NCERT Solutions for Class 10 Hindi (Kshitij 2) अध्याय 8: बालगोबिन भगत (NCERT 2026–27)

यह पृष्ठ कक्षा 10 हिंदी की पुस्तक क्षितिज भाग 2 (गद्य खंड) के अध्याय 8 ‘बालगोबिन भगत’ (लेखक – रामवृक्ष बेनीपुरी) का पूरा समाधान देता है – प्रश्न-अभ्यास के उत्तर, सार, शब्दार्थ, अतिरिक्त प्रश्न, MCQ एवं अभिकथन-कारण सहित।

कक्षा: 10 विषय: हिंदी पुस्तक: क्षितिज भाग 2 (गद्य खंड) अध्याय: 8 लेखक: रामवृक्ष बेनीपुरी विधा: रेखाचित्र सत्र: 2026–27

लेखक परिचय – रामवृक्ष बेनीपुरी

रामवृक्ष बेनीपुरी का जन्म सन् 1899 में बिहार के मुजफ़्फ़रपुर ज़िले के बेनीपुर गाँव में हुआ था। बचपन में ही माता-पिता का निधन हो जाने के कारण उनका आरंभिक जीवन अभावों, कठिनाइयों और संघर्षों में बीता। दसवीं तक की शिक्षा प्राप्त करने के बाद वे सन् 1920 में राष्ट्रीय स्वाधीनता आंदोलन से सक्रिय रूप से जुड़ गए और कई बार जेल भी गए। मात्र पंद्रह वर्ष की अवस्था में उनकी रचनाएँ पत्र-पत्रिकाओं में छपने लगी थीं। वे प्रतिभाशाली पत्रकार थे और उन्होंने तरुण भारत, किसान मित्र, बालक, युवक, योगी, जनता, जनवाणी तथा नयी धारा जैसी अनेक पत्र-पत्रिकाओं का संपादन किया। उनकी प्रमुख रचनाओं में पतितों के देश में (उपन्यास), चिता के फूल (कहानी), अंबपाली (नाटक), माटी की मूरतें (रेखाचित्र), पैरों में पंख बाँधकर (यात्रा-वृत्तांत) तथा ज़ंजीरें और दीवारें (संस्मरण) उल्लेखनीय हैं। विशिष्ट शैलीकार होने के कारण उन्हें ‘कलम का जादूगर’ कहा जाता है। सन् 1968 में उनका देहावसान हुआ।

पाठ का सार

‘बालगोबिन भगत’ रामवृक्ष बेनीपुरी द्वारा रचित एक मार्मिक रेखाचित्र है, जिसमें लेखक ने एक ऐसे विलक्षण चरित्र का उद्घाटन किया है जो मनुष्यता, लोक-संस्कृति और सामूहिक चेतना का प्रतीक है। बालगोबिन भगत मँझोले कद के गोरे-चिट्टे, साठ से ऊपर आयु के व्यक्ति थे। उनके बाल पक गए थे, चेहरा सफ़ेद बालों से जगमगाता रहता था। वे कपड़े बहुत कम पहनते – कमर में एक लँगोटी और सिर पर कनफटी टोपी; जाड़े में काली कमली ओढ़ लेते। माथे पर रामानंदी चंदन और गले में तुलसी की बेडौल माला रहती।

देखने में साधु जैसे लगने पर भी वे पूरे गृहस्थ थे – उनके पास खेतीबारी थी, बेटा और पतोहू थी और एक साफ़-सुथरा मकान भी था। फिर भी वे साधु की सभी परिभाषाओं पर खरे उतरते थे। वे कबीर को ‘साहब’ मानते, उन्हीं के गीत गाते और उन्हीं के आदेशों पर चलते थे। वे कभी झूठ नहीं बोलते, खरा व्यवहार रखते, किसी से दो-टूक बात करने में संकोच न करते, किसी की चीज़ बिना पूछे न छूते। खेत में जो कुछ पैदा होता, उसे पहले चार कोस दूर कबीरपंथी मठ में ‘भेंट’ रूप में ले जाते और वहाँ से ‘प्रसाद’ रूप में जो मिलता, उसी से गुज़र-बसर करते।

उनके मधुर गायन की कोई सानी न थी। आषाढ़ की रिमझिम में जब समूचा गाँव खेतों में उतर पड़ता, तब कीचड़ में लथपथ रोपनी करते हुए बालगोबिन भगत का संगीत सारे वातावरण को चमत्कृत कर देता – बच्चे झूम उठते, औरतों के होंठ गुनगुनाने लगते और हलवाहों के पैर ताल से उठने लगते। भादों की अँधेरी रात हो या माघ की कड़कड़ाती भोर, उनका खंजड़ी-संगीत निरंतर बजता रहता। कार्तिक से फागुन तक वे प्रातःकाल ‘प्रभातियाँ’ गाते थे।

उनके जीवन में संगीत-साधना का चरम उत्कर्ष उस दिन देखा गया जिस दिन उनका इकलौता बेटा मरा। उन्होंने बेटे के शव को फूलों और तुलसीदल से सजाकर उसके सामने गीत गाए और पतोहू को रोने के बदले उत्सव मनाने को कहा – उनका विश्वास था कि आत्मा परमात्मा से जा मिली है। श्राद्ध की अवधि पूरी होते ही उन्होंने पतोहू को बुलाकर ज़बरदस्ती उसकी दूसरी शादी करा देने का आदेश दे दिया। अंत में नेम-व्रत न छोड़ने वाले भगत की मृत्यु भी उन्हीं के अनुरूप हुई – एक संध्या गीत गाने के बाद भोर में लोगों ने जाकर देखा तो बालगोबिन भगत नहीं रहे, सिर्फ़ उनका पंजर पड़ा था।

मूलभाव

इस रेखाचित्र का मूलभाव यह है कि सच्चे संन्यास का आधार वेशभूषा या बाहरी अनुष्ठान नहीं, बल्कि जीवन के मानवीय सरोकार, सत्य-निष्ठा और निष्काम कर्म हैं। बालगोबिन भगत गृहस्थ रहते हुए भी आदर्श साधु थे। पाठ सामाजिक रूढ़ियों पर भी प्रहार करता है – भगत बेटे की मृत्यु को उत्सव मानते हैं और विधवा पतोहू का पुनर्विवाह कराते हैं। साथ ही यह रेखाचित्र ग्रामीण जीवन, लोक-संगीत और ऋतुओं की सजीव झाँकी प्रस्तुत करता है।

कठिन शब्द-अर्थ

शब्दअर्थ
मँझोलान बहुत बड़ा न बहुत छोटा; मध्यम कद का
कमलीकंबल
कनफटी टोपीकानों को ढकने वाली टोपी (कबीरपंथियों जैसी)
पतोहूपुत्रवधू, पुत्र की स्त्री
रोपनीधान की रोपाई
कलेवासवेरे का जलपान, नाश्ता
पुरवाईपूरब की ओर से बहने वाली हवा
अधरतियाआधी रात
खंजड़ीढपली के ढंग का परंतु आकार में उससे छोटा एक वाद्य यंत्र
निस्तब्धतासन्नाटा, नीरवता
लोहीप्रातःकाल की लालिमा
कुहासाकोहरा
आवृतढका हुआ, आच्छादित
कुशएक प्रकार की नुकीली घास
बोदाकम बुद्धि वाला, मंदबुद्धि
संबलसहारा
प्रभातीप्रातःकाल गाए जाने वाले जागरण-गीत
पंजरशरीर का ढाँचा; निर्जीव देह
तल्लीनतालीन हो जाना, मग्नता
श्रमबिंदुपरिश्रम से उत्पन्न पसीने की बूँदें

प्रश्न-अभ्यास के उत्तर

1. खेतीबारी से जुड़े गृहस्थ बालगोबिन भगत अपनी किन चारित्रिक विशेषताओं के कारण साधु कहलाते थे?

उत्तरगृहस्थ होते हुए भी बालगोबिन भगत साधु की सभी परिभाषाओं पर खरे उतरते थे। उनकी प्रमुख चारित्रिक विशेषताएँ ये थीं—(क) वे कबीर को ‘साहब’ मानते, उन्हीं के गीत गाते और उन्हीं के आदर्शों पर चलते थे।(ख) वे कभी झूठ नहीं बोलते और सबसे खरा एवं दो-टूक व्यवहार रखते थे।(ग) वे किसी से बेकार झगड़ा मोल नहीं लेते थे और किसी की चीज़ बिना पूछे नहीं छूते थे – यहाँ तक कि दूसरे के खेत में शौच के लिए भी नहीं बैठते थे।(घ) खेत में जो कुछ पैदा होता, उसे पहले कबीरपंथी मठ में भेंट चढ़ाते और वहाँ से प्रसाद रूप में मिले अन्न से ही गुज़ारा करते।इन्हीं सात्त्विक एवं संयमी गुणों के कारण वे साधु कहलाते थे।

2. भगत की पुत्रवधू उन्हें अकेले क्यों नहीं छोड़ना चाहती थी?

उत्तरबेटे की मृत्यु के बाद बालगोबिन भगत वृद्ध और अकेले रह गए थे। पुत्रवधू को चिंता थी कि बुढ़ापे में उनकी देखभाल करने वाला कोई नहीं रहेगा।वह रो-रोकर कहती थी कि “मैं चली जाऊँगी तो बुढ़ापे में कौन आपके लिए भोजन बनाएगा, बीमार पड़ने पर कौन एक चुल्लू पानी भी देगा?”इसी ममता और सेवा-भाव के कारण वह उन्हें अकेले छोड़कर दूसरी शादी के लिए जाना नहीं चाहती थी; परंतु भगत का निर्णय अटल था।

3. भगत ने अपने बेटे की मृत्यु पर अपनी भावनाएँ किस तरह व्यक्त कीं?

उत्तरअपने इकलौते बेटे की मृत्यु पर भगत ने शोक के बजाय असाधारण धैर्य और आध्यात्मिक आनंद प्रकट किया।उन्होंने बेटे के शव को आँगन में चटाई पर लिटाकर सफ़ेद कपड़े से ढक दिया और उस पर फूल तथा तुलसीदल बिखेर दिए; सिरहाने एक दीपक जला दिया।वे शव के सामने बैठकर वही पुराना स्वर, वही तल्लीनता लिए गीत गाते रहे और पतोहू को रोने के बदले उत्सव मनाने को कहा।उनका विश्वास था कि आत्मा परमात्मा के पास चली गई है और विरहिणी अपने प्रियतम से जा मिली है – इससे बढ़कर आनंद की और कौन बात! इस प्रकार उन्होंने मृत्यु पर भी जीवन के अटूट विश्वास को व्यक्त किया।

4. भगत के व्यक्तित्व और उनकी वेशभूषा का अपने शब्दों में चित्र प्रस्तुत कीजिए।

उत्तरबालगोबिन भगत मँझोले कद के गोरे-चिट्टे व्यक्ति थे। आयु साठ वर्ष से ऊपर थी और उनके बाल पक चुके थे, जिससे उनका चेहरा सफ़ेद बालों से जगमगाता रहता था।वे लंबी दाढ़ी या जटा-जूट नहीं रखते थे। कपड़े बहुत कम पहनते – कमर में केवल एक लँगोटी और सिर पर कबीरपंथियों जैसी कनफटी टोपी; जाड़ा आने पर ऊपर से एक काली कमली ओढ़ लेते।माथे पर सदा चमकता हुआ रामानंदी चंदन रहता, जो नाक के एक छोर से आरंभ होता, और गले में तुलसी की जड़ों की एक बेडौल माला बँधी रहती।सादगी, संयम और तेजस्विता उनके व्यक्तित्व की पहचान थी – देखने में साधु जैसे, पर भीतर से पूर्ण गृहस्थ।

5. बालगोबिन भगत की दिनचर्या लोगों के अचरज का कारण क्यों थी?

उत्तरबालगोबिन भगत की कठोर नियमबद्ध और तपस्वी दिनचर्या लोगों को अचरज में डाल देती थी।कार्तिक से फागुन तक वे प्रतिदिन सबेरे ही उठ जाते और न जाने किस वक़्त जागकर गाँव से दो मील दूर नदी-स्नान करने जाते; लौटकर पोखरे के ऊँचे भिंडे पर खंजड़ी लेकर गाने बैठ जाते।माघ की कड़कड़ाती ठंड में भी, जब लोग रजाई में दुबके रहते, वे कुश की चटाई पर पूरब मुँह काली कमली ओढ़े खंजड़ी बजाते और गाते रहते – ठंड से बेपरवाह उनके माथे पर श्रमबिंदु चमकते रहते।बीमार होने पर भी उन्होंने नेम-व्रत नहीं छोड़ा। इसी कठोर साधना, संयम और निरंतरता के कारण उनकी दिनचर्या लोगों के अचरज का कारण थी।

6. पाठ के आधार पर बालगोबिन भगत के मधुर गायन की विशेषताएँ लिखिए।

उत्तर(क) उनका गायन सीधा-सादा होते हुए भी अत्यंत मधुर, सजीव और हृदयस्पर्शी था; वे कबीर के सीधे-सादे पद गाते थे जो उनके कंठ से निकलकर जीवंत हो उठते थे।(ख) उनके गायन में अद्भुत तन्मयता और भक्ति-भाव था; गाते-गाते वे इतने मस्त और उत्तेजित हो उठते कि लगता अभी खड़े हो जाएँगे।(ग) उनके स्वर में ऐसा जादू था कि वह सुनने वालों को मंत्रमुग्ध कर देता – बच्चे झूम उठते, औरतों के होंठ गुनगुनाने लगते और हलवाहों के पैर ताल से उठने लगते।(घ) धीरे-धीरे स्वर ऊँचा होता, एक निश्चित ताल और गति आती; ताल-स्वर के चढ़ाव के साथ श्रोताओं का मन भी ऊपर उठता जाता और सारा वातावरण संगीतमय एवं नृत्यशील हो उठता।इस प्रकार उनका गायन व्यक्तिगत साधना न रहकर सामूहिक आनंद का स्रोत बन जाता था।

7. कुछ मार्मिक प्रसंगों के आधार पर यह दिखाई देता है कि बालगोबिन भगत प्रचलित सामाजिक मान्यताओं को नहीं मानते थे। पाठ के आधार पर उन प्रसंगों का उल्लेख कीजिए।

उत्तर(क) बेटे की मृत्यु पर शोक के बदले उत्सव— इकलौते बेटे की मृत्यु पर भगत रोने-पीटने के बजाय गीत गाते रहे और पतोहू को रोने के बदले उत्सव मनाने को कहा, क्योंकि उनके अनुसार आत्मा परमात्मा से जा मिली थी।(ख) श्राद्ध और दाह-संस्कार में रूढ़ियों का त्याग— उन्होंने क्रिया-कर्म में अधिक तूल नहीं दिया और बेटे को मुखाग्नि भी पुत्रवधू से ही दिलाई, जबकि समाज में स्त्री द्वारा अग्नि देना मान्य नहीं था।(ग) विधवा पुत्रवधू का पुनर्विवाह— श्राद्ध की अवधि पूरी होते ही उन्होंने पतोहू के भाई को बुलाकर आदेश दिया कि उसकी दूसरी शादी कर दी जाए – यह उस समय की प्रचलित मान्यताओं के विरुद्ध एक साहसिक एवं प्रगतिशील कदम था।इन प्रसंगों से स्पष्ट है कि भगत अंधविश्वासों और रूढ़ियों से ऊपर उठे हुए व्यक्ति थे।

8. धान की रोपाई के समय समूचे माहौल को भगत की स्वर लहरियाँ किस तरह चमत्कृत कर देती थीं? उस माहौल का शब्द-चित्र प्रस्तुत कीजिए।

उत्तरआषाढ़ की रिमझिम में समूचा गाँव खेतों में उतर पड़ता – कहीं हल चलते, कहीं रोपनी होती, धान के पानी-भरे खेतों में बच्चे उछलते और मेड़ पर कलेवा लिए औरतें बैठी रहतीं। आकाश बादलों से घिरा रहता, ठंडी पुरवाई बहती रहती।ऐसे ही समय बालगोबिन भगत समूचा शरीर कीचड़ में लथपथ किए अपने खेत में रोपनी करते हुए गाने लगते। उनकी अँगुलियाँ एक-एक पौधा पंक्तिबद्ध बैठातीं और कंठ एक-एक शब्द को संगीत के जीने पर चढ़ाकर कुछ को आकाश की ओर और कुछ को पृथ्वी पर खड़े लोगों के कानों की ओर भेजता।उनकी स्वर-लहरियाँ सुनकर बच्चे खेलते हुए झूम उठते, मेड़ पर खड़ी औरतों के होंठ काँप उठते और वे गुनगुनाने लगतीं, हलवाहों के पैर ताल से उठने लगते तथा रोपनी करने वालों की अँगुलियाँ एक अजीब क्रम से चलने लगतीं।इस प्रकार उनका संगीत मानो जादू बनकर सारे वातावरण को आनंद, ताल और जीवंतता से भर देता था।

रचना और अभिव्यक्ति

9. पाठ के आधार पर बताएँ कि बालगोबिन भगत की कबीर पर श्रद्धा किन-किन रूपों में प्रकट हुई है?

उत्तर(क) वे कबीर को अपना ‘साहब’ (स्वामी) मानते थे।(ख) वे सदा कबीर के ही सीधे-सादे पद गाते थे और उन्हीं गीतों में रम जाते थे।(ग) वे कबीर के आदेशों एवं आदर्शों पर ही अपना जीवन ढालते थे – सत्य बोलना, खरा व्यवहार रखना और निष्काम कर्म करना।(घ) खेत की उपज को पहले कबीरपंथी मठ में भेंट चढ़ाकर प्रसाद रूप में पाई वस्तु से ही जीवन-निर्वाह करना।(ङ) कबीर की भाँति ही वे आडंबरों से दूर, सहज भक्ति और मानवता में विश्वास रखते थे। इस प्रकार उनकी श्रद्धा गायन, आचरण, भोजन और जीवन-दर्शन – हर रूप में प्रकट होती है।

10. आपकी दृष्टि में भगत की कबीर पर अगाध श्रद्धा के क्या कारण रहे होंगे?

उत्तरकबीर की निर्गुण भक्ति, सादगी और आडंबर-विरोधी विचारधारा भगत के सरल एवं संयमी स्वभाव से पूरी तरह मेल खाती थी, इसलिए वे कबीर की ओर सहज ही आकृष्ट हुए।कबीर ने ऊँच-नीच, जाति-पाँति और सामाजिक रूढ़ियों का खंडन किया था; भगत भी इन्हीं रूढ़ियों से ऊपर उठे हुए थे, अतः कबीर का दर्शन उन्हें अपने जीवन का आदर्श लगा।कबीर के पदों की मधुरता, उनमें छिपा गहरा अध्यात्म और सत्य-निष्ठा भगत के संगीत-प्रेमी एवं भक्त हृदय को छू गई। इन्हीं कारणों से उनकी कबीर पर अगाध श्रद्धा रही होगी। (विद्यार्थी अपने तर्क भी जोड़ सकते हैं।)

11. गाँव का सामाजिक-सांस्कृतिक परिवेश आषाढ़ चढ़ते ही उल्लास से क्यों भर जाता है?

उत्तरआषाढ़ का महीना वर्षा और खेती के आरंभ का प्रतीक है – किसान का पूरा जीवन इसी ऋतु पर निर्भर है, इसलिए इसके आते ही गाँव में उल्लास छा जाता है।रिमझिम वर्षा में समूचा गाँव एक साथ खेतों में उतर पड़ता है – कहीं हल चलते, कहीं रोपनी होती; यह सामूहिक श्रम और सहयोग का उत्सव बन जाता है।पानी-भरे खेतों में बच्चे उछलते-कूदते हैं, मेड़ पर औरतें कलेवा लेकर बैठती हैं, और बालगोबिन भगत जैसे लोगों की स्वर-लहरियाँ सारे वातावरण को संगीतमय बना देती हैं।अच्छी फसल की आशा, हरियाली और सामूहिक उत्साह मिलकर गाँव के सामाजिक-सांस्कृतिक परिवेश को उल्लास से भर देते हैं।

12. “ऊपर की तसवीर से यह न माना जाए कि बालगोबिन भगत साधु थे।” क्या ‘साधु’ की पहचान पहनावे के आधार पर की जानी चाहिए? आप किन आधारों पर यह सुनिश्चित करेंगे कि अमुक व्यक्ति ‘साधु’ है?

उत्तरनहीं, ‘साधु’ की पहचान केवल पहनावे या बाहरी वेशभूषा के आधार पर नहीं की जानी चाहिए। भगवा वस्त्र, माला या तिलक धारण करने मात्र से कोई साधु नहीं हो जाता।सच्चे साधु की पहचान उसके आचरण और चरित्र से होती है। मैं इन आधारों पर सुनिश्चित करूँगा—(क) वह सत्यवादी हो और खरा व्यवहार रखता हो; (ख) लोभ, मोह और अहंकार से दूर हो; (ग) किसी का बुरा न सोचे और परोपकारी हो;(घ) इंद्रियों पर संयम रखता हो और निष्काम भाव से कर्म करता हो। बालगोबिन भगत गृहस्थ होकर भी इन सभी गुणों पर खरे उतरते थे, इसीलिए वे सच्चे अर्थों में साधु थे।

13. मोह और प्रेम में अंतर होता है। भगत के जीवन की किस घटना के आधार पर इस कथन का सच सिद्ध करेंगे?

उत्तरमोह में स्वार्थ और अधिकार-भाव होता है, जबकि सच्चा प्रेम निःस्वार्थ होता है और दूसरे का हित चाहता है।भगत अपने इकलौते बेटे से अत्यधिक प्रेम करते थे, फिर भी उसकी मृत्यु पर मोहवश रोने-बिलखने के बजाय उन्होंने उसे परमात्मा का मिलन मानकर उत्सव मनाया – यह मोह से ऊपर उठे शुद्ध प्रेम का प्रमाण है।इसी प्रकार पतोहू उनकी सेवा करना चाहती थी, पर भगत ने अपने सुख का मोह त्यागकर उसके भविष्य के हित में उसका पुनर्विवाह करा दिया। यदि उन्हें पतोहू की सेवा का मोह होता तो वे उसे रोक लेते।इन घटनाओं से सिद्ध होता है कि भगत के हृदय में मोह नहीं, बल्कि सच्चा एवं निःस्वार्थ प्रेम था।

भाषा-अध्ययन

14. इस पाठ में आए कोई दस क्रियाविशेषण छाँटकर लिखिए और उनके भेद भी बताइए।

उत्तरक्रियाविशेषण के चार भेद होते हैं – कालवाचक, स्थानवाचक, परिमाणवाचक तथा रीतिवाचक। पाठ में आए दस क्रियाविशेषण उनके भेद सहित— 1. हमेशा – कालवाचक क्रियाविशेषण 2. कभी (नहीं) – कालवाचक 3. बार-बार – कालवाचक 4. सबेरे / सवेरे – कालवाचक 5. ऊपर – स्थानवाचक 6. नीचे – स्थानवाचक 7. यहाँ / वहाँ – स्थानवाचक 8. बहुत – परिमाणवाचक 9. थोड़ा – परिमाणवाचक 10. धीरे-धीरे – रीतिवाचक क्रियाविशेषण (इनके अतिरिक्त ‘लगातार’, ‘बिलकुल’ आदि भी क्रियाविशेषण हैं।)

अतिरिक्त प्रश्न

लघु उत्तरीय प्रश्न (30–40 शब्द)

1. ‘बालगोबिन भगत’ किस विधा की रचना है और इसके लेखक कौन हैं?

उत्तर‘बालगोबिन भगत’ एक रेखाचित्र है। इसके लेखक रामवृक्ष बेनीपुरी हैं, जिन्हें ‘कलम का जादूगर’ भी कहा जाता है। इसमें उन्होंने एक विलक्षण, संयमी और संगीत-प्रेमी ग्रामीण चरित्र का सजीव शब्द-चित्र खींचा है।

2. भगत खेत की उपज का क्या करते थे?

उत्तरभगत अपने खेत में जो कुछ पैदा होता, उसे सिर पर लादकर पहले चार कोस दूर कबीरपंथी मठ में ‘भेंट’ रूप में ले जाते। वहाँ से ‘प्रसाद’ रूप में जो मिलता, उसे घर लाते और उसी से अपना जीवन-निर्वाह करते थे।

3. ‘प्रभाती’ क्या है? भगत इसे कब गाते थे?

उत्तरप्रभाती प्रातःकाल गाए जाने वाले जागरण-गीत हैं। बालगोबिन भगत कार्तिक के आते ही प्रभातियाँ गाना आरंभ कर देते थे, जो फागुन तक चलती रहती थीं। इन दिनों वे नदी-स्नान करके पोखरे के भिंडे पर खंजड़ी लेकर प्रभाती गाते थे।

4. भगत ने अपने बेटे के क्रिया-कर्म में रूढ़ियों का त्याग कैसे किया?

उत्तरभगत ने बेटे के क्रिया-कर्म में अधिक तूल नहीं दिया। उन्होंने मुखाग्नि भी पुत्रवधू से दिलाई, जबकि समाज में स्त्री द्वारा अग्नि देना मान्य नहीं था। श्राद्ध पूरा होते ही उन्होंने विधवा पतोहू का पुनर्विवाह करा देने का आदेश दे दिया।

5. बालगोबिन भगत की मृत्यु किस प्रकार हुई?

उत्तरअंतिम बार गंगा-स्नान से लौटने पर भगत की तबीयत सुस्त हो गई और हल्का बुखार रहने लगा, फिर भी उन्होंने नेम-व्रत और गीत-स्नान नहीं छोड़े। एक संध्या गीत गाने के बाद भोर में लोगों ने जाकर देखा तो वे नहीं रहे – सिर्फ़ उनका पंजर (निर्जीव देह) पड़ा था।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (100–120 शब्द)

6. बालगोबिन भगत का चरित्र-चित्रण कीजिए।

उत्तरबालगोबिन भगत इस रेखाचित्र के केंद्रीय पात्र हैं, जिनमें अनेक उच्च गुण समाए हैं। वे गृहस्थ होते हुए भी सच्चे साधु थे – कबीर को ‘साहब’ मानने वाले, सत्यवादी और खरा व्यवहार रखने वाले।वे संयमी थे – किसी की चीज़ बिना पूछे नहीं छूते और दूसरे के खेत में शौच तक नहीं बैठते थे। वे अद्भुत संगीत-साधक थे, जिनके मधुर गायन से समूचा वातावरण झूम उठता था।वे कठोर नेम-व्रती और तपस्वी थे – कड़ाके की ठंड में भी नदी-स्नान और गायन नहीं छोड़ते थे। साथ ही वे प्रगतिशील एवं रूढ़ि-विरोधी थे – बेटे की मृत्यु को उत्सव मानना और विधवा पतोहू का पुनर्विवाह कराना इसका प्रमाण है।इस प्रकार सादगी, सत्य-निष्ठा, संयम, मानवता और दृढ़ता उनके चरित्र के मूल गुण हैं।

7. लेखक ने बालगोबिन भगत को ‘साधु’ क्यों कहा है, जबकि वे पूरे गृहस्थ थे? इस कथन की समीक्षा कीजिए।

उत्तरलेखक के अनुसार साधुता वेशभूषा या बाहरी अनुष्ठानों से नहीं, बल्कि जीवन के मानवीय सरोकारों और आचरण से तय होती है। बालगोबिन भगत के पास खेतीबारी, घर, बेटा और पतोहू थी – वे पूरे गृहस्थ थे।फिर भी वे साधु की सभी परिभाषाओं पर खरे उतरते थे – वे कभी झूठ नहीं बोलते, खरा व्यवहार रखते, किसी से व्यर्थ झगड़ा नहीं करते और किसी की वस्तु बिना पूछे नहीं छूते थे।वे लोभ-मोह से ऊपर थे, निष्काम भाव से कर्म करते और अपनी उपज मठ में भेंट चढ़ाकर प्रसाद से जीवन चलाते थे। बेटे की मृत्यु पर भी उनका अध्यात्म-विश्वास डगमगाया नहीं।इस प्रकार लेखक यह सिद्ध करते हैं कि गृहस्थ होकर भी, अपने सद्गुणों और संयम के कारण भगत सच्चे साधु थे।

8. इस पाठ के माध्यम से लेखक किन सामाजिक रूढ़ियों पर प्रहार करते हैं? सोदाहरण लिखिए।

उत्तरलेखक ने बालगोबिन भगत के चरित्र के माध्यम से अनेक रूढ़ियों एवं अंधविश्वासों पर प्रहार किया है।(क) मृत्यु पर शोक की रूढ़ि— समाज में मृत्यु पर रोना-पीटना अनिवार्य माना जाता है, पर भगत ने बेटे की मृत्यु को आत्मा-परमात्मा का मिलन मानकर उत्सव मनाया और पतोहू को रोने से रोका।(ख) स्त्री द्वारा अग्नि न देने की मान्यता— भगत ने पुत्र को मुखाग्नि स्वयं न देकर पुत्रवधू से दिलाई, जो परंपरा के विरुद्ध था।(ग) विधवा-विवाह का निषेध— भगत ने विधवा पतोहू को बुढ़ापे में अपनी सेवा के लिए रोकने के बजाय उसके भविष्य के हित में उसका पुनर्विवाह करा दिया।इन उदाहरणों से स्पष्ट है कि लेखक मानवीय करुणा एवं प्रगतिशील दृष्टिकोण को रूढ़ियों से श्रेष्ठ मानते हैं।

अभ्यास MCQ & अभिकथन-कारण

1. ‘बालगोबिन भगत’ पाठ के लेखक कौन हैं?

(क) प्रेमचंद

(ख) रामवृक्ष बेनीपुरी

(ग) यशपाल

(घ) महावीर प्रसाद द्विवेदी

उत्तर(ख) रामवृक्ष बेनीपुरी।

2. ‘बालगोबिन भगत’ किस विधा की रचना है?

(क) कहानी

(ख) निबंध

(ग) रेखाचित्र

(घ) यात्रा-वृत्तांत

उत्तर(ग) रेखाचित्र।

3. बालगोबिन भगत किसे अपना ‘साहब’ मानते थे?

(क) तुलसीदास

(ख) सूरदास

(ग) कबीर

(घ) रैदास

उत्तर(ग) कबीर।

4. भगत खेत की उपज को सबसे पहले कहाँ ले जाते थे?

(क) अपने घर

(ख) बाज़ार

(ग) कबीरपंथी मठ

(घ) मंदिर

उत्तर(ग) कबीरपंथी मठ। वहाँ भेंट चढ़ाकर प्रसाद रूप में मिली वस्तु से जीवन चलाते थे।

5. भगत बेटे की मृत्यु पर पतोहू से क्या करने को कहते हैं?

(क) रोने को

(ख) उत्सव मनाने को

(ग) चुप रहने को

(घ) उपवास करने को

उत्तर(ख) उत्सव मनाने को – क्योंकि उनके अनुसार आत्मा परमात्मा से जा मिली थी।

6. भगत किस वाद्य यंत्र के साथ गीत गाते थे?

(क) ढोलक

(ख) खंजड़ी

(ग) तबला

(घ) हारमोनियम

उत्तर(ख) खंजड़ी।

7. बालगोबिन भगत ‘प्रभाती’ किस महीने से गाना आरंभ करते थे?

(क) आषाढ़

(ख) भादों

(ग) कार्तिक

(घ) फागुन

उत्तर(ग) कार्तिक – जो फागुन तक चलती रहती थी।

8. श्राद्ध पूरा होने पर भगत ने पतोहू के लिए क्या आदेश दिया?

(क) उसे घर में ही रखने का

(ख) उसका दूसरा विवाह कर देने का

(ग) उसे मठ भेजने का

(घ) उसे संन्यास दिलाने का

उत्तर(ख) उसका दूसरा विवाह कर देने का।

9. भगत के व्यक्तित्व की प्रमुख विशेषता क्या थी?

(क) धन-संग्रह

(ख) सादगी, सत्य-निष्ठा और संयम

(ग) क्रोध और हठ

(घ) दिखावा

उत्तर(ख) सादगी, सत्य-निष्ठा और संयम।

10. लेखक रामवृक्ष बेनीपुरी को किस उपाधि से जाना जाता है?

(क) कथा सम्राट

(ख) कलम का जादूगर

(ग) राष्ट्रकवि

(घ) कलम का सिपाही

उत्तर(ख) कलम का जादूगर।
उत्तर-कुंजी: 1–(ख), 2–(ग), 3–(ग), 4–(ग), 5–(ख), 6–(ख), 7–(ग), 8–(ख), 9–(ख), 10–(ख)।

अभिकथन-कारण – नीचे अभिकथन (A) और कारण (R) दिए गए हैं। सही विकल्प चुनिए—
(क) A और R दोनों सही, R, A की सही व्याख्या है। (ख) A और R दोनों सही, पर R, A की सही व्याख्या नहीं। (ग) A सही, R गलत। (घ) A गलत, R सही।

1. अभिकथन (A): बालगोबिन भगत गृहस्थ होते हुए भी साधु कहलाते थे।

कारण (R): वे सत्यवादी, संयमी थे और कबीर के आदर्शों पर चलते थे।

उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है।

2. अभिकथन (A): भगत ने अपने बेटे की मृत्यु पर उत्सव मनाया।

कारण (R): भगत को अपने बेटे से कोई लगाव नहीं था।

उत्तर(ग) A सही है, पर R गलत है – भगत बेटे से अत्यधिक प्रेम करते थे; उन्होंने मृत्यु को आत्मा-परमात्मा का मिलन मानकर उत्सव मनाया।

3. अभिकथन (A): भगत ने विधवा पुत्रवधू का पुनर्विवाह करा दिया।

कारण (R): वे प्रचलित सामाजिक रूढ़ियों से ऊपर उठे प्रगतिशील व्यक्ति थे।

उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है।

4. अभिकथन (A): भगत की दिनचर्या लोगों के अचरज का कारण थी।

कारण (R): वे कड़ाके की ठंड में भी नदी-स्नान और गायन का नेम नहीं छोड़ते थे।

उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है।

5. अभिकथन (A): भगत का संगीत केवल उनकी निजी साधना तक सीमित था।

कारण (R): उनके गायन से बच्चे, औरतें और हलवाहे सभी झूम उठते थे।

उत्तर(घ) A गलत है, R सही है – उनका संगीत निजी न रहकर समूचे वातावरण और सामूहिक मन को आनंदित कर देता था।

परीक्षा-युक्तियाँ एवं सामान्य गलतियाँ

परीक्षा-युक्तियाँ

  • लेखक का नाम रामवृक्ष बेनीपुरी और विधा रेखाचित्र अवश्य याद रखें।
  • भगत की साधुता के गुण (सत्य, संयम, कबीर-भक्ति, निष्काम कर्म) बिंदुवार लिखें।
  • रूढ़ि-विरोध के तीन प्रसंग (मृत्यु पर उत्सव, स्त्री द्वारा मुखाग्नि, विधवा-विवाह) याद रखें – ये बार-बार पूछे जाते हैं।
  • शब्द-चित्र वाले प्रश्नों (रोपाई का माहौल, भगत की वेशभूषा) में दृश्य-वर्णन के साथ लिखें।
  • उत्तर अंक के अनुसार लिखें – लघु प्रश्न में 30–40 तथा दीर्घ प्रश्न में 100–120 शब्द।

सामान्य गलतियाँ

  • लेखक को प्रेमचंद या यशपाल लिख देना – सही लेखक रामवृक्ष बेनीपुरी हैं।
  • विधा को ‘कहानी’ लिख देना – यह रेखाचित्र है।
  • यह समझ लेना कि भगत संन्यासी/साधु जाति के थे – वे पूरे गृहस्थ थे।
  • शब्दार्थ में ‘पतोहू’ को पत्नी लिख देना – इसका अर्थ पुत्रवधू है।
  • देवनागरी मात्राओं की अशुद्धियाँ – जैसे ‘खंजड़ी’, ‘प्रभाती’ की वर्तनी पर ध्यान दें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

‘बालगोबिन भगत’ पाठ के लेखक कौन हैं और यह किस विधा की रचना है?

इस पाठ के लेखक रामवृक्ष बेनीपुरी हैं, जिन्हें ‘कलम का जादूगर’ कहा जाता है। यह एक रेखाचित्र है।

बालगोबिन भगत गृहस्थ होकर भी साधु क्यों कहलाते थे?

क्योंकि वे सत्यवादी, संयमी और निष्काम कर्मी थे, कबीर को साहब मानकर उन्हीं के आदर्शों पर चलते थे और साधु की सभी परिभाषाओं पर खरे उतरते थे।

भगत ने बेटे की मृत्यु पर अपनी भावनाएँ किस प्रकार व्यक्त कीं?

उन्होंने शोक के बजाय गीत गाकर उत्सव मनाया और पतोहू को रोने के बदले उत्सव मनाने को कहा, क्योंकि उनका विश्वास था कि आत्मा परमात्मा से जा मिली है।

प्रश्न NCERT क्षितिज भाग 2 पुस्तक से ज्यों-के-त्यों लिए गए हैं; उत्तर ClearStudy द्वारा मौलिक रूप से तैयार एवं जाँचे गए हैं।

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