Class 7 Sanskrit Deepakam Chapter 6 Solutions — क्रीडाम वयं श्लोकान्त्याक्षरीम्
Class 7 Sanskrit Deepakam Chapter 6 solutions: विद्या पर दस सुभाषितों का हिन्दी अर्थ, छह अभ्यासों के उत्तर, विद्या-शब्द के रूप और अन्त्याक्षरी की गतिविधियाँ पढ़ें।
- पाठ का अवलोकन (Chapter Overview)
- पाठ-परिचय / प्रसंग
- मूल पाठ (दश श्लोकाः) + अन्वय + भावार्थ
- सार (Hindi Summary)
- शब्दार्थ (Word-meanings)
- अभ्यासः (वयम् अभ्यासं कुर्मः)
- योग्यताविस्तरः (व्याकरण-तालिका)
- अतिरिक्त प्रश्न (Extra Questions)
- MCQ & अभिकथन-कारण
- परीक्षा-सुझाव एवं सामान्य त्रुटियाँ
- अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
पाठ का अवलोकन (Chapter Overview)
दीपकम् कक्षा 7 का छठा पाठ ‘क्रीडाम वयं श्लोकान्त्याक्षरीम्’ एक रोचक एवं खेल-आधारित पाठ है। वर्षा के कारण बाहर न जा पाने पर दीपिका, भारती एवं उनके मित्र मिलकर एक नूतन क्रीडा – ‘अन्त्याक्षरी क्रीडा’ खेलने का निश्चय करते हैं। इसमें दो दल बनते हैं – ज्ञानमाला एवं रत्नमाला। नियम यह है कि एक दल का सदस्य एक पद्य (श्लोक) गाता है, और उस श्लोक के अन्तिम व्यञ्जन-वर्ण से दूसरा दल अगला श्लोक आरम्भ करता है। इसी क्रम में पाठ में विद्या (ज्ञान) की महिमा पर दस सुप्रसिद्ध सुभाषित-श्लोक प्रस्तुत किए गए हैं। पाठ का केन्द्रीय भाव यह है कि विद्या ही मनुष्य का सर्वश्रेष्ठ आभूषण, गुप्त धन एवं सच्चा बन्धु है। यह पाठ खेल-खेल में संस्कृत श्लोकों का अभ्यास एवं विद्या के महत्त्व का बोध कराता है।
पाठ-परिचय / प्रसंग
यह पाठ संवाद-शैली में आरम्भ होता है। बाहर वर्षा हो रही होती है, अतः खेलने की इच्छा रखने वाले बालक-बालिकाएँ घर के भीतर ही ‘अन्त्याक्षरी क्रीडा’ खेलते हैं। इस क्रीडा में दो गण (दल) बनाए जाते हैं – ज्ञानमालागणः एवं रत्नमालागणः। आदौ प्रथम दल का सदस्य एक श्लोक गाता है; उस श्लोक के अन्तिम व्यञ्जन-वर्ण से दूसरे दल का सदस्य अगला श्लोक आरम्भ करता है, और इसी क्रम से क्रीडा चलती रहती है। पाठ में दिए गए सभी दस श्लोक विद्या (ज्ञान) के माहात्म्य पर आधारित सुभाषित हैं, जो संस्कृत-साहित्य की नीति-परम्परा से लिए गए हैं।
मूल पाठ (दश श्लोकाः) + अन्वय + भावार्थ
(पाठ में ज्ञानमाला-गण एवं रत्नमाला-गण द्वारा गाए गए दस सुभाषित-श्लोक, पाठ के क्रम में; प्रत्येक का अन्वय एवं भावार्थ नीचे दिया गया है।)
श्लोक 1 (ज्ञानमालागणः)
विद्याहीना न शोभन्ते निर्गन्धा इव किंशुकाः ॥ १ ॥
श्लोक 2 (रत्नमालागणः)
व्यसनेन च मूर्खाणां निद्रया कलहेन वा ॥ २ ॥
श्लोक 3 (ज्ञानमालागणः)
खलस्य साधोर्विपरीतमेतत्, ज्ञानाय दानाय च रक्षणाय ॥ ३ ॥
श्लोक 4 (रत्नमालागणः)
ते मर्त्यलोके भुवि भारभूता, मनुष्यरूपेण मृगाश्चरन्ति ॥ ४ ॥
श्लोक 5 (ज्ञानमालागणः)
तत्त्वज्ञानं परा शान्तिर्यदा विद्या भवेत्तव ॥ ५ ॥
श्लोक 6 (रत्नमालागणः)
विद्या भोगकरी यशःसुखकरी विद्या गुरूणां गुरुः ।
विद्या बन्धुजनो विदेशगमने विद्या परा देवता,
विद्या राजसु पूज्यते न हि धनं विद्याविहीनः पशुः ॥ ६ ॥
श्लोक 7 (ज्ञानमालागणः)
शनैर्विद्या शनैर्वित्तं पञ्चैतानि शनैः शनैः ॥ ७ ॥
श्लोक 8 (रत्नमालागणः)
अतो धर्मार्थमोक्षेभ्यो विद्याभ्यासं समाचरेत् ॥ ८ ॥
श्लोक 9 (ज्ञानमालागणः)
पृथिव्याः भूषणं राजा विद्या सर्वस्य भूषणम् ॥ ९ ॥
श्लोक 10 (रत्नमालागणः)
व्यये कृते वर्धत एव नित्यं विद्याधनं सर्वधनप्रधानम् ॥ १० ॥
सार (Hindi Summary)
‘क्रीडाम वयं श्लोकान्त्याक्षरीम्’ पाठ का आरम्भ एक रोचक संवाद से होता है। बाहर वर्षा हो रही है, इसलिए दीपिका, भारती एवं उनके मित्र बाहर खेलने नहीं जा पाते। तब वे घर के भीतर ही एक नूतन क्रीडा – ‘अन्त्याक्षरी क्रीडा’ – खेलने का निश्चय करते हैं। खेल के नियम के अनुसार वे दो दल बनाते हैं – ज्ञानमालागण एवं रत्नमालागण। पहले एक दल का सदस्य एक श्लोक गाता है; उस श्लोक के अन्तिम व्यञ्जन-वर्ण से दूसरे दल का सदस्य अगला श्लोक आरम्भ करता है, और इसी क्रम में क्रीडा आगे बढ़ती है।
इस अन्त्याक्षरी-क्रीडा में दोनों दल विद्या (ज्ञान) की महिमा पर दस सुप्रसिद्ध सुभाषित-श्लोक प्रस्तुत करते हैं। इन श्लोकों का मुख्य भाव यह है कि रूप, यौवन एवं उच्च कुल होते हुए भी विद्याहीन व्यक्ति गन्धहीन पलाश-पुष्प के समान शोभा नहीं पाता। बुद्धिमान् व्यक्ति काव्य-शास्त्र के अनुशीलन में समय लगाते हैं, जबकि मूर्ख व्यसन, निद्रा एवं कलह में समय गँवाते हैं। दुष्ट व्यक्ति विद्या, धन एवं शक्ति का दुरुपयोग करता है, किन्तु सज्जन इनका उपयोग ज्ञान, दान एवं रक्षा के लिए करता है।
आगे के श्लोकों में बताया गया है कि विद्याहीन मनुष्य पशु के समान है, विद्या से ही यश, सम्पत्ति एवं शान्ति मिलती है, विद्या मनुष्य का गुप्त धन एवं प्रधान देवता है, तथा विद्या को धीरे-धीरे क्रमबद्ध रूप से अर्जित करना चाहिए। अन्त में कहा गया है कि विद्यारूपी धन न चोरी होता है, न छीना जाता है, न बँटता है, और देने से बढ़ता है – अतः विद्या ही सबका सर्वश्रेष्ठ आभूषण एवं सबसे प्रमुख धन है। संक्षेप में, यह पाठ खेल-खेल में विद्या के महत्त्व का सुन्दर बोध कराता है।

शब्दार्थ (Word-meanings)
| शब्दः (Sanskrit) | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| रूपयौवनसम्पन्नाः | सौन्दर्य एवं यौवन से सम्पन्न | Handsome & youthful |
| विशालकुलसम्भवाः | विशिष्ट (बड़े) परिवार में जन्मे हुए | Born in a privileged family |
| निर्गन्धाः | गन्धहीन | Without fragrance |
| किंशुकाः | पलाश (ढाक/टेसू) के वृक्ष | Flame-of-the-forest trees |
| धीमताम् | बुद्धिमान् लोगों का | Of intelligent people |
| व्यसनेन | भोग-विलास / बुरी आदत के द्वारा | By addiction & bad habits |
| मदाय | अभिमान के लिए | For arrogance |
| परिपीडनाय | कष्ट देने के लिए | For troubling |
| खलः | दुष्ट / दुर्जन | Wicked person |
| शीलम् | चरित्र | Character |
| मर्त्यलोके | संसार में | In this mortal world |
| भुवि | धरती पर | On the earth |
| भारभूताः | भारस्वरूप | A burden |
| वृत्तिः | आजीविका, उद्योग | Occupation / livelihood |
| लक्ष्मीः | सम्पत्ति, धन | Wealth |
| यशस्विनी | कीर्ति से युक्त | Endowed with fame |
| तत्त्वज्ञानम् | यथार्थ (वास्तविक) ज्ञान | Real knowledge |
| प्रच्छन्नगुप्तम् | ढँका हुआ एवं सुरक्षित | Covered and concealed |
| भोगकरी | सुख-भोग देने वाली | Giving materialistic pleasure |
| विदेशगमने | विदेश जाने पर | While travelling abroad |
| परा | श्रेष्ठ | Great / supreme |
| विद्याविहीनः | विद्या-रहित | Devoid of education |
| पन्थाः | मार्ग, पथ | The way / road |
| कन्था | पुराने वस्त्रों से बनी मोटी चादर | Rug made from rags |
| वित्तम् | धन | Money / wealth |
| सौख्यम् | सुख, आनन्द | Happiness |
| ध्रुवम् | निश्चित, स्थिर | Certain |
| समाचरेत् | करना चाहिए | Should do / practise |
| ताराणाम् | नक्षत्रों का | Of the stars |
| भूषणम् | आभूषण, अलंकार | Ornament |
| सुमम् | पुष्प, फूल | Flower |
| चोरहार्यम् | चोर के द्वारा हरण योग्य | Can be stolen by thieves |
| राजहार्यम् | राजा के द्वारा हरण योग्य | Can be seized by kings |
| भ्रातृभाज्यम् | भाई-बहनों में बँटने योग्य | Divisible amongst siblings |
| भारकारि | भारस्वरूप | Heavy / a burden |
| विद्याधनम् | विद्या रूपी धन | Wealth in the form of knowledge |
| सर्वधनप्रधानम् | सभी धनों में प्रमुख | Most important of all wealth |
अभ्यासः (वयम् अभ्यासं कुर्मः)
1. अधः प्रदत्तानां प्रश्नानाम् एकपदेन उत्तरं लिखन्तु —
(क) विद्याहीनाः कीदृशाः किंशुकाः इव न शोभन्ते ?
(ख) धीमतां कालः कथं गच्छति ?
(ग) केषां कालः निद्रया कलहेन वा गच्छति ?
(घ) खलस्य विद्या किमर्थम् ?
(ङ) सज्जनस्य विद्या किमर्थम् ?
(च) चन्द्रः केषां भूषणम् अस्ति ?
(छ) सर्वधनप्रधानं किम् ?
2. अधः प्रदत्तानां प्रश्नानां पूर्णवाक्येन उत्तरं लिखन्तु —
(क) निर्गन्धाः किंशुकाः इव के न शोभन्ते ?
(ख) मूर्खाणां कालः कथं गच्छति ?
(ग) दुर्जनः विद्यायाः धनस्य शक्तेः च उपयोगं कथं करोति ?
(घ) कीदृशाः मनुष्याः भुवि भारभूताः भवन्ति ?
(ङ) शनैः शनैः कानि साधनीयानि ?
3. उचितान् वाक्यांशान् परस्परं संयोजयन्तु —
(स्तंभ ‘क’ के वाक्यांशों को स्तंभ ‘ख’ के उपयुक्त वाक्यांशों से मिलाइए।)
| (क) | (ख) – सही मिलान (उत्तर) |
|---|---|
| तदा वृत्तिश्च कीर्तिश्च | यदा विद्या भवेत्तव |
| खलस्य साधोर्विपरीतमेतत् | ज्ञानाय दानाय च रक्षणाय |
| शनैर्विद्या शनैर्वित्तं | पञ्चैतानि शनैः शनैः |
| विद्याहीना न शोभन्ते | निर्गन्धा इव किंशुकाः |
| न चोरहार्यं न च राजहार्यम् | न भ्रातृभाज्यं न च भारकारि |
| विद्या राजसु पूज्यते | न हि धनम् |
| अतो धर्मार्थमोक्षेभ्यः | विद्याभ्यासं समाचरेत् |
4. उदाहरणानुसारम् अधः रेखाङ्कितानि पदानि आश्रित्य प्रश्ननिर्माणं कुर्वन्तु —
यथा – राजा पृथिव्याः भूषणं भवति । → राजा कस्याः भूषणं भवति ?
| वाक्यम् (रेखाङ्कित पद मोटे अक्षरों में) | प्रश्ननिर्माणम् (उत्तर) |
|---|---|
| (क) राजा पृथिव्याः भूषणं भवति । | राजा कस्याः भूषणं भवति ? |
| (ख) साधोः विद्या ज्ञानाय भवति । | कस्य विद्या ज्ञानाय भवति ? |
| (ग) विद्या गुरूणां गुरुः । | विद्या केषां गुरुः ? |
| (घ) ते मर्त्यलोके भुवि भारभूताः भवन्ति । | ते मर्त्यलोके भुवि कीदृशाः भवन्ति ? |
| (ङ) विद्याहीनाः न शोभन्ते । | के न शोभन्ते ? |
| (च) सर्वस्य लोचनं शास्त्रम् । | सर्वस्य लोचनं किम् ? |
| (छ) विद्या राजसु पूज्यते । | का राजसु पूज्यते ? |
| (ज) काव्यशास्त्रविनोदेन कालो गच्छति धीमताम् । | केन धीमतां कालो गच्छति ? |
5. मञ्जूषातः समुचितानि पदानि स्वीकृत्य रिक्तस्थानानि पूरयन्तु —
मञ्जूषा: रक्षणाय, मदाय, विवादाय, परिपीडनाय, ज्ञानाय, दानाय
| सज्जनस्य (उत्तर) | दुर्जनस्य (उत्तर) | |
|---|---|---|
| शक्तिः | रक्षणाय | परिपीडनाय |
| विद्या | ज्ञानाय | विवादाय |
| धनम् | दानाय | मदाय |
6. उदाहरणानुसारम् अधोलिखितानां पदानां विभक्तिं वचनं च लिखन्तु —
यथा – ताराणाम् – षष्ठी विभक्तिः, बहुवचनम् ।
| पदम् | विभक्तिः (उत्तर) | वचनम् (उत्तर) |
|---|---|---|
| (क) विद्याम् | द्वितीया विभक्तिः | एकवचनम् |
| (ख) धनस्य | षष्ठी विभक्तिः | एकवचनम् |
| (ग) कलहेन | तृतीया विभक्तिः | एकवचनम् |
| (घ) नराणाम् | षष्ठी विभक्तिः | बहुवचनम् |
| (ङ) मर्त्यलोके | सप्तमी विभक्तिः | एकवचनम् |
| (च) ज्ञानाय | चतुर्थी विभक्तिः | एकवचनम् |
| (छ) राजसु | सप्तमी विभक्तिः | बहुवचनम् |
योग्यताविस्तरः (व्याकरण-तालिका)
पाठ के अन्त में ‘योग्यताविस्तरः’ में विद्या से सम्बन्धित कुछ सुभाषित-श्लोक तथा ‘विद्या’ (आकारान्त स्त्रीलिङ्ग) शब्द के रूप दिए गए हैं, जिन्हें भली प्रकार कण्ठस्थ करना आवश्यक है।
विद्या-सन्दर्भे श्लोकाः (पाठ से)
नास्ति विद्यासमं वित्तं नास्ति विद्यासमं सुखम् ॥
विद्याभ्यासस्तपो ज्ञानमिन्द्रियाणां च संयमः ।
अहिंसा गुरुसेवा च निःश्रेयसकरं परम् ॥
ज्ञातिभिर्वण्ट्यते नैव चोरेणापि न नीयते ।
दाने नैव क्षयं याति विद्यारत्नं महाधनम् ॥ — योग्यताविस्तरः (दीपकम्)
‘विद्या’ इति शब्दस्य रूपाणि (आकारान्त स्त्रीलिङ्गः)
| विभक्तिः | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | विद्या | विद्ये | विद्याः |
| द्वितीया | विद्याम् | विद्ये | विद्याः |
| तृतीया | विद्यया | विद्याभ्याम् | विद्याभिः |
| चतुर्थी | विद्यायै | विद्याभ्याम् | विद्याभ्यः |
| पञ्चमी | विद्यायाः | विद्याभ्याम् | विद्याभ्यः |
| षष्ठी | विद्यायाः | विद्ययोः | विद्यानाम् |
| सप्तमी | विद्यायाम् | विद्ययोः | विद्यासु |
| सम्बोधनम् | (हे) विद्ये ! | (हे) विद्ये ! | (हे) विद्याः ! |
परियोजनाकार्यम् / कार्यकलापः (Project & Activity)
1. क, त, व, म, य इति पञ्चभिः वर्णैः श्लोकान् सङ्गृह्य लिखन्तु ।
2. पदान्त्याक्षरी क्रीडा एवं क्रियापद-स्मरणक्रीडा कक्षायां क्रीडन्तु ।
योग्यताविस्तर के तीसरे श्लोक में पदच्छेद है: दाने + न + एव + क्षयम् + याति — देने पर भी विद्या का क्षय नहीं होता। “दानेन + एव” करने से अर्थ उलट जाएगा। “विद्याविहीनः पशुः” जैसी उक्तियाँ सुभाषित की अलंकारात्मक नीति-शैली हैं; किसी व्यक्ति का मानवीय मूल्य उसकी औपचारिक शिक्षा से तय नहीं होता।
परियोजना 2 — श्लोकों की नई श्रृंखला
पुस्तक विभिन्न स्रोतों से सुभाषित चुनकर अन्त्याक्षरी-क्रम में लिखने को भी कहती है। शिक्षक से पाठ और उच्चारण जाँचें। पहले श्लोक का अन्तिम उपयुक्त व्यञ्जन लेकर अगला श्लोक चुनें। पुस्तक की तालिका में 9 से 10 के लिए ण्/न् दिया है; यह छूट कक्षा में पहले तय करें। यह एक नमूना/खुली गतिविधि है।
कार्यकलाप 3 — वर्णलेख का अभ्यास
क्षणे नष्टे कुतो विद्या कणे नष्टे कुतो धनम्॥
भाव: समय के छोटे-छोटे क्षणों में ज्ञान और थोड़ी-थोड़ी बचत से धन अर्जित करें; समय और साधनों का सदुपयोग सीखें। पुस्तक के पृष्ठ 70 पर अक्षर भरें और मात्राएँ स्पष्ट रखें।
अतिरिक्त प्रश्न (Extra Questions)
अतिरिक्त लघु प्रश्न — ClearStudy अभ्यास
1. ‘अन्त्याक्षरी क्रीडा’ क्या है और इसमें दलों के क्या नाम हैं?
2. विद्याहीन व्यक्ति की तुलना किससे की गई है और क्यों?
3. श्लोक 7 में कौन-से पाँच कार्य धीरे-धीरे करने को कहा गया है?
4. विद्याधन को साधारण धन से श्रेष्ठ क्यों कहा गया है?
5. श्लोक 6 के अनुसार विदेश-यात्रा में मनुष्य का सच्चा बन्धु कौन है?
अतिरिक्त व्याख्यात्मक प्रश्न — ClearStudy अभ्यास
6. ‘क्रीडाम वयं श्लोकान्त्याक्षरीम्’ पाठ का केन्द्रीय भाव अपने शब्दों में लिखिए।
7. इस पाठ में वर्णित सज्जन एवं दुर्जन के स्वभाव का अन्तर स्पष्ट कीजिए।
8. विद्या को ‘सर्वश्रेष्ठ आभूषण’ क्यों कहा गया है? पाठ के आधार पर समझाइए।
MCQ & अभिकथन-कारण
1. इस पाठ में खेली जाने वाली क्रीडा का नाम क्या है?
(क) पादकन्दुक-क्रीडा
(ख) अन्त्याक्षरी क्रीडा
(ग) कन्दुक-क्रीडा
(घ) धावन-क्रीडा
2. पाठ में बने दो दलों के नाम हैं—
(क) ज्ञानमाला एवं रत्नमाला
(ख) सूर्यमाला एवं चन्द्रमाला
(ग) पुष्पमाला एवं रत्नमाला
(घ) विद्यामाला एवं ज्ञानमाला
3. विद्याहीन व्यक्ति की तुलना किससे की गई है?
(क) सुगन्धित पुष्प से
(ख) निर्गन्ध किंशुक (पलाश) से
(ग) चन्द्रमा से
(घ) नक्षत्र से
4. बुद्धिमान् (धीमान्) लोगों का समय किसमें व्यतीत होता है?
(क) निद्रा में
(ख) कलह में
(ग) काव्यशास्त्र के अनुशीलन में
(घ) व्यसन में
5. सज्जन की विद्या किसके लिए होती है?
(क) विवाद के लिए
(ख) ज्ञान के लिए
(ग) अहंकार के लिए
(घ) पीड़ा देने के लिए
6. ‘शनैः शनैः’ वाले श्लोक में कितने कार्य धीरे-धीरे करने को कहा गया है?
(क) तीन
(ख) चार
(ग) पाँच
(घ) छह
7. श्लोक 6 के अनुसार राजसभाओं में किसका सम्मान होता है?
(क) धन का
(ख) रूप का
(ग) विद्या (विद्वान्) का
(घ) कुल का
8. विद्याधन की कौन-सी विशेषता श्लोक 10 में नहीं बताई गई?
(क) यह चोरी नहीं होता
(ख) यह बाँटने से घटता है
(ग) यह भारस्वरूप नहीं होता
(घ) यह खर्च करने (देने) पर बढ़ता है
9. ‘पन्थाः’ शब्द का अर्थ है—
(क) धन
(ख) मार्ग / पथ
(ग) पर्वत
(घ) वस्त्र
10. श्लोक 9 के अनुसार पृथ्वी का आभूषण कौन है?
(क) चन्द्रः
(ख) सुमम् (पुष्प)
(ग) राजा
(घ) तारा
अभिकथन-कारण – नीचे अभिकथन (A) और कारण (R) दिए गए हैं। सही विकल्प चुनिए—
(क) A और R दोनों सही, R, A की सही व्याख्या है। (ख) A और R दोनों सही, पर R, A की सही व्याख्या नहीं। (ग) A सही, R गलत। (घ) A गलत, R सही।
1. अभिकथन (A): ‘क्रीडाम वयं श्लोकान्त्याक्षरीम्’ पाठ में विद्या की महिमा बताई गई है।
कारण (R): पाठ में अन्त्याक्षरी-क्रीडा के माध्यम से विद्या (ज्ञान) पर आधारित दस सुभाषित-श्लोक प्रस्तुत किए गए हैं।
2. अभिकथन (A): विद्याधन सर्वश्रेष्ठ धन है।
कारण (R): विद्याधन को चोर चुरा सकता है तथा राजा छीन सकता है।
3. अभिकथन (A): रूप, यौवन एवं उच्च कुल होते हुए भी विद्याहीन व्यक्ति शोभा नहीं पाता।
कारण (R): वह गन्धहीन पलाश-पुष्प के समान है, जो देखने में सुन्दर होने पर भी उपयोगहीन होता है।
4. अभिकथन (A): ‘सम्’ उपसर्गयुक्त गम्-धातु के आत्मनेपद रूप बनते हैं।
कारण (R): ‘संगच्छध्वम्’ (सम् + गम्) आत्मनेपद का मध्यमपुरुष-बहुवचन रूप है।
5. अभिकथन (A): दुर्जन एवं सज्जन के स्वभाव में अन्तर होता है।
कारण (R): दुर्जन विद्या-धन-शक्ति का उपयोग विवाद, मद एवं पीड़ा के लिए करता है, जबकि सज्जन इनका उपयोग ज्ञान, दान एवं रक्षा के लिए करता है।
परीक्षा-सुझाव एवं सामान्य त्रुटियाँ
परीक्षा-सुझाव (Exam Tips)
- विद्या-विषयक प्रमुख श्लोक (विद्या नाम नरस्य रूपम्…, न चोरहार्यं…) कण्ठस्थ करें – इन्हीं से श्लोक-लेखन एवं भावार्थ के प्रश्न आते हैं।
- शब्दार्थ (किंशुकाः, धीमताम्, खलः, आकूतिः नहीं बल्कि पन्थाः, कन्था, ध्रुवम् आदि) हिन्दी एवं अंग्रेज़ी दोनों में याद रखें।
- एकपदेन एवं पूर्णवाक्येन उत्तर वाले प्रश्नों का अन्तर समझें – एकपद में केवल एक शब्द, पूर्णवाक्य में पूरा वाक्य लिखें।
- विभक्ति-वचन वाले प्रश्न (अभ्यास 6) के लिए ‘विद्या’ शब्द-रूप एवं प्रमुख विभक्ति-चिह्न याद रखें।
- प्रश्ननिर्माण में रेखांकित पद के अनुसार सही प्रश्नवाचक शब्द (कः, का, किम्, केषाम्, कस्याः, केन) चुनें।
सामान्य त्रुटियाँ (Common Mistakes)
- श्लोकों में मात्रा एवं विसर्ग की अशुद्धि – ‘धीमताम्’, ‘यशस्विनी’, ‘पृथिव्याः’ को शुद्ध लिखें।
- विभक्ति-पहचान में भूल – ‘ज्ञानाय’ (चतुर्थी), ‘कलहेन’ (तृतीया), ‘राजसु’ (सप्तमी बहुवचन) को सही पहचानें।
- सज्जन एवं दुर्जन के गुण-प्रयोग को परस्पर बदल देना – दुर्जन: विवाद/मद/परिपीडन; सज्जन: ज्ञान/दान/रक्षण।
- ‘निर्गन्धाः किंशुकाः’ का अर्थ ‘सुगन्धित फूल’ लिख देना – किंशुक गन्धहीन पलाश-पुष्प है।
- विद्याधन की विशेषता उलट देना – यह देने (व्यय) से बढ़ता है, घटता नहीं।
पाठ्यपुस्तक संदर्भ: NCERT दीपकम्, कक्षा 7, पाठ 6, पृष्ठ 57–70; उपलब्ध प्रति का पुनर्मुद्रण 2026–27। उत्तर और व्याख्याएँ ClearStudy की मौलिक शिक्षण सामग्री हैं; खुली गतिविधियों के उत्तर नमूने हैं। आधिकारिक NCERT पुस्तक पोर्टल।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
दीपकम् कक्षा 7 पाठ 6 ‘क्रीडाम वयं श्लोकान्त्याक्षरीम्’ किस विषय पर आधारित है?
यह पाठ ‘अन्त्याक्षरी क्रीडा’ नामक खेल के माध्यम से विद्या (ज्ञान) की महिमा पर आधारित है। इसमें ज्ञानमाला एवं रत्नमाला नामक दो दल विद्या-विषयक दस सुभाषित-श्लोक गाते हैं।
‘अन्त्याक्षरी क्रीडा’ के क्या नियम हैं?
एक दल का सदस्य एक श्लोक गाता है; उस श्लोक के अन्तिम व्यञ्जन-वर्ण से दूसरे दल का सदस्य अगला श्लोक आरम्भ करता है, और इसी क्रम में क्रीडा आगे बढ़ती है।
इस पाठ में विद्या को सबसे श्रेष्ठ धन क्यों कहा गया है?
क्योंकि विद्या-रूपी धन न चोरी होता है, न राजा द्वारा छीना जाता है, न भाइयों में बँटता है और न भारस्वरूप होता है; साधारण धन खर्च से घटता है, किन्तु विद्या देने (बाँटने) से बढ़ती है। इसीलिए विद्याधन सर्वधनप्रधान कहा गया है।
अतिरिक्त प्रश्न, MCQ और अभिकथन-कारण ClearStudy के अभ्यास हैं। मूल पुस्तक भी साथ में पढ़ें।
