NCERT Solutions for Class 10 Hindi (Sparsh 2) अध्याय 11: तीसरी कसम के शिल्पकार शैलेंद्र – प्रश्न-उत्तर, सार एवं शब्दार्थ (NCERT 2026–27)

यह पृष्ठ कक्षा 10 हिंदी की पुस्तक स्पर्श (भाग 2) के गद्य अध्याय 11 ‘तीसरी कसम के शिल्पकार शैलेंद्र’ (लेखक – प्रहलाद अग्रवाल) का पूरा एवं परीक्षा-केंद्रित समाधान देता है – पाठ का सार, शब्दार्थ, पाठ्यपुस्तक के सभी प्रश्न-अभ्यास के उत्तर, अतिरिक्त प्रश्न, MCQ तथा अभिकथन-कारण।

कक्षा: 10 विषय: हिंदी पुस्तक: स्पर्श (भाग 2) अध्याय: 11 लेखक: प्रहलाद अग्रवाल विधा: व्यक्ति-चित्र / निबंध सत्र: 2026–27

लेखक परिचय – प्रहलाद अग्रवाल

प्रहलाद अग्रवाल का जन्म सन् 1947 में मध्य प्रदेश के जबलपुर शहर में हुआ। उन्होंने हिंदी में एम.ए. तक शिक्षा प्राप्त की। किशोरावस्था से ही उन्हें हिंदी फ़िल्मों के इतिहास, फ़िल्मकारों के जीवन तथा उनके अभिनय के विषय में विस्तार से जानने और उस पर चर्चा करने का शौक रहा। वे सतना के शासकीय स्वशासी स्नातकोत्तर महाविद्यालय में अध्यापन करते रहे और फ़िल्म-जगत से जुड़े लोगों तथा फ़िल्मों पर निरंतर लेखन करते रहे। उनकी प्रमुख कृतियों में – सातवाँ दशक, तानाशाह, मैं ख़ुशबू, सुपर स्टार, राजकपूर: आधी हकीकत आधा फ़साना, कवि शैलेंद्र: ज़िंदगी की जीत में यकीन, प्यासा: चिर अतृप्त गुरुदत्त, उत्ताल उमंग: सुभाष घई की फ़िल्मकला, अरे ओ माँझी: बिमल राय का सिनेमा तथा महाबाज़ार के महानायक: इक्कीसवीं सदी का सिनेमा आदि उल्लेखनीय हैं। फ़िल्म-समीक्षा उनकी लेखनी का प्रमुख विषय रहा।

पाठ का सार

‘तीसरी कसम के शिल्पकार शैलेंद्र’ प्रसिद्ध गीतकार और कवि शैलेंद्र के फ़िल्म-निर्माण और उनकी संवेदनशील रचना-दृष्टि पर केंद्रित एक भावपूर्ण व्यक्ति-चित्र है। शैलेंद्र कई दशकों तक फ़िल्म-क्षेत्र से एक गीतकार के रूप में जुड़े रहे, परंतु जब उन्होंने फणीश्वरनाथ रेणु की अमर कृति ‘तीसरी कसम उर्फ़ मारे गए गुलफ़ाम’ को परदे पर उतारा, तो वह फ़िल्म हिंदी सिनेमा का मील का पत्थर सिद्ध हुई। लेखक इसे ‘सेल्युलाइड पर लिखी कविता’ कहते हैं, क्योंकि इसमें साहित्यिक कृति के साथ शत-प्रतिशत न्याय किया गया है।

यह शैलेंद्र के जीवन की पहली और अंतिम फ़िल्म थी। ‘तीसरी कसम’ को राष्ट्रपति स्वर्ण-पदक, बंगाल फ़िल्म जर्नलिस्ट एसोसिएशन द्वारा सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म का पुरस्कार तथा मास्को फ़िल्म फ़ेस्टिवल में भी पुरस्कार मिला। इस फ़िल्म में राजकपूर ने अपने जीवन की सर्वोत्कृष्ट भूमिका निभाई। शैलेंद्र राजकपूर के अनन्य मित्र थे; राजकपूर ने इस फ़िल्म में केवल एक रुपया पारिश्रमिक लेकर पूरी तन्मयता से अभिनय किया। शैलेंद्र एक आदर्शवादी, भावुक कवि थे, जिन्हें अपार संपत्ति और यश की उतनी कामना नहीं थी जितनी आत्म-संतुष्टि की।

फ़िल्म कलात्मक दृष्टि से बहुत ऊँची थी, परंतु इसे खरीदने वाला कोई वितरक आसानी से नहीं मिला, क्योंकि इसकी संवेदना ‘दो से चार बनाने’ का गणित जानने वालों की समझ से परे थी। शैलेंद्र ने दर्शकों की रुचि की आड़ में उथलेपन को कभी स्वीकार नहीं किया; वे मानते थे कि कलाकार का कर्तव्य उपभोक्ता की रुचियों का परिष्कार करना है। उनके गीत भाव-प्रवण थे, दुरूह नहीं। ‘तीसरी कसम’ में राजकपूर ‘हीरामन’ और वहीदा रहमान ‘हीराबाई’ के पात्रों में पूरी तरह ढल गए। राजकपूर ने अभिनय नहीं किया, बल्कि वह भोला-भाला देहाती गाड़ीवान हीरामन ही बन गया। इस प्रकार लेखक सिद्ध करते हैं कि एक सार्थक और उद्देश्यपूर्ण फ़िल्म बनाना कितना कठिन और जोखिम भरा काम है, और शैलेंद्र जैसा सच्चा कवि-हृदय ही ऐसी फ़िल्म रच सकता था।

मूलभाव

इस पाठ का मूलभाव यह है कि व्यावसायिक लाभ और दर्शकों की सस्ती रुचि के दबाव से परे जाकर भी कला की सार्थकता और संवेदना को सर्वोपरि रखा जा सकता है। शैलेंद्र ने यश और धन की लिप्सा से दूर रहकर आत्म-संतुष्टि के लिए एक ऐसी फ़िल्म बनाई जो लोक-तत्त्व और मानवीय करुणा से भरपूर थी। पाठ हमें सिखाता है कि सच्चा कलाकार बाज़ार के सामने नहीं झुकता, बल्कि उपभोक्ता की रुचि का परिष्कार करता है और व्यथा को पराजय नहीं, आगे बढ़ने का संदेश बनाकर प्रस्तुत करता है।

शब्दार्थ एवं टिप्पणियाँ

शब्दअर्थ
अंतरालके बाद, बीच का समय
अभिनीतअभिनय किया गया
सर्वोत्कृष्टसबसे अच्छा
सेल्युलाइडकैमरे की रील में उतार चित्र पर प्रस्तुत करना
सार्थकतासफलता के साथ, अर्थपूर्ण होना
कलात्मकताकला से परिपूर्ण
संवेदनशीलताभावुकता
शिद्दततीव्रता
अनन्यपरम, अत्यधिक
तन्मयतातल्लीनता, लीन हो जाना
पारिश्रमिकमेहनताना
यराना मस्तीदोस्ताना अंदाज़
आगाहसचेत, सावधान
आत्म-संतुष्टिअपनी तुष्टि, अपने मन का संतोष
बमुश्किलबहुत कठिनाई से
वितरकफ़िल्म को सिनेमाघरों तक पहुँचाने/प्रसारित करने वाले लोग
नामज़दविख्यात, प्रसिद्ध
नावाकिफ़अनजान
मंतव्यविचार, इच्छा, राय
उथलापनसतही, ओछापन
अभिजात्यपरिष्कृत, कुलीन
भाव-प्रवणभावनाओं से भरा हुआ
दुरूहकठिन
उकड़ूँघुटने मोड़कर पैर के तलवों के सहारे बैठना
सूक्ष्मताबारीकी
स्पंदितसंचालित, गतिमान
टप्पर-गाड़ीअर्धगोलाकार छप्परयुक्त बैलगाड़ी
हुज़ूमभीड़
त्रासददुखद
ग्लोरिफ़ाईगुणगान/महिमामंडित करना
वीभत्सभयावह
धन-लिप्साधन की अत्यधिक चाह
समीक्षकसमीक्षा करने वाला
कला-मर्मज्ञकला की परख करने वाला
चरमोत्कर्षऊँचाई के शिखर पर
ख़ालिसशुद्ध
भुच्चनिरा, बिलकुल (अनगढ़)
किंवदंतीकहावत, जनश्रुति

पाठ्यपुस्तक के प्रश्न-अभ्यास के उत्तर

मौखिक – निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर एक-दो पंक्तियों में दीजिए—

1. ‘तीसरी कसम’ फ़िल्म को कौन-कौन से पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है?

उत्तर‘तीसरी कसम’ को राष्ट्रपति स्वर्ण-पदक, बंगाल फ़िल्म जर्नलिस्ट एसोसिएशन द्वारा सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म का पुरस्कार तथा मास्को फ़िल्म फ़ेस्टिवल में भी पुरस्कार प्राप्त हुआ।

2. शैलेंद्र ने कितनी फ़िल्में बनाईं?

उत्तरशैलेंद्र ने अपने जीवन में केवल एक ही फ़िल्म बनाई – ‘तीसरी कसम’, जो उनकी पहली और अंतिम फ़िल्म थी।

3. राजकपूर द्वारा निर्देशित कुछ फ़िल्मों के नाम बताइए।

उत्तरराजकपूर द्वारा निर्मित/निर्देशित प्रमुख फ़िल्में हैं – मेरा नाम जोकर, संगम, सत्यम् शिवम् सुंदरम् आदि।

4. ‘तीसरी कसम’ फ़िल्म के नायक व नायिकाओं के नाम बताइए और फ़िल्म में इन्होंने किन पात्रों का अभिनय किया है?

उत्तरइस फ़िल्म के नायक राजकपूर हैं, जिन्होंने ‘हीरामन’ नामक गाड़ीवान का पात्र निभाया, तथा नायिका वहीदा रहमान हैं, जिन्होंने नौटंकी की बाई ‘हीराबाई’ का पात्र निभाया।

5. फ़िल्म ‘तीसरी कसम’ का निर्माण किसने किया था?

उत्तरफ़िल्म ‘तीसरी कसम’ का निर्माण गीतकार और कवि शैलेंद्र ने किया था।

6. राजकपूर ने ‘मेरा नाम जोकर’ के निर्माण के समय किस बात की कल्पना भी नहीं की थी?

उत्तरराजकपूर ने यह कल्पना भी नहीं की थी कि इस फ़िल्म का केवल एक ही भाग बनाने में छह वर्षों का समय लग जाएगा।

7. राजकपूर की किस बात पर शैलेंद्र का चेहरा मुरझा गया?

उत्तरजब राजकपूर ने गंभीरतापूर्वक कहा कि “मेरा पारिश्रमिक एडवांस देना होगा, पूरा एडवांस”, तब यह सुनकर शैलेंद्र का चेहरा मुरझा गया।

8. फ़िल्म समीक्षक राजकपूर को किस तरह का कलाकार मानते थे?

उत्तरफ़िल्म समीक्षक और कला-मर्मज्ञ राजकपूर को ‘आँखों से बात करने वाला’ अत्यंत संवेदनशील एवं सशक्त कलाकार मानते थे।

लिखित (क) – निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर (25–30 शब्दों में) लिखिए—

1. ‘तीसरी कसम’ फ़िल्म को ‘सेल्युलाइड पर लिखी कविता’ क्यों कहा गया है?

उत्तरइस फ़िल्म में रेणु की मार्मिक कहानी को पूरी संवेदनशीलता और काव्यात्मक सौंदर्य के साथ परदे पर उतारा गया है।गीत, संगीत, दृश्य और भावनाओं की सूक्ष्मता एक कविता जैसी अनुभूति देते हैं, इसीलिए इसे ‘सेल्युलाइड पर लिखी कविता’ कहा गया है।

2. ‘तीसरी कसम’ फ़िल्म को खरीददार क्यों नहीं मिल रहे थे?

उत्तरयह फ़िल्म कलात्मक एवं संवेदनशील थी, जिसकी गहराई व्यावसायिक लाभ का गणित जानने वालों की समझ से परे थी।इसमें रची-बसी करुणा तराज़ू पर तौली जा सकने वाली चीज़ नहीं थी, इसलिए इसे खरीदने वाला वितरक आसानी से नहीं मिला।

3. शैलेंद्र के अनुसार कलाकार का कर्तव्य क्या है?

उत्तरशैलेंद्र के अनुसार कलाकार को दर्शकों की रुचि की आड़ में उथलापन नहीं परोसना चाहिए।कलाकार का कर्तव्य है कि वह उपभोक्ता की रुचियों का परिष्कार करने का प्रयत्न करे और उन्हें ऊँचा उठाए।

4. फ़िल्मों में त्रासद स्थितियों का चित्रांकन ग्लोरिफ़ाई क्यों कर दिया जाता है?

उत्तरहमारी फ़िल्में प्रायः जीवन से दूर होती हैं और लोक-तत्त्व का अभाव रखती हैं।दुख का ऐसा वीभत्स रूप प्रस्तुत किया जाता है जो दर्शकों का भावनात्मक शोषण कर सके, इसी कारण त्रासद स्थितियों को महिमामंडित (ग्लोरिफ़ाई) कर दिया जाता है।

5. ‘शैलेंद्र ने राजकपूर की भावनाओं को शब्द दिए हैं’—इस कथन से आप क्या समझते हैं? स्पष्ट कीजिए।

उत्तरइसका आशय है कि शैलेंद्र ने राजकपूर के मन की अनकही भावनाओं को अपने गीतों के माध्यम से अभिव्यक्ति दी।राजकपूर जो महसूस करते थे, शैलेंद्र उसे सटीक शब्दों में ढाल देते थे; इसी कारण दोनों का साथ अत्यंत सफल और आत्मीय रहा।

6. लेखक ने राजकपूर को एशिया का सबसे बड़ा शोमैन कहा है। शोमैन से आप क्या समझते हैं?

उत्तर‘शोमैन’ से अभिप्राय ऐसे कलाकार/निर्माता से है जो भव्यता, प्रस्तुति-कौशल और मनोरंजन के द्वारा दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर देता है।राजकपूर की फ़िल्मों की भव्यता और लोकप्रियता के कारण उन्हें एशिया का सबसे बड़ा शोमैन कहा गया।

7. फ़िल्म ‘श्री 420’ के गीत ‘रातों दसों दिशाओं से कहेंगी अपनी कहानियाँ’ पर संगीतकार जयकिशन ने आपत्ति क्यों की?

उत्तरजयकिशन का विचार था कि दर्शक ‘चार दिशाएँ’ तो समझ सकते हैं, पर ‘दस दिशाएँ’ नहीं।इसी कारण उन्होंने इस पंक्ति पर आपत्ति की, परंतु शैलेंद्र ने इसे बदलने से इनकार कर दिया।

लिखित (ख) – निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर (50–60 शब्दों में) लिखिए—

1. राजकपूर द्वारा फ़िल्म की असफलता के खतरों से आगाह करने पर भी शैलेंद्र ने यह फ़िल्म क्यों बनाई?

उत्तरशैलेंद्र एक आदर्शवादी और भावुक कवि थे। उन्हें अपार संपत्ति और यश की उतनी कामना नहीं थी जितनी आत्म-संतुष्टि की।वे रेणु की मार्मिक कहानी को पूरी सार्थकता के साथ परदे पर उतारना चाहते थे। आर्थिक असफलता के खतरे जानते हुए भी उन्होंने केवल अपनी कलात्मक तृप्ति और आत्म-संतोष के लिए यह फ़िल्म बनाई, क्योंकि उनके लिए कला की सार्थकता धन से कहीं अधिक मूल्यवान थी।

2. ‘तीसरी कसम’ में राजकपूर का महिमामय व्यक्तित्व किस तरह हीरामन की आत्मा में उतर गया है? स्पष्ट कीजिए।

उत्तरराजकपूर उस समय एशिया के सबसे बड़े शोमैन के रूप में स्थापित हो चुके थे और उनका व्यक्तित्व एक किंवदंती बन चुका था।फिर भी ‘तीसरी कसम’ में वे कहीं हीरामन का अभिनय नहीं करते, बल्कि स्वयं हीरामन में ढल जाते हैं। वे एक खालिस देहाती, भोले-भाले गाड़ीवान बन गए जो केवल दिल की ज़ुबान समझता है। हीराबाई की उपेक्षा पर तड़पता और अपनेपन के लिए न्योछावर होता सच्चा हीरामन ही परदे पर दिखाई देता है – इस प्रकार उनका महिमामय व्यक्तित्व पूरी तरह हीरामन की आत्मा में उतर गया।

3. लेखक ने ऐसा क्यों लिखा है कि ‘तीसरी कसम’ ने साहित्य-रचना के साथ शत-प्रतिशत न्याय किया है?

उत्तररेणु की कहानी ‘मारे गए गुलफ़ाम’ की हर बारीकी, उसका रेशा-रेशा फ़िल्म में पूरी तरह उतर आया।पटकथा स्वयं रेणु ने तैयार की, जिससे मूल कहानी की संवेदना, करुणा और लोक-तत्त्व यथावत् बना रहा। पात्र, परिवेश और भावनाएँ साहित्यिक कृति के अनुरूप ही प्रस्तुत हुए, बिना किसी विकृति के। इसी कारण लेखक मानते हैं कि इस फ़िल्म ने साहित्य-रचना के साथ शत-प्रतिशत न्याय किया।

4. शैलेंद्र के गीतों की क्या विशेषताएँ हैं? अपने शब्दों में लिखिए।

उत्तरशैलेंद्र के गीत भाव-प्रवण थे, दुरूह नहीं – वे सरल शब्दों में गहरी भावना व्यक्त करते थे।उनके गीतों में केवल करुणा ही नहीं, बल्कि जूझने का संकेत और आगे बढ़ने का संदेश भी रहता था। ‘मेरा जूता है जापानी’ जैसे गीत सरलता और राष्ट्रीयता से भरे हैं। उन्होंने झूठे अभिजात्य को कभी नहीं अपनाया; उनके गीत शांत नदी के प्रवाह और समुद्र की गहराई-सी विशेषता लिए हुए थे।

5. फ़िल्म निर्माता के रूप में शैलेंद्र की विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।

उत्तरफ़िल्म निर्माता के रूप में शैलेंद्र आदर्शवादी, भावुक और कला के प्रति समर्पित थे।उन्होंने व्यावसायिक लाभ या दर्शकों की सस्ती रुचि के दबाव में आकर अपनी फ़िल्म को उथला नहीं बनाया। वे लोक-तत्त्व और मानवीय करुणा को महत्त्व देते थे तथा साहित्यिक कृति के साथ पूरा न्याय करना चाहते थे। आत्म-संतुष्टि उनके लिए धन और यश से अधिक मूल्यवान थी – इसी कारण उन्होंने ‘तीसरी कसम’ जैसी कालजयी फ़िल्म बनाई।

6. शैलेंद्र के निजी जीवन की छाप उनकी फ़िल्म में झलकती है—कैसे? स्पष्ट कीजिए।

उत्तरशैलेंद्र यश और धन-लिप्सा से कोसों दूर, सादगीपूर्ण एवं संवेदनशील जीवन जीते थे; यही गुण उनकी फ़िल्म में भी उतर आया।जो सरलता, करुणा और जूझने का संदेश उनके जीवन में था, वही ‘तीसरी कसम’ में दिखाई देता है। फ़िल्म में व्यथा को पराजय के रूप में नहीं, बल्कि आगे बढ़ने की प्रेरणा के रूप में प्रस्तुत किया गया है – यह स्वयं शैलेंद्र के जीवन-दर्शन का प्रतिबिंब है।

7. लेखक के इस कथन से कि ‘तीसरी कसम’ फ़िल्म कोई सच्चा कवि-हृदय ही बना सकता था, आप कहाँ तक सहमत हैं? स्पष्ट कीजिए।

उत्तरमैं लेखक के इस कथन से पूर्णतः सहमत हूँ। ‘तीसरी कसम’ में जो सूक्ष्म संवेदना, करुणा और लोक-तत्त्व है, उसे केवल एक भावुक एवं संवेदनशील कवि-हृदय ही अनुभव कर सकता था।व्यावसायिक लाभ की चिंता किए बिना, मात्र आत्म-संतुष्टि के लिए ऐसी कलात्मक फ़िल्म बनाना किसी व्यवसायी के बस की बात नहीं थी। शैलेंद्र ने अपनी काव्य-दृष्टि से कहानी की आत्मा को परदे पर साकार किया, इसलिए यह सच है कि ऐसी फ़िल्म कोई सच्चा कवि-हृदय ही रच सकता था।

लिखित (ग) – निम्नलिखित का आशय स्पष्ट कीजिए—

1. …वह तो एक आदर्शवादी भावुक कवि था, जिसे अपार संपत्ति और यश तक की इतनी कामना नहीं थी जितनी आत्म-संतुष्टि के सुख की अभिलाषा थी।

आशयइस कथन का आशय यह है कि शैलेंद्र भौतिक सुख-संपत्ति और प्रसिद्धि के पीछे नहीं भागते थे।उनके लिए सबसे बड़ा सुख आत्म-संतुष्टि था – अर्थात् अपने मन के अनुरूप सार्थक एवं कलात्मक कार्य करने का संतोष। धन और यश की अपेक्षा वे अपनी कला की तृप्ति को अधिक महत्त्व देते थे।

2. उनका यह दृढ़ मंतव्य था कि दर्शकों की रुचि की आड़ में हमें उथलेपन को उन पर नहीं थोपना चाहिए। कलाकार का यह कर्तव्य भी है कि वह उपभोक्ता की रुचियों का परिष्कार करने का प्रयत्न करे।

आशयइसका आशय यह है कि ‘दर्शक यही पसंद करते हैं’ का बहाना बनाकर सस्ती और ओछी सामग्री नहीं परोसनी चाहिए।सच्चे कलाकार का दायित्व है कि वह दर्शकों की रुचि को ऊँचा उठाए और उन्हें श्रेष्ठ, सार्थक कला से जोड़े, न कि उनकी निम्न रुचि का लाभ उठाए।

3. व्यथा आदमी को पराजित नहीं करती, उसे आगे बढ़ने का संदेश देती है।

आशयइसका आशय है कि दुख और पीड़ा मनुष्य को कमज़ोर या पराजित करने के लिए नहीं आती।शैलेंद्र के गीतों और दृष्टि के अनुसार व्यथा मनुष्य को संघर्ष की प्रेरणा देती है और जीवन में आगे बढ़ने का संबल बनती है – अर्थात् दुख को सकारात्मक रूप में लेना चाहिए।

4. दरअसल इस फ़िल्म की संवेदना किसी दो से चार बनाने वाले की समझ से परे है।

आशययहाँ ‘दो से चार बनाने वाला’ उस व्यावसायिक व्यक्ति का प्रतीक है जो केवल लाभ-हानि का गणित जानता है।आशय यह है कि ‘तीसरी कसम’ की गहरी मानवीय संवेदना और करुणा को केवल पैसे की दृष्टि रखने वाला व्यापारी नहीं समझ सकता; ऐसी कला मुनाफ़े के तराज़ू पर नहीं तौली जा सकती।

5. उनके गीत भाव-प्रवण थे—दुरूह नहीं।

आशयइसका आशय है कि शैलेंद्र के गीत भावनाओं से भरपूर, सरल और सहज थे।वे कठिन, बोझिल या क्लिष्ट भाषा का प्रयोग नहीं करते थे, इसलिए उनके गीत आम जनता तक सहजता से पहुँच जाते और गहराई से प्रभावित करते थे।

भाषा अध्ययन

1. पाठ में आए ‘से’ के विभिन्न प्रयोगों से वाक्य की संरचना को समझिए— (क) राजकपूर ने एक अच्छे और सच्चे मित्र की हैसियत से शैलेंद्र को फ़िल्म की असफलता के खतरों से आगाह भी किया। (ख) रातें दसों दिशाओं से कहेंगी अपनी कहानियाँ। (ग) फ़िल्म इंडस्ट्री में रहते हुए भी वहाँ के तौर-तरीकों से नावाकिफ़ थे। (घ) दरअसल इस फ़िल्म की संवेदना किसी दो से चार बनाने के गणित जानने वालों की समझ से परे थी। (ङ) शैलेंद्र राजकपूर की इस यराना दोस्ती से परिचित तो थे।

उत्तरइन वाक्यों में ‘से’ का प्रयोग भिन्न-भिन्न अर्थों में हुआ है –(क) हैसियत से → रूप/भूमिका के अर्थ में (करण/रीति)।(ख) दसों दिशाओं से → स्थान/दिशा (अपादान) के अर्थ में।(ग) तौर-तरीकों से नावाकिफ़ → विषय/संबंध के अर्थ में।(घ) समझ से परे → तुलना/सीमा के अर्थ में।(ङ) यराना दोस्ती से परिचित → विषय/संबंध के अर्थ में। इस प्रकार एक ही ‘से’ वाक्य के अनुसार अलग-अलग कारक-अर्थ देता है।

2. इस पाठ में आए निम्नलिखित वाक्यों की संरचना पर ध्यान दीजिए— (क) ‘तीसरी कसम’ फ़िल्म नहीं, सेल्युलाइड पर लिखी कविता थी। (ख) उन्होंने ऐसी फ़िल्म बनाई थी जिसे सच्चा कवि-हृदय ही बना सकता था। (ग) फ़िल्म कब आई, कब चली गई, मालूम ही नहीं पड़ा। (घ) ख़ालिस देहाती भुच्च गाड़ीवान जो सिर्फ़ दिल की ज़ुबान समझता है, दिमाग की नहीं।

उत्तरइन वाक्यों में सरल, संयुक्त एवं मिश्र संरचनाएँ देखी जा सकती हैं –(क) यह एक रचना-कौशलयुक्त वाक्य है जिसमें ‘नहीं…बल्कि’ का भाव निहित है (खंडन के बाद पुष्टि)।(ख) मिश्र वाक्य – इसमें मुख्य उपवाक्य के साथ ‘जिसे…ही’ वाला विशेषण-उपवाक्य जुड़ा है।(ग) संयुक्त वाक्य – तीन उपवाक्य अल्पविराम से जुड़कर एक भाव व्यक्त करते हैं।(घ) मिश्र वाक्य – ‘जो…समझता है’ विशेषण-उपवाक्य ‘गाड़ीवान’ की विशेषता बताता है। (विद्यार्थी इसी प्रकार की संरचना के वाक्य स्वयं बनाएँ।)

3. पाठ में आए निम्नलिखित मुहावरों से वाक्य बनाइए— चेहरा मुरझाना, चक्कर खा जाना, दो से चार बनाना, आँखों से बोलना।

उत्तरचेहरा मुरझाना (उदास हो जाना) – परीक्षा में कम अंक देखकर रवि का चेहरा मुरझा गया।चक्कर खा जाना (हैरान/भ्रमित हो जाना) – कठिन सवाल देखकर बड़े-बड़े विद्वान भी चक्कर खा जाते हैं।दो से चार बनाना (मुनाफ़ा कमाना) – व्यापारी हर सौदे में दो से चार बनाने की ताक में रहता है।आँखों से बोलना (भावों को आँखों से व्यक्त करना) – अच्छे कलाकार शब्दों के बिना ही आँखों से बोल लेते हैं।

4. निम्नलिखित शब्दों के हिंदी पर्याय दीजिए— (क) शिद्दत (ख) यराना (ग) बमुश्किल (घ) ख़ालिस (ङ) नावाकिफ़ (च) यकीन (छ) हावी (ज) रेशा।

उत्तर(क) शिद्दत – तीव्रता / प्रबलता(ख) यराना – दोस्ताना / मित्रता(ग) बमुश्किल – बहुत कठिनाई से(घ) ख़ालिस – शुद्ध / विशुद्ध(ङ) नावाकिफ़ – अनजान / अपरिचित(च) यकीन – विश्वास / भरोसा(छ) हावी – प्रभावी / दबदबा रखने वाला(ज) रेशा – तंतु / सूक्ष्म धागा (बारीकी)

5. निम्नलिखित का संधि-विच्छेद कीजिए— (क) चित्रांकन (ख) सर्वोत्कृष्ट (ग) चरमोत्कर्ष (घ) रूपांतरण (ङ) घनानंद।

उत्तर(क) चित्रांकन = चित्र + अंकन(ख) सर्वोत्कृष्ट = सर्व + उत्कृष्ट(ग) चरमोत्कर्ष = चरम + उत्कर्ष(घ) रूपांतरण = रूप + अंतरण(ङ) घनानंद = घन + आनंद

6. निम्नलिखित का समास-विग्रह कीजिए और समास का नाम भी लिखिए— (क) कला-मर्मज्ञ (ख) लोकप्रिय (ग) राष्ट्रपति।

उत्तर(क) कला-मर्मज्ञ = कला का मर्मज्ञ – तत्पुरुष समास।(ख) लोकप्रिय = लोक में प्रिय – तत्पुरुष (अधिकरण तत्पुरुष) समास।(ग) राष्ट्रपति = राष्ट्र का पति (स्वामी) – तत्पुरुष (संबंध तत्पुरुष) समास।

योग्यता विस्तार

1. ‘तीसरी कसम’ फ़िल्म फणीश्वरनाथ रेणु की कहानी ‘मारे गए गुलफ़ाम (तीसरी कसम)’ पर आधारित है। विद्यार्थी इस मूल कहानी को खोजकर पढ़ें और जानकारी एकत्र करें।

2. समाचार-पत्रों में दी जाने वाली तीन फ़िल्मों की समीक्षा पढ़िए तथा ‘तीसरी कसम’ फ़िल्म देखकर उसकी समीक्षा स्वयं लिखने का प्रयास कीजिए। (यह विद्यार्थी का स्वयं करने का कार्य है।)

परियोजना कार्य

1. ‘जो बात पहले की फ़िल्मों में थी, वह अब कहाँ’ – वर्तमान दौर की फ़िल्मों और पहले की फ़िल्मों में समानता और अंतर पर कक्षा में चर्चा कीजिए। (समूह-गतिविधि)

2. ‘तीसरी कसम’ जैसी अन्य फ़िल्में भी हैं जो किसी साहित्यिक रचना पर बनी हैं। नीचे दिए नमूने के अनुसार ऐसी फ़िल्मों की सूची तैयार कीजिए—

क्र.सं.फ़िल्म का नामसाहित्यिक रचनाभाषारचनाकार
1.देवदासदेवदासबंगलाशरतचंद्र
2.गोदानगोदानहिंदीप्रेमचंद
3.गाइडThe Guideअंग्रेज़ीआर.के. नारायण
4.उमराव जानउमराव जान अदाउर्दूमिर्ज़ा हादी रुस्वा

(विद्यार्थी इस सूची को और भी फ़िल्मों से बढ़ा सकते हैं।)

3. लोकगीत हमें अपनी संस्कृति से जोड़ते हैं। अपने क्षेत्र के दो-तीन प्रचलित लोकगीतों को एकत्र कर परियोजना कॉपी पर लिखिए। (यह विद्यार्थी का स्वयं करने का कार्य है।)

अतिरिक्त प्रश्न

लघु उत्तरीय प्रश्न (30–40 शब्द)

1. ‘तीसरी कसम’ किस कहानी पर आधारित है और इसके कहानीकार कौन हैं?

उत्तर‘तीसरी कसम’ फ़िल्म फणीश्वरनाथ रेणु की प्रसिद्ध कहानी ‘मारे गए गुलफ़ाम उर्फ़ तीसरी कसम’ पर आधारित है। इस फ़िल्म की पटकथा भी स्वयं रेणु ने तैयार की थी, जिससे मूल कहानी की हर बारीकी फ़िल्म में उतर सकी।

2. शैलेंद्र को राजकपूर ने केवल एक रुपया पारिश्रमिक क्यों लिया?

उत्तरशैलेंद्र राजकपूर के अनन्य मित्र थे। मित्रता निभाते हुए और इस सार्थक फ़िल्म के प्रति समर्पण दिखाते हुए राजकपूर ने मात्र एक रुपया प्रतीकात्मक पारिश्रमिक लेकर पूरी तन्मयता से अभिनय किया, बिना किसी आर्थिक अपेक्षा के।

3. ‘तीसरी कसम’ शैलेंद्र के जीवन में किस दृष्टि से विशेष महत्त्व रखती है?

उत्तर‘तीसरी कसम’ शैलेंद्र के जीवन की पहली और अंतिम फ़िल्म थी। यही फ़िल्म उनकी कवि-दृष्टि और संवेदनशीलता का सर्वश्रेष्ठ प्रमाण है, जिसने अनेक पुरस्कार जीते और हिंदी सिनेमा में मील का पत्थर सिद्ध हुई।

4. राजकपूर ने एक साथ कौन-सी चार फ़िल्मों के निर्माण की घोषणा की थी?

उत्तर‘संगम’ की सफलता के बाद राजकपूर ने एक साथ चार फ़िल्मों के निर्माण की घोषणा की थी – ‘मेरा नाम जोकर’, ‘अजंता’, ‘मैं और मेरा दोस्त’ तथा ‘सत्यम् शिवम् सुंदरम्’।

5. हीरामन और हीराबाई के बीच के संवाद को लेखक ने किस प्रकार सराहा है?

उत्तरलेखक के अनुसार कजरी नदी के किनारे बैठा हीरामन जब गीत गाते हुए हीराबाई से पूछता है – ‘मन समझती हैं न आप?’, तब हीराबाई ज़ुबान से नहीं, आँखों से बोलती है। दुनिया-भर के शब्द भी उस भाषा को अभिव्यक्ति नहीं दे सकते – यही फ़िल्म की सूक्ष्म संवेदना है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (100–120 शब्द)

6. ‘तीसरी कसम’ की सफलता के बावजूद इसे आज भी क्यों याद किया जाता है? पाठ के आधार पर स्पष्ट कीजिए।

उत्तर‘तीसरी कसम’ एक यादगार फ़िल्म होने के बावजूद आज इसलिए भी याद की जाती है क्योंकि इसके निर्माण ने यह उजागर कर दिया कि हिंदी फ़िल्म-जगत में एक सार्थक और उद्देश्यपूर्ण फ़िल्म बनाना कितना कठिन और जोखिम भरा काम है।इसने साहित्यिक कृति के साथ शत-प्रतिशत न्याय किया, इसमें लोक-तत्त्व और मानवीय करुणा भरपूर थी, और इसने दुख को जीवन-सापेक्ष, सहज रूप में प्रस्तुत किया।राजकपूर का सर्वोत्कृष्ट अभिनय, वहीदा रहमान का सहज अभिनय, शंकर-जयकिशन का संगीत और शैलेंद्र की संवेदनशील दृष्टि – इन सबने मिलकर इसे कालजयी बना दिया। यह केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि एक श्रेष्ठ कला-कृति है, इसीलिए इसे आज भी सम्मान से याद किया जाता है।

7. इस पाठ के आधार पर शैलेंद्र के व्यक्तित्व एवं कला-दृष्टि की विशेषताओं का वर्णन कीजिए।

उत्तरशैलेंद्र एक आदर्शवादी, भावुक और संवेदनशील कवि-हृदय व्यक्ति थे। वे धन और यश की लिप्सा से कोसों दूर थे और आत्म-संतुष्टि को सबसे बड़ा सुख मानते थे।उनकी कला-दृष्टि अत्यंत ऊँची थी – वे मानते थे कि कलाकार को दर्शकों की रुचि की आड़ में उथलापन नहीं परोसना चाहिए, बल्कि उनकी रुचि का परिष्कार करना चाहिए। उनके गीत भाव-प्रवण, सरल और जन-सामान्य से जुड़े हुए थे, दुरूह नहीं।वे लोक-तत्त्व, करुणा और जूझने के संदेश को महत्त्व देते थे। व्यावसायिक दबाव में झुकने के बजाय उन्होंने ‘तीसरी कसम’ जैसी सार्थक फ़िल्म बनाई। इस प्रकार वे सिद्धांतवादी, स्वाभिमानी और सच्चे कलाकार थे, जिनके जीवन और कला में पूरी एकरूपता थी।

बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQ)

1. ‘तीसरी कसम के शिल्पकार शैलेंद्र’ पाठ के लेखक कौन हैं?

(क) फणीश्वरनाथ रेणु

(ख) प्रहलाद अग्रवाल

(ग) शैलेंद्र

(घ) राजकपूर

उत्तर(ख) प्रहलाद अग्रवाल।

2. शैलेंद्र ने अपने जीवन में कुल कितनी फ़िल्में बनाईं?

(क) दो

(ख) चार

(ग) एक

(घ) तीन

उत्तर(ग) एक।

3. ‘तीसरी कसम’ फ़िल्म में राजकपूर ने किस पात्र का अभिनय किया?

(क) हीराबाई

(ख) गुलफ़ाम

(ग) हीरामन

(घ) गाड़ीवान महुआ

उत्तर(ग) हीरामन।

4. ‘तीसरी कसम’ फ़िल्म किस कहानी पर आधारित है?

(क) मारे गए गुलफ़ाम

(ख) पंच परमेश्वर

(ग) ईदगाह

(घ) मैला आँचल

उत्तर(क) मारे गए गुलफ़ाम।

5. फ़िल्म की नायिका (हीराबाई) की भूमिका किसने निभाई?

(क) नरगिस

(ख) वहीदा रहमान

(ग) मीना कुमारी

(घ) मधुबाला

उत्तर(ख) वहीदा रहमान।

6. राजकपूर ने ‘तीसरी कसम’ के लिए कितना पारिश्रमिक लिया?

(क) कुछ नहीं

(ख) पूरा पारिश्रमिक

(ग) मात्र एक रुपया (एडवांस)

(घ) आधा पारिश्रमिक

उत्तर(ग) मात्र एक रुपया (एडवांस)।

7. लेखक ने ‘तीसरी कसम’ को क्या कहा है?

(क) सेल्युलाइड पर लिखी कविता

(ख) व्यावसायिक फ़िल्म

(ग) साधारण मनोरंजन

(घ) असफल प्रयोग

उत्तर(क) सेल्युलाइड पर लिखी कविता।

8. शैलेंद्र को मुख्यतः धन और यश की अपेक्षा किसकी अभिलाषा थी?

(क) प्रसिद्धि की

(ख) सत्ता की

(ग) आत्म-संतुष्टि की

(घ) पुरस्कारों की

उत्तर(ग) आत्म-संतुष्टि की।

9. ‘श्री 420’ के गीत की पंक्ति ‘रातें दसों दिशाओं से…’ पर किसने आपत्ति की थी?

(क) राजकपूर

(ख) संगीतकार जयकिशन

(ग) मुकेश

(घ) शंकर

उत्तर(ख) संगीतकार जयकिशन।

10. लेखक के अनुसार शैलेंद्र को मात्र गीतकार नहीं, बल्कि क्या कहा जाना चाहिए?

(क) निर्देशक

(ख) अभिनेता

(ग) कवि

(घ) समीक्षक

उत्तर(ग) कवि।
उत्तर-कुंजी (MCQ): 1–(ख), 2–(ग), 3–(ग), 4–(क), 5–(ख), 6–(ग), 7–(क), 8–(ग), 9–(ख), 10–(ग)।

अभिकथन-कारण (Assertion–Reason)

निर्देश: नीचे अभिकथन (A) और कारण (R) दिए गए हैं। सही विकल्प चुनिए—
(क) A और R दोनों सही, R, A की सही व्याख्या है। (ख) A और R दोनों सही, पर R, A की सही व्याख्या नहीं। (ग) A सही, R गलत। (घ) A गलत, R सही।

1. अभिकथन (A): ‘तीसरी कसम’ शैलेंद्र के जीवन की पहली और अंतिम फ़िल्म थी।

कारण (R): शैलेंद्र मूलतः एक गीतकार और कवि थे और उन्होंने केवल यही एक फ़िल्म बनाई।

उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है।

2. अभिकथन (A): ‘तीसरी कसम’ को खरीदने वाला वितरक आसानी से नहीं मिला।

कारण (R): फ़िल्म में राजकपूर और वहीदा रहमान जैसे सितारे और शंकर-जयकिशन का लोकप्रिय संगीत नहीं था।

उत्तर(ग) A सही है, पर R गलत है – फ़िल्म में ये सितारे और संगीत थे; वितरक न मिलने का कारण इसकी गहरी संवेदना का व्यावसायिक समझ से परे होना था।

3. अभिकथन (A): राजकपूर ने ‘तीसरी कसम’ में अभिनय नहीं किया, बल्कि वह स्वयं हीरामन में ढल गया।

कारण (R): राजकपूर एक संवेदनशील और सशक्त कलाकार थे जिन्हें समीक्षक ‘आँखों से बात करने वाला’ मानते थे।

उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है।

4. अभिकथन (A): शैलेंद्र ने दर्शकों की रुचि की आड़ में उथलापन परोसना उचित नहीं माना।

कारण (R): वे मानते थे कि कलाकार का कर्तव्य उपभोक्ता की रुचियों का परिष्कार करना है।

उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है।

5. अभिकथन (A): शैलेंद्र को अपार संपत्ति और यश की प्रबल कामना थी।

कारण (R): वे एक आदर्शवादी और भावुक कवि थे जिन्हें आत्म-संतुष्टि के सुख की अभिलाषा थी।

उत्तर(घ) A गलत है, R सही है – शैलेंद्र को धन-यश की प्रबल कामना नहीं, बल्कि आत्म-संतुष्टि की अभिलाषा थी।
उत्तर-कुंजी (A–R): 1–(क), 2–(ग), 3–(क), 4–(क), 5–(घ)।

परीक्षा-युक्तियाँ एवं सामान्य गलतियाँ

परीक्षा-युक्तियाँ

  • लेखक (प्रहलाद अग्रवाल), विधा (व्यक्ति-चित्र), फ़िल्म (तीसरी कसम), मूल कहानी (मारे गए गुलफ़ाम – रेणु) और पात्र (हीरामन = राजकपूर, हीराबाई = वहीदा रहमान) तथ्य कंठस्थ रखें।
  • ‘सेल्युलाइड पर लिखी कविता’, ‘आत्म-संतुष्टि’, ‘रुचि का परिष्कार’ और ‘शत-प्रतिशत न्याय’ जैसे मूल वाक्यांश उत्तर में अवश्य प्रयोग करें – ये मूल्यवर्धन करते हैं।
  • आशय-स्पष्टीकरण में पहले सरल भाषा में अर्थ, फिर एक पंक्ति में संदर्भगत विस्तार लिखें।
  • 25–30 तथा 50–60 शब्दों की शब्द-सीमा का ध्यान रखें; अनावश्यक विस्तार से बचें।

सामान्य गलतियाँ

  • शैलेंद्र को निर्देशक/अभिनेता लिख देना – वे गीतकार-कवि एवं इस फ़िल्म के निर्माता थे।
  • यह लिख देना कि शैलेंद्र ने अनेक फ़िल्में बनाईं – उन्होंने केवल एक फ़िल्म बनाई।
  • हीरामन और हीराबाई के पात्र-अभिनेता आपस में गड्ड-मड्ड कर देना।
  • आशय लिखते समय केवल वाक्य दोहरा देना, अर्थ स्पष्ट न करना।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

‘तीसरी कसम के शिल्पकार शैलेंद्र’ पाठ के लेखक कौन हैं?

इस पाठ के लेखक प्रहलाद अग्रवाल हैं, जो फ़िल्म-समीक्षा एवं फ़िल्म-संबंधी लेखन के लिए प्रसिद्ध हैं।

‘तीसरी कसम’ फ़िल्म किस कहानी पर आधारित है?

यह फ़िल्म फणीश्वरनाथ रेणु की कहानी ‘मारे गए गुलफ़ाम उर्फ़ तीसरी कसम’ पर आधारित है, जिसकी पटकथा भी रेणु ने स्वयं तैयार की थी।

‘तीसरी कसम’ को ‘सेल्युलाइड पर लिखी कविता’ क्यों कहा गया है?

क्योंकि इस फ़िल्म ने रेणु की मार्मिक कहानी को काव्यात्मक संवेदनशीलता और सूक्ष्मता के साथ परदे पर उतारा, जिससे वह एक कविता-सी अनुभूति देती है।

प्रश्न NCERT स्पर्श (भाग 2) पुस्तक से ज्यों-के-त्यों लिए गए हैं; उत्तर ClearStudy द्वारा मौलिक रूप से तैयार एवं जाँचे गए हैं।

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