Class 8 Sanskrit Deepakam Chapter 9 Solutions (NCERT 2026–27) – कोऽरुक् ? कोऽरुक् ? कोऽरुक् ?

This page gives the complete solution for Class 8 Sanskrit Deepakam (दीपकम्) Chapter 9 ‘कोऽरुक् ? कोऽरुक् ? कोऽरुक् ?’ – the story of आचार्य वाग्भट and भगवान् धन्वन्तरि (in the form of a parrot) teaching the आयुर्वेदिक secret of health – हितभुक्, मितभुक्, ऋतुभुक्. You get the पाठ-परिचय/प्रसंग, सार (Hindi summary), शब्दार्थ table, original exam-ready answers to every question of the अभ्यास (अभ्यासात् जायते सिद्धिः), the श्लोक पदच्छेद-अन्वय-भावार्थ of योग्यताविस्तरः, extra questions, MCQs, अभिकथन-कारण and FAQs.

Class: 8 Subject: Sanskrit Book: Deepakam (दीपकम्) Chapter: 9 पाठ: कोऽरुक् ? कोऽरुक् ? कोऽरुक् ? Session: 2026–27

पाठ का अवलोकन (Chapter Overview)

दीपकम् कक्षा 8 का नवम पाठ ‘कोऽरुक् ? कोऽरुक् ? कोऽरुक् ?’ एक रोचक कथा के माध्यम से आयुर्वेद के आहार-नियमों की शिक्षा देता है। पाठ का आरम्भ माता एवं पुत्र के एक संवाद से होता है, जिसमें माता पुत्र को अत्युष्ण भोजन तुरन्त न देने का कारण आयुर्वेद के उपदेश से बताती है। इसी प्रसंग से शिक्षक आहार-सम्बन्धी एक रोचक कथा सुनाते हैं – भगवान् धन्वन्तरि शुक (तोते) का रूप धारण कर उत्तम वैद्य की खोज में ‘कोऽरुक्’ (कौन नीरोग है?) पूछते हुए घूमते हैं। केवल आचार्य वाग्भट ही इसका सटीक उत्तर देते हैं – ‘हितभुक्, मितभुक्, ऋतुभुक्’ अर्थात् जो हितकर, सीमित एवं ऋतु के अनुकूल भोजन करता है, वही सदा स्वस्थ रहता है। पाठ का केन्द्रीय भाव है – संयमित, सात्त्विक एवं ऋतु के अनुकूल आहार ही उत्तम स्वास्थ्य का आधार है।

पाठ-परिचय / प्रसंग

यह पाठ आयुर्वेद की प्रसिद्ध परम्परा एवं चरकसंहिता के श्लोकों पर आधारित एक कथात्मक पाठ है। इसमें भगवान् धन्वन्तरि (आयुर्वेद के देवता) एवं प्रसिद्ध वैद्य वाग्भट का प्रसंग दिया गया है। ‘कोऽरुक्’ का संधि-विच्छेद है – कः + अरुक्, अर्थात् ‘कौन रोगरहित (नीरोग/स्वस्थ) है?’। पाठ में हितभुक्-मितभुक्-ऋतुभुक् की व्याख्या के लिए चरकसंहिता के श्लोक तथा सात्त्विक-राजसिक-तामसिक आहार के लिए श्रीमद्भगवद्गीता के श्लोक उद्धृत किए गए हैं। पाठ का उद्देश्य विद्यार्थियों को संतुलित आहार एवं स्वस्थ जीवनशैली की प्रेरणा देना है।

सार (Hindi Summary)

पाठ का आरम्भ एक घरेलू संवाद से होता है। एक बालक भूख से व्याकुल होकर माता से शीघ्र भोजन परोसने का आग्रह करता है, किन्तु माता उसे अत्युष्ण (बहुत गरम) भोजन तुरन्त नहीं देती, क्योंकि ‘अत्युष्णं भोजनं हितकरं न भवति’ – यह आयुर्वेद का उपदेश है। इसी प्रसंग पर शिक्षक आहार से सम्बन्धित एक रोचक कथा सुनाते हैं।

भारतवर्ष के वैद्य विभिन्न व्याधियों का शमन कैसे करते हैं – यह जानने के लिए भगवान् धन्वन्तरि एक मनोहर शुक (तोते) का रूप धारण कर गाँव-गाँव घूमने लगे। वे अनेक प्रसिद्ध वैद्यों के भवनों के पास वृक्ष पर बैठकर मधुर स्वर में ‘कोऽरुक्, कोऽरुक्, कोऽरुक्’ (कौन नीरोग है?) पुकारते, किन्तु किसी ने भी इस प्रश्न पर ध्यान नहीं दिया। अन्त में वे वैद्य वाग्भट की कुटिया के समीप पहुँचे और प्रांगण के पुष्पवृक्ष पर बैठकर वही ध्वनि की। चिकित्सा में निरत वाग्भट मधुर वाणी सुनकर बाहर आए और शुक को देखकर समझ गए कि यह कोई साधारण पक्षी नहीं, अपितु कोई देवविशेष है।

वाग्भट ने शुक को फल दिए, परन्तु उसने तब तक फल नहीं खाए जब तक उसके प्रश्न का उत्तर न मिला। तब वाग्भट ने सूत्ररूप में तीन उत्तर दिए – ‘हितभुक्, मितभुक्, ऋतुभुक्’ अर्थात् जो हितकर, सीमित मात्रा में एवं ऋतु के अनुकूल भोजन करता है, वही सदा स्वस्थ रहता है। उत्तर सुनकर प्रसन्न होकर शुक ने फल खाए। तत्पश्चात् शुकरूपी धन्वन्तरि ने अपना वास्तविक रूप प्रकट किया, वाग्भट के उत्कृष्ट आयुर्वेद-ज्ञान की प्रशंसा की और उन्हें अष्टाङ्ग-आयुर्वेद का सारभूत ग्रन्थ रचने का आशीर्वाद देकर अन्तर्धान हो गए। तब वाग्भट ने शिष्यों को चरकसंहिता के श्लोकों द्वारा हितभुक्, मितभुक् एवं ऋतुभुक् का अर्थ समझाया तथा प्रतिदिन व्यायाम, दन्तशोधन, स्वच्छ जल से स्नान एवं भूख लगने पर भोजन का महत्त्व बताया और ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ की मंगलकामना की। इस प्रकार यह पाठ संतुलित आहार एवं स्वस्थ जीवनशैली की प्रेरणा देता है।

शब्दार्थ (Word-meanings)

शब्दः (Sanskrit)हिन्दी अर्थEnglish meaning
अरुक्नीरोग, स्वस्थOne who is not sick
निरामयाःनीरोगीFree from disease
झटितिशीघ्र, तत्कालQuickly / at once
हितभुक्हितकर भोजन करने वालाOne who eats nutritious/beneficial food
मितभुक्सीमित मात्रा में भोजन करने वालाOne who eats in limited quantity
ऋतुभुक्ऋतु के अनुकूल भोजन करने वालाOne who eats food suited to the season
शुकरूपम्तोते का रूपThe form of a parrot
अभ्रमत्घूमाWandered / roamed
कुटीरसमीपम्कुटिया के पासNear the hut
प्राङ्गणम्आँगन, प्रांगणCourtyard
विस्मितःआश्चर्यचकितAstonished
समर्पितवान्अर्पित किया, दियाOffered
अन्तर्हितःअन्तर्धान हो गयाDisappeared
व्याधीनाम्रोगों काOf diseases
प्रयुञ्जीतप्रयोग करेShould use / employ
अनुवर्ततेअनुसरण करता है, बना रहता हैFollows / is maintained
अजातानाम्जो उत्पन्न नहीं हुए, उनकाOf those (disorders) not yet arisen
गुरूणाम्गरिष्ठ (भारी) पदार्थों काOf heavy foods
लघूनाम्हल्के (सुपाच्य) पदार्थों काOf light foods
बुभुक्षायाम्भूख लगने परOn feeling hungry
दन्तविशोधनम्दाँतों की सफाईCleaning of the teeth

अभ्यासः (अभ्यासात् जायते सिद्धिः)

1. अधोलिखितान् प्रश्नान् एकपदेन उत्तरत —

(क) शुकरूपं कः धृतवान् ?

उत्तरधन्वन्तरिः (भगवान् धन्वन्तरिः) ।

(ख) धन्वन्तरिः (शुकः) कुत्र उपविश्य ध्वनिम् अकरोत् ?

उत्तरवृक्षे (वैद्यानां भवनपार्श्वस्थे/पुष्पतरौ) ।

(ग) अन्ते शुकः कस्य आश्रमस्य समीपं गतवान् ?

उत्तरवाग्भटस्य (वैद्यस्य वाग्भटस्य) ।

(घ) ऋतवः कति सन्ति ?

उत्तरषट् (षट् ऋतवः सन्ति) ।

(ङ) वाग्भटः शुकस्य रहस्यं केभ्यः उक्तवान् ?

उत्तरशिष्येभ्यः (छात्रेभ्यः) ।

2. पट्टिकातः उचितानि पदानि चित्वा रिक्तस्थानानि पूरयत —

पट्टिका (शब्द-मञ्जूषा): चरकस्य, कुटीरसमीपं, भारतवर्षे, आयुर्वेदज्ञानेन, अतिमात्रं

उत्तर (क) भारतवर्षे जनाः कथं निरामयाः भवन्ति ? (ख) अन्ते सः वैद्यस्य वाग्भटस्य कुटीरसमीपं गतवान् । (ग) तव उत्कृष्टेन आयुर्वेदज्ञानेन अहम् अतीव सन्तुष्टः अस्मि । (घ) महर्षेः चरकस्य नाम भवन्तः श्रुतवन्तः स्युः । (ङ) लघुद्रव्याणि अतिमात्रं सेवनेन हानिकराणि जायन्ते ।

3. अधोलिखितानां प्रश्नानां पूर्णवाक्येन उत्तराणि लिखत —

(क) मधुरां वाणीं श्रुत्वा चिकित्सानिरतः वाग्भटः किम् अकरोत् ?

उत्तरमधुरां वाणीं श्रुत्वा चिकित्सानिरतः वाग्भटः प्राङ्गणम् आगत्य सर्वासु दिक्षु अपश्यत्

(ख) वाग्भटः झटिति किम् अकरोत् ?

उत्तरवाग्भटः झटिति तस्मै विहगाय (शुकाय) मधुराणि फलानि समर्पितवान्

(ग) छात्राः पुनः जिज्ञासया आचार्यं किम् अपृच्छन् ?

उत्तरछात्राः पुनः जिज्ञासया आचार्यम् अपृच्छन् – “आचार्य ! ‘हितभुक्, मितभुक्, ऋतुभुक्’ इति एतेषां कः आशयः ?”

(घ) भगवान् धन्वन्तरिः अस्माकं कृते संक्षेपेण किं प्रदत्तवान् ?

उत्तरभगवान् धन्वन्तरिः अस्माकं कृते संक्षेपेण स्वास्थ्यरक्षणाय सूत्ररूपेण सन्देशं प्रदत्तवान्

(ङ) ऋषयः नित्यं कां प्रार्थनां कुर्वन्ति ?

उत्तरऋषयः नित्यं ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः’ इति प्रार्थनां कुर्वन्ति ।

4. पाठात् यथोचितानि विशेषणपदानि विशेष्यपदानि वा चित्वा रिक्तस्थानानि पूरयत —

(पाठ से उपयुक्त विशेषण-पद अथवा विशेष्य-पद चुनकर रिक्त स्थान भरिए।)

विशेषणम्विशेष्यम्
विभिन्नानाम्व्याधीनाम्
मनोहरम्शुकम्
विशालेप्राङ्गणे
मधुराम्वाणीम्
लौकिकःखगः
मधुराणिफलानि
समुचितम्उत्तरम्
उत्तमस्यवैद्यस्य
प्रियशिष्याः
सात्त्विकम्भोजनम्
उत्तमाःवैद्याः

(पाठ के आधार पर उपयुक्त मिलान; रिक्त स्थानों में भरे गए पद मोटे अक्षरों में हैं। विद्यालय/शिक्षक के मार्गदर्शन में अन्य समानार्थक विशेषण-पद भी मान्य हो सकते हैं।)

5. पाठं पठित्वा अधोलिखितपट्टिकातः पदानि चित्वा उचितसञ्चिकायां पूरयत —

पट्टिका: लौकिकः, व्याधीनाम्, देवः, वृक्षे, त्रीणि, उत्तमस्य, वाणीम्, विस्मितः, मधुरया, प्रश्नान्, पूज्यः, खगः, विशाले, शुकम्, वाग्भटः

विशेषणपदानिविशेष्यपदानि
लौकिकःव्याधीनाम्
उत्तमस्यदेवः
विस्मितःवृक्षे
मधुरयात्रीणि
पूज्यःवाणीम्
विशालेप्रश्नान्
 खगः
 शुकम्
 वाग्भटः

(विशेषणपदानि – वे पद जो किसी की विशेषता बताते हैं; विशेष्यपदानि – जिनकी विशेषता बताई जाती है। संज्ञावाचक/मूल पद विशेष्य की सञ्चिका में रखे जाते हैं।)

6. अधोलिखितानि वाक्यानि पठित्वा तेन सम्बद्धं श्लोकं पाठात् चित्वा लिखत —

(क) अस्माभिः नित्यं व्यायामः, स्नानं, दन्तधावनं, बुभुक्षायाञ्च भोजनं कर्तव्यम् ।

सम्बद्धः श्लोकःव्यायामः प्रातरुत्थाय, नित्यं दन्तविशोधनम् ।
स्वच्छजलेन सुस्नानं, बुभुक्षायाञ्च भोजनम् ॥ ४ ॥

(ख) अस्माभिः हितकरः आहारः सेवनीयः येन विकाराणां शमनं स्वास्थ्यस्य च रक्षणं भवेत् ।

सम्बद्धः श्लोकःतच्च नित्यं प्रयुञ्जीत स्वास्थ्यं येनानुवर्तते ।
अजातानां विकाराणामनुत्पत्तिकरं च यत् ॥ १ ॥

(ग) ऋतोः अनुसारं भोजनेन बलस्य वर्णस्य च अभिवृद्धिः भवति ।

सम्बद्धः श्लोकःतस्याशिताद्यादाहारात् बलं वर्णश्च वर्धते ।
तस्यर्तुसात्म्यं विदितं चेष्टाहारव्यपाश्रयम् ॥ ३ ॥

योग्यताविस्तरः (श्लोक-भावार्थ) & परियोजनाकार्यम्

पाठ के ‘योग्यताविस्तरः’ भाग में चरकसंहिता के श्लोकों का पदच्छेद, अन्वय एवं भावार्थ, चरकसंहिता का परिचय, श्रीमद्भगवद्गीता के आधार पर सात्त्विक-राजसिक-तामसिक आहार तथा कुछ आहार-विषयक सूक्तियाँ दी गई हैं।

(क) श्लोकानां पदच्छेदः, अन्वयः, भावार्थः च

तच्च नित्यं प्रयुञ्जीत, स्वास्थ्यं येनानुवर्तते ।
अजातानां विकाराणामनुत्पत्तिकरं च यत् ॥ १ ॥ — चरकसंहिता (हितभुक्)
भावार्थःपदच्छेदः – तत् च नित्यम् प्रयुञ्जीत स्वास्थ्यम् येन अनुवर्तते, अजातानाम् विकाराणाम् अनुत्पत्तिकरम् च यत् ।भावार्थः – जिस आहार के सेवन से स्वास्थ्य की रक्षा हो तथा जो अनुत्पन्न (अभी न उपजे) रोगों को उत्पन्न न होने दे, ऐसे हितकर आहार का ही नित्य सेवन करना चाहिए। यही ‘हितभुक्’ का तात्पर्य है।
अल्पादाने गुरूणां च लघूनां चातिसेवने ।
मात्राकारणमुद्दिष्टं द्रव्याणां गुरुलाघवे ॥ २ ॥ — चरकसंहिता (मितभुक्)
भावार्थःपदच्छेदः – अल्पादाने गुरूणाम् च लघूनाम् च अतिसेवने मात्राकारणम् उद्दिष्टम् द्रव्याणाम् गुरुलाघवे ।भावार्थः – गरिष्ठ (भारी) पदार्थ भी अल्प मात्रा में सेवन करने से सुपाच्य हो जाते हैं, और हल्के पदार्थ भी अधिक मात्रा में सेवन करने पर हानिकारक हो जाते हैं। अतः मात्रा (परिमाण) के अनुसार ही भोजन करना चाहिए। यही ‘मितभुक्’ है।
तस्याशिताद्यादाहारात् बलं वर्णश्च वर्धते ।
तस्यर्तुसात्म्यं विदितं चेष्टाहारव्यपाश्रयम् ॥ ३ ॥ — चरकसंहिता (ऋतुभुक्)
भावार्थःपदच्छेदः – तस्य अशिताद्यात् आहारात् बलम् वर्णः च वर्धते, तस्य ऋतुसात्म्यम् विदितम्, चेष्टा-आहार-व्यपाश्रयम् ।भावार्थः – ग्रीष्म, वर्षा, शरद्, शिशिर, हेमन्त एवं वसन्त – ये छह ऋतुएँ हैं। जो मनुष्य ऋतु के अनुकूल स्वास्थ्यप्रद आहार करना जानता है तथा उसी के अनुसार आचरण करता है, उसका खाया-पिया सब बलवर्धक, वर्ण-कान्ति बढ़ाने वाला, सुखवर्धक एवं आयुवर्धक होता है। यही ‘ऋतुभुक्’ का भाव है।
व्यायामः प्रातरुत्थाय, नित्यं दन्तविशोधनम् ।
स्वच्छजलेन सुस्नानं, बुभुक्षायाञ्च भोजनम् ॥ ४ ॥ — स्वास्थ्य-सूत्र
भावार्थःपदच्छेदः – व्यायामः प्रातः उत्थाय नित्यम् दन्तविशोधनम् स्वच्छजलेन सुस्नानम् बुभुक्षायाम् च भोजनम् ।भावार्थः – प्रतिदिन प्रातः उठकर व्यायाम करना चाहिए, फिर भली प्रकार दन्तशोधन (दाँतों की सफाई) करना चाहिए, स्वच्छ जल से उत्तम स्नान करना चाहिए, और जब भूख लगे तभी हितकर, स्वल्प एवं ऋतु-अनुकूल भोजन करना चाहिए।
सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः ।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुःखभाग्भवेत् ॥ ५ ॥ — मङ्गल-प्रार्थना
भावार्थःपदच्छेदः – सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुःखभाग् भवेत् ।भावार्थः – संसार में सभी सुखी हों, सभी नीरोग हों, सभी कल्याण (मंगल) देखें तथा कोई भी दुःख का भागी न हो। यह सबके कल्याण की उदात्त मंगलकामना है।

(ख) चरकसंहितायाः परिचयः

महर्षि चरक ने चरकसंहिता ग्रन्थ की रचना की। यह आयुर्वेद का एक प्रमुख ग्रन्थ है। इस ग्रन्थ में आठ स्थान हैं – सूत्रस्थान, निदानस्थान, विमानस्थान, शरीरस्थान, इन्द्रियस्थान, चिकित्सास्थान, कल्पस्थान एवं सिद्धिस्थान। इसमें केवल रोगों की चिकित्सा ही नहीं, अपितु स्वास्थ्य के संरक्षण एवं आयु की वृद्धि के उपाय भी बताए गए हैं।

(ग) आहार-परिचयः (श्रीमद्भगवद्गीता)

आहार-प्रकारःभावार्थः (संक्षेप)
सात्त्विकः आहारः
(गीता १७/८)
जो आहार आयु, बुद्धि, बल एवं आरोग्य बढ़ाने वाले, रसयुक्त, स्निग्ध, स्थिर एवं हृदय को प्रिय होते हैं, वे सात्त्विक आहार हैं। आरोग्य के लिए सात्त्विक आहार ही सेवनीय है।
राजसिकः आहारः
(गीता १७/९)
अति कटु, अम्ल, लवण, उष्ण, तीक्ष्ण, रूक्ष एवं विदाही आहार राजसिक है। इसके सेवन से अनेक व्याधियाँ, दुःख एवं शोक होते हैं; अतः विद्यार्थी को इससे बचना चाहिए।
तामसिकः आहारः
(गीता १७/१०)
एक प्रहर पूर्व बना, रसहीन, दुर्गन्धयुक्त, बासी, जूठा एवं अपवित्र भोजन तामसिक है। इससे निद्रा, तन्द्रा एवं आलस्य बढ़ते हैं; अतः विद्यार्थी को इसका त्याग करना चाहिए।

परियोजनाकार्यम् (Project Work)

1. विद्यालयस्य परिसरे विद्यमानानां पञ्चवृक्षाणां नामानि तेषाम् औषधीयं प्रयोगं च लिखत ।

मार्गदर्शनम् (नमूना)विद्यालय-परिसर के पाँच वृक्षों के नाम एवं औषधीय उपयोग, जैसे – (1) तुलसी – सर्दी-खाँसी एवं रोग-प्रतिरोधक, (2) नीम – त्वचा-रोग एवं रक्तशोधक, (3) आँवला – विटामिन-C, पाचन एवं केश-स्वास्थ्य, (4) अश्वगन्धा/पीपल – बल एवं शान्ति, (5) एलोवेरा (घृतकुमारी) – त्वचा एवं पाचन।

2. स्वास्थ्येन सम्बद्धानां दशश्लोकानां संग्रहणं कुरुत ।

मार्गदर्शनम्स्वास्थ्य से सम्बन्धित दस श्लोकों का संग्रह कीजिए – इस पाठ के श्लोक (हितभुक्-मितभुक्-ऋतुभुक्, ‘मिताहारो नरः…’, ‘अनारोग्यमनायुष्यम्…’) तथा ‘शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्’ आदि लोकोक्त श्लोकों को सुलेख में लिखकर एकत्र कीजिए।

3. पाठे आगतान् श्लोकान् कण्ठस्थीकृत्य कक्षायां श्रावयत ।

मार्गदर्शनम्यह अभ्यास-कार्य है। पाठ में आए पाँचों श्लोकों को शुद्ध उच्चारण के साथ कण्ठस्थ कीजिए तथा कक्षा में सस्वर सुनाइए।

अतिरिक्त प्रश्न (Extra Questions)

लघु उत्तरीय प्रश्न (30–40 शब्द)

1. भगवान् धन्वन्तरि ने कौन-सा रूप क्यों धारण किया?

उत्तरभगवान् धन्वन्तरि ने यह जानने के लिए कि भारतवर्ष के वैद्य विभिन्न व्याधियों का शमन कैसे करते हैं, एक मनोहर शुक (तोते) का रूप धारण किया और उत्तम वैद्य की खोज में गाँव-गाँव घूमने लगे।

2. शुक ने वाग्भट द्वारा दिए गए फल पहले क्यों नहीं खाए?

उत्तरशुक तब तक फल नहीं खाना चाहता था जब तक उसके ‘कोऽरुक्’ प्रश्न का सही उत्तर न मिल जाए। अतः उसने पहले फल नहीं खाए; जब वाग्भट ने ‘हितभुक्, मितभुक्, ऋतुभुक्’ उत्तर दिया, तभी प्रसन्न होकर फल खाए।

3. ‘कोऽरुक्’ का संधि-विच्छेद एवं अर्थ लिखिए।

उत्तर‘कोऽरुक्’ का संधि-विच्छेद है – कः + अरुक्। इसका अर्थ है – ‘कौन अरुक् अर्थात् नीरोग (स्वस्थ) है?’। यही प्रश्न शुकरूपी धन्वन्तरि बार-बार करते हैं।

4. वाग्भट ने शुक को साधारण पक्षी क्यों नहीं समझा?

उत्तरशुक मधुर मानवीय वाणी में सार्थक प्रश्न ‘कोऽरुक्’ कर रहा था। ऐसा सार्थक शब्द करने वाले पक्षी को देखकर विस्मित वाग्भट ने समझ लिया कि यह कोई लौकिक (साधारण) खग नहीं, अपितु निश्चय ही कोई देवविशेष है।

5. धन्वन्तरि ने वाग्भट को क्या आशीर्वाद/उपदेश दिया?

उत्तरधन्वन्तरि ने वाग्भट के उत्कृष्ट आयुर्वेद-ज्ञान से अत्यन्त सन्तुष्ट होकर उन्हें आशीर्वाद दिया कि वे अष्टाङ्ग-आयुर्वेद के विचार के सारभूत तन्त्र (ग्रन्थ) की रचना करें। ऐसा कहकर वे अन्तर्धान हो गए।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (100–120 शब्द)

6. ‘कोऽरुक् ? कोऽरुक् ? कोऽरुक् ?’ पाठ का केन्द्रीय संदेश अपने शब्दों में लिखिए।

उत्तरइस पाठ का केन्द्रीय संदेश है – संतुलित, हितकर एवं ऋतु-अनुकूल आहार ही उत्तम स्वास्थ्य का आधार है। शुकरूपी धन्वन्तरि का प्रश्न ‘कोऽरुक्’ (कौन नीरोग है?) का उत्तर वाग्भट तीन सूत्रों में देते हैं – ‘हितभुक्, मितभुक्, ऋतुभुक्’। अर्थात् जो हितकर भोजन करता है, सीमित मात्रा में खाता है तथा ऋतु के अनुकूल आहार लेता है, वही सदा स्वस्थ रहता है।पाठ चरकसंहिता के श्लोकों द्वारा इन तीनों का अर्थ स्पष्ट करता है तथा गीता के आधार पर सात्त्विक, राजसिक एवं तामसिक आहार का विवेचन करता है। साथ ही प्रतिदिन व्यायाम, दन्तशोधन, स्वच्छ जल से स्नान एवं भूख लगने पर भोजन का उपदेश देता है। अन्त में ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ की मंगलकामना के साथ यह पाठ स्वस्थ एवं संयमित जीवनशैली की प्रेरणा देता है।

7. शुकरूपी धन्वन्तरि एवं वाग्भट के प्रसंग का वर्णन कीजिए।

उत्तरउत्तम वैद्य की खोज में भगवान् धन्वन्तरि शुक का रूप धारण कर गाँव-गाँव घूमते हुए वैद्यों के भवनों के पास वृक्ष पर बैठकर ‘कोऽरुक्, कोऽरुक्, कोऽरुक्’ पुकारते रहे, किन्तु किसी ने ध्यान नहीं दिया। अन्त में वे वाग्भट की कुटिया के प्रांगण के पुष्पवृक्ष पर बैठे और वही मधुर ध्वनि की।मधुर वाणी सुनकर वाग्भट बाहर आए और सार्थक मानवीय ध्वनि करते शुक को देखकर समझ गए कि यह कोई देवविशेष है। उन्होंने उसे फल दिए, पर शुक ने तब तक नहीं खाए जब तक उत्तर न मिला। वाग्भट ने उत्तर दिया – ‘हितभुक्, मितभुक्, ऋतुभुक्’। प्रसन्न होकर शुक ने फल खाए और धन्वन्तरि ने अपना वास्तविक रूप प्रकट कर वाग्भट को आयुर्वेद-ग्रन्थ रचने का आशीर्वाद दिया।

8. आयुर्वेद के अनुसार स्वस्थ जीवन के नियम बताइए।

उत्तरआयुर्वेद के अनुसार उत्तम स्वास्थ्य का मूल संतुलित आहार एवं नियमित जीवनशैली है। आहार के तीन सूत्र हैं – हितभुक् (हितकर भोजन जो रोगों को न उपजने दे), मितभुक् (मात्रा के अनुसार सीमित भोजन) तथा ऋतुभुक् (ऋतु के अनुकूल भोजन जो बल एवं वर्ण बढ़ाए)।इसके अतिरिक्त प्रतिदिन प्रातः उठकर व्यायाम करना, दाँतों की सफाई करना, स्वच्छ जल से स्नान करना तथा भूख लगने पर ही भोजन करना चाहिए। अति-उष्ण एवं राजसिक-तामसिक भोजन से बचना चाहिए और सात्त्विक आहार लेना चाहिए। इन नियमों के पालन से मनुष्य नीरोग, बलवान् एवं दीर्घायु बनता है – ‘सर्वे सन्तु निरामयाः’।

MCQ & अभिकथन-कारण

1. शुकरूप किसने धारण किया?

(क) वाग्भटः

(ख) चरकः

(ग) धन्वन्तरिः

(घ) सुश्रुतः

उत्तर(ग) धन्वन्तरिः।

2. ‘कोऽरुक्’ का अर्थ है—

(क) कौन रोगी है?

(ख) कौन नीरोग (स्वस्थ) है?

(ग) कौन भूखा है?

(घ) कौन वैद्य है?

उत्तर(ख) कौन नीरोग (स्वस्थ) है? (कः + अरुक्)

3. वाग्भट ने शुक को कितने सूत्ररूप उत्तर दिए?

(क) द्वे

(ख) त्रीणि

(ग) चत्वारि

(घ) पञ्च

उत्तर(ख) त्रीणि। (हितभुक्, मितभुक्, ऋतुभुक्)

4. ऋतवः कति सन्ति?

(क) चत्वारः

(ख) पञ्च

(ग) षट्

(घ) सप्त

उत्तर(ग) षट्। (ग्रीष्मः, वर्षा, शरद्, शिशिरः, हेमन्तः, वसन्तः)

5. ‘मितभुक्’ का अर्थ है—

(क) हितकर भोजन करने वाला

(ख) सीमित मात्रा में भोजन करने वाला

(ग) ऋतु के अनुकूल भोजन करने वाला

(घ) अधिक भोजन करने वाला

उत्तर(ख) सीमित मात्रा में भोजन करने वाला।

6. ‘चरकसंहिता’ ग्रन्थ की रचना किसने की?

(क) महर्षि वाग्भट

(ख) महर्षि सुश्रुत

(ग) महर्षि चरक

(घ) भगवान् धन्वन्तरि

उत्तर(ग) महर्षि चरक।

7. अन्त में शुक किसकी कुटिया के समीप पहुँचा?

(क) चरकस्य

(ख) वाग्भटस्य

(ग) सुश्रुतस्य

(घ) धन्वन्तरेः

उत्तर(ख) वाग्भटस्य।

8. गीता के अनुसार जो आहार आयु, बुद्धि एवं आरोग्य बढ़ाता है, वह कहलाता है—

(क) सात्त्विकः

(ख) राजसिकः

(ग) तामसिकः

(घ) विदाही

उत्तर(क) सात्त्विकः।

9. ‘निरामयाः’ शब्द का अर्थ है—

(क) धनवान्

(ख) नीरोगी

(ग) बलवान्

(घ) ज्ञानी

उत्तर(ख) नीरोगी।

10. माता के अनुसार अत्युष्ण भोजन—

(क) हितकर होता है

(ख) हितकर नहीं होता

(ग) बलवर्धक होता है

(घ) सात्त्विक होता है

उत्तर(ख) हितकर नहीं होता। (‘अत्युष्णं भोजनं हितकरं न भवति’)
उत्तर-कुंजी: 1-(ग), 2-(ख), 3-(ख), 4-(ग), 5-(ख), 6-(ग), 7-(ख), 8-(क), 9-(ख), 10-(ख)

अभिकथन-कारण – नीचे अभिकथन (A) और कारण (R) दिए गए हैं। सही विकल्प चुनिए—
(क) A और R दोनों सही, R, A की सही व्याख्या है। (ख) A और R दोनों सही, पर R, A की सही व्याख्या नहीं। (ग) A सही, R गलत। (घ) A गलत, R सही।

1. अभिकथन (A): शुकरूपी धन्वन्तरि ने वाग्भट को उत्तम वैद्य माना।

कारण (R): वाग्भट ने ही ‘कोऽरुक्’ प्रश्न का सटीक उत्तर ‘हितभुक्, मितभुक्, ऋतुभुक्’ दिया।

उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है।

2. अभिकथन (A): अत्युष्ण भोजन तुरन्त नहीं देना चाहिए।

कारण (R): आयुर्वेद के अनुसार ‘अत्युष्णं भोजनं हितकरं न भवति’।

उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है।

3. अभिकथन (A): गरिष्ठ पदार्थ भी अल्प मात्रा में सुपाच्य हो जाते हैं।

कारण (R): भोजन में सदैव अधिक मात्रा में खाना ही हितकर है।

उत्तर(ग) A सही है, किन्तु R गलत है – मात्रा के अनुसार सीमित भोजन ही हितकर है (मितभुक्)।

4. अभिकथन (A): ऋतु के अनुकूल आहार से बल एवं वर्ण की वृद्धि होती है।

कारण (R): ‘ऋतुभुक्’ व्यक्ति का खाया-पिया बलवर्धक एवं वर्णकान्तिजनक होता है।

उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है।

5. अभिकथन (A): शुक एक देवविशेष था।

कारण (R): वह सार्थक मानवीय वाणी में ‘कोऽरुक्’ प्रश्न कर रहा था, जो साधारण पक्षी नहीं कर सकता।

उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है।

परीक्षा-सुझाव एवं सामान्य त्रुटियाँ

परीक्षा-सुझाव (Exam Tips)

  • ‘हितभुक्, मितभुक्, ऋतुभुक्’ की परिभाषा एवं अर्थ अच्छी प्रकार याद रखें – ये पाठ का मूल भाव हैं।
  • पाँचों श्लोक एवं उनका भावार्थ कण्ठस्थ करें – श्लोक-मिलान एवं भावार्थ के प्रश्न इन्हीं से आते हैं।
  • ‘कोऽरुक् = कः + अरुक्’ का संधि-विच्छेद अवश्य याद रखें।
  • एकपदेन एवं पूर्णवाक्येन उत्तर के अन्तर का ध्यान रखें – पूर्णवाक्य में पूरा वाक्य लिखें।
  • विशेषण-विशेष्य पदों को छाँटने के प्रश्नों में लिङ्ग-वचन-विभक्ति का मिलान देखें।

सामान्य त्रुटियाँ (Common Mistakes)

  • हितभुक्/मितभुक्/ऋतुभुक् के अर्थ आपस में बदल देना – मितभुक् = सीमित मात्रा, ऋतुभुक् = ऋतु-अनुकूल।
  • शुकरूप धारण करने वाले को वाग्भट बता देना – शुकरूप धन्वन्तरि ने धारण किया था।
  • चरकसंहिता का रचयिता धन्वन्तरि लिख देना – इसके रचयिता महर्षि चरक हैं।
  • ऋतुओं की संख्या भूल जाना – ऋतुएँ षट् (छह) हैं।
  • श्लोक-लेखन में मात्रा एवं विसर्ग की अशुद्धि (बुभुक्षायाञ्च, निरामयाः, अनुत्पत्तिकरम्)।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

दीपकम् कक्षा 8 के पाठ 9 ‘कोऽरुक्’ का अर्थ क्या है?

‘कोऽरुक्’ का संधि-विच्छेद है – कः + अरुक्। इसका अर्थ है – ‘कौन अरुक् अर्थात् नीरोग (स्वस्थ) है?’। यही प्रश्न शुकरूपी भगवान् धन्वन्तरि बार-बार करते हैं।

‘हितभुक्, मितभुक्, ऋतुभुक्’ का क्या तात्पर्य है?

हितभुक् – जो हितकर भोजन करता है; मितभुक् – जो सीमित मात्रा में भोजन करता है; ऋतुभुक् – जो ऋतु के अनुकूल भोजन करता है। जो इन तीनों का पालन करता है, वही सदा स्वस्थ रहता है।

इस पाठ में शुकरूप किसने धारण किया था और क्यों?

भगवान् धन्वन्तरि ने शुक (तोते) का रूप धारण किया था, ताकि वे जान सकें कि भारतवर्ष के वैद्य रोगों का शमन कैसे करते हैं तथा उत्तम वैद्य की खोज कर सकें। अन्ततः उन्होंने वाग्भट को उत्तम वैद्य के रूप में पहचाना।

श्लोक, प्रश्न एवं अभ्यास-शीर्षक NCERT दीपकम् पुस्तक से ज्यों-के-त्यों लिए गए हैं; सार, भावार्थ एवं उत्तर ClearStudy द्वारा मौलिक रूप से तैयार किए गए हैं।

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