NCERT Solutions for Class 10 Hindi (Sparsh 2) अध्याय 13: पतझर में टूटी पत्तियाँ – प्रश्न-उत्तर, सार एवं व्याख्या (NCERT 2026–27)

यह पृष्ठ कक्षा 10 हिंदी की पुस्तक स्पर्श (भाग 2) के अध्याय 13 ‘पतझर में टूटी पत्तियाँ’ (लेखक – रवींद्र केलेकर) का पूरा समाधान देता है। इसमें दो प्रसंग हैं – (I) गिन्नी का सोना और (II) झेन की देन। यहाँ पाठ का सार, शब्दार्थ, आशय-स्पष्टीकरण, सभी प्रश्न-अभ्यास के उत्तर, अतिरिक्त प्रश्न, MCQ तथा अभिकथन-कारण दिए गए हैं।

कक्षा: 10 विषय: हिंदी पुस्तक: स्पर्श (भाग 2) अध्याय: 13 लेखक: रवींद्र केलेकर विधा: गद्य (प्रसंग/निबंध) सत्र: 2026–27

लेखक परिचय – रवींद्र केलेकर

रवींद्र केलेकर का जन्म 7 मार्च 1925 को कोंकण क्षेत्र में हुआ था। विद्यार्थी जीवन से ही वे गोवा-मुक्ति आंदोलन में सक्रिय रूप से जुड़ गए थे। गांधीवादी चिंतक के रूप में विख्यात केलेकर ने अपने लेखन में जन-जीवन के विविध पक्षों, मान्यताओं और व्यक्तिगत विचारों को देश और समाज के परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत किया। कोंकणी और मराठी के शीर्षस्थ लेखक एवं पत्रकार केलेकर की कोंकणी में पच्चीस, मराठी में तीन तथा हिंदी और गुजराती में भी कुछ पुस्तकें प्रकाशित हुईं। उन्होंने काका कालेलकर की अनेक पुस्तकों का संपादन एवं अनुवाद भी किया। गोवा कला अकादमी के साहित्य पुरस्कार सहित अनेक सम्मानों से सम्मानित केलेकर की प्रमुख कृतियाँ हैं – उजवाडाचे सूर, समिधा, सांगली (कोंकणी) तथा हिंदी में पतझर में टूटी पत्तियाँ। उनका निधन सन् 2010 में हुआ।

पाठ का सार

‘पतझर में टूटी पत्तियाँ’ में रवींद्र केलेकर ने थोड़े शब्दों में गहरी बात कहने वाले दो प्रसंग प्रस्तुत किए हैं, जो पाठक को जागरूक और सक्रिय नागरिक बनने की प्रेरणा देते हैं।

(I) गिन्नी का सोना – लेखक बताते हैं कि शुद्ध सोना अलग होता है और गिन्नी का सोना अलग। गिन्नी के सोने में थोड़ा-सा ताँबा मिला होता है, इसलिए वह अधिक चमकता और मजबूत होता है; इसी से प्रायः गहने बनाए जाते हैं। इसी प्रकार शुद्ध आदर्श शुद्ध सोने जैसे होते हैं। कुछ लोग उनमें व्यावहारिकता का थोड़ा-सा ताँबा मिलाकर उन्हें ‘प्रैक्टिकल’ बना देते हैं और ‘प्रैक्टिकल आइडियालिस्ट’ कहलाते हैं। लेखक चेताते हैं कि जब व्यावहारिकता का बखान होने लगता है, तब जीवन से आदर्श धीरे-धीरे पीछे हटने लगते हैं और सोने के बजाय ताँबा ही आगे आ जाता है। गांधीजी ‘प्रैक्टिकल आइडियालिस्ट’ अवश्य थे, पर वे आदर्शों को व्यावहारिकता के स्तर पर नहीं उतारते थे, बल्कि व्यावहारिकता को आदर्शों के स्तर पर चढ़ाते थे – वे सोने में ताँबा नहीं, बल्कि ताँबे में सोना मिलाकर उसका मूल्य बढ़ाते थे। इसीलिए उनके जीवन में सोना (आदर्श) ही सदा आगे रहा। लेखक का निष्कर्ष है कि समाज को शाश्वत मूल्य आदर्शवादी लोगों ने ही दिए हैं; व्यवहारवादी तो समाज को गिराते ही रहे हैं।

(II) झेन की देन – जापान-यात्रा में लेखक के एक मित्र ने बताया कि वहाँ अस्सी प्रतिशत लोग मनोरोग से ग्रस्त हैं, क्योंकि जीवन की रफ्तार बहुत बढ़ गई है – लोग चलते नहीं, दौड़ते हैं; बोलते नहीं, बकते हैं। अमेरिका से प्रतिस्पर्धा में एक महीने का काम एक दिन में पूरा करने की होड़ ने दिमाग पर ‘स्पीड’ का इंजन लगा दिया, जिससे तनाव बढ़ता है और इंजन टूट जाता है। शाम को मित्र लेखक को ‘टी-सेरेमनी’ (चा-नो-यू) में ले गए। एक शांत पर्णकुटी में ‘चाजीन’ ने अत्यंत गरिमापूर्ण ढंग से चाय बनाकर पिलाई। वहाँ तीन से अधिक लोगों को प्रवेश नहीं दिया जाता और प्याले में दो घूँट से अधिक चाय नहीं होती। डेढ़ घंटे तक एक-एक बूँद चाय पीते हुए लेखक का मन इतना शांत हो गया कि उसके दिमाग की रफ्तार धीरे-धीरे धीमी पड़कर बिलकुल बंद हो गई। उसे लगा मानो वह अनंतकाल में जी रहा हो। तब उसे अनुभव हुआ कि हम या तो भूतकाल में जीते हैं या भविष्यकाल में, जबकि सत्य केवल वर्तमान क्षण है और उसी में जीना चाहिए। ‘जीना किसे कहते हैं’ – यह झेन परंपरा की बड़ी देन जापानियों को मिली है।

मूलभाव / प्रतिपाद्य

दोनों प्रसंग जीवन-मूल्यों से जुड़े हैं। पहला प्रसंग सिखाता है कि व्यावहारिकता को आदर्शों से ऊँचा न मानें; सच्चा नेतृत्व वही है जो व्यावहारिकता को आदर्श के स्तर तक उठाए, जैसा गांधीजी ने किया। दूसरा प्रसंग सिखाता है कि भूत और भविष्य की चिंता में डूबे रहने के बजाय वर्तमान क्षण में पूरी एकाग्रता से जीना ही सच्चा जीवन है – यही मानसिक शांति का रहस्य है।

कठिन शब्द-अर्थ

शब्दअर्थ
व्यावहारिकतासमय और अवसर देखकर कार्य करने की सूझ
प्रैक्टिकल आइडियालिस्टव्यावहारिक आदर्शवादी
बखानवर्णन करना, बयान करना
सूझ-बूझकाम करने की समझ
स्तरश्रेणी; (के स्तर) के बराबर
सजगसचेत, सावधान
शाश्वतजो सदैव एक-सा रहे, जो बदला न जा सके
शुद्ध सोना24 कैरट का (बिना मिलावट का) सोना
गिन्नी का सोना22 कैरट (सोने में ताँबा मिला हुआ) सोना, जिससे गहने बनाए जाते हैं
मानसिकमस्तिष्क संबंधी, दिमागी
मनोरुग्णतनाव के कारण मन से अस्वस्थ
प्रतिस्पर्धाहोड़
स्पीडगति
टी-सेरेमनीजापान में चाय पीने का विशेष आयोजन
चा-नो-यूजापानी में टी-सेरेमनी का नाम
दफ़्तीलकड़ी की खोखली सरकने वाली दीवार जिस पर चित्रकारी होती है
पर्णकुटीपत्तों से बनी कुटिया
बेढब-साबेडौल-सा
चाजीनजापानी विधि से चाय पिलाने वाला
गरिमापूर्णसलीके से
भंगिमामुद्रा
जयजयवंतीएक राग का नाम
खदबदानाउबलना
उलझनअसमंजस की स्थिति
अनंतकालवह काल जिसका अंत न हो
सन्नाटाखामोशी
मिथ्याभ्रम, झूठ

पाठ्यपुस्तक के प्रश्न-अभ्यास के उत्तर

मौखिक – निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर एक-दो पंक्तियों में दीजिए

1. शुद्ध सोना और गिन्नी का सोना अलग क्यों होता है?

उत्तरशुद्ध सोना 24 कैरट का होता है, जिसमें कोई मिलावट नहीं होती। गिन्नी के सोने में थोड़ा-सा ताँबा मिला होता है, इसलिए वह अधिक चमकता और मजबूत होता है – इसी कारण दोनों अलग होते हैं।

2. प्रैक्टिकल आइडियालिस्ट किसे कहते हैं?

उत्तरजो लोग अपने आदर्शों में व्यावहारिकता का थोड़ा-सा पुट मिलाकर उन्हें व्यवहार में चलाकर दिखाते हैं, उन्हें ‘प्रैक्टिकल आइडियालिस्ट’ (व्यावहारिक आदर्शवादी) कहते हैं।

3. पाठ के संदर्भ में शुद्ध आदर्श क्या है?

उत्तरपाठ के अनुसार शुद्ध आदर्श वे आदर्श हैं जो शुद्ध सोने के समान होते हैं – जिनमें व्यावहारिकता की कोई मिलावट नहीं होती और जो समाज को शाश्वत मूल्य प्रदान करते हैं।

4. लेखक ने जापानियों के दिमाग में ‘स्पीड’ का इंजन लगने की बात क्यों कही है?

उत्तरअमेरिका से प्रतिस्पर्धा के कारण जापानी एक महीने का काम एक दिन में पूरा करने लगे और उनके जीवन की रफ्तार बहुत बढ़ गई। यही दर्शाने के लिए लेखक ने कहा कि उनके दिमाग में ‘स्पीड’ का इंजन लग गया है, जिससे वह हजार गुना तेज दौड़ने लगा।

5. जापानी में चाय पीने की विधि को क्या कहते हैं?

उत्तरजापानी में चाय पीने की इस विधि (टी-सेरेमनी) को ‘चा-नो-यू’ कहते हैं।

6. जापान में जहाँ चाय पिलाई जाती है, उस स्थान की क्या विशेषता है?

उत्तरवह एक छह मंजिली इमारत की छत पर बनी सुंदर पर्णकुटी थी, जिसकी दीवारें दफ़्ती की और जमीन तातामी (चटाई) की थी। वहाँ का वातावरण इतना शांत था कि चायदानी के पानी का खदबदाना भी सुनाई देता था; वहाँ तीन से अधिक लोगों को प्रवेश नहीं दिया जाता।

लिखित (क) – निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर (25–30 शब्दों में) लिखिए

1. शुद्ध आदर्श की तुलना सोने से और व्यावहारिकता की तुलना ताँबे से क्यों की गई है?

उत्तरशुद्ध सोने की भाँति शुद्ध आदर्श बहुमूल्य पर कोमल होते हैं। जैसे ताँबा मिलाने से सोना मजबूत बनता है, वैसे ही व्यावहारिकता का थोड़ा पुट आदर्शों को व्यवहार में उतारने योग्य बना देता है – इसीलिए यह तुलना की गई है।

2. चाजीन ने कौन-सी क्रियाएँ गरिमापूर्ण ढंग से पूरी कीं?

उत्तरचाजीन ने उठकर झुककर अभिवादन किया, बैठने की जगह दिखाई, अँगीठी सुलगाई, उस पर चायदानी रखी, बगल के कमरे से बरतन लाकर तौलिए से पोंछे और बड़े सलीके से चाय बनाकर प्यालों में भरकर सामने रखी – ये सभी क्रियाएँ उसने गरिमापूर्ण ढंग से कीं।

3. ‘टी-सेरेमनी’ में कितने आदमियों को प्रवेश दिया जाता था और क्यों?

उत्तर‘टी-सेरेमनी’ में तीन से अधिक आदमियों को प्रवेश नहीं दिया जाता था, क्योंकि इस विधि में शांति मुख्य बात होती है। अधिक लोग होने पर शांति भंग हो जाती, इसलिए सीमित लोगों को ही प्रवेश मिलता था।

4. चाय पीने के बाद लेखक ने स्वयं में क्या परिवर्तन महसूस किया?

उत्तरचाय पीते-पीते लेखक के दिमाग की रफ्तार धीरे-धीरे धीमी होकर बिलकुल बंद हो गई। उसे लगा मानो वह अनंतकाल में जी रहा हो; भूत और भविष्य दोनों काल उसके मन से उड़ गए और केवल वर्तमान क्षण शेष रहा।

लिखित (ख) – निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर (50–60 शब्दों में) लिखिए

1. गांधीजी में नेतृत्व की अद्भुत क्षमता थी; उदाहरण सहित इस बात की पुष्टि कीजिए।

उत्तरगांधीजी ‘प्रैक्टिकल आइडियालिस्ट’ थे – वे व्यावहारिकता को पहचानते और उसका मूल्य जानते थे, इसीलिए अपने विलक्षण आदर्श चला सके।वे आदर्शों को व्यावहारिकता के स्तर पर उतारने के बजाय व्यावहारिकता को आदर्शों के स्तर तक ऊपर उठा देते थे। इसी कारण देश उनके पीछे चला और सोना (आदर्श) सदा आगे रहा – यही उनकी अद्भुत नेतृत्व-क्षमता का प्रमाण है।

2. आपके विचार से कौन-से ऐसे मूल्य हैं जो शाश्वत हैं? वर्तमान समय में इन मूल्यों की प्रासंगिकता स्पष्ट कीजिए।

उत्तरसत्य, अहिंसा, ईमानदारी, करुणा, परोपकार, त्याग और मानवता जैसे मूल्य शाश्वत हैं, क्योंकि ये समय के साथ बदलते नहीं।वर्तमान युग में स्वार्थ, प्रतिस्पर्धा और भौतिकता के बढ़ने से इन मूल्यों की प्रासंगिकता और भी अधिक है। ये मूल्य समाज में शांति, विश्वास और सद्भाव बनाए रखते हैं; इनके बिना उन्नति अधूरी और खोखली रह जाती है।

3. अपने जीवन की किसी ऐसी घटना का उल्लेख कीजिए जब– (1) शुद्ध आदर्श से आपको हानि-लाभ हुआ हो। (2) शुद्ध आदर्श में व्यावहारिकता का पुट देने से लाभ हुआ हो।

उत्तर (संभावित)(1) एक बार परीक्षा में मित्र ने नकल कराने को कहा, पर मैंने ईमानदारी (शुद्ध आदर्श) के कारण मना कर दिया। उस समय मित्र नाराज हुआ (हानि), किंतु बाद में सबने मेरी सच्चाई की प्रशंसा की (लाभ)।(2) ‘हमेशा सच बोलना चाहिए’ – इस आदर्श में व्यावहारिकता मिलाकर मैंने बीमार दादी से उनकी रिपोर्ट के बारे में कठोर सच न कहकर सांत्वना दी, जिससे उनका मनोबल बना रहा – यह व्यावहारिक आदर्श का लाभ था। (विद्यार्थी अपने अनुभव लिखें।)

4. ‘शुद्ध सोने में ताँबे की मिलावट या ताँबे में सोना’, गांधीजी के आदर्श और व्यवहार के संदर्भ में यह बात किस तरह झलकती है? स्पष्ट कीजिए।

उत्तरसाधारण व्यावहारिक लोग शुद्ध सोने (आदर्श) में ताँबा (व्यावहारिकता) मिलाते हैं, जिससे धीरे-धीरे आदर्श पीछे हट जाते हैं और व्यावहारिकता ही प्रधान हो जाती है।इसके विपरीत गांधीजी ताँबे में सोना मिलाते थे – अर्थात् व्यावहारिकता को आदर्शों के स्तर तक ऊपर उठाते थे, जिससे उनके जीवन में आदर्श सदा प्रधान रहे। यही उनके आदर्श और व्यवहार के संतुलन को दर्शाता है।

5. ‘गिरगिट’ कहानी में आपने समाज में व्याप्त अवसरानुसार अपने व्यवहार को पल-पल में बदल डालने की एक बानगी देखी। इस पाठ के अंश ‘गिन्नी का सोना’ के संदर्भ में स्पष्ट कीजिए कि ‘आदर्शवादिता’ और ‘व्यावहारिकता’ इनमें से जीवन में किसका महत्त्व है?

उत्तर‘गिरगिट’ में अवसर देखकर रंग बदलने वाली व्यावहारिकता दिखाई गई है, जो स्वार्थपूर्ण है। ‘गिन्नी का सोना’ के अनुसार जीवन में आदर्शवादिता का महत्त्व अधिक है।केवल लाभ-हानि देखने वाले व्यवहारवादी आगे तो बढ़ते हैं, पर ऊपर नहीं उठते; समाज को शाश्वत मूल्य तो आदर्शवादी लोगों ने ही दिए हैं। थोड़ी-सी व्यावहारिकता उपयोगी है, पर उसे आदर्शों पर हावी नहीं होने देना चाहिए।

6. लेखक के मित्र ने मानसिक रोग के क्या-क्या कारण बताए? आप इन कारणों से कहाँ तक सहमत हैं?

उत्तरमित्र ने बताया कि जीवन की रफ्तार बहुत बढ़ गई है – लोग चलते नहीं, दौड़ते हैं; बोलते नहीं, बकते हैं; अकेले में भी लगातार बड़बड़ाते रहते हैं। अमेरिका से प्रतिस्पर्धा में एक महीने का काम एक दिन में पूरा करने की होड़ ने दिमाग पर तनाव बढ़ाकर इंजन तोड़ दिया।मैं इन कारणों से पूर्णतः सहमत हूँ। अत्यधिक भागदौड़, अंधी प्रतिस्पर्धा और तनाव वास्तव में आज मानसिक रोगों के प्रमुख कारण हैं, इसलिए संतुलित एवं शांत जीवन ही उत्तम है।

7. लेखक के अनुसार सत्य केवल वर्तमान है, उसी में जीना चाहिए। लेखक ने ऐसा क्यों कहा होगा? स्पष्ट कीजिए।

उत्तरलेखक का मानना है कि हम या तो बीते दिनों की खट्टी-मीठी यादों में उलझे रहते हैं या भविष्य के रंगीन सपनों में। दोनों ही काल मिथ्या हैं – एक बीत चुका है, दूसरा अभी आया नहीं।हमारे सामने जो वर्तमान क्षण है, वही सत्य है; उसी में पूरी एकाग्रता से जीना ही वास्तविक जीवन है। भूत-भविष्य की चिंता तनाव बढ़ाती है, जबकि वर्तमान में जीने से मन शांत और सुखी रहता है – इसीलिए लेखक ने ऐसा कहा।

लिखित (ग) – निम्नलिखित के आशय स्पष्ट कीजिए

1. समाज के पास अगर शाश्वत मूल्यों जैसा कुछ है तो वह आदर्शवादी लोगों का ही दिया हुआ है।

आशयसत्य, अहिंसा, करुणा, त्याग जैसे जो स्थायी मूल्य समाज में विद्यमान हैं, वे आदर्शवादी महापुरुषों की देन हैं। व्यवहारवादी लोग केवल अपना लाभ देखते हैं और समाज को नीचे गिराते हैं, जबकि आदर्शवादी अपने त्याग और उच्च जीवन से समाज को ऊँचा उठाते एवं दिशा देते हैं।

2. जब व्यावहारिकता का बखान होने लगता है तब ‘प्रैक्टिकल आइडियालिस्टों’ के जीवन से आदर्श धीरे-धीरे पीछे हटने लगते हैं और उनकी व्यावहारिक सूझ-बूझ ही आगे आने लगती है।

आशयजब व्यक्ति अपनी व्यावहारिकता की प्रशंसा सुनने लगता है, तब वह आदर्शों की उपेक्षा करके लाभ-हानि वाली चतुराई को ही महत्त्व देने लगता है। धीरे-धीरे उसके जीवन से आदर्श पीछे हट जाते हैं और केवल व्यावहारिक स्वार्थ-बुद्धि शेष रह जाती है – अर्थात् सोना पीछे और ताँबा आगे आ जाता है।

3. हमारे जीवन की रफ्तार बढ़ गई है। यहाँ कोई चलता नहीं बल्कि दौड़ता है। कोई बोलता नहीं, बकता है। हम जब अकेले पड़ते हैं तब अपने आपसे लगातार बड़बड़ाते रहते हैं।

आशयआधुनिक जीवन में मनुष्य अत्यधिक व्यस्त और बेचैन हो गया है। प्रतिस्पर्धा के कारण उसके पास धैर्य नहीं रहा – वह हर काम जल्दबाजी और तनाव में करता है। मन की यही अशांति उसे अकेले में भी चैन नहीं लेने देती और वह बड़बड़ाता रहता है, जिससे मानसिक रोग बढ़ते हैं।

4. सभी क्रियाएँ इतनी गरिमापूर्ण ढंग से कीं कि उसकी हर भंगिमा से लगता था मानो जयजयवंती के सुर गूँज रहे हों।

आशयचाजीन चाय बनाने की हर क्रिया इतने सलीके, शांति और लय के साथ करता था कि उसकी प्रत्येक मुद्रा संगीतमय प्रतीत होती थी। जिस प्रकार जयजयवंती राग के सुर मन को शांति और आनंद देते हैं, उसी प्रकार चाजीन के सौंदर्यपूर्ण एवं गरिमामय हाव-भाव वातावरण को मधुर एवं शांत बना रहे थे।

भाषा-अध्ययन

1. नीचे दिए गए शब्दों का वाक्य में प्रयोग कीजिए– व्यावहारिकता, आदर्श, सूझबूझ, विलक्षण, शाश्वत।

उत्तरव्यावहारिकता– जीवन में आदर्शों के साथ थोड़ी व्यावहारिकता भी आवश्यक है।आदर्श– गांधीजी हमारे लिए महान आदर्श हैं।सूझबूझ– कठिन समय में अपनी सूझबूझ से उसने सबकी जान बचाई।विलक्षण– इस बालक की स्मरण-शक्ति विलक्षण है।शाश्वत– सत्य और अहिंसा शाश्वत मूल्य हैं।

2. ‘लाभ-हानि’ का विग्रह इस प्रकार होगा– लाभ और हानि। यहाँ द्वंद्व समास है। नीचे दिए गए द्वंद्व समास का विग्रह कीजिए– (क) माता-पिता (ख) पाप-पुण्य (ग) सुख-दुख (घ) रात-दिन (ङ) अन्न-जल (च) घर-बाहर (छ) देश-विदेश।

उत्तर(क) माता-पिता = माता और पिता(ख) पाप-पुण्य = पाप और पुण्य(ग) सुख-दुख = सुख और दुख(घ) रात-दिन = रात और दिन(ङ) अन्न-जल = अन्न और जल(च) घर-बाहर = घर और बाहर(छ) देश-विदेश = देश और विदेश

3. नीचे दिए गए विशेषण शब्दों से भाववाचक संज्ञा बनाइए– (क) सफल (ख) विलक्षण (ग) व्यावहारिक (घ) सजग (ङ) आदर्शवादी (च) शुद्ध।

उत्तर(क) सफल = सफलता(ख) विलक्षण = विलक्षणता(ग) व्यावहारिक = व्यावहारिकता(घ) सजग = सजगता(ङ) आदर्शवादी = आदर्शवादिता(च) शुद्ध = शुद्धता / शुद्धि

4. अनेकार्थी शब्द – नीचे दिए गए शब्दों के भिन्न-भिन्न अर्थ स्पष्ट करने के लिए उनका वाक्यों में प्रयोग कीजिए– उत्तर, कर, अंक, नग।

उत्तरउत्तर– (जवाब) उसने प्रश्न का सही उत्तर दिया। / (दिशा) कश्मीर भारत के उत्तर में है।कर– (हाथ) माँ ने बालक के सिर पर कर रखा। / (टैक्स) हमें समय पर कर चुकाना चाहिए।अंक– (गोद) माँ ने शिशु को अंक में ले लिया। / (नंबर) उसे परीक्षा में अच्छे अंक मिले।नग– (रत्न) अँगूठी में सुंदर नग जड़ा है। / (पर्वत) हिमालय एक ऊँचा नग है।

5. निम्नलिखित वाक्यों को संयुक्त वाक्य में बदलकर लिखिए– (क) अँगीठी सुलगाई। उस पर चायदानी रखी। (ख) चाय तैयार हुई। उसने वह प्यालों में भरी। (ग) बगल के कमरे से जाकर कुछ बरतन ले आया। तौलिए से बरतन साफ़ किए।

उत्तर(क) उसने अँगीठी सुलगाई और उस पर चायदानी रखी।(ख) चाय तैयार हुई और उसने वह प्यालों में भरी।(ग) वह बगल के कमरे से जाकर कुछ बरतन ले आया और तौलिए से उन्हें साफ़ किया।

6. निम्नलिखित वाक्यों से मिश्र वाक्य बनाइए– (क) चाय पीने की यह एक विधि है। जापानी में उसे चा-नो-यू कहते हैं। (ख) बाहर बेढब-सा एक मिट्टी का बरतन था। उसमें पानी भरा हुआ था। (ग) चाय तैयार हुई। उसने वह प्यालों में भरी। फिर वे प्याले हमारे सामने रख दिए।

उत्तर(क) चाय पीने की यह एक विधि है, जिसे जापानी में चा-नो-यू कहते हैं।(ख) बाहर बेढब-सा एक मिट्टी का बरतन था, जिसमें पानी भरा हुआ था।(ग) जब चाय तैयार हुई, तो उसने वह प्यालों में भरी और फिर वे प्याले हमारे सामने रख दिए।

योग्यता-विस्तार एवं परियोजना कार्य (गांधीजी पर आधारित पुस्तकें पढ़ना, ‘टी-सेरेमनी’ का शब्द-चित्र बनाना, चाय की पैदावार वाले स्थानों का मानचित्र तैयार करना) विद्यार्थी की अपनी रचनात्मक एवं व्यावहारिक गतिविधियाँ हैं, जिन्हें वे स्वयं कक्षा/परियोजना-पुस्तिका में करें।

अतिरिक्त प्रश्न

लघु उत्तरीय (30–40 शब्द)

1. गिन्नी के सोने से प्रायः क्या बनाया जाता है और क्यों?

उत्तरगिन्नी के सोने से प्रायः गहने बनाए जाते हैं। चूँकि उसमें थोड़ा ताँबा मिला होता है, इसलिए वह शुद्ध सोने की अपेक्षा अधिक चमकदार और मजबूत होता है, जिससे गहने टिकाऊ बनते हैं; इसी कारण औरतें अकसर इसी सोने के गहने बनवाती हैं।

2. गांधीजी आदर्शों को व्यावहारिकता के स्तर पर क्यों नहीं उतरने देते थे?

उत्तरगांधीजी जानते थे कि आदर्शों को व्यावहारिकता के स्तर पर उतारने से वे गिर जाते हैं और स्वार्थ हावी हो जाता है। इसलिए वे आदर्शों की रक्षा करते हुए व्यावहारिकता को ही आदर्शों के स्तर तक ऊपर उठाते थे, ताकि उनके जीवन में सदा आदर्श प्रधान रहें।

3. लेखक टी-सेरेमनी के आरंभ में दस-पंद्रह मिनट तक क्यों उलझन में पड़ा रहा?

उत्तरलेखक का मन तेज रफ्तार की आदत से भरा था; इतने शांत और धीमे वातावरण में अचानक आकर उसका दिमाग सहज नहीं हो पाया। यही कारण है कि आरंभ के दस-पंद्रह मिनट वह असमंजस और बेचैनी में रहा, फिर धीरे-धीरे उसका मन शांत होने लगा।

4. टी-सेरेमनी के स्थान का वातावरण कैसा था?

उत्तरवह एक छह मंजिली इमारत की छत पर बनी सुंदर पर्णकुटी थी। वहाँ इतनी शांति थी कि चायदानी के पानी का खदबदाना भी स्पष्ट सुनाई देता था। यह शांत, सादगीपूर्ण और गरिमामय वातावरण मन को तनावमुक्त कर देता था।

5. ‘पतझर में टूटी पत्तियाँ’ शीर्षक की सार्थकता बताइए।

उत्तरजैसे पतझर में पेड़ से टूटी पत्तियाँ अलग-अलग होकर भी अपना अस्तित्व रखती हैं, वैसे ही ये दोनों स्वतंत्र प्रसंग छोटे होते हुए भी जीवन का गहरा संदेश देते हैं। थोड़े शब्दों में बड़ी बात कहने के कारण यह शीर्षक पूर्णतः सार्थक है।

दीर्घ उत्तरीय (100–120 शब्द)

6. ‘गिन्नी का सोना’ प्रसंग के माध्यम से लेखक क्या संदेश देना चाहता है? स्पष्ट कीजिए।

उत्तरइस प्रसंग में लेखक सोने और ताँबे के रूपक से आदर्श और व्यावहारिकता का संबंध समझाता है। शुद्ध सोना आदर्श का तथा ताँबा व्यावहारिकता का प्रतीक है।लेखक का संदेश है कि व्यावहारिकता को आदर्शों पर हावी नहीं होने देना चाहिए। जब लोग व्यावहारिकता का बखान करने लगते हैं, तब आदर्श पीछे हट जाते हैं और स्वार्थ-बुद्धि आगे आ जाती है।गांधीजी की तरह व्यावहारिकता को आदर्शों के स्तर तक उठाना चाहिए, न कि आदर्शों को गिराना। समाज को शाश्वत मूल्य आदर्शवादी लोगों ने ही दिए हैं, इसलिए जीवन में आदर्शवादिता का महत्त्व अधिक है।

7. ‘झेन की देन’ प्रसंग से हमें जीवन जीने की कौन-सी कला मिलती है? विस्तार से लिखिए।

उत्तर‘झेन की देन’ हमें वर्तमान में जीने की कला सिखाता है। आज मनुष्य अत्यधिक भागदौड़ और प्रतिस्पर्धा के कारण तनावग्रस्त और मनोरोगी होता जा रहा है।जापान की टी-सेरेमनी (चा-नो-यू) पूर्ण शांति, एकाग्रता और धीरज का प्रतीक है। डेढ़ घंटे तक शांत वातावरण में एक-एक बूँद चाय पीते हुए लेखक का मन स्थिर हो गया।इससे यह शिक्षा मिलती है कि भूतकाल की यादों और भविष्य की चिंताओं में उलझे रहना व्यर्थ है; दोनों मिथ्या हैं। सत्य केवल वर्तमान क्षण है। पूरी एकाग्रता से वर्तमान में जीना ही सच्चा जीवन और मानसिक शांति का मार्ग है।

8. चाजीन के व्यवहार और टी-सेरेमनी की विधि का वर्णन कीजिए।

उत्तरटी-सेरेमनी एक शांत पर्णकुटी में होती थी, जहाँ हाथ-पाँव धोकर अंदर जाते थे। चाजीन झुककर अभिवादन करता और अत्यंत सलीके से बैठने की जगह दिखाता।वह अँगीठी सुलगाकर उस पर चायदानी रखता, बरतन लाकर तौलिए से पोंछता और गरिमापूर्ण ढंग से चाय बनाता। उसकी हर भंगिमा से जयजयवंती राग के सुर-से गूँजते प्रतीत होते थे।वहाँ तीन से अधिक लोगों को प्रवेश नहीं मिलता था और प्याले में दो घूँट से अधिक चाय नहीं होती थी। डेढ़ घंटे तक एक-एक बूँद चाय पीते हुए मन पूर्णतः शांत हो जाता था – यही इस विधि की विशेषता है।

अभ्यास MCQ

1. ‘पतझर में टूटी पत्तियाँ’ के लेखक कौन हैं?

(क) काका कालेलकर

(ख) रवींद्र केलेकर

(ग) महात्मा गांधी

(घ) गिरिराज किशोर

उत्तर(ख) रवींद्र केलेकर।

2. गिन्नी के सोने में क्या मिला होता है?

(क) चाँदी

(ख) लोहा

(ग) ताँबा

(घ) पीतल

उत्तर(ग) ताँबा।

3. पाठ में आदर्श का प्रतीक किसे बताया गया है?

(क) ताँबे को

(ख) शुद्ध सोने को

(ग) गिन्नी के सोने को

(घ) चाँदी को

उत्तर(ख) शुद्ध सोने को।

4. लेखक के अनुसार गांधीजी क्या करते थे?

(क) सोने में ताँबा मिलाते थे

(ख) ताँबे में सोना मिलाते थे

(ग) आदर्श छोड़ देते थे

(घ) केवल व्यावहारिकता को महत्त्व देते थे

उत्तर(ख) ताँबे में सोना मिलाते थे – अर्थात् व्यावहारिकता को आदर्शों के स्तर तक उठाते थे।

5. जापान में चाय पीने की विधि को क्या कहते हैं?

(क) टी-पार्टी

(ख) चा-नो-यू

(ग) चाजीन

(घ) झेन

उत्तर(ख) चा-नो-यू।

6. लेखक के मित्र के अनुसार जापान में लगभग कितने प्रतिशत लोग मनोरोगी हैं?

(क) साठ प्रतिशत

(ख) सत्तर प्रतिशत

(ग) अस्सी प्रतिशत

(घ) नब्बे प्रतिशत

उत्तर(ग) अस्सी प्रतिशत।

7. चाय पिलाने वाले को जापानी में क्या कहते हैं?

(क) चाजीन

(ख) चा-नो-यू

(ग) तातामी

(घ) दफ़्ती

उत्तर(क) चाजीन।

8. टी-सेरेमनी में अधिक से अधिक कितने लोगों को प्रवेश दिया जाता था?

(क) दो

(ख) तीन

(ग) पाँच

(घ) सात

उत्तर(ख) तीन – क्योंकि वहाँ शांति मुख्य बात होती है।

9. लेखक के अनुसार सत्य कौन-सा काल है?

(क) भूतकाल

(ख) भविष्यकाल

(ग) वर्तमानकाल

(घ) तीनों काल

उत्तर(ग) वर्तमानकाल – उसी में जीना चाहिए।

10. चाजीन की भंगिमाओं से किस राग के सुर गूँजते प्रतीत होते थे?

(क) भैरवी

(ख) मालकौंस

(ग) जयजयवंती

(घ) यमन

उत्तर(ग) जयजयवंती।
उत्तर-कुंजी: 1-ख, 2-ग, 3-ख, 4-ख, 5-ख, 6-ग, 7-क, 8-ख, 9-ग, 10-ग।

अभिकथन-कारण

नीचे अभिकथन (A) और कारण (R) दिए गए हैं। सही विकल्प चुनिए—
(क) A और R दोनों सही, R, A की सही व्याख्या है। (ख) A और R दोनों सही, पर R, A की सही व्याख्या नहीं। (ग) A सही, R गलत। (घ) A गलत, R सही।

1. अभिकथन (A): गिन्नी का सोना शुद्ध सोने से अधिक मजबूत होता है।

कारण (R): गिन्नी के सोने में थोड़ा-सा ताँबा मिला होता है।

उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है।

2. अभिकथन (A): गांधीजी आदर्शों को व्यावहारिकता के स्तर पर उतार देते थे।

कारण (R): वे व्यावहारिकता को आदर्शों के स्तर तक ऊपर चढ़ाते थे।

उत्तर(घ) A गलत है, R सही है – गांधीजी आदर्शों को नीचे नहीं उतारते थे, बल्कि व्यावहारिकता को आदर्शों के स्तर तक उठाते थे।

3. अभिकथन (A): जापान में लोग मानसिक रोगों से ग्रस्त हो रहे हैं।

कारण (R): वहाँ जीवन की रफ्तार बहुत बढ़ गई है और प्रतिस्पर्धा के कारण तनाव बढ़ गया है।

उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है।

4. अभिकथन (A): टी-सेरेमनी में तीन से अधिक लोगों को प्रवेश नहीं दिया जाता।

कारण (R): इस विधि में शांति सबसे मुख्य बात होती है।

उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है।

5. अभिकथन (A): लेखक के अनुसार हमें भूत और भविष्य में ही जीना चाहिए।

कारण (R): वर्तमान क्षण ही एकमात्र सत्य है।

उत्तर(घ) A गलत है, R सही है – लेखक के अनुसार भूत-भविष्य मिथ्या हैं; हमें वर्तमान में ही जीना चाहिए।
उत्तर-कुंजी: 1-क, 2-घ, 3-क, 4-क, 5-घ।

परीक्षा-युक्तियाँ एवं सामान्य गलतियाँ

परीक्षा-युक्तियाँ

  • सोना = आदर्श और ताँबा = व्यावहारिकता – यह रूपक याद रखें; आशय-प्रश्न इसी पर आधारित होते हैं।
  • गांधीजी की पंक्ति “ताँबे में सोना मिलाते थे” को उद्धरण के रूप में अवश्य लिखें।
  • ‘झेन की देन’ में ‘वर्तमान ही सत्य है’ तथा ‘चा-नो-यू / चाजीन’ जैसे शब्द उत्तर में लिखें।
  • दोनों प्रसंगों के अलग-अलग संदेश स्पष्ट रूप से बिंदुवार लिखें।

सामान्य गलतियाँ

  • लेखक को काका कालेलकर समझ लेना – लेखक रवींद्र केलेकर हैं।
  • गांधीजी को साधारण व्यवहारवादी मान लेना – वे आदर्शों को सर्वोपरि रखते थे।
  • ‘चा-नो-यू’ (विधि) और ‘चाजीन’ (चाय पिलाने वाला) में भ्रम करना।
  • आशय-प्रश्न में केवल पंक्ति दोहरा देना – भाव अपने शब्दों में समझाएँ।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

‘पतझर में टूटी पत्तियाँ’ के लेखक कौन हैं?

इस पाठ के लेखक रवींद्र केलेकर हैं, जो कोंकणी और मराठी के शीर्षस्थ लेखक एवं गांधीवादी चिंतक थे।

इस पाठ में कितने प्रसंग हैं और उनके नाम क्या हैं?

इस पाठ में दो प्रसंग हैं – (I) गिन्नी का सोना और (II) झेन की देन। दोनों जीवन-मूल्यों से जुड़े संक्षिप्त किंतु गहरे प्रसंग हैं।

‘झेन की देन’ से हमें क्या शिक्षा मिलती है?

इससे हमें वर्तमान में जीने की कला मिलती है। भूत-भविष्य की चिंता छोड़कर पूरी एकाग्रता से वर्तमान क्षण में जीना ही मानसिक शांति और सच्चे जीवन का मार्ग है।

प्रश्न NCERT स्पर्श पुस्तक से ज्यों-के-त्यों लिए गए हैं; उत्तर ClearStudy द्वारा मौलिक रूप से तैयार एवं जाँचे गए हैं।

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