Class 7 Sanskrit Deepakam Chapter 2 Solutions (NCERT 2026–27) – नित्यं पिबाम: सुभाषितरसम्

यह पृष्ठ कक्षा 7 संस्कृत दीपकम् (दीपकम्) के द्वितीय पाठ ‘नित्यं पिबाम: सुभाषितरसम्’ का सम्पूर्ण हल प्रस्तुत करता है। इस पाठ में नौ प्रसिद्ध सुभाषितानि संगृहीत हैं, जो जीवन में सद्गुणों, परिश्रम, सत्य, विद्या, मधुर वचन एवं परोपकार की प्रेरणा देते हैं। यहाँ प्रत्येक श्लोक का मूल पाठ, पदच्छेद, अन्वय एवं भावार्थ, सार, शब्दार्थ-तालिका तथा पाठ के अभ्यासः के प्रत्येक प्रश्न एवं उप-भाग का मौलिक, परीक्षा-उपयोगी उत्तर दिया गया है, साथ ही तृतीया-विभक्ति की शब्दरूप-तालिका, अतिरिक्त प्रश्न, MCQ एवं अभिकथन-कारण भी सम्मिलित हैं।

Class: 7 Subject: Sanskrit Book: Deepakam (दीपकम्) Chapter: 2 पाठ: नित्यं पिबाम: सुभाषितरसम् Session: 2026–27

पाठ का अवलोकन (Chapter Overview)

दीपकम् कक्षा 7 का द्वितीय पाठ ‘नित्यं पिबाम: सुभाषितरसम्’ सुभाषितों (सुन्दर एवं हितकारी वचनों) का संग्रह है। पाठ का आरम्भ एक रोचक संवाद से होता है, जिसमें छात्र विद्यालय की भित्ति पर लिखी पंक्ति ‘अयोग्यः पुरुषो नास्ति योजकस्तत्र दुर्लभः’ का भाव अपने आचार्य से पूछते हैं। आचार्य बताते हैं कि श्रेष्ठ जनों द्वारा कहे गए सुवचन ही सुभाषित कहलाते हैं तथा इनके पठन से हमारा नैतिक एवं सामाजिक विकास होता है – ये बताते हैं कि क्या करना चाहिए और क्या नहीं। इसी प्रसंग के बाद नौ सुभाषित दिए गए हैं, जिनमें पाँच ‘व’कारों से युक्त पुरुष की पूज्यता, त्यागने योग्य छह दोष, शुद्धि के साधन, भारतवर्ष का परिचय, निरन्तर अभ्यास का महत्त्व, ज्ञानार्जन की विधि, मधुर वचन, उद्यम (परिश्रम) तथा परोपकार जैसे जीवनोपयोगी मूल्यों की शिक्षा दी गई है।

पाठ-परिचय / प्रसंग

यह पाठ संस्कृत-साहित्य की समृद्ध सुभाषित-परम्परा पर आधारित है। ‘सुभाषित’ शब्द का अर्थ है – ‘सु + भाषित’ अर्थात् सुन्दर रूप से कहा गया हितकारी वचन। ये श्रेष्ठ-जनों (कवियों, ऋषियों, नीतिकारों) के अनुभव से निकले संक्षिप्त किन्तु गहन उपदेश हैं, जो मनुष्यों के ‘विविध-मूल्यों के विकास’ एवं ‘चिन्तन-विकास’ के लिए कहे गए हैं। प्रस्तुत पाठ में संवाद के माध्यम से रमा, सुरेश, सुशीला आदि छात्र आचार्य से सुभाषितों का महत्त्व जानते हैं और फिर नौ सुभाषितों का सस्वर रसपान करते हैं। पाठ का शीर्षक ‘नित्यं पिबाम: सुभाषितरसम्’ का अर्थ है – ‘आओ, हम प्रतिदिन सुभाषितों के रस का पान करें’।

मूल पाठ (सुभाषितानि) + अन्वय एवं भावार्थ

(पाठ के नौ सुभाषित ज्यों-के-त्यों; प्रत्येक के साथ पदच्छेद, अन्वय एवं भावार्थ।)

वस्त्रेण वपुषा वाचा विद्यया विनयेन च ।
वकारैः पञ्चभिर्युक्तो नरो भवति पूजितः ॥ १ ॥ — सुभाषितम् १
पदच्छेदवस्त्रेण वपुषा वाचा विद्यया विनयेन च वकारैः पञ्चभिः युक्तः नरः भवति पूजितः ।
अन्वयवस्त्रेण वपुषा वाचा विद्यया विनयेन च (इति एतैः) पञ्चभिः वकारैः युक्तः नरः पूजितः भवति ।
भावार्थजो मनुष्य उचित वस्त्र धारण करता है, शरीर से स्वस्थ रहता है, सदा मधुर एवं हितकर वचन बोलता है, सदैव अध्ययन में संलग्न रहता है तथा विनम्रतापूर्वक व्यवहार करता है – इन पाँच ‘व’कारों (वस्त्र, वपु अर्थात् शरीर, वाक्, विद्या एवं विनय) से युक्त मनुष्य संसार में सम्मान प्राप्त करता है।
षड् दोषाः पुरुषेणेह हातव्या भूतिमिच्छता ।
निद्रा तन्द्रा भयं क्रोध आलस्यं दीर्घसूत्रता ॥ २ ॥ — सुभाषितम् २
पदच्छेदषड् दोषाः पुरुषेण इह हातव्याः भूतिम् इच्छता निद्रा तन्द्रा भयम् क्रोधः आलस्यम् दीर्घसूत्रता ।
अन्वयइह भूतिम् इच्छता पुरुषेण निद्रा तन्द्रा भयं क्रोधः आलस्यं दीर्घसूत्रता (च इत्येते) षड् दोषाः हातव्याः ।
भावार्थहम मनुष्यों में निद्रा आदि छह दोष होते हैं। ये हमारे ऐश्वर्य एवं उन्नति में बाधक हैं। अतः यदि मनुष्य अपने जीवन में धनवान् अथवा विद्वान् बनना चाहता है और ऐश्वर्य-वैभव प्राप्त करना चाहता है, तो उसे अति-निद्रा, तन्द्रा (आलस्ययुक्त ऊँघ), भय, क्रोध, आलस्य तथा दीर्घसूत्रता (काम को टालने की प्रवृत्ति) – इन छह दोषों का त्याग कर देना चाहिए।
अद्भिर्गात्राणि शुध्यन्ति मनः सत्येन शुध्यति ।
विद्यातपोभ्यां भूतात्मा बुद्धिर्ज्ञानेन शुध्यति ॥ ३ ॥ — सुभाषितम् ३
पदच्छेदअद्भिः गात्राणि शुध्यन्ति मनः सत्येन शुध्यति विद्या-तपोभ्यां भूतात्मा बुद्धिः ज्ञानेन शुध्यति ।
अन्वयगात्राणि अद्भिः शुध्यन्ति । मनः सत्येन शुध्यति । भूतात्मा विद्यातपोभ्यां शुध्यति । बुद्धिः ज्ञानेन शुध्यति ।
भावार्थप्रतिदिन स्नान से मनुष्य का शरीर स्वच्छ होता है। सत्य से मन पवित्र होता है – सत्य बोलने से मन में द्वन्द्व एवं भय नहीं रहता। नित्य विद्याभ्यास एवं परिश्रम (तप) से जीव की शुद्धि होती है तथा ज्ञान से बुद्धि निर्मल होती है। अतः मनुष्य को प्रतिदिन स्नान, सत्यभाषण, विद्याभ्यास, परिश्रम एवं ज्ञानार्जन करना चाहिए।
उत्तरं यत् समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम् ।
वर्षं तद् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः ॥ ४ ॥ — सुभाषितम् ४
पदच्छेदउत्तरं यत् समुद्रस्य हिमाद्रेः च एव दक्षिणं वर्षं तद् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः ।
अन्वययत् समुद्रस्य उत्तरं हिमाद्रेः च दक्षिणं तद् एव भारतं नाम वर्षम्, यत्र भारती सन्ततिः (अस्ति) ।
भावार्थइस सुभाषित में सुभाषितकार भारत के भौगोलिक स्वरूप का वर्णन करते हैं। हिन्द-महासागर के उत्तर भाग में तथा हिमालय के दक्षिण भाग में जो भू-भाग है, उस भू-भाग का नाम ‘भारतवर्ष’ है। यहाँ के नागरिक ‘भारतीय’ इस नाम से प्रसिद्ध हैं।
जलबिन्दुनिपातेन क्रमशः पूर्यते घटः ।
स हेतुः सर्वविद्यानां धर्मस्य च धनस्य च ॥ ५ ॥ — सुभाषितम् ५
पदच्छेदजलबिन्दु-निपातेन क्रमशः पूर्यते घटः सः हेतुः सर्वविद्यानां धर्मस्य च धनस्य च ।
अन्वयघटः क्रमशः जलबिन्दु-निपातेन पूर्यते, सः (अभ्यासः) सर्वविद्यानां धर्मस्य च धनस्य च हेतुः (भवति) ।
भावार्थजैसे जल की बूँदों के निरन्तर गिरने से खाली घड़ा भी क्रमशः भर जाता है, वैसे ही जीवन में निरन्तर अभ्यास से सामान्य मनुष्य भी सब प्रकार का ज्ञान, धर्म एवं धन प्राप्त कर लेता है। तात्पर्य यह है कि निरन्तर अभ्यास ही समस्त विद्या, धर्म एवं धन की प्राप्ति का कारण है।
यः पठति लिखति पश्यति परिपृच्छति पण्डितानुपाश्रयति ।
तस्य दिवाकरकिरणैः नलिनीदलमिव विस्तारिता बुद्धिः ॥ ६ ॥ — सुभाषितम् ६
पदच्छेदयः पठति लिखति पश्यति परिपृच्छति पण्डितान् उपाश्रयति तस्य दिवाकरकिरणैः नलिनीदलम् इव विस्तारिता बुद्धिः ।
अन्वययः पठति लिखति पश्यति परिपृच्छति पण्डितान् उपाश्रयति च तस्य बुद्धिः दिवाकरकिरणैः नलिनीदलम् इव विस्तारिता भवति ।
भावार्थहमें आत्मविकास के लिए सर्वथा श्रेष्ठ जनों के साथ संगति एवं सान्निध्य करना चाहिए। क्योंकि जो निरन्तर पढ़ता है (स्वाध्याय करता है), लिखता है, देखता है, अनेक प्रश्न पूछकर अपना संशय दूर करता है तथा विद्वानों के सान्निध्य में रहता है – उसकी बुद्धि उसी प्रकार विकसित होती है, जैसे सूर्य की किरणों से कमल का फूल पूर्ण रूप से खिल जाता है।
प्रियवाक्यप्रदानेन सर्वे तुष्यन्ति जन्तवः ।
तस्मात् तदेव वक्तव्यं वचने का दरिद्रता ॥ ७ ॥ — सुभाषितम् ७
पदच्छेदप्रियवाक्य-प्रदानेन सर्वे तुष्यन्ति जन्तवः तस्मात् तद् एव वक्तव्यं वचने का दरिद्रता ।
अन्वयसर्वे जन्तवः प्रियवाक्यप्रदानेन तुष्यन्ति, तस्मात् तद् एव वक्तव्यं, वचने का दरिद्रता ?
भावार्थमधुर भाषण से सभी प्राणी, हमारे सभी मित्र, माता, पिता, भाई आदि प्रसन्न हो जाते हैं। मधुर भाषण से कोई हानि नहीं होती। अतः सदा मधुर वचन ही बोलना चाहिए। मधुर बोलने में कभी संकोच (कंजूसी) नहीं करना चाहिए – वाणी में कैसी दरिद्रता?
आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः ।
नास्त्युद्यमसमो बन्धुः कृत्वा यं नावसीदति ॥ ८ ॥ — सुभाषितम् ८
पदच्छेदआलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थः महान् रिपुः न अस्ति उद्यमसमः बन्धुः कृत्वा यं न अवसीदति ।
अन्वयआलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थः महान् रिपुः (अस्ति) । उद्यमसमः बन्धुः नास्ति, (जनः) यं (उद्यमं) कृत्वा न अवसीदति ।
भावार्थआलस्य ही मनुष्य के शरीर में विद्यमान सबसे बड़ा शत्रु है। वही हमारे कार्य के सम्पादन में बाधक होता है। परिश्रम (उद्यम) ही हमारा वास्तविक मित्र है। जो परिश्रम करता है, वह कभी दुःख को प्राप्त नहीं होता, अर्थात् कभी हतोत्साहित नहीं होता।
अष्टादशपुराणेषु व्यासस्य वचनद्वयम् ।
परोपकारः पुण्याय पापाय परपीडनम् ॥ ९ ॥ — सुभाषितम् ९
पदच्छेदअष्टादश-पुराणेषु व्यासस्य वचन-द्वयं परोपकारः पुण्याय पापाय परपीडनम् ।
अन्वयअष्टादशपुराणेषु व्यासस्य वचनद्वयम् (अस्ति) – परोपकारः पुण्याय, परपीडनं पापाय (च भवति) ।
भावार्थमहर्षि वेदव्यास के अठारह पुराणों का सार दो वचनों में है – (1) दूसरों के उपकार से पुण्य होता है, तथा (2) दूसरों को पीड़ा देने से पाप होता है। अतः हमें सदा परोपकार करना चाहिए और दूसरों को पीड़ा कभी नहीं देनी चाहिए।

सार (Hindi Summary)

‘नित्यं पिबाम: सुभाषितरसम्’ पाठ का आरम्भ छात्रों एवं आचार्य के संवाद से होता है। विद्यालय की दीवार पर लिखी पंक्ति ‘अयोग्यः पुरुषो नास्ति योजकस्तत्र दुर्लभः’ का भाव छात्र आचार्य से पूछते हैं। आचार्य समझाते हैं कि संसार में कोई भी मनुष्य अयोग्य नहीं है, सभी योग्य हैं; केवल प्रेरक एवं मार्गदर्शक (योजक) का अभाव रहता है। आगे वे बताते हैं कि श्रेष्ठ-जनों द्वारा कहे गए सुवचन ही ‘सुभाषित’ कहलाते हैं और इनका पठन हमारे नैतिक एवं सामाजिक विकास का कारण बनता है, क्योंकि ये बताते हैं कि क्या करना चाहिए और क्या नहीं।

इसके पश्चात् पाठ में नौ सुभाषित दिए गए हैं। पहले सुभाषित में बताया गया है कि वस्त्र, शरीर, वाणी, विद्या एवं विनय – इन पाँच ‘व’कारों से युक्त मनुष्य सम्मान पाता है। दूसरे में निद्रा, तन्द्रा, भय, क्रोध, आलस्य एवं दीर्घसूत्रता – इन छह दोषों को त्यागने का उपदेश है। तीसरे में शुद्धि के साधन बताए गए हैं – जल से शरीर, सत्य से मन, विद्या-तप से जीव तथा ज्ञान से बुद्धि शुद्ध होती है। चौथे सुभाषित में भारतवर्ष का भौगोलिक परिचय दिया गया है। पाँचवें में निरन्तर अभ्यास का महत्त्व जल-बिन्दु एवं घड़े के उदाहरण से समझाया गया है।

छठे सुभाषित में पढ़ने, लिखने, देखने, प्रश्न पूछने एवं विद्वानों की संगति से बुद्धि के विकास की बात कमल के खिलने के उदाहरण से कही गई है। सातवें में मधुर वचन बोलने का उपदेश है, क्योंकि प्रिय वचन से सभी प्राणी प्रसन्न होते हैं। आठवें में आलस्य को सबसे बड़ा शत्रु एवं उद्यम (परिश्रम) को सबसे अच्छा मित्र बताया गया है। नौवें सुभाषित में महर्षि व्यास के अठारह पुराणों का सार – ‘परोपकार पुण्य है और परपीड़न पाप है’ – दिया गया है। इस प्रकार सम्पूर्ण पाठ सद्गुण, परिश्रम, सत्य, विद्या, मधुर वचन एवं परोपकार जैसे जीवनोपयोगी मूल्यों की प्रेरणा देता है।

शब्दार्थ (Word-meanings)

शब्दः (Sanskrit)संस्कृत अर्थःहिन्दी अर्थEnglish meaning
उत्थायउत्थानं कृत्वाखड़े होकरHaving got up
प्रेरकःप्रेरणादायकःप्रेरित करने वालाOne who inspires
नैतिकःसदाचारयुक्तःनैतिकMoral / ethical
वपुषाशरीरेणशरीर सेBy physique
सम्मानम्आदरःआदरRespect
हातव्याःत्यक्तव्याःछोड़ना चाहिएWorth discarding
भूतिम्वैभवम्ऐश्वर्यProsperity
तन्द्राअकर्मण्यताकर्महीनताLassitude
दीर्घसूत्रताविलम्बकार्यप्रवृत्तिःकार्य को आगे टालने की प्रवृत्तिProcrastination
अवरोधकाःनिवारकाःरोकनेवालेBarriers
वाञ्छतिइच्छतिचाहता/ती हैWants / Desires
अद्भिःजलैःजल सेBy water
भूतात्माजीवःप्राणीSoul
द्वन्द्वःद्वैधीभावःदुविधाDilemma
वर्षम्भूमेः विभागःमहाद्वीप का विभागA division of continent
सन्ततिःअपत्यम्सन्तानProgeny
निपातेनपतनेनगिरने सेBy falling
हेतुःकारणम्कारणReason
परिपृच्छतिसादरं पृच्छतिविनय से पूछता/ती हैHumbly enquires
उपाश्रयतिसमीपम् गच्छतिपास जाता/जाती हैApproaches
सङ्गतिःसंसर्गःसंगAssociation
तुष्यन्तिसन्तोषम् अनुभवन्तिसंतुष्ट होते हैंFeeling satisfied
रिपुःशत्रुःवैरीEnemy
पुण्यम्सत्कर्मणां फलम्सत्कार्यों के फलFruits of meritorious deeds
परपीडनम्अन्येभ्यः कष्टप्रदानम्दूसरों को पीड़ा देनाBothering others

अभ्यासः (वयम् अभ्यासं कुर्मः)

1. अधोलिखितानां प्रश्नानाम् उत्तराणि एकपदेन लिखन्तु —

(क) नरः कतिभिः वकारैः पूजितः भवति ?

उत्तरपञ्चभिः (वकारैः) ।

(ख) पुरुषेण कति दोषाः हातव्याः ?

उत्तरषड् (षट्) दोषाः ।

(ग) बुद्धिः केन शुध्यति ?

उत्तरज्ञानेन

(घ) जलबिन्दुनिपातेन क्रमशः कः पूर्यते ?

उत्तरघटः

(ङ) आलस्यं केषां महान् रिपुः अस्ति ?

उत्तरमनुष्याणाम्

2. निम्नलिखितानां प्रश्नानाम् उत्तराणि पूर्णवाक्येन लिखन्तु —

(क) नरः कथं पूजितो भवति ?

उत्तरनरः वस्त्रेण वपुषा वाचा विद्यया विनयेन च – एतैः पञ्चभिः वकारैः युक्तः सन् पूजितः भवति ।

(ख) पुरुषेण के दोषाः हातव्याः ?

उत्तरभूतिम् इच्छता पुरुषेण निद्रा, तन्द्रा, भयं, क्रोधः, आलस्यं, दीर्घसूत्रता च – एते षड् दोषाः हातव्याः ।

(ग) कस्य बुद्धिः विस्तारिता भवति ?

उत्तरयः पठति, लिखति, पश्यति, परिपृच्छति, पण्डितान् उपाश्रयति च तस्य (जनस्य) बुद्धिः विस्तारिता भवति ।

(घ) किं कृत्वा मनुष्यः नावसीदति ?

उत्तरउद्यमं (परिश्रमं) कृत्वा मनुष्यः न अवसीदति ।

(ङ) व्यासस्य वचनद्वयं किम् ?

उत्तरव्यासस्य वचनद्वयम् अस्ति – परोपकारः पुण्याय (भवति), परपीडनं च पापाय (भवति) ।

3. उदाहरणानुसारं श्लोकांशान् यथोचितं योजयन्तु —

(श्लोक के पूर्वार्ध को उसके सही उत्तरार्ध से मिलाइए।)

श्लोकांशः (पूर्वार्धम्)सही योजना (उत्तरार्धम्)
(क) विद्यया वपुषा वाचा वस्त्रेण विनयेन च ।वकारैः पञ्चभिर्युक्तो नरो भवति पूजितः ॥
(ख) षड् दोषाः पुरुषेणेह हातव्या भूतिमिच्छता ।निद्रा तन्द्रा भयं क्रोध आलस्यं दीर्घसूत्रता ॥
(ग) अद्भिर्गात्राणि शुध्यन्ति मनः सत्येन शुध्यति ।विद्यातपोभ्यां भूतात्मा बुद्धिर्ज्ञानेन शुध्यति ॥
(घ) उत्तरं यत् समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम् ।वर्षं तद् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः ॥
(ङ) जलबिन्दुनिपातेन क्रमशः पूर्यते घटः ।स हेतुः सर्वविद्यानां धर्मस्य च धनस्य च ॥

4. निम्नलिखितानां वाक्यानां समानार्थकान् श्लोकांशान् पाठात् चित्वा लिखन्तु —

(क) मधुरवाण्या सर्वे प्रसन्नाः भवन्ति ।

उत्तर‘प्रियवाक्यप्रदानेन सर्वे तुष्यन्ति जन्तवः ।’

(ख) परिश्रमेण तुल्यः बान्धवः नास्ति ।

उत्तर‘नास्त्युद्यमसमो बन्धुः ।’

(ग) परोपकारेण मानवस्य पुण्यार्जनं भवति ।

उत्तर‘परोपकारः पुण्याय ।’

(घ) हिन्दमहासागरात् हिमालयपर्यन्तं भारतवर्षम् ।

उत्तर‘उत्तरं यत् समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम् । वर्षं तद् भारतं नाम ।’

5. अधोलिखितानां शब्दानाम् उदाहरणानुसारं पर्यायपदानि लिखन्तु —

यथा – वपुः – शरीरम् ।

उत्तर (क) जलम् – नीरम् / सलिलम् / अम्बु / तोयम् (ख) लोचनम् – नेत्रम् / नयनम् / चक्षुः / अक्षि (ग) धनम् – द्रव्यम् / वित्तम् / अर्थः / वसु (घ) बुद्धिः – मेधा / प्रज्ञा / धीः / मतिः (ङ) रिपुः – शत्रुः / वैरी / अरिः / सपत्नः

6. अधः रिक्तस्थानानि तृतीयाविभक्तेः समुचितरूपैः पूरयन्तु —

(रिक्तस्थानों को तृतीया विभक्ति के उचित रूप से भरिए। नीचे की तालिका में रिक्त-स्थानों के उत्तर मोटे अक्षरों में दिए गए हैं।)

एकवचनम्द्विवचनम्बहुवचनम्
सुधाखण्डेनसुधाखण्डाभ्याम्सुधाखण्डैः
वृक्षेणवृक्षाभ्याम्वृक्षैः
लतयालताभ्याम्लताभिः
देशेनदेशाभ्याम्देशैः
पुण्येनपुण्याभ्याम्पुण्यैः
विनयेनविनयाभ्याम्विनयैः

7. कोष्ठके पदानि विलिख्य सुभाषितं पूरयन्तु —

(दिए गए पदों से सुभाषित (श्लोक 4 एवं 7) को पूर्ण कीजिए।)

उत्तर उत्तरं यत् समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम् ।
वर्षं तद्भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः
प्रियवाक्यप्रदानेन सर्वे तुष्यन्ति जन्तवः
तस्मात् तदेव वक्तव्यम् वचने का दरिद्रता

8. उपर्युक्तानि सुभाषितानि पठित्वा रिक्तस्थानानि पूरयन्तु —

उत्तर (क) आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः । (ख) तस्मात् तदेव वक्तव्यम् वचने का दरिद्रता । (ग) यः पठति लिखति पृच्छति पण्डितानुपाश्रयति (घ) स हेतुः सर्वविद्यानां धर्मस्य च धनस्य च । (ङ) विद्यातपोभ्यां भूतात्मा बुद्धिर्ज्ञानेन शुध्यति ।

अत्र इदम् अवधेयम् (व्याकरण-तालिका)

पाठ में ‘अत्र इदम् अवधेयम्’ के अन्तर्गत तृतीया-विभक्ति के शब्दरूप दिए गए हैं, जिन्हें उच्च स्वर से पढ़कर कण्ठस्थ करना चाहिए।

लिङ्गःशब्दःएकवचनम्द्विवचनम्बहुवचनम्
पुंल्लिङ्गशब्दाःछात्रछात्रेणछात्राभ्याम्छात्रैः
शिक्षकशिक्षकेणशिक्षकाभ्याम्शिक्षकैः
स्त्रीलिङ्गशब्दाःविद्याविद्ययाविद्याभ्याम्विद्याभिः
छात्राछात्रयाछात्राभ्याम्छात्राभिः
नपुंसकलिङ्गशब्दाःसत्यसत्येनसत्याभ्याम्सत्यैः
ज्ञानज्ञानेनज्ञानाभ्याम्ज्ञानैः
सर्वनामकिम्केनकाभ्याम्कैः

योग्यताविस्तरः & परियोजनाकार्यम्

योग्यताविस्तरः – पर्यायपदानि (अमरकोशः)

शब्दःपर्यायपदानि (अमरकोशात्)
वपुःगात्रं वपुः संहननं शरीरं वर्ष्म विग्रहः ।
नराःमनुष्याः मानुषाः मर्त्याः मनुजाः मानवाः नराः ।
भूतिःविभूतिः भूतिः ऐश्वर्यम् ।
मनःचित्तं तु चेतो हृदयं स्वान्तं हृन्मानसं मनः ।
बुद्धिःबुद्धिर्मनीषा धिषणा धीः प्रज्ञा शेमुषी मतिः ।
धनम्द्रव्यं वित्तं स्वापतेयं रिक्थम् ऋक्थं धनं वसु ।
पण्डितःविद्वान् विपश्चित् दोषज्ञः सन् सुधीः कोविदो बुधः ।
दिवाकरःसूरः सूर्यः अर्यमा आदित्यः द्वादशात्मा दिवाकरः ।
जन्तुःप्राणी तु चेतनः जन्मी जन्तुः जन्युः शरीरी ।
रिपुःरिपुः वैरी सपत्नः अरिः द्विषन् दुर्हृत् ।

परियोजनाकार्यम् (Project Work)

1. ‘शुध्’ इति धातोः लट्-लकारस्य रूपाणि स्फोरकपत्रे लिखित्वा आनयन्तु ।

मार्गदर्शनम् (नमूना)‘शुध्’ (शुध्यति) धातु, लट्-लकार, परस्मैपद –
प्रथमपुरुषः: शुध्यति, शुध्यतः, शुध्यन्ति ।
मध्यमपुरुषः: शुध्यसि, शुध्यथः, शुध्यथ ।
उत्तमपुरुषः: शुध्यामि, शुध्यावः, शुध्यामः ।
इन रूपों को चार्ट-पेपर (स्फोरकपत्र) पर सुन्दर अक्षरों में लिखकर कक्षा में लाइए।

2. सुभाषितेषु आगतानि तृतीयाविभक्तिरूपाणि संगृह्य उत्तरपुस्तिकायां लिखन्तु । तेषां प्रयोगं कृत्वा वाक्यानि अपि लिखन्तु ।

उत्तर (नमूना)पाठ के सुभाषितों में आए तृतीया-विभक्ति के रूप – वस्त्रेण, वपुषा, वाचा, विद्यया, विनयेन, अद्भिः, सत्येन, विद्यातपोभ्यां, ज्ञानेन, जलबिन्दुनिपातेन, दिवाकरकिरणैः, प्रियवाक्यप्रदानेन । प्रयोग-वाक्य – (i) सः विद्यया शोभते । (ii) वयं सत्येन जीवामः । (iii) छात्रः ज्ञानेन वर्धते ।

3. कार्यकलापः – ‘सुभाषितकण्ठपाठविषये’ एकां प्रतियोगितां वर्गे, कक्षायां, विद्यालये च आयोजयन्तु ।

मार्गदर्शनम्यह समूह-गतिविधि है। अपने वर्ग एवं विद्यालय में सुभाषितों के कण्ठस्थ पाठ (सस्वर वाचन) की एक प्रतियोगिता आयोजित कीजिए, जिसमें छात्र पाठ के नौ सुभाषित स्मृति से शुद्ध उच्चारण के साथ सुनाएँ।

अतिरिक्त प्रश्न (Extra Questions)

लघु उत्तरीय प्रश्न (30–40 शब्द)

1. ‘सुभाषित’ किसे कहते हैं?

उत्तरश्रेष्ठ-जनों (कवियों, ऋषियों एवं नीतिकारों) द्वारा कहे गए सुन्दर एवं हितकारी सुवचन ही ‘सुभाषित’ कहलाते हैं। ये मनुष्यों के विविध-मूल्यों एवं चिन्तन के विकास के लिए कहे जाते हैं तथा बताते हैं कि क्या करना चाहिए और क्या नहीं।

2. किन पाँच ‘व’कारों से युक्त मनुष्य सम्मान पाता है?

उत्तरवस्त्र, वपु (शरीर), वाक् (वाणी), विद्या एवं विनय – इन पाँच ‘व’कारों से युक्त मनुष्य संसार में सम्मान प्राप्त करता है, अर्थात् वह उत्तम वस्त्र, स्वस्थ शरीर, मधुर वाणी, विद्या एवं विनम्रता से शोभित होता है।

3. ऐश्वर्य चाहने वाले मनुष्य को किन छह दोषों का त्याग करना चाहिए?

उत्तरऐश्वर्य एवं उन्नति चाहने वाले मनुष्य को निद्रा (अति-निद्रा), तन्द्रा, भय, क्रोध, आलस्य तथा दीर्घसूत्रता (काम टालने की प्रवृत्ति) – इन छह दोषों का त्याग करना चाहिए, क्योंकि ये उन्नति में बाधक हैं।

4. ‘जलबिन्दुनिपातेन क्रमशः पूर्यते घटः’ से क्या शिक्षा मिलती है?

उत्तरजैसे जल की बूँदों के निरन्तर गिरने से खाली घड़ा भर जाता है, वैसे ही निरन्तर अभ्यास से सामान्य मनुष्य भी समस्त विद्या, धर्म एवं धन प्राप्त कर लेता है। इससे ‘निरन्तर अभ्यास’ का महत्त्व प्रकट होता है।

5. महर्षि व्यास के अनुसार अठारह पुराणों का सार क्या है?

उत्तरमहर्षि व्यास के अनुसार अठारह पुराणों का सार दो वचनों में है – परोपकार करने से पुण्य होता है तथा दूसरों को पीड़ा देने से पाप होता है। अतः सदा परोपकार करना चाहिए एवं परपीड़न से बचना चाहिए।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (100–120 शब्द)

6. पाठ ‘नित्यं पिबाम: सुभाषितरसम्’ में दिए गए शुद्धि के साधनों का वर्णन कीजिए।

उत्तरपाठ के तीसरे सुभाषित में मनुष्य की पूर्ण शुद्धि के चार साधन बताए गए हैं। पहला – शरीर की शुद्धि जल से होती है, अर्थात् प्रतिदिन स्नान से शरीर स्वच्छ रहता है। दूसरा – मन की शुद्धि सत्य से होती है; सत्य बोलने से मन में द्वन्द्व एवं भय नहीं रहता। तीसरा – जीव (आत्मा) की शुद्धि विद्या एवं तप (परिश्रम) से होती है।चौथा – बुद्धि की शुद्धि ज्ञान से होती है, अर्थात् ज्ञान से बुद्धि निर्मल एवं विवेकशील बनती है। इस प्रकार सुभाषित यह शिक्षा देता है कि मनुष्य को बाह्य स्वच्छता के साथ-साथ आन्तरिक पवित्रता पर भी ध्यान देना चाहिए। केवल शरीर धोने से शुद्धि पूर्ण नहीं होती; सत्य, विद्या, परिश्रम एवं ज्ञान से ही मनुष्य का सम्पूर्ण व्यक्तित्व पवित्र एवं श्रेष्ठ बनता है।

7. आलस्य एवं उद्यम के विषय में पाठ का सन्देश अपने शब्दों में लिखिए।

उत्तरपाठ के आठवें सुभाषित में आलस्य एवं उद्यम (परिश्रम) की तुलना की गई है। यहाँ आलस्य को मनुष्य के शरीर में ही विद्यमान ‘सबसे बड़ा शत्रु’ कहा गया है, क्योंकि वही हमारे प्रत्येक कार्य के सम्पादन में बाधक बनता है। आलस्य के कारण मनुष्य अपने योग्य कार्य भी समय पर पूरे नहीं कर पाता और उन्नति से वंचित रह जाता है।इसके विपरीत उद्यम (परिश्रम) को सबसे अच्छा मित्र (बन्धु) बताया गया है। यह वह बन्धु है, जिसे करने पर मनुष्य कभी दुःखी अथवा हतोत्साहित नहीं होता। तात्पर्य यह है कि सफलता एवं समृद्धि का मार्ग परिश्रम ही है। अतः हमें आलस्य का त्याग करके सदा उद्यमशील रहना चाहिए, क्योंकि परिश्रम ही जीवन में विजय, धन एवं सम्मान दिलाता है।

8. चौथे सुभाषित के आधार पर भारतवर्ष के भौगोलिक स्वरूप का वर्णन कीजिए।

उत्तरपाठ के चौथे सुभाषित में सुभाषितकार भारतवर्ष का भौगोलिक परिचय देते हैं। उनके अनुसार जो भू-भाग समुद्र (हिन्द-महासागर) के उत्तर में तथा हिमालय (हिमाद्रि) के दक्षिण में स्थित है, उसी भू-भाग का नाम ‘भारतवर्ष’ है। इस प्रकार उत्तर में हिमालय एवं दक्षिण में समुद्र इस देश की प्राकृतिक सीमाएँ बनाते हैं।सुभाषित में यह भी कहा गया है कि इस भू-भाग में रहने वाली सन्तति (नागरिक) ‘भारती’ अर्थात् ‘भारतीय’ इस नाम से प्रसिद्ध है। यह सुभाषित प्राचीन काल से ही भारत की एक स्पष्ट भौगोलिक एवं सांस्कृतिक पहचान को दर्शाता है तथा हमारे मन में मातृभूमि के प्रति गौरव एवं प्रेम का भाव जगाता है।

MCQ & अभिकथन-कारण

1. इस पाठ का शीर्षक है—

(क) वन्दे भारतमातरम्

(ख) नित्यं पिबाम: सुभाषितरसम्

(ग) सेवा हि परमो धर्मः

(घ) दशमः कः?

उत्तर(ख) नित्यं पिबाम: सुभाषितरसम्।

2. कितने ‘व’कारों से युक्त मनुष्य पूजित होता है?

(क) त्रिभिः

(ख) चतुर्भिः

(ग) पञ्चभिः

(घ) षड्भिः

उत्तर(ग) पञ्चभिः। (वस्त्र, वपु, वाक्, विद्या, विनय)

3. ऐश्वर्य चाहने वाले को कितने दोषों का त्याग करना चाहिए?

(क) चत्वारः

(ख) पञ्च

(ग) षट् (षड्)

(घ) सप्त

उत्तर(ग) षट् (षड्) दोष।

4. ‘मनः’ की शुद्धि किससे होती है?

(क) जलेन

(ख) सत्येन

(ग) ज्ञानेन

(घ) तपसा

उत्तर(ख) सत्येन।

5. ‘बुद्धिः’ की शुद्धि किससे होती है?

(क) अद्भिः

(ख) सत्येन

(ग) ज्ञानेन

(घ) विनयेन

उत्तर(ग) ज्ञानेन।

6. भारतवर्ष किसके उत्तर एवं हिमालय के दक्षिण में है?

(क) समुद्रस्य

(ख) नद्याः

(ग) वनस्य

(घ) पर्वतस्य

उत्तर(क) समुद्रस्य (के उत्तर में)।

7. जल की बूँदों के निरन्तर गिरने से क्या भर जाता है?

(क) सरोवरः

(ख) घटः

(ग) नदी

(घ) कूपः

उत्तर(ख) घटः।

8. किसकी बुद्धि कमल के समान विकसित होती है?

(क) यः केवलं शेते

(ख) यः पठति लिखति पश्यति परिपृच्छति च

(ग) यः क्रीडति

(घ) यः धनं सञ्चिनोति

उत्तर(ख) यः पठति लिखति पश्यति परिपृच्छति च।

9. पाठ के अनुसार मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु कौन है?

(क) क्रोधः

(ख) आलस्यम्

(ग) लोभः

(घ) भयम्

उत्तर(ख) आलस्यम्।

10. व्यास के वचनद्वय के अनुसार पुण्य किससे होता है?

(क) परपीडनेन

(ख) परोपकारेण

(ग) धनसञ्चयेन

(घ) निद्रया

उत्तर(ख) परोपकारेण।
उत्तर-कुंजी: 1-(ख), 2-(ग), 3-(ग), 4-(ख), 5-(ग), 6-(क), 7-(ख), 8-(ख), 9-(ख), 10-(ख)

अभिकथन-कारण – नीचे अभिकथन (A) और कारण (R) दिए गए हैं। सही विकल्प चुनिए—
(क) A और R दोनों सही, R, A की सही व्याख्या है। (ख) A और R दोनों सही, पर R, A की सही व्याख्या नहीं। (ग) A सही, R गलत। (घ) A गलत, R सही।

1. अभिकथन (A): ऐश्वर्य चाहने वाले मनुष्य को आलस्य का त्याग करना चाहिए।

कारण (R): आलस्य निद्रा, तन्द्रा आदि छह दोषों में से एक है, जो उन्नति में बाधक होते हैं।

उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है।

2. अभिकथन (A): निरन्तर अभ्यास से सामान्य मनुष्य भी विद्या, धर्म एवं धन प्राप्त कर लेता है।

कारण (R): जैसे जल-बिन्दुओं के निरन्तर गिरने से घड़ा भर जाता है, वैसे ही निरन्तर अभ्यास फलदायी होता है।

उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है।

3. अभिकथन (A): मधुर वचन बोलने में कभी संकोच नहीं करना चाहिए।

कारण (R): प्रिय वचन से सभी प्राणी प्रसन्न होते हैं तथा मधुर भाषण में कोई हानि नहीं है।

उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है।

4. अभिकथन (A): मन की शुद्धि केवल जल से होती है।

कारण (R): ‘मनः सत्येन शुध्यति’ – मन की शुद्धि सत्य से होती है, जल से तो शरीर शुद्ध होता है।

उत्तर(घ) A गलत है, किन्तु R सही है – जल से शरीर की और सत्य से मन की शुद्धि होती है।

5. अभिकथन (A): परोपकार पुण्य का कारण है।

कारण (R): अठारह पुराणों के सारस्वरूप व्यास के वचनद्वय में परोपकार को पुण्य एवं परपीड़न को पाप कहा गया है।

उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है।

परीक्षा-सुझाव एवं सामान्य त्रुटियाँ

परीक्षा-सुझाव (Exam Tips)

  • नौ सुभाषित कण्ठस्थ करें – श्लोक-पूर्ति, रिक्तस्थान-पूर्ति एवं श्लोकांश-योजना के प्रश्न प्रायः इन्हीं से आते हैं।
  • प्रत्येक सुभाषित का अन्वय एवं भावार्थ अलग से याद रखें; एकपदेन एवं पूर्णवाक्येन दोनों प्रकार के उत्तर लिखने का अभ्यास करें।
  • शब्दार्थ (वपुषा, भूतिम्, दीर्घसूत्रता, अद्भिः, परपीडनम् आदि) हिन्दी एवं अंग्रेज़ी दोनों में याद रखें।
  • तृतीया-विभक्ति की शब्दरूप-तालिका (छात्रेण, विद्यया, ज्ञानेन, केन) तथा रिक्तस्थान-पूर्ति का अभ्यास करें।
  • पर्यायपद (जलम्, लोचनम्, धनम्, बुद्धिः, रिपुः) एवं अमरकोश के पर्याय याद रखें।

सामान्य त्रुटियाँ (Common Mistakes)

  • मात्रा एवं विसर्ग की अशुद्धि – भूतिम्, हातव्याः, सन्ततिः, रिपुः को शुद्ध लिखें।
  • तृतीया-विभक्ति के रूप में भूल – स्त्रीलिङ्ग ‘लता’ का एकवचन ‘लतया’ (न कि ‘लतेन’)।
  • शुद्धि-साधनों में मिश्रण – जल से शरीर, सत्य से मन, ज्ञान से बुद्धि – इन्हें न उलझाएँ।
  • ‘षड् दोषाः’ को ‘पञ्च दोषाः’ लिख देना – दोष छह हैं, ‘व’कार पाँच।
  • एकपदेन उत्तर वाले प्रश्न में पूरा वाक्य तथा पूर्णवाक्येन वाले में केवल एक शब्द लिख देना।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

दीपकम् कक्षा 7 पाठ 2 ‘नित्यं पिबाम: सुभाषितरसम्’ में क्या है?

इस पाठ में नौ प्रसिद्ध सुभाषित (सुन्दर हितकारी वचन) संगृहीत हैं, जो सद्गुण, परिश्रम, सत्य, विद्या, मधुर वचन एवं परोपकार जैसे जीवनोपयोगी मूल्यों की शिक्षा देते हैं। शीर्षक का अर्थ है – ‘आओ, हम प्रतिदिन सुभाषितों के रस का पान करें’।

‘सुभाषित’ का क्या अर्थ है?

‘सुभाषित’ (सु + भाषित) का अर्थ है – श्रेष्ठ जनों द्वारा सुन्दर रूप से कहा गया हितकारी वचन। ये मनुष्य के नैतिक एवं सामाजिक विकास तथा चिन्तन-विकास के लिए कहे जाते हैं।

इस पाठ के अनुसार शुद्धि के साधन कौन-से हैं?

तीसरे सुभाषित के अनुसार – शरीर की शुद्धि जल से, मन की शुद्धि सत्य से, जीव (आत्मा) की शुद्धि विद्या एवं तप से तथा बुद्धि की शुद्धि ज्ञान से होती है।

सुभाषितानि, प्रश्न एवं अभ्यास-शीर्षक NCERT दीपकम् पुस्तक से ज्यों-के-त्यों लिए गए हैं; अन्वय, भावार्थ, सार एवं उत्तर ClearStudy द्वारा मौलिक रूप से तैयार किए गए हैं।

Scroll to Top