँ सुनकर सहानुभूति देने के बजाय उनका ‘व्यंग्य-मलिन उपहास’ उड़ाता है; इसलिए वह अपनी पीड़ा प्रकट करना व्यर्थ मानता है।

2. आत्मकथा सुनाने के संदर्भ में ‘अभी समय भी नहीं’ कवि ऐसा क्यों कहता है?

उत्तरकवि का मानना है कि आत्मकथा कहने का अभी उपयुक्त समय नहीं आया है। उसके मन की वेदना अभी थककर सोई हुई है – “अभी समय भी नहीं, थकी सोई है मेरी मौन व्यथा।”अपने दुख-दर्द को स्वयं फिर से जगाकर सबके सामने रखना वह नहीं चाहता, क्योंकि इससे उसकी सोई पीड़ा फिर ताज़ा हो उठेगी।साथ ही उसे लगता है कि अभी उसने जीवन का इतना अनुभव नहीं पाया कि वह उसे कथा के रूप में कह सके; इसलिए मौन रहकर दूसरों को सुनना ही अच्छा है।

3. स्मृति को ‘पाथेय’ बनाने से कवि का क्या आशय है?

उत्तर‘पाथेय’ का अर्थ है मार्ग में साथ रखा जाने वाला भोजन या संबल। कवि ने अपने जीवन में जिस सुख का स्वप्न देखा था वह पूरा न हो सका, फिर भी उसकी मधुर स्मृति आज भी उसके पास है।कवि कहता है कि उसी अधूरे सुख की स्मृति ही उसके थके हुए जीवन-पथ का सहारा बन गई है – जैसे थका हुआ पथिक रास्ते के लिए रखे भोजन से बल पाता है।अर्थात् कठिनाइयों और अभावों से भरे जीवन-मार्ग पर वही बीती हुई मधुर स्मृति उसे आगे बढ़ने की प्रेरणा और संबल देती है।

4. भाव स्पष्ट कीजिए—

(क) “मिला कहाँ वह सुख जिसका मैं स्वप्न देखकर जाग गया।
आलिंगन में आते-आते मुसक्या कर जो भाग गया।”

उत्तरइन पंक्तियों में कवि अपने अधूरे रह गए सुख की पीड़ा व्यक्त करता है। उसने जिस सुख की मधुर कल्पना (स्वप्न) की थी, वह यथार्थ में कभी प्राप्त ही नहीं हुआ।वह सुख इतने पास आ गया था कि मानो आलिंगन में समा जाने वाला हो, परंतु ठीक उसी क्षण वह मुसकराकर भाग गया – अर्थात् सुख प्राप्त होते-होते रह गया और कवि के हाथ केवल निराशा ही लगी।यहाँ अधूरी अभिलाषा और जीवन के अभाव-पक्ष की मार्मिक अभिव्यक्ति हुई है।

(ख) “जिसके अरुण-कपोलों की मतवाली सुंदर छाया में।
अनुरागिनी उषा लेती थी निज सुहाग मधुमाया में।”

उत्तरइन पंक्तियों में कवि अपनी प्रियतमा (अथवा अपने अधूरे सुख-स्वप्न) के अनुपम सौंदर्य का छायावादी, मानवीकरण-युक्त चित्रण करता है।उसके लाल-लाल गालों (अरुण-कपोलों) की मस्त एवं सुंदर छाया इतनी मनोहर थी कि प्रेम से भरी हुई प्रभात-वेला (अनुरागिनी उषा) भी मानो उसी की मधुर माया में अपना सुहाग (सौंदर्य/सौभाग्य) सँवारती थी।अर्थात् प्रिय का सौंदर्य उषा की लालिमा से भी बढ़कर था; उषा की लालिमा भी मानो उसी से शोभा पाती थी। यहाँ सुख की स्मृति का अत्यंत कोमल एवं काल्पनिक सौंदर्य-चित्रण है।

5. ‘उज्ज्वल गाथा कैसे गाऊँ, मधुर चाँदनी रातों की’—कथन के माध्यम से कवि क्या कहना चाहता है?

उत्तरइस कथन के द्वारा कवि कहना चाहता है कि उसके जीवन में सुख और आनंद के वैसे उज्ज्वल क्षण आए ही नहीं, जिन्हें वह गौरव के साथ गाकर सुना सके।‘मधुर चाँदनी रातें’ जीवन के सुखद, मादक और प्रसन्न क्षणों की प्रतीक हैं; परंतु कवि के जीवन में तो अभाव और अधूरे सपने ही रहे।अतः वह अपने जीवन की उज्ज्वल/सुखमय गाथा गाने में असमर्थता प्रकट करता है – जो सुख उसे मिला ही नहीं, उसका बखान वह कैसे करे।

6. ‘आत्मकथ्य’ कविता की काव्यभाषा की विशेषताएँ उदाहरण सहित लिखिए।

उत्तरछायावादी कोमलता एवं लाक्षणिकता: कविता में कोमल, ललित एवं नवीन शब्दों तथा बिंबों का प्रयोग है। जैसे – ‘अरुण-कपोलों की मतवाली सुंदर छाया’।प्रतीक एवं मानवीकरण: ‘मधुप’ (मन रूपी भौंरा), ‘अनुरागिनी उषा’, ‘सरलते तेरी हँसी’ जैसे प्रयोगों में अमूर्त भावों एवं प्रकृति का मानवीकरण हुआ है।लाक्षणिक/प्रतीकात्मक शब्दावली: ‘गागर रीती’ (भावशून्य खाली मन), ‘स्मृति पाथेय’, ‘कंथा की सीवन उधेड़ना’ (मन के रहस्य खोलना) जैसे प्रयोग गहरे अर्थ देते हैं।संस्कृतनिष्ठ खड़ी बोली एवं संगीतात्मकता: भाषा तत्सम-प्रधान, संगीतमय और भावपूर्ण है। चित्रात्मकता, सूक्ष्म सौंदर्य-चित्रण एवं आत्म-विश्लेषण इस कविता की प्रमुख विशेषताएँ हैं।

7. कवि ने जो सुख का स्वप्न देखा था, उसे कविता में किस रूप में अभिव्यक्त किया है?

उत्तरकवि ने अपने सुख के स्वप्न को एक अत्यंत सुंदर एवं प्रिय छवि के रूप में अभिव्यक्त किया है, जो अरुण-कपोलों वाली, मतवाली और मनोहर थी।उसका सौंदर्य इतना मोहक था कि प्रेम-भरी उषा भी उसी की मधुर माया में अपना सुहाग सँवारती-सी प्रतीत होती थी।किंतु यह सुख कवि को मिल न सका – “आलिंगन में आते-आते मुसक्या कर जो भाग गया।” अर्थात् वह सुख स्वप्न बनकर ही रह गया।इस प्रकार कवि ने सुख को एक अधूरी, मादक एवं स्मृति-शेष कल्पना के रूप में प्रस्तुत किया है, जिसकी स्मृति अब उसके जीवन-पथ का सहारा है।

रचना और अभिव्यक्ति

8. इस कविता के माध्यम से प्रसाद जी के व्यक्तित्व की जो झलक मिलती है, उसे अपने शब्दों में लिखिए।

उत्तरइस कविता से प्रसाद जी एक अत्यंत विनम्र, संवेदनशील एवं आत्म-निरीक्षण करने वाले व्यक्ति के रूप में उभरते हैं। वे अपने को महान न मानकर एक सामान्य व्यक्ति समझते हैं।वे यथार्थवादी हैं – जीवन के अभाव और दुख को सहज भाव से स्वीकार करते हैं और झूठी प्रशंसा या आत्म-प्रदर्शन से दूर रहते हैं।वे आत्म-सम्मानी एवं अंतर्मुखी हैं; अपनी निजी पीड़ा को सार्वजनिक करना उन्हें स्वीकार नहीं। साथ ही वे करुण, भावुक और सौंदर्य-प्रेमी कवि-हृदय के स्वामी हैं। कुल मिलाकर उनका व्यक्तित्व विनम्रता, यथार्थबोध और गहन संवेदनशीलता का मिश्रण है।

9. आप किन व्यक्तियों की आत्मकथा पढ़ना चाहेंगे और क्यों?

उत्तर (संभावित)मैं उन व्यक्तियों की आत्मकथा पढ़ना चाहूँगा जिन्होंने संघर्षों के बीच कुछ महान कार्य किया हो और जिनका जीवन प्रेरणा देता हो।जैसे – महात्मा गांधी की ‘सत्य के प्रयोग’, डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम की ‘विंग्स ऑफ़ फ़ायर’, हेलेन केलर एवं डॉ. भीमराव अंबेडकर जैसे महापुरुषों का जीवन।इनकी आत्मकथाएँ इसलिए पढ़ना चाहूँगा क्योंकि इनसे संघर्ष, परिश्रम, ईमानदारी और दृढ़ संकल्प की प्रेरणा मिलती है और कठिन परिस्थितियों में आगे बढ़ने का मार्ग दिखता है। (विद्यार्थी अपनी पसंद एवं कारण लिख सकते हैं।)

10. कोई भी अपनी आत्मकथा लिख सकता है। उसके लिए विशिष्ट या बड़ा होना ज़रूरी नहीं। हरियाणा राज्य के गुड़गाँव में घरेलू सहायिका के रूप में काम करने वाली बेबी हालदार की आत्मकथा ‘आलो आँधारि’ बहुतों के द्वारा सराही गई। आत्मकथात्मक शैली में अपने बारे में कुछ लिखिए।

उत्तर (नमूना)मेरा जन्म एक साधारण परिवार में हुआ। बचपन से ही मुझे पढ़ने-लिखने और नई बातें सीखने का शौक रहा है।मेरे जीवन में भी सुख-दुख आते रहे – कभी परीक्षा में अच्छे अंक न आने का दुख, तो कभी किसी प्रतियोगिता में जीतने का सुख। हर कठिनाई ने मुझे कुछ-न-कुछ सिखाया।मेरे माता-पिता और शिक्षक मेरे प्रेरणास्रोत हैं। मैं ईमानदारी, परिश्रम और दूसरों की सहायता को जीवन का आधार मानता हूँ।आगे चलकर मैं एक अच्छा इंसान बनकर अपने परिवार, समाज और देश के लिए कुछ उपयोगी करना चाहता हूँ। यही मेरी छोटी-सी आत्म-कथा का सार है। (विद्यार्थी अपने जीवन के अनुसार लिखें।)

अतिरिक्त प्रश्न

लघु उत्तरीय प्रश्न (30–40 शब्द)

1. ‘आत्मकथ्य’ कविता का प्रसंग (पृष्ठभूमि) क्या है?

उत्तरप्रेमचंद के संपादन में ‘हंस’ पत्रिका का आत्मकथा-विशेषांक निकलना तय हुआ था। मित्रों के आग्रह पर भी प्रसाद जी आत्मकथा लिखने को सहमत नहीं थे। इसी असहमति के तर्क से यह कविता जन्मी, जो सन् 1932 में प्रकाशित हुई।

2. ‘मधुप’ और ‘मुरझाई पत्तियों’ के बिंब से कवि क्या व्यंजित करता है?

उत्तर‘मधुप’ मन रूपी भौंरा है, जो गुनगुनाकर मानो अपनी कहानी कहता है; ‘मुरझाई गिरती पत्तियाँ’ जीवन की क्षणभंगुरता एवं नश्वरता का प्रतीक हैं। दोनों मिलकर जीवन की उदासी और बीते समय की पीड़ा को व्यंजित करते हैं।

3. कवि ‘सरलते’ की हँसी क्यों नहीं उड़ाना चाहता?

उत्तरकवि अपनी सरलता एवं भोलेपन का स्वयं उपहास नहीं करना चाहता और न ही अपनी भूलों या दूसरों के छल को उजागर करना चाहता है। उसे यह विडंबना लगती है कि आत्मकथा लिखकर वह अपनी ही सरलता का मखौल उड़ाए।

4. ‘यह लो, करते ही रहते हैं अपना व्यंग्य-मलिन उपहास’ पंक्ति का आशय लिखिए।

उत्तरइस पंक्ति का आशय है कि संसार के असंख्य जीवन-इतिहास एक-दूसरे का ओछा, निंदा-भरा उपहास ही करते रहते हैं। लोग दूसरों की कमजोरियाँ सुनकर सहानुभूति देने के बजाय व्यंग्य और हँसी उड़ाते हैं, इसलिए कवि अपनी व्यथा कहने से बचना चाहता है।

5. कविता के अंत में कवि का स्वर कैसा है?

उत्तरकविता के अंत में कवि का स्वर अत्यंत विनम्र, संयमित एवं अंतर्मुखी है। वह आत्मकथा कहने के बजाय मौन रहकर दूसरों को सुनना उचित मानता है और कहता है कि “अभी समय भी नहीं” – उसकी मौन व्यथा अभी थककर सोई हुई है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (100–120 शब्द)

6. ‘आत्मकथ्य’ कविता को छायावादी कविता क्यों कहा जाता है? स्पष्ट कीजिए।

उत्तर‘आत्मकथ्य’ छायावादी काव्य की प्रमुख विशेषताओं को धारण करने के कारण छायावादी कविता मानी जाती है।(क) सूक्ष्म एवं कोमल कल्पना: ‘अरुण-कपोलों की मतवाली सुंदर छाया’ जैसे चित्र अत्यंत कोमल एवं काल्पनिक हैं।(ख) प्रकृति एवं अमूर्त का मानवीकरण: ‘अनुरागिनी उषा’ का सुहाग सँवारना तथा ‘मधुप’ का कहानी कहना मानवीकरण के सुंदर उदाहरण हैं।(ग) प्रतीकात्मकता एवं लाक्षणिकता: ‘गागर रीती’, ‘स्मृति पाथेय’, ‘कंथा की सीवन’ जैसे प्रयोग गहरे प्रतीकार्थ रखते हैं।(घ) आत्म-अभिव्यक्ति एवं वेदना: कवि के अंतर्मन की पीड़ा, अधूरे सुख और आत्म-विश्लेषण की प्रधानता है। ये सभी छायावाद के लक्षण हैं, अतः यह छायावादी कविता है।

7. ‘आत्मकथ्य’ में यथार्थ की स्वीकृति और कवि की विनम्रता – दोनों किस प्रकार झलकती हैं? विवेचना कीजिए।

उत्तरयथार्थ की स्वीकृति: कवि अपने जीवन के अभाव-पक्ष को निःसंकोच स्वीकार करता है। वह मानता है कि उसका जीवन सामान्य है, उसमें उज्ज्वल/सुखद गाथाएँ नहीं; जो सुख चाहा वह ‘आलिंगन में आते-आते भाग गया’। वह अपने जीवन को ‘रीती गागर’ कहकर उसकी रिक्तता को सच्चाई से प्रकट करता है।विनम्रता: कवि स्वयं को महान नहीं मानता; वह कहता है कि उसके जीवन में ऐसा कुछ नहीं जिसे सुनकर लोग वाह-वाह करें। आत्मकथा लिखने के बजाय वह मौन रहकर दूसरों को सुनना श्रेष्ठ मानता है।इस प्रकार जीवन के सत्य को बिना अतिशयोक्ति स्वीकार करना यथार्थ-बोध है, और स्वयं को साधारण मानकर आत्म-प्रदर्शन से दूर रहना उसकी विनम्रता है। यही इस कविता को विशिष्ट बनाता है।

8. ‘स्मृति पाथेय’ की संकल्पना के आधार पर बताइए कि अधूरे सुख की स्मृति कवि के जीवन में क्या भूमिका निभाती है?

उत्तरकवि के जीवन में जिस सुख की कामना थी, वह कभी पूरा न हुआ; वह स्वप्न बनकर ही रह गया। फिर भी उस अधूरे सुख की मधुर स्मृति कवि के पास सुरक्षित है।‘पाथेय’ अर्थात् यात्रा में साथ रखा जाने वाला संबल। कवि कहता है कि यही स्मृति उसके थके हुए जीवन-पथ का सहारा बन गई है – “उसकी स्मृति पाथेय बनी है थके पथिक की पंथा की।”अर्थात् अभावों एवं कठिनाइयों से भरे जीवन-मार्ग पर वही बीती हुई कोमल स्मृति उसे संबल, प्रेरणा एवं जीने की शक्ति देती है। दुख से भरे जीवन में सुख की एक छोटी-सी स्मृति भी कितनी बड़ी संजीवनी बन सकती है – यही इस संकल्पना का भाव है।

बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQ)

1. ‘आत्मकथ्य’ कविता के रचयिता कौन हैं?

(क) सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’

(ख) जयशंकर प्रसाद

(ग) सुमित्रानंदन पंत

(घ) महादेवी वर्मा

2. यह कविता पहली बार किस पत्रिका के किस विशेषांक में प्रकाशित हुई?

(क) सरस्वती के काव्य-विशेषांक में

(ख) हंस के आत्मकथा-विशेषांक में

(ग) धर्मयुग के दीपावली-अंक में

(घ) कादंबिनी के कहानी-अंक में

3. ‘मधुप’ शब्द का कविता में क्या अर्थ है?

(क) मधु (शहद)

(ख) मन रूपी भौंरा

(ग) कोयल

(घ) फूल

4. कवि किस काव्य-धारा (वाद) के प्रमुख कवि माने जाते हैं?

(क) प्रगतिवाद

(ख) प्रयोगवाद

(ग) छायावाद

(घ) रहस्यवाद

5. ‘गागर रीती’ से कवि का क्या तात्पर्य है?

(क) टूटा हुआ घड़ा

(ख) भावों से भरा मन

(ग) भावशून्य, खाली मन

(घ) जल से भरा घड़ा

6. कवि आत्मकथा लिखने से क्यों बचना चाहता है?

(क) उसे लिखना नहीं आता

(ख) उसका जीवन सामान्य है और उसमें कुछ महान-रोचक नहीं

(ग) उसके पास समय की कमी है

(घ) वह प्रसिद्धि नहीं चाहता

7. कवि के अनुसार उसके जीवन-पथ का सहारा (पाथेय) क्या बना है?

(क) धन-संपत्ति

(ख) अधूरे सुख की स्मृति

(ग) मित्रों का साथ

(घ) यश और प्रशंसा

8. ‘आलिंगन में आते-आते मुसक्या कर जो भाग गया’ – यहाँ क्या भाग गया?

(क) कवि की प्रियतमा

(ख) कवि का देखा हुआ सुख का स्वप्न

(ग) कवि का मित्र

(घ) उषा की लालिमा

9. इनमें से कौन-सी रचना जयशंकर प्रसाद की नहीं है?

(क) कामायनी

(ख) आँसू

(ग) झरना

(घ) साकेत

10. ‘अभी समय भी नहीं’ कहकर कवि क्या प्रकट करता है?

(क) उसे जल्दी है

(ख) आत्मकथा कहने का उपयुक्त समय अभी नहीं आया

(ग) उसकी मृत्यु निकट है

(घ) वह व्यस्त है

उत्तर-कुंजी: 1→(ख), 2→(ख), 3→(ख), 4→(ग), 5→(ग), 6→(ख), 7→(ख), 8→(ख), 9→(घ – ‘साकेत’ मैथिलीशरण गुप्त की रचना है), 10→(ख)

अभिकथन-कारण (Assertion–Reason)

निर्देश: नीचे अभिकथन (A) और कारण (R) दिए गए हैं। सही विकल्प चुनिए—
(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या है। (ख) A और R दोनों सही हैं, पर R, A की सही व्याख्या नहीं है। (ग) A सही है, R गलत है। (घ) A गलत है, R सही है।

1. अभिकथन (A): कवि अपनी आत्मकथा लिखने से इनकार कर देता है।

कारण (R): कवि अपने जीवन को सामान्य मानता है और उसमें कोई महान या रोचक बात नहीं देखता।

2. अभिकथन (A): कवि ‘अभी समय भी नहीं’ कहकर आत्मकथा को टाल देता है।

कारण (R): कवि को लेखन-कला का कोई ज्ञान नहीं था।

3. अभिकथन (A): ‘आत्मकथ्य’ एक छायावादी कविता है।

कारण (R): इसमें कोमल कल्पना, प्रतीक, मानवीकरण एवं सूक्ष्म सौंदर्य-चित्रण की प्रधानता है।

4. अभिकथन (A): अधूरे सुख की स्मृति कवि के जीवन-पथ का पाथेय बन गई है।

कारण (R): वह सुख कवि को पूरी तरह प्राप्त हो चुका था।

5. अभिकथन (A): संसार के लोग दूसरों की व्यथा सुनकर उसका उपहास उड़ाते हैं।

कारण (R): इसीलिए कवि अपनी निजी पीड़ा को सार्वजनिक करने से बचता है।

उत्तर-कुंजी: 1→(क); 2→(ग) – A सही, R गलत (असली कारण उसकी मौन व्यथा का सोया होना है); 3→(क); 4→(ग) – A सही, R गलत (सुख तो प्राप्त ही नहीं हुआ, केवल स्मृति शेष है); 5→(क)।

परीक्षा-युक्तियाँ एवं सामान्य गलतियाँ

परीक्षा-युक्तियाँ

  • भाव स्पष्ट करते समय पहले पंक्ति का सीधा अर्थ, फिर उसमें छिपा भाव और अंत में प्रयुक्त बिंब/अलंकार लिखें।
  • कवि-परिचय में जन्म-वर्ष (1889), छायावाद, ‘कामायनी’ एवं मंगलाप्रसाद पारितोषिक अवश्य लिखें।
  • काव्यभाषा की विशेषताएँ पूछे जाने पर प्रतीक, मानवीकरण एवं लाक्षणिकता के उदाहरण कविता से उद्धृत करें।
  • ‘मधुप, गागर रीती, स्मृति पाथेय, कंथा’ जैसे कठिन शब्दों के अर्थ याद रखें – इन पर सीधे प्रश्न बनते हैं।

सामान्य गलतियाँ

  • यह न लिखें कि कवि को सुख मिल गया था – सुख ‘आते-आते भाग गया’, अर्थात् मिला ही नहीं।
  • ‘मधुप’ का अर्थ केवल ‘शहद’ लिखना गलत है; यहाँ इसका अर्थ ‘मन रूपी भौंरा’ है।
  • कविता को रसखान/तुलसी जैसी भक्ति-कविता न समझें – यह छायावादी आत्म-कथ्य है।
  • देवनागरी की मात्राओं (अरुण-कपोल, अनुरागिनी, पाथेय) में त्रुटि न करें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

‘आत्मकथ्य’ कविता के कवि कौन हैं?

‘आत्मकथ्य’ कविता के रचयिता छायावाद के प्रमुख कवि जयशंकर प्रसाद हैं, जिनका जन्म सन् 1889 में काशी (वाराणसी) में हुआ था।

कवि आत्मकथा लिखने से क्यों इनकार करता है?

कवि अपने जीवन को सामान्य मानता है, जिसमें कोई महान या रोचक बात नहीं; उसमें अभाव और अधूरे सपनों की कथा है। संसार दूसरों की पीड़ा का उपहास उड़ाता है, इसलिए वह अपनी निजी व्यथा प्रकट करना उचित नहीं समझता।

‘स्मृति पाथेय’ का क्या आशय है?

‘पाथेय’ अर्थात् मार्ग का संबल। कवि के अधूरे सुख की मधुर स्मृति ही उसके थके हुए जीवन-पथ का सहारा बन गई है, जो उसे आगे बढ़ने की प्रेरणा एवं शक्ति देती है।

प्रश्न NCERT क्षितिज भाग 2 पुस्तक से ज्यों-के-त्यों लिए गए हैं; उत्तर ClearStudy द्वारा मौलिक रूप से तैयार एवं जाँचे गए हैं।

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