Class 6 Sanskrit Deepakam Chapter 13 Solutions (NCERT 2026–27) – पृथिव्यां त्रीणि रत्नानि

This page gives the complete solution for Class 6 Sanskrit Deepakam (दीपकम्) Chapter 13 ‘पृथिव्यां त्रीणि रत्नानि’ – a collection of seven famous सुभाषितानि (wise sayings) drawn from नीति-ग्रन्थ such as चाणक्यनीति, हितोपदेश, पञ्चतन्त्र and रामायण. You get the मूल सुभाषितानि with अन्वय & भावार्थ, शब्दार्थ, and original, exam-ready answers to every question of the अभ्यासः (वयम् अभ्यासं कुर्मः), along with extra questions, MCQs, अभिकथन-कारण and FAQs.

Class: 6 Subject: Sanskrit Book: Deepakam (दीपकम्) Chapter: 13 (त्रयोदशः पाठः) पाठ: पृथिव्यां त्रीणि रत्नानि Session: 2026–27

पाठ का अवलोकन (Chapter Overview)

दीपकम् कक्षा 6 का त्रयोदश (13वाँ) पाठ ‘पृथिव्यां त्रीणि रत्नानि’ सात प्रसिद्ध सुभाषितों (सुन्दर एवं उपदेशप्रद वचनों) का संकलन है। पाठ का आरम्भ एक रोचक संवाद से होता है, जिसमें आचार्य छात्रों को स्फोरकपत्र (फ्लैश-कार्ड) दिखाते हैं, जिन पर सुन्दर चित्र एवं श्लोक अंकित हैं। आचार्य बताते हैं कि ‘सुन्दर वचन ही सुभाषित कहलाते हैं’ और ये हमें उत्तम कार्य करने की प्रेरणा देते हैं। पाठ में दिए गए सात सुभाषित जल-अन्न-सुभाषित रूपी तीन रत्नों, ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की उदार भावना, परिश्रम के महत्त्व, बड़ों के सम्मान, उद्यम-साहस-धैर्य जैसे गुणों, विद्या से प्राप्त सुख तथा मातृभूमि की महिमा का बोध कराते हैं। पाठ का केन्द्रीय भाव है – नीति, परिश्रम, उदारता एवं विद्या ही जीवन के सच्चे रत्न हैं।

पाठ-परिचय / प्रसंग

यह पाठ किसी एक ग्रन्थ से नहीं, अपितु अनेक प्रसिद्ध नीति-ग्रन्थों से चुने गए सुभाषितों का संग्रह है। सुभाषित का अर्थ है – ‘सु + भाषित’ अर्थात् सुन्दर रूप से कहा गया वचन। पाठ के अन्त में ‘योग्यताविस्तरः’ में बताया गया है कि ये सुभाषित चाणक्यनीतिः, मनुस्मृतिः, पञ्चतन्त्रम्, हितोपदेशः, रामायणम् तथा सुभाषितरत्नभाण्डागारः जैसे ग्रन्थों से लिए गए हैं। ये वचन सूत्ररूप में जीवन के मूल्यों एवं आदर्शों की शिक्षा देते हैं और छात्रों को उत्तम कार्य के लिए प्रेरित करते हैं।

मूल सुभाषितानि (अन्वय + भावार्थ)

(पाठ के सात सुभाषित ज्यों-के-त्यों, साथ में अन्वय एवं भावार्थ।)

सुभाषितम् 1 – तीन रत्न

पृथिव्यां त्रीणि रत्नानि जलमन्नं सुभाषितम् ।
मूढैः पाषाणखण्डेषु रत्नसंज्ञा विधीयते ॥ — (नीति-सुभाषितम्)
अन्वयःपृथिव्यां जलम् अन्नं सुभाषितम् (इति) त्रीणि रत्नानि (सन्ति) । मूढैः पाषाणखण्डेषु रत्नसंज्ञा विधीयते ।भावार्थ: पृथ्वी पर तीन (सच्चे) रत्न हैं – जल, अन्न और सुभाषित। किन्तु मूर्ख लोग पत्थर के टुकड़ों (हीरे-मणि आदि) को ही रत्न कहते हैं।

सुभाषितम् 2 – वसुधैव कुटुम्बकम्

अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम् ।
उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम् ॥ — (हितोपदेशः / पञ्चतन्त्रम्)
अन्वयःअयं निजः परः वा इति गणना लघुचेतसां (जनानां भवति) । उदारचरितानां (जनानां) तु वसुधा एव कुटुम्बकम् (भवति) ।भावार्थ: ‘यह अपना है, यह पराया है’ – ऐसी संकुचित गणना तुच्छ हृदय वाले लोग करते हैं। किन्तु उदार स्वभाव वाले लोगों के लिए तो सम्पूर्ण पृथ्वी ही एक परिवार है।

सुभाषितम् 3 – उद्यम का महत्त्व

उद्यमेन हि सिद्ध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः ।
न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः ॥ — (हितोपदेशः)
अन्वयःकार्याणि उद्यमेन हि सिद्ध्यन्ति, मनोरथैः न (सिद्ध्यन्ति) । (यथा) मृगाः (स्वयं) सुप्तस्य सिंहस्य मुखे न प्रविशन्ति ।भावार्थ: कार्य परिश्रम से ही सिद्ध होते हैं, केवल इच्छा करने मात्र से नहीं। जैसे सोते हुए सिंह के मुख में हिरण स्वयं प्रवेश नहीं करते (सिंह को भी भोजन के लिए प्रयत्न करना पड़ता है)।

सुभाषितम् 4 – बड़ों के सम्मान का फल

अभिवादनशीलस्य नित्यं वृद्धोपसेविनः ।
चत्वारि तस्य वर्धन्ते आयुर्विद्या यशो बलम् ॥ — (मनुस्मृतिः)
अन्वयःतस्य नित्यम् अभिवादनशीलस्य वृद्धोपसेविनः आयुः विद्या यशः बलम् (च इति) चत्वारि वर्धन्ते ।भावार्थ: जो व्यक्ति सदा बड़ों एवं ज्येष्ठों का अभिवादन (प्रणाम) तथा सेवा करता है, उसकी चार वस्तुएँ बढ़ती हैं – आयु, विद्या, यश और बल।

सुभाषितम् 5 – छह गुण

उद्यमः साहसं धैर्यं बुद्धिः शक्तिः पराक्रमः ।
षडेते यत्र वर्तन्ते तत्र देवः सहायकृत् ॥ — (नीति-सुभाषितम्)
अन्वयःयत्र उद्यमः साहसं धैर्यं बुद्धिः शक्तिः पराक्रमः च एते षड् वर्तन्ते, तत्र देवः सहायकृत् (भवति) ।भावार्थ: उद्यम, साहस, धैर्य, बुद्धि, शक्ति और पराक्रम – ये छह गुण जहाँ होते हैं, वहाँ ईश्वर भी सहायता करते हैं।

सुभाषितम् 6 – विद्या का फल

विद्या ददाति विनयं विनयाद्याति पात्रताम् ।
पात्रत्वाद्धनमाप्नोति धनाद्धर्मं ततः सुखम् ॥ — (हितोपदेशः)
अन्वयःविद्या विनयं ददाति, (मनुष्यः) विनयात् पात्रतां याति, पात्रत्वात् धनम् आप्नोति, धनात् धर्मं ततः सुखम् (च आप्नोति) ।भावार्थ: विद्या विनम्रता देती है, विनम्रता से योग्यता मिलती है, योग्यता से धन प्राप्त होता है, धन से धर्म और धर्म से सुख की प्राप्ति होती है। अतः विद्या ही समस्त सुखों का मूल है।

सुभाषितम् 7 – मातृभूमि की महिमा

अपि स्वर्णमयी लङ्का न मे लक्ष्मण रोचते ।
जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी ॥ — (रामायणम्)
अन्वयःहे लक्ष्मण ! स्वर्णमयी अपि लङ्का मे (मह्यं) न रोचते । यतो हि जननी जन्मभूमिः च स्वर्गात् अपि गरीयसी (भवति) ।भावार्थ: श्रीराम लक्ष्मण से कहते हैं – हे लक्ष्मण! यद्यपि लङ्का सोने की बनी है, फिर भी मुझे वह अच्छी नहीं लगती; क्योंकि माता और जन्मभूमि स्वर्ग से भी बढ़कर महान् हैं।

सुभाषितम् 8 – बुद्धिस्थ विद्या एवं स्वहस्त-धन

पुस्तकस्था तु या विद्या परहस्तगतं धनम् ।
कार्यकाले समुत्पन्ने न सा विद्या न तद्धनम् ॥ — (चाणक्यनीतिः)
अन्वयःपुस्तकस्था तु या विद्या (अस्ति), परहस्तगतं (च यद्) धनम् (अस्ति), (तद् उभयम् अपि) कार्यकाले समुत्पन्ने (सति) – न सा विद्या, न (च) तद् धनम् (स्वस्य उपयोगाय भवति) ।भावार्थ: जो विद्या केवल पुस्तक में रह जाती है (कण्ठस्थ नहीं होती) और जो धन दूसरों के हाथ में चला जाता है – आवश्यकता के समय न वह विद्या काम आती है, न वह धन। अतः विद्या को बुद्धि में और धन को अपने पास रखना चाहिए।

सार (Hindi Summary)

‘पृथिव्यां त्रीणि रत्नानि’ पाठ का आरम्भ आचार्य एवं छात्रों के एक मनोरम संवाद से होता है। आचार्य छात्रों को स्फोरकपत्र (फ्लैश-कार्ड) दिखाते हैं, जिन पर सुन्दर चित्र एवं श्लोक हैं। आचार्य बताते हैं कि ये ‘सुभाषित’ हैं अर्थात् सुन्दर वचन, जो हमें उत्तम कार्य की प्रेरणा देते हैं। इसके बाद पाठ में सात प्रसिद्ध सुभाषित दिए गए हैं।

पहला सुभाषित कहता है कि पृथ्वी पर सच्चे तीन रत्न जल, अन्न और सुभाषित हैं, मणि-पत्थर नहीं। दूसरा सुभाषित ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का उदार भाव सिखाता है – उदार लोगों के लिए सारी पृथ्वी ही परिवार है। तीसरा सुभाषित परिश्रम का महत्त्व बताता है – कार्य केवल इच्छा से नहीं, उद्यम से ही सिद्ध होते हैं, जैसे सोते सिंह के मुख में हिरण स्वयं नहीं आते। चौथा सुभाषित कहता है कि बड़ों का अभिवादन एवं सेवा करने वाले की आयु, विद्या, यश और बल बढ़ते हैं।

पाँचवाँ सुभाषित बताता है कि जहाँ उद्यम, साहस, धैर्य, बुद्धि, शक्ति और पराक्रम होते हैं, वहाँ ईश्वर भी सहायता करते हैं। छठा सुभाषित विद्या की महिमा दर्शाता है – विद्या से विनय, विनय से योग्यता, योग्यता से धन, धन से धर्म और धर्म से सुख मिलता है। सातवाँ सुभाषित (रामायण से) मातृभूमि की महिमा बताता है – श्रीराम कहते हैं कि स्वर्णमयी लङ्का भी उन्हें प्रिय नहीं, क्योंकि माता एवं जन्मभूमि स्वर्ग से भी महान् हैं। अन्तिम सुभाषित सिखाता है कि केवल पुस्तक में रही विद्या और दूसरे के हाथ गया धन समय पर काम नहीं आते। संक्षेप में, यह पाठ नीति, परिश्रम, उदारता, बड़ों का सम्मान, मातृभूमि-प्रेम एवं विद्या के महत्त्व की प्रेरणा देता है।

शब्दार्थ (Word-meanings)

शब्दः (Sanskrit)हिन्दी अर्थEnglish meaning
मूढैःमूर्ख जनों के द्वाराBy fools
पाषाणखण्डेषुपत्थर के टुकड़ों मेंIn pieces of stone
रत्नसंज्ञारत्न का नाम/संज्ञाThe name ‘jewel’
निजःअपना (स्वकीयः)Own
परःअन्य/पराया जनOther
लघुचेतसाम्संकुचित/क्षुद्र हृदय वालों काOf the narrow-minded
वसुधापृथ्वी (धरित्री)The Earth
कुटुम्बकम्परिवार/कुटुम्बFamily
उद्यमेनपरिश्रम सेBy effort
मनोरथैःकेवल इच्छाओं सेBy mere wishes
सुप्तस्यसोते हुए (का)Of the sleeping (one)
अभिवादनशीलस्यअभिवादन/प्रणाम करने वाले काOf one who greets respectfully
वृद्धोपसेविनःबड़ों की सेवा करने वाले काOf one who serves elders
वर्धन्तेबढ़ते हैंIncrease / grow
सहायकृत्सहायता करने वालाOne who helps
पात्रताम्योग्यता कोWorthiness / ability
आप्नोतिप्राप्त करता हैObtains / receives
गरीयसीश्रेष्ठ/महानGreater / superior
स्वर्णमयीसोने की बनी हुईMade of gold
परहस्तगतम्दूसरे के हाथ में गया हुआGone into another’s hand

अभ्यासः (वयम् अभ्यासं कुर्मः)

1. एतानि सर्वाणि सुभाषितानि उच्चैः पठन्तु स्मरन्तु लिखन्तु च ।

उत्तरयह अभ्यास-कार्य है। पाठ के सातों सुभाषितों (पृथिव्यां त्रीणि रत्नानि…, अयं निजः परो वेति…, उद्यमेन हि…, अभिवादनशीलस्य…, उद्यमः साहसं…, विद्या ददाति…, अपि स्वर्णमयी लङ्का…) को शुद्ध उच्चारण के साथ ऊँचे स्वर में पढ़ें, कण्ठस्थ करें तथा शुद्ध-शुद्ध लिखकर अभ्यास करें। पढ़ते समय सन्धि, मात्रा एवं विसर्ग का विशेष ध्यान रखें।

2. अधोलिखितानां प्रश्नानाम् उत्तराणि एकपदेन लिखन्तु —

(क) पृथिव्यां कति रत्नानि सन्ति ?

उत्तरत्रीणि

(ख) अयं निजः परो वा इति गणना केषां भवति ?

उत्तरलघुचेतसाम्

(ग) कार्याणि केन सिद्ध्यन्ति ?

उत्तरउद्यमेन

(घ) विद्या किं ददाति ?

उत्तरविनयम्

(ङ) जननी जन्मभूमिश्च कस्मात् गरीयसी ?

उत्तरस्वर्गात् (स्वर्गादपि) ।

(च) लङ्का कीदृशी आसीत् ?

उत्तरस्वर्णमयी

3. अधोलिखितानां प्रश्नानाम् एकवाक्येन उत्तराणि लिखन्तु —

(क) पृथिव्यां त्रीणि रत्नानि कानि सन्ति ?

उत्तरपृथिव्यां जलम् अन्नं सुभाषितं च (इति) त्रीणि रत्नानि सन्ति ।

(ख) उदारचरितानां भावः कः भवति ?

उत्तरउदारचरितानां कृते वसुधा एव कुटुम्बकम् (इति) भावः भवति ।

(ग) मृगाः स्वयमेव कस्य मुखे न प्रविशन्ति ?

उत्तरमृगाः स्वयमेव सुप्तस्य सिंहस्य मुखे न प्रविशन्ति ।

(घ) अभिवादनशीलस्य नित्यं कानि वर्धन्ते ?

उत्तरअभिवादनशीलस्य नित्यम् आयुः विद्या यशः बलम् (इति) चत्वारि वर्धन्ते ।

(ङ) मनुष्यः धनात् किम् आप्नोति ?

उत्तरमनुष्यः धनात् धर्मम् आप्नोति ।

(च) उत्पन्नेषु कार्येषु कीदृशं धनम् उपयोगाय न भवति ?

उत्तरउत्पन्नेषु कार्येषु परहस्तगतं धनम् उपयोगाय न भवति ।

4. चित्रं दृष्ट्वा वाक्यानि रचयन्तु —

(पुस्तक के चित्रों को देखकर वाक्य बनाइए। उदाहरण पुस्तक में दिया गया है।)

उत्तर (नमूना) उदाहरणम् – वृक्षः फलानि यच्छति । त्वं फलानि स्वीकरोषि । अहं फलानि स्वीकरोमि । (क) माता भोजनं यच्छति । त्वं भोजनं स्वीकरोषि । अहं भोजनं स्वीकरोमि । (ख) शिक्षकः पुस्तकं यच्छति । त्वं पुस्तकं स्वीकरोषि । अहं पुस्तकं स्वीकरोमि । (ग) गौः दुग्धं यच्छति । त्वं दुग्धं स्वीकरोषि । अहं दुग्धं स्वीकरोमि । (घ) मित्रं पुष्पं यच्छति । त्वं पुष्पं स्वीकरोषि । अहं पुष्पं स्वीकरोमि । (ङ) पिता उपहारं यच्छति । त्वं उपहारं स्वीकरोषि । अहम् उपहारं स्वीकरोमि । (चित्र के अनुसार वस्तु बदलकर वाक्य बनाएँ।)

5. अधोलिखितानि वाक्यानि पठित्वा ‘आम्’ अथवा ‘न’ इति लिखन्तु —

यथा – किं पृथिव्यां त्रीणि रत्नानि सन्ति ? → आम् ।

उत्तर (क) त्रीणि रत्नानि जलम् अन्नं पाषाणः च सन्ति ? → (ख) किं धर्मेण सुखं प्राप्यते ? → आम् (ग) किं विद्या विनयं ददाति ? → आम् (घ) किम् अभिवादनशीलस्य विद्या वर्धते ? → आम् (ङ) किम् उद्यमेन कार्याणि नश्यन्ति ? → (च) किं जन्मभूमिः स्वर्गात् गरीयसी भवति ? → आम्

6. चित्रे दर्शितस्य नाम लिङ्गं च निर्दिशन्तु —

(चित्र में दर्शाई वस्तु का नाम एवं लिङ्ग लिखिए। उदाहरण पुस्तक में दिया गया है।)

उत्तर (नमूना) उदाहरणम् – पुष्पम् – नपुंसकलिङ्गम् । सिंहः – पुंलिङ्गम् । वृक्षः – पुंलिङ्गम् । पुस्तकम् – नपुंसकलिङ्गम् । माता / जननी – स्त्रीलिङ्गम् । जलम् – नपुंसकलिङ्गम् । (अपनी पुस्तक के चित्रों के अनुसार नाम एवं लिङ्ग लिखें।)

7. वलये पदानि विलिख्य सुभाषितं पूरयन्तु —

(वृत्त (वलय) में दिए पदों को क्रम से लगाकर सुभाषित पूरा कीजिए।)

उत्तरविद्या ददाति विनयं विनयाद्याति पात्रताम् ।
पात्रत्वाद्धनमाप्नोति धनाद्धर्मं ततः सुखम् ॥

8. पिट्टकातः पदानि चित्वा निर्देशानुसारं पदानि लिखन्तु —

पिट्टका (शब्द-मञ्जूषा): जननी, धैर्यम्, विद्या, विनयः, निजः, पत्रम्, बुद्धिः, मूलम्, पराक्रमः, शक्तिः, धनम्, उद्यमः

उत्तर (क) प्रथमान्त-पुंलिङ्गपदानि सन्ति – 1. उद्यमः 2. विनयः 3. निजः 4. पराक्रमः (ख) प्रथमान्त-स्त्रीलिङ्गपदानि सन्ति – 1. वसुधा 2. जननी 3. विद्या 4. शक्तिः (बुद्धिः) (ग) प्रथमान्त-नपुंसकलिङ्गपदानि सन्ति – 1. साहसम् 2. धैर्यम् 3. पत्रम् 4. मूलम् (धनम्) (पिट्टका के अनुसार ‘बुद्धिः’ एवं ‘शक्तिः’ स्त्रीलिङ्ग तथा ‘धनम्’ नपुंसकलिङ्ग भी हैं।)

9. पाठगतानि सुभाषितानि स्मृत्वा रिक्तस्थानानि पूरयन्तु —

उत्तर (क) पृथिव्यां त्रीणि रत्नानि जलमन्नं सुभाषितम् । (ख) उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकं भवति । (ग) उद्यमेन हि कार्याणि सिद्ध्यन्ति । (घ) अभिवादनशीलस्य वृद्धोपसेविनः चत्वारि वर्धन्ते । (ङ) उद्यमः साहसं धैर्यं बुद्धिः शक्तिः पराक्रमः । (च) विद्या विनयं ददाति । (छ) जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी भवति ।

10. चित्राणि दृष्ट्वा उचितान् श्लोकांशान् लिखन्तु —

(चित्रों को देखकर उनसे सम्बन्धित उपयुक्त सुभाषित-अंश लिखिए। नमूना उत्तर नीचे दिए गए हैं।)

उत्तर (नमूना) सिंह एवं हिरण का चित्र → न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः । जल-अन्न का चित्र → पृथिव्यां त्रीणि रत्नानि जलमन्नं सुभाषितम् । लङ्का/माता का चित्र → जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी । बड़ों को प्रणाम का चित्र → अभिवादनशीलस्य नित्यं वृद्धोपसेविनः । (अपनी पुस्तक के चित्रों के अनुसार सही श्लोकांश चुनें।)

योग्यताविस्तरः & परियोजनाकार्यम्

योग्यताविस्तरः (सुभाषितों के स्रोत-ग्रन्थ)

पाठ के ये सुभाषित विविध ग्रन्थों से लिए गए हैं। उनका संक्षिप्त परिचय इस प्रकार है –

ग्रन्थःपरिचयः (Introduction)
चाणक्यनीतिःएक नीतिग्रन्थ; रचनाकार – चाणक्य। इसमें सूत्ररूप में धर्म, संस्कृति, न्यायव्यवस्था, शान्ति एवं सुशिक्षा का सुन्दर वर्णन है।
मनुस्मृतिःप्रसिद्ध नीति एवं धर्मग्रन्थ; रचनाकार – महर्षि मनु। इसमें बारह अध्याय हैं तथा संसार की उत्पत्ति, धर्म, संस्कृति एवं मनुष्य के कर्तव्यों का वर्णन है।
पञ्चतन्त्रम्कथाग्रन्थ; रचनाकार – पण्डित विष्णुशर्मा। इसमें पाँच तन्त्र हैं – मित्रभेदः, मित्रलाभः, काकोलूकीयम्, लब्धप्रणाशः एवं अपरीक्षितकारकम्।
हितोपदेशःरचनाकार – नारायण पण्डित। इसमें पशु-पक्षियों की कथाओं द्वारा बालकों को नीति का बोध कराया गया है।
रामायणम्भारतीय संस्कृति का आदर्श-स्वरूप दर्शाने वाला ग्रन्थ; रचयिता – महर्षि वाल्मीकि। इसमें श्रीराम का चरित वर्णित है; यह ‘आदिकाव्य’ नाम से प्रसिद्ध है।
सुभाषितरत्नभाण्डागारःविविध संस्कृत-ग्रन्थों से चुने गए सुभाषितों का संग्रह-ग्रन्थ।

परियोजनाकार्यम् (Project Work)

1. पाठस्य सर्वाणि सुभाषितानि बृहत्-स्फोरकपत्रे सचित्रं लिखित्वा कक्षायाः भित्तौ स्थापयन्तु ।

मार्गदर्शनम्पाठ के सातों सुभाषितों को बड़े फ्लैश-कार्ड (स्फोरकपत्र) पर सुन्दर चित्रों के साथ लिखकर कक्षा की दीवार पर लगाइए।

2. सुभाषितेषु प्रयुक्तानां क्रियापदानां सूचीं कुर्वन्तु । तेषाम् आधारेण वाक्यरचनां कुर्वन्तु ।

उत्तर (नमूना)क्रियापदानि – विधीयते, सिद्ध्यन्ति, प्रविशन्ति, वर्धन्ते, वर्तन्ते, ददाति, याति, आप्नोति, रोचते।
वाक्य-नमूना – (1) कार्याणि उद्यमेन सिद्ध्यन्ति । (2) विद्या विनयं ददाति । (3) तस्य यशः वर्धते ।

3. विद्या, उद्यमः, अभिवादनशीलः इत्यादिगुणाः येषु सन्ति तादृशानां पञ्चानां महापुरुषाणां जीवनपरिचयं पठन्तु लिखन्तु च ।

मार्गदर्शनम्विद्या, परिश्रम एवं विनम्रता जैसे गुणों से युक्त पाँच महापुरुषों (जैसे – स्वामी विवेकानन्द, डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम, महात्मा गांधी, ईश्वरचन्द्र विद्यासागर, डॉ. राधाकृष्णन्) का संक्षिप्त जीवन-परिचय पढ़कर लिखिए।

4. ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ इति विषये एकां भाषणप्रतियोगिताम् आयोजयन्तु ।

मार्गदर्शनम्‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ (सम्पूर्ण विश्व एक परिवार है) विषय पर कक्षा में भाषण-प्रतियोगिता का आयोजन कीजिए।

अतिरिक्त प्रश्न (Extra Questions)

लघु उत्तरीय प्रश्न (30–40 शब्द)

1. सुभाषित किसे कहते हैं?

उत्तर‘सु + भाषित’ अर्थात् सुन्दर रूप से कहा गया वचन ही सुभाषित कहलाता है। ये नीतिपूर्ण, संक्षिप्त एवं उपदेशप्रद वचन होते हैं, जो हमें उत्तम कार्य करने की प्रेरणा देते हैं।

2. पृथ्वी पर तीन सच्चे रत्न कौन-से हैं और क्यों?

उत्तरपृथ्वी पर तीन सच्चे रत्न हैं – जल, अन्न और सुभाषित। ये जीवन के लिए सर्वाधिक उपयोगी हैं, अतः इन्हें ही असली रत्न कहा गया है। मूर्ख लोग पत्थर के टुकड़ों (मणि-हीरे) को रत्न मानते हैं।

3. ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का क्या अर्थ है?

उत्तर‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का अर्थ है – सम्पूर्ण पृथ्वी ही एक परिवार है। उदार स्वभाव वाले लोग सबको अपना मानते हैं और ‘यह अपना, यह पराया’ जैसी संकुचित भावना नहीं रखते।

4. श्रीराम को स्वर्णमयी लङ्का भी प्रिय क्यों नहीं लगी?

उत्तरश्रीराम को सोने की बनी लङ्का भी प्रिय नहीं लगी, क्योंकि उनके लिए माता एवं जन्मभूमि स्वर्ग से भी बढ़कर महान् थीं। इससे मातृभूमि-प्रेम का आदर्श प्रकट होता है।

5. किन छह गुणों के होने पर ईश्वर भी सहायता करते हैं?

उत्तरउद्यम, साहस, धैर्य, बुद्धि, शक्ति और पराक्रम – ये छह गुण जहाँ होते हैं, वहाँ ईश्वर भी सहायता करते हैं। अर्थात् जो परिश्रमी एवं प्रयत्नशील होता है, उसे ही दैवी सहायता मिलती है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (100–120 शब्द)

6. ‘उद्यमेन हि सिद्ध्यन्ति कार्याणि’ सुभाषित का भाव विस्तार से समझाइए।

उत्तरइस सुभाषित का भाव है कि किसी भी कार्य की सिद्धि केवल इच्छा (मनोरथ) करने से नहीं होती, अपितु परिश्रम (उद्यम) से होती है। इसमें एक सुन्दर उदाहरण दिया गया है – सोते हुए सिंह के मुख में हिरण स्वयं प्रवेश नहीं करते। सिंह यद्यपि बलवान् है, फिर भी उसे भी अपने भोजन के लिए प्रयत्न करना पड़ता है।इसी प्रकार मनुष्य को भी अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए केवल कल्पना करने के बजाय परिश्रम करना चाहिए। आलस्य त्यागकर निरन्तर प्रयत्न करने वाला व्यक्ति ही सफलता प्राप्त करता है। यह सुभाषित हमें कर्मठ, उद्यमी एवं प्रयत्नशील बनने की प्रेरणा देता है।

7. ‘विद्या ददाति विनयम्’ सुभाषित में विद्या से सुख तक की शृंखला को स्पष्ट कीजिए।

उत्तरइस सुभाषित में विद्या से आरम्भ होकर सुख तक पहुँचने की एक सुन्दर शृंखला दर्शाई गई है। विद्या मनुष्य को विनम्रता (विनय) प्रदान करती है। विनम्रता से व्यक्ति में योग्यता (पात्रता) आती है। योग्यता से वह सरलता से धन अर्जित करता है।धन से वह धर्म का आचरण करता है और धर्म के आचरण से अन्ततः उसे सुख की प्राप्ति होती है। इस प्रकार विद्या ही समस्त सुखों का मूल आधार है। यह सुभाषित हमें शिक्षा देता है कि विद्या-अर्जन सबसे महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि उसी से विनय, योग्यता, धन, धर्म एवं सुख – सभी क्रमशः प्राप्त होते हैं।

8. इस पाठ के सुभाषित किन-किन ग्रन्थों से लिए गए हैं? संक्षेप में बताइए।

उत्तरइस पाठ के सुभाषित विविध प्रसिद्ध नीति-ग्रन्थों से लिए गए हैं। ‘चाणक्यनीतिः’ चाणक्य द्वारा रचित नीतिग्रन्थ है। ‘मनुस्मृतिः’ महर्षि मनु द्वारा रचित धर्म एवं नीतिग्रन्थ है। ‘पञ्चतन्त्रम्’ विष्णुशर्मा का कथाग्रन्थ है, जिसमें पाँच तन्त्र हैं।‘हितोपदेशः’ नारायण पण्डित द्वारा रचित है, जिसमें पशु-पक्षियों की कथाओं से नीति-बोध कराया गया है। ‘रामायणम्’ महर्षि वाल्मीकि का आदिकाव्य है, जिसमें श्रीराम का चरित वर्णित है। इनके अतिरिक्त ‘सुभाषितरत्नभाण्डागारः’ विविध ग्रन्थों के सुभाषितों का संग्रह है। ये सभी ग्रन्थ हमें जीवन-मूल्यों एवं आदर्शों की शिक्षा देते हैं।

MCQ & अभिकथन-कारण

1. पृथ्वी पर कितने (सच्चे) रत्न बताए गए हैं?

(क) दो

(ख) तीन

(ग) चार

(घ) पाँच

उत्तर(ख) तीन। (जल, अन्न, सुभाषित)

2. ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ किनके लिए होता है?

(क) लघुचेतसां जनानाम्

(ख) मूढानाम्

(ग) उदारचरितानाम्

(घ) क्रोधिनाम्

उत्तर(ग) उदारचरितानाम्।

3. कार्य किससे सिद्ध होते हैं?

(क) मनोरथैः

(ख) उद्यमेन

(ग) निद्रया

(घ) आलस्येन

उत्तर(ख) उद्यमेन।

4. अभिवादनशील एवं वृद्धों की सेवा करने वाले की कौन-सी चार वस्तुएँ बढ़ती हैं?

(क) धन, मित्र, सुख, यश

(ख) आयु, विद्या, यश, बल

(ग) रूप, बल, धन, विद्या

(घ) आयु, धन, सुख, बुद्धि

उत्तर(ख) आयु, विद्या, यश, बल।

5. ‘उद्यमः साहसं धैर्यं…’ में कितने गुण बताए गए हैं?

(क) चार

(ख) पाँच

(ग) छह

(घ) सात

उत्तर(ग) छह। (उद्यम, साहस, धैर्य, बुद्धि, शक्ति, पराक्रम)

6. विद्या सबसे पहले क्या प्रदान करती है?

(क) धनम्

(ख) विनयम्

(ग) सुखम्

(घ) पात्रताम्

उत्तर(ख) विनयम्।

7. श्रीराम ने किससे कहा कि लङ्का उन्हें प्रिय नहीं लगती?

(क) सीतायै

(ख) हनुमते

(ग) लक्ष्मणाय

(घ) भरताय

उत्तर(ग) लक्ष्मणाय।

8. जननी एवं जन्मभूमि किससे भी श्रेष्ठ (गरीयसी) हैं?

(क) धनात्

(ख) स्वर्गात्

(ग) राज्यात्

(घ) विद्यायाः

उत्तर(ख) स्वर्गात् (स्वर्गादपि)।

9. किस सुभाषित में ‘सिंह’ एवं ‘मृग’ का उदाहरण आया है?

(क) विद्या ददाति विनयम्

(ख) उद्यमेन हि सिद्ध्यन्ति कार्याणि

(ग) अयं निजः परो वेति

(घ) अपि स्वर्णमयी लङ्का

उत्तर(ख) उद्यमेन हि सिद्ध्यन्ति कार्याणि।

10. केवल पुस्तक में रही विद्या एवं दूसरे के हाथ गया धन कब काम नहीं आते?

(क) रात्रौ

(ख) कार्यकाले समुत्पन्ने (आवश्यकता के समय)

(ग) उत्सवे

(घ) यात्रायाम्

उत्तर(ख) कार्यकाले समुत्पन्ने (आवश्यकता के समय)।
उत्तर-कुंजी: 1-(ख), 2-(ग), 3-(ख), 4-(ख), 5-(ग), 6-(ख), 7-(ग), 8-(ख), 9-(ख), 10-(ख)

अभिकथन-कारण – नीचे अभिकथन (A) और कारण (R) दिए गए हैं। सही विकल्प चुनिए—
(क) A और R दोनों सही, R, A की सही व्याख्या है। (ख) A और R दोनों सही, पर R, A की सही व्याख्या नहीं। (ग) A सही, R गलत। (घ) A गलत, R सही।

1. अभिकथन (A): पृथ्वी पर जल, अन्न एवं सुभाषित को तीन रत्न कहा गया है।

कारण (R): ये तीनों जीवन के लिए अत्यन्त उपयोगी हैं, इसीलिए इन्हें सच्चे रत्न कहा गया है।

उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है।

2. अभिकथन (A): ‘अयं निजः परो वा’ ऐसी गणना उदार लोग करते हैं।

कारण (R): उदार स्वभाव वाले लोगों के लिए सम्पूर्ण पृथ्वी ही एक परिवार है।

उत्तर(घ) A गलत है – ऐसी संकुचित गणना तो ‘लघुचेतसां’ (तुच्छ हृदय वाले) लोग करते हैं; R सही है।

3. अभिकथन (A): सोते हुए सिंह के मुख में हिरण स्वयं प्रवेश नहीं करते।

कारण (R): कार्य केवल इच्छा (मनोरथ) से नहीं, अपितु परिश्रम (उद्यम) से ही सिद्ध होते हैं।

उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है।

4. अभिकथन (A): श्रीराम को स्वर्णमयी लङ्का भी प्रिय नहीं लगती।

कारण (R): माता एवं जन्मभूमि स्वर्ग से भी अधिक श्रेष्ठ हैं।

उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है।

5. अभिकथन (A): विद्या मनुष्य को विनम्रता प्रदान करती है।

कारण (R): विद्या से विनय, विनय से पात्रता, पात्रता से धन, धन से धर्म एवं धर्म से सुख की प्राप्ति होती है।

उत्तर(क) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या करता है।

परीक्षा-सुझाव एवं सामान्य त्रुटियाँ

परीक्षा-सुझाव (Exam Tips)

  • सातों सुभाषित कण्ठस्थ करें – रिक्तस्थान-पूर्ति एवं श्लोक-लेखन के प्रश्न प्रायः इन्हीं से आते हैं।
  • एकपदेन एवं एकवाक्येन उत्तर के अन्तर को समझें – प्रश्न-संख्या 2 में केवल एक शब्द, संख्या 3 में पूरा वाक्य लिखें।
  • हर सुभाषित का भावार्थ (तीन रत्न, वसुधैव कुटुम्बकम्, उद्यम, बड़ों का सम्मान, छह गुण, विद्या, मातृभूमि) याद रखें।
  • शब्दार्थ (मूढैः, लघुचेतसाम्, उद्यमेन, गरीयसी, आकूतिः-समान शब्द) हिन्दी एवं अंग्रेज़ी दोनों में याद करें।
  • प्रत्येक सुभाषित किस ग्रन्थ से लिया गया है – योग्यताविस्तरः से जोड़कर याद रखें।

सामान्य त्रुटियाँ (Common Mistakes)

  • ‘अयं निजः परो वा’ की गणना को उदार लोगों का बताना – यह ‘लघुचेतसां’ का भाव है।
  • तीन रत्नों में ‘पाषाण/मणि’ जोड़ देना – सच्चे रत्न केवल जल, अन्न एवं सुभाषित हैं।
  • सन्धि-विच्छेद की भूल – ‘स्वर्गादपि’ = स्वर्गात् + अपि, ‘जलमन्नम्’ = जलम् + अन्नम्।
  • मात्रा एवं विसर्ग की अशुद्धि – सिद्ध्यन्ति, गरीयसी, वृद्धोपसेविनः को शुद्ध लिखें।
  • छह गुणों में से किसी को छोड़ देना – उद्यम, साहस, धैर्य, बुद्धि, शक्ति, पराक्रम – सभी छह लिखें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

दीपकम् कक्षा 6 पाठ 13 ‘पृथिव्यां त्रीणि रत्नानि’ में किन तीन रत्नों की बात है?

इस पाठ के पहले सुभाषित के अनुसार पृथ्वी पर तीन सच्चे रत्न हैं – जल, अन्न और सुभाषित (सुन्दर वचन)। मूर्ख लोग पत्थर के टुकड़ों (मणि-हीरे) को रत्न मानते हैं।

‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का अर्थ क्या है?

इसका अर्थ है – सम्पूर्ण पृथ्वी ही एक परिवार है। उदार हृदय वाले लोग सबको अपना मानते हैं और ‘अपना-पराया’ जैसी संकुचित भावना नहीं रखते।

इस पाठ के सुभाषित किन ग्रन्थों से लिए गए हैं?

ये सुभाषित चाणक्यनीतिः, मनुस्मृतिः, पञ्चतन्त्रम्, हितोपदेशः, रामायणम् तथा सुभाषितरत्नभाण्डागारः जैसे प्रसिद्ध नीति एवं संग्रह-ग्रन्थों से लिए गए हैं।

सुभाषितानि, प्रश्न एवं अभ्यास-शीर्षक NCERT दीपकम् पुस्तक से ज्यों-के-त्यों लिए गए हैं; अन्वय, सार, भावार्थ एवं उत्तर ClearStudy द्वारा मौलिक रूप से तैयार किए गए हैं।

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