Class 8 Sanskrit Deepakam Chapter 9 Solutions (NCERT 2026–27) – कोऽरुक् ? कोऽरुक् ? कोऽरुक् ?
This page gives the complete solution for Class 8 Sanskrit Deepakam (दीपकम्) Chapter 9 ‘कोऽरुक् ? कोऽरुक् ? कोऽरुक् ?’ – the story of आचार्य वाग्भट and भगवान् धन्वन्तरि (in the form of a parrot) teaching the आयुर्वेदिक secret of health – हितभुक्, मितभुक्, ऋतुभुक्. You get the पाठ-परिचय/प्रसंग, सार (Hindi summary), शब्दार्थ table, original exam-ready answers to every question of the अभ्यास (अभ्यासात् जायते सिद्धिः), the श्लोक पदच्छेद-अन्वय-भावार्थ of योग्यताविस्तरः, extra questions, MCQs, अभिकथन-कारण and FAQs.
- पाठ का अवलोकन (Chapter Overview)
- पाठ-परिचय / प्रसंग
- सार (Hindi Summary)
- शब्दार्थ (Word-meanings)
- अभ्यासः (अभ्यासात् जायते सिद्धिः)
- योग्यताविस्तरः (श्लोक-भावार्थ) & परियोजनाकार्यम्
- अतिरिक्त प्रश्न (Extra Questions)
- MCQ & अभिकथन-कारण
- परीक्षा-सुझाव एवं सामान्य त्रुटियाँ
- अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
पाठ का अवलोकन (Chapter Overview)
दीपकम् कक्षा 8 का नवम पाठ ‘कोऽरुक् ? कोऽरुक् ? कोऽरुक् ?’ एक रोचक कथा के माध्यम से आयुर्वेद के आहार-नियमों की शिक्षा देता है। पाठ का आरम्भ माता एवं पुत्र के एक संवाद से होता है, जिसमें माता पुत्र को अत्युष्ण भोजन तुरन्त न देने का कारण आयुर्वेद के उपदेश से बताती है। इसी प्रसंग से शिक्षक आहार-सम्बन्धी एक रोचक कथा सुनाते हैं – भगवान् धन्वन्तरि शुक (तोते) का रूप धारण कर उत्तम वैद्य की खोज में ‘कोऽरुक्’ (कौन नीरोग है?) पूछते हुए घूमते हैं। केवल आचार्य वाग्भट ही इसका सटीक उत्तर देते हैं – ‘हितभुक्, मितभुक्, ऋतुभुक्’ अर्थात् जो हितकर, सीमित एवं ऋतु के अनुकूल भोजन करता है, वही सदा स्वस्थ रहता है। पाठ का केन्द्रीय भाव है – संयमित, सात्त्विक एवं ऋतु के अनुकूल आहार ही उत्तम स्वास्थ्य का आधार है।
पाठ-परिचय / प्रसंग
यह पाठ आयुर्वेद की प्रसिद्ध परम्परा एवं चरकसंहिता के श्लोकों पर आधारित एक कथात्मक पाठ है। इसमें भगवान् धन्वन्तरि (आयुर्वेद के देवता) एवं प्रसिद्ध वैद्य वाग्भट का प्रसंग दिया गया है। ‘कोऽरुक्’ का संधि-विच्छेद है – कः + अरुक्, अर्थात् ‘कौन रोगरहित (नीरोग/स्वस्थ) है?’। पाठ में हितभुक्-मितभुक्-ऋतुभुक् की व्याख्या के लिए चरकसंहिता के श्लोक तथा सात्त्विक-राजसिक-तामसिक आहार के लिए श्रीमद्भगवद्गीता के श्लोक उद्धृत किए गए हैं। पाठ का उद्देश्य विद्यार्थियों को संतुलित आहार एवं स्वस्थ जीवनशैली की प्रेरणा देना है।
सार (Hindi Summary)
पाठ का आरम्भ एक घरेलू संवाद से होता है। एक बालक भूख से व्याकुल होकर माता से शीघ्र भोजन परोसने का आग्रह करता है, किन्तु माता उसे अत्युष्ण (बहुत गरम) भोजन तुरन्त नहीं देती, क्योंकि ‘अत्युष्णं भोजनं हितकरं न भवति’ – यह आयुर्वेद का उपदेश है। इसी प्रसंग पर शिक्षक आहार से सम्बन्धित एक रोचक कथा सुनाते हैं।
भारतवर्ष के वैद्य विभिन्न व्याधियों का शमन कैसे करते हैं – यह जानने के लिए भगवान् धन्वन्तरि एक मनोहर शुक (तोते) का रूप धारण कर गाँव-गाँव घूमने लगे। वे अनेक प्रसिद्ध वैद्यों के भवनों के पास वृक्ष पर बैठकर मधुर स्वर में ‘कोऽरुक्, कोऽरुक्, कोऽरुक्’ (कौन नीरोग है?) पुकारते, किन्तु किसी ने भी इस प्रश्न पर ध्यान नहीं दिया। अन्त में वे वैद्य वाग्भट की कुटिया के समीप पहुँचे और प्रांगण के पुष्पवृक्ष पर बैठकर वही ध्वनि की। चिकित्सा में निरत वाग्भट मधुर वाणी सुनकर बाहर आए और शुक को देखकर समझ गए कि यह कोई साधारण पक्षी नहीं, अपितु कोई देवविशेष है।
वाग्भट ने शुक को फल दिए, परन्तु उसने तब तक फल नहीं खाए जब तक उसके प्रश्न का उत्तर न मिला। तब वाग्भट ने सूत्ररूप में तीन उत्तर दिए – ‘हितभुक्, मितभुक्, ऋतुभुक्’ अर्थात् जो हितकर, सीमित मात्रा में एवं ऋतु के अनुकूल भोजन करता है, वही सदा स्वस्थ रहता है। उत्तर सुनकर प्रसन्न होकर शुक ने फल खाए। तत्पश्चात् शुकरूपी धन्वन्तरि ने अपना वास्तविक रूप प्रकट किया, वाग्भट के उत्कृष्ट आयुर्वेद-ज्ञान की प्रशंसा की और उन्हें अष्टाङ्ग-आयुर्वेद का सारभूत ग्रन्थ रचने का आशीर्वाद देकर अन्तर्धान हो गए। तब वाग्भट ने शिष्यों को चरकसंहिता के श्लोकों द्वारा हितभुक्, मितभुक् एवं ऋतुभुक् का अर्थ समझाया तथा प्रतिदिन व्यायाम, दन्तशोधन, स्वच्छ जल से स्नान एवं भूख लगने पर भोजन का महत्त्व बताया और ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ की मंगलकामना की। इस प्रकार यह पाठ संतुलित आहार एवं स्वस्थ जीवनशैली की प्रेरणा देता है।
शब्दार्थ (Word-meanings)
| शब्दः (Sanskrit) | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| अरुक् | नीरोग, स्वस्थ | One who is not sick |
| निरामयाः | नीरोगी | Free from disease |
| झटिति | शीघ्र, तत्काल | Quickly / at once |
| हितभुक् | हितकर भोजन करने वाला | One who eats nutritious/beneficial food |
| मितभुक् | सीमित मात्रा में भोजन करने वाला | One who eats in limited quantity |
| ऋतुभुक् | ऋतु के अनुकूल भोजन करने वाला | One who eats food suited to the season |
| शुकरूपम् | तोते का रूप | The form of a parrot |
| अभ्रमत् | घूमा | Wandered / roamed |
| कुटीरसमीपम् | कुटिया के पास | Near the hut |
| प्राङ्गणम् | आँगन, प्रांगण | Courtyard |
| विस्मितः | आश्चर्यचकित | Astonished |
| समर्पितवान् | अर्पित किया, दिया | Offered |
| अन्तर्हितः | अन्तर्धान हो गया | Disappeared |
| व्याधीनाम् | रोगों का | Of diseases |
| प्रयुञ्जीत | प्रयोग करे | Should use / employ |
| अनुवर्तते | अनुसरण करता है, बना रहता है | Follows / is maintained |
| अजातानाम् | जो उत्पन्न नहीं हुए, उनका | Of those (disorders) not yet arisen |
| गुरूणाम् | गरिष्ठ (भारी) पदार्थों का | Of heavy foods |
| लघूनाम् | हल्के (सुपाच्य) पदार्थों का | Of light foods |
| बुभुक्षायाम् | भूख लगने पर | On feeling hungry |
| दन्तविशोधनम् | दाँतों की सफाई | Cleaning of the teeth |
अभ्यासः (अभ्यासात् जायते सिद्धिः)
1. अधोलिखितान् प्रश्नान् एकपदेन उत्तरत —
(क) शुकरूपं कः धृतवान् ?
(ख) धन्वन्तरिः (शुकः) कुत्र उपविश्य ध्वनिम् अकरोत् ?
(ग) अन्ते शुकः कस्य आश्रमस्य समीपं गतवान् ?
(घ) ऋतवः कति सन्ति ?
(ङ) वाग्भटः शुकस्य रहस्यं केभ्यः उक्तवान् ?
2. पट्टिकातः उचितानि पदानि चित्वा रिक्तस्थानानि पूरयत —
पट्टिका (शब्द-मञ्जूषा): चरकस्य, कुटीरसमीपं, भारतवर्षे, आयुर्वेदज्ञानेन, अतिमात्रं
3. अधोलिखितानां प्रश्नानां पूर्णवाक्येन उत्तराणि लिखत —
(क) मधुरां वाणीं श्रुत्वा चिकित्सानिरतः वाग्भटः किम् अकरोत् ?
(ख) वाग्भटः झटिति किम् अकरोत् ?
(ग) छात्राः पुनः जिज्ञासया आचार्यं किम् अपृच्छन् ?
(घ) भगवान् धन्वन्तरिः अस्माकं कृते संक्षेपेण किं प्रदत्तवान् ?
(ङ) ऋषयः नित्यं कां प्रार्थनां कुर्वन्ति ?
4. पाठात् यथोचितानि विशेषणपदानि विशेष्यपदानि वा चित्वा रिक्तस्थानानि पूरयत —
(पाठ से उपयुक्त विशेषण-पद अथवा विशेष्य-पद चुनकर रिक्त स्थान भरिए।)
| विशेषणम् | विशेष्यम् |
|---|---|
| विभिन्नानाम् | व्याधीनाम् |
| मनोहरम् | शुकम् |
| विशाले | प्राङ्गणे |
| मधुराम् | वाणीम् |
| लौकिकः | खगः |
| मधुराणि | फलानि |
| समुचितम् | उत्तरम् |
| उत्तमस्य | वैद्यस्य |
| प्रिय | शिष्याः |
| सात्त्विकम् | भोजनम् |
| उत्तमाः | वैद्याः |
(पाठ के आधार पर उपयुक्त मिलान; रिक्त स्थानों में भरे गए पद मोटे अक्षरों में हैं। विद्यालय/शिक्षक के मार्गदर्शन में अन्य समानार्थक विशेषण-पद भी मान्य हो सकते हैं।)
5. पाठं पठित्वा अधोलिखितपट्टिकातः पदानि चित्वा उचितसञ्चिकायां पूरयत —
पट्टिका: लौकिकः, व्याधीनाम्, देवः, वृक्षे, त्रीणि, उत्तमस्य, वाणीम्, विस्मितः, मधुरया, प्रश्नान्, पूज्यः, खगः, विशाले, शुकम्, वाग्भटः
| विशेषणपदानि | विशेष्यपदानि |
|---|---|
| लौकिकः | व्याधीनाम् |
| उत्तमस्य | देवः |
| विस्मितः | वृक्षे |
| मधुरया | त्रीणि |
| पूज्यः | वाणीम् |
| विशाले | प्रश्नान् |
| खगः | |
| शुकम् | |
| वाग्भटः |
(विशेषणपदानि – वे पद जो किसी की विशेषता बताते हैं; विशेष्यपदानि – जिनकी विशेषता बताई जाती है। संज्ञावाचक/मूल पद विशेष्य की सञ्चिका में रखे जाते हैं।)
6. अधोलिखितानि वाक्यानि पठित्वा तेन सम्बद्धं श्लोकं पाठात् चित्वा लिखत —
(क) अस्माभिः नित्यं व्यायामः, स्नानं, दन्तधावनं, बुभुक्षायाञ्च भोजनं कर्तव्यम् ।
स्वच्छजलेन सुस्नानं, बुभुक्षायाञ्च भोजनम् ॥ ४ ॥
(ख) अस्माभिः हितकरः आहारः सेवनीयः येन विकाराणां शमनं स्वास्थ्यस्य च रक्षणं भवेत् ।
अजातानां विकाराणामनुत्पत्तिकरं च यत् ॥ १ ॥
(ग) ऋतोः अनुसारं भोजनेन बलस्य वर्णस्य च अभिवृद्धिः भवति ।
तस्यर्तुसात्म्यं विदितं चेष्टाहारव्यपाश्रयम् ॥ ३ ॥
योग्यताविस्तरः (श्लोक-भावार्थ) & परियोजनाकार्यम्
पाठ के ‘योग्यताविस्तरः’ भाग में चरकसंहिता के श्लोकों का पदच्छेद, अन्वय एवं भावार्थ, चरकसंहिता का परिचय, श्रीमद्भगवद्गीता के आधार पर सात्त्विक-राजसिक-तामसिक आहार तथा कुछ आहार-विषयक सूक्तियाँ दी गई हैं।
(क) श्लोकानां पदच्छेदः, अन्वयः, भावार्थः च
अजातानां विकाराणामनुत्पत्तिकरं च यत् ॥ १ ॥ — चरकसंहिता (हितभुक्)
मात्राकारणमुद्दिष्टं द्रव्याणां गुरुलाघवे ॥ २ ॥ — चरकसंहिता (मितभुक्)
तस्यर्तुसात्म्यं विदितं चेष्टाहारव्यपाश्रयम् ॥ ३ ॥ — चरकसंहिता (ऋतुभुक्)
स्वच्छजलेन सुस्नानं, बुभुक्षायाञ्च भोजनम् ॥ ४ ॥ — स्वास्थ्य-सूत्र
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुःखभाग्भवेत् ॥ ५ ॥ — मङ्गल-प्रार्थना
(ख) चरकसंहितायाः परिचयः
महर्षि चरक ने चरकसंहिता ग्रन्थ की रचना की। यह आयुर्वेद का एक प्रमुख ग्रन्थ है। इस ग्रन्थ में आठ स्थान हैं – सूत्रस्थान, निदानस्थान, विमानस्थान, शरीरस्थान, इन्द्रियस्थान, चिकित्सास्थान, कल्पस्थान एवं सिद्धिस्थान। इसमें केवल रोगों की चिकित्सा ही नहीं, अपितु स्वास्थ्य के संरक्षण एवं आयु की वृद्धि के उपाय भी बताए गए हैं।
(ग) आहार-परिचयः (श्रीमद्भगवद्गीता)
| आहार-प्रकारः | भावार्थः (संक्षेप) |
|---|---|
| सात्त्विकः आहारः (गीता १७/८) | जो आहार आयु, बुद्धि, बल एवं आरोग्य बढ़ाने वाले, रसयुक्त, स्निग्ध, स्थिर एवं हृदय को प्रिय होते हैं, वे सात्त्विक आहार हैं। आरोग्य के लिए सात्त्विक आहार ही सेवनीय है। |
| राजसिकः आहारः (गीता १७/९) | अति कटु, अम्ल, लवण, उष्ण, तीक्ष्ण, रूक्ष एवं विदाही आहार राजसिक है। इसके सेवन से अनेक व्याधियाँ, दुःख एवं शोक होते हैं; अतः विद्यार्थी को इससे बचना चाहिए। |
| तामसिकः आहारः (गीता १७/१०) | एक प्रहर पूर्व बना, रसहीन, दुर्गन्धयुक्त, बासी, जूठा एवं अपवित्र भोजन तामसिक है। इससे निद्रा, तन्द्रा एवं आलस्य बढ़ते हैं; अतः विद्यार्थी को इसका त्याग करना चाहिए। |
परियोजनाकार्यम् (Project Work)
1. विद्यालयस्य परिसरे विद्यमानानां पञ्चवृक्षाणां नामानि तेषाम् औषधीयं प्रयोगं च लिखत ।
2. स्वास्थ्येन सम्बद्धानां दशश्लोकानां संग्रहणं कुरुत ।
3. पाठे आगतान् श्लोकान् कण्ठस्थीकृत्य कक्षायां श्रावयत ।
अतिरिक्त प्रश्न (Extra Questions)
लघु उत्तरीय प्रश्न (30–40 शब्द)
1. भगवान् धन्वन्तरि ने कौन-सा रूप क्यों धारण किया?
2. शुक ने वाग्भट द्वारा दिए गए फल पहले क्यों नहीं खाए?
3. ‘कोऽरुक्’ का संधि-विच्छेद एवं अर्थ लिखिए।
4. वाग्भट ने शुक को साधारण पक्षी क्यों नहीं समझा?
5. धन्वन्तरि ने वाग्भट को क्या आशीर्वाद/उपदेश दिया?
दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (100–120 शब्द)
6. ‘कोऽरुक् ? कोऽरुक् ? कोऽरुक् ?’ पाठ का केन्द्रीय संदेश अपने शब्दों में लिखिए।
7. शुकरूपी धन्वन्तरि एवं वाग्भट के प्रसंग का वर्णन कीजिए।
8. आयुर्वेद के अनुसार स्वस्थ जीवन के नियम बताइए।
MCQ & अभिकथन-कारण
1. शुकरूप किसने धारण किया?
(क) वाग्भटः
(ख) चरकः
(ग) धन्वन्तरिः
(घ) सुश्रुतः
2. ‘कोऽरुक्’ का अर्थ है—
(क) कौन रोगी है?
(ख) कौन नीरोग (स्वस्थ) है?
(ग) कौन भूखा है?
(घ) कौन वैद्य है?
3. वाग्भट ने शुक को कितने सूत्ररूप उत्तर दिए?
(क) द्वे
(ख) त्रीणि
(ग) चत्वारि
(घ) पञ्च
4. ऋतवः कति सन्ति?
(क) चत्वारः
(ख) पञ्च
(ग) षट्
(घ) सप्त
5. ‘मितभुक्’ का अर्थ है—
(क) हितकर भोजन करने वाला
(ख) सीमित मात्रा में भोजन करने वाला
(ग) ऋतु के अनुकूल भोजन करने वाला
(घ) अधिक भोजन करने वाला
6. ‘चरकसंहिता’ ग्रन्थ की रचना किसने की?
(क) महर्षि वाग्भट
(ख) महर्षि सुश्रुत
(ग) महर्षि चरक
(घ) भगवान् धन्वन्तरि
7. अन्त में शुक किसकी कुटिया के समीप पहुँचा?
(क) चरकस्य
(ख) वाग्भटस्य
(ग) सुश्रुतस्य
(घ) धन्वन्तरेः
8. गीता के अनुसार जो आहार आयु, बुद्धि एवं आरोग्य बढ़ाता है, वह कहलाता है—
(क) सात्त्विकः
(ख) राजसिकः
(ग) तामसिकः
(घ) विदाही
9. ‘निरामयाः’ शब्द का अर्थ है—
(क) धनवान्
(ख) नीरोगी
(ग) बलवान्
(घ) ज्ञानी
10. माता के अनुसार अत्युष्ण भोजन—
(क) हितकर होता है
(ख) हितकर नहीं होता
(ग) बलवर्धक होता है
(घ) सात्त्विक होता है
अभिकथन-कारण – नीचे अभिकथन (A) और कारण (R) दिए गए हैं। सही विकल्प चुनिए—
(क) A और R दोनों सही, R, A की सही व्याख्या है। (ख) A और R दोनों सही, पर R, A की सही व्याख्या नहीं। (ग) A सही, R गलत। (घ) A गलत, R सही।
1. अभिकथन (A): शुकरूपी धन्वन्तरि ने वाग्भट को उत्तम वैद्य माना।
कारण (R): वाग्भट ने ही ‘कोऽरुक्’ प्रश्न का सटीक उत्तर ‘हितभुक्, मितभुक्, ऋतुभुक्’ दिया।
2. अभिकथन (A): अत्युष्ण भोजन तुरन्त नहीं देना चाहिए।
कारण (R): आयुर्वेद के अनुसार ‘अत्युष्णं भोजनं हितकरं न भवति’।
3. अभिकथन (A): गरिष्ठ पदार्थ भी अल्प मात्रा में सुपाच्य हो जाते हैं।
कारण (R): भोजन में सदैव अधिक मात्रा में खाना ही हितकर है।
4. अभिकथन (A): ऋतु के अनुकूल आहार से बल एवं वर्ण की वृद्धि होती है।
कारण (R): ‘ऋतुभुक्’ व्यक्ति का खाया-पिया बलवर्धक एवं वर्णकान्तिजनक होता है।
5. अभिकथन (A): शुक एक देवविशेष था।
कारण (R): वह सार्थक मानवीय वाणी में ‘कोऽरुक्’ प्रश्न कर रहा था, जो साधारण पक्षी नहीं कर सकता।
परीक्षा-सुझाव एवं सामान्य त्रुटियाँ
परीक्षा-सुझाव (Exam Tips)
- ‘हितभुक्, मितभुक्, ऋतुभुक्’ की परिभाषा एवं अर्थ अच्छी प्रकार याद रखें – ये पाठ का मूल भाव हैं।
- पाँचों श्लोक एवं उनका भावार्थ कण्ठस्थ करें – श्लोक-मिलान एवं भावार्थ के प्रश्न इन्हीं से आते हैं।
- ‘कोऽरुक् = कः + अरुक्’ का संधि-विच्छेद अवश्य याद रखें।
- एकपदेन एवं पूर्णवाक्येन उत्तर के अन्तर का ध्यान रखें – पूर्णवाक्य में पूरा वाक्य लिखें।
- विशेषण-विशेष्य पदों को छाँटने के प्रश्नों में लिङ्ग-वचन-विभक्ति का मिलान देखें।
सामान्य त्रुटियाँ (Common Mistakes)
- हितभुक्/मितभुक्/ऋतुभुक् के अर्थ आपस में बदल देना – मितभुक् = सीमित मात्रा, ऋतुभुक् = ऋतु-अनुकूल।
- शुकरूप धारण करने वाले को वाग्भट बता देना – शुकरूप धन्वन्तरि ने धारण किया था।
- चरकसंहिता का रचयिता धन्वन्तरि लिख देना – इसके रचयिता महर्षि चरक हैं।
- ऋतुओं की संख्या भूल जाना – ऋतुएँ षट् (छह) हैं।
- श्लोक-लेखन में मात्रा एवं विसर्ग की अशुद्धि (बुभुक्षायाञ्च, निरामयाः, अनुत्पत्तिकरम्)।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
दीपकम् कक्षा 8 के पाठ 9 ‘कोऽरुक्’ का अर्थ क्या है?
‘कोऽरुक्’ का संधि-विच्छेद है – कः + अरुक्। इसका अर्थ है – ‘कौन अरुक् अर्थात् नीरोग (स्वस्थ) है?’। यही प्रश्न शुकरूपी भगवान् धन्वन्तरि बार-बार करते हैं।
‘हितभुक्, मितभुक्, ऋतुभुक्’ का क्या तात्पर्य है?
हितभुक् – जो हितकर भोजन करता है; मितभुक् – जो सीमित मात्रा में भोजन करता है; ऋतुभुक् – जो ऋतु के अनुकूल भोजन करता है। जो इन तीनों का पालन करता है, वही सदा स्वस्थ रहता है।
इस पाठ में शुकरूप किसने धारण किया था और क्यों?
भगवान् धन्वन्तरि ने शुक (तोते) का रूप धारण किया था, ताकि वे जान सकें कि भारतवर्ष के वैद्य रोगों का शमन कैसे करते हैं तथा उत्तम वैद्य की खोज कर सकें। अन्ततः उन्होंने वाग्भट को उत्तम वैद्य के रूप में पहचाना।
श्लोक, प्रश्न एवं अभ्यास-शीर्षक NCERT दीपकम् पुस्तक से ज्यों-के-त्यों लिए गए हैं; सार, भावार्थ एवं उत्तर ClearStudy द्वारा मौलिक रूप से तैयार किए गए हैं।
