कक्षा 6 हिंदी (मल्हार) पाठ 7 – जलाते चलो (कविता) प्रश्न-उत्तर एवं भावार्थ (NCERT 2026–27)

यह पृष्ठ कक्षा 6 हिंदी की नई पुस्तक मल्हार के पाठ 7 ‘जलाते चलो’ (कवि – द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी) का पूरा समाधान देता है – कविता का मूल पाठ, भावार्थ, शब्दार्थ तथा पाठ की सभी गतिविधियों (मेरी समझ से, मिलकर करें मिलान, पंक्तियों पर चर्चा, सोच-विचार के लिए, कविता की रचना, अनुमान या कल्पना से आदि) के मौलिक एवं परीक्षा-उपयोगी उत्तर।

कक्षा: 6 विषय: हिंदी पुस्तक: मल्हार पाठ: 7 कवि: द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी विधा: कविता सत्र: 2026–27

कवि परिचय – द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी

द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी (1916–1998) हिंदी के प्रसिद्ध कवि एवं बाल-साहित्यकार थे। बच्चों के लिए सरल, मधुर एवं प्रेरक रचनाएँ लिखने वाले चर्चित रचनाकारों में उनका नाम प्रमुखता से लिया जाता है। उन्होंने बच्चों के लिए बहुत-सी कविताएँ एवं गीत लिखे, जिनमें उत्साह, आशा एवं अच्छे संस्कारों का भाव भरा रहता है। उनका लिखा गीत ‘हम सब सुमन एक उपवन के’ आज भी बहुत लोकप्रिय है। ‘जलाते चलो’ भी उनकी ऐसी ही एक प्रेरणादायक रचना है, जो निराशा के अँधेरे में आशा एवं भलाई का दीप जलाते रहने का संदेश देती है।

कविता (मूल पाठ)

‘जलाते चलो’ एक आशा एवं उत्साह जगाने वाली कविता है, जिसमें अँधेरे (तिमिर/निशा) को बुराई एवं निराशा का तथा दीप-ज्योति को भलाई एवं आशा का प्रतीक बनाकर निरंतर अच्छे कार्य करते रहने की प्रेरणा दी गई है।

जलाते चलो ये दिये स्नेह भर-भर
कभी तो धरा का अँधेरा मिटेगा।

भले शक्ति विज्ञान में है निहित वह
कि जिससे अमावस बने पूर्णिमा-सी,
मगर विश्व पर आज क्यों दिवस ही में
घिरी आ रही है अमावस निशा-सी।
बिना स्नेह विद्युत-दिये जल रहे जो
बुझाओ इन्हें, यों न पथ मिल सकेगा।।

जला दीप पहला तुम्हीं ने तिमिर की
चुनौती प्रथम बार स्वीकार की थी,
तिमिर की सरित पार करने तुम्हीं ने
बना दीप की नाव तैयार की थी।
बहाते चलो नाव तुम वह निरंतर
कभी तो तिमिर का किनारा मिलेगा।।

युगों से तुम्हीं ने तिमिर की शिला पर
दिये अनगिनत हैं निरंतर जलाए,
समय साक्षी है कि जलते हुए दीप
अनगिन तुम्हारे पवन ने बुझाए।
मगर बुझ स्वयं ज्योति जो दे गए वे
उसी से तिमिर को उजेला मिलेगा।।

दिये और तूफ़ान की यह कहानी
चली आ रही और चलती रहेगी,
जली जो प्रथम बार लौ दीप की
स्वर्ण-सी जल रही और जलती रहेगी।
रहेगा धरा पर दिया एक भी यदि
कभी तो निशा को सवेरा मिलेगा।।

— द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी

सार

‘जलाते चलो’ कवि द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी की एक आशा एवं उत्साह से भरी प्रेरणादायक कविता है। कवि इस कविता में बार-बार यह संदेश देते हैं कि हमें स्नेह (प्रेम) से भरे दीप अर्थात भलाई एवं सेवा के कार्य निरंतर जलाते रहना चाहिए, क्योंकि एक-न-एक दिन इन्हीं से धरती का अँधेरा अवश्य मिट जाएगा। यहाँ ‘अँधेरा’, ‘तिमिर’ एवं ‘निशा’ बुराई, अज्ञान, दुख एवं निराशा के प्रतीक हैं, जबकि ‘दीप’, ‘ज्योति’ एवं ‘सवेरा’ भलाई, ज्ञान, सेवा एवं आशा के प्रतीक हैं।

कवि कहते हैं कि भले ही विज्ञान में इतनी शक्ति हो कि वह अमावस की काली रात को पूर्णिमा जैसी उजली बना दे, फिर भी आज संसार में दिन के समय भी अमावस की रात जैसा अँधेरा छाता जा रहा है। इसका कारण है — प्रेम एवं संवेदना का अभाव। इसीलिए कवि कहते हैं कि जो बिजली के दीप (बल्ब) स्नेह के बिना केवल बाहरी प्रकाश दे रहे हैं, वे सच्चा मार्ग नहीं दिखा सकते।

कवि मनुष्य के साहस की प्रशंसा करते हुए कहते हैं कि अँधेरे की चुनौती को सबसे पहले मनुष्य ने ही स्वीकार किया और तिमिर रूपी नदी को पार करने के लिए दीप रूपी नाव बनाई। इस नाव को निरंतर चलाते रहने से कभी-न-कभी अँधेरे का किनारा (अंत) अवश्य मिलेगा। युगों-युगों से मनुष्य अँधेरे के विरुद्ध दीप जलाता आ रहा है; तूफ़ान (विपत्तियाँ) उन दीपों को बुझाते रहे, फिर भी जो लोग स्वयं बुझकर भी अपनी ज्योति दूसरों को दे गए, उन्हीं के त्याग से अँधेरे में उजाला फैलेगा। दीप और तूफ़ान का यह संघर्ष सदा से चला आ रहा है और चलता रहेगा। कवि का दृढ़ विश्वास है कि जब तक धरती पर एक भी दीप जलता रहेगा, तब तक अँधेरी रात को सवेरा अवश्य मिलेगा। इस प्रकार कविता हमें निराश न होकर, चुनौतियों का सामना करते हुए, सबकी भलाई के लिए निरंतर अच्छे कार्य करते रहने की प्रेरणा देती है।

भावार्थ

पहला अंश – “जलाते चलो ये दिये स्नेह भर-भर / कभी तो धरा का अँधेरा मिटेगा।” कवि कहते हैं कि स्नेह (प्रेम) से भर-भरकर ये दीप अर्थात भलाई के कार्य निरंतर जलाते चलो। इस प्रकार लगातार सेवा एवं अच्छे कार्य करते रहने से एक-न-एक दिन धरती पर फैला बुराई, दुख एवं अज्ञान का अँधेरा अवश्य मिट जाएगा।

दूसरा अंश – “भले शक्ति विज्ञान में है निहित वह… बुझाओ इन्हें, यों न पथ मिल सकेगा।” भले ही विज्ञान में इतनी शक्ति है कि वह अमावस की काली रात को पूर्णिमा जैसी उजली बना सके, फिर भी आज संसार पर दिन में ही अमावस की रात जैसा अँधेरा घिरता आ रहा है। जो विद्युत-दीप (बल्ब) स्नेह के बिना केवल बाहरी रोशनी दे रहे हैं, उन्हें बुझा दो, क्योंकि प्रेम-रहित प्रकाश से सही मार्ग नहीं मिल सकता।

तीसरा अंश – “जला दीप पहला तुम्हीं ने… कभी तो तिमिर का किनारा मिलेगा।” कवि मनुष्य से कहते हैं — अँधेरे की चुनौती को सबसे पहले तुम्हीं ने स्वीकार किया और पहला दीप जलाया। तिमिर रूपी नदी को पार करने के लिए तुमने दीप रूपी नाव तैयार की। उस नाव को निरंतर चलाते रहो, तभी कभी-न-कभी अँधेरे का किनारा (अंत) अवश्य मिलेगा।

चौथा अंश – “युगों से तुम्हीं ने… उसी से तिमिर को उजेला मिलेगा।” युगों से मनुष्य अँधेरे रूपी शिला पर अनगिनत दीप जलाता आ रहा है। समय इसका साक्षी है कि तूफ़ानी हवाओं ने उन जलते दीपों को बार-बार बुझाया। फिर भी जो दीप (व्यक्ति) स्वयं बुझकर भी अपनी ज्योति दूसरों को दे गए, उन्हीं के त्याग एवं बलिदान से अँधेरे को उजाला मिलेगा।

पाँचवाँ अंश – “दिये और तूफ़ान की यह कहानी… कभी तो निशा को सवेरा मिलेगा।” दीप और तूफ़ान के संघर्ष की यह कहानी सदा से चली आ रही है और आगे भी चलती रहेगी। दीप की जो लौ पहली बार जली थी, वह सोने के समान चमकती हुई आगे भी जलती रहेगी। कवि का दृढ़ विश्वास है कि यदि धरती पर एक भी दीप जलता रहा, तो कभी-न-कभी अँधेरी रात को सवेरा अवश्य मिलेगा — अर्थात आशा एवं भलाई कभी समाप्त नहीं होगी।

शब्दार्थ

कठिन शब्दअर्थ
स्नेहप्रेम; (दीपक में पड़ने वाला) तेल
धरापृथ्वी, धरती
तिमिरअँधेरा, अंधकार
निशारात
अमावसअमावस्या; जिस रात आकाश में चंद्रमा दिखाई नहीं देता
पूर्णिमापूर्णमासी; जिस रात पूरा चंद्रमा दिखाई देता है
निहितछिपा हुआ, समाया हुआ
दिवसदिन
विद्युत-दियेबिजली से जलने वाले दीप, बल्ब आदि
पथरास्ता, मार्ग
दीप / दियादीपक
चुनौतीललकार, मुश्किल कार्य का सामना
सरितनदी
निरंतरलगातार, बिना रुके
युगसमय, काल; बहुत लंबा समय
शिलाचट्टान, बड़ा पत्थर
अनगिनत / अनगिनजिनकी गिनती न हो सके, बहुत अधिक
साक्षीगवाह
पवनहवा
ज्योतिप्रकाश, लौ
उजेला / उजालाप्रकाश, रोशनी
तूफ़ानआँधी; यहाँ विपत्ति/बाधा
लौदीपक की ज्वाला
स्वर्णसोना
सवेरासुबह, प्रभात

मेरी समझ से

(क) नीचे दिए गए प्रश्नों का सटीक उत्तर कौन-सा है? उसके सामने तारा (★) बनाइए—

(1) निम्नलिखित में से कौन-सी बात इस कविता में मुख्य रूप से कही गई है?

• भलाई के कार्य करते रहना

• दीपावली के दीपक जलाना

• बल्ब आदि जलाकर अंधकार दूर करना

• तिमिर मिलने तक नाव चलाते रहना

उत्तर★ भलाई के कार्य करते रहना।इस कविता में ‘दीप जलाने’ का अर्थ केवल असली दीपक या बल्ब जलाना नहीं, बल्कि स्नेह एवं भलाई के कार्य निरंतर करते रहना है, जिससे संसार से बुराई एवं निराशा का अँधेरा मिट सके।

(2) “जला दीप पहला तुम्हीं ने तिमिर की, चुनौती प्रथम बार स्वीकार की थी” — यह वाक्य किससे कहा गया है?

• तूफ़ान से

• मनुष्यों से

• दीपकों से

• तिमिर से

उत्तर★ मनुष्यों से।कवि मनुष्य को संबोधित कर रहे हैं, क्योंकि अँधेरे की चुनौती को सबसे पहले मनुष्य ने ही स्वीकार किया और पहला दीप जलाकर अंधकार से लड़ाई आरंभ की थी।

(ख) अब अपने मित्रों के साथ चर्चा कीजिए और कारण बताइए कि आपने ये उत्तर ही क्यों चुने?

उत्तर (मार्गदर्शन)यह समूह में मिलकर करने वाली गतिविधि है। उत्तर चुनते समय हमने कविता के संदेश को आधार बनाया।पहले प्रश्न में ‘दीप’ भलाई का प्रतीक है, इसलिए मुख्य बात ‘भलाई के कार्य करते रहना’ है। दूसरे प्रश्न में ‘तुम्हीं ने’ शब्द मनुष्य को संबोधित करता है, जिसने सबसे पहले अँधेरे से लड़ने का साहस किया। परस्पर चर्चा से हम एक-दूसरे के तर्क समझकर सही निष्कर्ष तक पहुँचते हैं।

मिलकर करें मिलान

कविता में से चुनकर कुछ शब्द दिए गए हैं। इन्हें इनके सही अर्थों या संदर्भों से मिलाइए।

शब्दअर्थ या संदर्भ
1. अमावस(घ) अमावस्या, जिस रात आकाश में चंद्रमा दिखाई नहीं देता।
2. पूर्णिमा(क) पूर्णमासी, वह तिथि जिस रात चंद्रमा पूरा दिखाई देता है।
3. विद्युत-दिये(ख) विद्युत दिये अर्थात बिजली से जलने वाले दीपक, बल्ब आदि उपकरण।
4. युग(ग) समय, काल; युग संख्या में चार माने गए हैं — सत्ययुग, त्रेता युग, द्वापर युग और कलियुग।
सही मिलान1 → (घ) अमावस्या, जिस रात आकाश में चंद्रमा दिखाई नहीं देता।2 → (क) पूर्णमासी, जिस रात चंद्रमा पूरा दिखाई देता है।3 → (ख) बिजली से जलने वाले दीपक, बल्ब आदि।4 → (ग) समय, काल; चार युग — सत्ययुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग।

पंक्तियों पर चर्चा

कविता से चुनी गई कुछ पंक्तियाँ नीचे दी गई हैं। इन्हें ध्यान से पढ़िए और इन पर विचार कीजिए। आपको इनका क्या अर्थ समझ में आया?

“दिये और तूफ़ान की यह कहानी / चली आ रही और चलती रहेगी, / जली जो प्रथम बार लौ दीप की / स्वर्ण-सी जल रही और जलती रहेगी।। / रहेगा धरा पर दिया एक भी यदि / कभी तो निशा को सवेरा मिलेगा।।”

अर्थ/विचारइन पंक्तियों में कवि दीप एवं तूफ़ान को आमने-सामने रखकर भलाई और बुराई के निरंतर संघर्ष की ओर संकेत करते हैं। ‘दीप’ भलाई, आशा एवं सेवा का प्रतीक है, जबकि ‘तूफ़ान’ बुराई, बाधा एवं विपत्ति का।कवि कहते हैं कि यह संघर्ष सदा से चलता आ रहा है और आगे भी चलता रहेगा; तूफ़ान भले ही दीप बुझाने का प्रयास करे, पर दीप की लौ सोने-सी चमकती हुई जलती रहेगी। संदेश यह है कि जब तक संसार में एक भी अच्छा व्यक्ति (दीप) रहेगा, तब तक निराशा एवं बुराई की रात को कभी-न-कभी आशा एवं भलाई का सवेरा अवश्य मिलेगा।

सोच-विचार के लिए

कविता को एक बार फिर से पढ़िए, पता लगाइए और लिखिए—

(क) कविता में अँधेरे या तिमिर के लिए किन वस्तुओं के उदाहरण दिए गए हैं?

उत्तरकविता में अँधेरे या तिमिर के लिए अमावस (अमावस्या), निशा (रात) तथा तूफ़ान के उदाहरण दिए गए हैं। कवि ने दिन में भी छाने वाली ‘अमावस निशा-सी’ अँधियारी का उल्लेख किया है तथा तूफ़ान को दीप बुझाने वाली शक्ति बताया है।

(ख) यह कविता आशा और उत्साह जगाने वाली कविता है। इसमें क्या आशा की गई है? यह आशा क्यों की गई है?

उत्तरइस कविता में यह आशा की गई है कि एक-न-एक दिन धरती से अँधेरा (बुराई, दुख, निराशा) अवश्य मिटेगा और निशा को सवेरा (आशा एवं उजाला) मिलेगा।यह आशा इसलिए की गई है क्योंकि मनुष्य निरंतर स्नेह एवं भलाई के दीप जलाता आ रहा है। जब तक धरती पर एक भी दीप (अच्छा व्यक्ति/अच्छा कार्य) जलता रहेगा, तब तक अँधेरे को मिटाया जा सकता है — इसी विश्वास के कारण कवि आशावान हैं।

(ग) कविता में किसे जलाने और किसे बुझाने की बात कही गई है?

उत्तरकविता में स्नेह से भरे दीप (प्रेम एवं भलाई के कार्य) निरंतर जलाते रहने की बात कही गई है।इसके विपरीत, जो विद्युत-दिये (बल्ब) स्नेह के बिना केवल बाहरी प्रकाश दे रहे हैं, उन्हें बुझाने की बात कही गई है, क्योंकि प्रेम-रहित प्रकाश से सच्चा मार्ग नहीं मिल सकता।

कविता की रचना

“जलाते चलो ये दिये स्नेह भर-भर / कभी तो धरा का अँधेरा मिटेगा।” इन पंक्तियों को लय सहित गाने या बोलने का प्रयास कीजिए। दोनों पंक्तियों को गाने या बोलने में समान समय लगा या अलग-अलग?

उत्तरइन दोनों पंक्तियों को गाने या बोलने में लगभग एक-समान समय लगता है। केवल इन्हीं दो पंक्तियों में नहीं, बल्कि इस कविता की प्रत्येक पंक्ति को बोलने में लगभग समान समय ही लगता है। इसी विशेषता (समान लय एवं ताल) के कारण यह कविता और अधिक प्रभावशाली एवं गेय बन गई है।

(क) इस कविता को एक बार फिर से पढ़िए और इस कविता की विशेषताओं की सूची बनाइए, जैसे इस कविता की पंक्तियों को 2–4, 2–4 के क्रम में बाँटा गया है आदि।

उत्तर (विशेषताओं की सूची)1. प्रत्येक पंक्ति को बोलने/गाने में लगभग समान समय लगता है, जिससे कविता में सुंदर लय बनती है।2. पंक्तियों को एक निश्चित क्रम (टेक एवं अंतरे) में बाँटा गया है — हर अंश के अंत में ‘…मिलेगा/मिटेगा’ जैसी टेक-पंक्ति दोहराई गई है।3. भाषा सरल, मधुर एवं प्रेरक है तथा ‘अँधेरा-तिमिर-निशा’ और ‘दीप-ज्योति-सवेरा’ जैसे विरोधी (प्रतीकात्मक) शब्दों का सुंदर प्रयोग हुआ है।4. ‘भर-भर’, ‘धीरे-धीरे’ जैसी पुनरुक्ति तथा प्रतीक एवं उपमा (अमावस निशा-सी, स्वर्ण-सी) के प्रयोग से कविता और प्रभावशाली बनी है।

(ख) अपने समूह की सूची को कक्षा में सबके साथ साझा कीजिए।

उत्तर (गतिविधि)यह कक्षा में मिलकर करने वाली गतिविधि है। प्रत्येक समूह अपनी बनाई विशेषताओं की सूची बारी-बारी से कक्षा में सुनाए और अन्य समूहों की बताई नई विशेषताओं को भी अपनी सूची में जोड़ ले, जिससे सबकी समझ और बढ़ जाए।

मिलान

स्तंभ 1 और स्तंभ 2 में कुछ पंक्तियाँ दी गई हैं। मिलते-जुलते भाव वाली पंक्तियों को जोड़िए—

स्तंभ 1 (पंक्ति)स्तंभ 2 (मिलता-जुलता भाव)
1. कभी तो तिमिर का किनारा मिलेगा।(ग) विश्व की समस्याओं से एक-न-एक दिन छुटकारा अवश्य मिलेगा।
2. जलाते चलो ये दिये स्नेह भर-भर।(घ) दूसरों के सुख-चैन के लिए प्रयास करते रहिए।
3. मगर विश्व पर आज क्यों दिवस ही में घिरी आ रही है अमावस निशा-सी।(ख) विश्व में सुख-शांति क्यों कम होती जा रही है?
4. बिना स्नेह विद्युत-दिये जल रहे जो बुझाओ इन्हें, यों न पथ मिल सकेगा।(क) विश्व की भलाई का ध्यान रखे बिना प्रगति करने से कोई लाभ नहीं होगा।
सही मिलान1 → (ग) विश्व की समस्याओं से एक-न-एक दिन छुटकारा अवश्य मिलेगा।2 → (घ) दूसरों के सुख-चैन के लिए प्रयास करते रहिए।3 → (ख) विश्व में सुख-शांति क्यों कम होती जा रही है?4 → (क) विश्व की भलाई का ध्यान रखे बिना प्रगति करने से कोई लाभ नहीं होगा।

अनुमान या कल्पना से

अपने समूह में मिलकर चर्चा कीजिए—

(क) “दिये और तूफ़ान की यह कहानी / चली आ रही और चलती रहेगी” — दीपक और तूफ़ान की यह कौन-सी कहानी हो सकती है जो सदा से चली आ रही है?

उत्तरयह दीपक और तूफ़ान की कहानी वास्तव में भलाई और बुराई के बीच चलने वाले निरंतर संघर्ष की कहानी है।‘दीपक’ अच्छाई, आशा, ज्ञान एवं सेवा का प्रतीक है तथा ‘तूफ़ान’ बुराई, निराशा, अज्ञान एवं विपत्ति का। जैसे तूफ़ान दीप को बुझाने का प्रयास करता है, वैसे ही बुराई अच्छाई को मिटाना चाहती है; पर अच्छाई कभी पूरी तरह समाप्त नहीं होती — यही संघर्ष युगों से चला आ रहा है और आगे भी चलता रहेगा।

(ख) “जली जो प्रथम बार लौ दीप की / स्वर्ण-सी जल रही और जलती रहेगी” — दीपक की यह सोने जैसी लौ क्या हो सकती है जो अनगिनत सालों से जल रही है?

उत्तरदीपक की यह सोने जैसी लौ मनुष्य के भीतर की आशा, भलाई एवं उत्साह की भावना हो सकती है, जो आरंभ से ही जल रही है।यह वही प्रेरणा-ज्योति है जिसके बल पर मनुष्य ने सबसे पहले अँधेरे की चुनौती स्वीकार की थी। यह सत्य, प्रेम एवं सेवा की ज्योति है, जो अनेक कठिनाइयों के बाद भी कभी नहीं बुझती और पीढ़ी-दर-पीढ़ी जलती रहती है।

शब्दों के रूप

“कि जिससे अमावस बने पूर्णिमा-सी” — ‘अमावस’ का अर्थ है ‘अमावस्या’। इन दोनों शब्दों का अर्थ समान है, पर लिखने-बोलने में थोड़ा अंतर है। ऐसे ही कुछ शब्द नीचे दिए गए हैं। इनसे मिलते-जुलते दूसरे शब्द कविता से खोजकर लिखिए।

दिया गया शब्दकविता में मिलता-जुलता रूप
1. दियादीप / दिये
2. उजेलाउजाला (ज्योति, प्रकाश)
3. अनगिनअनगिनत
4. (कुछ अन्य शब्द) तिमिरअँधेरा (अंधकार)
5. निशारात / अमावस
6. सरितनदी
संकेत‘दिया’ और ‘दीप/दिये’, ‘उजेला’ और ‘उजाला’, ‘अनगिन’ और ‘अनगिनत’ — इन जोड़ों का अर्थ समान है, केवल लिखने-बोलने में थोड़ा अंतर है। इसी प्रकार ‘तिमिर-अँधेरा’, ‘निशा-रात’, ‘सरित-नदी’ जैसे समान अर्थ वाले शब्द भी आपस में चर्चा करके खोजे जा सकते हैं।

अर्थ की बात

(क) “जलाते चलो ये दिये स्नेह भर-भर” — इस पंक्ति में ‘चलो’ के स्थान पर ‘रहो’ शब्द रखकर पढ़िए। इस शब्द के बदलने से पंक्ति के अर्थ में क्या अंतर आ रहा है?

उत्तर‘जलाते चलो’ में ‘चलो’ शब्द में आगे बढ़ते रहने, गति एवं निरंतर प्रयास का भाव है — अर्थात दीप जलाते हुए आगे बढ़ते चलो।जबकि ‘जलाते रहो’ में केवल एक ही स्थान पर रुककर दीप जलाते रहने का भाव आता है, उसमें आगे बढ़ने या यात्रा का भाव नहीं रहता। इस प्रकार शब्द बदलने से पंक्ति का अर्थ एवं उसका प्रभाव भी बदल जाता है; ‘चलो’ शब्द कविता में अधिक उपयुक्त एवं प्रेरक है।

(ख) नीचे कुछ पंक्तियाँ दी गई हैं। पंक्तियों के सामने लगभग समान अर्थों वाले कुछ शब्द दिए गए हैं। उनमें से वह शब्द चुनिए, जो उस पंक्ति में सबसे उपयुक्त रहेगा—

पंक्ति (रिक्त स्थान सहित)विकल्पसबसे उपयुक्त शब्द
1. बहाते चलो ____ तुम वह निरंतरनैया, नाव, नौकानाव
   कभी तो तिमिर का ____ मिलेगा।।तट, तीर, किनाराकिनारा
2. रहेगा ____ पर दिया एक भी यदिधरा, धरती, भूमिधरा
   कभी तो निशा को ____ मिलेगा।।प्रातः, सुबह, सवेरासवेरा
3. जला दीप पहला तुम्हीं ने ____ कीअंधकार, तिमिर, अँधेरेतिमिर
   चुनौती ____ बार स्वीकार की थी।प्रथम, अव्वल, पहलीप्रथम
उत्तरमूल कविता के अनुसार सबसे उपयुक्त शब्द हैं — नाव, किनारा, धरा, सवेरा, तिमिर, प्रथम। ये शब्द पंक्ति की लय, तुक एवं भाव तीनों के अनुकूल बैठते हैं।

प्रतीक

(क) “कभी तो निशा को सवेरा मिलेगा” — ‘निशा’ का अर्थ है रात और ‘सवेरा’ का अर्थ है सुबह। पर कविता में इन दोनों शब्दों का प्रयोग केवल ‘रात’ और ‘सुबह’ के लिए नहीं हुआ है। पता लगाइए कि ‘निशा’ और ‘सवेरा’ का इस कविता में क्या-क्या अर्थ हो सकता है। (संकेत — निशा से जुड़ा है ‘अँधेरा’ और सवेरे से जुड़ा है ‘उजाला’)

उत्तरकविता में ‘निशा’ (रात) केवल समय नहीं, बल्कि बुराई, अज्ञान, दुख, निराशा एवं कठिनाई का प्रतीक है।इसी प्रकार ‘सवेरा’ (सुबह) केवल समय नहीं, बल्कि भलाई, ज्ञान, सुख, आशा एवं अच्छे दिनों का प्रतीक है। इसलिए “निशा को सवेरा मिलेगा” का अर्थ है — बुराई एवं निराशा के स्थान पर भलाई एवं आशा का उजाला अवश्य फैलेगा।

(ख) कविता में से चुनकर कुछ शब्द दिए गए हैं — दिये, अँधेरा, अमावस, पूर्णिमा, दिवस, तिमिर, नाव, किनारा, शिला, ज्योति, उजेला, तूफ़ान, लौ, स्वर्ण, जलना, बुझना। इन पर चर्चा कीजिए और इन्हें ‘सवेरा’ तथा ‘निशा’ के उपयुक्त स्थान पर लिखिए।

उत्तरसवेरा (उजाले/भलाई से जुड़े शब्द): दिये, पूर्णिमा, दिवस, ज्योति, उजेला, लौ, स्वर्ण, जलना, किनारा।निशा (अँधेरे/बुराई से जुड़े शब्द): अँधेरा, अमावस, तिमिर, तूफ़ान, बुझना, शिला।(‘नाव’ अँधेरे को पार करने का साधन है, इसे प्रयास/आशा के रूप में सवेरे की ओर रखा जा सकता है।)

(ग) अपने समूह में मिलकर ‘निशा’ और ‘सवेरा’ के लिए कुछ और शब्द सोचिए और लिखिए।

उत्तरनिशा (रात) के लिए: रात्रि, रजनी, यामिनी, अँधियारी, तम।सवेरा (सुबह) के लिए: प्रभात, भोर, उषा, अरुणोदय, प्रातःकाल।

पंक्ति से पंक्ति

“जला दीप पहला तुम्हीं ने तिमिर की / चुनौती प्रथम बार स्वीकार की थी” — इस पंक्ति को वाक्य के रूप में इस प्रकार लिख सकते हैं: “तुम्हीं ने पहला दीप जला तिमिर की चुनौती प्रथम बार स्वीकार की थी।” अब नीचे दी गई पंक्तियों को इसी प्रकार वाक्यों के रूप में लिखिए—

1. बहाते चलो नाव तुम वह निरंतर।

उत्तरतुम उस नाव को निरंतर बहाते चलो।

2. जलाते चलो ये दिये स्नेह भर-भर।

उत्तरतुम इन दीयों को स्नेह से भर-भरकर जलाते चलो।

3. बुझाओ इन्हें, यों न पथ मिल सकेगा।

उत्तरइन्हें बुझा दो, (क्योंकि) इस प्रकार (इनसे) सही पथ नहीं मिल सकेगा।

4. मगर विश्व पर आज क्यों दिवस ही में घिरी आ रही है अमावस निशा-सी।

उत्तरमगर आज विश्व पर दिन में ही अमावस की रात-सी अँधियारी क्यों घिरती आ रही है?

सा/सी/से का प्रयोग

“घिरी आ रही है अमावस निशा-सी”, “स्वर्ण-सी जल रही और जलती रहेगी” — इन पंक्तियों में ‘सी’ शब्द समानता दिखाने के लिए आया है। जब ‘सा/सी/से’ का प्रयोग समानता दिखाने के लिए हो, तो इनसे पहले योजक चिह्न (-) लगाया जाता है। अब आप भी ‘सा/सी/से’ का प्रयोग करते हुए कल्पना से पाँच वाक्य लिखिए।

उत्तर (नमूना वाक्य)1. उसका चेहरा चाँद-सा सुंदर है।2. बर्फ़ ऊन-सी मुलायम लगती है।3. वह शेर-सा निडर होकर लड़ा।4. उसकी आँखें कमल-सी कोमल हैं।5. नदी का पानी दर्पण-से स्वच्छ है।

पाठ से आगे (अन्य गतिविधियाँ)

आपकी बात

(क) “रहेगा धरा पर दिया एक भी यदि / कभी तो निशा को सवेरा मिलेगा” — यदि हर व्यक्ति अपना कर्तव्य समझ ले और दूसरों की भलाई के लिए कार्य करे तो पूरी दुनिया सुंदर बन जाएगी। आप भी दूसरों के लिए प्रतिदिन बहुत-से अच्छे कार्य करते होंगे। अपने उन कार्यों के बारे में बताइए।

उत्तर (नमूना)मैं प्रतिदिन दूसरों के लिए कई अच्छे कार्य करने का प्रयास करता हूँ — जैसे छोटे भाई-बहन को पढ़ाई में मदद करना, बड़ों का आदर करना, अपने मित्र की कठिनाई में सहायता करना, पौधों को पानी देना तथा कूड़ा सही स्थान पर डालना।कभी-कभी मैं सड़क पार करते बुज़ुर्ग की मदद करता हूँ या किसी ज़रूरतमंद को अपना सामान बाँट देता हूँ। ऐसे छोटे-छोटे अच्छे कार्य ही ‘स्नेह से भरे दीप’ हैं, जो धीरे-धीरे संसार से अँधेरा मिटाते हैं।

(ख) इस कविता में निराश न होने, चुनौतियों का सामना करने और सबके सुख के लिए कार्य करने की प्रेरणा दी गई है। यदि आपको अपने किसी मित्र को निराश न होने के लिए प्रेरित करना हो तो आप क्या करेंगे? क्या कहेंगे?

उत्तर (नमूना)यदि मेरा कोई मित्र निराश होगा, तो मैं उसे प्यार से समझाऊँगा कि कठिनाइयाँ जीवन का हिस्सा हैं और हर रात के बाद सवेरा अवश्य आता है। मैं उसे इसी कविता की पंक्ति सुनाऊँगा — “कभी तो निशा को सवेरा मिलेगा।”मैं उसका हौसला बढ़ाऊँगा, उसकी अच्छाइयाँ याद दिलाऊँगा और कहूँगा कि साहस न छोड़े तथा निरंतर प्रयास करता रहे; मैं हर कदम पर उसके साथ हूँ। इस प्रकार मैं उसके मन में आशा का दीप फिर से जला दूँगा।

(ग) क्या आपको कभी किसी ने कोई कार्य करने के लिए प्रेरित किया है? कब? कैसे? उस घटना के बारे में बताइए।

उत्तर (नमूना)हाँ, एक बार मैं गणित में कमज़ोर होने के कारण निराश हो गया था। तब मेरी अध्यापिका ने मुझे प्रेरित किया। उन्होंने कहा कि प्रतिदिन थोड़ा-थोड़ा अभ्यास करने से कोई भी कठिन विषय आसान हो जाता है।उनकी बात से मुझमें नया उत्साह आया। मैंने रोज़ अभ्यास करना शुरू किया और कुछ ही महीनों में मेरे अंक बहुत अच्छे हो गए। उस दिन मुझे समझ आया कि प्रोत्साहन के दो शब्द भी किसी के लिए ‘सवेरा’ बन सकते हैं।

अमावस्या और पूर्णिमा

(क) “भले शक्ति विज्ञान में है निहित वह / कि जिससे अमावस बने पूर्णिमा-सी” — क्या आप जानते हैं कि अमावस्या और पूर्णिमा के होने का क्या कारण है?

उत्तरचंद्रमा का अपना कोई प्रकाश नहीं होता; वह सूर्य के प्रकाश से ही चमकता है। चंद्रमा पृथ्वी की परिक्रमा करता है और पृथ्वी सूर्य की। इसी कारण पृथ्वी से चंद्रमा का दिखने वाला भाग घटता-बढ़ता रहता है।पूर्णिमा की रात चंद्रमा का पूरा प्रकाशित भाग हमारी ओर होता है, इसलिए चाँद पूरा दिखाई देता है। इसके बाद चंद्रमा की कला धीरे-धीरे घटती जाती है और अमावस्या की रात उसका प्रकाशित भाग हमारी ओर न होने से चाँद बिल्कुल दिखाई नहीं देता। कला घटने के दिनों को ‘कृष्ण पक्ष’ (कृष्ण = काला) और बढ़ने के दिनों को ‘शुक्ल पक्ष’ (शुक्ल = उजला) कहते हैं।

(ख) नीचे दिए गए चित्र में अमावस्या, पूर्णिमा, कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष को पहचानिए और ये नाम उपयुक्त स्थानों पर लिखिए।

उत्तर (मार्गदर्शन)चित्र में जहाँ चाँद पूरा गोल एवं उजला दिखे, वहाँ पूर्णिमा लिखें; जहाँ चाँद बिल्कुल न दिखे (पूरा काला), वहाँ अमावस्या लिखें।पूर्णिमा से अमावस्या की ओर चाँद के घटते क्रम को कृष्ण पक्ष तथा अमावस्या से पूर्णिमा की ओर चाँद के बढ़ते क्रम को शुक्ल पक्ष लिखें।

तिथिपत्र

दिए गए तिथिपत्र (जनवरी 2023) को देखकर प्रश्नों के उत्तर दीजिए—

(क) दिए गए महीने में कुल कितने दिन हैं?

उत्तरजनवरी महीने में कुल 31 दिन हैं।

(ख) पूर्णिमा और अमावस्या किस दिनांक और वार को पड़ रही है?

उत्तरपूर्णिमा — 6 जनवरी, शुक्रवार को। अमावस्या — 21 जनवरी, शनिवार को।

(ग) कृष्ण पक्ष की सप्तमी और शुक्ल पक्ष की सप्तमी में कितने दिनों का अंतर है?

उत्तरकृष्ण पक्ष की सप्तमी 14 जनवरी को तथा शुक्ल पक्ष की सप्तमी 28 जनवरी को है। दोनों में 14 दिनों का अंतर है।

(घ) इस महीने में कृष्ण पक्ष में कुल कितने दिन हैं?

उत्तरतिथिपत्र के अनुसार कृष्ण पक्ष 7 जनवरी (प्रतिपदा) से 21 जनवरी (अमावस्या) तक चलता है, अर्थात इस महीने में कृष्ण पक्ष के 15 दिन हैं।

(ङ) ‘वसंत पंचमी’ की तिथि बताइए।

उत्तरतिथिपत्र के अनुसार ‘वसंत पंचमी’ 26 जनवरी, गुरुवार (शुक्ल पंचमी) को है।

आज की पहेली

“समय साक्षी है कि जलते हुए दीप / अनगिन तुम्हारे पवन ने बुझाए।” — ‘पवन’ शब्द का अर्थ है हवा। दिए गए अक्षर-जाल में ‘पवन’ (हवा) के लिए प्रयोग होने वाले अलग-अलग शब्द छिपे हैं। उन्हें खोजिए।

उत्तर‘पवन’ (हवा) के लिए अक्षर-जाल में छिपे शब्द हैं — बादल नहीं, बल्कि पवन के पर्यायवाची: अनिल, समीर, हवा, वायु, मारुत तथा पवन।(पवन के अन्य पर्यायवाची शब्द भी हैं — वात, बयार, समीरण। ये सभी ‘हवा’ के लिए प्रयोग होते हैं।)

खोजबीन के लिए

कविता से संबंधित कुछ रचनाएँ दी गई हैं, इन्हें पुस्तक में दिए गए क्यू.आर. कोड की सहायता से पढ़ें, देखें व समझें।

उत्तर (गतिविधि)यह स्वयं पढ़ने एवं समझने की गतिविधि है। दी गई रचनाएँ हैं — ‘हम सब सुमन एक उपवन के’, ‘बढ़े चलो’, ‘रोज़ बदलता कैसे चाँद भाग 1’ तथा ‘रोज़ बदलता कैसे चाँद भाग 2’।इन रचनाओं को पढ़कर हमें आशा, उत्साह एवं चंद्रमा के घटने-बढ़ने के बारे में और अधिक जानकारी मिलती है, जिससे ‘जलाते चलो’ कविता का भाव और गहराई से समझ में आता है।

अतिरिक्त प्रश्न

लघु उत्तरीय प्रश्न (30–40 शब्द)

1. ‘जलाते चलो’ कविता के कवि कौन हैं? वे किस प्रकार की रचनाओं के लिए प्रसिद्ध हैं?

उत्तर‘जलाते चलो’ कविता के कवि द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी हैं। वे बाल-साहित्य के चर्चित रचनाकार थे और बच्चों के लिए सरल, मधुर एवं प्रेरक कविताएँ तथा गीत लिखने के लिए प्रसिद्ध हैं। उनका गीत ‘हम सब सुमन एक उपवन के’ आज भी बहुत लोकप्रिय है।

2. कविता में ‘दीप’ और ‘तिमिर’ किसके प्रतीक हैं?

उत्तरकविता में ‘दीप’ (ज्योति) भलाई, आशा, ज्ञान एवं सेवा का प्रतीक है, जबकि ‘तिमिर’ (अँधेरा, निशा) बुराई, अज्ञान, दुख एवं निराशा का प्रतीक है। कवि चाहते हैं कि भलाई का दीप जलाकर बुराई का अँधेरा मिटाया जाए।

3. कवि ‘विद्युत-दिये’ (बल्ब) को बुझाने के लिए क्यों कहते हैं?

उत्तरकवि कहते हैं कि जो बिजली के दीप स्नेह (प्रेम) के बिना केवल बाहरी प्रकाश दे रहे हैं, उनसे सच्चा मार्ग नहीं मिल सकता। प्रेम-रहित प्रकाश व्यर्थ है, इसलिए ऐसे दीपों के स्थान पर स्नेह से भरे दीप जलाने पर बल दिया गया है।

4. कविता के अनुसार अँधेरे को उजाला कैसे मिलेगा?

उत्तरकविता के अनुसार जो दीप (व्यक्ति) स्वयं बुझकर भी अपनी ज्योति दूसरों को दे जाते हैं, अर्थात त्याग एवं बलिदान करते हैं, उन्हीं के कारण अँधेरे को उजाला मिलता है। निरंतर भलाई एवं सेवा के कार्य ही अँधेरे को मिटाते हैं।

5. कविता का मुख्य संदेश क्या है?

उत्तरकविता का मुख्य संदेश है — निराश हुए बिना, चुनौतियों का साहस से सामना करते हुए, सबकी भलाई के लिए स्नेह एवं सेवा के दीप निरंतर जलाते रहना चाहिए, क्योंकि एक-न-एक दिन धरती का अँधेरा अवश्य मिटेगा और निशा को सवेरा मिलेगा।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (100–120 शब्द)

6. ‘जलाते चलो’ कविता एक आशा एवं उत्साह जगाने वाली कविता है। स्पष्ट कीजिए।

उत्तर‘जलाते चलो’ सचमुच आशा एवं उत्साह जगाने वाली कविता है। कवि बार-बार कहते हैं कि चाहे संसार में कितना भी अँधेरा (बुराई एवं निराशा) क्यों न हो, हमें स्नेह से भरे दीप अर्थात भलाई के कार्य निरंतर करते रहना चाहिए।कवि निराश नहीं होते; वे विश्वास दिलाते हैं कि अँधेरे की चुनौती को मनुष्य पहले भी जीतता आया है और आगे भी जीतेगा। “कभी तो तिमिर का किनारा मिलेगा” तथा “कभी तो निशा को सवेरा मिलेगा” जैसी पंक्तियाँ मन में नई आशा भरती हैं। दीप एवं तूफ़ान के संघर्ष में दीप की लौ को कभी न बुझने वाली बताकर कवि यह उत्साह जगाते हैं कि भलाई एवं सत्य की जीत निश्चित है। इसी कारण यह कविता प्रेरणादायक एवं उत्साहवर्धक मानी जाती है।

7. कविता में प्रयुक्त प्रतीकों (अँधेरा, दीप, तूफ़ान, सवेरा) की सहायता से कवि क्या समझाना चाहते हैं?

उत्तरकवि ने इस कविता में सुंदर प्रतीकों का प्रयोग करके अपनी बात को गहराई से समझाया है। यहाँ ‘अँधेरा/तिमिर/निशा’ बुराई, अज्ञान, दुख एवं निराशा का प्रतीक है तथा ‘दीप/ज्योति/सवेरा’ भलाई, ज्ञान, सुख एवं आशा का प्रतीक है।‘तूफ़ान’ उन कठिनाइयों एवं विपत्तियों का प्रतीक है जो अच्छाई को मिटाना चाहती हैं। इन प्रतीकों के माध्यम से कवि यह समझाना चाहते हैं कि संसार में भलाई और बुराई का संघर्ष निरंतर चलता रहता है; कठिनाइयाँ भले ही भलाई के दीप को बुझाने का प्रयास करें, पर मनुष्य को साहस एवं प्रेम के साथ अच्छे कार्य करते रहना चाहिए। तभी अँधेरा मिटेगा और जीवन में सच्चा सवेरा आएगा।

8. इस कविता से हमें क्या-क्या प्रेरणा मिलती है? अपने जीवन से उदाहरण देकर बताइए।

उत्तरइस कविता से हमें अनेक अच्छी प्रेरणाएँ मिलती हैं — निराश न होना, कठिनाइयों का साहस से सामना करना, दूसरों की भलाई के लिए निरंतर अच्छे कार्य करते रहना तथा सत्य एवं प्रेम का साथ कभी न छोड़ना।अपने जीवन में हम भी इन शिक्षाओं को अपना सकते हैं। जैसे — यदि किसी विषय में हम कमज़ोर हैं तो निराश होकर हार मानने के बजाय निरंतर अभ्यास करते रहना चाहिए। किसी मित्र के दुखी होने पर उसका हौसला बढ़ाना, ज़रूरतमंद की मदद करना तथा स्वच्छता एवं अच्छे व्यवहार से समाज को बेहतर बनाना — ये सब ‘स्नेह से भरे दीप’ जलाने के समान हैं। इस प्रकार छोटे-छोटे अच्छे कार्यों से हम अपने आसपास का अँधेरा मिटा सकते हैं।

अभ्यास MCQ & अभिकथन-कारण

1. ‘जलाते चलो’ कविता के कवि कौन हैं?

(क) सूरदास

(ख) द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी

(ग) रहीम

(घ) सुभद्रा कुमारी चौहान

उत्तर(ख) द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी।

2. कविता में हमें किसे ‘स्नेह भर-भर’ जलाने को कहा गया है?

(क) तूफ़ान को

(ख) दीयों को

(ग) शिला को

(घ) नाव को

उत्तर(ख) दीयों को।

3. कविता में ‘तिमिर’ का अर्थ है—

(क) उजाला

(ख) अँधेरा

(ग) सवेरा

(घ) दीपक

उत्तर(ख) अँधेरा।

4. कवि के अनुसार तिमिर की चुनौती को सबसे पहले किसने स्वीकार किया?

(क) सूर्य ने

(ख) तूफ़ान ने

(ग) मनुष्य ने

(घ) चंद्रमा ने

उत्तर(ग) मनुष्य ने।

5. ‘सरित’ शब्द का अर्थ है—

(क) पर्वत

(ख) नदी

(ग) समुद्र

(घ) तालाब

उत्तर(ख) नदी।

6. कविता में ‘पवन’ ने क्या किया?

(क) दीप जलाए

(ख) अनगिनत दीप बुझाए

(ग) नाव चलाई

(घ) सवेरा लाया

उत्तर(ख) अनगिनत दीप बुझाए।

7. कविता में ‘निशा’ और ‘सवेरा’ किसके प्रतीक हैं?

(क) सर्दी और गर्मी के

(ख) बुराई/निराशा और भलाई/आशा के

(ग) धरती और आकाश के

(घ) नदी और किनारे के

उत्तर(ख) बुराई/निराशा और भलाई/आशा के।

8. कवि किस प्रकार के विद्युत-दीपों को बुझाने के लिए कहते हैं?

(क) जो बहुत तेज़ जलते हैं

(ख) जो स्नेह के बिना जल रहे हैं

(ग) जो पुराने हो गए हैं

(घ) जो रंगीन हैं

उत्तर(ख) जो स्नेह के बिना जल रहे हैं।

9. कविता के अनुसार धरती पर कब तक सवेरे की आशा बनी रहेगी?

(क) जब तक सूर्य रहेगा

(ख) जब तक एक भी दीप जलता रहेगा

(ग) जब तक तूफ़ान आता रहेगा

(घ) जब तक रात रहेगी

उत्तर(ख) जब तक एक भी दीप जलता रहेगा।

10. ‘जलाते चलो’ कविता का मुख्य भाव क्या है?

(क) प्रकृति का वर्णन

(ख) निराश हुए बिना निरंतर भलाई के कार्य करते रहना

(ग) त्योहार मनाना

(घ) विज्ञान की प्रशंसा

उत्तर(ख) निराश हुए बिना निरंतर भलाई के कार्य करते रहना।
उत्तर-कुंजी: 1-(ख), 2-(ख), 3-(ख), 4-(ग), 5-(ख), 6-(ख), 7-(ख), 8-(ख), 9-(ख), 10-(ख)

अभिकथन-कारण – नीचे अभिकथन (A) और कारण (R) दिए गए हैं। सही विकल्प चुनिए—
(क) A और R दोनों सही, R, A की सही व्याख्या है। (ख) A और R दोनों सही, पर R, A की सही व्याख्या नहीं। (ग) A सही, R गलत। (घ) A गलत, R सही।

1. अभिकथन (A): ‘जलाते चलो’ कविता आशा एवं उत्साह जगाने वाली कविता है।

कारण (R): कवि विश्वास दिलाते हैं कि एक-न-एक दिन निशा को सवेरा अवश्य मिलेगा।

उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है।

2. अभिकथन (A): कविता में ‘दीप’ भलाई एवं आशा का प्रतीक है।

कारण (R): दीप अँधेरे को मिटाकर प्रकाश फैलाता है, जैसे भलाई बुराई को मिटाती है।

उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है।

3. अभिकथन (A): कवि सभी प्रकार के विद्युत-दीपों (बल्बों) को बुझाने के लिए कहते हैं।

कारण (R): कवि केवल उन्हीं विद्युत-दीपों को बुझाने को कहते हैं जो स्नेह के बिना जल रहे हैं।

उत्तर(घ) A गलत है (कवि सभी नहीं, केवल स्नेह-रहित दीपों को बुझाने की बात करते हैं), जबकि R सही है।

4. अभिकथन (A): तूफ़ान ने अनगिनत जलते हुए दीप बुझा दिए।

कारण (R): ‘पवन’ अर्थात तेज़ हवा (तूफ़ान) दीपकों को बुझा देती है।

उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है।

5. अभिकथन (A): कविता हमें कठिनाइयों के आगे हार मानकर निराश हो जाने की प्रेरणा देती है।

कारण (R): कवि कहते हैं कि निरंतर दीप जलाते रहने से कभी तो अँधेरा अवश्य मिटेगा।

उत्तर(घ) A गलत है (कविता निराश होने की नहीं, बल्कि निरंतर प्रयास करते रहने की प्रेरणा देती है), जबकि R सही है।

परीक्षा-उपयोगी सुझाव एवं सामान्य भूलें

परीक्षा-उपयोगी सुझाव

  • कविता के प्रतीकों को अवश्य याद रखें — अँधेरा/तिमिर/निशा = बुराई-निराशा; दीप/ज्योति/सवेरा = भलाई-आशा।
  • “कभी तो तिमिर का किनारा मिलेगा” एवं “कभी तो निशा को सवेरा मिलेगा” जैसी टेक-पंक्तियाँ भावार्थ लिखते समय अवश्य उद्धृत करें।
  • शब्दार्थ में ‘स्नेह’ के दोनों अर्थ (प्रेम तथा तेल) तथा ‘विद्युत-दिये’ का अर्थ ठीक से लिखें।
  • कवि का नाम एवं उनकी प्रसिद्ध रचना ‘हम सब सुमन एक उपवन के’ याद रखें।

सामान्य भूलें (इनसे बचें)

  • ‘दीप जलाने’ का अर्थ केवल असली दीपक/बल्ब जलाना समझ लेना — इसका सही अर्थ है भलाई के कार्य करना।
  • यह कह देना कि कवि सभी बल्ब बुझाने को कहते हैं — वे केवल स्नेह-रहित दीपों को बुझाने की बात करते हैं।
  • ‘निशा’ एवं ‘सवेरा’ को केवल रात एवं सुबह मान लेना; ये बुराई-निराशा तथा भलाई-आशा के प्रतीक हैं।
  • कवि का नाम गलत लिखना (सही: द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी)।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

‘जलाते चलो’ कविता के कवि कौन हैं?

‘जलाते चलो’ कविता के कवि द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी (1916–1998) हैं, जो बाल-साहित्य के चर्चित रचनाकार थे। उनका गीत ‘हम सब सुमन एक उपवन के’ आज भी लोकप्रिय है।

‘जलाते चलो’ कविता का मुख्य भाव क्या है?

कविता का मुख्य भाव है — निराश हुए बिना, चुनौतियों का सामना करते हुए, सबकी भलाई के लिए स्नेह एवं सेवा के दीप निरंतर जलाते रहना, क्योंकि एक-न-एक दिन धरती का अँधेरा अवश्य मिटेगा।

कविता में ‘दीप’ और ‘अँधेरा’ किसके प्रतीक हैं?

‘दीप’ (ज्योति, सवेरा) भलाई, आशा एवं ज्ञान का प्रतीक है, जबकि ‘अँधेरा’ (तिमिर, निशा) बुराई, निराशा एवं अज्ञान का प्रतीक है।

कवि किन विद्युत-दीपों को बुझाने के लिए कहते हैं?

कवि केवल उन्हीं विद्युत-दीपों (बल्बों) को बुझाने के लिए कहते हैं जो स्नेह (प्रेम) के बिना केवल बाहरी प्रकाश दे रहे हैं, क्योंकि प्रेम-रहित प्रकाश से सच्चा मार्ग नहीं मिल सकता।

कविता एवं प्रश्न/गतिविधि-शीर्षक NCERT मल्हार पुस्तक से ज्यों-के-त्यों लिए गए हैं; भावार्थ एवं उत्तर ClearStudy द्वारा मौलिक रूप से तैयार किए गए हैं।

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