NCERT Solutions for Class 10 Sanskrit (Shemushi) पाठः 10: अन्योक्तयः

This page gives the complete solution for Class 10 Sanskrit Shemushi (शेमुषी द्वितीयो भागः) Chapter 10 ‘अन्योक्तयः’ – a संग्रह of seven अन्योक्ति (allegorical) verses drawn from पण्डितराज-जगन्नाथ’s ‘भामिनीविलासः’, महाकवि-माघ’s ‘शिशुपालवधम्’ and महाकवि-भर्तृहरि’s ‘नीतिशतकम्’ – with मूल श्लोक, अन्वय, original हिन्दी भावार्थ, सार, शब्दार्थ table, and exam-ready answers to every question of the अभ्यासः, plus extra questions, MCQs, अभिकथन-कारण and FAQs (NCERT 2026–27).

कक्षा (Class): 10 विषय (Subject): Sanskrit (संस्कृत) पुस्तक (Book): Shemushi 2 (शेमुषी द्वितीयो भागः) पाठः (Chapter): 10 पाठ-नाम: अन्योक्तयः सत्र (Session): 2026–27

पाठ का अवलोकन (Chapter Overview)

शेमुषी (द्वितीयो भागः) कक्षा 10 का दशम (अन्तिम) पाठ ‘अन्योक्तयः’ है। अन्योक्ति का अर्थ है – किसी की प्रशंसा अथवा निन्दा को अप्रत्यक्ष रूप से, बहाने से अथवा किसी प्रतीक के माध्यम से प्रकट करना। जब किसी प्रतीक या माध्यम के द्वारा किसी के गुण की प्रशंसा या दोष की निन्दा की जाती है, तब वह बात शीघ्र ही पाठक के मन में बैठ जाती है। इस पाठ में सात अन्योक्तियों का संग्रह है, जिनमें राजहंस, कोकिल, मेघ, मालाकार, तड़ाग (सरोवर) एवं चातक आदि के माध्यम से मनुष्य को सद्वृत्तियों एवं सत्कर्मों की ओर प्रवृत्त होने का सन्देश दिया गया है। ये श्लोक प्रतीकात्मक होकर भी मानव-जीवन में उत्तम आचरण, उपकार एवं स्वाभिमान की प्रेरणा देते हैं।

पाठ-परिचय / कवि-परिचय

इस पाठ में संकलित श्लोकों में छठे और सातवें श्लोक को छोड़कर शेष श्लोक पण्डितराज जगन्नाथ के ‘भामिनीविलासः’ नामक गीतिकाव्य से लिए गए हैं। छठा श्लोक महाकवि माघ के ‘शिशुपालवधम्’ महाकाव्य से तथा सातवाँ श्लोक महाकवि भर्तृहरि के ‘नीतिशतकम्’ से उद्धृत है।

पण्डितराज जगन्नाथ संस्कृत-साहित्य के मूर्धन्य एवं सरस कवि थे। वे मुग़ल शासक शाहजहाँ द्वारा अपनी राज-सभा में सम्मानित किए गए थे। उनकी तेरह कृतियाँ प्राप्त होती हैं, जिनमें गंगालहरी, अमृतलहरी, सुधालहरी, लक्ष्मीलहरी, करुणालहरी, रसगंगाधरः एवं भामिनीविलासः प्रमुख हैं। ‘भामिनीविलासः’ उनकी विविध पद्यों का संग्रह है। महाकवि माघ का एकमात्र महाकाव्य ‘शिशुपालवधम्’ प्राप्त होता है। महाकवि भर्तृहरि के तीन शतक प्रसिद्ध हैं – शृंगारशतकम्, नीतिशतकम् एवं वैराग्यशतकम्।

मूल श्लोक एवं अन्वय (Verses & Anvaya)

एकेन राजहंसेन या शोभा सरसो भवेत् ।
न सा बकसहस्रेण परितस्तीरवासिना ॥ १ ॥

अन्वयः – एकेन राजहंसेन सरसः या शोभा भवेत्, परितः तीरवासिना बकसहस्रेण सा (शोभा) न (भवति) ।

भावार्थ: एक ही राजहंस से सरोवर की जो शोभा होती है, वह शोभा तट पर चारों ओर रहने वाले हजारों बगुलों से नहीं होती। तात्पर्य यह है कि एक ही गुणवान् व्यक्ति से जो शोभा (कीर्ति) होती है, वह असंख्य गुणहीन व्यक्तियों से नहीं हो सकती।

भुक्ता मृणालपटली भवता निपीता­
न्यम्बूनि यत्र नलिनानि निषेवितानि ।
रे राजहंस! वद तस्य सरोवरस्य,
कृत्येन केन भविताऽसि कृतोपकारः ॥ २ ॥

अन्वयः – यत्र भवता मृणालपटली भुक्ता, अम्बूनि निपीतानि, नलिनानि निषेवितानि, रे राजहंस! तस्य सरोवरस्य केन कृत्येन कृतोपकारः भविता असि, वद ।

भावार्थ: हे राजहंस! जिस सरोवर में तुमने कमल-नालों का समूह खाया, जल पिया तथा कमलों का सेवन किया, उस सरोवर का तुम किस कार्य से उपकार करोगे, यह बताओ। अर्थात् जो किसी का उपकार ग्रहण करता है, उसे प्रत्युपकार भी करना चाहिए – कृतघ्न नहीं होना चाहिए।

तोयैरल्पैरपि करुणया भीमभानौ निदाघे,
मालाकार! व्यरचि भवता या तरोरस्य पुष्टिः ।
सा किं शक्या जनयितुमिह प्रावृषेण्येन वारां,
धारासारानपि विकिरता विश्वतो वारिदेन ॥ ३ ॥

अन्वयः – हे मालाकार! भीमभानौ निदाघे अल्पैः तोयैः अपि भवता करुणया अस्य तरोः या पुष्टिः व्यरचि, सा (पुष्टिः) विश्वतः वाराम् धारासारान् अपि विकिरता प्रावृषेण्येन वारिदेन इह जनयितुम् किं शक्या ।

भावार्थ: हे माली! प्रचण्ड सूर्य के तपते हुए ग्रीष्मकाल में थोड़े-से जल से भी करुणापूर्वक तुमने इस वृक्ष की जो पुष्टि (पालन-पोषण) की, क्या वह पुष्टि चारों ओर जल की धाराओं को बरसाने वाले वर्षाकालीन बादल के द्वारा यहाँ उत्पन्न की जा सकती है? तात्पर्य यह है कि समय पर किया गया थोड़ा-सा उपकार असमय किए गए बड़े उपकार से कहीं अधिक मूल्यवान् होता है।

आपेदिरेऽम्बरपथं परितः पतंगाः,
भृंगा रसालमुकुलानि समाश्रयन्ते ।
संकोचमंचति सरस्त्वयि दीनदीनो,
मीनो नु हन्त! कतमां गतिमभ्युपैतु ॥ ४ ॥

अन्वयः – पतंगाः परितः अम्बरपथम् आपेदिरे, भृंगाः रसालमुकुलानि समाश्रयन्ते, सरः त्वयि संकोचम् अञ्चति, हन्त! दीनदीनः मीनः नु कतमां गतिम् अभ्युपैतु ।

भावार्थ: (हे सरोवर!) पक्षी चारों ओर आकाश-मार्ग को प्राप्त कर लेते हैं (उड़ जाते हैं), भौंरे आम की मंजरियों का आश्रय ले लेते हैं; किन्तु तुम्हारे सूख जाने (संकुचित होने) पर, हाय! अत्यन्त दीन मछली किस गति (शरण) को प्राप्त करे? अर्थात् आश्रयदाता के नष्ट होने पर सर्वाधिक कष्ट उसके आश्रित दीन-असहाय प्राणियों को ही होता है।

एक एव खगो मानी वने वसति चातकः ।
पिपासितो वा म्रियते याचते वा पुरन्दरम् ॥ ५ ॥

अन्वयः – मानी एकः एव चातकः खगः वने वसति, पिपासितः (सन्) म्रियते वा पुरन्दरम् याचते वा ।

भावार्थ: वन में एक ही स्वाभिमानी पक्षी चातक रहता है, जो प्यासा होकर या तो मर जाता है या (केवल) इन्द्र (मेघ) से ही जल की याचना करता है। तात्पर्य यह है कि स्वाभिमानी व्यक्ति किसी क्षुद्र से याचना नहीं करता, वह श्रेष्ठ से ही याचना करता है अथवा प्राण त्याग देता है।

आश्वास्य पर्वतकुलं तपनोष्णतप्त­
मुद्दामदावविधुराणि च काननानि ।
नानानदीनदशतानि च पूरयित्वा,
रिक्तोऽसि यज्जलद! सैव तवोत्तमा श्रीः ॥ ६ ॥

अन्वयः – हे जलद! तपनोष्णतप्तम् पर्वतकुलम्, उद्दामदावविधुराणि काननानि च आश्वास्य, नानानदीनदशतानि च पूरयित्वा, यत् रिक्तः असि, सा एव तव उत्तमा श्रीः ।

भावार्थ: हे बादल! सूर्य की गर्मी से तपे हुए पर्वत-समूह को तथा भयंकर दावानल से व्याकुल वनों को आश्वासन (शीतलता) देकर एवं अनेक सैकड़ों नदियों-नदों को भरकर तुम जो रिक्त (खाली) हो गए हो, वही तुम्हारी सर्वोत्तम शोभा (श्री) है। तात्पर्य यह है कि दूसरों के उपकार में अपना सर्वस्व लुटा देना ही उदार पुरुष की सच्ची शोभा है।

रे रे चातक! सावधानमनसा मित्र! क्षणं श्रूयता­
मम्भोदा बहवो भवन्ति गगने सर्वेऽपि नैतादृशाः ।
केचिद् वृष्टिभिरार्द्रयन्ति वसुधां गर्जन्ति केचिद् वृथा,
यं यं पश्यसि तस्य तस्य पुरतो मा ब्रूहि दीनं वचः ॥ ७ ॥

अन्वयः – रे रे मित्र चातक! सावधानमनसा क्षणम् श्रूयताम्, गगने बहवः अम्भोदाः भवन्ति, सर्वे अपि एतादृशाः न (सन्ति), केचित् वृष्टिभिः वसुधाम् आर्द्रयन्ति, केचित् वृथा गर्जन्ति, (त्वम्) यं यं पश्यसि तस्य तस्य पुरतः दीनं वचः मा ब्रूहि ।

भावार्थ: हे मित्र चातक! सावधान मन से क्षण-भर सुनो – आकाश में बहुत-से बादल होते हैं, किन्तु सभी एक-जैसे (उदार) नहीं होते। कुछ वर्षा से पृथ्वी को भिगो देते हैं और कुछ व्यर्थ ही गरजते हैं। इसलिए जिस-जिसको तुम देखो, उस-उसके सामने दीनतापूर्ण वचन मत बोलो। तात्पर्य – प्रत्येक के सामने याचना करना उचित नहीं; सुपात्र को पहचानकर ही याचना करनी चाहिए।

(श्लोक 1–5 – भामिनीविलासः / पण्डितराज जगन्नाथ; श्लोक 6 – शिशुपालवधम् / महाकवि माघ; श्लोक 7 – नीतिशतकम् / महाकवि भर्तृहरि)

सार / भावार्थ (Hindi Summary)

‘अन्योक्तयः’ पाठ में सात अन्योक्ति-श्लोकों का सुन्दर संग्रह है। अन्योक्ति वह अलंकृत शैली है जिसमें किसी प्रतीक (राजहंस, मेघ, मालाकार, सरोवर, चातक आदि) के माध्यम से अप्रत्यक्ष रूप से किसी के गुण की प्रशंसा या दोष की निन्दा की जाती है। इस प्रकार कही गई बात पाठक के मन में शीघ्र एवं चिरकाल तक बैठ जाती है।

प्रथम श्लोक में एक राजहंस से सरोवर की जो शोभा होती है, वह हजारों बगुलों से नहीं – अर्थात् एक गुणी ही सहस्र गुणहीनों से श्रेष्ठ है। द्वितीय श्लोक में राजहंस से कहा गया है कि जिस सरोवर ने उसका पालन किया, उसका उपकार वह कैसे चुकाएगा – अर्थात् कृतघ्न नहीं होना चाहिए। तृतीय श्लोक में माली के द्वारा ग्रीष्म में थोड़े जल से किए गए वृक्ष-पोषण को असमय बरसने वाले मेघ से श्रेष्ठ बताया गया है – समयोचित उपकार ही मूल्यवान् है। चतुर्थ श्लोक में सरोवर के सूखने पर असहाय मछली की दुर्दशा द्वारा बताया गया है कि आश्रयदाता के नष्ट होने पर आश्रितों को ही सर्वाधिक कष्ट होता है।

पंचम श्लोक में स्वाभिमानी चातक का उदाहरण है, जो प्यासा रहकर मर जाता है पर केवल इन्द्र (मेघ) से ही जल माँगता है – स्वाभिमानी क्षुद्र से याचना नहीं करता। षष्ठ श्लोक में मेघ को सम्बोधित कर कहा गया है कि पर्वतों, वनों एवं नदियों को जल देकर रिक्त हो जाना ही उसकी सर्वोत्तम शोभा है – परोपकार में सर्वस्व अर्पण ही श्रेष्ठ है। सप्तम श्लोक में चातक को सावधान किया गया है कि सभी मेघ उदार नहीं होते; अतः प्रत्येक के सामने दीन वचन न कहकर सुपात्र को ही पहचानना चाहिए। इस प्रकार ये अन्योक्तियाँ गुण, कृतज्ञता, समयोचित उपकार, परोपकार एवं स्वाभिमान का अनुपम सन्देश देती हैं।

शब्दार्थ (Word-meanings)

शब्दः (Sanskrit)अर्थः (हिन्दी)Meaning (English)
सरसःतालाब का, सरोवर काOf a lake
बकसहस्रेणहजारों बगुलों सेBy a thousand herons
परितःचारों ओरAll around
तीरवासिनातटवासी के द्वाराBy resident of the shore
मृणालपटलीकमल-नालों का समूहBunch of lotus stems
निपीतानिभली-भाँति पिए गएWell drunk
नलिनानिकमलों कोThe lotuses
कृतोपकारःउपकार किया हुआ (प्रत्युपकारी)One who requites
भीमभानौप्रचण्ड सूर्य होने परUnder the sweltering sun
निदाघेग्रीष्मकाल मेंIn the summer season
मालाकारहे माली!O gardener!
पुष्टिःपोषण, वृद्धिNourishment
प्रावृषेण्येनवर्षाकालीन के द्वाराBy the rainy-season
वारिदेनबादल के द्वाराBy the cloud
धारासारान्धाराओं का प्रवाहFlow of torrent water
रसालमुकुलानिआम की मंजरियों कोBlossoms of the mango tree
संकोचम् अञ्चतिसंकुचित (सूख) होने परOn drying / shrinking
मीनःमछलीFish
मानीस्वाभिमानीSelf-respecting
पुरन्दरम्इन्द्र कोThe king of gods (Indra)
आश्वास्यतृप्त/आश्वस्त करकेAfter satisfying
रिक्तःखाली, रीताEmpty
अम्भोदाःबादलClouds
आर्द्रयन्तिजल से भिगो देते हैंWet with water
वसुधाम्पृथ्वी कोThe earth
गर्जन्तिगर्जना करते हैंThunder

अभ्यासः के उत्तर (Exercise Solutions)

1. एकपदेन उत्तरं लिखत —

(क) कस्य शोभा एकेन राजहंसेन भवति?

उत्तरसरसः (सरोवरस्य) ।

(ख) सरसः तीरे के वसन्ति?

उत्तरबकाः (बगुले) ।

(ग) कः पिपासितः म्रियते?

उत्तरचातकः

(घ) के रसालमुकुलानि समाश्रयन्ते?

उत्तरभृंगाः (भौंरे) ।

(ङ) अम्भोदाः कुत्र सन्ति?

उत्तरगगने (आकाशे) ।

2. अधोलिखितानां प्रश्नानाम् उत्तराणि संस्कृतभाषया लिखत —

(क) सरसः शोभा केन भवति?

उत्तरसरसः शोभा एकेन राजहंसेन भवति । (परितः तीरवासिना बकसहस्रेण सा शोभा न भवति।)

(ख) चातकः किमर्थं मानी कथ्यते?

उत्तरचातकः पिपासितः सन् अपि केवलं पुरन्दरम् (इन्द्रम्) एव जलं याचते, अन्यं कमपि न याचते, याचनाभावे च म्रियते; अतः सः मानी (स्वाभिमानी) कथ्यते ।

(ग) मीनः कदा दीनां गतिं प्राप्नोति?

उत्तरयदा सरः संकोचम् अञ्चति (शुष्कं भवति), तदा मीनः दीनां गतिं प्राप्नोति ।

(घ) कानि पूरयित्वा जलदः रिक्तः भवति?

उत्तरजलदः पर्वतकुलम् आश्वास्य, काननानि च (आश्वास्य), नानानदीनदशतानि पूरयित्वा रिक्तः भवति ।

(ङ) वृष्टिभिः वसुधां के आर्द्रयन्ति?

उत्तरकेचित् अम्भोदाः (केचित् मेघाः) वृष्टिभिः वसुधाम् आर्द्रयन्ति ।

3. अधोलिखितवाक्येषु रेखांकितपदानि आधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत —

(क) मालाकारः तोयैः तरोः पुष्टिं करोति ।

उत्तरमालाकारः कैः तरोः पुष्टिं करोति?

(ख) भृंगाः रसालमुकुलानि समाश्रयन्ते ।

उत्तरके रसालमुकुलानि समाश्रयन्ते?

(ग) पतंगाः अम्बरपथम् आपेदिरे ।

उत्तरपतंगाः कम् आपेदिरे?

(घ) जलदः नानानदीनदशतानि पूरयित्वा रिक्तः अस्ति ।

उत्तरजलदः नानानदीनदशतानि पूरयित्वा कीदृशः अस्ति?

(ङ) चातकः वने वसति ।

उत्तरचातकः कुत्र वसति?

4. अधोलिखितयोः श्लोकयोः भावार्थं स्वकीयभाषया (स्वभाषया) लिखत —

(अ) तोयैरल्पैरपि … वारिदेन ।

भावार्थःइस श्लोक में मालाकार (माली) के माध्यम से समयोचित उपकार की महत्ता बताई गई है। कवि कहते हैं – हे माली! प्रचण्ड सूर्य से तपते हुए ग्रीष्मकाल में थोड़े-से जल से भी तुमने करुणापूर्वक इस वृक्ष का जो पोषण किया, वह पोषण चारों ओर मूसलाधार जल बरसाने वाले वर्षाकालीन मेघ के द्वारा भी (असमय में) नहीं किया जा सकता। तात्पर्य यह है कि उचित समय पर किया गया थोड़ा-सा उपकार असमय किए गए विशाल उपकार से कहीं अधिक मूल्यवान् एवं फलदायी होता है।

(आ) रे रे चातक … दीनं वचः ।

भावार्थःइस श्लोक में चातक के माध्यम से सुपात्र को पहचानने का उपदेश दिया गया है। कवि कहते हैं – हे मित्र चातक! सावधान मन से क्षण-भर सुनो। आकाश में बहुत-से बादल होते हैं, किन्तु सभी एक-समान (उदार) नहीं होते। कुछ बादल वर्षा करके पृथ्वी को सींच देते हैं, तो कुछ केवल व्यर्थ ही गरजते रहते हैं। अतः जिस-जिसको देखो, उस-उसके सामने दीनतापूर्ण याचना के वचन मत बोलो। आशय यह है कि बिना सुपात्र को पहचाने प्रत्येक के सामने हाथ फैलाना अपने स्वाभिमान को खोना है।

5. अधोलिखितयोः श्लोकयोः अन्वयं लिखत —

(अ) आपेदिरे … कतमां गतिमभ्युपैति ।

अन्वयःपतंगाः परितः अम्बरपथम् आपेदिरे, भृंगाः रसालमुकुलानि समाश्रयन्ते, सरः त्वयि संकोचम् अञ्चति, हन्त! दीनदीनः मीनः नु कतमां गतिम् अभ्युपैति ।

(आ) आश्वास्य … सैव तवोत्तमा श्रीः ।

अन्वयःहे जलद! तपनोष्णतप्तम् पर्वतकुलम्, उद्दामदावविधुराणि काननानि च आश्वास्य, नानानदीनदशतानि च पूरयित्वा, यत् रिक्तः असि, सा एव तव उत्तमा श्रीः ।

6. उदाहरणमनुसृत्य सन्धिं/सन्धिविच्छेदं वा कुरुत —

(i) यथा – अन्य + उक्तयः = अन्योक्तयः

उत्तर (क) निपीतानि + अम्बूनि = निपीतान्यम्बूनि (ख) कृत + उपकारः = कृतोपकारः (ग) तपन + उष्णतप्तम् = तपनोष्णतप्तम् (घ) तव + उत्तमा = तवोत्तमा (ङ) न + एतादृशाः = नैतादृशाः

(ii) यथा – पिपासितः + अपि = पिपासितोऽपि

उत्तर (क) कः + अपि = कोऽपि (ख) रिक्तः + असि = रिक्तोऽसि (ग) मीनः + अयम् = मीनोऽयम् (घ) सर्वे + अपि = सर्वेऽपि

(iii) यथा – सरसः + भवेत् = सरसो भवेत्

उत्तर (क) खगः + मानी = खगो मानी (ख) मीनः + नु = मीनो नु (ग) पिपासितः + वा = पिपासितो वा (घ) पुरतः + मा = पुरतो मा

(iv) यथा – मुनिः + अपि = मुनिरपि

उत्तर (क) तोयैः + अल्पैः = तोयैरल्पैः (ख) अल्पैः + अपि = अल्पैरपि (ग) तरोः + अपि = तरोरपि (घ) वृष्टिभिः + आर्द्रयन्ति = वृष्टिभिरार्द्रयन्ति

7. उदाहरणमनुसृत्य अधोलिखितैः विग्रहपदैः समस्तपदानि रचयत —

यथा – पीतं च तत् पटजम् = पीतपटजम्

विग्रहपदानिसमस्तपदानि (उत्तर)
(क) राजा च असौ हंसःराजहंसः
(ख) भीमः च असौ भानुःभीमभानुः
(ग) अम्बरम् एव पन्थाःअम्बरपथः
(घ) उत्तमा च इयं श्रीःउत्तमश्रीः
(ङ) सावधानं च तत् मनः, तेनसावधानमनसा

अतिरिक्त प्रश्न (Extra Questions)

लघु उत्तरीय प्रश्न (30–40 शब्द)

1. ‘अन्योक्ति’ किसे कहते हैं?

उत्तरअन्योक्ति वह काव्य-शैली है जिसमें अप्रत्यक्ष रूप से, बहाने से अथवा किसी प्रतीक (हंस, मेघ, चातक आदि) के माध्यम से किसी के गुण की प्रशंसा या दोष की निन्दा की जाती है। ऐसी बात पाठक के मन में शीघ्र एवं चिरकाल तक बैठ जाती है।

2. इस पाठ के श्लोक किन ग्रन्थों से संकलित हैं?

उत्तरछठे एवं सातवें श्लोक को छोड़कर शेष श्लोक पण्डितराज जगन्नाथ के ‘भामिनीविलासः’ से लिए गए हैं। छठा श्लोक महाकवि माघ के ‘शिशुपालवधम्’ से तथा सातवाँ श्लोक महाकवि भर्तृहरि के ‘नीतिशतकम्’ से उद्धृत है।

3. राजहंस से सरोवर के उपकार के सम्बन्ध में कवि क्या कहते हैं?

उत्तरकवि राजहंस से कहते हैं कि जिस सरोवर में उसने कमल-नाल खाए, जल पिया एवं कमलों का सेवन किया, उस सरोवर का वह किस कार्य से प्रत्युपकार करेगा। तात्पर्य यह है कि उपकार ग्रहण करने वाले को कृतघ्न नहीं, अपितु कृतज्ञ एवं प्रत्युपकारी होना चाहिए।

4. चातक को ‘मानी’ क्यों कहा गया है?

उत्तरचातक स्वाभिमानी पक्षी है। वह प्यासा होकर भी किसी क्षुद्र जलाशय से जल नहीं माँगता; वह या तो केवल इन्द्र (मेघ) से ही जल की याचना करता है या प्यासा रहकर प्राण त्याग देता है। इसी स्वाभिमान के कारण उसे ‘मानी’ कहा गया है।

5. मेघ की सर्वोत्तम शोभा किसमें बताई गई है?

उत्तरमेघ की सर्वोत्तम शोभा इसमें बताई गई है कि वह तपते हुए पर्वतों एवं दावानल से व्याकुल वनों को शीतलता देकर तथा सैकड़ों नदियों-नदों को जल से भरकर स्वयं रिक्त (खाली) हो जाता है। परोपकार में अपना सर्वस्व लुटा देना ही उसकी सच्ची शोभा है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (100–120 शब्द)

6. ‘अन्योक्तयः’ पाठ का केन्द्रीय सन्देश अपने शब्दों में लिखिए।

उत्तर‘अन्योक्तयः’ पाठ में सात अन्योक्तियों के माध्यम से मानव-जीवन के उत्तम मूल्यों की शिक्षा दी गई है। राजहंस की अन्योक्तियों से यह बताया गया है कि एक गुणवान् ही सहस्र गुणहीनों से श्रेष्ठ होता है तथा उपकार करने वाले के प्रति कृतज्ञ रहना चाहिए। मालाकार की अन्योक्ति समयोचित उपकार की महत्ता दर्शाती है। सरोवर एवं मछली की अन्योक्ति यह बोध कराती है कि आश्रयदाता के नष्ट होने पर आश्रितों को ही सर्वाधिक कष्ट होता है।चातक की अन्योक्तियाँ स्वाभिमान एवं सुपात्र की पहचान का उपदेश देती हैं – स्वाभिमानी क्षुद्र से याचना नहीं करता तथा बिना सुपात्र पहचाने सबके सामने दीन वचन नहीं बोलता। मेघ की अन्योक्ति परोपकार में सर्वस्व अर्पण को सच्ची शोभा बताती है। इस प्रकार पाठ का केन्द्रीय सन्देश है – गुण, कृतज्ञता, समयोचित उपकार, परोपकार एवं स्वाभिमान का पालन।

7. तृतीय श्लोक (तोयैरल्पैरपि…) के आधार पर समयोचित उपकार के महत्त्व को स्पष्ट कीजिए।

उत्तरतृतीय श्लोक में मालाकार (माली) के माध्यम से कवि ने समयोचित उपकार की श्रेष्ठता को प्रकट किया है। प्रचण्ड सूर्य से तपते हुए ग्रीष्मकाल में जब वृक्ष को जल की अत्यन्त आवश्यकता थी, तब माली ने थोड़े-से जल से भी करुणापूर्वक उसका पोषण किया और उसे जीवित रखा। कवि कहते हैं कि वर्षाकाल में चारों ओर मूसलाधार जल बरसाने वाला विशाल मेघ भी असमय में वह पुष्टि उत्पन्न नहीं कर सकता।इस अन्योक्ति से यह शिक्षा मिलती है कि उचित समय पर किया गया थोड़ा-सा उपकार असमय में किए गए बड़े उपकार से कहीं अधिक मूल्यवान् होता है। संकट के समय की गई छोटी-सी सहायता प्राणरक्षक सिद्ध होती है, जबकि अवसर बीत जाने के बाद किया गया विशाल उपकार भी निरर्थक हो जाता है। अतः मनुष्य को सत्पात्र की आवश्यकता के समय ही उसकी सहायता करनी चाहिए।

8. चातक-सम्बन्धी दोनों अन्योक्तियों (श्लोक 5 एवं 7) का तुलनात्मक भाव लिखिए।

उत्तरपाठ में चातक से सम्बन्धित दो अन्योक्तियाँ हैं, जो भिन्न-भिन्न किन्तु पूरक सन्देश देती हैं। पंचम श्लोक में चातक के स्वाभिमान की प्रशंसा की गई है – वह प्यासा रहकर मर जाता है, परन्तु किसी क्षुद्र से जल नहीं माँगता; वह केवल इन्द्र (मेघ) से ही याचना करता है। यह श्लोक स्वाभिमान का आदर्श प्रस्तुत करता है।सप्तम श्लोक में चातक को सावधान करते हुए कहा गया है कि आकाश में अनेक बादल होते हैं, किन्तु सभी उदार नहीं – कुछ वर्षा करते हैं और कुछ व्यर्थ गरजते हैं; अतः जिस-जिसको देखो, उसके सामने दीन वचन मत बोलो। यह श्लोक सुपात्र की पहचान का उपदेश देता है। दोनों श्लोकों का सम्मिलित भाव यह है कि याचना केवल योग्य एवं उदार पात्र से करनी चाहिए, अन्यथा अपना स्वाभिमान बनाए रखना ही श्रेयस्कर है।

MCQ & अभिकथन-कारण

1. इस पाठ का नाम क्या है?

(क) सूक्तयः

(ख) अन्योक्तयः

(ग) सुभाषितानि

(घ) नीतिनवनीतम्

उत्तर(ख) अन्योक्तयः।

2. इस पाठ में कुल कितनी अन्योक्तियाँ संकलित हैं?

(क) पाँच

(ख) छह

(ग) सात

(घ) आठ

उत्तर(ग) सात।

3. सरोवर की शोभा किससे होती है?

(क) बकसहस्रेण

(ख) एकेन राजहंसेन

(ग) तीरवासिना

(घ) मीनेन

उत्तर(ख) एकेन राजहंसेन।

4. ‘पुरन्दरम्’ शब्द का अर्थ है —

(क) चातक

(ख) इन्द्र

(ग) मेघ

(घ) सूर्य

उत्तर(ख) इन्द्र।

5. ‘निदाघे’ पद किस ऋतु को सूचित करता है?

(क) वर्षा

(ख) शिशिर

(ग) ग्रीष्म

(घ) हेमन्त

उत्तर(ग) ग्रीष्म।

6. छठा श्लोक किस ग्रन्थ से लिया गया है?

(क) भामिनीविलासः

(ख) नीतिशतकम्

(ग) शिशुपालवधम्

(घ) रघुवंशम्

उत्तर(ग) शिशुपालवधम् (महाकवि माघ)।

7. सरोवर के सूखने पर किसे दीन गति प्राप्त होती है?

(क) पतंगाय

(ख) भृंगाय

(ग) मीनाय

(घ) राजहंसाय

उत्तर(ग) मीनाय (मछली को)।

8. सातवाँ श्लोक किस कवि की रचना से उद्धृत है?

(क) कालिदासः

(ख) भर्तृहरिः

(ग) माघः

(घ) जगन्नाथः

उत्तर(ख) भर्तृहरिः (नीतिशतकम्)।

9. ‘आर्द्रयन्ति’ क्रिया का अर्थ है —

(क) सुखा देते हैं

(ख) जल से भिगो देते हैं

(ग) जला देते हैं

(घ) उड़ा देते हैं

उत्तर(ख) जल से भिगो देते हैं।

10. मेघ की उत्तम श्री (शोभा) किसमें बताई गई है?

(क) गर्जना करने में

(ख) जल भरकर रखने में

(ग) सबको जल देकर रिक्त हो जाने में

(घ) आकाश में मँडराने में

उत्तर(ग) सबको जल देकर रिक्त हो जाने में।
उत्तर-कुंजी: 1-(ख), 2-(ग), 3-(ख), 4-(ख), 5-(ग), 6-(ग), 7-(ग), 8-(ख), 9-(ख), 10-(ग)

अभिकथन-कारण – नीचे अभिकथन (A) और कारण (R) दिए गए हैं। सही विकल्प चुनिए—
(क) A और R दोनों सही, R, A की सही व्याख्या है। (ख) A और R दोनों सही, पर R, A की सही व्याख्या नहीं। (ग) A सही, R गलत। (घ) A गलत, R सही।

1. अभिकथन (A): चातक को ‘मानी’ (स्वाभिमानी) कहा गया है।

कारण (R): चातक प्यासा रहकर मर जाता है, पर केवल इन्द्र (मेघ) से ही जल माँगता है, किसी क्षुद्र से नहीं।

उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है।

2. अभिकथन (A): एक राजहंस से सरोवर की जो शोभा होती है, वह हजारों बगुलों से नहीं होती।

कारण (R): बगुले संख्या में अधिक होते हैं, इसलिए वे राजहंस से अधिक शोभा देते हैं।

उत्तर(ग) A सही है, किन्तु R गलत है – शोभा संख्या से नहीं, अपितु गुण से होती है; एक गुणी ही सहस्र गुणहीनों से श्रेष्ठ है।

3. अभिकथन (A): समयोचित किया गया थोड़ा-सा उपकार असमय किए गए बड़े उपकार से श्रेष्ठ है।

कारण (R): ग्रीष्म में माली के थोड़े जल से हुई वृक्ष-पुष्टि वर्षा-मेघ भी असमय उत्पन्न नहीं कर सकता।

उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है।

4. अभिकथन (A): सरोवर के सूखने पर मछली को सर्वाधिक कष्ट होता है।

कारण (R): पक्षी आकाश में उड़ जाते हैं और भौंरे आम की मंजरियों का आश्रय ले लेते हैं, पर मछली असहाय रहती है।

उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है।

5. अभिकथन (A): मेघ का सबको जल देकर रिक्त हो जाना ही उसकी सर्वोत्तम शोभा है।

कारण (R): परोपकार में अपना सर्वस्व अर्पण कर देना उदार पुरुष की सच्ची शोभा है।

उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है।

परीक्षा-युक्तियाँ एवं सामान्य गलतियाँ

परीक्षा-युक्तियाँ (Exam Tips)

  • प्रत्येक अन्योक्ति का प्रतीक एवं उससे जुड़ा सन्देश याद रखें – राजहंस (गुण/कृतज्ञता), मालाकार (समयोचित उपकार), मीन (आश्रित की दुर्दशा), चातक (स्वाभिमान/सुपात्र), मेघ (परोपकार)।
  • तीनों स्रोत-ग्रन्थ एवं कवि याद रखें – भामिनीविलासः (जगन्नाथ), शिशुपालवधम् (माघ), नीतिशतकम् (भर्तृहरि)।
  • अन्वय एवं भावार्थ-लेखन के प्रश्न प्रायः तृतीय, चतुर्थ, षष्ठ एवं सप्तम श्लोक से आते हैं – इन्हें विशेष रूप से तैयार करें।
  • सन्धि-विच्छेद में विसर्ग-सन्धि (सरसो भवेत्, मीनो नु, रिक्तोऽसि) का अभ्यास करें।
  • प्रश्न-निर्माण में रेखांकित पद की विभक्ति देखकर सही प्रश्नवाचक (कः/के/किम्/कुत्र/कीदृशः/कैः) चुनें।

सामान्य गलतियाँ (Common Mistakes)

  • ‘पुरन्दरम्’ का अर्थ मेघ समझ लेना – इसका अर्थ इन्द्र है।
  • संयुक्ताक्षर लिखने में भूल – ‘राजहंसः’, ‘मृणालपटली’, ‘पुरन्दरम्’ शुद्ध लिखें।
  • छठे एवं सातवें श्लोक के स्रोत-ग्रन्थ को भामिनीविलासः से जोड़ देना (ये माघ एवं भर्तृहरि के हैं)।
  • विसर्ग-सन्धि में ‘ो’ एवं अवग्रह (ऽ) का सही प्रयोग न करना (रिक्तोऽसि, पिपासितोऽपि)।
  • प्रश्न-निर्माण में करण-विभक्ति (तोयैः → कैः) के स्थान पर कर्ता-प्रश्न लगा देना।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

शेमुषी कक्षा 10 का दशम पाठ ‘अन्योक्तयः’ किस विषय पर आधारित है?

यह पाठ सात अन्योक्ति-श्लोकों का संग्रह है। ‘अन्योक्ति’ का अर्थ है – प्रतीक के माध्यम से अप्रत्यक्ष रूप से किसी के गुण की प्रशंसा या दोष की निन्दा करना। इसमें राजहंस, मेघ, मालाकार, सरोवर एवं चातक के माध्यम से सद्वृत्तियों एवं सत्कर्मों की प्रेरणा दी गई है।

इस पाठ के श्लोक किन-किन ग्रन्थों से लिए गए हैं?

श्लोक 1 से 5 पण्डितराज जगन्नाथ के ‘भामिनीविलासः’ से, छठा श्लोक महाकवि माघ के ‘शिशुपालवधम्’ से तथा सातवाँ श्लोक महाकवि भर्तृहरि के ‘नीतिशतकम्’ से उद्धृत हैं।

चातक को ‘मानी’ (स्वाभिमानी) क्यों कहा गया है?

चातक प्यासा रहकर भी किसी क्षुद्र जलाशय से जल नहीं माँगता; वह केवल इन्द्र (मेघ) से ही याचना करता है अथवा प्यासा रहकर प्राण त्याग देता है। इसी स्वाभिमान के कारण उसे ‘मानी’ कहा गया है।

श्लोक, अन्वय, प्रश्न एवं अभ्यास-शीर्षक NCERT शेमुषी (द्वितीयो भागः) पुस्तक से ज्यों-के-त्यों लिए गए हैं; भावार्थ, सार एवं उत्तर ClearStudy द्वारा मौलिक रूप से तैयार किए गए हैं।

Scroll to Top