Class 8 Sanskrit Deepakam Chapter 5 Solutions (NCERT 2026–27) – गीता सुगीता कर्तव्या

This page gives the complete solution for Class 8 Sanskrit Deepakam (दीपकम्) Chapter 5 ‘गीता सुगीता कर्तव्या’ – eight selected श्लोक of the श्रीमद्भगवद्गीता with their मूल पाठ, सार (Hindi summary), शब्दार्थ, and original, exam-ready answers to every question of the अभ्यास (अभ्यासात् जायते सिद्धिः) along with the व्याकरण-तालिकाः (विभक्ति-प्रयोग), extra questions, MCQs, अभिकथन-कारण and FAQs.

Class: 8 Subject: Sanskrit Book: Deepakam (दीपकम्) Chapter: 5 पाठ: गीता सुगीता कर्तव्या Session: 2026–27

पाठ का अवलोकन (Chapter Overview)

दीपकम् कक्षा 8 का पाँचवाँ पाठ ‘गीता सुगीता कर्तव्या’ श्रीमद्भगवद्गीता के आठ चुने हुए श्लोकों पर आधारित है। पाठ का आरम्भ कुरुक्षेत्र में आयोजित श्रीगीता-जयन्ती-महोत्सव के एक रोचक संवाद से होता है, जहाँ रमेश अपने पिता के साथ जाता है और कथावाचक से प्रसिद्ध श्लोक “गीता सुगीता कर्तव्या किमन्यैः शास्त्रविस्तरैः” सुनकर पिता से गीता के विषय में पूछता है। पिता बताते हैं कि कुरुक्षेत्र के युद्ध में युद्ध-विमुख अर्जुन को भगवान् श्रीकृष्ण ने जो कर्तव्य-पालन का उपदेश दिया, वही श्रीमद्भगवद्गीता है। ‘गीता सुगीता कर्तव्या’ का तात्पर्य है – गीता का सम्यक् अभ्यास करना चाहिए तथा कार्यक्षेत्र एवं जीवन-क्षेत्र में उसके उपदेशों का पालन करना चाहिए। पाठ का केन्द्रीय भाव स्थितप्रज्ञता, क्रोध-त्याग, ज्ञान-प्राप्ति, भक्ति एवं वाङ्मय तप जैसे जीवन-मूल्यों की शिक्षा देना है।

पाठ-परिचय / प्रसंग

यह पाठ श्रीमद्भगवद्गीता से संकलित आठ श्लोकों पर आधारित है। श्रीमद्भगवद्गीता भगवान् श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को दिए गए जीवन-मूल्य सम्बन्धी उपदेशों का सङ्कलनात्मक ग्रन्थ है, जिसे महर्षि वेदव्यास ने महाभारत के भीष्मपर्व में वर्णित किया है। गीता में कुल अठारह अध्याय एवं सात सौ (७००) श्लोक हैं। पाठ का प्रसंग कुरुक्षेत्र के गीता-जयन्ती-महोत्सव से जुड़ा है, जहाँ रमेश एवं उसके पिता का संवाद चलता है। इसी संवाद के माध्यम से गीता के द्वितीय, चतुर्थ, बारहवें एवं सत्रहवें अध्याय आदि से चुने हुए आठ श्लोक प्रस्तुत किए गए हैं, जो स्थितप्रज्ञ पुरुष के लक्षण, क्रोध की हानि, ज्ञान-प्राप्ति के उपाय, ईश्वर के प्रिय भक्त के गुण एवं वाङ्मय तप की शिक्षा देते हैं।

मूल श्लोकाः

(श्रीमद्भगवद्गीतायाः अष्ट चयनिताः श्लोकाः, ज्यों-के-त्यों।)

गीता सुगीता कर्तव्या किमन्यैः शास्त्रविस्तरैः ।
या स्वयं पद्मनाभस्य मुखपद्माद्विनिःसृता ॥

दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः ।
वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते ॥ १ ॥

क्रोधाद्भवति सम्मोहः सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः ।
स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति ॥ २ ॥

तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया ।
उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः ॥ ३ ॥

श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः ।
ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति ॥ ४ ॥

अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च ।
निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी ॥ ५ ॥

सन्तुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चयः ।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्यो मद्भक्तः स मे प्रियः ॥ ६ ॥

यस्मान्नोद्विजते लोकः लोकान्नोद्विजते च यः ।
हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो यः स च मे प्रियः ॥ ७ ॥

अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत् ।
स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते ॥ ८ ॥
— श्रीमद्भगवद्गीता (चयनिताः श्लोकाः)

सार (Hindi Summary)

‘गीता सुगीता कर्तव्या’ पाठ का आरम्भ कुरुक्षेत्र में आयोजित श्रीगीता-जयन्ती-महोत्सव के एक रोचक प्रसंग से होता है। रमेश अपने पिता के साथ इस उत्सव में जाता है। वहाँ कथावाचक गीता के विषय में बताते हुए प्रसिद्ध श्लोक सुनाते हैं – “गीता का अच्छी प्रकार अध्ययन करना चाहिए, अन्य शास्त्रों के विस्तार से क्या लाभ; क्योंकि यह स्वयं भगवान् विष्णु के मुख-कमल से निःसृत हुई है।” यह सुनकर रमेश अपने पिता से पूछता है कि गीता क्या है और इसे ‘सुगीता’ (सुन्दर ढंग से अभ्यास योग्य) कैसे बनाया जाए।

पिता बताते हैं कि बहुत वर्ष पूर्व कुरुक्षेत्र में कौरवों एवं पाण्डवों के बीच महायुद्ध हुआ था। उस युद्ध में अपने सगे-सम्बन्धियों को देखकर अर्जुन युद्ध नहीं करना चाहता था। तब भगवान् श्रीकृष्ण ने युद्ध-विमुख अर्जुन को कर्तव्य-पालन का उपदेश दिया। श्रीकृष्ण का यही उपदेश श्रीमद्भगवद्गीता है, जिसमें अमृत के समान उपदेश भरे हैं। ‘गीता सुगीता कर्तव्या’ का आशय है कि गीता का सम्यक् अभ्यास करना चाहिए, उसे उत्तम भाव से पढ़ना चाहिए तथा कार्यक्षेत्र एवं जीवन-क्षेत्र में उसके उपदेशों का अनुपालन करना चाहिए।

पाठ में दिए गए आठ श्लोक गीता के अनेक जीवन-मूल्यों की शिक्षा देते हैं – जो मनुष्य दुःख में उद्विग्न नहीं होता तथा सुख में आसक्ति से रहित रहता है, वह स्थितप्रज्ञ मुनि कहलाता है। क्रोध से सम्मोह, सम्मोह से स्मृति-नाश, स्मृति-नाश से बुद्धि-नाश एवं अन्ततः विनाश होता है। ज्ञान प्रणाम, सेवा एवं विनम्र जिज्ञासा से तत्त्वदर्शी गुरु द्वारा प्राप्त होता है। श्रद्धालु एवं संयमी पुरुष ज्ञान प्राप्त कर शीघ्र परम शान्ति पाता है। जो किसी से द्वेष नहीं करता, सबका मित्र एवं दयालु है, ममता एवं अहंकार से रहित है, सुख-दुःख में समभाव रखता है तथा हर्ष-क्रोध-भय से मुक्त है, वही भगवान् का प्रिय भक्त है। अन्त में बताया गया है कि उद्वेग न करने वाला, सत्य, प्रिय एवं हितकर वचन तथा स्वाध्याय का अभ्यास ही ‘वाङ्मय तप’ कहलाता है। इस प्रकार पाठ हमें समता, संयम, ज्ञान, भक्ति एवं मधुर-वाणी का संदेश देता है।

शब्दार्थ (Word-meanings)

शब्दः (Sanskrit)हिन्दी अर्थEnglish meaning
सुगीताअच्छी तरह से गाई/अभ्यास की जाने वालीWell sung / well practised
युद्धपराङ्मुखम्युद्ध-विमुखThe war-averse
अमृततुल्याःअमृत के समान, अति महत्त्वपूर्णLike nectar
अनुद्विग्नमनाःअविचलित मन वालाOf tranquil mind
विगतस्पृहःआसक्ति रहितDetached, free of craving
वीत-राग-भय-क्रोधःवासना, भय और क्रोध से रहितFree from attachment, fear and anger
स्थितधीःस्थिर मन वालाSteady-minded
मुनिःतपस्वी, यतिThe sage
सम्मोहःकर्तव्य-अकर्तव्य का अविवेकDelusion
स्मृतिविभ्रमःस्मरणशक्ति का नाश होनाLoss of memory
श्रद्धावान्श्रद्धा से युक्तDevoted, faithful
संयतेन्द्रियःसंयमित इन्द्रियों वालाOne who has controlled his senses
प्रणिपातेनप्रणाम के द्वाराBy bowing down / salutation
परिप्रश्नेनविनम्र होकर पुनः-पुनः पूछने सेBy questioning with humility
उपदेक्ष्यन्तिउपदेश देंगेThey will preach
तत्त्वदर्शिनःतत्त्वज्ञानी, सत्य के द्रष्टाThose who have realized the Truth
विद्धितुम जानो(Let you) know
अद्वेष्टाद्वेष न करने वालाOne who never hates
निर्ममःममत्व-भावना से रहितFree from the sense of ‘mine’
समदुःखसुखःसुख और दुःख में समान भाव वालाSame in pain and pleasure
दृढनिश्चयःदृढ़ निश्चय वालाFirmly resolute / determined
उद्विजतेउद्विग्न होता हैGets agitated
हर्षामर्षभयोद्वेगैःहर्ष, क्रोध, भय और चिन्ता सेFrom joy, impatience, fear and anxiety
अनुद्वेगकरम्व्याकुलता न करने वालाUnoffending / non-agitating
वाङ्मयम्वाचिक (वाणी सम्बन्धी)Verbal (penance)

अभ्यासः (अभ्यासात् जायते सिद्धिः)

1. अधोलिखितानां प्रश्नानाम् एकपदेन उत्तरं लिखत —

(क) श्रद्धावान् जनः किं लभते ?

उत्तरज्ञानम्।

(ख) कस्मात् सम्मोहः जायते ?

उत्तरक्रोधात्।

(ग) सम्मोहात् किं जायते ?

उत्तरस्मृतिविभ्रमः।

(घ) अर्जुनाय गीतां कः उपदिष्टवान् ?

उत्तरश्रीकृष्णः (भगवान् श्रीकृष्णः)।

(ङ) हर्षामर्षभयोद्वेगैः मुक्तः नरः कस्य प्रियः भवति ?

उत्तरभगवतः (श्रीकृष्णस्य)।

2. पूर्णवाक्येन उत्तरं लिखत —

(क) कीदृशं वाक्यं वाङ्मयं तपः उच्यते ?

उत्तरयद् वाक्यम् अनुद्वेगकरं, सत्यं, प्रियं, हितकरं च भवति, तथा यत् स्वाध्यायस्य अभ्यासरूपम् अस्ति, तद् वाक्यं वाङ्मयं तपः उच्यते।

(ख) कीदृशः जनः स्थितधीः उच्यते ?

उत्तरयः जनः दुःखेषु अनुद्विग्नमनाः, सुखेषु विगतस्पृहः, राग-भय-क्रोध-रहितः च भवति, सः जनः स्थितधीः (स्थितप्रज्ञः मुनिः) उच्यते।

(ग) जनः कथं प्रणश्यति ?

उत्तरक्रोधात् सम्मोहः, सम्मोहात् स्मृतिविभ्रमः, स्मृतिभ्रंशात् बुद्धिनाशः भवति; बुद्धिनाशात् एव जनः प्रणश्यति।

(घ) जनः कथम् उत्तमां शान्तिं प्राप्नोति ?

उत्तरयः श्रद्धावान्, तत्परः, संयतेन्द्रियः जनः ज्ञानं लभते, सः ज्ञानं लब्ध्वा अचिरेण एव परां (उत्तमां) शान्तिम् अधिगच्छति।

(ङ) उपदेशप्राप्तये त्रयः उपायाः के भवन्ति ?

उत्तरउपदेशप्राप्तये त्रयः उपायाः सन्ति – (1) प्रणिपातः (प्रणामः), (2) परिप्रश्नः (विनम्र जिज्ञासा), (3) सेवा।

3. कोष्ठके दत्तानि पदानि उपयुज्य वाक्यानि रचयत —

शब्द-मञ्जूषा: सेवया, स्मृतिविभ्रमः, योगी, वाङ्मयं, स्थितधीः

उत्तर (क) अनुद्वेगकरं सत्यं प्रियहितं च वाक्यं वाङ्मयं तपः उच्यते। (ख) सततं सन्तुष्टः दृढनिश्चयः च योगी भवति। (ग) अनुद्विग्नमनाः मुनिः स्थितधीः उच्यते। (घ) तद् आत्मज्ञानं प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया च विद्धि। (ङ) सम्मोहात् स्मृतिविभ्रमः भवति।

4. अधोलिखितानि पदानि उपयुज्य वाक्यानि रचयत —

(दिए गए पदों का प्रयोग कर शुद्ध वाक्य बनाइए। नमूना उत्तर नीचे हैं।)

पदम्वाक्यम् (नमूना उत्तर)
(क) उच्यतेसत्यवादी जनः सज्जनः उच्यते
(ख) चरामः लक्ष्मणः वनं गच्छतः।
(ग) नसः क्रोधं करोति।
(घ) लब्ध्वाज्ञानं लब्ध्वा मनुष्यः शान्तिं प्राप्नोति।
(ङ) कुर्यात्छात्रः नित्यम् अभ्यासं कुर्यात्

(मूल पुस्तक में अन्तिम दो उपखण्ड दोनों ‘ङ’ अंकित हैं; यहाँ स्पष्टता हेतु (घ) लब्ध्वा एवं (ङ) कुर्यात् रखा गया है।)

5. पाठानुसारं समुचितेन पदेन श्लोकं पूरयत —

उत्तर (क) श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः (ख) स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते। (ग) सन्तुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चयः (घ) क्रोधाद् भवति सम्मोहः सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः। (ङ) तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्ने सेवया।

6. उदाहरणानुसारं पदानि स्त्रीलिङ्गे परिवर्तयत —

उदाहरणम् – श्रद्धावान् → श्रद्धावती; बुद्धिमान् → बुद्धिमती।

पुंल्लिङ्गम्स्त्रीलिङ्गम् (उत्तर)
(क) गुणवान्गुणवती
(ख) आयुष्मान्आयुष्मती
(ग) क्षमावान्क्षमावती
(घ) ज्ञानवान्ज्ञानवती
(ङ) श्रीमान्श्रीमती

7. समुचितेन पदेन सह स्तम्भौ मेलयत —

स्तम्भः ‘अ’स्तम्भः ‘इ’ (दत्त-विकल्पाः)
(क) सर्वभूतानाम्पुनः पुनः प्रश्नकरणेन
(ख) अनुद्विग्नमनाःस्थिरमतिमान्
(ग) स्थितधीःइन्द्रियसंयमी
(घ) परिप्रश्नेयस्य मनः विचलितं न भवति
(ङ) संयतेन्द्रियःसर्वेषां प्राणिनाम्
सही मेलनम् (उत्तर) (क) सर्वभूतानाम् → सर्वेषां प्राणिनाम् (ख) अनुद्विग्नमनाः → यस्य मनः विचलितं न भवति (ग) स्थितधीः → स्थिरमतिमान् (घ) परिप्रश्ने → पुनः पुनः प्रश्नकरणेन (ङ) संयतेन्द्रियः → इन्द्रियसंयमी

8. श्रीमद्भगवद्गीतायाः विषये पञ्च वाक्यानि लिखत —

उत्तर (नमूना) (क) श्रीमद्भगवद्गीता भगवतः श्रीकृष्णस्य उपदेशानां सङ्कलनात्मकः ग्रन्थः अस्ति। (ख) महर्षिः वेदव्यासः महाभारतस्य भीष्मपर्वणि गीतां वर्णितवान्। (ग) गीतायाम् अष्टादश अध्यायाः सप्तशतं (७००) श्लोकाः च सन्ति। (घ) श्रीकृष्णः युद्धविमुखम् अर्जुनं कर्तव्यपालनार्थम् उपदिष्टवान्। (ङ) गीतायाः उपदेशाः जीवने अनुपालनीयाः सन्ति।

अत्र इदम् अवधेयम् (व्याकरण-तालिकाः)

पाठ में ‘अत्र इदम् अवधेयम्’ के अन्तर्गत विभक्ति-प्रयोग सम्बन्धी निम्नलिखित व्याकरण-बिन्दु दिए गए हैं, जिन्हें ध्यानपूर्वक समझना आवश्यक है।

1. आधार-अर्थे सप्तमी-विभक्तिः

जहाँ क्रिया या स्थिति का आधार (स्थान/अवसर) बताया जाता है, वहाँ सप्तमी विभक्ति (में/पर) का प्रयोग होता है।

उदाहरणम्आधार-पदम् (सप्तमी)
उत्पीठिकायां पुस्तकम् अस्ति।उत्पीठिकायाम्
दुःखेषु अनुद्विग्नमनाः भवेत्।दुःखेषु
सुखेषु विगतस्पृहः भवेत्।सुखेषु

2. उत्पत्ति/कारण-अर्थे पञ्चमी-विभक्तिः

जहाँ किसी वस्तु की उत्पत्ति अथवा कारण (से/के कारण) बताया जाता है, वहाँ पञ्चमी विभक्ति का प्रयोग होता है।

उदाहरणम्कारण-पदम् (पञ्चमी)
क्रोधात् सम्मोहः भवति।क्रोधात्
सम्मोहात् स्मृतिविभ्रमः भवति।सम्मोहात्
स्मृतिभ्रंशात् बुद्धिनाशः भवति।स्मृतिभ्रंशात्

योग्यताविस्तरः & परियोजनाकार्यम्

योग्यताविस्तरः (ज्ञान-विस्तार) – श्रीमद्भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता भगवान् श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को प्रदत्त जीवन-मूल्य सम्बन्धी उपदेशों का सङ्कलनात्मक ग्रन्थ है। महर्षि वेदव्यास ने महाभारत के भीष्मपर्व में इसका वर्णन किया है। गीता में अठारह अध्याय एवं सात सौ (७००) श्लोक हैं।

अध्यायःनाम (विषयः)
१.अर्जुनविषादयोगः (सैन्य-निरीक्षणम्)
२.साङ्ख्ययोगः (गीतायाः सारः)
३.कर्मयोगः (कर्मणः महत्त्वम्)
४.ज्ञान-कर्म-संन्यासयोगः (दिव्यज्ञानम्)
५.कर्मसंन्यासयोगः (कर्म-वैराग्य-योगः)
६.आत्मसंयमयोगः (ध्यान-योगः)
७.ज्ञान-विज्ञानयोगः (भगवद्ज्ञानस्य प्राप्तिः)
८.अक्षर-ब्रह्मयोगः (भगवतः प्राप्तिः)
९.राजविद्या-राजगुह्ययोगः (परमं गुप्तं ज्ञानम्)
१०.विभूतियोगः (भगवतः ऐश्वर्यम्)
११.विश्वरूप-दर्शनयोगः (विश्वरूपस्य दर्शनम्)
१२.भक्तियोगः (भक्तिभावज्ञानम्)
१३.क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ-विभागयोगः (प्रकृतेः पुरुषस्य चेतनायाः च ज्ञानम्)
१४.गुणत्रय-विभागयोगः (प्रकृतेः गुणत्रयस्य वर्णनम्)
१५.पुरुषोत्तमयोगः (विश्वस्य केन्द्ररूपेण ब्रह्मणः वर्णनम्)
१६.दैवासुर-सम्पद्विभागयोगः (दैवी-आसुरी-स्वभावानां वर्णनम्)
१७.श्रद्धात्रय-विभागयोगः (श्रद्धायाः विभागानां वर्णनम्)
१८.मोक्ष-संन्यासयोगः (उपसंहारः, संन्यास-सिद्धि-वर्णनम्)
सरसं गायामः —
भगवद्गीता किञ्चिदधीता, गङ्गा-जल-लव-कणिका पीता ।
सकृदपि येन मुरारि समर्चा, तस्य यमः किं कुरुते चर्चाम् ॥

कर्तव्यदीक्षां च समत्वशिक्षां, ज्ञानस्य भिक्षां शरणागतिञ्च ।
ददाति गीता करुणार्द्रभूता, कृष्णेन दत्ता जगतां हिताय ॥

परियोजनाकार्यम् (Project Work)

1. कक्षायां श्रीमद्भगवद्गीतानुगुणं ‘स्थितधीः’ इति विषयम् अधिकृत्य ‘मम जीवनलक्ष्यम्’ इत्यस्मिन् विषये परिचर्चां स्थापयतु।

मार्गदर्शनम्यह कक्षा-गतिविधि है। गीता के अनुसार ‘स्थितधीः’ (स्थितप्रज्ञ) पुरुष के लक्षणों – सुख-दुःख में समभाव, क्रोध-भय-राग से मुक्ति, संयम एवं दृढ़ निश्चय – को ध्यान में रखते हुए अपने जीवन-लक्ष्य पर कक्षा में चर्चा कीजिए।

2. विविध-धर्माणां धर्मग्रन्थानां नामानि विलिख्य कस्यचित् एकस्य धर्मग्रन्थस्य विवरणं लिखत।

उत्तर (नमूना)विभिन्न धर्मों के धर्मग्रन्थ – हिन्दू: वेद, गीता, रामायण; बौद्ध: त्रिपिटक; जैन: आगम; सिख: गुरु-ग्रन्थ-साहिब; इस्लाम: कुरान; ईसाई: बाइबल। उदाहरण-विवरण (श्रीमद्भगवद्गीता): यह महाभारत के भीष्मपर्व का अंश है, जिसमें श्रीकृष्ण ने अर्जुन को कर्म, ज्ञान एवं भक्ति का उपदेश दिया। इसमें १८ अध्याय एवं ७०० श्लोक हैं तथा यह निष्काम कर्म एवं समभाव की शिक्षा देता है।

अतिरिक्त प्रश्न (Extra Questions)

लघु उत्तरीय प्रश्न (30–40 शब्द)

1. ‘गीता सुगीता कर्तव्या’ इत्यस्य कः आशयः ?

उत्तरइसका आशय है कि गीता का सम्यक् रूप से अभ्यास एवं उत्तम भाव से अध्ययन करना चाहिए, तथा कार्यक्षेत्र एवं जीवन-क्षेत्र में उसके उपदेशों का पालन करना चाहिए। अन्य शास्त्रों के विस्तार से तब विशेष आवश्यकता नहीं रहती।

2. अर्जुनः युद्धं कर्तुं किमर्थं न इच्छति स्म ?

उत्तरकुरुक्षेत्र के युद्ध में अपने सगे-सम्बन्धियों (बान्धवों) को सामने देखकर अर्जुन युद्ध नहीं करना चाहता था। तब भगवान् श्रीकृष्ण ने युद्ध-विमुख अर्जुन को कर्तव्य-पालन का उपदेश दिया।

3. क्रोध से किस प्रकार मनुष्य का विनाश होता है ?

उत्तरक्रोध से सम्मोह (अविवेक) उत्पन्न होता है, सम्मोह से स्मृति का नाश होता है, स्मृति-नाश से बुद्धि नष्ट होती है तथा बुद्धि के नाश से मनुष्य का सर्वथा विनाश हो जाता है।

4. भगवान् का प्रिय भक्त कैसा होता है ?

उत्तरजो किसी से द्वेष नहीं करता, सबका मित्र एवं दयालु है, ममता एवं अहंकार से रहित है, सुख-दुःख में समभाव रखता है, क्षमाशील है तथा हर्ष-क्रोध-भय-चिन्ता से मुक्त है – वही भगवान् का अत्यन्त प्रिय भक्त होता है।

5. ‘वाङ्मय तप’ क्या है ?

उत्तरजो वचन उद्वेग न करने वाला, सत्य, प्रिय एवं हितकर हो, तथा शास्त्रों का स्वाध्याय एवं अभ्यास हो – इसी को वाणी-सम्बन्धी तप अर्थात् ‘वाङ्मय तप’ कहते हैं।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (100–120 शब्द)

6. स्थितप्रज्ञ (स्थितधीः) पुरुष के लक्षणों का वर्णन कीजिए।

उत्तरगीता के अनुसार स्थितप्रज्ञ अथवा स्थितधीः वह पुरुष है जिसकी बुद्धि सदा स्थिर एवं समभाव में रहती है। वह दुःख आने पर उद्विग्न (व्याकुल) नहीं होता तथा सुख की प्राप्ति में भी आसक्ति नहीं रखता। वह राग (आसक्ति), भय एवं क्रोध – इन तीनों से सर्वथा मुक्त रहता है।ऐसा मुनि-पुरुष अपनी इन्द्रियों को वश में रखता है, किसी भी परिस्थिति में विचलित नहीं होता तथा समभाव से जीवन जीता है। उसका मन शान्त, संयमित एवं स्थिर रहता है। यही गीता का आदर्श मनुष्य है, जो सुख-दुःख, लाभ-हानि एवं मान-अपमान में समान बना रहता है और इसी कारण परम शान्ति को प्राप्त करता है।

7. ज्ञान-प्राप्ति के लिए गीता ने कौन-से उपाय बताए हैं ? समझाइए।

उत्तरगीता के अनुसार सच्चा तत्त्वज्ञान केवल पुस्तकों से नहीं, अपितु योग्य गुरु से ही प्राप्त होता है। भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि उस ज्ञान को प्रणिपात (प्रणाम), परिप्रश्न (विनम्रतापूर्वक पुनः-पुनः पूछना) एवं सेवा – इन तीन उपायों से प्राप्त करो।शिष्य को विनम्र एवं जिज्ञासु होकर गुरु के समीप जाना चाहिए, उनकी सेवा करनी चाहिए तथा श्रद्धापूर्वक प्रश्न पूछने चाहिए। तत्त्वदर्शी ज्ञानी गुरु ही उसे यथार्थ ज्ञान प्रदान करते हैं। आगे कहा गया है कि श्रद्धालु, तत्पर एवं संयमी पुरुष ही यह ज्ञान प्राप्त करता है और ज्ञान पाकर शीघ्र ही परम शान्ति को प्राप्त कर लेता है।

8. श्रीमद्भगवद्गीता का संक्षिप्त परिचय दीजिए।

उत्तरश्रीमद्भगवद्गीता भगवान् श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को दिए गए जीवन-मूल्य सम्बन्धी उपदेशों का सङ्कलनात्मक ग्रन्थ है। महर्षि वेदव्यास ने इसे महाभारत के भीष्मपर्व में वर्णित किया है। इसमें कुल अठारह अध्याय एवं सात सौ (७००) श्लोक हैं।कुरुक्षेत्र के युद्ध में जब अपने बान्धवों को देखकर अर्जुन युद्ध-विमुख हो गया, तब श्रीकृष्ण ने उसे कर्म, ज्ञान एवं भक्ति का उपदेश देकर कर्तव्य-पालन के लिए प्रेरित किया। गीता निष्काम कर्म, समभाव, स्थितप्रज्ञता एवं भक्ति की शिक्षा देती है। इसे अमृत के समान माना जाता है तथा इसका सन्देश समस्त मानव-जाति के कल्याण के लिए है।

MCQ & अभिकथन-कारण

1. यह पाठ किस ग्रन्थ से संकलित है?

(क) रामायणात्

(ख) श्रीमद्भगवद्गीतायाः

(ग) उपनिषदः

(घ) पुराणात्

उत्तर(ख) श्रीमद्भगवद्गीतायाः।

2. श्रीमद्भगवद्गीता में कितने अध्याय हैं?

(क) सोलह

(ख) सत्रह

(ग) अठारह

(घ) बीस

उत्तर(ग) अठारह। (कुल ७०० श्लोक)

3. अर्जुन को गीता का उपदेश किसने दिया?

(क) वेदव्यासः

(ख) श्रीकृष्णः

(ग) भीष्मः

(घ) सञ्जयः

उत्तर(ख) श्रीकृष्णः।

4. ‘क्रोधात्’ से सर्वप्रथम क्या उत्पन्न होता है?

(क) बुद्धिनाशः

(ख) स्मृतिविभ्रमः

(ग) सम्मोहः

(घ) ज्ञानम्

उत्तर(ग) सम्मोहः।

5. स्थिर बुद्धि वाला मुनि क्या कहलाता है?

(क) योगी

(ख) स्थितधीः

(ग) तत्त्वदर्शी

(घ) श्रद्धावान्

उत्तर(ख) स्थितधीः।

6. ज्ञान प्राप्त करने के तीन उपाय कौन-से हैं?

(क) धन, बल, यश

(ख) प्रणिपात, परिप्रश्न, सेवा

(ग) क्रोध, भय, राग

(घ) हर्ष, अमर्ष, उद्वेग

उत्तर(ख) प्रणिपात, परिप्रश्न, सेवा।

7. श्रद्धावान् एवं संयमी पुरुष ज्ञान पाकर शीघ्र क्या प्राप्त करता है?

(क) धनम्

(ख) परां शान्तिम्

(ग) यशः

(घ) राज्यम्

उत्तर(ख) परां शान्तिम्।

8. ‘निर्ममः’ शब्द का अर्थ है—

(क) अहंकारी

(ख) ममत्व-भावना से रहित

(ग) क्रोधी

(घ) दयालु

उत्तर(ख) ममत्व-भावना से रहित।

9. वाणी-सम्बन्धी तप को क्या कहते हैं?

(क) कायिक तप

(ख) मानस तप

(ग) वाङ्मय तप

(घ) यज्ञ तप

उत्तर(ग) वाङ्मय तप।

10. श्रीमद्भगवद्गीता महाभारत के किस पर्व में वर्णित है?

(क) आदिपर्वणि

(ख) भीष्मपर्वणि

(ग) शान्तिपर्वणि

(घ) द्रोणपर्वणि

उत्तर(ख) भीष्मपर्वणि।
उत्तर-कुंजी: 1-(ख), 2-(ग), 3-(ख), 4-(ग), 5-(ख), 6-(ख), 7-(ख), 8-(ख), 9-(ग), 10-(ख)

अभिकथन-कारण – नीचे अभिकथन (A) और कारण (R) दिए गए हैं। सही विकल्प चुनिए—
(क) A और R दोनों सही, R, A की सही व्याख्या है। (ख) A और R दोनों सही, पर R, A की सही व्याख्या नहीं। (ग) A सही, R गलत। (घ) A गलत, R सही।

1. अभिकथन (A): ‘गीता सुगीता कर्तव्या’ पाठ श्रीमद्भगवद्गीता के श्लोकों पर आधारित है।

कारण (R): यह पाठ गीता के चुने हुए आठ श्लोकों के माध्यम से स्थितप्रज्ञता, ज्ञान एवं भक्ति की शिक्षा देता है।

उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है।

2. अभिकथन (A): क्रोध से अन्ततः मनुष्य का विनाश होता है।

कारण (R): क्रोध से सम्मोह, सम्मोह से स्मृति-नाश, स्मृति-नाश से बुद्धि-नाश एवं बुद्धि-नाश से विनाश होता है।

उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है।

3. अभिकथन (A): ज्ञान केवल धन एवं बल से प्राप्त होता है।

कारण (R): गीता के अनुसार ज्ञान प्रणिपात, परिप्रश्न एवं सेवा से तत्त्वदर्शी गुरु द्वारा प्राप्त होता है।

उत्तर(घ) A गलत है, किन्तु R सही है – ज्ञान धन-बल से नहीं, अपितु प्रणाम, जिज्ञासा एवं सेवा से गुरु द्वारा प्राप्त होता है।

4. अभिकथन (A): स्थितप्रज्ञ पुरुष सुख-दुःख में समभाव रखता है।

कारण (R): वह राग, भय एवं क्रोध से मुक्त रहता है तथा किसी भी परिस्थिति में विचलित नहीं होता।

उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है।

5. अभिकथन (A): उद्वेग न करने वाला, सत्य, प्रिय एवं हितकर वचन वाङ्मय तप कहलाता है।

कारण (R): स्वाध्याय एवं अभ्यास भी वाणी-सम्बन्धी तप का अंग माने गए हैं।

उत्तर(ख) A और R दोनों सही हैं, किन्तु R, A की पूर्ण व्याख्या नहीं करता (दोनों वाङ्मय तप के पृथक्-पृथक् अंग हैं)।

परीक्षा-सुझाव एवं सामान्य त्रुटियाँ

परीक्षा-सुझाव (Exam Tips)

  • आठों श्लोक कण्ठस्थ करें – श्लोक-पूर्ति (रिक्तस्थान) के प्रश्न प्रायः इन्हीं से आते हैं।
  • शब्दार्थ (स्थितधीः, सम्मोहः, प्रणिपातेन, निर्ममः, वाङ्मयम् आदि) हिन्दी एवं अंग्रेज़ी दोनों में याद रखें।
  • क्रोध से विनाश तक की शृंखला (क्रोध → सम्मोह → स्मृतिविभ्रम → बुद्धिनाश → विनाश) क्रम सहित याद करें।
  • सप्तमी (आधार) एवं पञ्चमी (कारण/उत्पत्ति) विभक्ति के नियम उदाहरण सहित याद रखें।
  • ‘एकपदेन’ वाले प्रश्नों में केवल एक पद लिखें तथा ‘पूर्णवाक्येन’ वाले में पूरा वाक्य।

सामान्य त्रुटियाँ (Common Mistakes)

  • क्रोध-शृंखला का क्रम उलट देना – पहले सम्मोह, फिर स्मृतिविभ्रम, फिर बुद्धिनाश आता है।
  • ज्ञान-प्राप्ति के तीन उपायों में से कोई एक भूल जाना – प्रणिपात, परिप्रश्न एवं सेवा तीनों लिखें।
  • विभक्ति की भूल – आधार में सप्तमी (दुःखेषु) एवं कारण में पञ्चमी (क्रोधात्) का प्रयोग करें।
  • स्त्रीलिङ्ग बनाते समय ‘वान्’ → ‘वती’ (श्रद्धावान् → श्रद्धावती) न करना।
  • गीता का पर्व/रचयिता गलत बताना – यह महाभारत के भीष्मपर्व में है, इसे वेदव्यास ने वर्णित किया।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

दीपकम् कक्षा 8 का पाँचवाँ पाठ ‘गीता सुगीता कर्तव्या’ किस ग्रन्थ से लिया गया है?

यह पाठ श्रीमद्भगवद्गीता के आठ चुने हुए श्लोकों पर आधारित है। श्रीमद्भगवद्गीता महाभारत के भीष्मपर्व का अंश है, जिसे महर्षि वेदव्यास ने वर्णित किया तथा इसमें १८ अध्याय एवं ७०० श्लोक हैं।

‘गीता सुगीता कर्तव्या’ का अर्थ क्या है?

इसका अर्थ है कि गीता का सम्यक् अभ्यास एवं उत्तम भाव से अध्ययन करना चाहिए तथा कार्यक्षेत्र एवं जीवन-क्षेत्र में उसके उपदेशों का पालन करना चाहिए।

स्थितप्रज्ञ (स्थितधीः) पुरुष कौन होता है?

जो मनुष्य दुःख में उद्विग्न नहीं होता, सुख में आसक्ति नहीं रखता तथा राग, भय एवं क्रोध से मुक्त रहकर सुख-दुःख में समभाव रखता है, वही स्थितप्रज्ञ (स्थितधीः) मुनि कहलाता है।

श्लोक, प्रश्न एवं अभ्यास-शीर्षक NCERT दीपकम् पुस्तक से ज्यों-के-त्यों लिए गए हैं; सार, भावार्थ एवं उत्तर ClearStudy द्वारा मौलिक रूप से तैयार किए गए हैं।

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