Class 8 Sanskrit Deepakam Appendix 1 — व्याकरणम्

Class 8 Sanskrit Deepakam Appendix 1 व्याकरणम्: उपसर्ग, क्त्वा–ल्यप्–तुमुन्–क्तवतु, 22 धातुओं के रूप, विभक्ति और सन्धि के हिन्दी उदाहरण व अभ्यास।

पुस्तक: NCERT दीपकम्, कक्षा ८ · भाग: परिशिष्टम् 1 · मुद्रित पृष्ठ: 159–165 · स्रोत: स्थानीय NCERT PDF, पुनर्मुद्रण 2026–27

दीपकम् में 13 मुख्य पाठ हैं। यह परिशिष्ट सहायक संदर्भ सामग्री है; नीचे दिए गए अभ्यास ClearStudy के मौलिक अभ्यास हैं, NCERT के मुद्रित प्रश्न नहीं।

उपसर्गः — धातु के पहले जुड़ने वाला अंश

उपसर्ग धातु या क्रिया के पहले जुड़कर अर्थ बदल सकता है या उसे विशेष अर्थ दे सकता है। गच्छति का अर्थ ‘जाता है’, जबकि आगच्छति का अर्थ ‘आता है’। हर उपसर्ग का हर धातु के साथ एक ही स्थिर अर्थ नहीं होता; पूरे शब्द और वाक्य को देखें।

पुस्तक में दिए 22 उपसर्ग: प्र, परा, अप, सम्, अनु, अव, निस्, निर्, दुस्, दुर्, वि, आङ्, नि, अधि, अपि, अति, सु, उत्, अभि, प्रति, परि, उप। आङ् का प्रयुक्त रूप ‘आ’ दिखाई देता है। निस्/निर् और दुस्/दुर् के रूप अगले वर्ण के अनुसार बदल सकते हैं।

उपसर्ग और क्रिया का सरल शब्द-निर्माण चित्र; पाठ्य रूप अलग-अलग पढ़े जा सकते हैं।

एक से अधिक उपसर्ग भी आ सकते हैं: प्रति + आ + गच्छति → प्रत्यागच्छति (‘वापस आता है’)। संधि के कारण जुड़ने पर रूप बदलता है। पुस्तक के विजयते और विरमति जैसे उदाहरण यह भी बताते हैं कि कुछ धातुओं में उपसर्ग के साथ पद-प्रयोग बदल सकता है; इसे सभी क्रियाओं का नियम न मानें।

प्रत्ययाः — क्त्वा, ल्यप्, तुमुन् और क्तवतु

धातु या शब्द के बाद जुड़ने वाला अंश प्रत्यय है। इस परिशिष्ट में मुख्य रूप से धातु से बनने वाले कृदन्त रूप समझाए गए हैं।

चार कृदन्त प्रत्ययों की तुलना
प्रत्ययप्रयोगरूपमौलिक उदाहरण
क्त्वाबिना उपसर्ग की धातु; पहली क्रिया पूरी करके दूसरी क्रियापठ् → पठित्वा; कृ → कृत्वाबालकः पुस्तकं पठित्वा लिखति।
ल्यप्उपसर्गयुक्त धातु; क्त्वा के स्थान परप्र + नम् → प्रणम्य; आ + नी → आनीयबालिका गुरुं प्रणम्य पठति।
तुमुन्किस काम के लिए / करने के लिएगम् → गन्तुम्; कृ → कर्तुम्सः पठितुं विद्यालयं गच्छति।
क्तवतुकर चुके व्यक्ति का रूप; लिङ्ग-वचन-विभक्ति के अनुसार बदलता हैकृतवान् / कृतवती / कृतवत्सा कार्यं कृतवती।
महत्त्वपूर्ण अन्तर: क्त्वा और ल्यप् के प्रयोग में पहली और दूसरी क्रिया का कर्ता सामान्यतः एक ही होता है। रामः स्नात्वा पठति में राम नहाता भी है और पढ़ता भी है। क्त्वा, ल्यप् और तुमुन् से बने रूप अव्यय हैं। क्तवतु का रूप विशेषण की तरह बदलता है: सः हसितवान्, सा हसितवती, तत् हसितवत्। ‘हसितवान्’ क्तवतु-प्रत्यय का रूप है; स्वयं लङ्-लकार का क्रियापद नहीं।

22 धातुओं के रूप — तुलनात्मक सारणी

पृष्ठ 161–162 की धातुओं का क्रम रखा गया है। ल्यप् वाले स्तम्भ में उपसर्ग सहित उदाहरण है; क्तवतु के स्तम्भ में पुल्लिङ्ग, प्रथमा, एकवचन दिया है। मोबाइल पर बड़ी सारणी को दाएँ-बाएँ सरकाएँ।

धातु, वर्तमान क्रिया और कृदन्त रूप
धातुःलट्, प्रथमपुरुष एकवचनक्त्वाल्यप्, उपसर्ग सहिततुमुन्क्तवतु
पठ्पठतिपठित्वाप्रपठ्यपठितुम्पठितवान्
खाद्खादतिखादित्वाप्रखाद्यखादितुम्खादितवान्
हस्हसतिहसित्वाविहस्यहसितुम्हसितवान्
लिख्लिखतिलिखित्वाविलिख्यलेखितुम्लिखितवान्
पापिबतिपीत्वानिपीयपातुम्पीतवान्
गम्गच्छतिगत्वाआगत्यगन्तुम्गतवान्
त्यज्त्यजतित्यक्त्वापरित्यज्यत्यक्तुम्त्यक्तवान्
नीनयतिनीत्वाआनीयनेतुम्नीतवान्
कृकरोतिकृत्वाअनुकृत्यकर्तुम्कृतवान्
घ्राजिघ्रतिघ्रात्वाआघ्रायघ्रातुम्घ्रातवान्
स्थातिष्ठतिस्थित्वाप्रस्थायस्थातुम्स्थितवान्
नम्नमतिनत्वाप्रणम्यनन्तुम्नतवान्
स्मृस्मरतिस्मृत्वासंस्मृत्यस्मर्तुम्स्मृतवान्
लुण्ठ्लुण्ठतिलुण्ठित्वाविलुण्ठ्यलुण्ठितुम्लुण्ठितवान्
ज्ञाजानातिज्ञात्वाविज्ञायज्ञातुम्ज्ञातवान्
क्षाल्क्षालयतिक्षालयित्वाप्रक्षाल्यक्षालयितुम्क्षालितवान्
दाददातिदत्त्वाप्रदायदातुम्दत्तवान्
दृश्पश्यतिदृष्ट्वाप्रदृश्यद्रष्टुम्दृष्टवान्
प्रच्छ्पृच्छतिपृष्ट्वाप्रपृच्छ्यप्रष्टुम्पृष्टवान्
ग्रह्गृह्णातिगृहीत्वासङ्गृह्यग्रहीतुम्गृहीतवान्
वद्वदतिउदित्वाप्रोद्यवदितुम्उदितवान्
क्रीड्क्रीडतिक्रीडित्वाप्रक्रीड्यक्रीडितुम्क्रीडितवान्
स्रोत की एक मुद्रणगत असंगति: पृष्ठ 161 में पठ् की पंक्ति के ल्यप् स्तम्भ में ‘सम्पूज्य’ छपा है। यह सम् + पूज् से बना रूप है, पठ् से नहीं। ऊपर उस खाने में पठ् का उपसर्गयुक्त उदाहरण ‘प्रपठ्य’ दिया गया है। ‘सम्पूज्य’ अपने सही मूल के साथ वैध है।

विभक्तिः — कारक, सम्बन्ध और सम्बोधन

वाक्य में संज्ञा या सर्वनाम का क्रिया तथा दूसरे शब्दों से सम्बन्ध उसके विभक्ति-रूप से समझा जाता है। केवल हिन्दी अनुवाद का एक शब्द देखकर विभक्ति तय न करें।

विभक्तियों का प्रयोग
विभक्ति / प्रयोगसम्बन्धमौलिक/पुस्तकाधारित उदाहरणसरल अर्थ
प्रथमाकर्ता — कौन?रामः गच्छति।राम जाता है।
द्वितीयाकर्म — किसे / क्या?रामः वनं गच्छति।राम वन जाता है।
तृतीयाकरण — किस साधन से?रामः पुष्पकविमानेन गच्छति।राम पुष्पक विमान से जाता है।
चतुर्थीसम्प्रदान — किसे दिया जाता है?गुरुः शिष्याय ज्ञानं ददाति।गुरु शिष्य को ज्ञान देते हैं।
पञ्चमीअपादान — कहाँ से अलग होना?वृक्षात् पत्रं पतति।पेड़ से पत्ता गिरता है।
षष्ठीसम्बन्ध — किसका?रामस्य राजधानी अयोध्या।राम की राजधानी अयोध्या है।
सप्तमीअधिकरण — कहाँ / किसमें?छात्राः विद्यालये पठन्ति।विद्यार्थी विद्यालय में पढ़ते हैं।
सम्बोधनकिसी को पुकारनाहे राम! हे सीते!हे राम! हे सीता!

छः कारक: कर्तृ, कर्म, करण, सम्प्रदान, अपादान और अधिकरण। षष्ठी सामान्यतः दो शब्दों का सम्बन्ध बताती है, इसलिए इन छः कारकों में नहीं गिनी जाती। सम्बोधन पुकारने का प्रयोग है; उसे आठवाँ कारक न कहें।

उपपदविभक्ति — साथ आए शब्द से विभक्ति

कुछ शब्द अपने साथ प्रयुक्त संज्ञा की विभक्ति निर्धारित करते हैं। नीचे इस पुस्तक में दिए सरल प्रयोग हैं। जैसे सह के साथ पुत्रेण तृतीया है, जबकि नमः के साथ गुरवे चतुर्थी है।

उपपदों के साथ विभक्ति
उपपदविभक्तिउदाहरण और अर्थ
परितःद्वितीयाग्रामं परितः — गाँव के चारों ओर
उभयतःद्वितीयामार्गम् उभयतः — मार्ग के दोनों ओर
सहतृतीयापुत्रेण सह — पुत्र के साथ
अलम्तृतीयाअलं कोलाहलेन — शोर पर्याप्त है / शोर बंद करो
नमःचतुर्थीगुरवे नमः — गुरु को नमस्कार
बहिःपञ्चमीग्रामाद् बहिः — गाँव के बाहर
उपरिषष्ठीमन्दिरस्य उपरि — मन्दिर के ऊपर
अधःषष्ठीवृक्षस्य अधः — वृक्ष के नीचे

सन्धिः — स्वर और व्यञ्जन के नियम

दो वर्णों के पास आने पर होने वाले वर्ण-परिवर्तन को सन्धि कहते हैं। पुस्तक तीन प्रकार बताती है: स्वर-सन्धि, व्यञ्जन-सन्धि और विसर्ग-सन्धि। इस परिशिष्ट में नीचे दिए स्वर तथा व्यञ्जन नियमों का विवरण है; विसर्ग-सन्धि के विस्तृत नियम यहाँ नहीं दिए गए हैं।

स्वर-सन्धि: अयादि और पूर्वरूप

दो स्वर-सन्धियाँ
नामनियम का सारसही उदाहरण
अयादिए → अय्; ऐ → आय्; ओ → अव्; औ → आव्, आगे स्वर होने परशे + अनम् → शयनम्
गै + अकः → गायकः
भो + अनम् → भवनम्
नौ + इकः → नाविकः
पूर्वरूपपदान्त ए/ओ के बाद अ आने पर ए/ओ बना रहता है; लुप्त अ का चिह्न ऽ हैते + अपि → तेऽपि
सर्वे + अपि → सर्वेऽपि
नमो + अस्तु → नमोऽस्तु
विष्णो + अव → विष्णोऽव

पूर्वरूप की पदान्त वाली स्थिति को पहचानें; हर ए/ओ + अ पर बिना प्रसंग देखे अयादि न लगाएँ। अवग्रह ‘ऽ’ लुप्त अ को दिखाता है, अलग स्वर नहीं है।

व्यञ्जन-सन्धि: पाँच नियम

व्यञ्जन-सन्धि के पुस्तक में दिए नियम
नियमसरल पहचानउदाहरण
श्चुत्वस् / तवर्ग का श् / चवर्ग के पास आकर सम्बद्ध श् / चवर्ग में बदलनातत् + चित्रम् → तच्चित्रम्
उत् + चारणम् → उच्चारणम्
मनस् + चञ्चलम् → मनश्चञ्चलम्
जश्त्वपदान्त वर्गीय वर्ण का स्वर या घोष वर्ण से पहले अपने वर्ग के तीसरे वर्ण में बदलना; पाँचवाँ वर्ण इसमें नहींवाक् + अर्थौ → वागर्थौ
जगत् + ईशः → जगदीशः
दिक् + गजाः → दिग्गजाः
अनुस्वारपदान्त म् के बाद व्यञ्जन आने पर ंरामम् + वन्दे → रामं वन्दे
गृहम् + गच्छ → गृहं गच्छ
परसवर्णअनुस्वार के बाद वर्गीय व्यञ्जन हो तो उसके वर्ग का अनुनासिक; पदान्त में विकल्प मिलता हैअं + कितः → अङ्कितः
कं + पते → कम्पते
गृहं + गच्छ → गृहङ्गच्छ / गृहं गच्छ
णत्वएक ही पद में ऋ, र् या ष् के प्रभाव से निश्चित शर्तों में न् → ण्प्र + नमति → प्रणमति
कृष्णः, विष्णुः, वर्णः
णत्व की सीमा: केवल शब्द में र/ष दिख जाने से हर न को ण नहीं बनाया जाता। एक ही पद की शर्त और बीच के वर्ण महत्त्वपूर्ण हैं। पुस्तक के अनुसार स्वर, ह्, य्, व्, कवर्ग और पवर्ग के कुछ व्यवधान में भी नियम चलता है। नराणाम् जैसे रूपों में णत्व के साथ शब्दरूप का अन्य परिवर्तन भी है; पूरे रूप को सीखें।

ClearStudy अभ्यास — उत्तर सहित

ये पुनरावृत्ति के लिए बनाए गए मौलिक प्रश्न हैं। पहले स्वयं हल करें, फिर उत्तर देखें।

मौलिक पुनरावृत्ति अभ्यास
प्रश्नउत्तर और कारण
1. गम् + क्त्वा का रूप लिखिए।गत्वा।
2. प्र + नम् + ल्यप् का रूप लिखिए।प्रणम्य।
3. कृ + तुमुन् का रूप लिखिए।कर्तुम्।
4. सा कार्यं ___। (कृतवान् / कृतवती)कृतवती; सा स्त्रीलिङ्ग है।
5. गुरवे नमः — गुरवे की विभक्ति?चतुर्थी; नमः के साथ चतुर्थी।
6. वृक्षात् पत्रं पतति — वृक्षात् का कारक?अपादान; वृक्षात् पञ्चमी एकवचन है।
7. जगत् + ईशः की सन्धि कीजिए।जगदीशः — जश्त्व।
8. सर्वेऽपि का विच्छेद कीजिए।सर्वे + अपि — पूर्वरूप।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

क्या यह दीपकम् का पाठ 14 है?

नहीं। पुस्तक के 13 मुख्य पाठों के बाद परिशिष्टम् १ — व्याकरणम् है। स्थानीय फाइल hsde114.pdf इसी परिशिष्ट की है।

क्त्वा और ल्यप् में क्या अन्तर है?

बिना उपसर्ग की धातु से सामान्यतः क्त्वा रूप बनता है, जैसे गत्वा। उपसर्गयुक्त धातु में उसी पहले-क्रिया वाले प्रयोग के लिए ल्यप् आता है, जैसे आगत्य। दोनों अव्यय हैं।

क्या षष्ठी विभक्ति एक कारक है?

इस पुस्तक के छः कारकों में षष्ठी नहीं है। षष्ठी सामान्यतः शब्दों का सम्बन्ध दिखाती है, जैसे रामस्य राजधानी।

पठ् की पंक्ति में सम्पूज्य क्यों नहीं दिया गया?

सम्पूज्य सम् + पूज् से बना है, पठ् से नहीं। स्रोत की पंक्ति में यह असंगति है; यहाँ पठ् का उदाहरण प्रपठ्य देकर अन्तर स्पष्ट किया गया है।

मूल पुस्तक का स्रोत: NCERT का आधिकारिक पाठ्यपुस्तक पोर्टल। इस पृष्ठ की व्याख्या और मौलिक अभ्यास ClearStudy के हैं।

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