कक्षा 7 संस्कृत दीपकम् पाठ 5 ‘सेवा हि परमो धर्मः’ हल (NCERT 2026–27)

यह पृष्ठ कक्षा 7 संस्कृत दीपकम् (दीपकम्) पाठ 5 ‘सेवा हि परमो धर्मः’ का सम्पूर्ण समाधान देता है – प्रसिद्ध रसायनशास्त्रज्ञ एवं चिकित्सक नागार्जुन की वह कथा जो सिखाती है कि सच्चे चिकित्सक के लिए सेवाभावना ही सर्वोच्च धर्म है। यहाँ मूल पाठ, अन्वय/भावार्थ, सार, शब्दार्थ तथा पाठ के सम्पूर्ण अभ्यास (हर प्रश्न एवं उप-भाग) के मौलिक, परीक्षा-उपयोगी उत्तर, क्तवतु-प्रत्यय एवं ‘स्म’-प्रयोग की व्याकरण-तालिकाएँ, अतिरिक्त प्रश्न, 10 MCQ, 5 अभिकथन-कारण तथा FAQ दिए गए हैं।

Class: 7 Subject: Sanskrit Book: Deepakam (दीपकम्) Chapter: 5 पाठः: सेवा हि परमो धर्मः Session: 2026–27

पाठ का अवलोकन (Chapter Overview)

दीपकम् कक्षा 7 का पंचम पाठ ‘सेवा हि परमो धर्मः’ एक प्रेरक गद्य-कथा है। पाठ का आरम्भ छात्रों एवं आचार्या के संवाद से होता है, जिसमें यह विचार उठता है कि जीवन में सफलता के लिए विद्या, उपाधि, पदवी एवं धन के साथ-साथ मानवीय गुण भी आवश्यक हैं। इसी भाव से सम्बद्ध प्रसिद्ध रसायनशास्त्रज्ञ एवं चिकित्सक नागार्जुन की कथा प्रस्तुत की गई है। नागार्जुन को एक सहायक की आवश्यकता थी। उन्होंने दो योग्य युवकों की परीक्षा ली। एक युवक ने अपने घर की समस्याओं को छोड़कर समय पर औषध बनाकर दिखा दी; दूसरा युवक मार्ग में एक रोगी की सेवा में लग गया और समय पर औषध न बना सका। फिर भी नागार्जुन ने दूसरे युवक को चुना, क्योंकि उसमें सेवाभावना थी। पाठ का केन्द्रीय भाव है – सेवा ही सर्वोच्च धर्म है, और सेवाभावना के बिना सच्चा चिकित्सक नहीं बन सकता।

पाठ-परिचय / प्रसंग

प्रस्तुत पाठ एक गद्य-कथा है जो मानवीय गुणों, विशेषतः सेवा एवं करुणा के महत्त्व को रेखांकित करती है। पाठ की पृष्ठभूमि में सिद्धार्थ (गौतम बुद्ध) का उदाहरण है – जिनके जीवन में विद्या, धन एवं पद सब कुछ था, किन्तु वे मानवीय गुणों के कारण ही महात्मा बने। सत्य, करुणा, उदारता, सेवा, परोपकार एवं अक्रोध जैसे मानवीय गुणों से सम्बद्ध इस कथा का नायक आचार्य नागार्जुन है, जो रसायनशास्त्र एवं चिकित्सा का प्रसिद्ध विद्वान था। व्याकरण की दृष्टि से यह पाठ क्तवतु-प्रत्यय (भूतकाल-बोधक) तथा ‘स्म’-अव्यय के प्रयोग द्वारा भूतकाल बनाने का अभ्यास कराता है।

मूल पाठ एवं अन्वय/भावार्थ

(पाठ की मुख्य गद्य-कथा – मूल वाक्य ज्यों-के-त्यों, साथ में सरल हिन्दी भावार्थ।)

1. प्रियच्छात्राः! जीवने सफलतायै मानवः किं किम् अर्जयेत्? विद्याम्! उपाधिम्! पदवीम्! धनम्! — किम् एतदेव पर्याप्तम्? अन्यत् किम् आवश्यकं महोदये?
भावार्थ – आचार्या पूछती हैं – प्रिय छात्रो! जीवन में सफलता के लिए मनुष्य को क्या-क्या अर्जित करना चाहिए? छात्र उत्तर देते हैं – विद्या! उपाधि! पदवी! धन! किन्तु एक छात्र पूछता है – क्या इतना ही पर्याप्त है? और क्या आवश्यक है, महोदये?
2. मानवीयाः गुणाः अपि आवश्यकाः भोः! यथा सिद्धार्थस्य जीवने विद्या, धनं, पदं च सर्वमपि आसीत्। किन्तु मानवीयगुणैः एव सः महात्मा बुद्धः जातः। सत्यं, करुणा, उदारता, सेवा, परोपकारः, अक्रोधः इत्यादयः मानवीयाः गुणाः सन्ति।
भावार्थ – आचार्या कहती हैं – मानवीय गुण भी आवश्यक हैं! जैसे सिद्धार्थ के जीवन में विद्या, धन एवं पद सब कुछ था, किन्तु मानवीय गुणों से ही वे महात्मा बुद्ध बने। सत्य, करुणा, उदारता, सेवा, परोपकार, अक्रोध आदि मानवीय गुण हैं।
3. नागार्जुनः प्रसिद्धः रसायनशास्त्रज्ञः चिकित्सकः च आसीत्। सः अहोरात्रं प्रयोगशालायां कार्यं करोति स्म। एकदा सः महाराजं निवेदितवान् – “महाराज! मम चिकित्साकार्याय एकः सहायकः आवश्यकः” इति। राजा एतद् अङ्गीकृतवान् उक्तवान् च – ‘अस्तु, अहं व्यवस्थां करोमि। श्वः के चन योग्याः युवकाः आगमिष्यन्ति। भवान् परीक्षां कृत्वा तेषु युवकेषु कमपि योग्यं स्वीकरोतु’ इति।
भावार्थ – नागार्जुन प्रसिद्ध रसायनशास्त्रज्ञ एवं चिकित्सक था। वह दिन-रात प्रयोगशाला में कार्य करता था। एक बार उसने महाराज से निवेदन किया – “महाराज! मेरे चिकित्सा-कार्य के लिए एक सहायक आवश्यक है।” राजा ने यह स्वीकार किया और कहा – ‘ठीक है, मैं व्यवस्था करता हूँ। कल कुछ योग्य युवक आएँगे। आप परीक्षा करके उन युवकों में से किसी योग्य को चुन लें।’
4. अन्यस्मिन् दिने द्वौ युवकौ आगतवन्तौ। नागार्जुनः द्वयोः विद्याभ्यासविषये पृष्टवान्। द्वयोः अपि विद्याभ्यासविषयः समानः एव आसीत्। तदा नागार्जुनः तौ एकं विशिष्टं रसायनं निर्माय आगच्छताम् इति सूचितवान्। तदर्थं दिनद्वयस्य अवसरं दत्तवान्। “गमनसमये राजमार्गेण गच्छताम्” इत्यपि सूचितवान्।
भावार्थ – अगले दिन दो युवक आए। नागार्जुन ने दोनों से उनकी पढ़ाई के विषय में पूछा। दोनों की पढ़ाई का स्तर समान ही था। तब नागार्जुन ने उन दोनों को एक विशिष्ट रसायन (औषध) बनाकर आने को कहा। इसके लिए दो दिन का अवसर दिया। “जाते समय राजमार्ग से जाना” – यह भी कहा।
5. दिनद्वयानन्तरं नागार्जुनस्य समीपे प्रथमः युवकः आगतवान्। “औषधनिर्माणे किमपि कष्टं न अभवत् खलु?” इति नागार्जुनः पृष्टवान्। युवकः स्वनिष्ठां दर्शयितुं स्वगृहस्य समस्याः वर्णितवान् – “पितुः उदरवेदना, मातुः ज्वरः च आसीत्। तथापि अहं तत्सर्वं परित्यज्य औषधं निर्मितवान्” इति उक्त्वा नागार्जुनाय रसायनं दत्तवान्।
भावार्थ – दो दिन बाद नागार्जुन के पास पहला युवक आया। नागार्जुन ने पूछा – “औषध बनाने में कोई कष्ट तो नहीं हुआ?” युवक ने अपनी निष्ठा दिखाने के लिए अपने घर की समस्याएँ बताईं – “पिता को पेट-दर्द एवं माता को ज्वर था। फिर भी मैंने वह सब छोड़कर औषध बना ली” – यह कहकर उसने नागार्जुन को रसायन दे दिया।
6. तदभ्यन्तरे द्वितीयः युवकः अपि आगतवान्। सः खिन्नः आसीत्। तमपि नागार्जुनः पृष्टवान्। तदा युवकः उक्तवान् “अहम् औषधं निर्मातुं न शक्तवान्” इति। “किमर्थं न शक्तवान्?” इति नागार्जुनः पृच्छति। युवकः उक्तवान् – “राजमार्गे अहं कञ्चित् रोगिणं दृष्टवान्। तस्य परिस्थितिः शोचनीया आसीत्। अहं तं स्वगृहं नीतवान्। दिनद्वयं तस्य एव सेवायां निरतः आसम्। अद्य प्रातः सः स्वस्थः अभवत्। अहं ततः साक्षात् अत्र आगतवान्। रसायननिर्माणार्थं समयम् एव न प्राप्तवान्” इति।
भावार्थ – इसी बीच दूसरा युवक भी आया। वह उदास था। नागार्जुन ने उससे भी पूछा। तब युवक ने कहा “मैं औषध नहीं बना सका।” नागार्जुन ने पूछा – “क्यों नहीं बना सके?” युवक बोला – “राजमार्ग पर मैंने एक रोगी को देखा। उसकी दशा दयनीय थी। मैं उसे अपने घर ले गया। दो दिन तक उसी की सेवा में लगा रहा। आज सुबह वह स्वस्थ हो गया। मैं वहाँ से सीधे यहाँ आ गया। रसायन बनाने के लिए समय ही नहीं मिला।”
7. तदनन्तरं नागार्जुनः द्वितीयं युवकं सहायकत्वेन स्वीकृतवान्। राजा एतं वृत्तान्तं श्रुत्वा आश्चर्यं प्रकटितवान्। सः नागार्जुनं पृष्टवान् – “प्रथमः युवकः औषधं कृत्वा आनीतवान्। द्वितीयः तथा न कृतवान्। तथापि भवान् किमर्थं द्वितीयं चितवान्?” नागार्जुनः अवदत् – “द्वितीयः अपि औषधनिर्माणे कुशलः अस्ति। किन्तु तेन समयः न प्राप्तः। यतः सः सेवायां निरतः आसीत्। तं रोगिणम् अहं पूर्वमेव मार्गे दृष्टवान्। अतः ‘राजमार्गेण गन्तव्यम्’ इति अहं युवकद्वयं सूचितवान्। प्रथमः रोगिणं दृष्ट्वा अपि अग्रे गतवान्। सः यन्त्रवत् कार्यं करोति। तस्मिन् सेवायाः भावना नास्ति। सेवाभावनां विना चिकित्सकः कथं भवेत्? अतः अहं द्वितीयस्य चयनं कृतवान्” इति।
भावार्थ – इसके बाद नागार्जुन ने दूसरे युवक को सहायक के रूप में स्वीकार किया। राजा यह वृत्तान्त सुनकर आश्चर्यचकित हुआ। उसने नागार्जुन से पूछा – “पहला युवक औषध बनाकर लाया, दूसरे ने नहीं बनाई; फिर भी आपने दूसरे को क्यों चुना?” नागार्जुन बोला – “दूसरा भी औषध बनाने में कुशल है, पर उसे समय नहीं मिला क्योंकि वह सेवा में लीन था। उस रोगी को मैंने पहले ही मार्ग में देख लिया था। इसीलिए मैंने दोनों युवकों को ‘राजमार्ग से जाना’ कहा था। पहला युवक रोगी को देखकर भी आगे बढ़ गया। वह यन्त्र की भाँति कार्य करता है; उसमें सेवा की भावना नहीं है। सेवाभावना के बिना कोई चिकित्सक कैसे बन सकता है? इसीलिए मैंने दूसरे का चयन किया।”

सार (Hindi Summary)

‘सेवा हि परमो धर्मः’ पाठ का आरम्भ आचार्या एवं छात्रों के एक रोचक संवाद से होता है। आचार्या पूछती हैं कि जीवन में सफलता के लिए मनुष्य को क्या अर्जित करना चाहिए। छात्र विद्या, उपाधि, पदवी एवं धन का उत्तर देते हैं। तब आचार्या समझाती हैं कि इनके साथ-साथ मानवीय गुण – सत्य, करुणा, उदारता, सेवा, परोपकार एवं अक्रोध – भी आवश्यक हैं। उदाहरणस्वरूप सिद्धार्थ के पास विद्या, धन एवं पद सब था, फिर भी वे मानवीय गुणों के कारण ही महात्मा बुद्ध बने।

इन्हीं गुणों से जुड़ी नागार्जुन की कथा प्रस्तुत है। नागार्जुन प्रसिद्ध रसायनशास्त्रज्ञ एवं चिकित्सक था, जो दिन-रात प्रयोगशाला में कार्य करता था। उसे एक सहायक की आवश्यकता थी। राजा ने दो योग्य युवक भेजे। नागार्जुन ने दोनों को एक विशिष्ट औषध दो दिन में बनाकर लाने को कहा और ‘राजमार्ग से ही आना’ भी कहा। पहला युवक घर की समस्याएँ (पिता का पेट-दर्द, माता का ज्वर) छोड़कर समय पर औषध बना लाया। दूसरा युवक उदास होकर बिना औषध के आया और बताया कि उसने मार्ग में एक दयनीय रोगी को देखा, उसे अपने घर ले जाकर दो दिन सेवा की, और रोगी स्वस्थ हो गया; इसी कारण उसे औषध बनाने का समय नहीं मिला।

नागार्जुन ने दूसरे युवक को सहायक चुना। राजा को आश्चर्य हुआ तो नागार्जुन ने बताया कि दोनों औषध-निर्माण में कुशल थे, किन्तु पहला युवक रोगी को देखकर भी यन्त्र की भाँति आगे बढ़ गया – उसमें सेवा की भावना नहीं थी। दूसरे युवक ने रोगी की सेवा को प्राथमिकता दी। नागार्जुन का स्पष्ट विचार था – “सेवाभावना के बिना कोई सच्चा चिकित्सक नहीं बन सकता।” इस प्रकार पाठ का संदेश है – सेवा ही सर्वोच्च धर्म है। केवल कौशल एवं ज्ञान पर्याप्त नहीं; करुणा एवं सेवाभावना ही मनुष्य को सच्चे अर्थ में महान बनाती है।

शब्दार्थ (Word-meanings)

शब्दः (Sanskrit)हिन्दी अर्थEnglish meaning
उपाधिम्उपाधि को (नामचिह्नम्)Degree
पदवीम्पदवी को (पदनाम)Designation / Position
मानवीयाःमानवों में होने वाले (गुण)Humane (qualities)
रसायनशास्त्रज्ञःरसायनशास्त्र का विशेषज्ञChemist & druggist
चिकित्सकःवैद्य (भिषक्)Physician
प्रयोगशालायाम्प्रयोगशाला मेंIn the laboratory
अङ्गीकृतवान्स्वीकार किया (स्वीकृतवान्)Accepted
व्यवस्थाम्व्यवस्था को (प्रबन्धनम्)Arrangement
अन्यस्मिन् दिनेअगले दिन (अपरस्मिन् दिवसे)On another day
राजमार्गःराजमार्ग (मुख्यमार्गः)Highway
खिन्नःदुःखी (दुःखितः)Sad
(अहम्) शक्तवान्(मैं) कर सका (समर्थः अभवम्)(I) could do
रोगिणम्रोगी को (अस्वस्थम्)For/the sick person
शोचनीयादुःखदायी (दयनीया)Miserable
निरतःमग्न / लीनEngrossed
वृत्तान्तम्प्रसङ्ग को (घटनाम्)Anecdote
चितवान्चुना (चयनं कृतवान्)Selected
यन्त्रवत्यन्त्र की भाँति (यन्त्रम् इव)Like a machine
कषायम्काढ़ा को (क्वाथम्)Herbal decoction
निवेदितवान्निवेदन कियाRequested / submitted

अभ्यासः (वयम् अभ्यासं कुर्मः)

1. अधोलिखितानां प्रश्नानाम् एकपदेन पदद्वयेन वा उत्तराणि लिखन्तु —

(क) कः प्रसिद्धः चिकित्सकः आसीत्?

उत्तरनागार्जुनः (प्रसिद्धः चिकित्सकः आसीत्)।

(ख) अन्यस्मिन् दिवसे कौ आगतौ?

उत्तरद्वौ युवकौ (आगतौ)।

(ग) कः खिन्नः आसीत्?

उत्तरद्वितीयः युवकः (खिन्नः आसीत्)।

(घ) रुग्णस्य परिस्थितिः कथम् आसीत्?

उत्तररुग्णस्य परिस्थितिः शोचनीया आसीत्।

(ङ) नागार्जुनः सहायकरूपेण कं चितवान्?

उत्तरनागार्जुनः सहायकरूपेण द्वितीयं युवकम् चितवान्।

(च) कां विना चिकित्सकः न भवति?

उत्तरसेवाभावनां विना चिकित्सकः न भवति।

(छ) नागार्जुनः युवकौ केन मार्गेण गन्तुं सूचितवान्?

उत्तरनागार्जुनः युवकौ राजमार्गेण गन्तुं सूचितवान्।

2. अधोलिखितानां प्रश्नानां पूर्णवाक्येन उत्तरं लिखन्तु —

(क) अहोरात्रं नागार्जुनः कुत्र कार्यं करोति स्म?

उत्तरअहोरात्रं नागार्जुनः प्रयोगशालायां कार्यं करोति स्म।

(ख) नागार्जुनः महाराजं किं निवेदितवान्?

उत्तरनागार्जुनः महाराजं निवेदितवान् – “मम चिकित्साकार्याय एकः सहायकः आवश्यकः” इति।

(ग) प्रथमः युवकः कथं कार्यं कृतवान्?

उत्तरप्रथमः युवकः स्वगृहस्य समस्याः (पितुः उदरवेदनां मातुः ज्वरं च) परित्यज्य औषधं निर्मितवान्; सः यन्त्रवत् (सेवाभावनां विना) कार्यं कृतवान्।

(घ) द्वितीयः युवकः राजमार्गे रोगिणं दृष्ट्वा किं कृतवान्?

उत्तरद्वितीयः युवकः राजमार्गे रोगिणं दृष्ट्वा तं स्वगृहं नीतवान् दिनद्वयं च तस्य सेवायां निरतः अभवत्

(ङ) सेवायाः भावनां विना किं न भवेत्?

उत्तरसेवायाः भावनां विना (उत्तमः) चिकित्सकः न भवेत्।

3. उदाहरणानुसारम् अधोलिखितानां पदानां स्त्रीलिङ्गरूपाणि लिखन्तु —

यथा – पठितवान् → (एकवचनम्) पठितवती, (बहुवचनम्) पठितवत्यः।

पुंलिङ्गम् (पद)स्त्रीलिङ्गे एकवचनम्स्त्रीलिङ्गे बहुवचनम्
(क) पठितवान्पठितवतीपठितवत्यः
(ख) गतवान्गतवतीगतवत्यः
(ग) लिखितवान्लिखितवतीलिखितवत्यः
(घ) खादितवान्खादितवतीखादितवत्यः
(ङ) क्रीडितवान्क्रीडितवतीक्रीडितवत्यः
(च) हसितवान्हसितवतीहसितवत्यः
(छ) निवेदितवान्निवेदितवतीनिवेदितवत्यः
(ज) सूचितवान्सूचितवतीसूचितवत्यः

4. उदाहरणानुसारम् अधोलिखितानां पदानां पुंलिङ्गरूपाणि लिखन्तु।

यथा – पठितवती → (एकवचनम्) पठितवान्, (बहुवचनम्) पठितवन्तः।

स्त्रीलिङ्गम् (पद)पुंलिङ्गे एकवचनम्पुंलिङ्गे बहुवचनम्
(क) पठितवतीपठितवान्पठितवन्तः
(ख) कृतवतीकृतवान्कृतवन्तः
(ग) दृष्टवतीदृष्टवान्दृष्टवन्तः
(घ) दत्तवतीदत्तवान्दत्तवन्तः
(ङ) प्रक्षालितवतीप्रक्षालितवान्प्रक्षालितवन्तः
(च) धावितवतीधावितवान्धावितवन्तः

5. उदाहरणानुसारं वाक्यानि परिवर्तयन्तु —

यथा – पिता कषायं पिबति। → पिता कषायं पीतवान्। / अहं पुस्तकं नयामि। → अहं पुस्तकं नीतवान् / नीतवती।

मूल वाक्य (वर्तमानकाले)परिवर्तित वाक्य (क्तवतु – भूतकाले)
(क) युवकः आपणं गच्छति।युवकः आपणं गतवान्
(ख) सः रोटिकां खादति।सः रोटिकां खादितवान्
(ग) महिला वस्त्रं ददाति।महिला वस्त्रं दत्तवती
(घ) बालकः द्विचक्रिकातः पतति।बालकः द्विचक्रिकातः पतितवान्
(ङ) पितामही चलच्चित्रं पश्यति।पितामही चलच्चित्रं दृष्टवती
(च) अहं गृहपाठं लिखामि।अहं गृहपाठं लिखितवान् / लिखितवती
(छ) त्वं कुत्र गच्छसि?त्वं कुत्र गतवान् / गतवती?
(ज) अश्वाः वने धावन्ति।अश्वाः वने धावितवन्तः
(झ) बालिकाः शीघ्रम् आगच्छन्ति।बालिकाः शीघ्रम् आगतवत्यः
(ञ) वयं समुद्रतीरे पयोहिमं खादामः।वयं समुद्रतीरे पयोहिमं खादितवन्तः / खादितवत्यः

6. अनुच्छेदे कोष्ठकेषु केचन धातवः दत्ताः सन्ति। उपरि दत्तम् अवधेयांशं पठित्वा ‘स्म’ इति अव्ययपदम् उपयुज्य अनुच्छेदं पुनः लिखन्तु।

(शीर्षकम् – आदर्शः कृषकः)

उत्तर (पूर्ण अनुच्छेद) कृषकः प्रतिदिनं कृषिक्षेत्रं गच्छति स्म। जलसेचनं करोति स्म। कीटानां निवारणार्थं जैवौषधं स्थापयति स्म। सः कृषिकार्यं सम्यक् जानाति स्म। अतः अन्ये कृषकाः संशयेन पृच्छन्ति स्म। सः स्वाभिमानेन जीवति स्म। अतः ‘अहं कृषकः भूमिपुत्रः’ इति साभिमानं वदति स्म सः क्षेत्रे गोमयं योजयति स्म, न तु कृतकान् पदार्थान्। अतः व्रीहेः गुणवत्ता अधिका भवति स्म। जनाः जालपटुमाध्यमेन तस्य तण्डुलं क्रीणन्ति स्म। एवं तस्य परिवारस्य सर्वे जनाः कृषिकार्येण ससुखं जीवन्ति स्म। सः सर्वान् वदति स्म “कृषकः न दीनः न च दरिद्रः, परं सर्वेषां पोषकः” इति।

अत्र इदम् अवधेयम् (व्याकरण-तालिकाः)

पाठ में ‘अत्र इदम् अवधेयम्’ एवं ‘योग्यताविस्तरः’ के अन्तर्गत भूतकाल बनाने की दो विधियाँ दी गई हैं, जिन्हें ध्यानपूर्वक समझना आवश्यक है।

1. क्तवतु-प्रत्ययः (भूतकाल-बोधक)

धातु के साथ क्तवतु प्रत्यय जोड़ने पर भी भूतकाल-बोधक पद बनते हैं। पुंलिङ्ग एवं स्त्रीलिङ्ग में रूप भिन्न होते हैं।

निर्माणपुंलिङ्गम् (एक/बहु)स्त्रीलिङ्गम् (एक/बहु)
पठ् + क्तवतुपठितवान् / पठितवन्तःपठितवती / पठितवत्यः

उदाहरण – सः पठितवान्। सा पठितवती। छात्राः पठितवन्तः। बालिकाः पठितवत्यः। अहं पठितवान् / पठितवती।

2. ‘स्म’-अव्ययस्य प्रयोगः

वर्तमानकाल-क्रियापद के साथ ‘स्म’ अव्यय जोड़ने पर भूतकाल का अर्थ निकलता है।
यथा – सः बाल्ये पुस्तकानि पठति। → सः बाल्ये पुस्तकानि पठति स्म (= अपठत्)।

3. धातुरूप-तालिका (भूतकाल की तीन विधियाँ)

धातुःलट् (वर्तमान)लङ् (भूत)क्तवतु (पुं.)क्तवतु (स्त्री.)स्म-प्रयोगः
गम्गच्छतिअगच्छत्गतवान्गतवतीगच्छति स्म
लिख्लिखतिअलिखत्लिखितवान्लिखितवतीलिखति स्म
गागायतिअगायत्गीतवान्गीतवतीगायति स्म
पापिबतिअपिबत्पीतवान्पीतवतीपिबति स्म
श्रुशृणोतिअशृणोत्श्रुतवान्श्रुतवतीशृणोति स्म
दाददातिअददात्दत्तवान्दत्तवतीददाति स्म
ज्ञाजानातिअजानात्ज्ञातवान्ज्ञातवतीजानाति स्म
कृकरोतिअकरोत्कृतवान्कृतवतीकरोति स्म
दृश्पश्यतिअपश्यत्दृष्टवान्दृष्टवतीपश्यति स्म
स्थातिष्ठतिअतिष्ठत्स्थितवान्स्थितवतीतिष्ठति स्म

योग्यताविस्तरः & परियोजनाकार्यम्

योग्यताविस्तरः – स्वास्थ्यरक्षणाय नियमाः (श्लोक)

ब्राह्मे मुहूर्ते उत्तिष्ठेत् स्वस्थो रक्षार्थमायुषः।
सर्वमेव परित्यज्य शरीरमनुपालयेत्॥
भोजनान्ते पिबेत् तक्रं वासरान्ते पिबेत् पयः।
निशान्ते च पिबेत् वारि त्रिभी रोगो न जायते॥
भावार्थ – आयु की रक्षा हेतु स्वस्थ मनुष्य ब्राह्म मुहूर्त में उठे और सब छोड़कर शरीर का पालन (देखभाल) करे। भोजन के अन्त में छाछ, दिन के अन्त में दूध तथा रात्रि के अन्त में जल पीने से (इन तीन के सेवन से) रोग नहीं होता।

परियोजनाकार्यम् (Project Work)

1. परहितार्थं सेवारतानां प्रेरकाणां महात्मनां जीवनसम्बद्धां कथां सङ्गृह्णन्तु।

मार्गदर्शनम्परोपकार एवं सेवा में लगे प्रेरक महापुरुषों (यथा – मदर टेरेसा, बाबा आम्टे, फ्लोरेंस नाइटिंगेल, महात्मा गांधी) के जीवन से जुड़ी एक प्रेरक कथा एकत्र कीजिए एवं कक्षा में सुनाइए।

2. अस्माकं समाजे कुटुम्बे वा सेवाकार्यं कुर्वतः जनद्वयस्य विवरणं लिखन्तु।

मार्गदर्शनम्अपने समाज अथवा परिवार में सेवाकार्य करने वाले दो व्यक्तियों (जैसे – रोगियों की सेवा करने वाला परिचारक, वृद्धों की देखभाल करने वाला परिवारजन) के बारे में संक्षिप्त विवरण लिखिए।

3. भवतां परिवेशे विद्यमानानाम् आयुर्वेदीयसस्यानां पदार्थानां च नामानि लिखन्तु। तेषां स्वास्थ्यरक्षणलाभान् लिखन्तु।

उत्तर (नमूना)यथा – बिल्वम् (बेल) पाचनक्रियां वर्धयति। लवङ्गम् (लौंग) दन्तसमस्याः कासं च नाशयति। तुलसी कासश्वासरोगान् निवारयति। आर्द्रकम् (अदरक) पाचनं सुधारयति। हरिद्रा (हल्दी) व्रणं शोधयति रोगप्रतिरोधकशक्तिं च वर्धयति।

4. अधः कानिचन चित्राणि वाक्यानि च सन्ति। चित्राणि पश्यन्तु, वाक्यानि पठन्तु। इदानीम् उचितं वाक्यं चित्रेण सह योजयन्तु।

मार्गदर्शनम्यह चित्र-मिलान का अभ्यास है (पुस्तक के चित्रों के साथ करें)। पाठ के पाँच वाक्य हैं – (1) धेनुर्माता परमशिवा (गाय रूपी माता परम कल्याणकारी है), (2) नित्यं मातापित्रोः सेवा (प्रतिदिन माता-पिता की सेवा), (3) रोगातुराणाम् उपचारः (रोगियों का उपचार), (4) गृहकार्येषु भगिन्याः साहाय्यम् (गृहकार्य में बहन की सहायता), (5) परस्परं कार्यकरणे साहाय्यम् (परस्पर कार्य में सहायता)। प्रत्येक वाक्य को उससे मेल खाते उपयुक्त चित्र के साथ जोड़िए।

अतिरिक्त प्रश्न (Extra Questions)

लघु उत्तरीय प्रश्न (30–40 शब्द)

1. नागार्जुनः कः आसीत्? सः किं कार्यं करोति स्म?

उत्तरनागार्जुनः प्रसिद्धः रसायनशास्त्रज्ञः चिकित्सकः च आसीत्। सः अहोरात्रं प्रयोगशालायां चिकित्सा एवं रसायन-निर्माण कार्यं करोति स्म।

2. नागार्जुनः युवकौ कीदृशीं परीक्षां दत्तवान्?

उत्तरनागार्जुनः युवकौ एकं विशिष्टं रसायनं दिनद्वयस्य अन्तः निर्माय आगन्तुं कथितवान्, तथा ‘राजमार्गेण गन्तव्यम्’ इति अपि सूचितवान्। यथार्थतः इयं परीक्षा कौशलस्य न, अपितु सेवाभावनायाः आसीत्।

3. प्रथमः युवकः किमर्थं चयने असफलः अभवत्?

उत्तरप्रथमः युवकः समये औषधं निर्मितवान् किन्तु राजमार्गे रोगिणं दृष्ट्वा अपि यन्त्रवत् अग्रे गतवान्। तस्मिन् सेवायाः भावना नासीत्, अतः सः चयने असफलः अभवत्।

4. राजा कस्मात् आश्चर्यं प्रकटितवान्?

उत्तरयः युवकः औषधं निर्मितवान् सः न चितः, अपि तु यः औषधं न निर्मितवान् सः एव चितः – एतत् श्रुत्वा राजा आश्चर्यं प्रकटितवान्।

5. अस्य पाठस्य मुख्यः सन्देशः कः?

उत्तरअस्य पाठस्य मुख्यः सन्देशः अस्ति – सेवा एव परमः धर्मः। केवलं कौशलं ज्ञानं वा पर्याप्तं न; सेवाभावना करुणा च मानवं श्रेष्ठं करोति।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (100–120 शब्द)

6. नागार्जुनेन द्वितीयस्य युवकस्य चयनस्य किं कारणम् आसीत्? सोदाहरणं स्पष्टीकुरुत।

उत्तरनागार्जुनः द्वितीयं युवकं चितवान्, यतः तस्मिन् सेवाभावना आसीत्। उभौ युवकौ औषधनिर्माणे कुशलौ आस्ताम्, किन्तु द्वितीयः युवकः राजमार्गे एकं शोचनीयदशायुक्तं रोगिणं दृष्ट्वा तं स्वगृहं नीतवान्, दिनद्वयं तस्य सेवायां निरतः अभवत्, येन रोगी स्वस्थः जातः। एतेन कारणेन सः समये औषधं निर्मातुं न शक्तवान्।अन्यतः प्रथमः युवकः रोगिणं दृष्ट्वा अपि यन्त्रवत् अग्रे गतवान्। नागार्जुनः अमन्यत – “सेवाभावनां विना चिकित्सकः कथं भवेत्?” चिकित्सकस्य कृते कौशलेन सह करुणा सेवा च अनिवार्या। अतः नागार्जुनः सेवाभावनायुक्तं द्वितीयं युवकम् एव सहायकत्वेन स्वीकृतवान्। एषः एव पाठस्य केन्द्रीयः सन्देशः – सेवा हि परमो धर्मः।

7. ‘सेवा हि परमो धर्मः’ इति कथनं स्वजीवनसन्दर्भे कथं प्रासङ्गिकम्? स्वमतं लिखत।

उत्तर‘सेवा हि परमो धर्मः’ इति कथनं सर्वदा प्रासङ्गिकम् अस्ति। यः जनः परेषां दुःखे साहाय्यं करोति, सः एव सत्यरूपेण मानवः। यथा पाठे द्वितीयः युवकः स्वकार्यं त्यक्त्वा रोगिणः सेवां कृतवान्, तथा एव अस्माभिः अपि कुटुम्बे विद्यालये समाजे च सेवाकार्यं कर्तव्यम्।मातापित्रोः सेवा, वृद्धानां रुग्णानां च साहाय्यम्, सहपाठिनां सहयोगः, दीन-दुःखितानां प्रति करुणा – एतानि सर्वाणि सेवायाः रूपाणि सन्ति। केवलं धनार्जनम् उपाधि-प्राप्तिः वा जीवनस्य लक्ष्यं न भवेत्; परोपकारः सेवा च मानवजीवनस्य सारः। सेवया एव समाजे स्नेहः, शान्तिः, सद्भावना च वर्धते। अतः सेवा एव परमः धर्मः इति कथनं सर्वथा सत्यम्।

8. क्तवतु-प्रत्ययेन तथा ‘स्म’-अव्ययेन भूतकालः कथं रच्यते? उदाहरणैः सह स्पष्टीकुरुत।

उत्तरसंस्कृते भूतकालः लङ्-लकारेण तु रच्यते एव, किन्तु अन्ये अपि द्वौ उपायौ स्तः। प्रथमः – क्तवतु-प्रत्ययः। धातोः सह क्तवतु योजनेन भूतकालार्थकानि पदानि भवन्ति। यथा – पठ् + क्तवतु = पठितवान् (पुंलिङ्गम्), पठितवती (स्त्रीलिङ्गम्); गम् → गतवान्/गतवती; कृ → कृतवान्/कृतवती।द्वितीयः उपायः – ‘स्म’-अव्ययस्य प्रयोगः। वर्तमानकाल-क्रियापदेन सह ‘स्म’ इति अव्ययं योजयित्वा अपि भूतकालार्थः भवति। यथा – गच्छति स्म (= अगच्छत् / गतवान्), लिखति स्म (= अलिखत् / लिखितवान्), पठति स्म (= अपठत्)। एवं त्रिभिः अपि उपायैः भूतकालः रच्यते।

MCQ & अभिकथन-कारण

1. नागार्जुनः कः आसीत्?

(क) राजा

(ख) रसायनशास्त्रज्ञः चिकित्सकः च

(ग) कृषकः

(घ) सैनिकः

उत्तर(ख) रसायनशास्त्रज्ञः चिकित्सकः च।

2. नागार्जुनं कस्य आवश्यकता आसीत्?

(क) धनस्य

(ख) सहायकस्य

(ग) गृहस्य

(घ) अश्वस्य

उत्तर(ख) सहायकस्य।

3. परीक्षायै कति युवकाः आगताः?

(क) एकः

(ख) द्वौ

(ग) त्रयः

(घ) चत्वारः

उत्तर(ख) द्वौ।

4. नागार्जुनः युवकौ केन मार्गेण गन्तुं सूचितवान्?

(क) वनमार्गेण

(ख) राजमार्गेण

(ग) नदीमार्गेण

(घ) पर्वतमार्गेण

उत्तर(ख) राजमार्गेण।

5. द्वितीयः युवकः किमर्थं औषधं निर्मातुं न शक्तवान्?

(क) सः आलस्येन सुप्तवान्

(ख) सः रोगिणः सेवायां निरतः आसीत्

(ग) सः औषधनिर्माणं न जानाति स्म

(घ) सः क्रीडितवान्

उत्तर(ख) सः रोगिणः सेवायां निरतः आसीत्।

6. नागार्जुनः सहायकत्वेन कं स्वीकृतवान्?

(क) प्रथमं युवकम्

(ख) द्वितीयं युवकम्

(ग) उभौ युवकौ

(घ) न कमपि

उत्तर(ख) द्वितीयं युवकम्।

7. ‘शोचनीया’ इति पदस्य अर्थः कः?

(क) प्रसन्ना

(ख) दयनीया

(ग) सुन्दरी

(घ) सबला

उत्तर(ख) दयनीया।

8. ‘निरतः’ इति पदस्य अर्थः कः?

(क) लीनः / मग्नः

(ख) क्रुद्धः

(ग) भीतः

(घ) श्रान्तः

उत्तर(क) लीनः / मग्नः।

9. ‘पठ् + क्तवतु’ इत्यस्य स्त्रीलिङ्गे एकवचनरूपं किम्?

(क) पठितवान्

(ख) पठितवती

(ग) पठितवन्तः

(घ) पठितवत्यः

उत्तर(ख) पठितवती।

10. अस्य पाठस्य केन्द्रीयः सन्देशः कः?

(क) धनम् एव सर्वश्रेष्ठम्

(ख) सेवा एव परमः धर्मः

(ग) कौशलम् एव पर्याप्तम्

(घ) उपाधिः एव महती

उत्तर(ख) सेवा एव परमः धर्मः।
उत्तर-कुंजी: 1-(ख), 2-(ख), 3-(ख), 4-(ख), 5-(ख), 6-(ख), 7-(ख), 8-(क), 9-(ख), 10-(ख)

अभिकथन-कारण – नीचे अभिकथन (A) और कारण (R) दिए गए हैं। सही विकल्प चुनिए—
(क) A और R दोनों सही, R, A की सही व्याख्या है। (ख) A और R दोनों सही, पर R, A की सही व्याख्या नहीं। (ग) A सही, R गलत। (घ) A गलत, R सही।

1. अभिकथन (A): नागार्जुनः द्वितीयं युवकं सहायकत्वेन स्वीकृतवान्।

कारण (R): द्वितीये युवके सेवायाः भावना आसीत्, यां विना चिकित्सकः न भवेत्।

उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है।

2. अभिकथन (A): प्रथमः युवकः समये औषधं निर्मितवान्।

कारण (R): प्रथमः युवकः रोगिणं दृष्ट्वा तस्य सेवायां निरतः अभवत्।

उत्तर(ग) A सही है, किन्तु R गलत है – प्रथम युवक रोगी को देखकर भी (सेवा न करके) यन्त्रवत् आगे बढ़ गया था।

3. अभिकथन (A): नागार्जुनः युवकौ ‘राजमार्गेण गन्तव्यम्’ इति सूचितवान्।

कारण (R): रोगी पहले से ही राजमार्ग पर था, अतः नागार्जुन उनकी सेवाभावना की परीक्षा लेना चाहता था।

उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है।

4. अभिकथन (A): क्तवतु-प्रत्ययेन भूतकालार्थक पदानि भवन्ति।

कारण (R): वर्तमानकाल-क्रियापदेन सह ‘स्म’-अव्ययस्य योजनेन अपि भूतकालार्थः भवति।

उत्तर(ख) A और R दोनों सही हैं, किन्तु R, A की सही व्याख्या नहीं है (दोनों भूतकाल बनाने के पृथक्-पृथक् उपाय हैं)।

5. अभिकथन (A): सिद्धार्थः मानवीयगुणैः एव महात्मा बुद्धः जातः।

कारण (R): सत्यं, करुणा, उदारता, सेवा, परोपकारः इत्यादयः मानवीयाः गुणाः सन्ति।

उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है।

परीक्षा-सुझाव एवं सामान्य त्रुटियाँ

परीक्षा-सुझाव (Exam Tips)

  • कथा का क्रम (नागार्जुन → दो युवक → परीक्षा → प्रथम/द्वितीय युवक → चयन) याद रखें – पूर्णवाक्य उत्तर इसी से आते हैं।
  • क्तवतु-प्रत्यय के पुंलिङ्ग एवं स्त्रीलिङ्ग रूप (पठितवान्/पठितवती, गतवान्/गतवती) तालिका सहित रटें।
  • ‘स्म’ अव्यय वर्तमान-क्रिया के साथ भूतकाल बनाता है (गच्छति स्म = अगच्छत्) – यह नियम स्पष्ट रखें।
  • शब्दार्थ (शोचनीया, निरतः, चितवान्, यन्त्रवत्, वृत्तान्तम्) हिन्दी एवं अंग्रेज़ी दोनों में याद रखें।
  • ‘एकपदेन उत्तरम्’ में एक/दो शब्द, ‘पूर्णवाक्येन’ में पूरा वाक्य लिखें।

सामान्य त्रुटियाँ (Common Mistakes)

  • क्तवतु रूप में लिङ्ग की भूल – स्त्रीलिङ्ग में ‘-वती/-वत्यः’, पुंलिङ्ग में ‘-वान्/-वन्तः’ लगाएँ।
  • ‘स्म’ जोड़ते समय धातु को भूतकाल (लङ्) में बदल देना – धातु वर्तमान में ही रहती है (पठति स्म, अपठत् स्म नहीं)।
  • चयन का कारण उल्टा लिखना – नागार्जुन ने सेवाभावना वाले द्वितीय युवक को चुना, औषध लाने वाले प्रथम को नहीं।
  • ‘केन मार्गेण’ का उत्तर ‘राजमार्गेण’ (तृतीया) लिखें, ‘राजमार्गः’ नहीं।
  • विसर्ग/मात्रा की अशुद्धि – निरतः, शोचनीया, सूचितवान् को शुद्ध लिखें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

दीपकम् कक्षा 7 पाठ 5 ‘सेवा हि परमो धर्मः’ का मुख्य संदेश क्या है?

इस पाठ का मुख्य संदेश है – सेवा ही सर्वोच्च धर्म है। नागार्जुन की कथा द्वारा यह सिखाया गया है कि सच्चे चिकित्सक के लिए केवल कौशल पर्याप्त नहीं; सेवाभावना एवं करुणा भी अनिवार्य हैं।

नागार्जुन ने दूसरे युवक को सहायक के रूप में क्यों चुना?

क्योंकि दूसरे युवक में सेवाभावना थी – उसने मार्ग में मिले एक दयनीय रोगी की दो दिन सेवा की और उसे स्वस्थ किया, इसी कारण समय पर औषध न बना सका। नागार्जुन का मत था कि सेवाभावना के बिना कोई सच्चा चिकित्सक नहीं बन सकता।

इस पाठ में कौन-से व्याकरण-बिन्दु सिखाए गए हैं?

इस पाठ में भूतकाल बनाने की दो विधियाँ सिखाई गई हैं – (1) क्तवतु-प्रत्यय (पठितवान्/पठितवती) तथा (2) वर्तमान-क्रिया के साथ ‘स्म’ अव्यय का प्रयोग (गच्छति स्म = अगच्छत्)।

मूल पाठ, प्रश्न एवं अभ्यास-शीर्षक NCERT दीपकम् पुस्तक से ज्यों-के-त्यों लिए गए हैं; सार, भावार्थ एवं उत्तर ClearStudy द्वारा मौलिक रूप से तैयार किए गए हैं।

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