Class 7 Sanskrit Deepakam Chapter 6 Solutions — क्रीडाम वयं श्लोकान्त्याक्षरीम्

Class 7 Sanskrit Deepakam Chapter 6 solutions: विद्या पर दस सुभाषितों का हिन्दी अर्थ, छह अभ्यासों के उत्तर, विद्या-शब्द के रूप और अन्त्याक्षरी की गतिविधियाँ पढ़ें।

Class: 7 Subject: Sanskrit Book: Deepakam (दीपकम्) Chapter: 6 पाठ: क्रीडाम वयं श्लोकान्त्याक्षरीम् प्रति का पुनर्मुद्रण: 2026–27

पाठ का अवलोकन (Chapter Overview)

दीपकम् कक्षा 7 का छठा पाठ ‘क्रीडाम वयं श्लोकान्त्याक्षरीम्’ एक रोचक एवं खेल-आधारित पाठ है। वर्षा के कारण बाहर न जा पाने पर दीपिका, भारती एवं उनके मित्र मिलकर एक नूतन क्रीडा – ‘अन्त्याक्षरी क्रीडा’ खेलने का निश्चय करते हैं। इसमें दो दल बनते हैं – ज्ञानमाला एवं रत्नमाला। नियम यह है कि एक दल का सदस्य एक पद्य (श्लोक) गाता है, और उस श्लोक के अन्तिम व्यञ्जन-वर्ण से दूसरा दल अगला श्लोक आरम्भ करता है। इसी क्रम में पाठ में विद्या (ज्ञान) की महिमा पर दस सुप्रसिद्ध सुभाषित-श्लोक प्रस्तुत किए गए हैं। पाठ का केन्द्रीय भाव यह है कि विद्या ही मनुष्य का सर्वश्रेष्ठ आभूषण, गुप्त धन एवं सच्चा बन्धु है। यह पाठ खेल-खेल में संस्कृत श्लोकों का अभ्यास एवं विद्या के महत्त्व का बोध कराता है।

पाठ-परिचय / प्रसंग

यह पाठ संवाद-शैली में आरम्भ होता है। बाहर वर्षा हो रही होती है, अतः खेलने की इच्छा रखने वाले बालक-बालिकाएँ घर के भीतर ही ‘अन्त्याक्षरी क्रीडा’ खेलते हैं। इस क्रीडा में दो गण (दल) बनाए जाते हैं – ज्ञानमालागणः एवं रत्नमालागणः। आदौ प्रथम दल का सदस्य एक श्लोक गाता है; उस श्लोक के अन्तिम व्यञ्जन-वर्ण से दूसरे दल का सदस्य अगला श्लोक आरम्भ करता है, और इसी क्रम से क्रीडा चलती रहती है। पाठ में दिए गए सभी दस श्लोक विद्या (ज्ञान) के माहात्म्य पर आधारित सुभाषित हैं, जो संस्कृत-साहित्य की नीति-परम्परा से लिए गए हैं।

मूल पाठ (दश श्लोकाः) + अन्वय + भावार्थ

(पाठ में ज्ञानमाला-गण एवं रत्नमाला-गण द्वारा गाए गए दस सुभाषित-श्लोक, पाठ के क्रम में; प्रत्येक का अन्वय एवं भावार्थ नीचे दिया गया है।)

श्लोक 1 (ज्ञानमालागणः)

रूपयौवनसम्पन्ना विशालकुलसम्भवाः ।
विद्याहीना न शोभन्ते निर्गन्धा इव किंशुकाः ॥ १ ॥
पदच्छेदःरूप-यौवन-सम्पन्नाः विशाल-कुल-सम्भवाः विद्या-हीनाः न शोभन्ते निर्गन्धाः इव किंशुकाः ।
अन्वयःरूपयौवनसम्पन्नाः विशालकुलसम्भवाः (परन्तु) विद्याहीनाः (जनाः) निर्गन्धाः किंशुकाः इव न शोभन्ते ।
भावार्थःजिन लोगों के पास सुन्दर रूप, यौवन एवं उत्तम कुल में जन्म भी है, किन्तु यदि वे विद्या का अर्जन नहीं करते तो उनकी शोभा नहीं होती। जैसे फूले हुए पलाश (टेसू) के वृक्ष देखने में अत्यन्त सुन्दर होते हैं, किन्तु उनमें सुगन्ध नहीं होती, अतः लोग उनका उपयोग नहीं करते। इसी प्रकार रूप, यौवन एवं उच्च कुल की अपेक्षा विद्या ही श्रेष्ठ है।

श्लोक 2 (रत्नमालागणः)

काव्यशास्त्रविनोदेन कालो गच्छति धीमताम् ।
व्यसनेन च मूर्खाणां निद्रया कलहेन वा ॥ २ ॥
पदच्छेदःकाव्य-शास्त्र-विनोदेन कालः गच्छति धीमताम् व्यसनेन च मूर्खाणाम् निद्रया कलहेन वा ।
अन्वयःधीमतां कालः काव्यशास्त्रविनोदेन (गच्छति), मूर्खाणां च (कालः) व्यसनेन निद्रया कलहेन वा गच्छति ।
भावार्थःबुद्धिमान् लोग काव्यों एवं शास्त्रों के अनुशीलन (आनन्दपूर्वक अध्ययन) से अपने समय का सदुपयोग करते हैं, परन्तु मूर्ख जन सोकर, परस्पर कलह करके अथवा दुर्व्यसन में पड़कर अपने अमूल्य समय का दुरुपयोग करते हैं। अतः हमें भी सदा विद्या के अभ्यास, पठन एवं लेखन में समय लगाना चाहिए।

श्लोक 3 (ज्ञानमालागणः)

विद्या विवादाय धनं मदाय, शक्तिः परेषां परिपीडनाय ।
खलस्य साधोर्विपरीतमेतत्, ज्ञानाय दानाय च रक्षणाय ॥ ३ ॥
पदच्छेदःविद्या विवादाय धनम् मदाय शक्तिः परेषाम् परिपीडनाय खलस्य साधोः विपरीतम् एतत् ज्ञानाय दानाय च रक्षणाय ।
अन्वयःखलस्य विद्या विवादाय, धनं मदाय, शक्तिः परेषां परिपीडनाय (च भवति) । (परं) साधोः एतद्-विपरीतं (विद्या) ज्ञानाय, (धनं) दानाय, (शक्तिः) रक्षणाय च (भवति) ।
भावार्थःदुष्ट व्यक्ति विद्या का उपयोग झगड़े के लिए, धन का उपयोग अहंकार के लिए तथा शक्ति का उपयोग दूसरों को पीड़ा देने के लिए करता है। किन्तु सज्जन का स्वभाव इसके विपरीत होता है – वह विद्या का उपयोग दूसरों के ज्ञान-वर्धन के लिए, धन का उपयोग दान के लिए तथा शक्ति का उपयोग दुर्बलों की रक्षा के लिए करता है।

श्लोक 4 (रत्नमालागणः)

येषां न विद्या न तपो न दानं, ज्ञानं न शीलं न गुणो न धर्मः ।
ते मर्त्यलोके भुवि भारभूता, मनुष्यरूपेण मृगाश्चरन्ति ॥ ४ ॥
पदच्छेदःयेषाम् न विद्या न तपः न दानम् ज्ञानम् न शीलम् न गुणः न धर्मः ते मर्त्य-लोके भुवि भार-भूताः मनुष्य-रूपेण मृगाः चरन्ति ।
अन्वयःयेषां (जनानां) विद्या न, तपः न, दानं न, ज्ञानं न, शीलं न, गुणः न, धर्मः (अपि) न सन्ति, ते मर्त्यलोके भुवि भारभूताः मृगाः मनुष्यरूपेण चरन्ति ।
भावार्थःजो लोग न विद्या अर्जित करते हैं, न तप करते हैं, न दान देते हैं, न ज्ञान प्राप्त करते हैं, न उत्तम चरित्रवान् होते हैं, न गुणवान् होते हैं और न धर्म का आचरण करते हैं – वे इस संसार में पृथ्वी पर भारस्वरूप हैं और मनुष्य के रूप में पशुओं के समान इधर-उधर घूमते रहते हैं।

श्लोक 5 (ज्ञानमालागणः)

तदा वृत्तिश्च कीर्तिश्च लक्ष्मीर्वाणी यशस्विनी ।
तत्त्वज्ञानं परा शान्तिर्यदा विद्या भवेत्तव ॥ ५ ॥
पदच्छेदःतदा वृत्तिः च कीर्तिः च लक्ष्मीः वाणी यशस्विनी तत्त्वज्ञानम् परा शान्तिः यदा विद्या भवेत् तव ।
अन्वयःयदा तव विद्या भवेत्, तदा (ते) वृत्तिः, कीर्तिः, लक्ष्मीः, यशस्विनी वाणी, तत्त्वज्ञानं, परा शान्तिः च (भवेत्) ।
भावार्थःयदि तुम विद्या अर्जित करते हो, तो तुम्हें आजीविका (उद्योग), यश, सम्पत्ति, कीर्तिप्रद वाणी, वास्तविक तत्त्वज्ञान तथा उत्तम शान्ति की प्राप्ति होती है। अतः निरन्तर विद्या-अर्जन करना चाहिए।

श्लोक 6 (रत्नमालागणः)

विद्या नाम नरस्य रूपमधिकं प्रच्छन्नगुप्तं धनं,
विद्या भोगकरी यशःसुखकरी विद्या गुरूणां गुरुः ।
विद्या बन्धुजनो विदेशगमने विद्या परा देवता,
विद्या राजसु पूज्यते न हि धनं विद्याविहीनः पशुः ॥ ६ ॥
पदच्छेदःविद्या नाम नरस्य रूपम् अधिकम् प्रच्छन्न-गुप्तम् धनम् विद्या भोगकरी यशः-सुखकरी विद्या गुरूणाम् गुरुः विद्या बन्धु-जनः विदेश-गमने विद्या परा देवता विद्या राजसु पूज्यते न हि धनम् विद्या-विहीनः पशुः ।
अन्वयःविद्या नाम नरस्य अधिकं रूपं प्रच्छन्नगुप्तं धनं (च अस्ति) । विद्या भोगकरी यशःसुखकरी (च अस्ति) । विद्या गुरूणां गुरुः (अस्ति) । विद्या विदेशगमने बन्धुजनः (भवति) । विद्या परा देवता (अस्ति) । विद्या राजसु पूज्यते, धनं न हि (पूज्यते) । विद्याविहीनः (जनः) पशुः (भवति) ।
भावार्थःविद्या मनुष्य का श्रेष्ठ सौन्दर्य है और छिपा हुआ गुप्त धन है। विद्या आनन्द देती है, कीर्ति बढ़ाती है तथा सुख प्रदान करती है। विद्या गुरुओं की भी गुरु है। विदेश-यात्रा में विद्या ही बन्धु बन जाती है। विद्या प्रधान देवता है। राजसभाओं में विद्वान् का ही सम्मान होता है, धनवान् का नहीं। अतः जो विद्याहीन है वह पशु के समान है।

श्लोक 7 (ज्ञानमालागणः)

शनैः पन्थाः शनैः कन्था शनैः पर्वतलङ्घनम् ।
शनैर्विद्या शनैर्वित्तं पञ्चैतानि शनैः शनैः ॥ ७ ॥
पदच्छेदःशनैः पन्थाः शनैः कन्था शनैः पर्वत-लङ्घनम् शनैः विद्या शनैः वित्तम् पञ्च एतानि शनैः शनैः ।
अन्वयःपन्थाः शनैः, कन्था शनैः, पर्वतलङ्घनं शनैः, विद्या शनैः, वित्तं शनैः च – एतानि पञ्च (कार्याणि) शनैः शनैः (करणीयानि) ।
भावार्थःमनुष्य को चलते समय सदा सावधानी से चलना चाहिए। वस्त्र की सिलाई जागरूकता से करनी चाहिए। पर्वत पर चढ़ाई क्रमशः (धीरे-धीरे) करनी चाहिए। विद्या एवं धन को निरन्तर प्रयत्न से अर्जित करना चाहिए। ये पाँच कार्य धीरे-धीरे अर्थात् सोपान-क्रम (क्रमबद्ध) से ही करने चाहिए।

श्लोक 8 (रत्नमालागणः)

न विद्यया विना सौख्यं नराणां जायते ध्रुवम् ।
अतो धर्मार्थमोक्षेभ्यो विद्याभ्यासं समाचरेत् ॥ ८ ॥
पदच्छेदःन विद्यया विना सौख्यम् नराणाम् जायते ध्रुवम् अतः धर्म-अर्थ-मोक्षेभ्यः विद्याभ्यासम् समाचरेत् ।
अन्वयःविद्यया विना नराणां ध्रुवं सौख्यं न जायते । अतः धर्म-अर्थ-मोक्षेभ्यः विद्याभ्यासं समाचरेत् ।
भावार्थःमनुष्यों के लिए विद्या-अर्जन अत्यन्त अनिवार्य है। यदि मनुष्य विद्या-अर्जन नहीं करते तो उन्हें स्थिर (निश्चित) सुख प्राप्त नहीं होता। अतः धर्म-साधन के लिए, अर्थ (धन)-लाभ के लिए तथा मोक्ष प्राप्त करने के लिए विद्या का अभ्यास करना चाहिए।

श्लोक 9 (ज्ञानमालागणः)

ताराणां भूषणं चन्द्रः लतानां भूषणं सुमम् ।
पृथिव्याः भूषणं राजा विद्या सर्वस्य भूषणम् ॥ ९ ॥
पदच्छेदःताराणाम् भूषणम् चन्द्रः लतानाम् भूषणम् सुमम् पृथिव्याः भूषणम् राजा विद्या सर्वस्य भूषणम् ।
अन्वयःचन्द्रः ताराणां भूषणम् (अस्ति), सुमं लतानां भूषणम् (अस्ति), राजा पृथिव्याः भूषणम् (अस्ति), (परं) विद्या सर्वस्य भूषणम् (अस्ति) ।
भावार्थःतारे चन्द्रमा के साथ शोभा पाते हैं। लताएँ फूलों के साथ शोभा पाती हैं। राजा पृथ्वी की शोभा बढ़ाता है। किन्तु विद्या से सभी मनुष्यों की शोभा बढ़ती है। अतः विद्या ही सबका सर्वश्रेष्ठ आभूषण है।

श्लोक 10 (रत्नमालागणः)

न चोरहार्यं न च राजहार्यं न भ्रातृभाज्यं न च भारकारि ।
व्यये कृते वर्धत एव नित्यं विद्याधनं सर्वधनप्रधानम् ॥ १० ॥
पदच्छेदःन चोर-हार्यम् न च राज-हार्यम् न भ्रातृ-भाज्यम् न च भारकारि व्यये कृते वर्धते एव नित्यम् विद्या-धनम् सर्व-धन-प्रधानम् ।
अन्वयः(विद्याधनं) चोरहार्यं न सन्ति, राजहार्यं न सन्ति, भ्रातृभाज्यं न सन्ति, भारकारि च न सन्ति, व्यये कृते (विद्याधनं) नित्यं वर्धते एव, (अतः) विद्याधनं सर्वधनप्रधानम् (अस्ति) ।
भावार्थःचोर धन को चुरा सकता है, राजा धन को छीन सकता है तथा भाइयों में धन का विभाजन हो सकता है। साधारण धन खर्च करने पर घट जाता है। किन्तु विद्या रूपी धन को न चोर चुरा सकता है, न राजा छीन सकता है, न भाइयों में बँटता है और न ही वह भारस्वरूप होता है। विद्या के वितरण से विद्याधन और भी बढ़ता है। अतः सभी धनों में विद्याधन ही प्रमुख धन है।

सार (Hindi Summary)

‘क्रीडाम वयं श्लोकान्त्याक्षरीम्’ पाठ का आरम्भ एक रोचक संवाद से होता है। बाहर वर्षा हो रही है, इसलिए दीपिका, भारती एवं उनके मित्र बाहर खेलने नहीं जा पाते। तब वे घर के भीतर ही एक नूतन क्रीडा – ‘अन्त्याक्षरी क्रीडा’ – खेलने का निश्चय करते हैं। खेल के नियम के अनुसार वे दो दल बनाते हैं – ज्ञानमालागण एवं रत्नमालागण। पहले एक दल का सदस्य एक श्लोक गाता है; उस श्लोक के अन्तिम व्यञ्जन-वर्ण से दूसरे दल का सदस्य अगला श्लोक आरम्भ करता है, और इसी क्रम में क्रीडा आगे बढ़ती है।

इस अन्त्याक्षरी-क्रीडा में दोनों दल विद्या (ज्ञान) की महिमा पर दस सुप्रसिद्ध सुभाषित-श्लोक प्रस्तुत करते हैं। इन श्लोकों का मुख्य भाव यह है कि रूप, यौवन एवं उच्च कुल होते हुए भी विद्याहीन व्यक्ति गन्धहीन पलाश-पुष्प के समान शोभा नहीं पाता। बुद्धिमान् व्यक्ति काव्य-शास्त्र के अनुशीलन में समय लगाते हैं, जबकि मूर्ख व्यसन, निद्रा एवं कलह में समय गँवाते हैं। दुष्ट व्यक्ति विद्या, धन एवं शक्ति का दुरुपयोग करता है, किन्तु सज्जन इनका उपयोग ज्ञान, दान एवं रक्षा के लिए करता है।

आगे के श्लोकों में बताया गया है कि विद्याहीन मनुष्य पशु के समान है, विद्या से ही यश, सम्पत्ति एवं शान्ति मिलती है, विद्या मनुष्य का गुप्त धन एवं प्रधान देवता है, तथा विद्या को धीरे-धीरे क्रमबद्ध रूप से अर्जित करना चाहिए। अन्त में कहा गया है कि विद्यारूपी धन न चोरी होता है, न छीना जाता है, न बँटता है, और देने से बढ़ता है – अतः विद्या ही सबका सर्वश्रेष्ठ आभूषण एवं सबसे प्रमुख धन है। संक्षेप में, यह पाठ खेल-खेल में विद्या के महत्त्व का सुन्दर बोध कराता है।

पदान्त्याक्षरी का क्रम: रामः से म लेकर मानवः, मानवः से व लेकर वनम्, और वनम् में म् से पहले न लेकर नकुलः
पुस्तक के पृष्ठ 70 का पदान्त्याक्षरी उदाहरण। अन्त में म्, विसर्ग या अनुस्वार हो तो उससे पहले का व्यञ्जन लें। श्लोकान्त्याक्षरी में कक्षा की सहमत छूट भी स्पष्ट करें।

शब्दार्थ (Word-meanings)

शब्दः (Sanskrit)हिन्दी अर्थEnglish meaning
रूपयौवनसम्पन्नाःसौन्दर्य एवं यौवन से सम्पन्नHandsome & youthful
विशालकुलसम्भवाःविशिष्ट (बड़े) परिवार में जन्मे हुएBorn in a privileged family
निर्गन्धाःगन्धहीनWithout fragrance
किंशुकाःपलाश (ढाक/टेसू) के वृक्षFlame-of-the-forest trees
धीमताम्बुद्धिमान् लोगों काOf intelligent people
व्यसनेनभोग-विलास / बुरी आदत के द्वाराBy addiction & bad habits
मदायअभिमान के लिएFor arrogance
परिपीडनायकष्ट देने के लिएFor troubling
खलःदुष्ट / दुर्जनWicked person
शीलम्चरित्रCharacter
मर्त्यलोकेसंसार मेंIn this mortal world
भुविधरती परOn the earth
भारभूताःभारस्वरूपA burden
वृत्तिःआजीविका, उद्योगOccupation / livelihood
लक्ष्मीःसम्पत्ति, धनWealth
यशस्विनीकीर्ति से युक्तEndowed with fame
तत्त्वज्ञानम्यथार्थ (वास्तविक) ज्ञानReal knowledge
प्रच्छन्नगुप्तम्ढँका हुआ एवं सुरक्षितCovered and concealed
भोगकरीसुख-भोग देने वालीGiving materialistic pleasure
विदेशगमनेविदेश जाने परWhile travelling abroad
पराश्रेष्ठGreat / supreme
विद्याविहीनःविद्या-रहितDevoid of education
पन्थाःमार्ग, पथThe way / road
कन्थापुराने वस्त्रों से बनी मोटी चादरRug made from rags
वित्तम्धनMoney / wealth
सौख्यम्सुख, आनन्दHappiness
ध्रुवम्निश्चित, स्थिरCertain
समाचरेत्करना चाहिएShould do / practise
ताराणाम्नक्षत्रों काOf the stars
भूषणम्आभूषण, अलंकारOrnament
सुमम्पुष्प, फूलFlower
चोरहार्यम्चोर के द्वारा हरण योग्यCan be stolen by thieves
राजहार्यम्राजा के द्वारा हरण योग्यCan be seized by kings
भ्रातृभाज्यम्भाई-बहनों में बँटने योग्यDivisible amongst siblings
भारकारिभारस्वरूपHeavy / a burden
विद्याधनम्विद्या रूपी धनWealth in the form of knowledge
सर्वधनप्रधानम्सभी धनों में प्रमुखMost important of all wealth

अभ्यासः (वयम् अभ्यासं कुर्मः)

1. अधः प्रदत्तानां प्रश्नानाम् एकपदेन उत्तरं लिखन्तु —

(क) विद्याहीनाः कीदृशाः किंशुकाः इव न शोभन्ते ?

उत्तरनिर्गन्धाः।

(ख) धीमतां कालः कथं गच्छति ?

उत्तरकाव्यशास्त्रविनोदेन।

(ग) केषां कालः निद्रया कलहेन वा गच्छति ?

उत्तरमूर्खाणाम्।

(घ) खलस्य विद्या किमर्थम् ?

उत्तरविवादाय।

(ङ) सज्जनस्य विद्या किमर्थम् ?

उत्तरज्ञानाय।

(च) चन्द्रः केषां भूषणम् अस्ति ?

उत्तरताराणाम्।

(छ) सर्वधनप्रधानं किम् ?

उत्तरविद्याधनम्।

2. अधः प्रदत्तानां प्रश्नानां पूर्णवाक्येन उत्तरं लिखन्तु —

(क) निर्गन्धाः किंशुकाः इव के न शोभन्ते ?

उत्तररूपयौवनसम्पन्नाः विशालकुलसम्भवाः अपि विद्याहीनाः जनाः निर्गन्धाः किंशुकाः इव न शोभन्ते ।

(ख) मूर्खाणां कालः कथं गच्छति ?

उत्तरमूर्खाणां कालः व्यसनेन, निद्रया कलहेन वा गच्छति ।

(ग) दुर्जनः विद्यायाः धनस्य शक्तेः च उपयोगं कथं करोति ?

उत्तरदुर्जनः विद्यायाः उपयोगं विवादाय, धनस्य उपयोगं मदाय (अहङ्काराय), शक्तेः उपयोगं च परेषां परिपीडनाय करोति ।

(घ) कीदृशाः मनुष्याः भुवि भारभूताः भवन्ति ?

उत्तरयेषां विद्या, तपः, दानं, ज्ञानं, शीलं, गुणः, धर्मः च न सन्ति, ते मनुष्याः भुवि भारभूताः भवन्ति (मनुष्यरूपेण मृगाः इव चरन्ति) ।

(ङ) शनैः शनैः कानि साधनीयानि ?

उत्तरशनैः शनैः पन्थाः, कन्था, पर्वतलङ्घनम्, विद्या, वित्तम् च – एतानि पञ्च (कार्याणि) साधनीयानि ।

3. उचितान् वाक्यांशान् परस्परं संयोजयन्तु —

(स्तंभ ‘क’ के वाक्यांशों को स्तंभ ‘ख’ के उपयुक्त वाक्यांशों से मिलाइए।)

(क)(ख) – सही मिलान (उत्तर)
तदा वृत्तिश्च कीर्तिश्चयदा विद्या भवेत्तव
खलस्य साधोर्विपरीतमेतत्ज्ञानाय दानाय च रक्षणाय
शनैर्विद्या शनैर्वित्तंपञ्चैतानि शनैः शनैः
विद्याहीना न शोभन्तेनिर्गन्धा इव किंशुकाः
न चोरहार्यं न च राजहार्यम्न भ्रातृभाज्यं न च भारकारि
विद्या राजसु पूज्यतेन हि धनम्
अतो धर्मार्थमोक्षेभ्यःविद्याभ्यासं समाचरेत्

4. उदाहरणानुसारम् अधः रेखाङ्कितानि पदानि आश्रित्य प्रश्ननिर्माणं कुर्वन्तु —

यथा – राजा पृथिव्याः भूषणं भवति । → राजा कस्याः भूषणं भवति ?

वाक्यम् (रेखाङ्कित पद मोटे अक्षरों में)प्रश्ननिर्माणम् (उत्तर)
(क) राजा पृथिव्याः भूषणं भवति ।राजा कस्याः भूषणं भवति ?
(ख) साधोः विद्या ज्ञानाय भवति ।कस्य विद्या ज्ञानाय भवति ?
(ग) विद्या गुरूणां गुरुः ।विद्या केषां गुरुः ?
(घ) ते मर्त्यलोके भुवि भारभूताः भवन्ति ।ते मर्त्यलोके भुवि कीदृशाः भवन्ति ?
(ङ) विद्याहीनाः न शोभन्ते ।के न शोभन्ते ?
(च) सर्वस्य लोचनं शास्त्रम् ।सर्वस्य लोचनं किम् ?
(छ) विद्या राजसु पूज्यते ।का राजसु पूज्यते ?
(ज) काव्यशास्त्रविनोदेन कालो गच्छति धीमताम् ।केन धीमतां कालो गच्छति ?

5. मञ्जूषातः समुचितानि पदानि स्वीकृत्य रिक्तस्थानानि पूरयन्तु —

मञ्जूषा: रक्षणाय, मदाय, विवादाय, परिपीडनाय, ज्ञानाय, दानाय

 सज्जनस्य (उत्तर)दुर्जनस्य (उत्तर)
शक्तिःरक्षणायपरिपीडनाय
विद्याज्ञानायविवादाय
धनम्दानायमदाय

6. उदाहरणानुसारम् अधोलिखितानां पदानां विभक्तिं वचनं च लिखन्तु —

यथा – ताराणाम् – षष्ठी विभक्तिः, बहुवचनम् ।

पदम्विभक्तिः (उत्तर)वचनम् (उत्तर)
(क) विद्याम्द्वितीया विभक्तिःएकवचनम्
(ख) धनस्यषष्ठी विभक्तिःएकवचनम्
(ग) कलहेनतृतीया विभक्तिःएकवचनम्
(घ) नराणाम्षष्ठी विभक्तिःबहुवचनम्
(ङ) मर्त्यलोकेसप्तमी विभक्तिःएकवचनम्
(च) ज्ञानायचतुर्थी विभक्तिःएकवचनम्
(छ) राजसुसप्तमी विभक्तिःबहुवचनम्

योग्यताविस्तरः (व्याकरण-तालिका)

पाठ के अन्त में ‘योग्यताविस्तरः’ में विद्या से सम्बन्धित कुछ सुभाषित-श्लोक तथा ‘विद्या’ (आकारान्त स्त्रीलिङ्ग) शब्द के रूप दिए गए हैं, जिन्हें भली प्रकार कण्ठस्थ करना आवश्यक है।

विद्या-सन्दर्भे श्लोकाः (पाठ से)

नास्ति विद्यासमो बन्धुर्नास्ति विद्यासमः सुहृत् ।
नास्ति विद्यासमं वित्तं नास्ति विद्यासमं सुखम् ॥

विद्याभ्यासस्तपो ज्ञानमिन्द्रियाणां च संयमः ।
अहिंसा गुरुसेवा च निःश्रेयसकरं परम् ॥

ज्ञातिभिर्वण्ट्यते नैव चोरेणापि न नीयते ।
दाने नैव क्षयं याति विद्यारत्नं महाधनम् ॥ — योग्यताविस्तरः (दीपकम्)

‘विद्या’ इति शब्दस्य रूपाणि (आकारान्त स्त्रीलिङ्गः)

विभक्तिःएकवचनम्द्विवचनम्बहुवचनम्
प्रथमाविद्याविद्येविद्याः
द्वितीयाविद्याम्विद्येविद्याः
तृतीयाविद्ययाविद्याभ्याम्विद्याभिः
चतुर्थीविद्यायैविद्याभ्याम्विद्याभ्यः
पञ्चमीविद्यायाःविद्याभ्याम्विद्याभ्यः
षष्ठीविद्यायाःविद्ययोःविद्यानाम्
सप्तमीविद्यायाम्विद्ययोःविद्यासु
सम्बोधनम्(हे) विद्ये !(हे) विद्ये !(हे) विद्याः !

परियोजनाकार्यम् / कार्यकलापः (Project & Activity)

1. क, त, व, म, य इति पञ्चभिः वर्णैः श्लोकान् सङ्गृह्य लिखन्तु ।

मार्गदर्शनम्यह परियोजना-कार्य है। ‘क’, ‘त’, ‘व’, ‘म’, ‘य’ इन पाँच वर्णों से आरम्भ होने वाले श्लोक/सुभाषित ग्रन्थालय, अन्तर्जाल, अध्यापकों एवं मित्रों से एकत्र कर स्फोरकपत्र (chart) पर लिखें तथा शिक्षक की अनुमति से कक्षा-भित्ति पर लगाएँ।

2. पदान्त्याक्षरी क्रीडा एवं क्रियापद-स्मरणक्रीडा कक्षायां क्रीडन्तु ।

मार्गदर्शनम्कक्षा में पदान्त्याक्षरी क्रीडा खेलें – यथा रामः → मानवः → वनम् → नकुलः। (जब पद के अन्त में ‘म्’, विसर्ग या अनुस्वार हो, तब उससे पूर्व के व्यञ्जन-वर्ण को लेकर अगला पद बोलें।) क्रियापद-स्मरणक्रीडा में पहला छात्र एक क्रियापद (गच्छति) बोलता है, दूसरा उसे दोहराकर नया जोड़ता है (गच्छति पठति), इसी क्रम से क्रीडा आगे बढ़ती है।

योग्यताविस्तर के तीसरे श्लोक में पदच्छेद है: दाने + न + एव + क्षयम् + याति — देने पर भी विद्या का क्षय नहीं होता। “दानेन + एव” करने से अर्थ उलट जाएगा। “विद्याविहीनः पशुः” जैसी उक्तियाँ सुभाषित की अलंकारात्मक नीति-शैली हैं; किसी व्यक्ति का मानवीय मूल्य उसकी औपचारिक शिक्षा से तय नहीं होता।

परियोजना 2 — श्लोकों की नई श्रृंखला

पुस्तक विभिन्न स्रोतों से सुभाषित चुनकर अन्त्याक्षरी-क्रम में लिखने को भी कहती है। शिक्षक से पाठ और उच्चारण जाँचें। पहले श्लोक का अन्तिम उपयुक्त व्यञ्जन लेकर अगला श्लोक चुनें। पुस्तक की तालिका में 9 से 10 के लिए ण्/न् दिया है; यह छूट कक्षा में पहले तय करें। यह एक नमूना/खुली गतिविधि है।

कार्यकलाप 3 — वर्णलेख का अभ्यास

क्षणशः कणशश्चैव विद्यामर्थं च साधयेत्।
क्षणे नष्टे कुतो विद्या कणे नष्टे कुतो धनम्॥

भाव: समय के छोटे-छोटे क्षणों में ज्ञान और थोड़ी-थोड़ी बचत से धन अर्जित करें; समय और साधनों का सदुपयोग सीखें। पुस्तक के पृष्ठ 70 पर अक्षर भरें और मात्राएँ स्पष्ट रखें।

अतिरिक्त प्रश्न (Extra Questions)

अतिरिक्त लघु प्रश्न — ClearStudy अभ्यास

1. ‘अन्त्याक्षरी क्रीडा’ क्या है और इसमें दलों के क्या नाम हैं?

उत्तरअन्त्याक्षरी क्रीडा एक श्लोक-आधारित खेल है, जिसमें एक दल श्लोक गाता है और उसके अन्तिम व्यञ्जन-वर्ण से दूसरा दल अगला श्लोक आरम्भ करता है। पाठ में दो दल हैं – ज्ञानमालागण एवं रत्नमालागण।

2. विद्याहीन व्यक्ति की तुलना किससे की गई है और क्यों?

उत्तरविद्याहीन व्यक्ति की तुलना गन्धहीन किंशुक (पलाश/टेसू) के पुष्प से की गई है। जैसे पलाश-पुष्प देखने में सुन्दर होते हुए भी सुगन्ध-रहित हैं, वैसे ही रूप-यौवन-कुल होते हुए भी विद्याहीन व्यक्ति शोभा नहीं पाता।

3. श्लोक 7 में कौन-से पाँच कार्य धीरे-धीरे करने को कहा गया है?

उत्तरश्लोक 7 में पाँच कार्य धीरे-धीरे (क्रमबद्ध रूप से) करने को कहा गया है – (1) मार्ग पर चलना, (2) कन्था (वस्त्र) सिलना, (3) पर्वत पर चढ़ना, (4) विद्या अर्जित करना, एवं (5) धन कमाना।

4. विद्याधन को साधारण धन से श्रेष्ठ क्यों कहा गया है?

उत्तरविद्याधन न चोरी होता है, न राजा द्वारा छीना जाता है, न भाइयों में बँटता है और न ही भारस्वरूप होता है। साधारण धन खर्च करने से घटता है, किन्तु विद्याधन देने से बढ़ता है। अतः विद्याधन ही सर्वश्रेष्ठ एवं प्रमुख धन है।

5. श्लोक 6 के अनुसार विदेश-यात्रा में मनुष्य का सच्चा बन्धु कौन है?

उत्तरश्लोक 6 के अनुसार विदेश-यात्रा (विदेशगमन) में विद्या ही मनुष्य का सच्चा बन्धु है, क्योंकि विद्या ही अपरिचित स्थान पर भी मनुष्य की सहायता करती है तथा उसे सम्मान दिलाती है।

अतिरिक्त व्याख्यात्मक प्रश्न — ClearStudy अभ्यास

6. ‘क्रीडाम वयं श्लोकान्त्याक्षरीम्’ पाठ का केन्द्रीय भाव अपने शब्दों में लिखिए।

उत्तरइस पाठ का केन्द्रीय भाव विद्या (ज्ञान) की महिमा है। पाठ का आरम्भ वर्षा के कारण घर के भीतर खेली जाने वाली ‘अन्त्याक्षरी क्रीडा’ के रोचक संवाद से होता है, जिसमें ज्ञानमाला एवं रत्नमाला नामक दो दल बारी-बारी से विद्या पर सुभाषित-श्लोक गाते हैं।इन श्लोकों के माध्यम से यह बताया गया है कि रूप, यौवन एवं उच्च कुल होते हुए भी विद्याहीन मनुष्य गन्धहीन पलाश-पुष्प के समान शोभा नहीं पाता, वह पशु के समान है। विद्या से ही यश, सम्पत्ति, शान्ति एवं सम्मान मिलता है। विद्या मनुष्य का गुप्त धन एवं प्रधान देवता है, जो न चोरी होती है, न बँटती है और देने से बढ़ती है। अतः विद्या ही सबका सर्वश्रेष्ठ आभूषण एवं प्रमुख धन है। पाठ खेल-खेल में विद्या के महत्त्व का सुन्दर बोध कराता है।

7. इस पाठ में वर्णित सज्जन एवं दुर्जन के स्वभाव का अन्तर स्पष्ट कीजिए।

उत्तरपाठ के तीसरे श्लोक में सज्जन एवं दुर्जन के स्वभाव का स्पष्ट अन्तर बताया गया है। दुर्जन (खल) अपनी विद्या का उपयोग दूसरों से विवाद (झगड़ा) करने के लिए, धन का उपयोग अहंकार बढ़ाने के लिए तथा शक्ति का उपयोग दूसरों को पीड़ा देने के लिए करता है।इसके ठीक विपरीत सज्जन (साधु) अपनी विद्या का उपयोग दूसरों के ज्ञान-वर्धन के लिए, धन का उपयोग दान के लिए तथा शक्ति का उपयोग दुर्बलों की रक्षा के लिए करता है। इस प्रकार एक ही विद्या, धन एवं शक्ति का उपयोग व्यक्ति के स्वभाव के अनुसार भिन्न-भिन्न होता है। यही श्लोक हमें यह शिक्षा देता है कि हमें अपने गुणों एवं साधनों का उपयोग सदा लोक-कल्याण के लिए सज्जनों के समान करना चाहिए।

8. विद्या को ‘सर्वश्रेष्ठ आभूषण’ क्यों कहा गया है? पाठ के आधार पर समझाइए।

उत्तरपाठ के नवें श्लोक में विद्या को सबका सर्वश्रेष्ठ आभूषण कहा गया है। संसार की प्रत्येक वस्तु किसी न किसी आभूषण से शोभा पाती है – तारे चन्द्रमा से, लताएँ फूलों से, और पृथ्वी राजा से शोभायमान होती है।किन्तु ये आभूषण सीमित एवं बाह्य हैं, जबकि विद्या ऐसा आभूषण है जो प्रत्येक मनुष्य की आन्तरिक शोभा बढ़ाती है। विद्या से मनुष्य को यश, सम्मान, सम्पत्ति एवं शान्ति मिलती है; यह विदेश में बन्धु बनकर सहायता करती है तथा गुप्त धन की भाँति सदा साथ रहती है। बाह्य आभूषण नष्ट हो सकते हैं या चुराए जा सकते हैं, किन्तु विद्या-रूपी आभूषण कभी नष्ट नहीं होता, बल्कि देने से बढ़ता है। इसीलिए विद्या को सबका सर्वश्रेष्ठ आभूषण कहा गया है।

MCQ & अभिकथन-कारण

1. इस पाठ में खेली जाने वाली क्रीडा का नाम क्या है?

(क) पादकन्दुक-क्रीडा

(ख) अन्त्याक्षरी क्रीडा

(ग) कन्दुक-क्रीडा

(घ) धावन-क्रीडा

उत्तर(ख) अन्त्याक्षरी क्रीडा।

2. पाठ में बने दो दलों के नाम हैं—

(क) ज्ञानमाला एवं रत्नमाला

(ख) सूर्यमाला एवं चन्द्रमाला

(ग) पुष्पमाला एवं रत्नमाला

(घ) विद्यामाला एवं ज्ञानमाला

उत्तर(क) ज्ञानमाला एवं रत्नमाला।

3. विद्याहीन व्यक्ति की तुलना किससे की गई है?

(क) सुगन्धित पुष्प से

(ख) निर्गन्ध किंशुक (पलाश) से

(ग) चन्द्रमा से

(घ) नक्षत्र से

उत्तर(ख) निर्गन्ध किंशुक (पलाश) से।

4. बुद्धिमान् (धीमान्) लोगों का समय किसमें व्यतीत होता है?

(क) निद्रा में

(ख) कलह में

(ग) काव्यशास्त्र के अनुशीलन में

(घ) व्यसन में

उत्तर(ग) काव्यशास्त्र के अनुशीलन में।

5. सज्जन की विद्या किसके लिए होती है?

(क) विवाद के लिए

(ख) ज्ञान के लिए

(ग) अहंकार के लिए

(घ) पीड़ा देने के लिए

उत्तर(ख) ज्ञान के लिए (ज्ञानाय)।

6. ‘शनैः शनैः’ वाले श्लोक में कितने कार्य धीरे-धीरे करने को कहा गया है?

(क) तीन

(ख) चार

(ग) पाँच

(घ) छह

उत्तर(ग) पाँच। (पन्थाः, कन्था, पर्वतलङ्घनम्, विद्या, वित्तम्)

7. श्लोक 6 के अनुसार राजसभाओं में किसका सम्मान होता है?

(क) धन का

(ख) रूप का

(ग) विद्या (विद्वान्) का

(घ) कुल का

उत्तर(ग) विद्या (विद्वान्) का। (विद्या राजसु पूज्यते न हि धनम्)

8. विद्याधन की कौन-सी विशेषता श्लोक 10 में नहीं बताई गई?

(क) यह चोरी नहीं होता

(ख) यह बाँटने से घटता है

(ग) यह भारस्वरूप नहीं होता

(घ) यह खर्च करने (देने) पर बढ़ता है

उत्तर(ख) यह बाँटने से घटता है। (वास्तव में विद्याधन देने से बढ़ता है।)

9. ‘पन्थाः’ शब्द का अर्थ है—

(क) धन

(ख) मार्ग / पथ

(ग) पर्वत

(घ) वस्त्र

उत्तर(ख) मार्ग / पथ।

10. श्लोक 9 के अनुसार पृथ्वी का आभूषण कौन है?

(क) चन्द्रः

(ख) सुमम् (पुष्प)

(ग) राजा

(घ) तारा

उत्तर(ग) राजा। (पृथिव्याः भूषणं राजा)
उत्तर-कुंजी: 1-(ख), 2-(क), 3-(ख), 4-(ग), 5-(ख), 6-(ग), 7-(ग), 8-(ख), 9-(ख), 10-(ग)

अभिकथन-कारण – नीचे अभिकथन (A) और कारण (R) दिए गए हैं। सही विकल्प चुनिए—
(क) A और R दोनों सही, R, A की सही व्याख्या है। (ख) A और R दोनों सही, पर R, A की सही व्याख्या नहीं। (ग) A सही, R गलत। (घ) A गलत, R सही।

1. अभिकथन (A): ‘क्रीडाम वयं श्लोकान्त्याक्षरीम्’ पाठ में विद्या की महिमा बताई गई है।

कारण (R): पाठ में अन्त्याक्षरी-क्रीडा के माध्यम से विद्या (ज्ञान) पर आधारित दस सुभाषित-श्लोक प्रस्तुत किए गए हैं।

उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है।

2. अभिकथन (A): विद्याधन सर्वश्रेष्ठ धन है।

कारण (R): विद्याधन को चोर चुरा सकता है तथा राजा छीन सकता है।

उत्तर(ग) A सही है, किन्तु R गलत है – विद्याधन न चोरी होता है, न छीना जाता है; यही इसकी श्रेष्ठता है।

3. अभिकथन (A): रूप, यौवन एवं उच्च कुल होते हुए भी विद्याहीन व्यक्ति शोभा नहीं पाता।

कारण (R): वह गन्धहीन पलाश-पुष्प के समान है, जो देखने में सुन्दर होने पर भी उपयोगहीन होता है।

उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है।

4. अभिकथन (A): ‘सम्’ उपसर्गयुक्त गम्-धातु के आत्मनेपद रूप बनते हैं।

कारण (R): ‘संगच्छध्वम्’ (सम् + गम्) आत्मनेपद का मध्यमपुरुष-बहुवचन रूप है।

उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है।

5. अभिकथन (A): दुर्जन एवं सज्जन के स्वभाव में अन्तर होता है।

कारण (R): दुर्जन विद्या-धन-शक्ति का उपयोग विवाद, मद एवं पीड़ा के लिए करता है, जबकि सज्जन इनका उपयोग ज्ञान, दान एवं रक्षा के लिए करता है।

उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है।
अभिकथन-कारण उत्तर-कुंजी: 1-(क), 2-(ग), 3-(क), 4-(क), 5-(क)

परीक्षा-सुझाव एवं सामान्य त्रुटियाँ

परीक्षा-सुझाव (Exam Tips)

  • विद्या-विषयक प्रमुख श्लोक (विद्या नाम नरस्य रूपम्…, न चोरहार्यं…) कण्ठस्थ करें – इन्हीं से श्लोक-लेखन एवं भावार्थ के प्रश्न आते हैं।
  • शब्दार्थ (किंशुकाः, धीमताम्, खलः, आकूतिः नहीं बल्कि पन्थाः, कन्था, ध्रुवम् आदि) हिन्दी एवं अंग्रेज़ी दोनों में याद रखें।
  • एकपदेन एवं पूर्णवाक्येन उत्तर वाले प्रश्नों का अन्तर समझें – एकपद में केवल एक शब्द, पूर्णवाक्य में पूरा वाक्य लिखें।
  • विभक्ति-वचन वाले प्रश्न (अभ्यास 6) के लिए ‘विद्या’ शब्द-रूप एवं प्रमुख विभक्ति-चिह्न याद रखें।
  • प्रश्ननिर्माण में रेखांकित पद के अनुसार सही प्रश्नवाचक शब्द (कः, का, किम्, केषाम्, कस्याः, केन) चुनें।

सामान्य त्रुटियाँ (Common Mistakes)

  • श्लोकों में मात्रा एवं विसर्ग की अशुद्धि – ‘धीमताम्’, ‘यशस्विनी’, ‘पृथिव्याः’ को शुद्ध लिखें।
  • विभक्ति-पहचान में भूल – ‘ज्ञानाय’ (चतुर्थी), ‘कलहेन’ (तृतीया), ‘राजसु’ (सप्तमी बहुवचन) को सही पहचानें।
  • सज्जन एवं दुर्जन के गुण-प्रयोग को परस्पर बदल देना – दुर्जन: विवाद/मद/परिपीडन; सज्जन: ज्ञान/दान/रक्षण।
  • ‘निर्गन्धाः किंशुकाः’ का अर्थ ‘सुगन्धित फूल’ लिख देना – किंशुक गन्धहीन पलाश-पुष्प है।
  • विद्याधन की विशेषता उलट देना – यह देने (व्यय) से बढ़ता है, घटता नहीं।

पाठ्यपुस्तक संदर्भ: NCERT दीपकम्, कक्षा 7, पाठ 6, पृष्ठ 57–70; उपलब्ध प्रति का पुनर्मुद्रण 2026–27। उत्तर और व्याख्याएँ ClearStudy की मौलिक शिक्षण सामग्री हैं; खुली गतिविधियों के उत्तर नमूने हैं। आधिकारिक NCERT पुस्तक पोर्टल।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

दीपकम् कक्षा 7 पाठ 6 ‘क्रीडाम वयं श्लोकान्त्याक्षरीम्’ किस विषय पर आधारित है?

यह पाठ ‘अन्त्याक्षरी क्रीडा’ नामक खेल के माध्यम से विद्या (ज्ञान) की महिमा पर आधारित है। इसमें ज्ञानमाला एवं रत्नमाला नामक दो दल विद्या-विषयक दस सुभाषित-श्लोक गाते हैं।

‘अन्त्याक्षरी क्रीडा’ के क्या नियम हैं?

एक दल का सदस्य एक श्लोक गाता है; उस श्लोक के अन्तिम व्यञ्जन-वर्ण से दूसरे दल का सदस्य अगला श्लोक आरम्भ करता है, और इसी क्रम में क्रीडा आगे बढ़ती है।

इस पाठ में विद्या को सबसे श्रेष्ठ धन क्यों कहा गया है?

क्योंकि विद्या-रूपी धन न चोरी होता है, न राजा द्वारा छीना जाता है, न भाइयों में बँटता है और न भारस्वरूप होता है; साधारण धन खर्च से घटता है, किन्तु विद्या देने (बाँटने) से बढ़ती है। इसीलिए विद्याधन सर्वधनप्रधान कहा गया है।

अतिरिक्त प्रश्न, MCQ और अभिकथन-कारण ClearStudy के अभ्यास हैं। मूल पुस्तक भी साथ में पढ़ें।

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