Class 8 Sanskrit Deepakam Chapter 5 Solutions — गीता सुगीता कर्तव्या
Class 8 Sanskrit Deepakam Chapter 5 solutions: आठ गीता-श्लोकों का हिन्दी सार, शब्दार्थ और आठ अभ्यासों के उत्तर पढ़ें। सप्तमी–पञ्चमी का प्रयोग, स्त्रीलिङ्ग-रूप और खुली गतिविधियों के नमूने समझें।
- पाठ का अवलोकन (Chapter Overview)
- पाठ-परिचय / प्रसंग
- मूल श्लोकाः
- सार (Hindi Summary)
- शब्दार्थ (Word-meanings)
- अभ्यासः (अभ्यासात् जायते सिद्धिः)
- अत्र इदम् अवधेयम् (व्याकरण-तालिकाः)
- योग्यताविस्तरः & परियोजनाकार्यम्
- अतिरिक्त प्रश्न (Extra Questions)
- MCQ & अभिकथन-कारण
- परीक्षा-सुझाव एवं सामान्य त्रुटियाँ
- अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
पाठ का अवलोकन (Chapter Overview)
दीपकम् कक्षा 8 का पाँचवाँ पाठ ‘गीता सुगीता कर्तव्या’ श्रीमद्भगवद्गीता के आठ चुने हुए श्लोकों पर आधारित है। पाठ का आरम्भ कुरुक्षेत्र में आयोजित श्रीगीता-जयन्ती-महोत्सव के एक रोचक संवाद से होता है, जहाँ रमेश अपने पिता के साथ जाता है और कथावाचक से प्रसिद्ध श्लोक “गीता सुगीता कर्तव्या किमन्यैः शास्त्रविस्तरैः” सुनकर पिता से गीता के विषय में पूछता है। पिता बताते हैं कि कुरुक्षेत्र के युद्ध में युद्ध-विमुख अर्जुन को भगवान् श्रीकृष्ण ने जो कर्तव्य-पालन का उपदेश दिया, वही श्रीमद्भगवद्गीता है। ‘गीता सुगीता कर्तव्या’ का तात्पर्य है – गीता का सम्यक् अभ्यास करना चाहिए तथा कार्यक्षेत्र एवं जीवन-क्षेत्र में उसके उपदेशों का पालन करना चाहिए। पाठ का केन्द्रीय भाव स्थितप्रज्ञता, क्रोध-त्याग, ज्ञान-प्राप्ति, भक्ति एवं वाङ्मय तप जैसे जीवन-मूल्यों की शिक्षा देना है।
पाठ-परिचय / प्रसंग
यह पाठ श्रीमद्भगवद्गीता से संकलित आठ श्लोकों पर आधारित है। श्रीमद्भगवद्गीता भगवान् श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को दिए गए जीवन-मूल्य सम्बन्धी उपदेशों का सङ्कलनात्मक ग्रन्थ है, जिसे महर्षि वेदव्यास ने महाभारत के भीष्मपर्व में वर्णित किया है। गीता में कुल अठारह अध्याय एवं सात सौ (७००) श्लोक हैं। पाठ का प्रसंग कुरुक्षेत्र के गीता-जयन्ती-महोत्सव से जुड़ा है, जहाँ रमेश एवं उसके पिता का संवाद चलता है। इसी संवाद के माध्यम से गीता के द्वितीय, चतुर्थ, बारहवें एवं सत्रहवें अध्याय आदि से चुने हुए आठ श्लोक प्रस्तुत किए गए हैं, जो स्थितप्रज्ञ पुरुष के लक्षण, क्रोध की हानि, ज्ञान-प्राप्ति के उपाय, ईश्वर के प्रिय भक्त के गुण एवं वाङ्मय तप की शिक्षा देते हैं।
मूल श्लोकाः
पहला अनङ्कित पद्य गीता की प्रशंसा में कथावाचक द्वारा कहा गया है। उसके बाद 1–8 अंकित पद्य श्रीमद्भगवद्गीता से चुने गए हैं।
या स्वयं पद्मनाभस्य मुखपद्माद्विनिःसृता ॥
दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः ।
वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते ॥ १ ॥
क्रोधाद्भवति सम्मोहः सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः ।
स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति ॥ २ ॥
तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया ।
उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः ॥ ३ ॥
श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः ।
ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति ॥ ४ ॥
अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च ।
निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी ॥ ५ ॥
सन्तुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चयः ।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्यो मद्भक्तः स मे प्रियः ॥ ६ ॥
यस्मान्नोद्विजते लोकः लोकान्नोद्विजते च यः ।
हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो यः स च मे प्रियः ॥ ७ ॥
अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत् ।
स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते ॥ ८ ॥
— श्रीमद्भगवद्गीता (चयनिताः श्लोकाः)
सार (Hindi Summary)
‘गीता सुगीता कर्तव्या’ पाठ का आरम्भ कुरुक्षेत्र में आयोजित श्रीगीता-जयन्ती-महोत्सव के एक रोचक प्रसंग से होता है। रमेश अपने पिता के साथ इस उत्सव में जाता है। वहाँ कथावाचक गीता के विषय में बताते हुए प्रसिद्ध श्लोक सुनाते हैं – “गीता का अच्छी प्रकार अध्ययन करना चाहिए, अन्य शास्त्रों के विस्तार से क्या लाभ; क्योंकि यह स्वयं भगवान् विष्णु के मुख-कमल से निःसृत हुई है।” यह सुनकर रमेश अपने पिता से पूछता है कि गीता क्या है और इसे ‘सुगीता’ (सुन्दर ढंग से अभ्यास योग्य) कैसे बनाया जाए।
पिता बताते हैं कि बहुत वर्ष पूर्व कुरुक्षेत्र में कौरवों एवं पाण्डवों के बीच महायुद्ध हुआ था। उस युद्ध में अपने सगे-सम्बन्धियों को देखकर अर्जुन युद्ध नहीं करना चाहता था। तब भगवान् श्रीकृष्ण ने युद्ध-विमुख अर्जुन को कर्तव्य-पालन का उपदेश दिया। श्रीकृष्ण का यही उपदेश श्रीमद्भगवद्गीता है, जिसमें अमृत के समान उपदेश भरे हैं। ‘गीता सुगीता कर्तव्या’ का आशय है कि गीता का सम्यक् अभ्यास करना चाहिए, उसे उत्तम भाव से पढ़ना चाहिए तथा कार्यक्षेत्र एवं जीवन-क्षेत्र में उसके उपदेशों का अनुपालन करना चाहिए।
पाठ में दिए गए आठ श्लोक गीता के अनेक जीवन-मूल्यों की शिक्षा देते हैं – जो मनुष्य दुःख में उद्विग्न नहीं होता तथा सुख में आसक्ति से रहित रहता है, वह स्थितप्रज्ञ मुनि कहलाता है। क्रोध से सम्मोह, सम्मोह से स्मृति-नाश, स्मृति-नाश से बुद्धि-नाश एवं अन्ततः विनाश होता है। ज्ञान प्रणाम, सेवा एवं विनम्र जिज्ञासा से तत्त्वदर्शी गुरु द्वारा प्राप्त होता है। श्रद्धालु एवं संयमी पुरुष ज्ञान प्राप्त कर शीघ्र परम शान्ति पाता है। जो किसी से द्वेष नहीं करता, सबका मित्र एवं दयालु है, ममता एवं अहंकार से रहित है, सुख-दुःख में समभाव रखता है तथा हर्ष-क्रोध-भय से मुक्त है, वही भगवान् का प्रिय भक्त है। अन्त में बताया गया है कि उद्वेग न करने वाला, सत्य, प्रिय एवं हितकर वचन तथा स्वाध्याय का अभ्यास ही ‘वाङ्मय तप’ कहलाता है। इस प्रकार पाठ हमें समता, संयम, ज्ञान, भक्ति एवं मधुर-वाणी का संदेश देता है।
आठों श्लोकों के हिन्दी भावार्थ — ClearStudy व्याख्या
- जो दुःख में व्याकुल नहीं होता, सुख में तृष्णा से मुक्त रहता और राग, भय तथा क्रोध से रहित है, उसे स्थिरबुद्धि मुनि कहा गया है।
- क्रोध से विवेक का भ्रम, उससे स्मृति-विभ्रम, फिर बुद्धि का नाश और अन्ततः पतन बताया गया है। यह नैतिक आत्मसंयम की शृंखला है।
- उस तत्त्वज्ञान को प्रणाम, जिज्ञासापूर्वक प्रश्न और सेवा से समझो; तत्त्वदर्शी ज्ञानी उसका उपदेश देंगे। परिप्रश्न में प्रश्न पूछना स्पष्ट रूप से शामिल है।
- श्रद्धा, तत्परता और इन्द्रिय-संयम वाला व्यक्ति ज्ञान प्राप्त करता है और ज्ञान के बाद शीघ्र परम शान्ति पाता है—यह श्लोक का आध्यात्मिक आदर्श है।
- किसी प्राणी से द्वेष न करना, मैत्री और करुणा रखना, ममत्व तथा अहंकार से मुक्त रहना, सुख-दुःख में समता और क्षमा रखना भक्त के गुण हैं।
- सदैव सन्तुष्ट, संयमी, दृढ़निश्चयी और मन-बुद्धि को भगवान् में अर्पित करने वाला भक्त श्रीकृष्ण को प्रिय कहा गया है।
- जिससे लोग उद्विग्न न हों और जो स्वयं भी लोगों से उद्विग्न न हो, तथा हर्ष, अमर्ष, भय और उद्वेग से मुक्त हो, वह प्रिय भक्त है।
- उद्वेग न करने वाली, सत्य, प्रिय और हितकर वाणी तथा स्वाध्याय का अभ्यास वाङ्मय तप कहलाते हैं। केवल मीठी बातें पर्याप्त नहीं; सत्य और हित भी आवश्यक हैं।
उपदेशों को धार्मिक–दार्शनिक साहित्य के संदर्भ में पढ़ें। क्रोध वाली शृंखला विवेक की हानि समझाने का नैतिक वर्णन है। शान्ति और ज्ञान यहाँ आध्यात्मिक आदर्श हैं।

शब्दार्थ (Word-meanings)
| शब्दः (Sanskrit) | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सुगीता | अच्छी तरह से गाई/अभ्यास की जाने वाली | Well sung / well practised |
| युद्धपराङ्मुखम् | युद्ध-विमुख | The war-averse |
| अमृततुल्याः | अमृत के समान, अति महत्त्वपूर्ण | Like nectar |
| अनुद्विग्नमनाः | अविचलित मन वाला | Of tranquil mind |
| विगतस्पृहः | आसक्ति रहित | Detached, free of craving |
| वीत-राग-भय-क्रोधः | वासना, भय और क्रोध से रहित | Free from attachment, fear and anger |
| स्थितधीः | स्थिर मन वाला | Steady-minded |
| मुनिः | तपस्वी, यति | The sage |
| सम्मोहः | कर्तव्य-अकर्तव्य का अविवेक | Delusion |
| स्मृतिविभ्रमः | स्मरणशक्ति का नाश होना | Loss of memory |
| श्रद्धावान् | श्रद्धा से युक्त | Devoted, faithful |
| संयतेन्द्रियः | संयमित इन्द्रियों वाला | One who has controlled his senses |
| प्रणिपातेन | प्रणाम के द्वारा | By bowing down / salutation |
| परिप्रश्नेन | विनम्र होकर पुनः-पुनः पूछने से | By questioning with humility |
| उपदेक्ष्यन्ति | उपदेश देंगे | They will preach |
| तत्त्वदर्शिनः | तत्त्वज्ञानी, सत्य के द्रष्टा | Those who have realized the Truth |
| विद्धि | तुम जानो | (Let you) know |
| अद्वेष्टा | द्वेष न करने वाला | One who never hates |
| निर्ममः | ममत्व-भावना से रहित | Free from the sense of ‘mine’ |
| समदुःखसुखः | सुख और दुःख में समान भाव वाला | Same in pain and pleasure |
| दृढनिश्चयः | दृढ़ निश्चय वाला | Firmly resolute / determined |
| उद्विजते | उद्विग्न होता है | Gets agitated |
| हर्षामर्षभयोद्वेगैः | हर्ष, क्रोध, भय और चिन्ता से | From joy, impatience, fear and anxiety |
| अनुद्वेगकरम् | व्याकुलता न करने वाला | Unoffending / non-agitating |
| वाङ्मयम् | वाचिक (वाणी सम्बन्धी) | Verbal (penance) |
अभ्यासः (अभ्यासात् जायते सिद्धिः)
1. अधोलिखितानां प्रश्नानाम् एकपदेन उत्तरं लिखत —
(क) श्रद्धावान् जनः किं लभते ?
(ख) कस्मात् सम्मोहः जायते ?
(ग) सम्मोहात् किं जायते ?
(घ) अर्जुनाय गीतां कः उपदिष्टवान् ?
(ङ) हर्षामर्षभयोद्वेगैः मुक्तः नरः कस्य प्रियः भवति ?
2. पूर्णवाक्येन उत्तरं लिखत —
(क) कीदृशं वाक्यं वाङ्मयं तपः उच्यते ?
(ख) कीदृशः जनः स्थितधीः उच्यते ?
(ग) जनः कथं प्रणश्यति ?
(घ) जनः कथम् उत्तमां शान्तिं प्राप्नोति ?
(ङ) उपदेशप्राप्तये त्रयः उपायाः के भवन्ति ?
3. कोष्ठके दत्तानि पदानि उपयुज्य वाक्यानि रचयत —
शब्द-मञ्जूषा: सेवया, स्मृतिविभ्रमः, योगी, वाङ्मयं, स्थितधीः
4. अधोलिखितानि पदानि उपयुज्य वाक्यानि रचयत —
(दिए गए पदों का प्रयोग कर शुद्ध वाक्य बनाइए। नमूना उत्तर नीचे हैं।)
| पदम् | वाक्यम् (नमूना उत्तर) |
|---|---|
| (क) उच्यते | सत्यवादी जनः सज्जनः उच्यते। |
| (ख) च | रामः लक्ष्मणः च वनं गच्छतः। |
| (ग) न | सः क्रोधं न करोति। |
| (घ) लब्ध्वा | ज्ञानं लब्ध्वा मनुष्यः शान्तिं प्राप्नोति। |
| (ङ) कुर्यात् | छात्रः नित्यम् अभ्यासं कुर्यात्। |
(मूल पुस्तक में अन्तिम दो उपखण्ड दोनों ‘ङ’ अंकित हैं; यहाँ स्पष्टता हेतु (घ) लब्ध्वा एवं (ङ) कुर्यात् रखा गया है।)
5. पाठानुसारं समुचितेन पदेन श्लोकं पूरयत —
6. उदाहरणानुसारं पदानि स्त्रीलिङ्गे परिवर्तयत —
उदाहरणम् – श्रद्धावान् → श्रद्धावती; बुद्धिमान् → बुद्धिमती।
| पुंल्लिङ्गम् | स्त्रीलिङ्गम् (उत्तर) |
|---|---|
| (क) गुणवान् | गुणवती |
| (ख) आयुष्मान् | आयुष्मती |
| (ग) क्षमावान् | क्षमावती |
| (घ) ज्ञानवान् | ज्ञानवती |
| (ङ) श्रीमान् | श्रीमती |
7. समुचितेन पदेन सह स्तम्भौ मेलयत —
| स्तम्भः ‘अ’ | स्तम्भः ‘इ’ (दत्त-विकल्पाः) |
|---|---|
| (क) सर्वभूतानाम् | पुनः पुनः प्रश्नकरणेन |
| (ख) अनुद्विग्नमनाः | स्थिरमतिमान् |
| (ग) स्थितधीः | इन्द्रियसंयमी |
| (घ) परिप्रश्नेन | यस्य मनः विचलितं न भवति |
| (ङ) संयतेन्द्रियः | सर्वेषां प्राणिनाम् |
8. श्रीमद्भगवद्गीतायाः विषये पञ्च वाक्यानि लिखत —
अत्र इदम् अवधेयम् (व्याकरण-तालिकाः)
पाठ में ‘अत्र इदम् अवधेयम्’ के अन्तर्गत विभक्ति-प्रयोग सम्बन्धी निम्नलिखित व्याकरण-बिन्दु दिए गए हैं, जिन्हें ध्यानपूर्वक समझना आवश्यक है।
1. आधार-अर्थे सप्तमी-विभक्तिः
जहाँ क्रिया या स्थिति का आधार (स्थान/अवसर) बताया जाता है, वहाँ सप्तमी विभक्ति (में/पर) का प्रयोग होता है।
| उदाहरणम् | आधार-पदम् (सप्तमी) |
|---|---|
| उत्पीठिकायां पुस्तकम् अस्ति। | उत्पीठिकायाम् |
| दुःखेषु अनुद्विग्नमनाः भवेत्। | दुःखेषु |
| सुखेषु विगतस्पृहः भवेत्। | सुखेषु |
2. उत्पत्ति/कारण-अर्थे पञ्चमी-विभक्तिः
जहाँ किसी वस्तु की उत्पत्ति अथवा कारण (से/के कारण) बताया जाता है, वहाँ पञ्चमी विभक्ति का प्रयोग होता है।
| उदाहरणम् | कारण-पदम् (पञ्चमी) |
|---|---|
| क्रोधात् सम्मोहः भवति। | क्रोधात् |
| सम्मोहात् स्मृतिविभ्रमः भवति। | सम्मोहात् |
| स्मृतिभ्रंशात् बुद्धिनाशः भवति। | स्मृतिभ्रंशात् |
योग्यताविस्तरः & परियोजनाकार्यम्
योग्यताविस्तरः (ज्ञान-विस्तार) – श्रीमद्भगवद्गीता
श्रीमद्भगवद्गीता भगवान् श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को प्रदत्त जीवन-मूल्य सम्बन्धी उपदेशों का सङ्कलनात्मक ग्रन्थ है। महर्षि वेदव्यास ने महाभारत के भीष्मपर्व में इसका वर्णन किया है। गीता में अठारह अध्याय एवं सात सौ (७००) श्लोक हैं।
| अध्यायः | नाम (विषयः) |
|---|---|
| १. | अर्जुनविषादयोगः (सैन्य-निरीक्षणम्) |
| २. | साङ्ख्ययोगः (गीतायाः सारः) |
| ३. | कर्मयोगः (कर्मणः महत्त्वम्) |
| ४. | ज्ञान-कर्म-संन्यासयोगः (दिव्यज्ञानम्) |
| ५. | कर्मसंन्यासयोगः (कर्म-वैराग्य-योगः) |
| ६. | आत्मसंयमयोगः (ध्यान-योगः) |
| ७. | ज्ञान-विज्ञानयोगः (भगवद्ज्ञानस्य प्राप्तिः) |
| ८. | अक्षर-ब्रह्मयोगः (भगवतः प्राप्तिः) |
| ९. | राजविद्या-राजगुह्ययोगः (परमं गुप्तं ज्ञानम्) |
| १०. | विभूतियोगः (भगवतः ऐश्वर्यम्) |
| ११. | विश्वरूप-दर्शनयोगः (विश्वरूपस्य दर्शनम्) |
| १२. | भक्तियोगः (भक्तिभावज्ञानम्) |
| १३. | क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ-विभागयोगः (प्रकृतेः पुरुषस्य चेतनायाः च ज्ञानम्) |
| १४. | गुणत्रय-विभागयोगः (प्रकृतेः गुणत्रयस्य वर्णनम्) |
| १५. | पुरुषोत्तमयोगः (विश्वस्य केन्द्ररूपेण ब्रह्मणः वर्णनम्) |
| १६. | दैवासुर-सम्पद्विभागयोगः (दैवी-आसुरी-स्वभावानां वर्णनम्) |
| १७. | श्रद्धात्रय-विभागयोगः (श्रद्धायाः विभागानां वर्णनम्) |
| १८. | मोक्ष-संन्यासयोगः (उपसंहारः, संन्यास-सिद्धि-वर्णनम्) |
भगवद्गीता किञ्चिदधीता, गङ्गा-जल-लव-कणिका पीता ।
सकृदपि येन मुरारि समर्चा, तस्य यमः किं कुरुते चर्चाम् ॥
कर्तव्यदीक्षां च समत्वशिक्षां, ज्ञानस्य भिक्षां शरणागतिञ्च ।
ददाति गीता करुणार्द्रभूता, कृष्णेन दत्ता जगतां हिताय ॥
परियोजनाकार्यम् (Project Work)
1. कक्षायां श्रीमद्भगवद्गीतानुगुणं ‘स्थितधीः’ इति विषयम् अधिकृत्य ‘मम जीवनलक्ष्यम्’ इत्यस्मिन् विषये परिचर्चां स्थापयतु।
2. विविध-धर्माणां धर्मग्रन्थानां नामानि विलिख्य कस्यचित् एकस्य धर्मग्रन्थस्य विवरणं लिखत।
नीचे के अतिरिक्त प्रश्न, MCQ और अभिकथन-कारण ClearStudy के अभ्यास हैं।
अतिरिक्त प्रश्न (Extra Questions)
अतिरिक्त लघु प्रश्न — ClearStudy अभ्यास
1. ‘गीता सुगीता कर्तव्या’ इत्यस्य कः आशयः ?
2. अर्जुनः युद्धं कर्तुं किमर्थं न इच्छति स्म ?
3. क्रोध से किस प्रकार मनुष्य का विनाश होता है ?
4. भगवान् का प्रिय भक्त कैसा होता है ?
5. ‘वाङ्मय तप’ क्या है ?
अतिरिक्त व्याख्यात्मक प्रश्न — ClearStudy अभ्यास
6. स्थितप्रज्ञ (स्थितधीः) पुरुष के लक्षणों का वर्णन कीजिए।
7. ज्ञान-प्राप्ति के लिए गीता ने कौन-से उपाय बताए हैं ? समझाइए।
8. श्रीमद्भगवद्गीता का संक्षिप्त परिचय दीजिए।
MCQ & अभिकथन-कारण
1. यह पाठ किस ग्रन्थ से संकलित है?
(क) रामायणात्
(ख) श्रीमद्भगवद्गीतायाः
(ग) उपनिषदः
(घ) पुराणात्
2. श्रीमद्भगवद्गीता में कितने अध्याय हैं?
(क) सोलह
(ख) सत्रह
(ग) अठारह
(घ) बीस
3. अर्जुन को गीता का उपदेश किसने दिया?
(क) वेदव्यासः
(ख) श्रीकृष्णः
(ग) भीष्मः
(घ) सञ्जयः
4. ‘क्रोधात्’ से सर्वप्रथम क्या उत्पन्न होता है?
(क) बुद्धिनाशः
(ख) स्मृतिविभ्रमः
(ग) सम्मोहः
(घ) ज्ञानम्
5. स्थिर बुद्धि वाला मुनि क्या कहलाता है?
(क) योगी
(ख) स्थितधीः
(ग) तत्त्वदर्शी
(घ) श्रद्धावान्
6. ज्ञान प्राप्त करने के तीन उपाय कौन-से हैं?
(क) धन, बल, यश
(ख) प्रणिपात, परिप्रश्न, सेवा
(ग) क्रोध, भय, राग
(घ) हर्ष, अमर्ष, उद्वेग
7. श्रद्धावान् एवं संयमी पुरुष ज्ञान पाकर शीघ्र क्या प्राप्त करता है?
(क) धनम्
(ख) परां शान्तिम्
(ग) यशः
(घ) राज्यम्
8. ‘निर्ममः’ शब्द का अर्थ है—
(क) अहंकारी
(ख) ममत्व-भावना से रहित
(ग) क्रोधी
(घ) दयालु
9. वाणी-सम्बन्धी तप को क्या कहते हैं?
(क) कायिक तप
(ख) मानस तप
(ग) वाङ्मय तप
(घ) यज्ञ तप
10. श्रीमद्भगवद्गीता महाभारत के किस पर्व में वर्णित है?
(क) आदिपर्वणि
(ख) भीष्मपर्वणि
(ग) शान्तिपर्वणि
(घ) द्रोणपर्वणि
अभिकथन-कारण – नीचे अभिकथन (A) और कारण (R) दिए गए हैं। सही विकल्प चुनिए—
(क) A और R दोनों सही, R, A की सही व्याख्या है। (ख) A और R दोनों सही, पर R, A की सही व्याख्या नहीं। (ग) A सही, R गलत। (घ) A गलत, R सही।
1. अभिकथन (A): ‘गीता सुगीता कर्तव्या’ पाठ श्रीमद्भगवद्गीता के श्लोकों पर आधारित है।
कारण (R): यह पाठ गीता के चुने हुए आठ श्लोकों के माध्यम से स्थितप्रज्ञता, ज्ञान एवं भक्ति की शिक्षा देता है।
2. अभिकथन (A): क्रोध से अन्ततः मनुष्य का विनाश होता है।
कारण (R): क्रोध से सम्मोह, सम्मोह से स्मृति-नाश, स्मृति-नाश से बुद्धि-नाश एवं बुद्धि-नाश से विनाश होता है।
3. अभिकथन (A): ज्ञान केवल धन एवं बल से प्राप्त होता है।
कारण (R): गीता के अनुसार ज्ञान प्रणिपात, परिप्रश्न एवं सेवा से तत्त्वदर्शी गुरु द्वारा प्राप्त होता है।
4. अभिकथन (A): स्थितप्रज्ञ पुरुष सुख-दुःख में समभाव रखता है।
कारण (R): वह राग, भय एवं क्रोध से मुक्त रहता है तथा किसी भी परिस्थिति में विचलित नहीं होता।
5. अभिकथन (A): उद्वेग न करने वाला, सत्य, प्रिय एवं हितकर वचन वाङ्मय तप कहलाता है।
कारण (R): स्वाध्याय एवं अभ्यास भी वाणी-सम्बन्धी तप का अंग माने गए हैं।
परीक्षा-सुझाव एवं सामान्य त्रुटियाँ
परीक्षा-सुझाव (Exam Tips)
- आठों श्लोक कण्ठस्थ करें – अभ्यास 5 की श्लोक-पूर्ति इनके आधार पर करें।
- शब्दार्थ (स्थितधीः, सम्मोहः, प्रणिपातेन, निर्ममः, वाङ्मयम् आदि) हिन्दी एवं अंग्रेज़ी दोनों में याद रखें।
- क्रोध से विनाश तक की शृंखला (क्रोध → सम्मोह → स्मृतिविभ्रम → बुद्धिनाश → विनाश) क्रम सहित याद करें।
- सप्तमी (आधार) एवं पञ्चमी (कारण/उत्पत्ति) विभक्ति के नियम उदाहरण सहित याद रखें।
- ‘एकपदेन’ वाले प्रश्नों में केवल एक पद लिखें तथा ‘पूर्णवाक्येन’ वाले में पूरा वाक्य।
सामान्य त्रुटियाँ (Common Mistakes)
- क्रोध-शृंखला का क्रम उलट देना – पहले सम्मोह, फिर स्मृतिविभ्रम, फिर बुद्धिनाश आता है।
- ज्ञान-प्राप्ति के तीन उपायों में से कोई एक भूल जाना – प्रणिपात, परिप्रश्न एवं सेवा तीनों लिखें।
- विभक्ति की भूल – आधार में सप्तमी (दुःखेषु) एवं कारण में पञ्चमी (क्रोधात्) का प्रयोग करें।
- स्त्रीलिङ्ग बनाते समय ‘वान्’ → ‘वती’ (श्रद्धावान् → श्रद्धावती) न करना।
- गीता का पर्व/रचयिता गलत बताना – यह महाभारत के भीष्मपर्व में है, इसे वेदव्यास ने वर्णित किया।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
दीपकम् कक्षा 8 का पाँचवाँ पाठ ‘गीता सुगीता कर्तव्या’ किस ग्रन्थ से लिया गया है?
यह पाठ श्रीमद्भगवद्गीता के आठ चुने हुए श्लोकों पर आधारित है। श्रीमद्भगवद्गीता महाभारत के भीष्मपर्व का अंश है, जिसे महर्षि वेदव्यास ने वर्णित किया तथा इसमें १८ अध्याय एवं ७०० श्लोक हैं।
‘गीता सुगीता कर्तव्या’ का अर्थ क्या है?
इसका अर्थ है कि गीता का सम्यक् अभ्यास एवं उत्तम भाव से अध्ययन करना चाहिए तथा कार्यक्षेत्र एवं जीवन-क्षेत्र में उसके उपदेशों का पालन करना चाहिए।
स्थितप्रज्ञ (स्थितधीः) पुरुष कौन होता है?
जो मनुष्य दुःख में उद्विग्न नहीं होता, सुख में आसक्ति नहीं रखता तथा राग, भय एवं क्रोध से मुक्त रहकर सुख-दुःख में समभाव रखता है, वही स्थितप्रज्ञ (स्थितधीः) मुनि कहलाता है।
पाठ्यपुस्तक संदर्भ: NCERT दीपकम्, कक्षा 8, पाठ 5, पृष्ठ 49–60; उपलब्ध प्रति का पुनर्मुद्रण 2026–27। उत्तर और व्याख्याएँ ClearStudy की मौलिक शिक्षण सामग्री हैं; खुली गतिविधियों के उत्तर नमूने हैं। आधिकारिक NCERT पुस्तक पोर्टल।
