पद प्रश्न उत्तर — कक्षा 9 हिंदी गंगा

कक्षा 9 हिंदी गंगा के अध्याय 8 ‘पद’ में रैदास भक्त और आराध्य के अटूट संबंध को सहज प्रतीकों में व्यक्त करते हैं। यहाँ दोनों पदों का भावार्थ, प्रश्नों के तर्कपूर्ण उत्तर, अलंकार, व्याकरण और गतिविधियों के नमूने दिए गए हैं।

कक्षा: 9 विषय: हिंदी पुस्तक: गंगा (काव्य खंड) अध्याय: 8 कवि: संत रैदास (रविदास) विधा: पद (भक्ति काव्य) स्रोत संस्करण: मार्च 2026

स्रोत: NCERT गंगा, कक्षा 9, प्रथम संस्करण मार्च 2026, पृष्ठ 145–152। खुले प्रश्नों, अनुभवों और रचनात्मक कार्यों के उत्तर नमूने हैं; अपने विचार जोड़ें। यह स्वतंत्र अध्ययन-सहायिका है, NCERT की आधिकारिक उत्तरमाला नहीं।

कवि परिचय – संत रैदास

रैदास नाम से विख्यात संत रविदास का जन्म काशी (वाराणसी) में हुआ। पाठ्यपुस्तक में उनका जीवनकाल सन् 1388–1518 माना गया है। वे संत कवियों में गिने जाते हैं। उन्होंने बाह्य आडंबरों का खंडन कर मन की शुद्धता और आंतरिक भक्ति को ही सच्चा धर्म माना। रैदास ने अपनी रचनाओं में सरल, व्यावहारिक ब्रजभाषा का प्रयोग किया, जिसमें अवधी, राजस्थानी, खड़ी बोली तथा उर्दू-फारसी के शब्दों का मिश्रण है। उनकी भक्ति-रचनाएँ आदि श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी में भी शामिल हैं और आज भी समानता, प्रेम तथा भाईचारे का संदेश देती हैं। उनकी रचनाएँ रैदास बानी में संकलित हैं।

पद (मूल पाठ)

(1)
अब कैसे छूटै राम रट लागी।
प्रभु जी तुम चंदन हम पानी, जाकी अंग-अंग बास समानी।
प्रभु जी तुम घन बन, हम मोरा, जैसे चितवत चंद चकोरा।
प्रभु जी तुम दीपक, हम बाती, जाकी जोति बरै दिन राती।
प्रभु जी तुम मोती, हम धागा, जैसे सोने मिलत सुहागा।
प्रभु जी तुम स्वामी, हम दासा, ऐसी भगति करै रैदासा।
(2)
जो तुम तोरौ राम मैं नहिं तोरौ, तुम सौ तोरि कवन सौं जोरौ।
तीरथ बरत न करूँ अंदेसा, तुम्हरे चरन कमल एक भरोसां।
जहँ जहँ जाओ तुम्हरी पूजा, तुम सा देव ओर नहिं दूजा।
मैं अपनो मन हरि से जोरौ, हरि सो जोरि सबन सो तोरौं।
सबही पहर तुम्हारी आसा, मन क्रम वचन कहै रैदासा।

(स्रोत – रैदास बानी, सं. डॉ. शुकदेव सिंह; लय को ध्यान में रखते हुए वर्तनी संबंधी किंचित परिवर्तन।)

पदों का भावार्थ

पद (1) – अनन्य भक्ति और समर्पण

रैदास कहते हैं कि अब उन्हें राम-नाम के जप की ऐसी लगन (रट) लग गई है कि वह किसी भी प्रकार नहीं छूट सकती। वे प्रभु से अपने अटूट संबंध को अनेक उपमाओं द्वारा व्यक्त करते हैं – हे प्रभु! आप चंदन हैं और मैं पानी हूँ, जिसके अंग-अंग में आपकी सुगंध समा गई है। आप घन अर्थात् बादल हैं और मैं मोर हूँ; अथवा जैसे चकोर चंद्रमा को अनिमेष निहारता है, वैसे ही मैं आपको निहारता हूँ। आप दीपक हैं और मैं बाती, जिसकी ज्योति दिन-रात जलती रहती है। आप मोती हैं और मैं धागा, और हमारा मेल वैसा ही है जैसे सोने के परिष्कार में सुहागा सहायक होता है। आप स्वामी हैं और मैं दास – रैदास ऐसी ही अनन्य भक्ति करते हैं। इस प्रकार पद में भक्त का आराध्य के प्रति पूर्ण समर्पण और अभिन्नता प्रकट होती है।

पद (2) – अटूट निष्ठा और विश्वास

रैदास कहते हैं – हे राम! भले ही आप मुझसे संबंध तोड़ लें, पर मैं आपसे नाता नहीं तोड़ूँगा; क्योंकि आपसे संबंध तोड़कर मैं और किससे नाता जोड़ूँ? मुझे तीर्थ-यात्रा या व्रत न कर पाने की कोई चिंता नहीं, क्योंकि मुझे तो केवल आपके चरण-कमलों का ही एकमात्र भरोसा है। मैं जहाँ-जहाँ जाता हूँ, वहीं आपकी पूजा होती है; आपके समान दूसरा कोई देव नहीं है। मैंने अपना मन हरि (प्रभु) से जोड़ लिया है और हरि से जोड़कर सांसारिक मोह से अपना मन हटा लिया है; इसका आशय लोगों के प्रति करुणा या जिम्मेदारी छोड़ना नहीं है। हर पहर (हर समय) मुझे केवल आपकी ही आशा है – रैदास मन, कर्म और वचन से यही कहते हैं। यह पद निष्ठा, विश्वास और अडिग भक्ति को व्यंजित करता है।

चंदन और पानी, जलता दीपक और बाती, तथा धागे में पिरोए मोती का हाथ से रंगा चित्र
रैदास के पदों के तीन प्रतीकों का कल्पनात्मक चित्र: चंदन–पानी, दीपक–बाती और मोती–धागा।

शब्दार्थ

शब्दअर्थ
राम रटराम-नाम का निरंतर जप/रटन
चंदनसुगंधित लकड़ी (एक प्रधान गंधद्रव्य)
बास समानीसुगंध समा गई
घन बनइस प्रसंग में घन अर्थात् बादल; इसे केवल घना जंगल समझना उचित नहीं
मोरामोर
चितवतनिहारना, टकटकी लगाकर देखना
चकोराचकोर पक्षी; चंद्रमा से उसका प्रेम काव्य-परंपरा की मान्यता है
दीपक / बातीदीया / बत्ती
जोति बरै दिन रातीज्योति/लौ दिन-रात जलती है
सुहागाबोरेक्स; धातु के परिष्कार में फ्लक्स के रूप में उपयोगी पदार्थ
दासादास, सेवक
तोरौ / जोरौतोड़ूँ (तोड़ें) / जोड़ूँ
तीरथ बरततीर्थ-यात्रा और व्रत
अंदेसाचिंता, संदेह, आशंका
चरन कमलचरण-कमल (कमल जैसे कोमल चरण)
भरोसांभरोसा, सहारा
मन क्रम वचनमन, कर्म और वचन से
जोति/ज्योतिप्रकाश, रोशनी, लौ

मेरे उत्तर मेरे तर्क

निम्नलिखित प्रश्नों के सटीक उत्तर चुनिए और यह भी बताइए कि आपको ये उत्तर उपयुक्त क्यों लगते हैं।

1. “अब कैसे छूटै राम रट लागी” पंक्ति का भाव है?

(क) नाम उच्चारण की कठिनाई

(ख) नाम रटकर याद करना

(ग) आराध्य का नाम जपना

(घ) मित्रों का नाम रटना

उत्तर(ग) आराध्य का नाम जपना।रैदास को राम-नाम के जप की ऐसी लगन लग गई है कि वह अब किसी भी प्रकार नहीं छूट सकती – यही पंक्ति का भाव है।

2. “प्रभु जी तुम चंदन हम पानी” पंक्ति में आराध्य और भक्त का संबंध किस रूप में व्यक्त हुआ है?

(क) एकाकार और समरूप

(ख) तरल और तीव्र सुगंध

(ग) आश्रय और आश्रित

(घ) द्रव और ठोस

उत्तर(क) एकाकार और समरूप।जैसे पानी चंदन में मिलकर उसकी सुगंध को अपने अंग-अंग में समा लेता है, वैसे ही भक्त आराध्य से एकाकार (एकरूप) हो जाता है।

3. “तुम दीपक, हम बाती” से रैदास का क्या भाव है?

(क) दीपक और बाती का कोई मेल नहीं होता है।

(ख) दीपक बिना बाती भी जल सकता है।

(ग) भक्त आराध्य से अधिक महत्वपूर्ण है।

(घ) भक्त का आराध्य से मेल जीवन को आलोकित करता है।

उत्तर(घ) भक्त का आराध्य से मेल जीवन को आलोकित करता है।जैसे दीपक और बाती मिलकर ज्योति देते हैं, वैसे ही भक्त और आराध्य का मेल भक्त के जीवन को ज्ञान-प्रकाश से आलोकित कर देता है।

4. “जो तुम तोरौ राम मैं नहिं तोरौ” पंक्ति में रैदास का क्या आशय है?

(क) परोपकारी भक्ति भाव

(ख) आराध्य से अटूट संबंध

(ग) सांसारिक मोह

(घ) कर्मकांड पर बल

उत्तर(ख) आराध्य से अटूट संबंध।भले ही प्रभु संबंध तोड़ लें, भक्त उनसे नाता नहीं तोड़ेगा – यह आराध्य के प्रति अडिग, अटूट निष्ठा को दर्शाता है।

5. “तीरथ बरत न करूँ अंदेसा” पंक्ति से आप क्या समझते हैं?

(क) तीर्थ और व्रत आवश्यक नहीं हैं।

(ख) तीर्थ और व्रत सब आवश्यक हैं।

(ग) तीर्थ जाने से मुक्ति निश्चित है।

(घ) आराध्य के चरणों में सच्चा आश्रय है।

उत्तर(घ) आराध्य के चरणों में सच्चा आश्रय है।रैदास को तीर्थ-व्रत न कर पाने की चिंता नहीं, क्योंकि उन्हें केवल प्रभु के चरण-कमलों का ही सच्चा भरोसा एवं आश्रय है।

6. सर्वव्यापक ईश्वर की अवधारणा किस पंक्ति में व्यक्त होती है?

(क) “जहँ जहँ जाओ तुम्हरी पूजा”

(ख) “जाकी जोति बरै दिन राती”

(ग) “तुम दीपक, हम बाती”

(घ) “तीरथ बरत न करूँ अंदेसा”

उत्तर(क) “जहँ जहँ जाओ तुम्हरी पूजा”।‘जहाँ-जहाँ जाऊँ वहीं आपकी पूजा होती है’ – यह ईश्वर के सर्वत्र व्याप्त (सर्वव्यापक) होने की भावना को व्यक्त करता है।

अर्थ और भाव

(क) “प्रभु जी तुम घन बन, हम मोरा, जैसे चितवत चंद चकोरा।”

अर्थ एवं भावअर्थ: हे प्रभु! आप घन अर्थात् बादल के समान हैं और मैं मोर हूँ, जो उन बादलों को देखकर आनंद से नाच उठता है; अथवा जैसे चकोर चंद्रमा को टकटकी लगाए निहारता रहता है, वैसे ही मैं आपको निहारता रहता हूँ।भाव: इसमें भक्त का आराध्य के प्रति अनन्य प्रेम और एकनिष्ठ लगन प्रकट होती है – जैसे मोर बादल का और चकोर चंद्रमा का अनन्य प्रेमी है, वैसे ही भक्त प्रभु का अनन्य प्रेमी है।

(ख) “तीरथ बरत न करूँ अंदेसा, तुम्हरे चरन कमल एक भरोसां।”

अर्थ एवं भावअर्थ: मुझे तीर्थ-यात्रा या व्रत न कर पाने की कोई चिंता (अंदेसा) नहीं है, क्योंकि मुझे तो केवल आपके चरण-कमलों का ही एकमात्र भरोसा (सहारा) है।भाव: रैदास बाह्य आडंबरों – तीर्थ और व्रत – को नहीं, बल्कि प्रभु-चरणों की सच्ची एवं अनन्य भक्ति को ही मुक्ति का सच्चा आधार मानते हैं।

मेरी समझ मेरे विचार

1. “जो तुम तोरौ राम मैं नहिं तोरौ” पंक्ति में रैदास की अपने आराध्य में अटूट निष्ठा का भाव है। इससे आप क्या समझते हैं? विस्तार से लिखिए।

उत्तररैदास कहते हैं कि भले ही प्रभु (राम) उनसे संबंध तोड़ लें, पर वे प्रभु से अपना नाता कभी नहीं तोड़ेंगे, क्योंकि उनके सिवा वे किससे नाता जोड़ें?इससे भक्त की एकनिष्ठ, अडिग और बिना शर्त की भक्ति प्रकट होती है।भक्त का प्रेम स्वार्थरहित और अटूट है – यह आराध्य के व्यवहार पर निर्भर नहीं करता, बल्कि भक्त अपनी ओर से सदा प्रभु से जुड़ा रहता है।

2. रैदास ने तीर्थ और व्रत के स्थान पर किस साधन को भक्ति का प्रमुख आधार माना है? आपके विचार से भक्ति के क्या आधार हो सकते हैं?

उत्तररैदास ने तीर्थ और व्रत जैसे बाह्य कर्मकांडों के स्थान पर प्रभु के चरण-कमलों में अटूट विश्वास एवं अनन्य भक्ति को भक्ति का प्रमुख आधार माना है।मेरे विचार से भक्ति के आधार हो सकते हैं – सच्चा प्रेम, श्रद्धा, मन की शुद्धता, ईश्वर के प्रति समर्पण और निष्कपट विश्वास। (अपने विचार जोड़ें।)

3. दोनों पदों में भक्त और आराध्य के संबंध को किन-किन प्रतीकों/उपमाओं से व्यक्त किया गया है? लिखिए।

उत्तरचंदन – पानी, घन (बादल) – मोर, चंद्रमा – चकोर, दीपक – बाती, मोती – धागा, सोना – सुहागा तथा स्वामी – दास।इन सभी उपमाओं/प्रतीकों के द्वारा रैदास ने भक्त और आराध्य के अटूट, अभिन्न एवं समर्पित संबंध को व्यक्त किया है।

कविता का सौंदर्य (अलंकार)

पंक्तिअलंकारस्पष्टीकरण
“जैसे चितवत चंद चकोरा”अनुप्रास‘च’ व्यंजन की आवृत्ति एक से अधिक बार होने से अनुप्रास अलंकार।
“जैसे सोने मिलत सुहागा”उपमाप्रसिद्ध वस्तु (सोना-सुहागा) की समानता के आधार पर तुलना होने से उपमा अलंकार।
“तुम्हरे चरन कमल एक भरोसां”रूपकचरणों में कमल का अभेद आरोप (चरण ही कमल) होने से रूपक अलंकार।

अन्य कविताओं से अलंकार खोजिए — नमूना

अलंकारपाठ में उदाहरणकारण
अनुप्रासराम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद: “सुर मुनि नाग नगर नर नारी”नाग, नगर, नर, नारी में न ध्वनि की आवृत्ति।
उपमाराम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद: “सहसबाहु सम सो रिपु मोरा”शत्रु की सहस्रबाहु से तुलना; सम वाचक शब्द है।
रूपकराम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद: “पद सरोज”पद अर्थात् चरणों में सरोज अर्थात् कमल का अभेद आरोप।

इन पंक्तियों को अध्याय 9 के संवाद में संदर्भ सहित पढ़ें।

कविता की अन्य विशेषताएँ

विशेषताउदाहरण (पंक्ति)
अनन्य भक्ति भाव“जो तुम तोरौ राम मैं नहिं तोरौ, तुम सौ तोरि कवन सौं जोरौ।”
सरल और लोकधर्मी भाषा“प्रभु जी तुम चंदन हम पानी, जाकी अंग-अंग बास समानी।”
उपमा और तुलना“प्रभु जी तुम मोती, हम धागा, जैसे सोने मिलत सुहागा।”
लयात्मकता/गेयता/ध्वन्यात्मकता“प्रभु जी तुम दीपक, हम बाती, जाकी जोति बरै दिन राती।” (तुकांत – पानी/समानी, मोरा/चकोरा)
दृढ़ निष्ठा और आस्था“तीरथ बरत न करूँ अंदेसा, तुम्हरे चरन कमल एक भरोसां।”

समाज और विज्ञान से संबंध

1. रैदास और कबीर ने निराकार आराध्य की भक्ति पर बल क्यों दिया होगा?

चर्चा का नमूना: तत्कालीन समाज में जातिगत ऊँच-नीच, धार्मिक आडंबर और साधारण लोगों के लिए धार्मिक अवसरों की असमानता जैसी समस्याएँ थीं। निराकार ईश्वर और आंतरिक भक्ति का विचार जन्म, धन या बाहरी चिह्न के बजाय मन की सच्चाई को महत्व देता था। लोकभाषा में रचना से यह संदेश व्यापक लोगों तक पहुँचा। दोनों कवियों के विचार पूरी तरह एक जैसे मानने के बजाय उनके अपने पदों के उदाहरण देखें। सामाजिक विज्ञान के शिक्षक से चर्चा करके उत्तर बढ़ाएँ।

2. सुहागा का रासायनिक नाम और विशेषताएँ

सामान्य सुहागा बोरेक्स / सोडियम टेट्राबोरेट डेकाहाइड्रेट है; प्रचलित सूत्र Na₂B₄O₇·10H₂O है। यह सामान्यतः सफेद क्रिस्टलीय पदार्थ होता है। धातु-कार्य में बोरेट फ्लक्स धात्विक ऑक्साइडों को घोलने और ऑक्सीकरण कम करने में सहायक होते हैं। इसलिए सोने के परिष्कार से जुड़ी उपमा में जीवन के निखार का भाव है; सुहागा सोने को किसी जादुई प्रक्रिया से नहीं चमकाता।

विज्ञान-जानकारी: U.S. Borax — बोरेक्स की पहचान और धातु-परिष्कार में उपयोग।

व्याकरण की बात

संज्ञा एवं सर्वनाम (पदों से)

उत्तरसंज्ञा: राम, चंदन, दीपक (अन्य – मोती, बाती, तीरथ)।सर्वनाम: तुम, हम, मैं (अन्य – जो, जाकी)।

शब्दों के अन्य रूप/पर्याय

पद का शब्दप्रचलित/अन्य शब्द
मोरामोर, मयूर
चकोराचकोर
बातीबत्ती
रातीरात, रात्रि
सोनेस्वर्ण, कनक
तीरथतीर्थ
बरतव्रत, उपवास

गायन और रचनात्मक गतिविधियाँ

1. समूह में पदों का गायन या पाठ

एक समूह पहला और दूसरा समूह दूसरा पद चुने। पहले शब्दार्थ समझें, फिर सही उच्चारण और विराम के साथ धीमी लय में अभ्यास करें। एक विद्यार्थी आरंभिक पंक्ति पढ़े और साथी शेष पंक्तियाँ मिलकर प्रस्तुत करें। प्रस्तुति के बाद श्रोता बताएं कि किन शब्दों से समर्पण और निष्ठा का भाव स्पष्ट हुआ। यह कार्य कक्षा में स्वयं करना है।

2. भक्त और आराध्य का संवाद — कल्पित नमूना

भक्त: प्रभु, आप चंदन हैं; मैं आपके गुणों की सुगंध अपने जीवन में बसाना चाहता हूँ।
आराध्य: तब अपने व्यवहार में प्रेम और करुणा लाओ।
भक्त: आप दीपक हैं और मैं बाती; आपके साथ जीवन में उजाला मिलता है।
आराध्य: उस उजाले से दूसरों की राह भी सरल बनाओ।
भक्त: मोती और धागे की तरह मैं आपसे जुड़ा रहूँगा।
आराध्य: सच्चाई और सेवा से अपने संकल्प को निभाओ।

यह पदों के प्रतीकों से प्रेरित मौलिक कल्पना है, मूल कविता का संवाद नहीं।

3. अटूट मित्रता पर लघुकथा — नमूना

वापस आई दोस्ती: आरव को लगा कि उसके मित्र समीर ने उसकी कॉपी छिपाई है। वह नाराज होकर बातचीत बंद कर बैठा। समीर ने कहा, “मैं तुम्हारा मित्र हूँ; पहले सच्चाई खोज लेते हैं।” दोनों ने कक्षा में तलाश की। कॉपी एक दूसरी मेज के नीचे मिली। आरव ने अपनी गलती स्वीकार कर क्षमा माँगी। समीर मुसकराया, “अगली बार अनुमान लगाने से पहले पूछ लेना।” विश्वास और संवाद ने उनकी मित्रता को फिर मजबूत कर दिया।

अपनी कहानी में गलतफहमी, सच्चाई का पता चलना और सम्मानपूर्वक समाधान जैसे प्रसंग जोड़ सकते हैं।

विस्तार: रैदास और नामदेव के पद

पाठ के अंत में दिए नामदेव के पहले पद में संसार और संबंधों की अस्थिरता पर प्रश्न तथा सद्गुरु से परम तत्व की पहचान है। दूसरे पद में बछड़े के बिना गाय और जल के बिना मछली जैसे बिंबों से ईश्वर-विरह की व्याकुलता व्यक्त होती है।

आधाररैदास के पदनामदेव के दिए पद
मुख्य भावअटूट भरोसा, दास्य और समर्पण।सांसारिक अस्थिरता, परम तत्व की खोज और विरह।
उदाहरणचंदन-पानी, दीपक-बाती, मोती-धागा।वृक्ष पर पक्षियों का बसेरा, गाय-बछड़ा, जल-मछली।
गुरु की भूमिकाइन दो पदों में गुरु का प्रत्यक्ष वर्णन नहीं।सद्गुरु की कृपा से परम तत्व की पहचान स्पष्ट है।
समानतालोकभाषा और परिचित वस्तुओं से आंतरिक भक्ति की अभिव्यक्ति।सहज उपमाएँ, नाम-स्मरण और प्रभु के प्रति अनन्य प्रेम।

चर्चा: समानताएँ और अंतर इन्हीं दिए गए पदों के आधार पर लिखें। संपूर्ण संत-परंपरा या किसी कवि के सभी विचारों पर इनसे अकेले निष्कर्ष न निकालें। नामदेव के पद में लौकिक आकर्षण की तुलना प्रेम की तीव्रता दिखाती है; वह हर सांसारिक आचरण को सही ठहराने का कथन नहीं है।

खोजबीन

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अतिरिक्त प्रश्न

अति लघु उत्तरीय

1. ‘पद’ के रचयिता कौन हैं और वे किस काल के कवि हैं?

उत्तरइन पदों के रचयिता संत रैदास (रविदास) हैं, जो भक्तिकाल (निर्गुण संत काव्य-धारा) के कवि हैं।

2. रैदास ने सच्चा धर्म किसे माना है?

उत्तरउन्होंने बाह्य आडंबरों के स्थान पर मन की शुद्धता और आंतरिक भक्ति को ही सच्चा धर्म माना है।

3. रैदास की रचनाएँ किस ग्रंथ में संकलित हैं?

उत्तरउनकी रचनाएँ ‘रैदास बानी’ में संकलित हैं तथा कुछ रचनाएँ ‘आदि श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी’ में भी शामिल हैं।

लघु उत्तरीय

4. पहले पद में रैदास ने भक्त और आराध्य के संबंध को किन उपमाओं से स्पष्ट किया है?

उत्तररैदास ने चंदन-पानी, बादल-मोर, चंद्रमा-चकोर, दीपक-बाती, मोती-धागा, सोना-सुहागा और स्वामी-दास जैसी उपमाओं का प्रयोग किया है।इनसे यह स्पष्ट होता है कि भक्त और आराध्य का संबंध अटूट एवं अभिन्न है – इन जोड़ों का काव्यात्मक मेल निकटता और समर्पण को समझाता है; इसे हर वस्तु के लिए वैज्ञानिक निर्भरता का नियम नहीं मानना चाहिए।

5. ‘सोने मिलत सुहागा’ उपमा से रैदास क्या कहना चाहते हैं?

उत्तरजैसे धातु के परिष्कार में सुहागा सहायक होता है, वैसे ही आराध्य का साथ पाकर भक्त का जीवन निखर एवं शुद्ध हो जाता है।इससे भक्त और प्रभु के परस्पर पूरक एवं अभिन्न संबंध का बोध होता है।

दीर्घ उत्तरीय

6. रैदास के पदों में व्यक्त भक्ति-भावना की प्रमुख विशेषताएँ लिखिए।

उत्तरअनन्यता: भक्त अपने आराध्य के प्रति पूर्ण रूप से समर्पित है और किसी अन्य को नहीं भजता।अटूट निष्ठा: प्रभु के संबंध तोड़ने पर भी भक्त नाता नहीं तोड़ता।आडंबर-विरोध: तीर्थ-व्रत जैसे बाह्य कर्मकांडों के स्थान पर प्रभु-चरणों की सच्ची भक्ति को महत्व।दास्य भाव एवं सर्वव्यापकता: स्वयं को प्रभु का दास मानना तथा ईश्वर को सर्वत्र व्याप्त अनुभव करना। भाषा सरल, लोकधर्मी एवं गेय है।

अभ्यास MCQ & अभिकथन-कारण

1. रैदास का जन्म कहाँ हुआ माना जाता है?

(क) काशी (वाराणसी)

(ख) मथुरा

(ग) अयोध्या

(घ) प्रयाग

उत्तर(क) काशी (वाराणसी)।

2. रैदास ने अपने पदों में मुख्यतः किस भाषा का प्रयोग किया है?

(क) संस्कृत

(ख) सरल, व्यावहारिक ब्रजभाषा

(ग) शुद्ध खड़ी बोली

(घ) केवल अवधी

उत्तर(ख) सरल, व्यावहारिक ब्रजभाषा (जिसमें अवधी, राजस्थानी, खड़ी बोली व उर्दू-फारसी के शब्द भी मिले हैं)।

3. ‘स्वामी–दास’ उपमा किस भाव को दर्शाती है?

(क) समानता का भाव

(ख) दास्य भाव (पूर्ण समर्पण)

(ग) मित्रता का भाव

(घ) विरोध का भाव

उत्तर(ख) दास्य भाव (पूर्ण समर्पण)।

4. ‘अंदेसा’ शब्द का अर्थ है—

(क) चिंता/संदेह

(ख) प्रसन्नता

(ग) तीर्थ

(घ) पूजा

उत्तर(क) चिंता/संदेह।

अभिकथन-कारण – नीचे अभिकथन (A) और कारण (R) दिए गए हैं। सही विकल्प चुनिए—
(क) A और R दोनों सही, R, A की सही व्याख्या है। (ख) A और R दोनों सही, पर R, A की सही व्याख्या नहीं। (ग) A सही, R गलत। (घ) A गलत, R सही।

1. अभिकथन (A): रैदास तीर्थ और व्रत न कर पाने की चिंता नहीं करते।

कारण (R): उन्हें केवल प्रभु के चरण-कमलों का ही एकमात्र भरोसा है।

उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है।

2. अभिकथन (A): रैदास बाह्य आडंबरों को सच्चा धर्म मानते हैं।

कारण (R): उन्होंने मन की शुद्धता और आंतरिक भक्ति को सच्चा धर्म माना है।

उत्तर(घ) A गलत है (वे आडंबरों का खंडन करते हैं), जबकि R सही है।

3. अभिकथन (A): “जहँ जहँ जाओ तुम्हरी पूजा” पंक्ति ईश्वर की सर्वव्यापकता दर्शाती है।

कारण (R): रैदास ईश्वर को सर्वत्र विद्यमान मानते हैं।

उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

‘पद’ के रचयिता कौन हैं?

इन पदों के रचयिता भक्तिकाल के निर्गुण संत कवि रैदास (रविदास) हैं।

“अब कैसे छूटै राम रट लागी” का क्या अर्थ है?

रैदास को राम-नाम के जप की ऐसी लगन लग गई है कि वह अब किसी भी प्रकार नहीं छूट सकती।

रैदास ने भक्ति का सच्चा आधार किसे माना है?

तीर्थ-व्रत जैसे बाह्य आडंबरों के स्थान पर प्रभु के चरणों में अटूट विश्वास एवं अनन्य भक्ति को।

पहले पद में कौन-कौन सी उपमाएँ प्रयुक्त हुई हैं?

चंदन-पानी, बादल-मोर, चंद्रमा-चकोर, दीपक-बाती, मोती-धागा, सोना-सुहागा और स्वामी-दास।

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