NCERT Solutions for Class 10 Hindi (Sparsh 2) अध्याय 1: साखी (कबीर) – प्रश्न-अभ्यास, सार एवं भावार्थ (NCERT 2026–27)

यह पृष्ठ कक्षा 10 हिंदी की पुस्तक स्पर्श (भाग 2) के अध्याय 1 ‘साखी’ (कवि – कबीर) का पूरा समाधान देता है – पाठ की सभी साखियों का भावार्थ, सार, कठिन शब्दार्थ, सम्पूर्ण प्रश्न-अभ्यास के उत्तर तथा अतिरिक्त अभ्यास के साथ।

कक्षा: 10 विषय: हिंदी पुस्तक: स्पर्श (भाग 2) अध्याय: 1 – साखी कवि: कबीर विधा: दोहा (साखी) सत्र: 2026–27

कवि परिचय – कबीर

कबीर का जन्म सन् 1398 में काशी (वाराणसी) में हुआ माना जाता है। वे गुरु रामानंद के शिष्य थे और लगभग 120 वर्ष की दीर्घ आयु तक जीवित रहे; जीवन के अंतिम कुछ वर्ष उन्होंने मगहर में बिताए और वहीं चिरनिद्रा में लीन हो गए। कबीर का आविर्भाव ऐसे समय में हुआ जब राजनीतिक, धार्मिक और सामाजिक उथल-पुथल अपने चरम पर थी। वे क्रांतदर्शी कवि थे; उनकी कविता में गहरी सामाजिक चेतना प्रकट होती है और वह सहज ही मर्म को छू लेती है। एक ओर उन्होंने धर्म के बाह्याडंबरों पर तीखी चोट की, तो दूसरी ओर आत्मा-परमात्मा के विरह-मिलन के भावपूर्ण गीत गाए। वे शास्त्रीय ज्ञान की अपेक्षा अनुभव-ज्ञान को अधिक महत्त्व देते थे। उनकी भाषा ‘पचमेल खिचड़ी’ या ‘सधुक्कड़ी’ कहलाती है, जिसमें अवधी, राजस्थानी, भोजपुरी और पंजाबी के शब्दों का प्रभाव है। उन्होंने अपने सबद और साखियों के माध्यम से जनचेतना को जन-जन तक पहुँचाया। सन् 1518 में उनका देहावसान हुआ।

कविता का सार

‘साखी’ शब्द ‘साक्षी’ का तद्भव रूप है, जिसका अर्थ है – प्रत्यक्ष ज्ञान देने वाला साक्ष्य। साखी वस्तुतः दोहा छंद ही है, जो 13 और 11 के विश्राम से कुल 24 मात्राओं का होता है। प्रस्तुत पाठ की साखियों में कबीर ने जीवन और अध्यात्म का सहज, अनुभवपरक तत्त्वज्ञान दिया है।

पहली साखी में कबीर मीठी वाणी बोलने का संदेश देते हैं – अहंकार छोड़कर बोला गया मीठा वचन स्वयं को शीतलता और दूसरों को सुख देता है। दूसरी साखी में वे बताते हैं कि जैसे कस्तूरी मृग की अपनी ही नाभि में बसी होती है पर वह उसे वन में ढूँढ़ता फिरता है, वैसे ही ईश्वर कण-कण में विद्यमान है, पर अज्ञानवश संसार उसे बाहर खोजता रहता है। तीसरी साखी में ज्ञान-दीपक के प्रकाश से अहंकार रूपी अंधकार के मिट जाने और ‘मैं’ के समाप्त होते ही प्रभु की प्राप्ति का भाव है।

चौथी साखी में कबीर कहते हैं कि सांसारिक सुख-भोग में लीन व्यक्ति सुखी प्रतीत होते हैं, पर प्रभु-वियोग में जागने और रोने वाला भक्त ही सच्चे अर्थों में जागरूक है। पाँचवीं साखी विरह की पीड़ा को व्यक्त करती है – विरह रूपी सर्प के डँसने पर कोई मंत्र काम नहीं आता; राम का वियोगी या तो जीवित नहीं रहता और रहता है तो बावला हो जाता है। छठी साखी में निंदक को पास रखने की सीख है, क्योंकि वह बिना साबुन-पानी के ही हमारे स्वभाव को निर्मल कर देता है।

सातवीं साखी में पुस्तकीय ज्ञान की निरर्थकता और प्रेम के एक अक्षर को पढ़ लेने वाले को सच्चा पंडित बताया गया है। आठवीं साखी में कबीर कहते हैं कि उन्होंने ज्ञान की मशाल से अपने मोह-ममता रूपी घर को जला दिया है; अब वे उसी का घर जलाने को तैयार हैं जो उनके साथ इस सच्चे मार्ग पर चले। इस प्रकार साखियाँ सरल भाषा में मीठी वाणी, आत्मज्ञान, निरहंकार, प्रेम-भक्ति और सच्चे ज्ञान का अनमोल संदेश देती हैं।

साखियों का भावार्थ

साखी 1
ऐसी बाँणी बोलिये, मन का आपा खोइ।
अपना तन सीतल करै, औरन कौं सुख होइ॥

भावार्थ: कबीर कहते हैं कि मनुष्य को ऐसी मधुर वाणी बोलनी चाहिए जिसमें अहंकार न हो। अहंकार त्यागकर बोला गया मीठा वचन बोलने वाले के मन-तन को शीतलता (शांति) देता है और सुनने वालों को भी सुख पहुँचाता है। मधुर वचन से वैर-विरोध मिटते हैं और परस्पर सौहार्द बढ़ता है।

साखी 2
कस्तूरी कुंडलि बसै, मृग ढूँढै बन माँहि।
ऐसैं घटि घटि राँम है, दुनियाँ देखै नाँहिं॥

भावार्थ: जैसे कस्तूरी मृग की अपनी ही नाभि में रहती है, फिर भी वह उसकी सुगंध पाकर उसे जंगल में ढूँढ़ता फिरता है; उसी प्रकार ईश्वर प्रत्येक प्राणी के हृदय (घट-घट) में विद्यमान है, परंतु अज्ञानवश संसार उसे बाहर खोजता रहता है और देख नहीं पाता। कबीर परमात्मा को अपने भीतर ही खोजने का संदेश देते हैं।

साखी 3
जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाँहि।
सब अँधियारा मिटि गया, जब दीपक देख्या माँहि॥

भावार्थ: कबीर कहते हैं कि जब तक मन में ‘मैं’ अर्थात् अहंकार था, तब तक ईश्वर के दर्शन नहीं हुए; अब जब अहंकार मिट गया और प्रभु का अनुभव हुआ, तो ‘मैं’ ही नहीं रहा। जैसे दीपक जलते ही अंधकार दूर हो जाता है, वैसे ही ज्ञान-दीपक के भीतर प्रकाशित होते ही अज्ञान और अहंकार का अंधकार मिट जाता है।

साखी 4
सुखिया सब संसार है, खायै अरु सोवै।
दुखिया दास कबीर है, जागै अरु रोवै॥

भावार्थ: कबीर कहते हैं कि सारा संसार सांसारिक भोग-विलास में लीन रहकर खा-पीकर सोता है और स्वयं को सुखी समझता है। परंतु ईश्वर का सच्चा भक्त (दास कबीर) प्रभु-वियोग में दुखी रहकर जागता और रोता रहता है। यहाँ ‘सोना’ अज्ञान-मोह में डूबे रहने का तथा ‘जागना’ आत्मबोध एवं ईश्वर-प्रेम में सचेत रहने का प्रतीक है।

साखी 5
बिरह भुवंगम तन बसै, मंत्र न लागै कोइ।
राम बियोगी ना जिवै, जिवै तो बौरा होइ॥

भावार्थ: कबीर कहते हैं कि जब विरह रूपी सर्प (भुजंग) शरीर में बस जाता है, तो उसका विष उतारने में कोई मंत्र काम नहीं आता। राम (ईश्वर) का वियोगी जीवित नहीं रह पाता और यदि जीवित रहता भी है तो वियोग की पीड़ा से बावला (पागल) हो जाता है। यह साखी ईश्वर-वियोग की असह्य पीड़ा को व्यक्त करती है।

साखी 6
निंदक नेड़ा राखिये, आँगणि कुटी बँधाइ।
बिन साबण पाँणीं बिना, निरमल करै सुभाइ॥

भावार्थ: कबीर कहते हैं कि निंदा करने वाले व्यक्ति को अपने पास रखना चाहिए, चाहे आँगन में ही उसके लिए कुटिया बनवानी पड़े। निंदक हमारी कमियाँ बताकर हमें सँभलने का अवसर देता है और इस प्रकार बिना साबुन और पानी के ही हमारे स्वभाव को निर्मल (शुद्ध) कर देता है। आलोचना को सकारात्मक रूप में लेकर मनुष्य अपना सुधार कर सकता है।

साखी 7
पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुवा, पंडित भया न कोइ।
एकै अषिर पीव का, पढ़ै सु पंडित होइ॥

भावार्थ: कबीर कहते हैं कि बड़ी-बड़ी पोथियाँ (ग्रंथ) पढ़-पढ़कर सारा संसार मर गया, फिर भी कोई सच्चा पंडित (ज्ञानी) नहीं बन सका। वास्तव में पंडित वही है जो प्रिय (परमात्मा) के प्रेम का एक अक्षर (तत्त्व) पढ़ ले अर्थात् हृदय से प्रेम-भक्ति का अनुभव कर ले। इस साखी में कबीर शास्त्रीय ज्ञान की अपेक्षा प्रेम और अनुभव-ज्ञान को श्रेष्ठ बताते हैं।

साखी 8
हम घर जाल्या आपणाँ, लिया मुराड़ा हाथि।
अब घर जालौं तास का, जे चलै हमारे साथि॥

भावार्थ: कबीर कहते हैं कि उन्होंने ज्ञान की जलती हुई मशाल (मुराड़ा) हाथ में लेकर अपने ही घर अर्थात् मोह-ममता और सांसारिक आसक्ति को जला डाला है। अब वे उसी का घर (मोह-बंधन) जलाने को तैयार हैं, जो उनके साथ इस सच्चे, निर्मोही ज्ञान-मार्ग पर चलने को तैयार हो। तात्पर्य यह है कि ईश्वर-प्राप्ति के लिए पहले अपने मोह और अहंकार का त्याग आवश्यक है।

शब्दार्थ एवं टिप्पणियाँ

शब्दअर्थ
बाँणीबोली, वाणी
आपाअहं, अहंकार
सीतलशीतल, शांत
औरन कौंऔरों को, दूसरों को
कुंडलिनाभि
मृगहिरण
बन माँहिवन में, जंगल में
घटि घटिघट-घट में, कण-कण में, प्रत्येक हृदय में
अँधियाराअंधकार, अँधेरा
दीपकदीया (यहाँ ज्ञान का प्रतीक)
देख्या माँहिभीतर देखा/अनुभव किया
सुखियासुखी
दुखियादुखी
जागैजागना (सचेत रहना)
रोवैरोना (वियोग में व्याकुल होना)
बिरहविरह, वियोग
भुवंगमभुजंग, साँप
बियोगीवियोगी, बिछुड़ा हुआ
बौराबावला, पागल
निंदकनिंदा करने वाला, आलोचक
नेड़ानिकट, पास
आँगणिआँगन
साबणसाबुन
निरमलनिर्मल, स्वच्छ, शुद्ध
सुभाइस्वभाव
पोथीपुस्तक, ग्रंथ
मुवा / मुआमर गया
अषिरअक्षर
पीवप्रिय (परमात्मा)
जाल्या / जालौंजलाया / जलाऊँ
आपणाँअपना
मुराड़ाजलती हुई लकड़ी, मशाल
तास काउसका

प्रश्न-अभ्यास (क) – निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए

1. मीठी वाणी बोलने से औरों को सुख और अपने तन को शीतलता कैसे प्राप्त होती है?

उत्तरअहंकार रहित मीठी वाणी सुनने वाले के मन को प्रसन्न और संतुष्ट कर देती है, जिससे दूसरों को सुख मिलता है।मधुर वचन बोलने से मन में किसी के प्रति वैर-द्वेष या क्रोध नहीं रहता, इसलिए बोलने वाले का अपना तन-मन भी शीतल अर्थात् शांत रहता है।इस प्रकार मीठी वाणी से एक ओर दूसरों को सुख और दूसरी ओर स्वयं को शांति, दोनों की प्राप्ति होती है।

2. दीपक दिखाई देने पर अँधियारा कैसे मिट जाता है? साखी के संदर्भ में स्पष्ट कीजिए।

उत्तरयहाँ ‘दीपक’ ज्ञान का तथा ‘अँधियारा’ अज्ञान एवं अहंकार का प्रतीक है।जैसे जलते हुए दीपक के प्रकाश से कमरे का अँधेरा तुरंत दूर हो जाता है, वैसे ही जब मनुष्य के भीतर ज्ञान का दीपक प्रकाशित होता है, तो उसके मन से अज्ञान और अहंकार का अंधकार मिट जाता है।अहंकार के मिटते ही ‘मैं’ का भाव समाप्त होकर प्रभु का अनुभव हो जाता है, जिससे आत्मज्ञान का प्रकाश फैल जाता है।

3. ईश्वर कण-कण में व्याप्त है, पर हम उसे क्यों नहीं देख पाते?

उत्तरईश्वर संसार के कण-कण में और प्रत्येक प्राणी के हृदय में विद्यमान है, परंतु अज्ञान, अहंकार और बाह्य आडंबरों के कारण मनुष्य उसे पहचान नहीं पाता।जैसे कस्तूरी मृग की नाभि में रहती है पर वह उसे वन में खोजता है, वैसे ही मनुष्य ईश्वर को मंदिर, तीर्थ आदि बाहरी स्थानों में ढूँढ़ता रहता है, अपने भीतर नहीं देखता।यदि मनुष्य अहंकार त्यागकर अपने अंतर्मन में झाँके, तो उसे ईश्वर के दर्शन हो सकते हैं।

4. संसार में सुखी व्यक्ति कौन है और दुखी कौन? यहाँ ‘सोना’ और ‘जागना’ किसके प्रतीक हैं? इसका प्रयोग यहाँ क्यों किया गया है? स्पष्ट कीजिए।

उत्तरसुखी व्यक्ति: कबीर के अनुसार संसार के वे लोग सुखी प्रतीत होते हैं जो सांसारिक भोग-विलास में डूबे रहते हैं अर्थात् खा-पीकर निश्चिंत होकर सोते हैं।दुखी व्यक्ति: ईश्वर का सच्चा भक्त (स्वयं कबीर) दुखी है, क्योंकि वह प्रभु के वियोग में जागता और रोता रहता है।प्रतीक: यहाँ ‘सोना’ सांसारिक मोह-माया एवं अज्ञान में डूबे रहने का तथा ‘जागना’ ईश्वर-प्रेम और आत्मबोध में सचेत रहने का प्रतीक है।प्रयोग का कारण: इन प्रतीकों के द्वारा कबीर यह स्पष्ट करना चाहते हैं कि सांसारिक सुख क्षणिक है, जबकि प्रभु-वियोग की पीड़ा ही सच्ची साधना और जागरूकता का मार्ग है।

5. अपने स्वभाव को निर्मल रखने के लिए कबीर ने क्या उपाय सुझाया है?

उत्तरकबीर ने अपने स्वभाव को निर्मल (शुद्ध) रखने के लिए निंदा करने वाले व्यक्ति को अपने पास रखने का उपाय सुझाया है।उनके अनुसार निंदक को आँगन में कुटी बनवाकर भी पास रखना चाहिए, क्योंकि वह हमारी कमियाँ और दोष बताता है।अपने दोषों को जानकर मनुष्य उन्हें सुधार लेता है और इस प्रकार निंदक बिना साबुन-पानी के ही उसके स्वभाव को निर्मल कर देता है।

6. ‘एकै अषिर पीव का, पढ़ै सु पंडित होइ’ – इस पंक्ति द्वारा कवि क्या कहना चाहता है?

उत्तरइस पंक्ति द्वारा कबीर कहना चाहते हैं कि सच्चा पंडित वही है जो प्रिय (परमात्मा) के प्रेम का एक अक्षर अर्थात् मूल तत्त्व पढ़ ले या हृदय से अनुभव कर ले।बड़े-बड़े ग्रंथ पढ़ लेना या पुस्तकीय ज्ञान अर्जित कर लेना सच्चा ज्ञान नहीं है।कवि का तात्पर्य है कि ईश्वर के प्रति सच्चा प्रेम और भक्ति का अनुभव ही वास्तविक ज्ञान है, और ऐसा अनुभवी व्यक्ति ही सच्चा पंडित कहलाने योग्य है।

7. कबीर की उद्धृत साखियों की भाषा की विशेषता स्पष्ट कीजिए।

उत्तरकबीर की साखियों की भाषा सहज, सरल एवं अनुभवपरक है, जो सीधे हृदय को छू लेती है।इसमें अवधी, राजस्थानी, भोजपुरी और पंजाबी आदि अनेक बोलियों के शब्दों का मिश्रण है, इसीलिए इसे ‘पचमेल खिचड़ी’ तथा ‘सधुक्कड़ी’ भाषा कहा जाता है।भाषा में लोकोक्तियों, प्रतीकों (कस्तूरी-मृग, दीपक, सर्प) और दृष्टांतों का सुंदर प्रयोग हुआ है।साखियाँ दोहा छंद में रचित हैं और इनमें मुहावरेदार, ओजपूर्ण तथा उपदेशात्मक शैली के दर्शन होते हैं।

प्रश्न-अभ्यास (ख) – निम्नलिखित का भाव स्पष्ट कीजिए

1. बिरह भुवंगम तन बसै, मंत्र न लागै कोइ।

भावइसमें कबीर विरह की असह्य पीड़ा को व्यक्त करते हैं। ईश्वर का विरह रूपी साँप जब शरीर में बस जाता है, तो उसका विष किसी भी मंत्र-तंत्र से नहीं उतरता।तात्पर्य यह है कि ईश्वर-वियोग की पीड़ा इतनी गहरी होती है कि उसका कोई उपचार संभव नहीं; वह केवल प्रभु-मिलन से ही शांत होती है।

2. कस्तूरी कुंडलि बसै, मृग ढूँढै बन माँहि।

भावकस्तूरी मृग की अपनी ही नाभि में होती है, फिर भी उसकी सुगंध से व्याकुल होकर वह उसे जंगल में ढूँढ़ता फिरता है।इसी प्रकार ईश्वर मनुष्य के अपने हृदय में विद्यमान है, पर अज्ञानवश वह उसे बाहर खोजता रहता है। संदेश यह है कि ईश्वर को बाहर नहीं, अपने भीतर ही खोजना चाहिए।

3. जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाँहि।

भावजब तक मनुष्य के मन में अहंकार (मैं का भाव) रहता है, तब तक उसे ईश्वर के दर्शन नहीं होते।जब अहंकार मिट जाता है, तभी प्रभु की प्राप्ति होती है। आशय यह है कि अहंकार और ईश्वर-प्राप्ति एक साथ नहीं रह सकते; निरहंकार होने पर ही प्रभु का अनुभव होता है।

4. पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुवा, पंडित भया न कोइ।

भावकेवल पुस्तकें पढ़-पढ़कर सारा संसार जीवन गँवा देता है, पर इससे कोई सच्चा ज्ञानी (पंडित) नहीं बन पाता।कबीर का आशय है कि पुस्तकीय ज्ञान से सच्चा ज्ञान प्राप्त नहीं होता; ईश्वर के प्रति प्रेम और अनुभव-ज्ञान ही व्यक्ति को सच्चा पंडित बनाता है।

भाषा अध्ययन

पाठ में आए निम्नलिखित शब्दों के प्रचलित (आधुनिक) रूप – उदाहरण: जिवै → जीना।

पाठ में आया शब्दप्रचलित (आधुनिक) रूप
औरनऔरों (दूसरों)
माँहिमें
देख्यादेखा
भुवंगमभुजंग (साँप)
नेड़ानिकट / नज़दीक
आँगणिआँगन
साबणसाबुन
मुवामरा / मर गया
पीवप्रिय / पिया
जालौंजलाऊँ
तासउस / उसका

योग्यता विस्तार एवं परियोजना कार्य

योग्यता विस्तार – 1. ‘साधु में निंदा सहन करने से विनयशीलता आती है’ तथा ‘व्यक्ति को मीठी व कल्याणकारी वाणी बोलनी चाहिए’ – ये दोनों विषय कक्षा-परिचर्चा हेतु हैं। संकेत: निंदा को सहने से व्यक्ति में अहंकार घटता है और विनम्रता बढ़ती है; मधुर वाणी से संबंध मधुर होते हैं और समाज में सद्भाव फैलता है। विद्यार्थी अपने तर्क सहित कक्षा में चर्चा करें।

योग्यता विस्तार – 2. कस्तूरी: कस्तूरी एक अत्यंत सुगंधित पदार्थ है, जो नर कस्तूरी-मृग (Musk Deer) की नाभि के पास स्थित ग्रंथि से प्राप्त होता है। इसका उपयोग इत्र और औषधि बनाने में होता है। यह मृग प्रायः हिमालयी क्षेत्रों में पाया जाता है और संरक्षित (Protected) प्रजाति है।

परियोजना कार्य – 1. मीठी वाणी/बोली संबंधी तथा ईश्वर-प्रेम संबंधी दोहों का संकलन कर चार्ट पर लिखकर भित्ति-पत्रिका पर लगाइए। (विद्यार्थी कबीर, रहीम आदि के दोहे एकत्र करें।)

परियोजना कार्य – 2. कबीर की साखियों को याद कीजिए और कक्षा में अंत्याक्षरी में उनका प्रयोग कीजिए। (समूह-गतिविधि।)

अतिरिक्त प्रश्न

लघु उत्तरीय (5)

1. ‘साखी’ शब्द का अर्थ एवं उसका छंद-विधान बताइए।

उत्तर‘साखी’ शब्द ‘साक्षी’ का तद्भव रूप है, जिसका अर्थ है प्रत्यक्ष ज्ञान का साक्ष्य देने वाला कथन।साखी वस्तुतः दोहा छंद ही है, जिसमें 13 और 11 के विश्राम से कुल 24 मात्राएँ होती हैं।

2. कबीर ने निंदक को पास रखने की सलाह क्यों दी है?

उत्तरनिंदक हमारी कमियाँ और दोष बताता है, जिससे हमें आत्म-सुधार का अवसर मिलता है।इस प्रकार वह बिना साबुन-पानी के ही हमारे स्वभाव को निर्मल कर देता है, इसलिए कबीर ने उसे पास रखने की सलाह दी है।

3. कबीर शास्त्रीय ज्ञान की अपेक्षा अनुभव-ज्ञान को अधिक महत्त्व क्यों देते हैं?

उत्तरकबीर के अनुसार पोथियाँ पढ़कर भी कोई सच्चा पंडित नहीं बन पाता।उनका मानना है कि ईश्वर के प्रति सच्चे प्रेम और भक्ति का अनुभव ही वास्तविक ज्ञान है, इसलिए वे प्रेम रूपी एक अक्षर के अनुभव-ज्ञान को पुस्तकीय ज्ञान से श्रेष्ठ मानते हैं।

4. आठवीं साखी में ‘घर जलाने’ का क्या आशय है?

उत्तरयहाँ ‘घर’ मोह-ममता, आसक्ति और अहंकार का प्रतीक है तथा ‘मुराड़ा’ (जलती मशाल) ज्ञान का।कबीर कहते हैं कि उन्होंने ज्ञान की मशाल से अपने मोह रूपी घर को जला दिया है; अब वे उसी का मोह जला सकते हैं जो उनके साथ इस निर्मोही ज्ञान-मार्ग पर चलने को तैयार हो।

5. कबीर की भाषा को ‘सधुक्कड़ी’ क्यों कहा जाता है?

उत्तरकबीर स्थान-स्थान पर भ्रमण कर प्रत्यक्ष ज्ञान प्राप्त करते थे, इसलिए उनकी भाषा में अवधी, राजस्थानी, भोजपुरी, पंजाबी आदि अनेक बोलियों के शब्द मिल गए।साधु-संतों द्वारा बोली जाने वाली इस मिश्रित भाषा को ही ‘सधुक्कड़ी’ (तथा ‘पचमेल खिचड़ी’) कहा जाता है।

दीर्घ उत्तरीय (3)

6. कबीर की साखियों में निहित सामाजिक एवं नैतिक संदेश को स्पष्ट कीजिए।

उत्तरकबीर की साखियाँ जीवन को सुधारने वाले अनेक मूल्यों का संदेश देती हैं।वे अहंकार त्यागकर मीठी एवं कल्याणकारी वाणी बोलने की प्रेरणा देती हैं, जिससे समाज में सद्भाव बढ़े।वे बाह्याडंबर का विरोध कर ईश्वर को अपने भीतर खोजने तथा निरहंकार होकर सच्चा ज्ञान पाने का उपदेश देती हैं।निंदक को पास रखकर आत्म-सुधार करना, पुस्तकीय ज्ञान के स्थान पर प्रेम और अनुभव-ज्ञान को अपनाना तथा मोह-ममता का त्याग करना – ये साखियों के प्रमुख नैतिक संदेश हैं।

7. ‘ईश्वर कण-कण में व्याप्त है’ – इस विचार को कबीर ने किन उदाहरणों से स्पष्ट किया है? सविस्तार लिखिए।

उत्तरकबीर मानते हैं कि ईश्वर निराकार होकर भी संसार के कण-कण और प्रत्येक प्राणी के हृदय में विद्यमान है।इसे स्पष्ट करने के लिए उन्होंने कस्तूरी-मृग का सुंदर उदाहरण दिया है – कस्तूरी मृग की अपनी ही नाभि में होती है, फिर भी वह उसे वन में ढूँढ़ता फिरता है।इसी प्रकार मनुष्य ईश्वर को मंदिर, तीर्थ आदि बाहरी स्थानों में खोजता है, जबकि वह उसके भीतर ही बसा है।कबीर का संदेश है कि अज्ञान और अहंकार त्यागकर अंतर्मन में झाँकने पर ही ईश्वर के दर्शन संभव हैं।

8. कबीर की भक्ति-भावना एवं विरह-वेदना पर साखियों के आधार पर प्रकाश डालिए।

उत्तरकबीर सच्चे ईश्वर-भक्त थे; उनकी साखियों में निर्गुण ईश्वर के प्रति गहरी भक्ति-भावना झलकती है।वे संसार के भोग-विलास को क्षणिक मानते हैं और प्रभु-वियोग में जागने-रोने वाले भक्त को ही सच्चा जागरूक बताते हैं।विरह-वेदना को उन्होंने ‘भुवंगम’ (साँप) के रूप में चित्रित किया है, जिसका विष किसी मंत्र से नहीं उतरता; राम का वियोगी या तो जीवित नहीं रहता और रहता है तो बावला हो जाता है।इस प्रकार उनकी साखियों में भक्ति और विरह की तीव्र, मार्मिक अनुभूति प्रकट होती है।

अभ्यास MCQ & अभिकथन-कारण

1. कबीर का जन्म कहाँ हुआ माना जाता है?

(क) मगहर

(ख) काशी (वाराणसी)

(ग) मथुरा

(घ) अयोध्या

उत्तर(ख) काशी (वाराणसी)।

2. कबीर किसके शिष्य थे?

(क) रामानुज

(ख) वल्लभाचार्य

(ग) रामानंद

(घ) तुलसीदास

उत्तर(ग) रामानंद।

3. ‘साखी’ शब्द किस शब्द का तद्भव रूप है?

(क) सखी

(ख) साक्षी

(ग) शाखा

(घ) साक्षर

उत्तर(ख) साक्षी।

4. कबीर के अनुसार मनुष्य को कैसी वाणी बोलनी चाहिए?

(क) कठोर और स्पष्ट

(ख) अहंकार रहित मीठी वाणी

(ग) चतुराई भरी वाणी

(घ) मौन रहना ही श्रेष्ठ है

उत्तर(ख) अहंकार रहित मीठी वाणी।

5. कस्तूरी-मृग के उदाहरण से कबीर क्या समझाना चाहते हैं?

(क) सुगंध का महत्त्व

(ख) ईश्वर हृदय में ही है, पर हम बाहर खोजते हैं

(ग) वन-संरक्षण

(घ) मृग की चंचलता

उत्तर(ख) ईश्वर हृदय में ही है, पर हम बाहर खोजते हैं।

6. ‘जब मैं था तब हरि नहीं’ – यहाँ ‘मैं’ का अर्थ है–

(क) कवि स्वयं

(ख) अहंकार

(ग) आत्मा

(घ) शरीर

उत्तर(ख) अहंकार।

7. साखी में ‘दीपक’ किसका प्रतीक है?

(क) अंधकार

(ख) ज्ञान

(ग) धन

(घ) पूजा

उत्तर(ख) ज्ञान।

8. ‘भुवंगम’ शब्द का अर्थ है–

(क) भुजा

(ख) भुजंग (साँप)

(ग) भँवरा

(घ) भूमि

उत्तर(ख) भुजंग (साँप)।

9. कबीर के अनुसार सच्चा पंडित कौन है?

(क) जो अनेक ग्रंथ पढ़े

(ख) जो प्रिय (प्रभु) के प्रेम का एक अक्षर पढ़/अनुभव ले

(ग) जो शास्त्रार्थ में जीते

(घ) जो संस्कृत जानता हो

उत्तर(ख) जो प्रिय (प्रभु) के प्रेम का एक अक्षर पढ़/अनुभव ले।

10. कबीर की भाषा को क्या कहा जाता है?

(क) ब्रजभाषा

(ख) खड़ी बोली

(ग) सधुक्कड़ी / पचमेल खिचड़ी

(घ) मैथिली

उत्तर(ग) सधुक्कड़ी / पचमेल खिचड़ी।
उत्तर-कुंजी: 1-(ख), 2-(ग), 3-(ख), 4-(ख), 5-(ख), 6-(ख), 7-(ख), 8-(ख), 9-(ख), 10-(ग)

अभिकथन-कारण – नीचे अभिकथन (A) और कारण (R) दिए गए हैं। सही विकल्प चुनिए—
(क) A और R दोनों सही, R, A की सही व्याख्या है। (ख) A और R दोनों सही, पर R, A की सही व्याख्या नहीं। (ग) A सही, R गलत। (घ) A गलत, R सही।

1. अभिकथन (A): कबीर मीठी एवं अहंकार रहित वाणी बोलने पर बल देते हैं।

कारण (R): मीठी वाणी दूसरों को सुख और स्वयं को शीतलता (शांति) प्रदान करती है।

उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है।

2. अभिकथन (A): कबीर ईश्वर को मंदिर-तीर्थ जैसे बाहरी स्थानों में खोजने पर बल देते हैं।

कारण (R): ईश्वर कण-कण और प्रत्येक हृदय में व्याप्त है।

उत्तर(घ) A गलत है (कबीर ईश्वर को अपने भीतर खोजने को कहते हैं), R सही है।

3. अभिकथन (A): कबीर ने निंदक को अपने पास रखने की सलाह दी है।

कारण (R): निंदक हमारी कमियाँ बताकर हमारे स्वभाव को निर्मल बना देता है।

उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है।

4. अभिकथन (A): कबीर पुस्तकीय ज्ञान को सच्चे पांडित्य का आधार मानते हैं।

कारण (R): ‘पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुवा, पंडित भया न कोइ’ पंक्ति में वे अनुभव-ज्ञान को श्रेष्ठ बताते हैं।

उत्तर(घ) A गलत है, R सही है – कबीर पुस्तकीय नहीं, प्रेम एवं अनुभव-ज्ञान को महत्त्व देते हैं।

5. अभिकथन (A): राम का वियोगी या तो जीवित नहीं रहता और रहता है तो बावला हो जाता है।

कारण (R): ईश्वर-वियोग की पीड़ा इतनी गहरी होती है कि उसका कोई मंत्र-उपचार नहीं।

उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है।
अभिकथन-कारण उत्तर-कुंजी: 1-(क), 2-(घ), 3-(क), 4-(घ), 5-(क)

परीक्षा-युक्तियाँ

  • भावार्थ पूछे जाने पर पहले साखी की पंक्ति लिखें, फिर उसका सरल अर्थ और अंत में निहित संदेश स्पष्ट करें।
  • प्रतीकों के अर्थ अवश्य याद रखें – दीपक = ज्ञान, अँधियारा = अज्ञान/अहंकार, सोना = मोह-माया, जागना = आत्मबोध, भुवंगम = विरह।
  • कबीर की भाषा-विशेषता (सधुक्कड़ी/पचमेल खिचड़ी) और छंद (दोहा, 24 मात्राएँ) से जुड़े प्रश्न प्रायः पूछे जाते हैं।
  • तद्भव-तत्सम तथा शब्दों के प्रचलित रूप (माँहि→में, साबण→साबुन) तालिका रूप में याद करें।

सामान्य गलतियाँ

  • ‘मैं’ का अर्थ ‘कवि स्वयं’ लिख देना – यहाँ ‘मैं’ अहंकार का प्रतीक है।
  • ‘निंदक’ वाली साखी का अर्थ शत्रु को पास रखना समझ लेना – इसका आशय आलोचना से आत्म-सुधार है।
  • साखियों की पंक्तियाँ लिखते समय शब्द बदल देना – पंक्तियाँ ज्यों-की-त्यों लिखें।
  • कबीर का जन्म-स्थान काशी के स्थान पर मगहर लिख देना (मगहर उनका निर्वाण-स्थल है)।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

कक्षा 10 हिंदी स्पर्श अध्याय 1 ‘साखी’ के कवि कौन हैं?

इस पाठ की साखियों के रचयिता संत कवि कबीर (1398–1518) हैं, जो निर्गुण भक्ति-धारा के प्रमुख कवि माने जाते हैं।

‘साखी’ शब्द का क्या अर्थ है?

‘साखी’ शब्द ‘साक्षी’ का तद्भव रूप है, जिसका अर्थ है प्रत्यक्ष ज्ञान का साक्ष्य देने वाला कथन। यह वस्तुतः दोहा छंद ही है (24 मात्राएँ)।

कबीर ने निंदक को पास रखने की सलाह क्यों दी है?

क्योंकि निंदक हमारी कमियाँ बताकर हमें सुधरने का अवसर देता है और इस प्रकार बिना साबुन-पानी के ही हमारे स्वभाव को निर्मल बना देता है।

प्रश्न NCERT स्पर्श पुस्तक से ज्यों-के-त्यों लिए गए हैं; उत्तर ClearStudy द्वारा मौलिक रूप से तैयार एवं जाँचे गए हैं।

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