NCERT Solutions for Class 10 Hindi (Sparsh 2) अध्याय 7: आत्मत्राण

यह पृष्ठ कक्षा 10 हिंदी की पुस्तक स्पर्श (भाग 2) के अध्याय 7 ‘आत्मत्राण’ (कवि – रवीन्द्रनाथ ठाकुर; हिंदी अनुवाद – आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी) का पूरा समाधान देता है – कविता का सार, भावार्थ, शब्दार्थ तथा सभी प्रश्न-अभ्यास के उत्तर।

कक्षा: 10 विषय: हिंदी पुस्तक: स्पर्श (भाग 2) अध्याय: 7 – आत्मत्राण कवि: रवीन्द्रनाथ ठाकुर अनुवाद: आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी विधा: कविता (प्रार्थना-गीत) सत्र: 2026–27

कवि परिचय – रवीन्द्रनाथ ठाकुर

रवीन्द्रनाथ ठाकुर (टैगोर) का जन्म 6 मई 1861 को बंगाल के एक संपन्न परिवार में हुआ था। वे नोबेल पुरस्कार पाने वाले पहले भारतीय हैं। उनकी आरंभिक शिक्षा-दीक्षा घर पर ही हुई और छोटी आयु में ही स्वाध्याय से उन्होंने अनेक विषयों का ज्ञान प्राप्त कर लिया। उनकी रचनाओं में लोक-संस्कृति का स्वर प्रमुखता से मुखरित होता है और प्रकृति से उन्हें गहरा लगाव था। उन्होंने लगभग एक हज़ार कविताएँ और दो हज़ार गीत लिखे; उनके गीतों की अलग धारा ‘रवीन्द्र संगीत’ कहलाती है। उन्होंने ‘शांति निकेतन’ नामक शिक्षण-संस्था की स्थापना की। ‘गीतांजलि’ पर उन्हें नोबेल पुरस्कार मिला; नैवेद्य, पूरबी, बलाका, क्षणिका, चित्र, सांध्यगीत, काबुलीवाला तथा गोरा व घरे-बाइरे उनकी प्रमुख कृतियाँ हैं। प्रस्तुत कविता का बांग्ला से हिंदी अनुवाद आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने किया है।

कविता का सार

‘आत्मत्राण’ रवीन्द्रनाथ ठाकुर की एक भावपूर्ण प्रार्थना-कविता है, जो परंपरागत प्रार्थना-गीतों से भिन्न है। साधारणतः मनुष्य ईश्वर से यह प्रार्थना करता है कि वह उसे विपत्तियों, दुखों और संकटों से बचा ले। किंतु इस कविता में कवि ईश्वर से दुखों से मुक्ति नहीं माँगता; वह तो केवल इतना चाहता है कि विपत्ति आने पर उसके मन में भय न हो और वह उन विपत्तियों का साहसपूर्वक सामना कर सके।

कवि कहता है कि वह दुख-ताप से व्यथित अपने मन के लिए सांत्वना नहीं चाहता; वह तो यह सामर्थ्य माँगता है कि वह दुख पर सदा विजय पा सके। यदि कोई सहायक न मिले, तब भी उसका अपना बल और पौरुष न डगमगाए। संसार में यदि उसे हानि उठानी पड़े या वंचना (छल) मिले, तो भी उसका मन क्षय (निराशा/टूटन) को स्वीकार न करे।

वह ईश्वर से प्रतिदिन अपनी रक्षा करने की भी प्रार्थना नहीं करता; वह तो केवल इतनी शक्ति चाहता है कि वह स्वयं इस संसार-सागर को तैरकर पार कर सके। वह यह भी नहीं चाहता कि ईश्वर उसका भार हल्का करके उसे सांत्वना दे; वह तो निर्भय होकर अपना भार स्वयं वहन करने की क्षमता माँगता है।

सुख के दिनों में कवि नतमस्तक होकर ईश्वर के मुख (उपस्थिति) को क्षण-क्षण पहचानता रहना चाहता है, अर्थात् सुख में भी वह प्रभु को न भूले। और दुख की रात में, जिस दिन सारा संसार उसे धोखा दे जाए, उस दिन भी उसके मन में ईश्वर के प्रति तनिक भी संशय न रहे। इस प्रकार यह कविता आत्मविश्वास, आत्मनिर्भरता, निर्भयता और ईश्वर पर अटूट श्रद्धा का संदेश देती है – ‘आत्मत्राण’ अर्थात् अपने बल से स्वयं की रक्षा।

मूलभाव / भावार्थ

1. “विपदाओं से मुझे बचाओ, यह मेरी प्रार्थना नहीं…” – कवि ईश्वर से विपत्तियों से बचाने की याचना नहीं करता; वह तो केवल यह चाहता है कि विपत्ति में कभी भय न पाए, अर्थात् संकट का निडर होकर सामना करने की शक्ति माँगता है।

2. “दुख-ताप से व्यथित चित्त को न दो सांत्वना… दुख को मैं कर सकूँ सदा जय।” – कवि दुख से घबराए मन के लिए तसल्ली नहीं, बल्कि दुख पर सदा विजय पाने की सामर्थ्य चाहता है।

3. “कोई कहीं सहायक न मिले… तो भी मन में ना मानूँ क्षय।” – सहायक न मिलने पर भी उसका आत्मबल और पौरुष न डिगे; हानि या छल मिलने पर भी मन निराशा (क्षय) को स्वीकार न करे।

4. “मेरा त्राण करो अनुदिन तुम… तरने की हो शक्ति अनामय।” – कवि प्रतिदिन रक्षा की प्रार्थना नहीं करता; वह स्वयं भवसागर तैरकर पार करने की निरोग, सशक्त सामर्थ्य माँगता है।

5. “नत शिर होकर सुख के दिन में… दुख-रात्रि में… तुम पर करूँ नहीं कुछ संशय।” – सुख के समय कवि विनम्र होकर ईश्वर को क्षण-क्षण पहचानता रहे और दुख के समय, संसार के धोखा दे जाने पर भी ईश्वर पर तनिक संशय न करे।

शब्दार्थ

शब्दअर्थ
आत्मत्राणस्वयं अपनी रक्षा करना, आत्मबल से अपना बचाव
विपदाविपत्ति, मुसीबत
करुणामयदूसरों पर दया करने वाला (ईश्वर)
दुख-तापकष्ट की पीड़ा
व्यथितदुखी, पीड़ित
चित्तमन, हृदय
सांत्वनाढाढ़स बँधाना, तसल्ली देना
सहायकमददगार
बलशक्ति, ताकत
पौरुषपराक्रम, मर्दानगी
हानिनुकसान, क्षति
वंचनाधोखा देना, छलना
क्षयनाश, टूटन, निराशा
त्राणभय-निवारण, बचाव, रक्षा, आश्रय
अनुदिनप्रतिदिन, हर दिन
अनामयरोग-रहित, स्वस्थ, निर्विकार
अनुनयविनय, विनती
वहन करनाभार उठाना, ढोना
निर्भयभयरहित, निडर
नत शिरसिर झुकाकर, विनम्र होकर
दुख-रात्रिदुख से भरी रात, संकट का समय
निखिलसंपूर्ण, समस्त संसार
संशयसंदेह, शक

प्रश्न-अभ्यास के उत्तर

नीचे NCERT पुस्तक ‘स्पर्श (भाग 2)’ के प्रश्न-अभ्यास के सभी प्रश्न ज्यों-के-त्यों दिए गए हैं; उत्तर परीक्षा-उपयोगी शैली में मौलिक रूप से तैयार किए गए हैं।

(क) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए–

1. कवि किससे और क्या प्रार्थना कर रहा है?

उत्तरकवि करुणामय ईश्वर से प्रार्थना कर रहा है। वह दुखों और विपत्तियों से बचने की प्रार्थना नहीं करता।वह तो केवल यह सामर्थ्य माँगता है कि विपत्ति आने पर उसके मन में भय न हो, वह दुख पर सदा विजय पा सके और स्वयं अपने बल से संकटों का सामना करते हुए भवसागर पार कर सके।साथ ही वह यह भी चाहता है कि सुख-दुख दोनों में उसकी ईश्वर पर श्रद्धा बनी रहे और कभी संशय न उत्पन्न हो।

2. ‘विपदाओं से मुझे बचाओ, यह मेरी प्रार्थना नहीं’–कवि इस पंक्ति के द्वारा क्या कहना चाहता है?

उत्तरइस पंक्ति के द्वारा कवि कहना चाहता है कि वह ईश्वर से विपत्तियों को टालने या उनसे बचाने की याचना नहीं करता।वह विपत्तियों से भागना नहीं चाहता, बल्कि उनका डटकर सामना करना चाहता है। उसे केवल इतना चाहिए कि विपत्ति में उसका मन भयभीत न हो।इस प्रकार कवि कायरतापूर्वक संकटों से पलायन के बजाय निडरता और आत्मविश्वास से उन्हें झेलने की शक्ति चाहता है।

3. कवि सहायक के न मिलने पर क्या प्रार्थना करता है?

उत्तरकवि प्रार्थना करता है कि यदि कहीं, कभी उसे कोई सहायक न मिले, तो भी उसका अपना बल और पौरुष न डगमगाए।अर्थात् सहायता न मिलने पर भी वह निराश या कमज़ोर न पड़े, बल्कि अपने आत्मबल और साहस से ही संकट का सामना करता रहे।

4. अंत में कवि क्या अनुनय करता है?

उत्तरअंत में कवि विनम्र अनुनय (विनती) करता है कि सुख के दिनों में वह नतमस्तक होकर ईश्वर को क्षण-क्षण पहचानता रहे, अर्थात् सुख में भी प्रभु को न भूले।और दुख की रात में, जिस दिन सारा संसार उसे धोखा दे दे, उस दिन भी उसके मन में ईश्वर के प्रति तनिक भी संशय न रहे – उसकी श्रद्धा अटल बनी रहे।

5. ‘आत्मत्राण’ शीर्षक की सार्थकता कविता के संदर्भ में स्पष्ट कीजिए।

उत्तर‘आत्मत्राण’ का अर्थ है – अपने बल से स्वयं की रक्षा करना। यह शीर्षक कविता के मूल भाव के पूर्णतः अनुकूल है।कविता में कवि ईश्वर से अपनी रक्षा या विपत्तियों से बचाव की याचना नहीं करता; वह तो स्वयं संकटों से जूझने, दुख पर विजय पाने और भवसागर अपने बल से तैरकर पार करने की शक्ति माँगता है।चूँकि सारी कविता आत्मबल, आत्मनिर्भरता और स्वयं अपनी रक्षा करने की भावना पर केंद्रित है, इसलिए ‘आत्मत्राण’ शीर्षक पूरी तरह सार्थक एवं उपयुक्त है।

6. अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए आप प्रार्थना के अतिरिक्त और क्या-क्या प्रयास करते हैं? लिखिए।

उत्तरकेवल प्रार्थना से इच्छाएँ पूरी नहीं होतीं; उनके लिए परिश्रम और प्रयास आवश्यक हैं। मैं निम्नलिखित प्रयास करता हूँ–(क) अपने लक्ष्य को स्पष्ट निर्धारित करता हूँ और उसके अनुसार योजना बनाता हूँ।(ख) नियमित परिश्रम, अभ्यास और आत्मानुशासन का पालन करता हूँ।(ग) कठिनाई आने पर निराश हुए बिना धैर्य और दृढ़ संकल्प से कार्य करता रहता हूँ।(घ) आवश्यकता पड़ने पर बड़ों, शिक्षकों एवं मित्रों से मार्गदर्शन लेता हूँ। (विद्यार्थी अपने अनुभव भी जोड़ सकते हैं।)

7. क्या कवि की यह प्रार्थना आपको अन्य प्रार्थना गीतों से अलग लगती है? यदि हाँ, तो कैसे?

उत्तरहाँ, यह प्रार्थना अन्य प्रार्थना-गीतों से बिल्कुल अलग है।सामान्य प्रार्थना-गीतों में मनुष्य ईश्वर से सुख, धन, सफलता तथा दुख-विपत्तियों से रक्षा की याचना करता है।किंतु इस कविता में कवि दुखों से मुक्ति या रक्षा नहीं माँगता; वह तो दुख और विपत्ति का स्वयं निडर होकर सामना करने की शक्ति, आत्मबल और दृढ़ता माँगता है।इस आत्मनिर्भरता और निर्भयता की भावना के कारण ही यह प्रार्थना औरों से भिन्न और विशिष्ट बन जाती है।

(ख) निम्नलिखित अंशों का भाव स्पष्ट कीजिए–

1. नत शिर होकर सुख के दिन में
तव मुख पहचानूँ छिन-छिन में।

भावकवि कहता है कि सुख के दिनों में भी वह घमंड न करे, बल्कि नतमस्तक (विनम्र) होकर रहे।सुख के प्रत्येक क्षण में वह ईश्वर के मुख अर्थात् उसकी कृपा एवं उपस्थिति को पहचानता रहे और कभी उसे न भूले।तात्पर्य यह है कि सुख-समृद्धि के समय भी मनुष्य को अहंकार से दूर रहकर ईश्वर का स्मरण करते रहना चाहिए।

2. हानि उठानी पड़े जगत् में लाभ अगर वंचना रही
तो भी मन में ना मानूँ क्षय।

भावकवि कहता है कि संसार में यदि उसे लाभ के स्थान पर हानि उठानी पड़े और सर्वत्र वंचना (धोखा-छल) ही मिले,तो भी वह अपने मन में क्षय अर्थात् निराशा, टूटन या पराजय को स्वीकार न करे।तात्पर्य यह है कि विपरीत परिस्थितियों और निरंतर असफलताओं में भी कवि का मनोबल और आत्मविश्वास कभी न टूटे।

3. तरने की हो शक्ति अनामय
मेरा भार अगर लघु करके न दो सांत्वना नहीं सही।

भावकवि ईश्वर से प्रार्थना करता है कि उसमें इस संसार-सागर को तैरकर पार करने की निरोग एवं सशक्त (अनामय) शक्ति हो।यदि ईश्वर उसका भार (कष्टों का बोझ) हल्का करके उसे सांत्वना न भी दे, तो भी कोई आपत्ति नहीं।तात्पर्य यह है कि कवि अपने जीवन-संघर्ष का बोझ स्वयं निर्भय होकर उठाना चाहता है; वह सहारे या रियायत के बजाय आत्मबल और सामर्थ्य चाहता है।

अतिरिक्त प्रश्न

लघु उत्तरीय प्रश्न (30–40 शब्द)

1. कविता ‘आत्मत्राण’ का मूल भाव संक्षेप में लिखिए।

उत्तरकविता का मूल भाव है – मनुष्य ईश्वर से दुखों से रक्षा नहीं, बल्कि दुखों और विपत्तियों का निडर होकर सामना करने की शक्ति, आत्मबल तथा आत्मनिर्भरता माँगे, और सुख-दुख दोनों में उसकी ईश्वर पर श्रद्धा अटल बनी रहे।

2. कवि करुणामय ईश्वर से सांत्वना के बदले क्या माँगता है?

उत्तरकवि दुख से व्यथित मन के लिए सांत्वना (तसल्ली) नहीं माँगता; वह तो यह सामर्थ्य माँगता है कि वह दुख पर सदा विजय पा सके। वह सहारे के बजाय स्वयं संघर्ष करने की शक्ति चाहता है।

3. इस कविता का अनुवाद किसने और किस भाषा से किया है?

उत्तरयह कविता मूलतः रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने बांग्ला भाषा में रची थी। इसका हिंदी में अनुवाद आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने किया है, जिन्होंने मूल रचना की ‘आत्मा’ को अक्षुण्ण बनाए रखा है।

4. कवि दुख की रात में ईश्वर से क्या अपेक्षा रखता है?

उत्तरकवि चाहता है कि दुख की रात में, जिस दिन सारा संसार उसे धोखा दे जाए, उस दिन भी उसके मन में ईश्वर के प्रति तनिक भी संशय न रहे। उसकी श्रद्धा हर परिस्थिति में अडिग बनी रहे।

5. ‘तरने की हो शक्ति अनामय’ पंक्ति में कवि की कौन-सी भावना व्यक्त हुई है?

उत्तरइस पंक्ति में आत्मनिर्भरता की भावना व्यक्त हुई है। कवि चाहता है कि उसमें संसार-सागर को स्वयं तैरकर पार करने की निरोग एवं सशक्त शक्ति हो; वह दूसरों के सहारे के बजाय अपने बल पर भरोसा करता है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (100–120 शब्द)

6. ‘आत्मत्राण’ कविता किस प्रकार आत्मविश्वास और आत्मनिर्भरता का संदेश देती है? स्पष्ट कीजिए।

उत्तर‘आत्मत्राण’ आत्मविश्वास और आत्मनिर्भरता की प्रेरक कविता है। कवि ईश्वर से विपत्तियों से रक्षा या सांत्वना नहीं माँगता, बल्कि उनका निडर होकर सामना करने की शक्ति माँगता है।वह कहता है कि सहायक न मिलने पर भी उसका बल-पौरुष न डगमगाए, हानि और वंचना मिलने पर भी मन निराशा को स्वीकार न करे और वह स्वयं भवसागर तैरकर पार करे।वह ईश्वर से भार हल्का करने की भी याचना नहीं करता, अपितु निर्भय होकर अपना भार स्वयं वहन करना चाहता है।इस प्रकार कविता संदेश देती है कि मनुष्य को कायरतापूर्वक संकटों से भागने के बजाय अपने आत्मबल और परिश्रम से उनका सामना करना चाहिए।

7. यह कविता परंपरागत प्रार्थना-गीतों से किस प्रकार भिन्न है? तर्क सहित लिखिए।

उत्तरपरंपरागत प्रार्थना-गीतों में भक्त ईश्वर से सुख, धन, सफलता तथा दुख-विपत्तियों से रक्षा की याचना करता है; वह अपने कष्ट दूर करने के लिए ईश्वर पर निर्भर रहता है।किंतु ‘आत्मत्राण’ में कवि दुखों से मुक्ति या रक्षा नहीं माँगता। वह तो दुख और विपत्ति को स्वयं झेलने तथा उन पर विजय पाने की शक्ति माँगता है।वह सहारे, सांत्वना या भार-मुक्ति के बजाय आत्मबल, निर्भयता और आत्मनिर्भरता चाहता है, साथ ही सुख-दुख दोनों में ईश्वर पर अटूट श्रद्धा।इसी आत्मनिर्भर, साहसी एवं निडर दृष्टिकोण के कारण यह कविता अन्य प्रार्थना-गीतों से पूर्णतः भिन्न और विशिष्ट बन जाती है।

8. ‘आत्मत्राण’ कविता आज के विद्यार्थी-जीवन में किस प्रकार प्रेरणादायक है?

उत्तरआज का विद्यार्थी-जीवन प्रतिस्पर्धा, परीक्षा-दबाव और असफलता के भय से भरा है। ऐसे में ‘आत्मत्राण’ अत्यंत प्रेरणादायक है।यह कविता सिखाती है कि कठिनाइयों से भागने या केवल भाग्य पर निर्भर रहने के बजाय उनका साहसपूर्वक सामना करना चाहिए।असफलता या सहायता न मिलने पर भी विद्यार्थी को निराश हुए बिना अपने परिश्रम और आत्मबल पर भरोसा रखना चाहिए।साथ ही, सफलता मिलने पर अहंकार न करना और कठिनाई में धैर्य व आस्था बनाए रखना – ये जीवन-मूल्य प्रत्येक विद्यार्थी को आत्मविश्वासी एवं दृढ़ बनाते हैं।

अभ्यास MCQ

1. ‘आत्मत्राण’ कविता के मूल रचयिता कौन हैं?

(क) हजारीप्रसाद द्विवेदी

(ख) रवीन्द्रनाथ ठाकुर

(ग) महादेवी वर्मा

(घ) सूर्यकांत त्रिपाठी निराला

उत्तर(ख) रवीन्द्रनाथ ठाकुर।

2. इस कविता का हिंदी अनुवाद किसने किया है?

(क) आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी

(ख) महावीर प्रसाद द्विवेदी

(ग) रामधारी सिंह दिनकर

(घ) सुमित्रानंदन पंत

उत्तर(क) आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी।

3. ‘आत्मत्राण’ का अर्थ है–

(क) आत्मा का त्याग

(ख) अपने बल से स्वयं की रक्षा

(ग) दूसरों से सहायता माँगना

(घ) ईश्वर की पूजा

उत्तर(ख) अपने बल से स्वयं की रक्षा।

4. कवि ईश्वर से विपत्ति में क्या नहीं चाहता?

(क) भय का अनुभव न हो

(ख) विपत्तियों से बचा लिया जाए

(ग) दुख पर विजय की शक्ति

(घ) आत्मबल बना रहे

उत्तर(ख) विपत्तियों से बचा लिया जाए – कवि रक्षा नहीं, सामना करने की शक्ति माँगता है।

5. ‘अनामय’ शब्द का अर्थ है–

(क) रोगी

(ख) रोग-रहित / स्वस्थ

(ग) दुखी

(घ) निर्धन

उत्तर(ख) रोग-रहित / स्वस्थ।

6. कवि दुख से व्यथित मन के लिए क्या नहीं चाहता?

(क) विजय

(ख) सांत्वना

(ग) शक्ति

(घ) आत्मबल

उत्तर(ख) सांत्वना।

7. ‘वंचना’ शब्द का अर्थ है–

(क) सहायता

(ख) धोखा / छल

(ग) विजय

(घ) प्रशंसा

उत्तर(ख) धोखा / छल।

8. सुख के दिनों में कवि किस प्रकार रहना चाहता है?

(क) अहंकार से

(ख) नतमस्तक (विनम्र) होकर

(ग) उदासीन होकर

(घ) ईश्वर को भूलकर

उत्तर(ख) नतमस्तक (विनम्र) होकर।

9. रवीन्द्रनाथ ठाकुर को किस कृति के लिए नोबेल पुरस्कार मिला?

(क) गोरा

(ख) गीतांजलि

(ग) बलाका

(घ) काबुलीवाला

उत्तर(ख) गीतांजलि।

10. यह कविता अन्य प्रार्थना-गीतों से किस कारण भिन्न है?

(क) इसमें ईश्वर की निंदा है

(ख) इसमें केवल सुख की कामना है

(ग) इसमें रक्षा नहीं, संघर्ष की शक्ति माँगी गई है

(घ) इसमें कोई प्रार्थना नहीं है

उत्तर(ग) इसमें रक्षा नहीं, संघर्ष की शक्ति माँगी गई है।
उत्तर-कुंजी: 1-(ख), 2-(क), 3-(ख), 4-(ख), 5-(ख), 6-(ख), 7-(ख), 8-(ख), 9-(ख), 10-(ग)।

अभिकथन-कारण

नीचे अभिकथन (A) और कारण (R) दिए गए हैं। सही विकल्प चुनिए—
(क) A और R दोनों सही, R, A की सही व्याख्या है। (ख) A और R दोनों सही, पर R, A की सही व्याख्या नहीं। (ग) A सही, R गलत। (घ) A गलत, R सही।

1. अभिकथन (A): कवि ईश्वर से विपत्तियों से बचने की प्रार्थना नहीं करता।

कारण (R): वह विपत्तियों का निडर होकर स्वयं सामना करने की शक्ति माँगता है।

उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है।

2. अभिकथन (A): ‘आत्मत्राण’ शीर्षक कविता के भाव के अनुकूल है।

कारण (R): पूरी कविता आत्मबल और स्वयं की रक्षा की भावना पर केंद्रित है।

उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है।

3. अभिकथन (A): कवि सुख के दिनों में अहंकार करना चाहता है।

कारण (R): वह सुख में नतमस्तक होकर ईश्वर को क्षण-क्षण पहचानना चाहता है।

उत्तर(घ) A गलत है, R सही है – कवि अहंकार नहीं, विनम्रता चाहता है।

4. अभिकथन (A): इस कविता का मूल बांग्ला से हिंदी अनुवाद हजारीप्रसाद द्विवेदी ने किया।

कारण (R): रवीन्द्रनाथ ठाकुर हिंदी में नहीं लिखते थे।

उत्तर(ख) A और R दोनों सही हैं, पर R, A की सही व्याख्या नहीं है (अनुवाद का कारण भाषा-सेतु बनाना है, यह तथ्य कि वे हिंदी में नहीं लिखते थे, व्याख्या नहीं)।

5. अभिकथन (A): कवि चाहता है कि दुख की रात में भी ईश्वर पर उसका संशय न हो।

कारण (R): कवि की ईश्वर पर श्रद्धा सुख-दुख दोनों में अटल बनी रहती है।

उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है।
उत्तर-कुंजी: 1-(क), 2-(क), 3-(घ), 4-(ख), 5-(क)।

परीक्षा-युक्तियाँ एवं सामान्य गलतियाँ

परीक्षा-युक्तियाँ

  • याद रखें – कवि रक्षा नहीं, बल्कि विपत्तियों का सामना करने की शक्ति माँगता है। यही कविता का केंद्रीय भाव है।
  • भाव-स्पष्टीकरण वाले प्रश्नों में पहले पंक्ति का सरल अर्थ, फिर उसका निहित भाव लिखें।
  • कठिन शब्दों (त्राण, अनामय, वंचना, क्षय, अनुनय) के अर्थ अवश्य याद रखें – इन पर एक-अंकीय प्रश्न आते हैं।
  • ‘यह कविता अन्य प्रार्थना-गीतों से भिन्न क्यों है’ – यह प्रायः पूछा जाने वाला प्रश्न है; तुलना सहित उत्तर लिखें।

सामान्य गलतियाँ

  • यह न लिखें कि कवि ईश्वर से दुखों से रक्षा माँगता है – वह तो ठीक इसके विपरीत माँगता है।
  • कवि और अनुवादक को न मिलाएँ – मूल कवि रवीन्द्रनाथ ठाकुर, अनुवादक हजारीप्रसाद द्विवेदी हैं।
  • ‘क्षय’ का अर्थ केवल ‘रोग/टीबी’ न लिखें; यहाँ इसका अर्थ नाश, निराशा, टूटन है।
  • शब्दार्थ में देवनागरी की मात्राओं की त्रुटि न करें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

‘आत्मत्राण’ कविता के कवि और अनुवादक कौन हैं?

इस कविता के मूल कवि रवीन्द्रनाथ ठाकुर हैं और इसका बांग्ला से हिंदी अनुवाद आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने किया है।

‘आत्मत्राण’ शब्द का अर्थ क्या है?

‘आत्मत्राण’ का अर्थ है – अपने बल से स्वयं की रक्षा करना, अर्थात् दूसरों के सहारे के बिना आत्मबल से अपना बचाव।

यह कविता अन्य प्रार्थना-गीतों से कैसे भिन्न है?

सामान्य प्रार्थना-गीतों में दुखों से रक्षा माँगी जाती है, जबकि इस कविता में कवि दुखों से बचाव नहीं, बल्कि उनका निडर होकर सामना करने की शक्ति और आत्मनिर्भरता माँगता है।

प्रश्न NCERT स्पर्श (भाग 2) पुस्तक से ज्यों-के-त्यों लिए गए हैं; उत्तर ClearStudy द्वारा मौलिक रूप से तैयार एवं जाँचे गए हैं।

Scroll to Top