Class 7 Sanskrit Deepakam Chapter 4 Solutions — न लभ्यते चेत् आम्लं द्राक्षाफलम्
Class 7 Sanskrit Deepakam Chapter 4 solutions: खट्टे अंगूर की कथा का हिन्दी अर्थ, सात अभ्यासों के क्रमबद्ध उत्तर, लट्-लकार के आत्मनेपद रूप और परियोजना का नमूना पढ़ें।
- पाठ का अवलोकन (Chapter Overview)
- पाठ-परिचय / प्रसंग
- मूल गीत-पाठ + अन्वय
- सार (Hindi Summary)
- शब्दार्थ (Word-meanings)
- अभ्यासः (वयम् अभ्यासं कुर्मः)
- अत्र इदम् अवधेयम् (व्याकरण-तालिकाः)
- योग्यताविस्तरः, परियोजनाकार्यम् & कार्यकलापः
- अतिरिक्त प्रश्न (Extra Questions)
- MCQ & अभिकथन-कारण
- परीक्षा-सुझाव एवं सामान्य त्रुटियाँ
- अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
पाठ का अवलोकन (Chapter Overview)
दीपकम् कक्षा 7 का चतुर्थ पाठ ‘न लभ्यते चेत् आम्लं द्राक्षाफलम्’ एक रोचक गीत-रूप कथा है, जो विश्वप्रसिद्ध ‘खट्टे अंगूर’ (Sour Grapes) की कहानी पर आधारित है। पाठ का आरम्भ एक चित्र-संवाद से होता है, जिसमें छात्र आचार्य को बताते हैं कि चित्र में एक वृक्ष, द्राक्षाफल (अंगूर) तथा एक शृगाल (लोमड़ी) है, जो अंगूर खाना चाहता है किन्तु नहीं पहुँच पाता। तत्पश्चात् यही कथा संस्कृत में गीत-रूप में प्रस्तुत की गई है। प्यास एवं भूख से व्याकुल एक शृगाल वन में भटकता है, अंगूर की बेल पर लगे फल देखकर उसके मुख में लार आ जाती है। वह बार-बार उछलता है पर फल नहीं पा पाता; अन्ततः ‘अंगूर खट्टे हैं’ कहकर वहाँ से भाग जाता है। पाठ का केन्द्रीय भाव यह है कि परिश्रम का फल न मिलने पर बहाना बनाना या वस्तु को निरर्थक बताना उचित नहीं – निरन्तर सच्चे प्रयत्न से ही सफलता मिलती है।
पाठ-परिचय / प्रसंग
यह पाठ एक सरल गीत-रूप (गीति-कथा) में रचा गया है, जिसे छात्र अभिनय एवं सस्वर गायन के साथ सीखते हैं। पाठ का आरम्भ चित्र पर आधारित कक्षा-संवाद से होता है, जहाँ आचार्य छात्रों से चित्र में दिख रही वस्तुओं के विषय में पूछते हैं और छात्र इस कथा को संस्कृत में गीत-रूप एवं अभिनय के साथ सीखने की इच्छा प्रकट करते हैं। कथा का नायक एक शृगाल (लोमड़ी) है। यह कथा हमें लट्-लकार आत्मनेपद की क्रियाओं (जायते, लभते, पलायते आदि) से भी परिचित कराती है। संदेश स्पष्ट है – जब कोई वस्तु प्रयत्न करने पर भी न मिले तो उसे ‘खट्टी’ (निरर्थक) कहकर अपनी असमर्थता को छिपाना मूर्खता है।
मूल गीत-पाठ + अन्वय
(दीपकम् पुस्तक का गीत-पाठ ज्यों-के-त्यों; नीचे प्रत्येक पद का सरल अन्वय/भावार्थ।)
पिपासया बुभुक्षया वनं गच्छति
सः वनं गच्छति, सः वनं गच्छति ।
तत्र गच्छति, किमपि न लभते
इतोऽपि गच्छति, किमपि न लभते
सः श्रान्तः जायते, खिन्नः जायते
किं च करोति ? सः किं च करोति ?
वामतः पश्यति, दक्षिणतः पश्यति
अग्रतः पश्यति, पृष्ठतः पश्यति
तस्य स्वेदः जायते, तृषा जायते
किं च पश्यति ? सः किं च पश्यति ?
सः पश्यति द्राक्षालतां, सः पश्यति द्राक्षाफलम्
उपरि उपरि लतासु दृश्यते च तत्फलम्
अनुक्षणं तन्मुखे रसः जायते
किं च करोति ? सः किं च करोति ?
एकवारम् उत्पतति, द्विवारम् उत्पतति
त्रिवारम् उत्पतति, पुनः पुनः उत्पतति
तस्य स्वेदः जायते, तस्य श्रमः जायते
किं कथयति ? सः किं कथयति ?
आम्लं द्राक्षाफलम्, आम्लं द्राक्षाफलम्
इत्येवं कथयति, सः पलायते
इत्येवं कथयति, सः पलायते ॥ — दीपकम् (कक्षा 7), चतुर्थः पाठः
अन्वय / भावार्थ
(1) एकः शृगालः पिपासया बुभुक्षया च (पीड़ितः सन्) वनं गच्छति। सः तत्र गच्छति, इतः अपि गच्छति, किन्तु किमपि (खाद्यं जलं वा) न लभते। (अतः) सः श्रान्तः खिन्नः च जायते। (तदा) सः किं करोति?
(2) सः वामतः, दक्षिणतः, अग्रतः, पृष्ठतः च पश्यति। तस्य स्वेदः तृषा च जायते। (तदा) सः किं पश्यति?
(3) सः द्राक्षालतां (अंगूर की बेल) पश्यति, द्राक्षाफलं च पश्यति। उपरि उपरि लतासु तत् फलं दृश्यते। अनुक्षणं (तत्क्षण ही) तस्य मुखे रसः (लार) जायते। (तदा) सः किं करोति?
(4) सः एकवारम्, द्विवारम्, त्रिवारम्, पुनः पुनः च उत्पतति (उछलता है)। तस्य स्वेदः श्रमः च जायते (किन्तु फलं न लभते)। (तदा) सः किं कथयति?
(5) ‘द्राक्षाफलम् आम्लम् (अस्ति)’ इति एवं सः कथयति, (तथा) सः पलायते (वहाँ से भाग जाता है)।
सार (Hindi Summary)
‘न लभ्यते चेत् आम्लं द्राक्षाफलम्’ पाठ एक गीत-रूप कथा है, जो खट्टे अंगूर की प्रसिद्ध नीति-कथा पर आधारित है। एक शृगाल (लोमड़ी) प्यास और भूख से व्याकुल होकर वन में जाता है। वह इधर-उधर बहुत घूमता है, किन्तु उसे खाने या पीने को कुछ भी नहीं मिलता। परिणामस्वरूप वह थक जाता है और दुःखी हो उठता है। वह बायीं ओर, दायीं ओर, आगे और पीछे – चारों दिशाओं में कुछ खोजते हुए देखता है। थकान और प्यास के कारण उसके शरीर से पसीना बहने लगता है।
तभी उसकी दृष्टि अंगूर की एक बेल (द्राक्षालता) पर पड़ती है, जिस पर ऊपर-ऊपर अंगूर के फल लटक रहे होते हैं। फलों को देखते ही उसके मुँह में तुरन्त लार (रस) भर आती है। फलों को पाने के लिए वह एक बार, दो बार, तीन बार और फिर बार-बार ऊपर उछलता है, परन्तु फल बहुत ऊँचाई पर होने के कारण उसके हाथ नहीं आते। बार-बार उछलने से वह और अधिक थक जाता है तथा उसका सारा परिश्रम व्यर्थ हो जाता है।
अन्त में, जब वह किसी भी प्रकार अंगूर नहीं पा पाता, तो अपनी असफलता को छिपाने के लिए वह कहता है – ‘ये अंगूर तो खट्टे हैं, ये अंगूर तो खट्टे हैं।’ ऐसा कहकर वह वहाँ से भाग जाता है। इस कथा से शिक्षा मिलती है कि परिश्रम करने पर भी यदि कोई वस्तु न मिले तो उसे निरर्थक या खराब बताकर बहाना नहीं बनाना चाहिए। प्रयत्न और धैर्य महत्त्वपूर्ण हैं; असफलता के कारण जाँचकर उपाय बदलना भी सीखना चाहिए। शृगाल ने अंगूर चखे ही नहीं, इसलिए उनका स्वाद खट्टा होने का निष्कर्ष प्रमाणित नहीं है।

शब्दार्थ (Word-meanings)
| शब्दः (Sanskrit) | संस्कृत अर्थः | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|---|
| शृगालः | लोमशा | लोमड़ी | Fox |
| वनम् | काननम् | जंगल, अरण्य | Forest |
| पिपासा | पातुम् इच्छा | प्यास | Thirst |
| बुभुक्षा | भोक्तुम् इच्छा | भूख | Hunger |
| किमपि | यत् किञ्चित् | कुछ भी | Anything |
| इतोऽपि | अतः परम् अपि | और भी (आगे भी) | More than this |
| लभते | प्राप्नोति | पाता है | Gets |
| श्रान्तः | क्लान्तः | थका हुआ | Tired |
| खिन्नः | दुःखितः | खेद से युक्त, उदास | Sad / dejected |
| जायते | भवति | होता है | Becomes |
| वामतः | वामभागे | बायीं ओर | Towards left |
| दक्षिणतः | दक्षिणभागे | दाहिनी ओर | Towards right |
| अग्रतः | अग्रभागे | आगे | In front |
| पृष्ठतः | पृष्ठभागे | पीछे | Behind |
| स्वेदः | घर्मः | पसीना | Sweat |
| तृषा | पिपासा | प्यास | Thirst |
| द्राक्षालताम् | द्राक्षाफलस्य वल्लीम् | अंगूर की बेल को | Grape-vine climber |
| उपरि | ऊर्ध्वभागे | ऊपर | Above |
| दृश्यते | अवलोक्यते | देखा जाता है | Is seen |
| अनुक्षणम् | क्षणाभ्यन्तरे | उसी क्षण, तुरन्त | Immediately |
| रसः | लालारसः / मुखस्रावः | लार | Saliva |
| एकवारम् | सकृत् | एक बार | Once |
| द्विवारम् | वारद्वयम् / द्विः | दो बार | Twice |
| उत्पतति | कूर्दते | कूदता है, उछलता है | Jumps |
| पुनः पुनः | भूयो भूयः | बार-बार | Frequently |
| कथयति | वदति | कहता है | Tells |
| आम्लम् | आम्लरसयुक्तम् | खट्टा | Sour |
| द्राक्षाफलम् | मृद्वीकाफलम् | अंगूर | Grapes |
| पलायते | अन्यत्र धावति | भाग जाता है | Runs away |
अभ्यासः (वयम् अभ्यासं कुर्मः)
1. एकः शृगालः इति गीतस्य साभिनयं कक्षायां गानं कुर्वन्तु ।
2. अधः प्रदत्तानां प्रश्नानाम् एकपदेन पदद्वयेन वा उत्तरं लिखन्तु —
(क) कः वनं गच्छति ?
(ख) शृगालः कां पश्यति ?
(ग) शृगालस्य मुखे किं जायते ?
(घ) द्राक्षालतायां शृगालः किं पश्यति ?
(ङ) द्राक्षाफलं कुत्र दृश्यते ?
(च) किं शृगालः पुनः पुनः उत्पतति ?
(छ) किं शृगालः द्राक्षाफलं प्राप्नोति ?
3. अधः प्रदत्तानां प्रश्नानां पूर्णवाक्येन उत्तरं लिखन्तु —
(क) शृगालः कथं वनं गच्छति ?
(ख) वनं गत्वा शृगालस्य किं जायते ?
(ग) शृगालः द्राक्षाफलं कुत्र पश्यति ?
(घ) द्राक्षाफलं दृष्ट्वा कस्य मुखे रसः जायते ?
(ङ) अन्ते शृगालः किं वदति ?
4. उपरि प्रदत्तां मञ्जूषां दृष्ट्वा रिक्तस्थानेषु उचितक्रियापदानि लिखन्तु —
(मञ्जूषा में दिए गए ‘वन्दते / वन्देथे / वन्दामहे’ आदि रूपों को देखकर लट्-लकार आत्मनेपद की पूरी तालिका भरिए। नीचे पूर्ण उत्तर दिए गए हैं।)
| धातुः | पुरुषः | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
|---|---|---|---|---|
| (क) वन्द् (वन्दते) | प्रथमपुरुषः | वन्दते | वन्देते | वन्दन्ते |
| मध्यमपुरुषः | वन्दसे | वन्देथे | वन्दध्वे | |
| उत्तमपुरुषः | वन्दे | वन्दावहे | वन्दामहे | |
| (ख) पलाय् (पलायते) | प्रथमपुरुषः | पलायते | पलायेते | पलायन्ते |
| मध्यमपुरुषः | पलायसे | पलायेथे | पलायध्वे | |
| उत्तमपुरुषः | पलाये | पलायावहे | पलायामहे | |
| (ग) जन् (जायते) | प्रथमपुरुषः | जायते | जायेते | जायन्ते |
| मध्यमपुरुषः | जायसे | जायेथे | जायध्वे | |
| उत्तमपुरुषः | जाये | जायावहे | जायामहे |
5. उदाहरणानुसारम् एकवचनरूपं दृष्ट्वा द्विवचन-बहुवचनरूपाणि लिखन्तु —
यथा – कम्प् : कम्पते (एकवचनम्), कम्पेते (द्विवचनम्), कम्पन्ते (बहुवचनम्) ।
| धातुः | एकवचनम् | द्विवचनम् (उत्तर) | बहुवचनम् (उत्तर) |
|---|---|---|---|
| कम्प् | कम्पते | कम्पेते | कम्पन्ते |
| वर्ध् | वर्धते | वर्धेते | वर्धन्ते |
| वृत् | वर्तसे | वर्तेथे | वर्तध्वे |
| प्र + काश् | प्रकाशते | प्रकाशेते | प्रकाशन्ते |
| वन्द् | वन्दे | वन्दावहे | वन्दामहे |
| याच् | याचते | याचेते | याचन्ते |
| लज्ज् | लज्जसे | लज्जेथे | लज्जध्वे |
| वीक्ष् | वीक्षते | वीक्षेते | वीक्षन्ते |
| सेव् | सेवे | सेवावहे | सेवामहे |
| वन्द् | वन्दसे | वन्देथे | वन्दध्वे |
| शुभ् | शोभते | शोभेते | शोभन्ते |
6. उदाहरणानुसारं वाक्यद्वयं लिखन्तु —
यथा – शत्रुः (पलाय्) → शत्रुः पलायते । चोराः (पलाय्) → चोराः पलायन्ते ।
| प्रश्नः | एकवचन-वाक्यम् (उत्तर) | बहुवचन-वाक्यम् (उत्तर) |
|---|---|---|
| (क) वृक्षः / बालाः (वर्ध्) | वृक्षः वर्धते । | बालाः वर्धन्ते । |
| (ख) छात्रः / भक्ताः (वन्द्) | छात्रः वन्दते । | भक्ताः वन्दन्ते । |
| (ग) वैद्यः / प्रेक्षकाः (वीक्ष्) | वैद्यः वीक्षते । | प्रेक्षकाः वीक्षन्ते । |
| (घ) कर्मचारी / महिलाः (सेव्) | कर्मचारी सेवते । | महिलाः सेवन्ते । |
| (ङ) वृक्षः / रुग्णाः (कम्प्) | वृक्षः कम्पते । | रुग्णाः कम्पन्ते । |
7. उदाहरणं दृष्ट्वा वाक्यानि उचितरूपैः पूरयन्तु —
यथा – शुनकं दृष्ट्वा बालकस्य भयं (जाय्) → शुनकं दृष्ट्वा बालकस्य भयं जायते ।
अत्र इदम् अवधेयम् (व्याकरण-तालिकाः)
इस पाठ में जायते, लभते, पलायते जैसे अनेक क्रियापद हैं। ये सब आत्मनेपदी धातुएँ हैं। इनके लट्-लकार (वर्तमान काल) के रूप किस प्रकार बनते हैं, इस पर ध्यान देना आवश्यक है। पाठ में दी गई ‘लभ्’ धातु की तालिका इस प्रकार है —
1. लभ् (लट्-लकारः, आत्मनेपदम्)
| पुरुषः | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
|---|---|---|---|
| प्रथमः पुरुषः | लभते | लभेते | लभन्ते |
| मध्यमः पुरुषः | लभसे | लभेथे | लभध्वे |
| उत्तमः पुरुषः | लभे | लभावहे | लभामहे |
आत्मनेपद की पहचान – प्रथमपुरुष एकवचन में प्रायः ‘-ते’ प्रत्यय आता है (जायते, लभते, पलायते, वन्दते आदि), जबकि परस्मैपद में ‘-ति’ (गच्छति, पठति) आता है।
लभते — वह पाता है, कर्तृवाच्य; लभ्यते — पाया जाता है, कर्मवाच्य। शीर्षक में लभ्यते और गीत में दृश्यते कर्मवाच्य के रूप हैं। आत्मनेपद का अर्थ हर वाक्य में “अपने लिए कार्य” होना भी आवश्यक नहीं। प्रश्न 5 में पुरुष न बदलें: वर्तसे → वर्तेथे → वर्तध्वे, जबकि वन्दे → वन्दावहे → वन्दामहे।
2. पाठ में प्रयुक्त मुख्य आत्मनेपदी क्रियापद
| धातुः | लट् प्र.पु. एकवचनम् | अर्थः |
|---|---|---|
| जन् | जायते | होता है / उत्पन्न होता है |
| लभ् | लभते | पाता है |
| पलाय् (परा + अय्) | पलायते | भाग जाता है |
योग्यताविस्तरः, परियोजनाकार्यम् & कार्यकलापः
योग्यताविस्तरः (श्लोक-पठनम्)
पाठ के अन्त में ‘योग्यताविस्तरः’ के अन्तर्गत दो प्रेरक श्लोक दिए गए हैं, जिन्हें ऊँचे स्वर में पढ़कर अर्थ समझना है।
प्रारभ्य विघ्नविहता विरमन्ति मध्याः ।
विघ्नैः पुनः पुनरपि प्रतिहन्यमानाः
प्रारभ्य चोत्तमजनाः न परित्यजन्ति ॥ १ ॥
गच्छन् पिपीलको याति योजनानां शतान्यपि ।
अगच्छन् वैनतेयोऽपि पदमेकं न गच्छति ॥ २ ॥
भावार्थ – (1) नीच (अधम) पुरुष विघ्नों के भय से कार्य आरम्भ ही नहीं करते; मध्यम पुरुष कार्य आरम्भ करके विघ्न आने पर उसे बीच में छोड़ देते हैं; किन्तु उत्तम पुरुष बार-बार विघ्नों से आहत होने पर भी आरम्भ किए हुए कार्य को नहीं छोड़ते। (2) चलती हुई चींटी सैकड़ों योजन दूरी तय कर लेती है, किन्तु न चलने वाला गरुड़ भी एक पग आगे नहीं जा पाता – अर्थात् सतत प्रयत्न ही सफलता का मूल है।
परियोजनाकार्यम् (Project Work)
त्वं जीवने कदाचित् अभीष्टं वस्तु न लभसे । कदाचित् तव लक्ष्यपूर्तिः न भवति । तदा त्वं किं करोषि, किं च चिन्तयसि इति संस्कृतभाषया / स्वभाषया प्रसङ्गसहितं लिख ।
कार्यकलापः (Activity)
मुखेन द्राक्षाफलस्य ग्रहणम् – इति क्रीडां कारयामः ।
अतिरिक्त प्रश्न (Extra Questions)
अतिरिक्त लघु प्रश्न — ClearStudy अभ्यास
1. शृगाल वन में क्यों गया था?
2. द्राक्षाफल देखकर शृगाल की क्या दशा हुई?
3. शृगाल फल क्यों नहीं पा सका?
4. अन्त में शृगाल ने क्या कहा और क्या किया?
5. इस पाठ में कौन-सी आत्मनेपदी क्रियाएँ प्रयुक्त हुई हैं?
अतिरिक्त व्याख्यात्मक प्रश्न — ClearStudy अभ्यास
6. ‘न लभ्यते चेत् आम्लं द्राक्षाफलम्’ पाठ की कथा अपने शब्दों में लिखिए।
7. इस पाठ से हमें क्या शिक्षा (सन्देश) मिलती है?
8. आत्मनेपद एवं परस्मैपद में क्या अन्तर है? पाठ से उदाहरण देकर समझाइए।
MCQ & अभिकथन-कारण
1. इस पाठ का नायक कौन है?
(क) सिंहः
(ख) शृगालः
(ग) मूषकः
(घ) मार्जारः
2. शृगाल किन कारणों से व्याकुल होकर वन गया?
(क) क्रोधेन
(ख) पिपासया बुभुक्षया च
(ग) भयेन
(घ) निद्रया
3. शृगाल ने बेल पर क्या देखा?
(क) पुष्पम्
(ख) पत्रम्
(ग) द्राक्षाफलम्
(घ) जलम्
4. द्राक्षाफल देखकर शृगाल के मुख में क्या उत्पन्न हुआ?
(क) रसः (लार)
(ख) भयम्
(ग) क्रोधः
(घ) निद्रा
5. फल पाने के लिए शृगाल ने क्या किया?
(क) निद्राम् अकरोत्
(ख) पुनः पुनः उत्पतति (बार-बार उछला)
(ग) रोदिति स्म
(घ) गीतम् अगायत्
6. क्या शृगाल को द्राक्षाफल प्राप्त हुआ?
(क) आम्, सरलतया
(ख) न, सः न प्राप्नोति
(ग) अर्धम् एव
(घ) अन्येन दत्तम्
7. अन्त में शृगाल ने अंगूरों के विषय में क्या कहा?
(क) मधुरं द्राक्षाफलम्
(ख) आम्लं द्राक्षाफलम्
(ग) पक्वं द्राक्षाफलम्
(घ) रिक्तं द्राक्षाफलम्
8. अन्त में शृगाल ने क्या किया?
(क) फलम् अखादत्
(ख) तत्र अस्वपत्
(ग) पलायते (भाग गया)
(घ) पुनः उत्पतति
9. ‘जायते, लभते, पलायते’ किस प्रकार की क्रियाएँ हैं?
(क) परस्मैपदी
(ख) आत्मनेपदी
(ग) उभयपदी
(घ) अव्यय
10. इस पाठ की मुख्य शिक्षा क्या है?
(क) असफलता पर बहाना बनाना ठीक है
(ख) परिश्रम के बाद भी वस्तु न मिलने पर उसे को निरर्थक कहना उचित नहीं
(ग) भूखे रहना उत्तम है
(घ) वन में नहीं जाना चाहिए
अभिकथन-कारण – नीचे अभिकथन (A) और कारण (R) दिए गए हैं। सही विकल्प चुनिए—
(क) A और R दोनों सही, R, A की सही व्याख्या है। (ख) A और R दोनों सही, पर R, A की सही व्याख्या नहीं। (ग) A सही, R गलत। (घ) A गलत, R सही।
1. अभिकथन (A): शृगाल वन में भटकते हुए थक एवं उदास हो गया।
कारण (R): इधर-उधर बहुत घूमने पर भी उसे खाने-पीने को कुछ नहीं मिला।
2. अभिकथन (A): द्राक्षाफल देखते ही शृगाल के मुख में रस (लार) उत्पन्न हुआ।
कारण (R): फलों को देखकर उन्हें खाने की प्रबल इच्छा जाग्रत हुई।
3. अभिकथन (A): शृगाल को अन्ततः द्राक्षाफल प्राप्त हो गया।
कारण (R): फल बेल पर बहुत ऊँचाई पर लगे थे, अतः बार-बार उछलने पर भी वे उसके हाथ नहीं आए।
4. अभिकथन (A): शृगाल ने अंगूरों को खट्टा (आम्ल) कहा।
कारण (R): अंगूर सचमुच पूर्णतः कच्चे एवं खट्टे थे, इसलिए उसने उन्हें छोड़ दिया।
5. अभिकथन (A): ‘जायते, लभते, पलायते’ आत्मनेपदी क्रियाएँ हैं।
कारण (R): आत्मनेपद की लट्-लकार प्रथमपुरुष एकवचन क्रियाओं में प्रायः ‘-ते’ प्रत्यय लगता है।
परीक्षा-सुझाव एवं सामान्य त्रुटियाँ
परीक्षा-सुझाव (Exam Tips)
- गीत-पाठ की पंक्तियाँ कण्ठस्थ करें – क्रम-निर्धारण एवं रिक्तस्थान-पूर्ति के प्रश्न प्रायः इन्हीं से आते हैं।
- शब्दार्थ (शृगालः, पिपासा, बुभुक्षा, स्वेदः, द्राक्षालता, उत्पतति, पलायते आदि) हिन्दी एवं अंग्रेज़ी दोनों में याद रखें।
- आत्मनेपद लट्-लकार (लभ्, जन्, पलाय्, वन्द्) की पूरी तालिका तीनों पुरुष एवं तीनों वचन सहित याद करें।
- ‘पूर्णवाक्येन उत्तरम्’ वाले प्रश्नों में पूरा वाक्य लिखें; ‘एकपदेन’ वाले प्रश्नों में केवल एक/दो पद।
- ‘आम् / न’ वाले प्रश्नों में उचित उत्तर के साथ पूरा वाक्य भी लिख दें (यथा – आम्, शृगालः पुनः पुनः उत्पतति)।
सामान्य त्रुटियाँ (Common Mistakes)
- आत्मनेपद को परस्मैपद बना देना – ‘लभते’ को ‘लभति’ लिखना गलत है।
- द्विवचन रूपों में भूल – लभ् का द्विवचन ‘लभेते’ है (न कि ‘लभतः’)।
- ‘पलायते’ का अर्थ ‘लेट जाता है’ समझ लेना – इसका अर्थ है ‘भाग जाता है’।
- संधि/मात्रा की अशुद्धि – इतोऽपि, अनुक्षणम्, बुभुक्षा को शुद्ध लिखें।
- कथा का भाव उलट देना – अंगूर खट्टे नहीं थे; न पाने पर शृगाल ने उन्हें खट्टा कहा।
पाठ्यपुस्तक संदर्भ: NCERT दीपकम्, कक्षा 7, पाठ 4, पृष्ठ 39–46; उपलब्ध प्रति का पुनर्मुद्रण 2026–27। उत्तर और व्याख्याएँ ClearStudy की मौलिक शिक्षण सामग्री हैं; खुली गतिविधियों के उत्तर नमूने हैं। आधिकारिक NCERT पुस्तक पोर्टल।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
दीपकम् कक्षा 7 का पाठ 4 ‘न लभ्यते चेत् आम्लं द्राक्षाफलम्’ किस पर आधारित है?
यह पाठ ‘खट्टे अंगूर’ (Sour Grapes) की प्रसिद्ध नीति-कथा पर आधारित एक संस्कृत गीत-पाठ है, जिसमें एक प्यासा-भूखा शृगाल (लोमड़ी) अंगूर पाने में असफल रहने पर उन्हें खट्टा कहकर भाग जाता है।
शृगाल को द्राक्षाफल क्यों नहीं मिला?
अंगूर के फल बेल पर बहुत ऊँचाई पर लगे थे। शृगाल ने एक बार, दो बार, तीन बार और फिर बार-बार उछलकर प्रयत्न किया, परन्तु ऊँचाई के कारण फल उसके हाथ नहीं आए।
इस पाठ की मुख्य व्याकरण-सीख क्या है?
इस पाठ में जायते, लभते, पलायते जैसी आत्मनेपदी क्रियाएँ हैं। यह पाठ लट्-लकार के आत्मनेपद रूपों का अभ्यास कराता है। केवल -ते देखकर धातु का पद तय न करें; कर्मवाच्य में भी ये प्रत्यय आते हैं।
अतिरिक्त प्रश्न, MCQ और अभिकथन-कारण ClearStudy के अभ्यास हैं। मूल पुस्तक भी साथ में पढ़ें।
