NCERT Solutions for Class 10 Hindi (Sanchayan 2) अध्याय 2: सपनों के-से दिन

यह पृष्ठ कक्षा 10 हिंदी की पूरक पाठ्यपुस्तक संचयन (भाग 2) के अध्याय 2 ‘सपनों के-से दिन’ (लेखक – गुलज़ार) का सम्पूर्ण समाधान देता है – पाठ का सार, शब्दार्थ, पाठ्यपुस्तक के सभी बोध-प्रश्नों के उत्तर, अतिरिक्त प्रश्न, MCQ तथा अभिकथन-कारण।

कक्षा: 10 विषय: हिंदी पुस्तक: संचयन (भाग 2) अध्याय: 2 – सपनों के-से दिन लेखक: गुलज़ार विधा: संस्मरणात्मक रेखाचित्र सत्र: 2026–27

लेखक परिचय – गुलज़ार

गुलज़ार का जन्म सन् 1934 में दीना (अब पाकिस्तान, तत्कालीन झेलम जिला) में हुआ था। उनका मूल नाम सम्पूरन सिंह कालरा है। वे हिंदी-उर्दू के सुप्रसिद्ध कवि, गीतकार, पटकथा-लेखक और फ़िल्म-निर्देशक हैं। बचपन में ही उन्हें साहित्य और कविता से गहरा लगाव हो गया था। उनकी रचनाओं में सहज, संवेदनशील और जीवन के छोटे-छोटे अनुभवों को छूती हुई भाषा मिलती है। उन्होंने अनेक यादगार फ़िल्मी गीत लिखे तथा बाल-साहित्य की रचना भी की। उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार, पद्म भूषण, अनेक राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार, ऑस्कर और ग्रैमी जैसे सम्मान प्राप्त हुए हैं तथा 2023 का ज्ञानपीठ पुरस्कार भी उन्हें प्रदान किया गया। ‘सपनों के-से दिन’ उनके अपने बचपन और स्कूली जीवन की भोली-भाली, खट्टी-मीठी यादों पर आधारित आत्मकथात्मक संस्मरण है।

पाठ का सार

‘सपनों के-से दिन’ गुलज़ार के बचपन और स्कूली जीवन का संस्मरणात्मक रेखाचित्र है। लेखक बताते हैं कि उनके साथ खेलने वाले अधिकतर बच्चे उन्हीं जैसे साधारण परिवारों के थे। नंगे पाँव, फटे-मैले कपड़े और बिखरे बालों वाले ये बच्चे लकड़ी के ढेर से कूदते-गिरते, चोट खाते, फिर भी अगले दिन खेलने आ जाते। मार खाने पर भी उनका खेल के प्रति आकर्षण कम न होता – यह बात लेखक को बाद में बाल-मनोविज्ञान पढ़ने पर समझ आई।

मुहल्ले के अधिकतर परिवार आसपास के गाँवों, राजस्थान या हरियाणा से आकर मंडी में व्यापार करने बसे थे, इसलिए उनकी बोलियाँ अलग-अलग थीं; फिर भी खेलते समय बच्चे एक-दूसरे की बात भली-भाँति समझ लेते – इससे सिद्ध होता है कि कोई भी भाषा आपसी व्यवहार में बाधा नहीं बनती। अधिकांश परिवार पढ़ाई को ज़रूरी नहीं समझते थे; कुछ बच्चे बस्ता तालाब में फेंककर स्कूल जाना ही छोड़ देते। दुकानदार बच्चों को पंडित घनश्याम दास से लंडे (बही-खाता) सीखकर दुकान सँभलाना अधिक उपयोगी मानते थे।

लेखक छुट्टियों की यादें सुनाते हैं – आरंभ के दिन खूब खेल-कूद और ननिहाल की मस्ती में बीतते, पर जैसे-जैसे छुट्टियाँ समाप्त होतीं, मास्टरों के दिए काम और पिटाई का डर बढ़ता जाता। फिर वे स्कूल और अध्यापकों का वर्णन करते हैं। पीटी मास्टर प्रीतमचंद बहुत कठोर अनुशासनप्रिय थे और छोटी-सी गलती पर भी ‘खाल खींचने’ जैसी सज़ा देते थे। एक बार उन्होंने चौथी कक्षा के बच्चों को फ़ारसी का शब्द-रूप याद न होने पर मुर्गा बनाकर इतना मारा कि हेडमास्टर शर्मा जी ने यह बर्बरता देखकर उन्हें मौके पर ही फटकारा और बाद में निलंबित (मुअत्तल) कर दिया।

स्वभाव से कठोर पीटी मास्टर का दूसरा रूप भी था – जब वे स्काउटिंग की परेड कराते और बच्चों को ‘शाबाश’ कहते, तो वह शाबाशी बच्चों को फ़ौज के तमगों-सी मूल्यवान लगती। निलंबन के बाद घर पर वे अपने तोतों से बड़े प्रेम से बातें करते थे। लेखक के लिए यह बात आज भी अद्भुत और अलौकिक-सी है कि जो मास्टर बच्चों की खाल तक उधेड़ देते थे, वही अपने तोतों से इतनी मीठी बातें कैसे कर लेते थे। समूचा पाठ स्कूली जीवन की मासूम, भयभरी पर मोहक यादों को आत्मीय भाषा में जीवंत कर देता है।

पाठ का मूलभाव

इस संस्मरण का मूलभाव यह है कि बचपन की स्कूली यादें भले ही डर, पिटाई और छुट्टियों के बीते दिनों के तनाव से भरी हों, फिर भी वे जीवन की सबसे मधुर और ‘सपनों के-से’ दिन होती हैं। पाठ शिक्षा-व्यवस्था में बच्चों की पिटाई की कुप्रथा पर भी प्रश्न उठाता है और बताता है कि कठोर दिखने वाले व्यक्ति के भीतर भी कोमलता का एक कोना होता है। साथ ही यह संदेश देता है कि खेल बच्चों के विकास के लिए आवश्यक है और भाषा का अंतर आपसी प्रेम-व्यवहार में कभी बाधा नहीं बनता।

कठिन शब्द-अर्थ

शब्दअर्थ
कच्छी / कच्छाघुटनों तक का छोटा अधोवस्त्र
तार-तार होनापूरी तरह फट जाना, चीथड़े-चीथड़े हो जाना
लथपथसना हुआ, भीगा हुआ (धूल-कीचड़ आदि से)
गुस्सैलबहुत जल्दी क्रोधित हो जाने वाला
परचूनियाराशन/सौदा-सुलफ़ की छोटी दुकान चलाने वाला
आढ़तीदलाली पर माल का लेन-देन कराने वाला व्यापारी
तहसीलदारतहसील का राजस्व अधिकारी
लंडेहिसाब-किताब लिखने की पंजाबी प्राचीन लिपि
बहियाँदुकान के हिसाब-किताब के खाते (बही का बहुवचन)
मुनीमीमुनीम का काम; दुकान का हिसाब रखना
लोकोक्तिकहावत, प्रचलित उक्ति
क़ैदबंधन, बंदी अवस्था
अलियार / डंडियाँरास्ते के किनारे उगी कटी-छँटी झाड़ियाँ
चपड़ासीचपरासी, संदेश-सेवक
मनोविज्ञानमन एवं व्यवहार का अध्ययन करने वाला शास्त्र
ट्रेनिंगप्रशिक्षण
हरफनमौलाहर कला/विद्या में निपुण, पारंगत
जबरन / ज़बरदस्तीबलपूर्वक
रंगरूटनया भरती हुआ सैनिक
मुअत्तलनिलंबित (काम से अस्थायी रूप से हटाया जाना)
महकमा-ए-तालीमशिक्षा विभाग
बहालपुनः नियुक्त करना, फिर से बहाली
अलौकिकलोक से परे, अद्भुत, असाधारण
खाल खींचना/उधेड़नाबहुत बुरी तरह पीटना (मुहावरा)
बर्बरताक्रूरता, निर्दयता

पाठ्यपुस्तक के बोध-प्रश्नों के उत्तर

1. कोई भी भाषा आपसी व्यवहार में बाधा नहीं बनती—पाठ के किस अंश से यह सिद्ध होता है?

उत्तरपाठ के उस अंश से यह सिद्ध होता है, जहाँ लेखक बताते हैं कि उनके आधे से अधिक साथी राजस्थान या हरियाणा से आकर मंडी में बसे परिवारों के थे, जिनकी बोली अलग और कुछ शब्द हँसी पैदा करने वाले लगते थे।बहुत छोटे होने के कारण आरंभ में बच्चे उनकी बोली कम समझ पाते थे, फिर भी “खेलते तो सभी एक-दूसरे की बात खूब अच्छी तरह समझ लेते।”इससे स्पष्ट है कि खेल और आपसी प्रेम-व्यवहार में भाषा का अंतर कभी बाधा नहीं बनता – भावना की भाषा सभी समझ लेते हैं।

2. पीटी साहब की ‘शाबाश’ फ़ौज के तमगों-सी क्यों लगती थी? स्पष्ट कीजिए।

उत्तरपीटी मास्टर प्रीतमचंद अत्यंत कठोर, अनुशासनप्रिय और कम बोलने वाले अध्यापक थे, जो प्रशंसा कभी-कभार ही करते थे।इसीलिए जब परेड या ड्रिल ठीक करने पर वे अपनी चमकीली आँखें झपकाकर ‘शाबाश’ कहते, तो वह विरल प्रशंसा बच्चों को असाधारण उपलब्धि-सी लगती।बच्चों को ऐसा अनुभव होता मानो उन्होंने किसी फ़ौज के सारे तमगे (पदक) जीत लिए हों। साल भर मास्टरों से मिले अंकों से भी वह एक ‘शाबाश’ अधिक मूल्यवान लगती, क्योंकि वह कठोर व्यक्ति से बहुत कठिनाई से मिली प्रशंसा थी।

3. नयी श्रेणी में जाने और नयी कापियों और पुरानी किताबों से आती ख़ास तरह की गंध से लेखक का बालमन क्यों उदास हो उठता था?

उत्तरनई श्रेणी में जाते ही लेखक को नई कापियों और पुरानी किताबों से एक विशेष-सी गंध आती थी, जिससे उनका मन उत्साह के बजाय उदास हो जाता था।मनोविज्ञान की जानकारी से लेखक ने इसका कारण यह समझा कि यह गंध आगे की श्रेणी की कठिन पढ़ाई और नए मास्टरों की मार-पीट के भय से जुड़ी हुई थी।यह डर उनके मन में भीतर तक बैठ गया था, इसलिए वही गंध सूँघते ही वह छिपा हुआ भय जाग उठता और बालमन उदास हो उठता था।

4. स्काउट परेड करते समय लेखक अपने को महत्त्वपूर्ण ‘आदमी’ फ़ौजी जवान क्यों समझने लगता था?

उत्तरस्काउटिंग की परेड के समय बच्चे धोबी की धुली वर्दी, पॉलिश किए बूट और जुर्राबें पहनते थे।मास्टर प्रीतमचंद की सीटी पर ‘लेफ्ट-राइट’ और ‘राइट टर्न, लेफ्ट टर्न, अबाउट टर्न’ के आदेशों पर बूटों की एड़ियाँ बजाते हुए वे अकड़कर मार्च करते थे।साफ़-सुथरी वर्दी, बूटों की ठक-ठक और सैनिकों जैसे अनुशासित कदमों से उन्हें लगता मानो वे विद्यार्थी नहीं, बल्कि कोई महत्त्वपूर्ण ‘आदमी’ – सचमुच के फ़ौजी जवान – हों। इसी गर्व के कारण वे स्वयं को फ़ौजी समझने लगते थे।

5. हेडमास्टर शर्मा जी ने पीटी साहब को मुअत्तल क्यों कर दिया?

उत्तरपीटी मास्टर प्रीतमचंद ने चौथी कक्षा के बच्चों को फ़ारसी का एक शब्द-रूप याद न कर पाने पर बहुत क्रूर दंड दिया।उन्होंने सभी बच्चों के कान पकड़वाकर, पीठ ऊँची करवाकर मुर्गा बना दिया, जिससे थोड़ी ही देर में बच्चों की टाँगों में जलन होने लगी और कमज़ोर बच्चे गिरने लगे।उसी समय हेडमास्टर शर्मा जी, जो स्वभाव से कोमल और दयालु थे, अस्पताल से लौटकर वहाँ आ पहुँचे। यह बर्बरता देखकर वे सहन न कर सके और उत्तेजित होकर पीटी साहब को फटकारा कि “क्या चौथी कक्षा को सज़ा देने का यह ढंग है? इसे फ़ौरन बंद करो।”इस अमानवीय एवं बर्बर व्यवहार के कारण ही हेडमास्टर शर्मा जी ने पीटी साहब को मुअत्तल (निलंबित) कर दिया।

6. लेखक के अनुसार उन्हें स्कूल खुशी से भागे जाने की जगह न लगने पर भी कब और क्यों उन्हें स्कूल जाना अच्छा लगने लगा?

उत्तरलेखक के लिए स्कूल आरंभ में कोई ऐसी जगह नहीं थी, जहाँ बच्चे खुशी से दौड़े जाएँ; अधिकतर बच्चे रोते-चिल्लाते ही स्कूल जाते थे।परंतु जब मास्टर प्रीतमचंद उन्हें स्काउटिंग की परेड और ड्रिल कराते, नीली-पीली झंडियाँ पकड़ाकर अभ्यास कराते और सही करने पर ‘शाबाश’ कहते, तब स्कूल अच्छा लगने लगता।साफ़ वर्दी और बूट पहनकर अनुशासित परेड करने में बच्चों को स्वयं के फ़ौजी जवान-सा महत्त्वपूर्ण होने का गर्व-भरा आनंद मिलता था – इसी कारण इन गतिविधियों के समय उन्हें स्कूल जाना अच्छा लगने लगता था।

7. लेखक अपने छात्र जीवन में स्कूल से छुट्टियों में मिले काम को पूरा करने के लिए क्या-क्या योजनाएँ बनाया करता था और उसे पूरा न कर पाने की स्थिति में किसकी भाँति ‘बहादुर’ बनने की कल्पना किया करता था?

उत्तरछुट्टियों के आरंभ में लेखक काम का हिसाब लगाता था – जैसे हिसाब के मास्टर दो सौ सवाल देते, तो वह सोचता कि यदि रोज़ दस सवाल निकाले जाएँ तो बीस दिन में सारे पूरे हो जाएँगे।परंतु खेल-कूद में दिन बीतते जाते और काम जैसे-का-तैसा पड़ा रहता। तब वह योजना बदलकर सोचता कि दस की क्या बात, रोज़ पंद्रह सवाल भी आसानी से निकाले जा सकते हैं – इस प्रकार वह बार-बार नई योजनाएँ बनाता रहता।जब काम फिर भी पूरा न हो पाता, तब वह उन साहसी सहपाठियों (‘बहादुरों’) की भाँति बनने की कल्पना करता, जो छुट्टियों का काम करने के बजाय मास्टरों की पिटाई को ही ‘सस्ता सौदा’ समझ लेते थे।

8. पाठ में वर्णित घटनाओं के आधार पर पीटी सर की चारित्रिक विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।

उत्तरकठोर एवं अनुशासनप्रिय: पीटी मास्टर प्रीतमचंद अत्यंत सख़्त अध्यापक थे; प्रार्थना और परेड में ज़रा-सी चूक पर भी वे बाघ की तरह झपटकर सज़ा देते थे।क्रोधी एवं कठोर दंड देने वाले: फ़ारसी का शब्द-रूप याद न होने पर उन्होंने बच्चों को मुर्गा बनाकर इतनी निर्दयता से दंड दिया कि वह बर्बरता कहलाई और उन्हें निलंबित होना पड़ा।कर्तव्यनिष्ठ एवं प्रशिक्षण में निपुण: वे स्काउटिंग, ड्रिल और परेड बड़ी कुशलता से कराते थे और सब बच्चों को अनुशासित बना देते थे।दृढ़ एवं निडर: निलंबित होने पर भी उन्हें रत्ती भर चिंता न थी; वे आराम से अपने चौबारे में रहते रहे।भीतर से कोमल: उनके कठोर रूप के पीछे एक संवेदनशील हृदय भी था – वे अपने पिंजरे के दो तोतों से प्रतिदिन प्रेम से बातें करते और उन्हें भिगोए बादाम खिलाते थे। इस प्रकार वे बाहर से कठोर पर भीतर से कोमल और जीवों से प्रेम करने वाले व्यक्ति थे।

9. विद्यार्थियों को अनुशासन में रखने के लिए पाठ में अपनाई गई युक्तियों और वर्तमान में स्वीकृत मान्यताओं के संबंध में अपने विचार प्रकट कीजिए।

उत्तरपाठ में अपनाई गई युक्तियाँ: उस समय विद्यार्थियों को अनुशासन में रखने के लिए शारीरिक दंड, मार-पीट, कान पकड़कर मुर्गा बनाना, घुड़की और भय जैसे कठोर साधनों का प्रयोग किया जाता था।मेरे विचार: ये युक्तियाँ अनुचित और अमानवीय थीं। डर और पिटाई से बच्चों में पढ़ाई के प्रति रुचि के बजाय भय और हीनभावना उत्पन्न होती थी।वर्तमान मान्यता: आज शिक्षा में शारीरिक दंड कानूनन वर्जित है। अनुशासन प्रेम, समझाने, प्रोत्साहन, अच्छे आचरण की प्रशंसा और रचनात्मक गतिविधियों के माध्यम से सिखाया जाता है। यही दृष्टिकोण उचित है, क्योंकि स्नेहपूर्ण वातावरण में बच्चे बिना भय के स्वाभाविक रूप से अनुशासित और आत्मविश्वासी बनते हैं।

10. बचपन की यादें मन को गुदगुदाने वाली होती हैं विशेषकर स्कूली दिनों की। अपने अब तक के स्कूली जीवन की खट्टी-मीठी यादों को लिखिए।

उत्तर (संभावित)यह विद्यार्थी का व्यक्तिगत अनुभव है; उत्तर इस प्रकार लिखा जा सकता है –मीठी यादें: मित्रों के साथ खेल का मैदान, टिफिन बाँटकर खाना, वार्षिकोत्सव और खेलकूद में भाग लेना, किसी विषय में सबसे अधिक अंक पाकर शिक्षक से ‘शाबाश’ सुनना तथा पिकनिक पर जाना – ये मेरी सबसे मधुर यादें हैं।खट्टी यादें: गृहकार्य पूरा न होने पर डाँट पड़ना, परीक्षा का तनाव, किसी मित्र से झगड़ा हो जाना या प्रिय शिक्षक का स्थानांतरण हो जाना – ये यादें थोड़ी कसैली हैं।आज ये सब यादें मन को गुदगुदाती हैं और लगता है कि सचमुच वे ‘सपनों के-से दिन’ थे। (विद्यार्थी अपने अनुभव जोड़ें।)

11. प्रायः अभिभावक बच्चों को खेल-कूद में ज्यादा रुचि लेने पर रोकते हैं और समय बरबाद न करने की नसीहत देते हैं। बताइए—

(क) खेल आपके लिए क्यों ज़रूरी हैं?

उत्तरखेल से शरीर स्वस्थ, फुर्तीला और बलवान बनता है तथा रोगों से बचाव होता है।खेल से मन प्रसन्न रहता है, पढ़ाई का तनाव दूर होता है और एकाग्रता बढ़ती है।खेल से अनुशासन, सहयोग, टीम-भावना, नेतृत्व, हार-जीत को समान भाव से स्वीकार करना और खेल-भावना जैसे जीवनोपयोगी गुण विकसित होते हैं। इसीलिए खेल मेरे लिए आवश्यक हैं।

(ख) आप कौन से ऐसे नियम-कायदों को अपनाएँगे जिससे अभिभावकों को आपके खेल पर आपत्ति न हो?

उत्तरमैं पढ़ाई और खेल में संतुलन रखूँगा तथा खेलने से पहले अपना गृहकार्य एवं दैनिक पढ़ाई पूरी कर लूँगा।खेलने का एक निश्चित समय तय कर लूँगा और उतने ही समय में खेलूँगा, ताकि अन्य कामों में बाधा न पड़े।सुरक्षित स्थान पर ही खेलूँगा, खेल में चोट से बचने का ध्यान रखूँगा तथा घरवालों को बताकर ही खेलने जाऊँगा।परीक्षा के दिनों में खेल का समय कम कर दूँगा। इस प्रकार अनुशासित ढंग से खेलने पर अभिभावकों को मेरे खेल पर कोई आपत्ति नहीं होगी।

अतिरिक्त प्रश्न

लघु उत्तरीय प्रश्न

1. खेलते समय बुरी तरह पिटने पर भी बच्चे अगले दिन फिर खेलने क्यों आ जाते थे?

उत्तरबाल-मनोविज्ञान के अनुसार बच्चों को खेलना स्वभावतः अत्यंत प्रिय होता है। खेल से मिलने वाला आनंद इतना प्रबल होता है कि चोट या पिटाई का दुख उसके सामने टिक नहीं पाता, इसलिए बुरी तरह पिटने पर भी बच्चे अगले दिन फिर खेलने चले आते थे।

2. लेखक के अनुसार उस समय के अधिकांश अभिभावक बच्चों को स्कूल भेजना ज़रूरी क्यों नहीं समझते थे?

उत्तरअधिकतर परिवार व्यापारी या मेहनतकश थे, जिन्हें पढ़ाई में कोई लाभ नहीं दिखता था। उन्हें लगता था कि बच्चा कौन-सा तहसीलदार बनना है; थोड़ा बड़ा होते ही वह पंडित घनश्याम दास से लंडे और मुनीमी सीखकर दुकान पर बहियाँ लिखने और हिसाब-किताब सँभालने लगेगा। इसलिए वे पढ़ाई के बजाय कामकाज सिखाना अधिक उपयोगी मानते थे।

3. हेडमास्टर शर्मा जी का स्वभाव पीटी साहब से किस प्रकार भिन्न था?

उत्तरहेडमास्टर शर्मा जी कोमल, सहृदय और दयालु स्वभाव के थे; किसी ने उन्हें छोटी गलती पर बच्चों को कठोर दंड देते नहीं देखा। अधिक-से-अधिक वे हल्की-सी चपत लगाते थे। इसके विपरीत पीटी मास्टर प्रीतमचंद अत्यंत कठोर, क्रोधी और मार-पीट करने वाले थे। इसीलिए शर्मा जी को पीटी साहब की बर्बरता असह्य लगी और उन्होंने उन्हें मुअत्तल कर दिया।

4. छुट्टियों के अंतिम दिनों में लेखक और उसके साथियों के मन की दशा कैसी हो जाती थी?

उत्तरछुट्टियों के आरंभ में तो खूब खेल-कूद और मस्ती होती, पर जैसे-जैसे छुट्टियाँ समाप्त होने लगतीं, दिन गिनते-गिनते डर बढ़ता जाता। मास्टरों के दिए काम का हिसाब और स्कूल की पिटाई का भय सताने लगता। दिन छोटे लगने लगते, मानो सूरज जल्दी छिप जाता हो, और स्कूल जाने का भय मन में गहराता जाता।

5. पीटी मास्टर प्रीतमचंद के कठोर रूप के पीछे छिपे कोमल हृदय का परिचय पाठ से दीजिए।

उत्तरमुअत्तल होने के बाद पीटी साहब बाज़ार के चौबारे में रहते थे, जहाँ वे अपने पिंजरे के दो तोतों से दिन में कई बार बड़े प्रेम से बातें करते और उन्हें भिगोए बादाम की गिरियाँ छीलकर खिलाते थे। जो मास्टर बच्चों की खाल तक उधेड़ देते थे, वही तोतों से इतनी मीठी बातें करते – यही उनके भीतर छिपे कोमल और जीव-प्रेमी हृदय का परिचय देता है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

6. ‘सपनों के-से दिन’ पाठ का यह शीर्षक कहाँ तक सार्थक है? सिद्ध कीजिए।

उत्तरपाठ का शीर्षक ‘सपनों के-से दिन’ पूर्णतः सार्थक है। बचपन के दिन सपनों के समान मधुर, निश्छल और सुंदर होते हैं, जो बीत जाने पर बहुत प्यारे लगते हैं।लेखक की स्कूली ज़िंदगी में खेल-कूद, ननिहाल की मस्ती, छुट्टियों का आनंद, स्काउटिंग की परेड और ‘शाबाश’ की खुशी जैसी अनेक मधुर यादें हैं।यद्यपि इन दिनों में पिटाई और डर भी था, फिर भी आज पीछे मुड़कर देखने पर वे सारे दुख-सुख मिलकर एक सुहावने सपने जैसे प्रतीत होते हैं।सपने की तरह ही वे दिन बीत गए और अब केवल स्मृति-रूप में शेष हैं। इस प्रकार बचपन की मासूम, खट्टी-मीठी यादों को व्यक्त करने वाला यह शीर्षक पूरी तरह उपयुक्त एवं सार्थक है।

7. इस पाठ के आधार पर तत्कालीन शिक्षा-व्यवस्था और आज की शिक्षा-व्यवस्था की तुलना कीजिए।

उत्तरतत्कालीन शिक्षा-व्यवस्था: उस समय शिक्षा को कम महत्त्व दिया जाता था; अधिकतर अभिभावक बच्चों को स्कूल भेजने के बजाय कामकाज सिखाना उचित समझते थे। अनुशासन के लिए मार-पीट और कठोर दंड का प्रयोग होता था, जिससे बच्चे स्कूल से डरते थे।आज की शिक्षा-व्यवस्था: आज शिक्षा को मौलिक अधिकार माना गया है और सर्वशिक्षा पर बल है। शारीरिक दंड कानूनन वर्जित है; अनुशासन प्रेम, प्रोत्साहन और रचनात्मक गतिविधियों से सिखाया जाता है।निष्कर्ष: आज की बाल-केंद्रित, भयमुक्त शिक्षा-व्यवस्था पहले की दंड-आधारित व्यवस्था से कहीं अधिक उत्तम है, क्योंकि स्नेहपूर्ण वातावरण में बच्चे स्वाभाविक रूप से सीखते और आत्मविश्वासी बनते हैं।

8. खेल बच्चों के सर्वांगीण विकास के लिए क्यों आवश्यक हैं? पाठ के संदर्भ में अपने विचार लिखिए।

उत्तरखेल बच्चों के शारीरिक, मानसिक एवं सामाजिक विकास के लिए अनिवार्य हैं। पाठ में बच्चे चोट खाकर भी खेलने आते थे, क्योंकि खेल उन्हें असीम आनंद देता था।शारीरिक विकास: खेल से शरीर स्वस्थ, बलवान और फुर्तीला बनता है। पाठ की स्काउटिंग-परेड बच्चों को अनुशासित और चुस्त बनाती थी।मानसिक विकास: खेल से मन प्रसन्न रहता है, तनाव दूर होता है और एकाग्रता बढ़ती है।सामाजिक एवं नैतिक विकास: खेल से सहयोग, टीम-भावना, अनुशासन, नेतृत्व और हार-जीत को समान भाव से स्वीकार करने की भावना विकसित होती है। इसीलिए खेल केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि बच्चों के सर्वांगीण विकास का सशक्त साधन हैं।

अभ्यास MCQ

1. ‘सपनों के-से दिन’ पाठ के लेखक कौन हैं?

(क) प्रेमचंद

(ख) गुलज़ार

(ग) हरिवंश राय बच्चन

(घ) यशपाल

उत्तर(ख) गुलज़ार।

2. गुलज़ार का मूल (असली) नाम क्या है?

(क) धनपत राय

(ख) सम्पूरन सिंह कालरा

(ग) प्रीतमचंद

(घ) घनश्याम दास

उत्तर(ख) सम्पूरन सिंह कालरा।

3. लेखक के अधिकांश साथी मुख्यतः किन प्रदेशों से आकर मंडी में बसे परिवारों के थे?

(क) बंगाल और बिहार

(ख) राजस्थान और हरियाणा

(ग) गुजरात और महाराष्ट्र

(घ) केरल और तमिलनाडु

उत्तर(ख) राजस्थान और हरियाणा।

4. पीटी मास्टर का नाम क्या था?

(क) मदनमोहन शर्मा

(ख) नौहरिया राम

(ग) प्रीतमचंद

(घ) घनश्याम दास

उत्तर(ग) प्रीतमचंद।

5. हेडमास्टर का नाम क्या था?

(क) शर्मा जी (मदनमोहन शर्मा)

(ख) प्रीतमचंद

(ग) हरजीलाल

(घ) भाई भीखे

उत्तर(क) शर्मा जी (मदनमोहन शर्मा)।

6. पीटी साहब ने चौथी कक्षा के बच्चों को किस विषय का शब्द-रूप याद न होने पर कठोर दंड दिया?

(क) अंग्रेज़ी

(ख) उर्दू

(ग) फ़ारसी

(घ) हिसाब

उत्तर(ग) फ़ारसी।

7. हेडमास्टर शर्मा जी ने पीटी साहब को क्या दंड दिया?

(क) चेतावनी

(ख) मुअत्तल (निलंबित) कर दिया

(ग) स्थानांतरण

(घ) जुर्माना

उत्तर(ख) मुअत्तल (निलंबित) कर दिया।

8. निलंबन के बाद पीटी साहब अपने चौबारे में किसके साथ प्रेम से बातें करते थे?

(क) कुत्तों के

(ख) दो तोतों के

(ग) बच्चों के

(घ) बकरियों के

उत्तर(ख) दो तोतों के।

9. स्काउटिंग की परेड कराते समय पीटी साहब सही करने पर बच्चों से क्या कहते थे?

(क) ठीक है

(ख) शाबाश

(ग) बहुत बुरा

(घ) चुप रहो

उत्तर(ख) शाबाश।

10. यह पाठ मुख्यतः किस विधा की रचना है?

(क) कहानी

(ख) कविता

(ग) आत्मकथात्मक संस्मरण/रेखाचित्र

(घ) एकांकी

उत्तर(ग) आत्मकथात्मक संस्मरण/रेखाचित्र।
उत्तर-कुंजी: 1-(ख), 2-(ख), 3-(ख), 4-(ग), 5-(क), 6-(ग), 7-(ख), 8-(ख), 9-(ख), 10-(ग)।

अभिकथन-कारण

नीचे अभिकथन (A) और कारण (R) दिए गए हैं। सही विकल्प चुनिए—
(क) A और R दोनों सही, R, A की सही व्याख्या है। (ख) A और R दोनों सही, पर R, A की सही व्याख्या नहीं। (ग) A सही, R गलत। (घ) A गलत, R सही।

1. अभिकथन (A): अलग-अलग बोली होने पर भी खेलते समय बच्चे एक-दूसरे की बात भली-भाँति समझ लेते थे।

कारण (R): आपसी प्रेम-व्यवहार में भाषा का अंतर बाधा नहीं बनता।

उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है।

2. अभिकथन (A): हेडमास्टर शर्मा जी ने पीटी साहब को मुअत्तल कर दिया।

कारण (R): पीटी साहब ने बच्चों को मुर्गा बनाकर बर्बरतापूर्वक दंड दिया था।

उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है।

3. अभिकथन (A): नई कापियों और पुरानी किताबों की गंध से लेखक का मन उदास हो जाता था।

कारण (R): यह गंध आगे की कठिन पढ़ाई और नए मास्टरों की मार-पीट के भय से जुड़ी हुई थी।

उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है।

4. अभिकथन (A): पीटी साहब का हृदय पूरी तरह कठोर और निर्दय था।

कारण (R): वे अपने तोतों से दिन में कई बार प्रेम से बातें करते और उन्हें बादाम खिलाते थे।

उत्तर(घ) A गलत है, R सही है – तोतों से प्रेम से पेश आना ही सिद्ध करता है कि उनका हृदय पूरी तरह कठोर नहीं, भीतर से कोमल भी था।

5. अभिकथन (A): अधिकांश अभिभावक बच्चों को स्कूल भेजना ज़रूरी नहीं समझते थे।

कारण (R): वे चाहते थे कि बच्चे लंडे और मुनीमी सीखकर दुकान का काम सँभालें।

उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है।
उत्तर-कुंजी: 1-(क), 2-(क), 3-(क), 4-(घ), 5-(क)।

परीक्षा-युक्तियाँ & सामान्य गलतियाँ

परीक्षा-युक्तियाँ

  • लेखक का सही नाम गुलज़ार (मूल नाम सम्पूरन सिंह कालरा) तथा पाठ की विधा संस्मरण/रेखाचित्र याद रखें।
  • पात्रों के नाम याद रखें – पीटी मास्टर प्रीतमचंद (कठोर) और हेडमास्टर शर्मा जी (कोमल)।
  • ‘शाबाश का फ़ौजी तमगों-सा लगना’ और ‘पीटी साहब का तोतों से प्रेम’ जैसे प्रसंग प्रायः पूछे जाते हैं – इन्हें उदाहरण सहित लिखें।
  • दीर्घ उत्तर बिंदुवार लिखें और अंक के अनुसार उत्तर की लंबाई रखें।

सामान्य गलतियाँ

  • लेखक का नाम प्रेमचंद लिख देना – यह पाठ गुलज़ार का है, प्रेमचंद का नहीं।
  • पीटी मास्टर और हेडमास्टर के स्वभाव को आपस में उलट देना।
  • दंड किस विषय (फ़ारसी) के कारण मिला, इसे भूल जाना या उर्दू/अंग्रेज़ी लिख देना।
  • पाठ को कहानी मान लेना – यह आत्मकथात्मक संस्मरण है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

‘सपनों के-से दिन’ पाठ के लेखक कौन हैं?

इस पाठ के लेखक गुलज़ार हैं, जिनका मूल नाम सम्पूरन सिंह कालरा है। यह उनके बचपन और स्कूली जीवन का आत्मकथात्मक संस्मरण है।

हेडमास्टर शर्मा जी ने पीटी साहब को मुअत्तल क्यों किया?

पीटी मास्टर प्रीतमचंद ने चौथी कक्षा के बच्चों को फ़ारसी का शब्द-रूप याद न होने पर मुर्गा बनाकर बर्बरतापूर्वक दंड दिया था। यह क्रूरता देखकर हेडमास्टर शर्मा जी ने उन्हें निलंबित कर दिया।

पीटी साहब की ‘शाबाश’ बच्चों को फ़ौजी तमगों-सी क्यों लगती थी?

पीटी साहब बहुत कठोर थे और शायद ही कभी प्रशंसा करते थे। इसलिए उनकी विरल ‘शाबाश’ बच्चों को किसी फ़ौज के सारे तमगे जीतने जैसी असाधारण उपलब्धि-सी लगती थी।

प्रश्न NCERT संचयन (भाग 2) पुस्तक के बोध-प्रश्नों से ज्यों-के-त्यों लिए गए हैं; उत्तर ClearStudy द्वारा मौलिक रूप से तैयार एवं जाँचे गए हैं।

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