कक्षा 9 हिंदी (गंगा) अध्याय 9 ‘राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद’ – प्रश्न-उत्तर, भावार्थ एवं व्याख्या (NCERT 2026–27)

यह पृष्ठ कक्षा 9 हिंदी की नई पुस्तक गंगा (काव्य खंड) के अध्याय 9 ‘राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद’ (कवि – गोस्वामी तुलसीदास; रामचरितमानस के बालकांड से) का पूरा समाधान देता है – भावार्थ, शब्दार्थ तथा सभी अभ्यास-प्रश्नों के उत्तर।

कक्षा: 9 विषय: हिंदी पुस्तक: गंगा (काव्य खंड) अध्याय: 9 कवि: गोस्वामी तुलसीदास स्रोत: रामचरितमानस (बालकांड) सत्र: 2026–27

कवि परिचय – गोस्वामी तुलसीदास

गोस्वामी तुलसीदास का जन्म आज के उत्तर प्रदेश में हुआ था। इनका जीवन-काल 16वीं–17वीं शताब्दी (सन् 1532–1623) के मध्य माना जाता है। रामचरितमानस उनका प्रसिद्ध महाकाव्य है, जो उनकी अनन्य रामभक्ति और सृजनात्मक कौशल का मनोरम उदाहरण है। उनकी अन्य प्रमुख रचनाएँ हैं – कवितावली, गीतावली, दोहावली, कृष्णगीतावली, विनयपत्रिका, हनुमान बाहुक। उनकी रचनाओं में राम मानवीय मर्यादाओं और आदर्शों के प्रतीक हैं, जिनके माध्यम से उन्होंने नीति, स्नेह, शील, विनय और त्याग जैसे मूल्यों को प्रतिष्ठित किया। उन्हें अवधी और ब्रज दोनों भाषाओं पर समान अधिकार था – रामचरितमानस की रचना अवधी में तथा विनयपत्रिकाकवितावली की रचना ब्रजभाषा में की। काशी में उनका देहावसान हुआ।

पद्यांश (मूल पाठ)

प्रस्तुत अंश रामचरितमानस के ‘बालकांड’ से है। सीता-स्वयंवर में श्रीराम द्वारा शिव-धनुष भंग का समाचार पाकर मुनि परशुराम क्रोधित होकर सभा में आते हैं।

देखत भृगुपति बेषु कराला। उठे सकल भय बिकल भुआला॥
पितु समेत कहि कहि निज नामा। लगे करन सब दंड प्रनामा॥
जेहि सुभायँ चितवहिं हितु जानी। सो जानइ जनु आइ खटानी॥
जनक बहोरि आइ सिरु नावा। सीय बोलाइ प्रनामु करावा॥
आसिष दीन्हि सखीं हरषानीं। निज समाज लै गइ सयानीं॥
बिस्वामित्रु मिले पुनि आई। पद सरोज मेले दोउ भाई॥
रामु लखनु दसरथ के ढोटा। दीन्हि असीस देखि भल जोटा॥
रामहि चितइ रहे थकि लोचन। रूप अपार मार मद मोचन॥
 बहुरि बिलोकि बिदेह सन कहहु काह अति भीर।
 पूछत जानि अजान जिमि ब्यापेउ कोपु सरीर॥
समाचार कहि जनक सुनाए। जेहि कारन महीप सब आए॥
सुनत बचन फिरि अनत निहारे। देखे चापखंड महि डारे॥
अति रिस बोले बचन कठोरा। कहु जड़ जनक धनुष कै तोरा॥
बेगि देखाउ मूढ़ न त आजू। उलटउँ महि जहँ लहि तव राजू॥
अति डरु उतरु देत नृपु नाहीं। कुटिल भूप हरषे मन माहीं॥
सुर मुनि नाग नगर नर नारी। सोचहिं सकल त्रास उर भारी॥
मन पछिताति सीय महतारी। बिधि अब सँवरी बात बिगारी॥
भृगुपति कर सुभाउ सुनि सीता। अरध निमेष कलप सम बीता॥
 सभय बिलोके लोग सब जानि जानकी भीरु।
 हृदयँ न हरषु बिषादु कछु बोले श्रीरघुबीरु॥
नाथ संभुधनु भंजनिहारा। होइहि केउ एक दास तुम्हारा॥
आयसु काह कहिअ किन मोही। सुनि रिसाइ बोले मुनि कोही॥
सेवकु सो जो करै सेवकाई। अरि करनी करि करिअ लराई॥
सुनहु राम जेहिं सिवधनु तोरा। सहसबाहु सम सो रिपु मोरा॥
सो बिलगाउ बिहाइ समाजा। न त मारे जैहहिं सब राजा॥
सुनि मुनि बचन लखन मुसुकाने। बोले परसुधरहि अपमाने॥
बहु धनुहीं तोरीं लरिकाई। कबहुँ न असि रिस कीन्हि गोसाईं॥
एहि धनु पर ममता केहि हेतू। सुनि रिसाइ कह भृगुकुलकेतू॥
 रे नृप बालक काल बस बोलत तोहि न सँभार।
 धनुही सम तिपुरारि धनु बिदित सकल संसार॥

(स्रोत – रामचरितमानस, बालकांड, गोस्वामी तुलसीदास।)

भावार्थ

परशुराम के भयानक रूप को देखकर सभा में उपस्थित सभी राजा भय से व्याकुल होकर उठ खड़े हुए और अपने पिता सहित अपना-अपना नाम बता-बताकर परशुराम को दंडवत प्रणाम करने लगे। परशुराम जिस किसी राजा को भी सहज भाव से (हितैषी जानकर) देख लेते, उसे लगता मानो उसकी मृत्यु निकट आ गई हो। फिर राजा जनक ने आकर सिर नवाया और सीता को बुलाकर भी प्रणाम कराया। परशुराम ने आशीर्वाद दिया, तब चतुर सखियाँ हर्षित होकर सीता को अपने समाज (दल) के साथ ले गईं।

इसके बाद विश्वामित्र ने आकर राम-लक्ष्मण दोनों भाइयों को परशुराम के चरण-कमलों में प्रणाम कराया और परिचय दिया कि ये राजा दशरथ के पुत्र राम और लक्ष्मण हैं। सुंदर जोड़ी देखकर परशुराम ने आशीर्वाद दिया, परंतु राम के अपार सौंदर्य को देखकर उनकी आँखें ठगी-सी रह गईं। फिर परशुराम ने जनक की ओर देखकर पूछा कि इतनी भीड़ किसलिए है? जानते हुए भी अनजान बनकर पूछते ही उनके शरीर में क्रोध व्याप्त हो गया।

जनक ने वह समाचार सुनाया कि जिस कारण सभी राजा एकत्र हुए हैं। यह सुनते ही परशुराम ने पलटकर देखा तो टूटे हुए धनुष के टुकड़े धरती पर पड़े दिखाई दिए। अत्यंत क्रोध में वे कठोर वचन बोले – “हे मूर्ख जनक! बता, धनुष किसने तोड़ा? शीघ्र दिखा, नहीं तो आज मैं तेरे समस्त राज्य को उलट दूँगा।” भय के मारे जनक कोई उत्तर नहीं दे पाते, पर कुटिल राजा मन-ही-मन प्रसन्न होते हैं। देवता, मुनि, नाग तथा नगर के सभी नर-नारी हृदय में भारी भय के कारण चिंतित हो उठते हैं। सीता की माता मन-ही-मन पछताती हैं कि विधाता ने बनी-बनाई बात बिगाड़ दी। परशुराम के क्रोधी स्वभाव को सुनकर सीता को आधा क्षण भी एक कल्प के समान बीतता प्रतीत होता है।

सभी लोगों को भयभीत देखकर और जानकी (सीता) को डरी हुई जानकर श्रीराम बोले – उनके हृदय में न तो हर्ष था, न विषाद। उन्होंने अत्यंत विनम्रता से कहा – “हे नाथ! शिव-धनुष को तोड़ने वाला आपका ही कोई एक दास होगा; आपकी क्या आज्ञा है, मुझसे क्यों नहीं कहते?” यह सुनकर क्रोधी मुनि परशुराम बोले – “सेवक वह है जो सेवा करे; शत्रु जैसा काम करके तो युद्ध ही करना पड़ता है। सुनो राम! जिसने शिव-धनुष तोड़ा है, वह सहस्रबाहु के समान मेरा शत्रु है। वह इस समाज को छोड़कर अलग हो जाए, नहीं तो सभी राजा मारे जाएँगे।”

मुनि के वचन सुनकर लक्ष्मण मुसकराए और परशुराम का उपहास करते हुए बोले – “बचपन में हमने ऐसी बहुत-सी छोटी धनुहियाँ तोड़ डालीं, पर आपने कभी ऐसा क्रोध नहीं किया। इस (शिव) धनुष पर ही इतनी ममता किस कारण?” यह सुनकर भृगुकुल के ध्वज (परशुराम) क्रोधित होकर बोले – “रे राजपुत्र! काल के वश में होकर तुझे बोलने में संभल नहीं है। यह कोई साधारण धनुही नहीं, बल्कि त्रिपुरारि (शिव) का धनुष है, जिसे सारा संसार जानता है।” (आगे की कथा में राम के विनय और विश्वामित्र के समझाने से परशुराम का क्रोध शांत होता है।)

शब्दार्थ

शब्दअर्थ
भृगुपति / भृगुकुलकेतूपरशुराम (भृगुकुल के स्वामी/ध्वज)
करालाभयानक, डरावना
भुआलाराजा, भूपाल
सुभायँस्वभाव, सहज प्रकृति
चितवहिंदेखना, निरखना
खटानीपूरी होना, समाप्त होना (यहाँ – मृत्यु निकट आना)
बहोरिफिर, पीछे
आसिष / असीसआशीर्वाद
ढोटापुत्र, बेटा
जोटाजोड़ा
लोचनआँख
अनतअन्यत्र, और कहीं
चापखंडधनुष का टुकड़ा
रिसरोष, क्रोध
बेगिशीघ्र, जल्दी
महिपृथ्वी
त्रासभय, डर
बिधिविधाता, ईश्वर
अरध निमेषआधा क्षण, आधा पल
कलप (कल्प)ब्रह्मा का एक दिन; अत्यंत लंबा काल
भीरुभयभीत, डरा हुआ
भंजनिहारातोड़ने वाला
आयसुआज्ञा, आदेश
कोहीक्रोधी
सहसबाहुसहस्रबाहु (एक पौराणिक शत्रु)
बिलगाउ / बिहाइअलग हो जाए / छोड़कर
परसुधरपरशुराम (फरसा धारण करने वाले)
लरिकाईलड़कपन, बचपन में
तिपुरारित्रिपुरारि, शिव

मेरे उत्तर मेरे तर्क

निम्नलिखित प्रश्नों के सटीक उत्तर चुनिए और यह भी बताइए कि आपको ये उत्तर उपयुक्त क्यों लगते हैं।

1. “पितु समेत कहि कहि निज नामा। लगे करन सब दंड प्रनामा।।” यह पंक्ति सभा में उपस्थित लोगों की किस मनःस्थिति को दर्शाती है?

(क) आदर और सम्मान

(ख) भक्ति और श्रद्धा

(ग) भय और शिष्टाचार

(घ) प्रेम और सहिष्णुता

उत्तर(ग) भय और शिष्टाचार।परशुराम के भयानक रूप से डरकर सभी राजा अपना नाम बता-बताकर दंडवत प्रणाम करने लगे – यह भय के साथ शिष्टाचारपूर्ण व्यवहार दर्शाता है।

2. “जनक बहोरि आइ सिरु नावा। सीय बोलाइ प्रनामु करावा” पंक्ति से राजा जनक के व्यवहार की कौन-सी विशेषता उद्घाटित होती है?

(क) संवेदनशीलता

(ख) शिष्टता

(ग) सहनशीलता

(घ) उदासीनता

उत्तर(ख) शिष्टता।जनक का स्वयं सिर नवाना और सीता से भी प्रणाम कराना उनके विनम्र एवं शिष्ट व्यवहार को दर्शाता है।

3. “अति रिस बोले बचन कठोरा।” जनक के प्रति परशुराम के कठोर वचन बोलने का मूल कारण था—

(क) उचित आदर-सत्कार न मिलना

(ख) जनक द्वारा समाचार छिपाना

(ग) शिव-धनुष का खंडित होना

(घ) अन्य राजाओं की सभा में उपस्थिति

उत्तर(ग) शिव-धनुष का खंडित होना।अपने आराध्य शिव का धनुष टूटा देखकर परशुराम क्रोध से भर उठते हैं और जनक को कठोर वचन कहते हैं।

4. राम का कथन “होइहि केउ एक दास तुम्हारा” उनके व्यक्तित्व की किस विशेषता को दर्शाता है?

(क) कूटनीति और चतुराई

(ख) विनम्रता और मर्यादा

(ग) त्याग और समर्पण

(घ) दृढ़ता और आत्मविश्वास

उत्तर(ख) विनम्रता और मर्यादा।क्रोधित परशुराम के समक्ष भी स्वयं को ‘दास’ कहकर राम अपनी विनम्रता और मर्यादित स्वभाव का परिचय देते हैं।

5. “सुनि मुनि बचन लखन मुसुकाने। बोले परसुधरहि अपमाने।।” लक्ष्मण के मुसकराने और उपहास भरे वचनों का क्या कारण था?

(क) वे सभा में अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करना चाहते थे।

(ख) उन्हें राम के प्रति अपना प्रेम प्रदर्शित करना था।

(ग) वे परशुराम की शक्ति से अनभिज्ञ थे।

(घ) वे परशुराम को चुनौती देना चाहते थे।

उत्तर(घ) वे परशुराम को चुनौती देना चाहते थे।निडर एवं उग्र स्वभाव के लक्ष्मण धनुष-भंग को तुच्छ बताकर व्यंग्य करते हैं और इस प्रकार परशुराम के क्रोध एवं शक्ति को चुनौती देते हैं।

मेरी समझ मेरे विचार

1. “अरध निमेष कलप सम बीता” पंक्ति का भाव स्पष्ट करते हुए बताइए कि कविता में यह किसके संदर्भ में कहा गया है और क्यों?

उत्तरयह पंक्ति सीता के संदर्भ में कही गई है।परशुराम के क्रोधी स्वभाव को सुनकर सीता इतनी चिंतित एवं भयभीत हो जाती हैं कि उन्हें आधा क्षण (अर्ध निमेष) भी एक कल्प (युग) के समान लंबा और भारी प्रतीत होने लगता है।यह अतिशयोक्ति द्वारा सीता की व्यग्रता और राम के प्रति गहरी चिंता को व्यक्त करता है – कहीं परशुराम के क्रोध से राम पर कोई संकट न आ जाए।

2. “सो बिलगाउ बिहाइ समाजा। न त मारे जैहहिं सब राजा।।” पंक्ति के आधार पर बताइए कि परशुराम द्वारा दी गई इस चेतावनी का सभा में उपस्थित राज-समाज पर क्या प्रभाव पड़ा होगा? तर्क सहित उत्तर दीजिए।

उत्तरपरशुराम ने धमकी दी कि धनुष तोड़ने वाला सभा से अलग हो जाए, अन्यथा सभी राजा मारे जाएँगे।पहले से ही परशुराम के रौद्र रूप से डरे हुए राजा इस चेतावनी से और भी भयभीत हो गए होंगे; डर के मारे कोई बोलने का साहस न कर सका।कुछ कुटिल राजा मन-ही-मन प्रसन्न भी हुए कि शायद राम-लक्ष्मण संकट में पड़ जाएँ। इस प्रकार पूरे राज-समाज पर भय एवं आशंका का गहरा प्रभाव पड़ा।

3. तुलसीदास ने राम और लक्ष्मण के माध्यम से एक ही परिस्थिति के प्रति दो अलग-अलग प्रतिक्रियाएँ दिखाई हैं। आपकी दृष्टि में परशुराम के क्रोध को शांत करने के लिए राम का ‘विनय’ का मार्ग उचित है या लक्ष्मण के ‘तर्क’ का? कारण सहित लिखिए।

उत्तरमेरी दृष्टि में राम का ‘विनय’ का मार्ग अधिक उचित एवं प्रभावी है।क्रोधी व्यक्ति को विनम्रता, धैर्य और मीठे वचनों से ही शांत किया जा सकता है; कठोर तर्क क्रोध को और भड़काता है।लक्ष्मण के व्यंग्यपूर्ण तर्क ने परशुराम के क्रोध को और बढ़ा दिया, जबकि अंततः राम के विनय और विश्वामित्र के समझाने से ही परशुराम शांत हुए। अतः सहनशीलता और विवेक से ही कठिन परिस्थितियाँ सुलझती हैं। (अपना मत कारण सहित दें।)

4. ‘हृदयँ न हरषु बिषादु कछु बोले श्रीरघुबीरु॥’ श्रीराम के हृदय में न हर्ष था, न विषाद। यह उनके व्यक्तित्व के किन गुणों को दर्शाता है? उनका भावनात्मक संतुलन इस पूरे पाठ में उन्हें अन्य पात्रों से अलग कैसे स्थापित करता है?

उत्तरयह राम के अद्भुत भावनात्मक संतुलन, धैर्य, गंभीरता और समता-भाव को दर्शाता है – न धनुष-भंग का हर्ष, न परशुराम के क्रोध का भय या विषाद।वे हर परिस्थिति में शांत, स्थिर और विवेकशील बने रहते हैं।यह संतुलन उन्हें अन्य पात्रों – भयभीत राजाओं, चिंतित सीता-सुनयना, उग्र लक्ष्मण और क्रोधी परशुराम – से अलग एवं श्रेष्ठ, अर्थात् एक आदर्श एवं मर्यादित व्यक्ति/शासक के रूप में स्थापित करता है।

मेरी कल्पना मेरे अनुमान

1. कल्पना कीजिए कि आप जनक की सभा में उपस्थित एक राजा हैं। परशुराम जी के आगमन से लेकर उनके गमन तक की कथा अपने शब्दों में लिखिए।

उत्तर (कल्पनात्मक)मैं जनक की सभा में बैठा था, तभी परशुराम जी फरसा लिए अत्यंत क्रोधित रूप में आए। उनके भयानक रूप को देखकर हम सब राजा भय से उठ खड़े हुए और अपना नाम बताकर प्रणाम करने लगे।टूटे धनुष को देखकर परशुराम ने जनक को कठोर वचन कहे और धमकी दी। राम ने अत्यंत विनम्रता से उत्तर दिया, जबकि लक्ष्मण ने व्यंग्य करके उनके क्रोध को बढ़ा दिया।अंततः विश्वामित्र के समझाने और राम के विनय से परशुराम का क्रोध शांत हुआ और वे संतुष्ट होकर चले गए। (विद्यार्थी अपने शब्दों में विस्तार दें।)

2. “अति डरु उतरु देत नृपु नाहीं। कुटिल भूप हरषे मन माहीं॥” जनक द्वारा डर से चुप रहने पर अन्य राजा मन में प्रसन्न क्यों हुए होंगे?

उत्तरजो राजा सीता-स्वयंवर में शिव-धनुष नहीं तोड़ पाए थे और अपमानित होकर लौटे थे, वे ईर्ष्यावश राम-लक्ष्मण तथा जनक का संकट देखकर प्रसन्न हुए।उन्हें लगा कि अब परशुराम के क्रोध से राम-लक्ष्मण मुसीबत में पड़ेंगे।यह मनुष्य के स्वभाव की उस कटु सच्चाई को उजागर करता है कि ईर्ष्यालु लोग दूसरों के संकट में सुख अनुभव करते हैं।

कविता का सौंदर्य

संवाद की विशेषताएँ (उदाहरण सहित)

विशेषताउदाहरण (पंक्ति)
राम की विनम्रता“नाथ संभुधनु भंजनिहारा। होइहि केउ एक दास तुम्हारा॥”
परशुराम का रौद्र रूप“अति रिस बोले बचन कठोरा। कहु जड़ जनक धनुष कै तोरा॥”
लक्ष्मण का प्रत्युत्तर“बहु धनुहीं तोरीं लरिकाई। कबहुँ न असि रिस कीन्हि गोसाईं॥”
पौराणिक संदर्भ“सहसबाहु सम सो रिपु मोरा” / “धनुही सम तिपुरारि धनु”
नाटकीयता“बेगि देखाउ मूढ़ न त आजू। उलटउँ महि जहँ लहि तव राजू॥”

अलंकार

अलंकारअर्थउदाहरण
अनुप्रासएक ही वर्ण की बार-बार आवृत्ति“अरि करनी करि करिअ लराई”
अतिशयोक्तिबात को बढ़ा-चढ़ाकर कहना“अरध निमेष कलप सम बीता”
रूपकरूप का आरोपण करना“पद सरोज मेले दोउ भाई” (चरण ही कमल)

व्याकरण की बात

गद्य-रूप (चौपाई का अर्थ)

उत्तरचौपाई: “अति डरु उतरु देत नृपु नाहीं। कुटिल भूप हरषे मन माहीं॥ सुर मुनि नाग नगर नर नारी। सोचहिं सकल त्रास उर भारी॥”गद्य-रूप: अत्यधिक भय के कारण राजा जनक कोई उत्तर नहीं दे पा रहे हैं। उनकी यह दशा देखकर कुटिल (दुष्ट) राजा मन-ही-मन प्रसन्न हो रहे हैं। देवता, मुनि, नाग तथा नगर के सभी नर-नारी हृदय में भारी भय (त्रास) के कारण चिंतित हो रहे हैं।

संवाद-मिलान (कौन-सा कथन किसका)

कथनपात्र
शिव के धनुष को तोड़ने वाला आपका कोई दास ही हो सकता है।राम
विधाता ने बनी-बनाई बात बिगाड़ दी।सीता की माता (सुनयना)
सेवक वह होता है जो सेवा का काम करे।परशुराम
इस कारण ये सब राजा आए हैं।राजा जनक
बचपन में हमने ऐसी बहुत-सी धनुहियाँ तोड़ डाली हैं।लक्ष्मण
क्या आज्ञा है, मुझसे क्यों नहीं कहते?राम
कहो जनक, किस कारण यह भीड़ है?परशुराम
इसी धनुष पर इतनी ममता क्यों!लक्ष्मण

अवधी शब्द एवं खड़ी बोली रूप

अवधी शब्दखड़ी बोली
कोहीक्रोधी
वेषुवेष
भुआलाराजा
लोचनआँख
रिसक्रोध
बेगिशीघ्र
महिपृथ्वी
ढोटापुत्र
आसिषआशीर्वाद

अतिरिक्त प्रश्न

अति लघु उत्तरीय

1. यह पद्यांश किस ग्रंथ और किस कांड से लिया गया है?

उत्तरयह पद्यांश गोस्वामी तुलसीदास रचित रामचरितमानस के ‘बालकांड’ से लिया गया है।

2. परशुराम के क्रोधित होकर सभा में आने का क्या कारण था?

उत्तरसीता-स्वयंवर में श्रीराम द्वारा शिव-धनुष भंग कर देना ही परशुराम के क्रोधित होकर सभा में आने का कारण था।

3. राम-लक्ष्मण का परशुराम से परिचय किसने कराया?

उत्तरमुनि विश्वामित्र ने राम-लक्ष्मण का परिचय परशुराम से कराया।

लघु उत्तरीय

4. राम और लक्ष्मण के स्वभाव में क्या अंतर इस संवाद से प्रकट होता है?

उत्तरराम धीर, गंभीर, विनम्र एवं मर्यादित हैं – वे विनय से परशुराम के क्रोध को शांत करना चाहते हैं।लक्ष्मण निडर, उग्र और व्यंग्यप्रिय हैं – वे तर्क और उपहास से परशुराम को चुनौती देते हैं। इस प्रकार दोनों भाई एक ही परिस्थिति में भिन्न स्वभाव प्रकट करते हैं।

5. परशुराम ने शिव-धनुष की तुलना किससे की और क्यों?

उत्तरपरशुराम ने स्पष्ट किया कि यह कोई साधारण धनुही नहीं, बल्कि त्रिपुरारि (शिव) का धनुष है, जिसे सारा संसार जानता है।वे इसे अत्यंत पवित्र एवं महत्वपूर्ण मानते थे, इसलिए इसके टूटने पर उनका क्रोध स्वाभाविक था।

दीर्घ उत्तरीय

6. इस संवाद के आधार पर परशुराम के चरित्र की विशेषताएँ लिखिए।

उत्तरक्रोधी एवं उग्र: शिव-धनुष टूटा देखकर वे अत्यंत क्रोधित हो उठते हैं।शिवभक्त एवं स्वाभिमानी: वे शिव-धनुष का अनादर सहन नहीं कर पाते।तेजस्वी एवं वीर: उनका रौद्र रूप सबको भयभीत कर देता है।यद्यपि वे क्रोधी हैं, फिर भी अंततः राम के विनय एवं सत्य को पहचानकर शांत हो जाते हैं – अर्थात् उनमें विवेक भी है।

अभ्यास MCQ & अभिकथन-कारण

1. यह पद्यांश किस कवि की रचना है?

(क) कबीर

(ख) रैदास

(ग) गोस्वामी तुलसीदास

(घ) सूरदास

उत्तर(ग) गोस्वामी तुलसीदास।

2. रामचरितमानस की रचना किस भाषा में हुई है?

(क) ब्रजभाषा

(ख) अवधी

(ग) संस्कृत

(घ) मैथिली

उत्तर(ख) अवधी।

3. ‘भृगुकुलकेतू’ किसके लिए प्रयुक्त संबोधन है?

(क) राम

(ख) लक्ष्मण

(ग) परशुराम

(घ) जनक

उत्तर(ग) परशुराम।

4. ‘लरिकाई’ शब्द का अर्थ है—

(क) बचपन/लड़कपन

(ख) क्रोध

(ग) धनुष

(घ) आशीर्वाद

उत्तर(क) बचपन/लड़कपन।

अभिकथन-कारण – नीचे अभिकथन (A) और कारण (R) दिए गए हैं। सही विकल्प चुनिए—
(क) A और R दोनों सही, R, A की सही व्याख्या है। (ख) A और R दोनों सही, पर R, A की सही व्याख्या नहीं। (ग) A सही, R गलत। (घ) A गलत, R सही।

1. अभिकथन (A): परशुराम सभा में क्रोधित होकर आए।

कारण (R): उनके आराध्य शिव का धनुष भंग हो गया था।

उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है।

2. अभिकथन (A): राम ने क्रोधित परशुराम का तर्क और उपहास से सामना किया।

कारण (R): राम विनम्र, धीर एवं मर्यादित स्वभाव के थे।

उत्तर(घ) A गलत है (तर्क-उपहास लक्ष्मण ने किया, राम ने विनय से सामना किया), जबकि R सही है।

3. अभिकथन (A): धनुष-भंग के बाद सीता अत्यंत व्यग्र हो उठती हैं।

कारण (R): परशुराम के क्रोध से राम पर संकट आने की आशंका उन्हें सताती है।

उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

‘राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद’ किस ग्रंथ से लिया गया है?

यह गोस्वामी तुलसीदास रचित रामचरितमानस के बालकांड से लिया गया है।

परशुराम सभा में क्रोधित होकर क्यों आए?

क्योंकि सीता-स्वयंवर में श्रीराम ने उनके आराध्य शिव का धनुष भंग कर दिया था।

इस संवाद में राम का स्वभाव कैसा प्रकट होता है?

राम धीर, गंभीर, विनम्र एवं मर्यादित प्रकट होते हैं; उनके हृदय में न हर्ष था, न विषाद।

लक्ष्मण और राम की प्रतिक्रिया में क्या अंतर है?

लक्ष्मण तर्क एवं व्यंग्य से परशुराम को चुनौती देते हैं, जबकि राम विनय से उनका क्रोध शांत करना चाहते हैं।

पद्यांश एवं प्रश्न NCERT गंगा पुस्तक से ज्यों-के-त्यों लिए गए हैं; भावार्थ एवं उत्तर ClearStudy द्वारा मौलिक रूप से तैयार किए गए हैं।

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