कक्षा 9 हिंदी (गंगा) अध्याय 9 ‘राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद’ – प्रश्न-उत्तर, भावार्थ एवं व्याख्या (NCERT 2026–27)
यह पृष्ठ कक्षा 9 हिंदी की नई पुस्तक गंगा (काव्य खंड) के अध्याय 9 ‘राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद’ (कवि – गोस्वामी तुलसीदास; रामचरितमानस के बालकांड से) का पूरा समाधान देता है – भावार्थ, शब्दार्थ तथा सभी अभ्यास-प्रश्नों के उत्तर।
कवि परिचय – गोस्वामी तुलसीदास
गोस्वामी तुलसीदास का जन्म आज के उत्तर प्रदेश में हुआ था। इनका जीवन-काल 16वीं–17वीं शताब्दी (सन् 1532–1623) के मध्य माना जाता है। रामचरितमानस उनका प्रसिद्ध महाकाव्य है, जो उनकी अनन्य रामभक्ति और सृजनात्मक कौशल का मनोरम उदाहरण है। उनकी अन्य प्रमुख रचनाएँ हैं – कवितावली, गीतावली, दोहावली, कृष्णगीतावली, विनयपत्रिका, हनुमान बाहुक। उनकी रचनाओं में राम मानवीय मर्यादाओं और आदर्शों के प्रतीक हैं, जिनके माध्यम से उन्होंने नीति, स्नेह, शील, विनय और त्याग जैसे मूल्यों को प्रतिष्ठित किया। उन्हें अवधी और ब्रज दोनों भाषाओं पर समान अधिकार था – रामचरितमानस की रचना अवधी में तथा विनयपत्रिका व कवितावली की रचना ब्रजभाषा में की। काशी में उनका देहावसान हुआ।
पद्यांश (मूल पाठ)
प्रस्तुत अंश रामचरितमानस के ‘बालकांड’ से है। सीता-स्वयंवर में श्रीराम द्वारा शिव-धनुष भंग का समाचार पाकर मुनि परशुराम क्रोधित होकर सभा में आते हैं।
पितु समेत कहि कहि निज नामा। लगे करन सब दंड प्रनामा॥
जेहि सुभायँ चितवहिं हितु जानी। सो जानइ जनु आइ खटानी॥
जनक बहोरि आइ सिरु नावा। सीय बोलाइ प्रनामु करावा॥
आसिष दीन्हि सखीं हरषानीं। निज समाज लै गइ सयानीं॥
बिस्वामित्रु मिले पुनि आई। पद सरोज मेले दोउ भाई॥
रामु लखनु दसरथ के ढोटा। दीन्हि असीस देखि भल जोटा॥
रामहि चितइ रहे थकि लोचन। रूप अपार मार मद मोचन॥
बहुरि बिलोकि बिदेह सन कहहु काह अति भीर।
पूछत जानि अजान जिमि ब्यापेउ कोपु सरीर॥
सुनत बचन फिरि अनत निहारे। देखे चापखंड महि डारे॥
अति रिस बोले बचन कठोरा। कहु जड़ जनक धनुष कै तोरा॥
बेगि देखाउ मूढ़ न त आजू। उलटउँ महि जहँ लहि तव राजू॥
अति डरु उतरु देत नृपु नाहीं। कुटिल भूप हरषे मन माहीं॥
सुर मुनि नाग नगर नर नारी। सोचहिं सकल त्रास उर भारी॥
मन पछिताति सीय महतारी। बिधि अब सँवरी बात बिगारी॥
भृगुपति कर सुभाउ सुनि सीता। अरध निमेष कलप सम बीता॥
सभय बिलोके लोग सब जानि जानकी भीरु।
हृदयँ न हरषु बिषादु कछु बोले श्रीरघुबीरु॥
आयसु काह कहिअ किन मोही। सुनि रिसाइ बोले मुनि कोही॥
सेवकु सो जो करै सेवकाई। अरि करनी करि करिअ लराई॥
सुनहु राम जेहिं सिवधनु तोरा। सहसबाहु सम सो रिपु मोरा॥
सो बिलगाउ बिहाइ समाजा। न त मारे जैहहिं सब राजा॥
सुनि मुनि बचन लखन मुसुकाने। बोले परसुधरहि अपमाने॥
बहु धनुहीं तोरीं लरिकाई। कबहुँ न असि रिस कीन्हि गोसाईं॥
एहि धनु पर ममता केहि हेतू। सुनि रिसाइ कह भृगुकुलकेतू॥
रे नृप बालक काल बस बोलत तोहि न सँभार।
धनुही सम तिपुरारि धनु बिदित सकल संसार॥
(स्रोत – रामचरितमानस, बालकांड, गोस्वामी तुलसीदास।)
भावार्थ
परशुराम के भयानक रूप को देखकर सभा में उपस्थित सभी राजा भय से व्याकुल होकर उठ खड़े हुए और अपने पिता सहित अपना-अपना नाम बता-बताकर परशुराम को दंडवत प्रणाम करने लगे। परशुराम जिस किसी राजा को भी सहज भाव से (हितैषी जानकर) देख लेते, उसे लगता मानो उसकी मृत्यु निकट आ गई हो। फिर राजा जनक ने आकर सिर नवाया और सीता को बुलाकर भी प्रणाम कराया। परशुराम ने आशीर्वाद दिया, तब चतुर सखियाँ हर्षित होकर सीता को अपने समाज (दल) के साथ ले गईं।
इसके बाद विश्वामित्र ने आकर राम-लक्ष्मण दोनों भाइयों को परशुराम के चरण-कमलों में प्रणाम कराया और परिचय दिया कि ये राजा दशरथ के पुत्र राम और लक्ष्मण हैं। सुंदर जोड़ी देखकर परशुराम ने आशीर्वाद दिया, परंतु राम के अपार सौंदर्य को देखकर उनकी आँखें ठगी-सी रह गईं। फिर परशुराम ने जनक की ओर देखकर पूछा कि इतनी भीड़ किसलिए है? जानते हुए भी अनजान बनकर पूछते ही उनके शरीर में क्रोध व्याप्त हो गया।
जनक ने वह समाचार सुनाया कि जिस कारण सभी राजा एकत्र हुए हैं। यह सुनते ही परशुराम ने पलटकर देखा तो टूटे हुए धनुष के टुकड़े धरती पर पड़े दिखाई दिए। अत्यंत क्रोध में वे कठोर वचन बोले – “हे मूर्ख जनक! बता, धनुष किसने तोड़ा? शीघ्र दिखा, नहीं तो आज मैं तेरे समस्त राज्य को उलट दूँगा।” भय के मारे जनक कोई उत्तर नहीं दे पाते, पर कुटिल राजा मन-ही-मन प्रसन्न होते हैं। देवता, मुनि, नाग तथा नगर के सभी नर-नारी हृदय में भारी भय के कारण चिंतित हो उठते हैं। सीता की माता मन-ही-मन पछताती हैं कि विधाता ने बनी-बनाई बात बिगाड़ दी। परशुराम के क्रोधी स्वभाव को सुनकर सीता को आधा क्षण भी एक कल्प के समान बीतता प्रतीत होता है।
सभी लोगों को भयभीत देखकर और जानकी (सीता) को डरी हुई जानकर श्रीराम बोले – उनके हृदय में न तो हर्ष था, न विषाद। उन्होंने अत्यंत विनम्रता से कहा – “हे नाथ! शिव-धनुष को तोड़ने वाला आपका ही कोई एक दास होगा; आपकी क्या आज्ञा है, मुझसे क्यों नहीं कहते?” यह सुनकर क्रोधी मुनि परशुराम बोले – “सेवक वह है जो सेवा करे; शत्रु जैसा काम करके तो युद्ध ही करना पड़ता है। सुनो राम! जिसने शिव-धनुष तोड़ा है, वह सहस्रबाहु के समान मेरा शत्रु है। वह इस समाज को छोड़कर अलग हो जाए, नहीं तो सभी राजा मारे जाएँगे।”
मुनि के वचन सुनकर लक्ष्मण मुसकराए और परशुराम का उपहास करते हुए बोले – “बचपन में हमने ऐसी बहुत-सी छोटी धनुहियाँ तोड़ डालीं, पर आपने कभी ऐसा क्रोध नहीं किया। इस (शिव) धनुष पर ही इतनी ममता किस कारण?” यह सुनकर भृगुकुल के ध्वज (परशुराम) क्रोधित होकर बोले – “रे राजपुत्र! काल के वश में होकर तुझे बोलने में संभल नहीं है। यह कोई साधारण धनुही नहीं, बल्कि त्रिपुरारि (शिव) का धनुष है, जिसे सारा संसार जानता है।” (आगे की कथा में राम के विनय और विश्वामित्र के समझाने से परशुराम का क्रोध शांत होता है।)
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| भृगुपति / भृगुकुलकेतू | परशुराम (भृगुकुल के स्वामी/ध्वज) |
| कराला | भयानक, डरावना |
| भुआला | राजा, भूपाल |
| सुभायँ | स्वभाव, सहज प्रकृति |
| चितवहिं | देखना, निरखना |
| खटानी | पूरी होना, समाप्त होना (यहाँ – मृत्यु निकट आना) |
| बहोरि | फिर, पीछे |
| आसिष / असीस | आशीर्वाद |
| ढोटा | पुत्र, बेटा |
| जोटा | जोड़ा |
| लोचन | आँख |
| अनत | अन्यत्र, और कहीं |
| चापखंड | धनुष का टुकड़ा |
| रिस | रोष, क्रोध |
| बेगि | शीघ्र, जल्दी |
| महि | पृथ्वी |
| त्रास | भय, डर |
| बिधि | विधाता, ईश्वर |
| अरध निमेष | आधा क्षण, आधा पल |
| कलप (कल्प) | ब्रह्मा का एक दिन; अत्यंत लंबा काल |
| भीरु | भयभीत, डरा हुआ |
| भंजनिहारा | तोड़ने वाला |
| आयसु | आज्ञा, आदेश |
| कोही | क्रोधी |
| सहसबाहु | सहस्रबाहु (एक पौराणिक शत्रु) |
| बिलगाउ / बिहाइ | अलग हो जाए / छोड़कर |
| परसुधर | परशुराम (फरसा धारण करने वाले) |
| लरिकाई | लड़कपन, बचपन में |
| तिपुरारि | त्रिपुरारि, शिव |
मेरे उत्तर मेरे तर्क
निम्नलिखित प्रश्नों के सटीक उत्तर चुनिए और यह भी बताइए कि आपको ये उत्तर उपयुक्त क्यों लगते हैं।
1. “पितु समेत कहि कहि निज नामा। लगे करन सब दंड प्रनामा।।” यह पंक्ति सभा में उपस्थित लोगों की किस मनःस्थिति को दर्शाती है?
(क) आदर और सम्मान
(ख) भक्ति और श्रद्धा
(ग) भय और शिष्टाचार
(घ) प्रेम और सहिष्णुता
2. “जनक बहोरि आइ सिरु नावा। सीय बोलाइ प्रनामु करावा” पंक्ति से राजा जनक के व्यवहार की कौन-सी विशेषता उद्घाटित होती है?
(क) संवेदनशीलता
(ख) शिष्टता
(ग) सहनशीलता
(घ) उदासीनता
3. “अति रिस बोले बचन कठोरा।” जनक के प्रति परशुराम के कठोर वचन बोलने का मूल कारण था—
(क) उचित आदर-सत्कार न मिलना
(ख) जनक द्वारा समाचार छिपाना
(ग) शिव-धनुष का खंडित होना
(घ) अन्य राजाओं की सभा में उपस्थिति
4. राम का कथन “होइहि केउ एक दास तुम्हारा” उनके व्यक्तित्व की किस विशेषता को दर्शाता है?
(क) कूटनीति और चतुराई
(ख) विनम्रता और मर्यादा
(ग) त्याग और समर्पण
(घ) दृढ़ता और आत्मविश्वास
5. “सुनि मुनि बचन लखन मुसुकाने। बोले परसुधरहि अपमाने।।” लक्ष्मण के मुसकराने और उपहास भरे वचनों का क्या कारण था?
(क) वे सभा में अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करना चाहते थे।
(ख) उन्हें राम के प्रति अपना प्रेम प्रदर्शित करना था।
(ग) वे परशुराम की शक्ति से अनभिज्ञ थे।
(घ) वे परशुराम को चुनौती देना चाहते थे।
मेरी समझ मेरे विचार
1. “अरध निमेष कलप सम बीता” पंक्ति का भाव स्पष्ट करते हुए बताइए कि कविता में यह किसके संदर्भ में कहा गया है और क्यों?
2. “सो बिलगाउ बिहाइ समाजा। न त मारे जैहहिं सब राजा।।” पंक्ति के आधार पर बताइए कि परशुराम द्वारा दी गई इस चेतावनी का सभा में उपस्थित राज-समाज पर क्या प्रभाव पड़ा होगा? तर्क सहित उत्तर दीजिए।
3. तुलसीदास ने राम और लक्ष्मण के माध्यम से एक ही परिस्थिति के प्रति दो अलग-अलग प्रतिक्रियाएँ दिखाई हैं। आपकी दृष्टि में परशुराम के क्रोध को शांत करने के लिए राम का ‘विनय’ का मार्ग उचित है या लक्ष्मण के ‘तर्क’ का? कारण सहित लिखिए।
4. ‘हृदयँ न हरषु बिषादु कछु बोले श्रीरघुबीरु॥’ श्रीराम के हृदय में न हर्ष था, न विषाद। यह उनके व्यक्तित्व के किन गुणों को दर्शाता है? उनका भावनात्मक संतुलन इस पूरे पाठ में उन्हें अन्य पात्रों से अलग कैसे स्थापित करता है?
मेरी कल्पना मेरे अनुमान
1. कल्पना कीजिए कि आप जनक की सभा में उपस्थित एक राजा हैं। परशुराम जी के आगमन से लेकर उनके गमन तक की कथा अपने शब्दों में लिखिए।
2. “अति डरु उतरु देत नृपु नाहीं। कुटिल भूप हरषे मन माहीं॥” जनक द्वारा डर से चुप रहने पर अन्य राजा मन में प्रसन्न क्यों हुए होंगे?
कविता का सौंदर्य
संवाद की विशेषताएँ (उदाहरण सहित)
| विशेषता | उदाहरण (पंक्ति) |
|---|---|
| राम की विनम्रता | “नाथ संभुधनु भंजनिहारा। होइहि केउ एक दास तुम्हारा॥” |
| परशुराम का रौद्र रूप | “अति रिस बोले बचन कठोरा। कहु जड़ जनक धनुष कै तोरा॥” |
| लक्ष्मण का प्रत्युत्तर | “बहु धनुहीं तोरीं लरिकाई। कबहुँ न असि रिस कीन्हि गोसाईं॥” |
| पौराणिक संदर्भ | “सहसबाहु सम सो रिपु मोरा” / “धनुही सम तिपुरारि धनु” |
| नाटकीयता | “बेगि देखाउ मूढ़ न त आजू। उलटउँ महि जहँ लहि तव राजू॥” |
अलंकार
| अलंकार | अर्थ | उदाहरण |
|---|---|---|
| अनुप्रास | एक ही वर्ण की बार-बार आवृत्ति | “अरि करनी करि करिअ लराई” |
| अतिशयोक्ति | बात को बढ़ा-चढ़ाकर कहना | “अरध निमेष कलप सम बीता” |
| रूपक | रूप का आरोपण करना | “पद सरोज मेले दोउ भाई” (चरण ही कमल) |
व्याकरण की बात
गद्य-रूप (चौपाई का अर्थ)
संवाद-मिलान (कौन-सा कथन किसका)
| कथन | पात्र |
|---|---|
| शिव के धनुष को तोड़ने वाला आपका कोई दास ही हो सकता है। | राम |
| विधाता ने बनी-बनाई बात बिगाड़ दी। | सीता की माता (सुनयना) |
| सेवक वह होता है जो सेवा का काम करे। | परशुराम |
| इस कारण ये सब राजा आए हैं। | राजा जनक |
| बचपन में हमने ऐसी बहुत-सी धनुहियाँ तोड़ डाली हैं। | लक्ष्मण |
| क्या आज्ञा है, मुझसे क्यों नहीं कहते? | राम |
| कहो जनक, किस कारण यह भीड़ है? | परशुराम |
| इसी धनुष पर इतनी ममता क्यों! | लक्ष्मण |
अवधी शब्द एवं खड़ी बोली रूप
| अवधी शब्द | खड़ी बोली |
|---|---|
| कोही | क्रोधी |
| वेषु | वेष |
| भुआला | राजा |
| लोचन | आँख |
| रिस | क्रोध |
| बेगि | शीघ्र |
| महि | पृथ्वी |
| ढोटा | पुत्र |
| आसिष | आशीर्वाद |
अतिरिक्त प्रश्न
अति लघु उत्तरीय
1. यह पद्यांश किस ग्रंथ और किस कांड से लिया गया है?
2. परशुराम के क्रोधित होकर सभा में आने का क्या कारण था?
3. राम-लक्ष्मण का परशुराम से परिचय किसने कराया?
लघु उत्तरीय
4. राम और लक्ष्मण के स्वभाव में क्या अंतर इस संवाद से प्रकट होता है?
5. परशुराम ने शिव-धनुष की तुलना किससे की और क्यों?
दीर्घ उत्तरीय
6. इस संवाद के आधार पर परशुराम के चरित्र की विशेषताएँ लिखिए।
अभ्यास MCQ & अभिकथन-कारण
1. यह पद्यांश किस कवि की रचना है?
(क) कबीर
(ख) रैदास
(ग) गोस्वामी तुलसीदास
(घ) सूरदास
2. रामचरितमानस की रचना किस भाषा में हुई है?
(क) ब्रजभाषा
(ख) अवधी
(ग) संस्कृत
(घ) मैथिली
3. ‘भृगुकुलकेतू’ किसके लिए प्रयुक्त संबोधन है?
(क) राम
(ख) लक्ष्मण
(ग) परशुराम
(घ) जनक
4. ‘लरिकाई’ शब्द का अर्थ है—
(क) बचपन/लड़कपन
(ख) क्रोध
(ग) धनुष
(घ) आशीर्वाद
अभिकथन-कारण – नीचे अभिकथन (A) और कारण (R) दिए गए हैं। सही विकल्प चुनिए—
(क) A और R दोनों सही, R, A की सही व्याख्या है। (ख) A और R दोनों सही, पर R, A की सही व्याख्या नहीं। (ग) A सही, R गलत। (घ) A गलत, R सही।
1. अभिकथन (A): परशुराम सभा में क्रोधित होकर आए।
कारण (R): उनके आराध्य शिव का धनुष भंग हो गया था।
2. अभिकथन (A): राम ने क्रोधित परशुराम का तर्क और उपहास से सामना किया।
कारण (R): राम विनम्र, धीर एवं मर्यादित स्वभाव के थे।
3. अभिकथन (A): धनुष-भंग के बाद सीता अत्यंत व्यग्र हो उठती हैं।
कारण (R): परशुराम के क्रोध से राम पर संकट आने की आशंका उन्हें सताती है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
‘राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद’ किस ग्रंथ से लिया गया है?
यह गोस्वामी तुलसीदास रचित रामचरितमानस के बालकांड से लिया गया है।
परशुराम सभा में क्रोधित होकर क्यों आए?
क्योंकि सीता-स्वयंवर में श्रीराम ने उनके आराध्य शिव का धनुष भंग कर दिया था।
इस संवाद में राम का स्वभाव कैसा प्रकट होता है?
राम धीर, गंभीर, विनम्र एवं मर्यादित प्रकट होते हैं; उनके हृदय में न हर्ष था, न विषाद।
लक्ष्मण और राम की प्रतिक्रिया में क्या अंतर है?
लक्ष्मण तर्क एवं व्यंग्य से परशुराम को चुनौती देते हैं, जबकि राम विनय से उनका क्रोध शांत करना चाहते हैं।
पद्यांश एवं प्रश्न NCERT गंगा पुस्तक से ज्यों-के-त्यों लिए गए हैं; भावार्थ एवं उत्तर ClearStudy द्वारा मौलिक रूप से तैयार किए गए हैं।
