NCERT Solutions for Class 10 Hindi (Sparsh 2) अध्याय 7: आत्मत्राण
यह पृष्ठ कक्षा 10 हिंदी की पुस्तक स्पर्श (भाग 2) के अध्याय 7 ‘आत्मत्राण’ (कवि – रवीन्द्रनाथ ठाकुर; हिंदी अनुवाद – आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी) का पूरा समाधान देता है – कविता का सार, भावार्थ, शब्दार्थ तथा सभी प्रश्न-अभ्यास के उत्तर।
कवि परिचय – रवीन्द्रनाथ ठाकुर
रवीन्द्रनाथ ठाकुर (टैगोर) का जन्म 6 मई 1861 को बंगाल के एक संपन्न परिवार में हुआ था। वे नोबेल पुरस्कार पाने वाले पहले भारतीय हैं। उनकी आरंभिक शिक्षा-दीक्षा घर पर ही हुई और छोटी आयु में ही स्वाध्याय से उन्होंने अनेक विषयों का ज्ञान प्राप्त कर लिया। उनकी रचनाओं में लोक-संस्कृति का स्वर प्रमुखता से मुखरित होता है और प्रकृति से उन्हें गहरा लगाव था। उन्होंने लगभग एक हज़ार कविताएँ और दो हज़ार गीत लिखे; उनके गीतों की अलग धारा ‘रवीन्द्र संगीत’ कहलाती है। उन्होंने ‘शांति निकेतन’ नामक शिक्षण-संस्था की स्थापना की। ‘गीतांजलि’ पर उन्हें नोबेल पुरस्कार मिला; नैवेद्य, पूरबी, बलाका, क्षणिका, चित्र, सांध्यगीत, काबुलीवाला तथा गोरा व घरे-बाइरे उनकी प्रमुख कृतियाँ हैं। प्रस्तुत कविता का बांग्ला से हिंदी अनुवाद आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने किया है।
कविता का सार
‘आत्मत्राण’ रवीन्द्रनाथ ठाकुर की एक भावपूर्ण प्रार्थना-कविता है, जो परंपरागत प्रार्थना-गीतों से भिन्न है। साधारणतः मनुष्य ईश्वर से यह प्रार्थना करता है कि वह उसे विपत्तियों, दुखों और संकटों से बचा ले। किंतु इस कविता में कवि ईश्वर से दुखों से मुक्ति नहीं माँगता; वह तो केवल इतना चाहता है कि विपत्ति आने पर उसके मन में भय न हो और वह उन विपत्तियों का साहसपूर्वक सामना कर सके।
कवि कहता है कि वह दुख-ताप से व्यथित अपने मन के लिए सांत्वना नहीं चाहता; वह तो यह सामर्थ्य माँगता है कि वह दुख पर सदा विजय पा सके। यदि कोई सहायक न मिले, तब भी उसका अपना बल और पौरुष न डगमगाए। संसार में यदि उसे हानि उठानी पड़े या वंचना (छल) मिले, तो भी उसका मन क्षय (निराशा/टूटन) को स्वीकार न करे।
वह ईश्वर से प्रतिदिन अपनी रक्षा करने की भी प्रार्थना नहीं करता; वह तो केवल इतनी शक्ति चाहता है कि वह स्वयं इस संसार-सागर को तैरकर पार कर सके। वह यह भी नहीं चाहता कि ईश्वर उसका भार हल्का करके उसे सांत्वना दे; वह तो निर्भय होकर अपना भार स्वयं वहन करने की क्षमता माँगता है।
सुख के दिनों में कवि नतमस्तक होकर ईश्वर के मुख (उपस्थिति) को क्षण-क्षण पहचानता रहना चाहता है, अर्थात् सुख में भी वह प्रभु को न भूले। और दुख की रात में, जिस दिन सारा संसार उसे धोखा दे जाए, उस दिन भी उसके मन में ईश्वर के प्रति तनिक भी संशय न रहे। इस प्रकार यह कविता आत्मविश्वास, आत्मनिर्भरता, निर्भयता और ईश्वर पर अटूट श्रद्धा का संदेश देती है – ‘आत्मत्राण’ अर्थात् अपने बल से स्वयं की रक्षा।
मूलभाव / भावार्थ
1. “विपदाओं से मुझे बचाओ, यह मेरी प्रार्थना नहीं…” – कवि ईश्वर से विपत्तियों से बचाने की याचना नहीं करता; वह तो केवल यह चाहता है कि विपत्ति में कभी भय न पाए, अर्थात् संकट का निडर होकर सामना करने की शक्ति माँगता है।
2. “दुख-ताप से व्यथित चित्त को न दो सांत्वना… दुख को मैं कर सकूँ सदा जय।” – कवि दुख से घबराए मन के लिए तसल्ली नहीं, बल्कि दुख पर सदा विजय पाने की सामर्थ्य चाहता है।
3. “कोई कहीं सहायक न मिले… तो भी मन में ना मानूँ क्षय।” – सहायक न मिलने पर भी उसका आत्मबल और पौरुष न डिगे; हानि या छल मिलने पर भी मन निराशा (क्षय) को स्वीकार न करे।
4. “मेरा त्राण करो अनुदिन तुम… तरने की हो शक्ति अनामय।” – कवि प्रतिदिन रक्षा की प्रार्थना नहीं करता; वह स्वयं भवसागर तैरकर पार करने की निरोग, सशक्त सामर्थ्य माँगता है।
5. “नत शिर होकर सुख के दिन में… दुख-रात्रि में… तुम पर करूँ नहीं कुछ संशय।” – सुख के समय कवि विनम्र होकर ईश्वर को क्षण-क्षण पहचानता रहे और दुख के समय, संसार के धोखा दे जाने पर भी ईश्वर पर तनिक संशय न करे।
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| आत्मत्राण | स्वयं अपनी रक्षा करना, आत्मबल से अपना बचाव |
| विपदा | विपत्ति, मुसीबत |
| करुणामय | दूसरों पर दया करने वाला (ईश्वर) |
| दुख-ताप | कष्ट की पीड़ा |
| व्यथित | दुखी, पीड़ित |
| चित्त | मन, हृदय |
| सांत्वना | ढाढ़स बँधाना, तसल्ली देना |
| सहायक | मददगार |
| बल | शक्ति, ताकत |
| पौरुष | पराक्रम, मर्दानगी |
| हानि | नुकसान, क्षति |
| वंचना | धोखा देना, छलना |
| क्षय | नाश, टूटन, निराशा |
| त्राण | भय-निवारण, बचाव, रक्षा, आश्रय |
| अनुदिन | प्रतिदिन, हर दिन |
| अनामय | रोग-रहित, स्वस्थ, निर्विकार |
| अनुनय | विनय, विनती |
| वहन करना | भार उठाना, ढोना |
| निर्भय | भयरहित, निडर |
| नत शिर | सिर झुकाकर, विनम्र होकर |
| दुख-रात्रि | दुख से भरी रात, संकट का समय |
| निखिल | संपूर्ण, समस्त संसार |
| संशय | संदेह, शक |
प्रश्न-अभ्यास के उत्तर
नीचे NCERT पुस्तक ‘स्पर्श (भाग 2)’ के प्रश्न-अभ्यास के सभी प्रश्न ज्यों-के-त्यों दिए गए हैं; उत्तर परीक्षा-उपयोगी शैली में मौलिक रूप से तैयार किए गए हैं।
(क) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए–
1. कवि किससे और क्या प्रार्थना कर रहा है?
2. ‘विपदाओं से मुझे बचाओ, यह मेरी प्रार्थना नहीं’–कवि इस पंक्ति के द्वारा क्या कहना चाहता है?
3. कवि सहायक के न मिलने पर क्या प्रार्थना करता है?
4. अंत में कवि क्या अनुनय करता है?
5. ‘आत्मत्राण’ शीर्षक की सार्थकता कविता के संदर्भ में स्पष्ट कीजिए।
6. अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए आप प्रार्थना के अतिरिक्त और क्या-क्या प्रयास करते हैं? लिखिए।
7. क्या कवि की यह प्रार्थना आपको अन्य प्रार्थना गीतों से अलग लगती है? यदि हाँ, तो कैसे?
(ख) निम्नलिखित अंशों का भाव स्पष्ट कीजिए–
1. नत शिर होकर सुख के दिन में
तव मुख पहचानूँ छिन-छिन में।
2. हानि उठानी पड़े जगत् में लाभ अगर वंचना रही
तो भी मन में ना मानूँ क्षय।
3. तरने की हो शक्ति अनामय
मेरा भार अगर लघु करके न दो सांत्वना नहीं सही।
अतिरिक्त प्रश्न
लघु उत्तरीय प्रश्न (30–40 शब्द)
1. कविता ‘आत्मत्राण’ का मूल भाव संक्षेप में लिखिए।
2. कवि करुणामय ईश्वर से सांत्वना के बदले क्या माँगता है?
3. इस कविता का अनुवाद किसने और किस भाषा से किया है?
4. कवि दुख की रात में ईश्वर से क्या अपेक्षा रखता है?
5. ‘तरने की हो शक्ति अनामय’ पंक्ति में कवि की कौन-सी भावना व्यक्त हुई है?
दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (100–120 शब्द)
6. ‘आत्मत्राण’ कविता किस प्रकार आत्मविश्वास और आत्मनिर्भरता का संदेश देती है? स्पष्ट कीजिए।
7. यह कविता परंपरागत प्रार्थना-गीतों से किस प्रकार भिन्न है? तर्क सहित लिखिए।
8. ‘आत्मत्राण’ कविता आज के विद्यार्थी-जीवन में किस प्रकार प्रेरणादायक है?
अभ्यास MCQ
1. ‘आत्मत्राण’ कविता के मूल रचयिता कौन हैं?
(क) हजारीप्रसाद द्विवेदी
(ख) रवीन्द्रनाथ ठाकुर
(ग) महादेवी वर्मा
(घ) सूर्यकांत त्रिपाठी निराला
2. इस कविता का हिंदी अनुवाद किसने किया है?
(क) आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी
(ख) महावीर प्रसाद द्विवेदी
(ग) रामधारी सिंह दिनकर
(घ) सुमित्रानंदन पंत
3. ‘आत्मत्राण’ का अर्थ है–
(क) आत्मा का त्याग
(ख) अपने बल से स्वयं की रक्षा
(ग) दूसरों से सहायता माँगना
(घ) ईश्वर की पूजा
4. कवि ईश्वर से विपत्ति में क्या नहीं चाहता?
(क) भय का अनुभव न हो
(ख) विपत्तियों से बचा लिया जाए
(ग) दुख पर विजय की शक्ति
(घ) आत्मबल बना रहे
5. ‘अनामय’ शब्द का अर्थ है–
(क) रोगी
(ख) रोग-रहित / स्वस्थ
(ग) दुखी
(घ) निर्धन
6. कवि दुख से व्यथित मन के लिए क्या नहीं चाहता?
(क) विजय
(ख) सांत्वना
(ग) शक्ति
(घ) आत्मबल
7. ‘वंचना’ शब्द का अर्थ है–
(क) सहायता
(ख) धोखा / छल
(ग) विजय
(घ) प्रशंसा
8. सुख के दिनों में कवि किस प्रकार रहना चाहता है?
(क) अहंकार से
(ख) नतमस्तक (विनम्र) होकर
(ग) उदासीन होकर
(घ) ईश्वर को भूलकर
9. रवीन्द्रनाथ ठाकुर को किस कृति के लिए नोबेल पुरस्कार मिला?
(क) गोरा
(ख) गीतांजलि
(ग) बलाका
(घ) काबुलीवाला
10. यह कविता अन्य प्रार्थना-गीतों से किस कारण भिन्न है?
(क) इसमें ईश्वर की निंदा है
(ख) इसमें केवल सुख की कामना है
(ग) इसमें रक्षा नहीं, संघर्ष की शक्ति माँगी गई है
(घ) इसमें कोई प्रार्थना नहीं है
अभिकथन-कारण
नीचे अभिकथन (A) और कारण (R) दिए गए हैं। सही विकल्प चुनिए—
(क) A और R दोनों सही, R, A की सही व्याख्या है। (ख) A और R दोनों सही, पर R, A की सही व्याख्या नहीं। (ग) A सही, R गलत। (घ) A गलत, R सही।
1. अभिकथन (A): कवि ईश्वर से विपत्तियों से बचने की प्रार्थना नहीं करता।
कारण (R): वह विपत्तियों का निडर होकर स्वयं सामना करने की शक्ति माँगता है।
2. अभिकथन (A): ‘आत्मत्राण’ शीर्षक कविता के भाव के अनुकूल है।
कारण (R): पूरी कविता आत्मबल और स्वयं की रक्षा की भावना पर केंद्रित है।
3. अभिकथन (A): कवि सुख के दिनों में अहंकार करना चाहता है।
कारण (R): वह सुख में नतमस्तक होकर ईश्वर को क्षण-क्षण पहचानना चाहता है।
4. अभिकथन (A): इस कविता का मूल बांग्ला से हिंदी अनुवाद हजारीप्रसाद द्विवेदी ने किया।
कारण (R): रवीन्द्रनाथ ठाकुर हिंदी में नहीं लिखते थे।
5. अभिकथन (A): कवि चाहता है कि दुख की रात में भी ईश्वर पर उसका संशय न हो।
कारण (R): कवि की ईश्वर पर श्रद्धा सुख-दुख दोनों में अटल बनी रहती है।
परीक्षा-युक्तियाँ एवं सामान्य गलतियाँ
परीक्षा-युक्तियाँ
- याद रखें – कवि रक्षा नहीं, बल्कि विपत्तियों का सामना करने की शक्ति माँगता है। यही कविता का केंद्रीय भाव है।
- भाव-स्पष्टीकरण वाले प्रश्नों में पहले पंक्ति का सरल अर्थ, फिर उसका निहित भाव लिखें।
- कठिन शब्दों (त्राण, अनामय, वंचना, क्षय, अनुनय) के अर्थ अवश्य याद रखें – इन पर एक-अंकीय प्रश्न आते हैं।
- ‘यह कविता अन्य प्रार्थना-गीतों से भिन्न क्यों है’ – यह प्रायः पूछा जाने वाला प्रश्न है; तुलना सहित उत्तर लिखें।
सामान्य गलतियाँ
- यह न लिखें कि कवि ईश्वर से दुखों से रक्षा माँगता है – वह तो ठीक इसके विपरीत माँगता है।
- कवि और अनुवादक को न मिलाएँ – मूल कवि रवीन्द्रनाथ ठाकुर, अनुवादक हजारीप्रसाद द्विवेदी हैं।
- ‘क्षय’ का अर्थ केवल ‘रोग/टीबी’ न लिखें; यहाँ इसका अर्थ नाश, निराशा, टूटन है।
- शब्दार्थ में देवनागरी की मात्राओं की त्रुटि न करें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
‘आत्मत्राण’ कविता के कवि और अनुवादक कौन हैं?
इस कविता के मूल कवि रवीन्द्रनाथ ठाकुर हैं और इसका बांग्ला से हिंदी अनुवाद आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने किया है।
‘आत्मत्राण’ शब्द का अर्थ क्या है?
‘आत्मत्राण’ का अर्थ है – अपने बल से स्वयं की रक्षा करना, अर्थात् दूसरों के सहारे के बिना आत्मबल से अपना बचाव।
यह कविता अन्य प्रार्थना-गीतों से कैसे भिन्न है?
सामान्य प्रार्थना-गीतों में दुखों से रक्षा माँगी जाती है, जबकि इस कविता में कवि दुखों से बचाव नहीं, बल्कि उनका निडर होकर सामना करने की शक्ति और आत्मनिर्भरता माँगता है।
प्रश्न NCERT स्पर्श (भाग 2) पुस्तक से ज्यों-के-त्यों लिए गए हैं; उत्तर ClearStudy द्वारा मौलिक रूप से तैयार एवं जाँचे गए हैं।
