Class 7 Sanskrit Deepakam Chapter 8 Solutions — हितं मनोहारि च दुर्लभं वचः

Class 7 Sanskrit Deepakam Chapter 8 solutions: दस सूक्तियों के हिन्दी अर्थ, आठ अभ्यासों के उत्तर, प्रश्ननिर्माण, विभक्ति और अनुस्वार/म् के नियम उदाहरणों सहित पढ़ें।

Class: 7 Subject: Sanskrit Book: Deepakam (दीपकम्) Chapter: 8 पाठ: हितं मनोहारि च दुर्लभं वचः प्रति का पुनर्मुद्रण: 2026–27

पाठ का अवलोकन (Chapter Overview)

दीपकम् कक्षा 7 का अष्टम पाठ ‘हितं मनोहारि च दुर्लभं वचः’ दस प्रेरणादायी सूक्तियों (सुभाषितों) का सुन्दर संकलन है, जिन्हें अथर्ववेद, कुमारसम्भवम्, पञ्चतन्त्रम्, उत्तररामचरितम्, नीतिशतकम् एवं किरातार्जुनीयम् जैसे विविध संस्कृत-ग्रन्थों से चुना गया है। पाठ का आरम्भ आचार्य एवं छात्रों के एक रोचक संवाद से होता है, जिसमें ‘सूक्ति’ का अर्थ — ‘सुन्दर वचन’ (सु + उक्ति) — समझाया गया है। प्रत्येक सूक्ति में कोई न कोई जीवनमूल्य निहित है – पृथ्वी के प्रति मातृभाव, गुणों का महत्त्व, स्वस्थ शरीर, समय एवं धन का सदुपयोग, परिश्रम, स्वाभिमान, क्रियाशीलता, सदाचार तथा हितकारी एवं मधुर वाणी। अन्तिम सूक्ति ‘हितं मनोहारि च दुर्लभं वचः’ ही पाठ का शीर्षक है, जो बताती है कि जो वचन हितकारी भी हो और मनोहर (मधुर) भी – ऐसी वाणी दुर्लभ होती है।

पाठ-परिचय / प्रसंग

पाठ का आरम्भ एक संवाद से होता है। एक छात्र आचार्य को बताता है कि उसकी माता ने उसे एक सूक्ति पढ़ाई – ‘सत्यं वद, धर्मं चर’। आचार्य समझाते हैं कि ‘सूक्ति’ का अर्थ है — सुन्दर वचन, और सूक्तियों में जीवनमूल्य निहित होते हैं। संस्कृत-साहित्य सूक्तियों का भण्डार (भाण्डागारः) है; ये हमें सन्मार्ग की ओर ले जाती हैं तथा जीवन में मार्गदर्शन करती हैं। छात्र कहते हैं कि वे इन सूक्तियों को केवल पढ़ते ही नहीं, अपितु स्मरण भी करते हैं और जीवन में आचरण भी करते हैं। इसी प्रसंग से पाठ की दस सूक्तियाँ प्रस्तुत की गई हैं।

मूल सूक्तयः (अन्वय एवं भावार्थ सहित)

(पुस्तक की दस सूक्तियाँ, प्रत्येक के साथ पदच्छेदः, अन्वयः एवं भावार्थः।)

१. माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः ।।१।।
— पाठ की सूक्ति

पदच्छेदः – माता भूमिः पुत्रः अहम् पृथिव्याः ।

अन्वयः – भूमिः माता (अस्ति), अहं पृथिव्याः पुत्रः (अस्मि) ।

भावार्थः – पृथ्वी हमारा माता के समान लालन-पालन करती है, अतः भूमि हम सबकी माता है। हम सब इस पृथ्वी की सन्तान हैं। यह सदा पूज्य है।

२. न रत्नमन्विष्यति, मृग्यते हि तत् ।।२।।
— पाठ की सूक्ति

पदच्छेदः – न रत्नम् अन्विष्यति मृग्यते हि तत् ।

अन्वयः – रत्नं न अन्विष्यति, तत् हि मृग्यते ।

भावार्थः – हीरे आदि रत्न स्वयं ग्राहक को नहीं खोजते, अपितु ग्राहक ही रत्नों को खोजते हैं। इसी प्रकार यदि हममें गुण हों, तो गुण के जानकार स्वयं ही हमें ढूँढ़ते हुए आते हैं।

३. शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम् ।।३।।
— पाठ की सूक्ति

पदच्छेदः – शरीरम् आद्यम् खलु धर्मसाधनम् ।

अन्वयः – शरीरं खलु आद्यं धर्मसाधनम् ।

भावार्थः – अपने कर्तव्यों के पालन के लिए शरीर की देखभाल महत्त्वपूर्ण है। अतः हमें सदा अपने शरीर की रक्षा करनी चाहिए, क्योंकि शरीर ही धर्म-पालन का प्रथम साधन है।

४. क्षणशः कणशश्‍चैव विद्यामर्थं च साधयेत् ।।४।।
— पाठ की सूक्ति

पदच्छेदः – क्षणशः कणशः च एव विद्याम् अर्थम् च साधयेत् ।

अन्वयः – क्षणशः (एव) विद्यां, कणशः एव अर्थं च साधयेत् ।

भावार्थः – ज्ञान पाने के लिए समय का निरन्तर उपयोग करना चाहिए, एक क्षण भी व्यर्थ न गँवाएँ। इसी प्रकार जो धन-संग्रह करना चाहे, वह कण-कण (एक-एक रुपये) का निरन्तर संग्रह करे। ‘क्षणत्यागे कुतो विद्या, कणत्यागे कुतो धनम्।’

५. सुखार्थिनः कुतो विद्या, कुतो विद्यार्थिनः सुखम् ।।५।।
— पाठ की सूक्ति

पदच्छेदः – सुखार्थिनः कुतः विद्या कुतः विद्यार्थिनः सुखम् ।

अन्वयः – सुखार्थिनः विद्या कुतः (भवेत्), विद्यार्थिनः सुखं कुतः (भवेत्) ।

भावार्थः – जो सदा सुख ही चाहता है, परिश्रम नहीं करता, आलसी है, वह विद्या कैसे प्राप्त कर सकता है? अतः जो ज्ञान पाना चाहे, वह आलस्य और केवल आराम की चाह छोड़कर निरन्तर विद्या-अर्जन करे।

६. गुणाः पूजास्थानं गुणिषु न च लिङ्गं न च वयः ।।६।।
— पाठ की सूक्ति

पदच्छेदः – गुणाः पूजास्थानं गुणिषु न च लिङ्गम् न च वयः ।

अन्वयः – गुणिषु गुणाः (एव) पूजास्थानं (भवन्ति), लिङ्गं च न (भवति), वयः च न (भवति) ।

भावार्थः – गुणों का सदा आदर होता है। गुणवान् व्यक्ति पुरुष हो या स्त्री, बालक हो या वृद्ध, वह सदा पूजनीय ही होता है। आदर के लिए लिङ्ग (पुरुष/स्त्री) या आयु महत्त्वपूर्ण नहीं है।

७. मा ब्रूहि दीनं वचः ।।७।।
— पाठ की सूक्ति

पदच्छेदः – मा ब्रूहि दीनम् वचः ।

अन्वयः – (त्वं) दीनं वचः मा ब्रूहि ।

भावार्थः – समाज में अनेक प्रकार के लोग होते हैं। कुछ सहायता करते हैं, तो कुछ केवल आत्म-प्रशंसा (विकत्थन) करते हैं। अतः स्वाभिमानी व्यक्ति को किसी के भी सामने अपमानजनक आत्महीन वाणी से बचना चाहिए। आवश्यकता पड़ने पर सम्मानपूर्वक सहायता माँगना स्वाभिमान के विरुद्ध नहीं है।

८. यस्तु क्रियावान् पुरुषः स विद्वान् ।।८।।
— पाठ की सूक्ति

पदच्छेदः – यः तु क्रियावान् पुरुषः सः विद्वान् ।

अन्वयः – यः तु क्रियावान् पुरुषः सः विद्वान् (भवति) ।

भावार्थः – अर्जित ज्ञान का जीवन में आचरण एवं व्यवहार में प्रयोग करने से ही मनुष्य वास्तविक विद्वान् बनता है, केवल पढ़ने मात्र से नहीं। अनुकूल कर्म के बिना विद्या व्यर्थ है। ‘ज्ञानं भारः क्रियां विना।’

९. शीलं परं भूषणम् ।।९।।
— पाठ की सूक्ति

पदच्छेदः – शीलम् परम् भूषणम् ।

अन्वयः – शीलं परं भूषणम् (अस्ति) ।

भावार्थः – मनुष्य का आचरण (शील) ही उसका सर्वश्रेष्ठ आभूषण है। सदाचार के बिना अन्य सभी गुण निरर्थक हो जाते हैं।

१०. हितं मनोहारि च दुर्लभं वचः ।।१०।।
— पाठ की सूक्ति

पदच्छेदः – हितम् मनोहारि च दुर्लभम् वचः ।

अन्वयः – हितं मनोहारि च वचः दुर्लभं (भवति) ।

भावार्थः – कुछ लोग हितकारी वचन तो बोलते हैं, पर कठोरता से बोलते हैं। कुछ मनोरंजक (मधुर) वचन बोलते हैं, पर वे हितकारी नहीं होते। ऐसा वचन दुर्लभ होता है जो हितकारी भी हो और मनोहर (मधुर) भी।

सार (Hindi Summary)

‘हितं मनोहारि च दुर्लभं वचः’ पाठ संस्कृत-साहित्य की दस अनमोल सूक्तियों का संकलन है। पाठ का आरम्भ आचार्य एवं छात्रों के संवाद से होता है, जिसमें ‘सूक्ति’ (सु + उक्ति = सुन्दर वचन) का अर्थ समझाया गया है। आचार्य बताते हैं कि सूक्तियों में जीवनमूल्य निहित रहते हैं और संस्कृत-साहित्य सूक्तियों का भण्डार है; ये हमें सन्मार्ग की ओर ले जाती हैं। छात्र इन्हें पढ़ते, स्मरण करते एवं जीवन में आचरण भी करते हैं।

दस सूक्तियाँ अथर्ववेद, कुमारसम्भवम्, पञ्चतन्त्रम्, उत्तररामचरितम्, नीतिशतकम् एवं किरातार्जुनीयम् जैसे विविध ग्रन्थों से ली गई हैं। पहली सूक्ति पृथ्वी को माता मानने का भाव देती है; दूसरी बताती है कि गुणवान् को संसार स्वयं खोज लेता है, जैसे ग्राहक रत्न को खोजते हैं; तीसरी में स्वस्थ शरीर को धर्म का प्रथम साधन कहा गया है; चौथी में क्षण-क्षण विद्या एवं कण-कण धन अर्जित करने का उपदेश है; पाँचवीं में आलसी सुखार्थी के लिए विद्या असम्भव बताई गई है।

छठी सूक्ति गुणों के आदर पर बल देती है – आयु एवं लिङ्ग नहीं, गुण ही पूजनीय हैं। सातवीं स्वाभिमान सिखाती है – दीन वचन मत बोलो। आठवीं बताती है कि क्रियाशील (आचरणशील) पुरुष ही सच्चा विद्वान् है। नौवीं में शील (सदाचार) को सर्वश्रेष्ठ आभूषण कहा गया है। अन्तिम सूक्ति, जो पाठ का शीर्षक है, सिखाती है कि जो वचन हितकारी भी हो और मधुर भी – वैसी वाणी दुर्लभ होती है। इस प्रकार यह पाठ सत्य, परिश्रम, गुण, सदाचार, स्वाभिमान एवं मधुर-हितकारी वाणी जैसे जीवनमूल्यों की प्रेरणा देता है।

कक्षा में शिक्षक दो विद्यार्थियों को खुले अभ्यास-पुस्तक से स्नेहपूर्वक समझाते हैं, हितकारी और मधुर वाणी का दृश्य
मौलिक कल्पनात्मक कक्षा-दृश्य: हितकारी बात को विनम्र और स्पष्ट ढंग से समझाना।

शब्दार्थ (Word-meanings)

शब्दः (Sanskrit)संस्कृत अर्थःहिन्दी अर्थEnglish meaning
चरआचरणं कुरुआचरण करो(May you) follow
इत्युक्तेइति कथनेअर्थात्It means
कुतूहलम्कौतुकम्उत्सुकताCuriosity
भाण्डागारःकोषःभण्डारTreasure-trove
अन्विष्यतिअन्वेषणं करोतिढूँढ़ता हैSearches
मृग्यतेअन्विष्यतेढूँढ़ा जाता हैIs searched for
आद्यम्प्रथमम्पहलाFirst
धर्मसाधनम्येन धर्मसिद्धिः भवतिधर्म-सिद्धि का साधनInstrument for performing Dharma
क्षणशःक्षणे क्षणेप्रत्येक पल मेंEvery moment
कणशःकणे कणेप्रत्येक कण मेंIn every particle
अर्थम्वित्तम्धन कोWealth
साधयेत्सम्पादयेत्अर्जन करना चाहिएShould accomplish
पणस्यनाणकस्यरुपये काOf a coin/rupee
सुखार्थिनःसुखम् इच्छतःसुख चाहने वाले काOf the seeker of comfort
पूजास्थानम्श्रद्धायोग्यम्वन्दनीयWorthy of worship
वयःअवस्थाआयुAge
मानमतDo not
ब्रूहिवदबोलोMay you tell
दीनम्दैन्यम्दयनीयHelpless / pitiable
विकत्थनम्गर्ववाणीमिथ्या आत्म-प्रशंसाBoasting
क्रियावान्क्रियाशीलःसक्रियAction-oriented
शीलम्आचरणम्चरित्रCharacter / conduct
मनोहारिमनोरञ्जकम्मन को हरने वाला, मधुरCharming / pleasing
दुर्लभम्दुष्प्राप्यम्कठिनाई से प्राप्त होने वालाRare / hard to find

प्रश्न 4 में पुस्तक के रेखांकित पद का ही प्रश्न बनाएँ: मनुष्यः → कः; लिङ्गम् → किम्; वचः → किम्। “मा ब्रूहि दीनं वचः” स्वाभिमान का संदेश है, सहायता माँगने पर रोक नहीं। सूक्ति 5 परिश्रम और आलस्य-त्याग की प्रेरणा है; पर्याप्त विश्राम और प्रसन्नता भी विद्यार्थी-जीवन में आवश्यक हैं। पुस्तक स्रोत-ग्रन्थों का सामूहिक परिचय देती है; यहाँ बिना निश्चित श्लोक-सन्दर्भ के किसी सूक्ति का लेखक घोषित नहीं किया गया है।

अभ्यासः (वयम् अभ्यासं कुर्मः)

1. अधोलिखितानि वाक्यानि पठित्वा ‘आम्’ अथवा ‘न’ इति वदन्तु लिखन्तु च —

(क) किं वयं पृथिव्याः पुत्राः पुत्र्यः च स्मः ?

उत्तरआम् । वयं पृथिव्याः पुत्राः पुत्र्यः च स्मः ।

(ख) किं रत्नम् अन्विष्यति ?

उत्तरन । रत्नं न अन्विष्यति, अपितु तत् मृग्यते ।

(ग) किं शीलं श्रेष्ठम् आभूषणम् अस्ति ?

उत्तरआम् । शीलं श्रेष्ठम् आभूषणम् अस्ति ।

(घ) किं शरीरम् आद्यं धर्मसाधनम् ?

उत्तरआम् । शरीरम् आद्यं धर्मसाधनम् (अस्ति) ।

(ङ) किं गुणानां सर्वदा एव आदरः भवति ?

उत्तरआम् । गुणानां सर्वदा एव आदरः भवति ।

(च) किं क्रियाशीलः एव विद्वान् भवति ?

उत्तरआम् । क्रियाशीलः एव (वास्तविकः) विद्वान् भवति ।

(छ) किम् अस्माभिः केवलं मनोरञ्जकानि वाक्यानि वक्तव्यानि ?

उत्तरन । अस्माभिः हितकारकाणि मनोहारीणि च वाक्यानि वक्तव्यानि, न केवलं मनोरञ्जकानि ।

(ज) यः सदा सुखम् इच्छति, किं सः विद्यां प्राप्नोति ?

उत्तरन । यः सदा सुखम् इच्छति, सः विद्यां न प्राप्नोति ।

2. पाठस्य आधारेण अधोलिखितानां प्रश्नानाम् उत्तराणि एकपदेन लिखन्तु —

(क) आद्यं धर्मसाधनं किम् ?

उत्तरशरीरम् ।

(ख) कीदृशं वचः मा ब्रूहि ?

उत्तरदीनम् ।

(ग) श्रेष्ठम् आभूषणं किम् अस्ति ?

उत्तरशीलम् ।

(घ) सर्वेषां मनुष्याणां माता का अस्ति ?

उत्तरभूमिः (पृथिवी) ।

(ङ) रत्नानाम् अन्वेषणं के कुर्वन्ति ?

उत्तरग्राहकाः ।

3. पाठस्य आधारेण अधोलिखितानां प्रश्नानाम् उत्तराणि पूर्णवाक्येन लिखन्तु —

(क) कः विद्वान् अस्ति ?

उत्तरयः क्रियावान् (क्रियाशीलः) पुरुषः अस्ति, सः एव (वास्तविकः) विद्वान् अस्ति ।

(ख) गुणिषु पूजास्थानं किम् ?

उत्तरगुणिषु गुणाः एव पूजास्थानं (भवन्ति), न तु लिङ्गं न च वयः ।

(ग) कः विद्यां न प्राप्नोति ?

उत्तरयः सदा सुखम् एव इच्छति, परिश्रमं न करोति, सः विद्यां न प्राप्नोति ।

(घ) मनुष्यः विद्याम् अर्थं च कथं साधयेत् ?

उत्तरमनुष्यः क्षणशः (क्षणे क्षणे) विद्यां, कणशः (कणे कणे) च अर्थं साधयेत् ।

(ङ) कीदृशं वचनं दुर्लभम् ?

उत्तरयत् वचनं हितकारकम् अपि स्यात्, मनोहारि (मधुरम्) अपि स्यात्, तादृशं वचनं दुर्लभं भवति ।

4. रेखाङ्कितपदानि आधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुर्वन्तु —

(रेखांकित पद के आधार पर उपयुक्त प्रश्नवाचक पद लगाकर प्रश्न बनाइए। यहाँ रेखांकित पद मोटे अक्षरों में दिखाया गया है।)

वाक्यम्प्रश्ननिर्माणम् (उत्तर)
(क) शीलं परं भूषणम् ।शीलं परं किम् ?
(ख) मनुष्यः पृथिव्याः सन्तानः अस्ति ।कः पृथिव्याः सन्तानः अस्ति ?
(ग) गुणिषु लिङ्गं वयः च न महत्त्वपूर्णम् ।गुणिषु किं वयः च न महत्त्वपूर्णम् ?
(घ) हितकारकं मनोहारि च वचः दुर्लभं भवति ।हितकारकं मनोहारि च किं दुर्लभं भवति ?

5. पाठस्य आधारेण उदाहरणानुसारं समुचितं मेलनं कुर्वन्तु —

(स्तंभ ‘क’ के पद एवं स्तंभ ‘ख’ के विकल्प नीचे दिए गए हैं; भाव के अनुसार मिलान कीजिए।)

स्तंभ ‘क’स्तंभ ‘ख’ (दत्त-विकल्पाः)
(क) क्षणशः कणशः साधयेत्शरीरम्
(ख) सर्वश्रेष्ठम् आभूषणम्गुणाः
(ग) रत्नं न अन्विष्यति, तत्दुर्लभम्
(घ) आद्यं धर्मसाधनम्शीलम्
(ङ) हितकारकं मनोहारि च वचःविद्याम् अर्थं च
(च) पूजास्थानम्मृग्यते
सही मेलन (उत्तर) (क) क्षणशः कणशः साधयेत् → विद्याम् अर्थं च (ख) सर्वश्रेष्ठम् आभूषणम् → शीलम् (ग) रत्नं न अन्विष्यति, तत् → मृग्यते (घ) आद्यं धर्मसाधनम् → शरीरम् (ङ) हितकारकं मनोहारि च वचः → दुर्लभम् (च) पूजास्थानम् → गुणाः

6. पाठात् अधोलिखितानां पदानां समानार्थकपदानि चित्वा लिखन्तु —

दत्त-पदम्समानार्थकपदम् (पाठात्) – उत्तर
(क) सुतःपुत्रः
(ख) प्रथमम्आद्यम्
(ग) धनम्अर्थम्
(घ) अवस्थावयः
(ङ) वचनम्वचः
(च) आचरणम्शीलम्

7. उदाहरणानुसारम् अधोलिखितेषु वाक्येषु रेखाङ्कितपदानां विभक्तिं निर्दिशन्तु —

यथा – माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः । → षष्ठी विभक्तिः।

वाक्यम् (रेखाङ्कित पद मोटे अक्षरों में)विभक्तिः (उत्तर)
(क) माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः ।षष्ठी विभक्तिः
(ख) गुणाः पूजास्थानं गुणिषु न च लिङ्गं न च वयः ।सप्तमी विभक्तिः
(ग) शीलं परं भूषणम् ।प्रथमा विभक्तिः
(घ) क्षणशः कणशश्चैव विद्याम् अर्थं च साधयेत् ।द्वितीया विभक्तिः
(ङ) सुखार्थिनः कुतो विद्या कुतो विद्यार्थिनः सुखम् ।षष्ठी विभक्तिः
(च) हितं मनोहारि च दुर्लभं वचः ।प्रथमा विभक्तिः

8. यत्र अग्रे स्वरः अस्ति तत्र अनुस्वारस्य स्थाने ‘म्’ लिखित्वा वाक्यानि पुनः लिखन्तु —

यथा – न रत्नं अन्विष्यति । → न रत्नम् अन्विष्यति ।

उत्तर (क) न रत्नं अन्विष्यति । → न रत्नम् अन्विष्यति । (ख) शरीरं आद्यं खलु धर्मसाधनम् । → शरीरम् आद्यं खलु धर्मसाधनम् । (केवल ‘शरीरं’ के आगे स्वर ‘आ’ है) (ग) वयं अद्यतनं पाठं पठामः । → वयम् अद्यतनं पाठं पठामः । (घ) त्वं अस्माकं गृहं आगच्छ । → त्वम् अस्माकं गृहम् आगच्छ । (ङ) अहं एकं प्रश्नं प्रष्टुं इच्छामि । → अहम् एकं प्रश्नं प्रष्टुम् इच्छामि । (च) गुणं अर्जयितुं अधिकं प्रयत्नं करोतु । → गुणम् अर्जयितुम् अधिकं प्रयत्नं करोतु ।

योग्यताविस्तरः (व्याकरण एवं ग्रन्थ-परिचय)

1. मकारलेखनम् (अनुस्वार एवं ‘म्’ का नियम)

जब ‘म’कार (म्) के बाद कोई व्यञ्जनवर्ण आता है, तब ‘म्’ के स्थान पर अनुस्वार ( ं ) लिखना चाहिए। किन्तु जब ‘म’कार (म्) के बाद कोई स्वरवर्ण आता है, तब ‘म्’ ही लिखा जाता है।
यथा – पुस्तकम् पठति = पुस्तकं पठति (आगे व्यञ्जन ‘प’)।
पुस्तकम् अपठत् = पुस्तकम् अपठत् (आगे स्वर ‘अ’, अतः ‘म्’ ही रहेगा)।

2. सूक्तिः (शब्द-निर्माण)

सूक्तिः = सु + उक्तिः (शोभना + उक्तिः = सूक्तिः), अर्थात् ‘सुन्दर वचन’। इन सूक्तियों में जीवनमूल्य निहित रहते हैं। ये सूक्तियाँ हमें जीवन में उन्नति की ओर प्रेरित करती हैं। संस्कृत-साहित्य इन्हीं सूक्तियों से परिपूर्ण है।

3. सूक्ति-स्रोत ग्रन्थों का संक्षिप्त परिचय

ग्रन्थःपरिचयः (संक्षिप्तः)
अथर्ववेदःचार वेदों में से एक; इसमें विविध स्तुतियाँ, अर्थशास्त्र, चिकित्साशास्त्र, तन्त्रविद्या, विज्ञान एवं दर्शन वर्णित हैं।
कुमारसम्भवम्महाकवि कालिदास की रचना; इसमें शिव-पार्वती के विवाह एवं कार्तिकेय (कुमार) के जन्म की कथा है।
पञ्चतन्त्रम्नीतिग्रन्थ; लेखक विष्णुशर्मा; इसके पाँच प्रकरणों में पशु-पक्षियों की कथाओं द्वारा नैतिक शिक्षा दी गई है।
उत्तररामचरितम्संस्कृत नाटकों में सुप्रसिद्ध; रचयिता महाकवि भवभूति; इसमें श्रीराम के राज्याभिषेक के पश्चात् के जीवन का चरित वर्णित है।
नीतिशतकम्परम्परा में भर्तृहरि से सम्बद्ध; नीतिशास्त्र का प्रसिद्ध शतक-काव्य (तीन शतकों में से एक)।
किरातार्जुनीयम्महाकवि भारवि रचित विशिष्ट महाकाव्य; इसमें किरात-वेशधारी शिव एवं अर्जुन की कथा वर्णित है।

परियोजनाकार्यम् & कार्यकलापः

परियोजनाकार्यम् (Project Work)

1. अन्तर्जालस्य (Internet) साहाय्येन एतादृशीनां प्रेरणादायिकानां दशानां सूक्तीनां सङ्ग्रहणं कृत्वा भित्तिपत्रम् एकं रचयन्तु ।

मार्गदर्शनम्यह गतिविधि-कार्य है। इंटरनेट की सहायता से ऐसी दस प्रेरणादायी सूक्तियाँ (जैसे – ‘सत्यमेव जयते’, ‘विद्या ददाति विनयम्’, ‘श्रद्धावान् लभते ज्ञानम्’) एकत्र कीजिए और एक सुन्दर भित्तिपत्र (wall-chart) बनाइए।

2. स्वमातृभाषायां प्रसिद्धाः कतिचन सूक्तीः लिखन्तु ।

मार्गदर्शनम्अपनी मातृभाषा (हिन्दी आदि) की कुछ प्रसिद्ध सूक्तियाँ/कहावतें लिखिए, जैसे – ‘मन के हारे हार है, मन के जीते जीत’, ‘अब पछताए होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत’ आदि।

3. एताः सूक्तीः पठित्वा भवतां मनसि कः विचारः उत्पद्यते इति स्वभाषया लिखन्तु ।

मार्गदर्शनम्इन सूक्तियों को पढ़कर आपके मन में जो विचार उत्पन्न हों (जैसे – परिश्रम, सदाचार एवं मधुर वाणी का महत्त्व), उन्हें अपनी भाषा में लिखिए।

कार्यकलापः (Activity)

एताः सूक्तीः कण्ठस्थीकृत्य कक्षायां श्रावयन्तु ।

मार्गदर्शनम्पाठ की दसों सूक्तियों को कण्ठस्थ (याद) करके कक्षा में शुद्ध उच्चारण के साथ सुनाइए।

अतिरिक्त प्रश्न (Extra Questions)

अतिरिक्त लघु प्रश्न — ClearStudy अभ्यास

1. ‘सूक्ति’ शब्द का अर्थ एवं निर्माण बताइए।

उत्तर‘सूक्ति’ का अर्थ है — सुन्दर वचन। यह ‘सु’ (शोभन/सुन्दर) एवं ‘उक्ति’ (कथन) के संयोग से बना है – सु + उक्तिः = सूक्तिः। सूक्तियों में जीवनमूल्य निहित होते हैं जो हमें सन्मार्ग की ओर प्रेरित करते हैं।

2. पाठ की सूक्तियाँ किन-किन ग्रन्थों से ली गई हैं? (कोई चार नाम लिखिए)

उत्तरपाठ की सूक्तियाँ विविध ग्रन्थों से संगृहीत हैं, जैसे – अथर्ववेद, कुमारसम्भवम्, पञ्चतन्त्रम्, उत्तररामचरितम्, नीतिशतकम् एवं किरातार्जुनीयम्।

3. ‘न रत्नमन्विष्यति, मृग्यते हि तत्’ सूक्ति का भाव स्पष्ट कीजिए।

उत्तररत्न स्वयं ग्राहक को नहीं खोजता, अपितु ग्राहक ही रत्न को खोजते हैं। इसी प्रकार जिस व्यक्ति में गुण होते हैं, गुणों के पारखी स्वयं उसे ढूँढ़ते हुए आते हैं। अतः हमें गुण-अर्जन पर ध्यान देना चाहिए।

4. ‘शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्’ का तात्पर्य लिखिए।

उत्तरशरीर ही धर्म (कर्तव्य) पालन का प्रथम साधन है। स्वस्थ शरीर रहने पर ही हम अपने कर्तव्यों का पालन कर सकते हैं, अतः हमें सदा अपने शरीर की रक्षा एवं देखभाल करनी चाहिए।

5. क्रियाशील व्यक्ति को सच्चा विद्वान् क्यों कहा गया है?

उत्तरकेवल पढ़ लेने से कोई वास्तविक विद्वान् नहीं बनता। जब मनुष्य अर्जित ज्ञान का जीवन एवं व्यवहार में आचरण (प्रयोग) करता है, तभी वह सच्चा विद्वान् कहलाता है। क्रिया के बिना ज्ञान भार-स्वरूप एवं व्यर्थ है।

अतिरिक्त व्याख्यात्मक प्रश्न — ClearStudy अभ्यास

6. पाठ ‘हितं मनोहारि च दुर्लभं वचः’ का केन्द्रीय संदेश अपने शब्दों में लिखिए।

उत्तरइस पाठ का केन्द्रीय संदेश है – सूक्तियों में निहित जीवनमूल्यों को जीवन में अपनाना। दस सूक्तियों के माध्यम से पाठ सिखाता है कि पृथ्वी हमारी माता है, गुणवान् को संसार स्वयं खोज लेता है, स्वस्थ शरीर धर्म का प्रथम साधन है, समय एवं धन का कण-कण उपयोग करना चाहिए, और आलसी सुखार्थी को विद्या नहीं मिलती।साथ ही गुणों का आदर लिङ्ग एवं आयु से ऊपर है, स्वाभिमानी को दीन वचन नहीं बोलने चाहिए, क्रियाशील ही सच्चा विद्वान् है, और शील (सदाचार) सर्वश्रेष्ठ आभूषण है। अन्तिम एवं शीर्षक-सूक्ति बताती है कि जो वचन हितकारी भी हो और मधुर भी – वैसी वाणी दुर्लभ होती है। इस प्रकार पाठ सत्य, परिश्रम, सदाचार एवं मधुर-हितकारी वाणी की प्रेरणा देता है।

7. पाठ के आरम्भिक संवाद का सार लिखिए तथा बताइए कि छात्र सूक्तियों के साथ क्या-क्या करते हैं।

उत्तरपाठ का आरम्भ आचार्य एवं छात्रों के संवाद से होता है। एक छात्र बताता है कि उसकी माता ने उसे एक सूक्ति – ‘सत्यं वद, धर्मं चर’ – पढ़ाई। एक अन्य छात्र पूछता है कि ‘सूक्ति’ का क्या अर्थ है। आचार्य समझाते हैं कि सूक्ति का अर्थ है ‘सुन्दर वचन’, और सूक्तियों में जीवनमूल्य निहित रहते हैं।आचार्य आगे बताते हैं कि सूक्तियाँ हमें सन्मार्ग की ओर ले जाती हैं एवं जीवन में मार्गदर्शन करती हैं; संस्कृत-साहित्य तो सूक्तियों का भण्डार (भाण्डागार) है। इस पर छात्रों में कुतूहल (उत्सुकता) बढ़ता है और वे कहते हैं कि वे इन सूक्तियों को केवल पढ़ते ही नहीं, अपितु स्मरण भी करते हैं और जीवन में आचरण भी करते हैं। यही संवाद पाठ की दस सूक्तियों की भूमिका तैयार करता है।

8. ‘मकारलेखनम्’ का नियम उदाहरण सहित समझाइए।

उत्तरमकारलेखनम् का नियम बताता है कि ‘म’कार (म्) के बाद यदि कोई व्यञ्जन-वर्ण आता है, तो ‘म्’ के स्थान पर अनुस्वार ( ं ) लिखा जाता है। किन्तु यदि ‘म’कार के बाद कोई स्वर-वर्ण आता है, तो ‘म्’ ही लिखा जाता है, अनुस्वार नहीं।उदाहरण – ‘पुस्तकम् पठति’ में ‘पठति’ का आरम्भ व्यञ्जन ‘प’ से होता है, अतः यह ‘पुस्तकं पठति’ बनेगा। किन्तु ‘पुस्तकम् अपठत्’ में आगे स्वर ‘अ’ है, अतः यहाँ ‘म्’ ही रहेगा – ‘पुस्तकम् अपठत्’। इसी नियम के अनुसार ‘न रत्नं अन्विष्यति’ को ‘न रत्नम् अन्विष्यति’ लिखा जाता है, क्योंकि आगे स्वर ‘अ’ है।

MCQ & अभिकथन-कारण

1. इस पाठ का शीर्षक किस सूक्ति पर आधारित है?

(क) शीलं परं भूषणम्

(ख) हितं मनोहारि च दुर्लभं वचः

(ग) माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः

(घ) यस्तु क्रियावान् पुरुषः स विद्वान्

उत्तर(ख) हितं मनोहारि च दुर्लभं वचः।

2. ‘सूक्ति’ शब्द किन दो शब्दों से बना है?

(क) सु + कृति

(ख) सु + उक्तिः

(ग) सत् + उक्तिः

(घ) सुख + उक्तिः

उत्तर(ख) सु + उक्तिः (शोभना उक्तिः = सूक्तिः)।

3. ‘आद्यं धर्मसाधनम्’ किसे कहा गया है?

(क) धनम्

(ख) शीलम्

(ग) शरीरम्

(घ) विद्याम्

उत्तर(ग) शरीरम्।

4. ‘मृग्यते’ पद का अर्थ है—

(क) ढूँढ़ता है

(ख) ढूँढ़ा जाता है

(ग) पाया जाता है

(घ) त्यागा जाता है

उत्तर(ख) ढूँढ़ा जाता है (अन्विष्यते)।

5. गुणों के आदर के लिए क्या महत्त्वपूर्ण नहीं है?

(क) गुण

(ख) लिङ्ग एवं आयु

(ग) सदाचार

(घ) ज्ञान

उत्तर(ख) लिङ्ग एवं आयु।

6. सच्चा विद्वान् कौन है?

(क) जो केवल पढ़ता है

(ख) जो क्रियाशील (आचरणशील) है

(ग) जो धनवान् है

(घ) जो सुख चाहता है

उत्तर(ख) जो क्रियाशील (आचरणशील) है।

7. ‘शीलं परं भूषणम्’ का अर्थ है—

(क) धन सर्वश्रेष्ठ आभूषण है

(ख) सदाचार (शील) सर्वश्रेष्ठ आभूषण है

(ग) विद्या सर्वश्रेष्ठ आभूषण है

(घ) रूप सर्वश्रेष्ठ आभूषण है

उत्तर(ख) सदाचार (शील) सर्वश्रेष्ठ आभूषण है।

8. ‘हितं मनोहारि च दुर्लभं वचः’ सूक्ति किस ग्रन्थ से है?

(क) पञ्चतन्त्रम्

(ख) नीतिशतकम्

(ग) किरातार्जुनीयम्

(घ) कुमारसम्भवम्

उत्तर(ग) किरातार्जुनीयम् (महाकवि भारवि)।

9. ‘म’कार के बाद स्वर आने पर क्या लिखा जाता है?

(क) अनुस्वार ( ं )

(ख) ‘म्’ ही

(ग) विसर्ग (ः)

(घ) कुछ नहीं

उत्तर(ख) ‘म्’ ही (यथा – पुस्तकम् अपठत्)।

10. मनुष्य को विद्या एवं धन का अर्जन किस प्रकार करना चाहिए?

(क) एक ही बार में

(ख) क्षणशः (क्षण-क्षण) एवं कणशः (कण-कण)

(ग) केवल अवकाश में

(घ) दूसरों से माँगकर

उत्तर(ख) क्षणशः (क्षण-क्षण) एवं कणशः (कण-कण)।
उत्तर-कुंजी: 1-(ख), 2-(ख), 3-(ग), 4-(ख), 5-(ख), 6-(ख), 7-(ख), 8-(ग), 9-(ख), 10-(ख)

अभिकथन-कारण – नीचे अभिकथन (A) और कारण (R) दिए गए हैं। सही विकल्प चुनिए—
(क) A और R दोनों सही, R, A की सही व्याख्या है। (ख) A और R दोनों सही, पर R, A की सही व्याख्या नहीं। (ग) A सही, R गलत। (घ) A गलत, R सही।

1. अभिकथन (A): ‘सूक्ति’ का अर्थ है — सुन्दर वचन।

कारण (R): ‘सूक्ति’ शब्द ‘सु’ (शोभन) एवं ‘उक्ति’ (कथन) के संयोग से बना है।

उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है।

2. अभिकथन (A): स्वस्थ शरीर की रक्षा करनी चाहिए।

कारण (R): शरीर ही धर्म (कर्तव्य) पालन का प्रथम साधन है।

उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है।

3. अभिकथन (A): आलसी एवं सुखार्थी व्यक्ति विद्या प्राप्त कर लेता है।

कारण (R): विद्या-अर्जन के लिए आलस्य और केवल आराम की चाह छोड़कर निरन्तर परिश्रम आवश्यक है।

उत्तर(घ) A गलत है, R सही है – सुखार्थी एवं आलसी व्यक्ति विद्या नहीं प्राप्त कर सकता।

4. अभिकथन (A): गुणवान् व्यक्ति बालक हो या वृद्ध, स्त्री हो या पुरुष – सदा पूजनीय होता है।

कारण (R): आदर का आधार गुण हैं, लिङ्ग एवं आयु नहीं।

उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है।

5. अभिकथन (A): हितकारी एवं मधुर दोनों गुणों से युक्त वचन दुर्लभ होता है।

कारण (R): प्रायः हितकारी वचन कठोर होते हैं और मधुर वचन हितकारी नहीं होते।

उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है।

परीक्षा-सुझाव एवं सामान्य त्रुटियाँ

परीक्षा-सुझाव (Exam Tips)

  • दसों सूक्तियाँ कण्ठस्थ करें – प्रत्येक सूक्ति का अन्वय एवं भावार्थ अलग-अलग याद रखें।
  • पुस्तक में दिए ग्रन्थ-परिचय और सम्बन्धित लेखकों के नाम पढ़ें; किसी सूक्ति का सटीक स्रोत लिखते समय श्लोक-सन्दर्भ जाँचें।
  • शब्दार्थ (अन्विष्यति, मृग्यते, आद्यम्, क्षणशः, कणशः, शीलम्, मनोहारि, दुर्लभम्) हिन्दी एवं अंग्रेज़ी दोनों में याद रखें।
  • ‘मकारलेखनम्’ नियम स्पष्ट समझें – आगे व्यञ्जन हो तो अनुस्वार, स्वर हो तो ‘म्’।
  • ‘पूर्णवाक्येन’ एवं ‘एकपदेन’ उत्तर के निर्देश पर ध्यान दें – उसी रूप में उत्तर लिखें।

सामान्य त्रुटियाँ (Common Mistakes)

  • एकपदेन उत्तर वाले प्रश्नों में पूरा वाक्य लिख देना – केवल एक पद ही लिखें (यथा – शरीरम्, शीलम्)।
  • ‘मकारलेखनम्’ में स्वर के आगे अनुस्वार लगा देना – स्वर हो तो ‘म्’ ही रहेगा।
  • ‘मृग्यते’ (कर्मवाच्य – ढूँढ़ा जाता है) एवं ‘अन्विष्यति’ (कर्तृवाच्य – ढूँढ़ता है) में भ्रम।
  • सूक्तियों के स्रोत-ग्रन्थ गलत लिख देना – भावार्थ के साथ ग्रन्थ-नाम भी याद रखें।
  • मात्रा एवं विसर्ग की अशुद्धि – मनोहारि, दुर्लभम्, पृथिव्याः, सुखार्थिनः शुद्ध लिखें।

पाठ्यपुस्तक संदर्भ: NCERT दीपकम्, कक्षा 7, पाठ 8, पृष्ठ 85–95; उपलब्ध प्रति का पुनर्मुद्रण 2026–27। उत्तर और व्याख्याएँ ClearStudy की मौलिक शिक्षण सामग्री हैं; खुली गतिविधियों के उत्तर नमूने हैं। आधिकारिक NCERT पुस्तक पोर्टल।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

दीपकम् कक्षा 7 पाठ 8 ‘हितं मनोहारि च दुर्लभं वचः’ में क्या है?

यह पाठ संस्कृत-साहित्य की दस प्रेरणादायी सूक्तियों (सुभाषितों) का संकलन है, जो अथर्ववेद, कुमारसम्भवम्, पञ्चतन्त्रम्, उत्तररामचरितम्, नीतिशतकम् एवं किरातार्जुनीयम् से ली गई हैं। प्रत्येक सूक्ति में कोई न कोई जीवनमूल्य निहित है।

‘हितं मनोहारि च दुर्लभं वचः’ का अर्थ क्या है?

इसका अर्थ है – जो वचन हितकारी (भला करने वाला) भी हो और मनोहर (मधुर) भी – ऐसी वाणी दुर्लभ (कठिनाई से प्राप्त होने वाली) होती है। प्रायः हितकारी वचन कठोर होते हैं और मधुर वचन हितकारी नहीं होते।

‘सूक्ति’ शब्द का क्या अर्थ है?

‘सूक्ति’ का अर्थ है — सुन्दर वचन। यह ‘सु’ (शोभन/सुन्दर) एवं ‘उक्ति’ (कथन) के संयोग से बना है (सु + उक्तिः = सूक्तिः)। सूक्तियों में जीवनमूल्य निहित रहते हैं।

अतिरिक्त प्रश्न, MCQ और अभिकथन-कारण ClearStudy के अभ्यास हैं। मूल पुस्तक भी साथ में पढ़ें।

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