Class 6 Sanskrit Deepakam Chapter 7 Solutions — शूराः वयं धीराः वयम्
शूराः वयं धीराः वयम् गीत के आठ अभ्यासों के क्रम में उत्तर, सरल अन्वय और हिन्दी भाव पढ़ें। वचन-परिवर्तन, सर्वनाम, पठ् धातु, तीन परियोजनाओं के नमूने और स्तोत्र-पठन का मार्गदर्शन दिया है। गीत साहस, सेवा और सद्भाव की प्रेरणा देता है।
- पाठ का अवलोकन (Chapter Overview)
- कवि-परिचय / प्रसंग
- मूल पद्यम् (गीतम्) + अन्वय
- सार / भावार्थ (Hindi Summary)
- शब्दार्थ (Word-meanings)
- वयम् अभ्यासं कुर्मः (अभ्यासः)
- अवधेयांशः & योग्यताविस्तरः (व्याकरण-तालिकाः)
- अतिरिक्त प्रश्न (Extra Questions)
- MCQ & अभिकथन-कारण
- परीक्षा-सुझाव एवं सामान्य त्रुटियाँ
- अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
पाठ का अवलोकन (Chapter Overview)
दीपकम् कक्षा 6 का सप्तम पाठ ‘शूराः वयं धीराः वयम्’ एक ओजपूर्ण देशभक्ति-गीत है। इसकी रचना सुप्रसिद्ध आधुनिक संस्कृत-कवि श्रीधर भास्कर वर्णेकर ने की है। गीत का आरम्भ एक संवाद से होता है, जिसमें विद्यार्थी आचार्य से चर्चा करते हैं कि ‘वयम्’ (हम) शब्द सभी भारतीयों के लिए प्रयुक्त हुआ है, गीत के आदर्श भाव में सभी भारतीयों को शूर और वीर कहा गया है; तत्पश्चात् सभी मिलकर सस्वर गीत गाते हैं। गीत में पाँच पद्य हैं। इसका केन्द्रीय भाव है – हम भारतीय शूर, वीर, धीर, गुणवान्, बलवान् एवं विजयी हैं। हमारे हृदय में लोभ, कपट एवं भय नहीं है; हम तेजस्वी, नीतिमान् एवं निर्भय होकर देश-सेवा करते हैं तथा अन्त में परमात्मा से उज्ज्वल विजय एवं मंगल की प्रार्थना करते हैं। यह गीत बालकों में देशभक्ति, साहस, आत्मविश्वास एवं सेवा-भाव जगाता है।
कवि-परिचय / प्रसंग
इस गीत के रचनाकार श्रीधर भास्कर वर्णेकर हैं। वे सुप्रसिद्ध आधुनिक संस्कृत-कवि थे। वर्णेकर महोदय का जन्म महाराष्ट्र राज्य के नागपुर नगर में हुआ था। उन्होंने अनेक काव्य, नाटक एवं गीत रचे। उनकी साहित्य-सेवा के लिए उन्हें राष्ट्रपति-पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया। प्रस्तुत गीत ‘शूराः वयं धीराः वयम्’ एक देशभक्ति-गीत है, जिसमें प्रत्येक भारतीय को शूर, वीर एवं धीर बताते हुए राष्ट्र-सेवा तथा परमात्मा से विजय एवं मंगल की कामना की गई है। गीत को सस्वर, सम्मिलित स्वर में गाने पर इसका ओज एवं भाव और भी मुखर हो उठता है।
मूल पद्यम् (गीतम्) + अन्वय
(गीत के पाँच पद्यों का अन्वय; गीत में शूरा वयं जैसे सन्धियुक्त रूप और अन्वय में शूराः जैसे अलग रूप ध्यान से पढ़ें।)
गुणशालिनो बलशालिनो जयगामिनो नितराम् ॥ १ ॥
शूरा वयम् ॥ (ध्रुवपदम्)
जनसेवका अतिभावुकाः शुभचिन्तका नियतम् ॥ २ ॥
शूरा वयम् ॥
ऊर्जस्वला वर्चस्वला अतिनिश्चला विजये ॥ ३ ॥
शूरा वयम् ॥
यामो वयं समराङ्गणं विजयार्थिनो बालाः ॥ ४ ॥
शूरा वयम् ॥
जयमङ्गलं परमोज्ज्वलं नो देहि परमात्मन् ॥ ५ ॥
शूरा वयम् ॥
सार / भावार्थ (Hindi Summary)
‘शूराः वयं धीराः वयम्’ एक ओजपूर्ण देशभक्ति-गीत है, जिसमें प्रत्येक भारतीय अपने स्वाभिमान, साहस एवं श्रेष्ठ गुणों का गौरवपूर्ण वर्णन करता है। पाठ के आरम्भ में विद्यार्थी एवं आचार्य के बीच संवाद होता है, जिसमें यह स्पष्ट किया जाता है कि गीत में आया ‘वयम्’ (हम) शब्द सभी भारतीयों के लिए है, यह गीत साहस और वीरता के सामूहिक आदर्श व्यक्त करता है। फिर सभी मिलकर सस्वर गीत गाते हैं।
पहले पद्य में कहा गया है कि हम भारतीय शूर, धीर एवं अत्यन्त वीर हैं तथा गुणवान्, बलवान् एवं सदा विजय की ओर बढ़ने वाले हैं। दूसरे पद्य में कवि बताते हैं कि हम सदा दृढ़ मन वाले, लोभ-रहित एवं साहसप्रिय हैं तथा निश्चित रूप से जन-सेवक, संवेदनशील, सद्भावना वाले और सबका शुभ चाहने वाले हैं। तीसरे पद्य में कहा गया है कि हमारे हृदय में धन की अधिक कामना, सुख की वासना अथवा कपट नहीं है; हम स्फूर्तिवान्, तेजस्वी एवं विजय के विषय में पूर्णतः अविचल हैं।
चौथे पद्य में सभी बालक स्वयं को भयरहित, नीतिमान् एवं दृढ़-शक्ति वाला बताते हुए कहते हैं कि हम विजय चाहने वाले होकर युद्ध-क्षेत्र में जाते हैं। अन्तिम पाँचवें पद्य में परमात्मा से प्रार्थना की गई है – हे जगदीश! हे परमेश! हे सकलेश! हे भगवन्! हमें परम उज्ज्वल विजय एवं मंगल प्रदान कीजिए। इस प्रकार यह गीत बालकों में देशभक्ति, साहस, सेवा-भाव, नीति एवं आत्मविश्वास की प्रेरणा भरता है।
शाब्दिक अर्थ और भाव: समराङ्गणम् का शाब्दिक अर्थ युद्ध का मैदान है; अभ्यास 2 में यही पाठानुसार शब्द लिखें। गीत के साहस, नीति और सेवा के भाव को आज के जीवन में कठिन जिम्मेदारियाँ निभाने से जोड़कर समझ सकते हैं; कर्तव्य-क्षेत्र इसका शाब्दिक अनुवाद नहीं है।

शब्दार्थ (Word-meanings)
| शब्दः (Sanskrit) | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| शूराः | पराक्रमी, वीर | Brave / valiant |
| धीराः | धैर्यवान् | Patient / courageous |
| सुतराम् / नितराम् | अत्यधिक रूप से | Exceedingly / abundantly |
| गुणशालिनः | गुणवान् | Virtuous |
| बलशालिनः | बलवान् | Strong |
| जयगामिनः | विजय की ओर बढ़ने वाले | Moving towards victory |
| दृढमानसाः | दृढ़ मन वाले | Determined / firm-minded |
| गतलालसाः | लालच रहित | Without greed |
| प्रियसाहसाः | साहसी, साहसप्रिय | Brave / fond of courage |
| नियतम् | निश्चित रूप से | Certainly / definitely |
| अतिभावुकाः | अत्यन्त संवेदनशील; यहाँ उत्तम भावना वाले | Deeply sensitive / compassionate |
| जनसेवकाः | लोगों की सेवा करने वाले | Servants of the people |
| शुभचिन्तकाः | शुभ (भला) चाहने वाले | Well-wishers |
| वञ्चना | कपट, छल | Deceit / fraud |
| ऊर्जस्वलाः | स्फूर्तिवान्, फुर्तीले | Energetic |
| वर्चस्वलाः | तेजस्वी | Radiant / lustrous |
| अतिनिश्चलाः | अविचल, दृढ़ निर्णय वाले | Unwavering / steadfast |
| गतभीतयः | भयरहित | Fearless |
| धृतनीतयः | नीति का आचरण करने वाले | Righteous / following ethics |
| दृढशक्तयः | दृढ़-शक्ति वाले, शक्तिमान् | Powerful |
| निखिलाः | सम्पूर्ण, सभी | All / entire |
| समराङ्गणम् | युद्ध का मैदान | Battlefield |
| विजयार्थिनः | विजय चाहने वाले | Seekers of victory |
| यामः | (हम) जाते हैं | (We) go |
| सकलेश | सभी के ईश (स्वामी) | Lord of all |
| परमोज्ज्वलम् | परम उज्ज्वल | Extremely bright |
| नः | हमें | Us / to us |
| देहि | दीजिए | (You) give |
वयम् अभ्यासं कुर्मः (अभ्यासः)
1. एतत् सम्पूर्णं गीतं सस्वरं गायन्तु, लिखन्तु, कण्ठस्थं च कुर्वन्तु ।
2. पाठस्य आधारेण प्रश्नानाम् उत्तराणि एकपदेन लिखन्तु —
(क) शूराः के ?
(ख) वयं कीदृशमानसाः स्मः ?
(ग) वयं कीदृशचिन्तकाः स्मः ?
(घ) वयं कुत्र अतिनिश्चलाः स्मः ?
(ङ) वयं विजयार्थिनः कुत्र यामः ?
3. उदाहरणानुसार वचन-परिवर्तन
पुस्तक पृष्ठ 83 में कहीं बायाँ और कहीं दायाँ रूप खाली है। नीचे मूल बाएँ-दाएँ क्रम को रखा है; मोटे अक्षरों में भरने वाला उत्तर है।
| पुस्तक का बायाँ रूप | पुस्तक का दायाँ रूप |
|---|---|
| (क) शूराः वयम् | शूरः अहम् — उदाहरण |
| वीराः वयम् | वीरः अहम् |
| (ख) बलशाली | बलशालिनः |
| जयगामी | जयगामिनः |
| (ग) दृढमानसाः | दृढमानसः |
| प्रियसाहसाः | प्रियसाहसः |
| (घ) अतिभावुकः | अतिभावुकाः |
| शुभचिन्तकाः | शुभचिन्तकः |
| (ङ) धनकामना | धनकामनाः |
| वञ्चना | वञ्चनाः |
| (च) वर्चस्वलः | वर्चस्वलाः |
| अतिनिश्चलः | अतिनिश्चलाः |
बलशालिनः → बलशाली और जयगामिनः → जयगामी; ये शूरः → शूराः जैसे अकारान्त रूपों से अलग हैं।
4. स्तम्भौ मेलयन्तु उत्तरं च लिखन्तु —
(स्तम्भ ‘अ’ की पंक्ति को स्तम्भ ‘ब’ की उपयुक्त पंक्ति से मिलाकर गीत के अनुसार पूरी पंक्ति बनाइए।)
| स्तम्भः (अ) | स्तम्भः (ब) – सही मेल (उत्तराणि) |
|---|---|
| (क) गतभीतयो धृतनीतयो | दृढशक्तयो निखिलाः |
| (ख) यामो वयं समराङ्गणं | विजयार्थिनो बालाः |
| (ग) जगदीश हे ! परमेश हे ! | सकलेश हे भगवन् ! |
| (घ) जयमङ्गलं परमोज्ज्वलं | नो देहि परमात्मन् ! |
| (ङ) जनसेवका अतिभावुकाः | शुभचिन्तका नियतम् |
| (च) ऊर्जस्वला वर्चस्वला | अतिनिश्चला विजये |
5. उदाहरणानुसारम् अधोलिखितानां पदानां वचनपरिवर्तनं कुर्वन्तु —
यथा – शूरः (एकवचनम्) → शूराः (बहुवचनम्) ।
| एकवचनम् | बहुवचनम् (उत्तर) |
|---|---|
| शूरः (यथा) | शूराः |
| (क) धीरः | धीराः |
| (ख) वीरः | वीराः |
| (ग) जनसेवकः | जनसेवकाः |
| (घ) धनकामना | धनकामनाः |
| (ङ) निखिलः | निखिलाः |
| (च) बालः | बालाः |
6. उदाहरणं दृष्ट्वा अधोलिखितानि पदानि परस्परं संयोज्य वाक्यानि रचयन्तु —
यथा – छात्रः पठति । (कर्ता एवं क्रिया का पुरुष-वचन मिलाकर वाक्य बनाइए।)
| कर्ता (अ) | उचिता क्रिया (ब) | वाक्यम् (उत्तर) |
|---|---|---|
| छात्रः (यथा) | पठति | छात्रः पठति । |
| (क) छात्रः | पठति | छात्रः पठति । |
| (ख) छात्रौ | पठतः | छात्रौ पठतः । |
| (ग) छात्राः | पठन्ति | छात्राः पठन्ति । |
| (घ) अहम् | पठामि | अहं पठामि । |
| (ङ) आवाम् | पठावः | आवां पठावः । |
| (च) वयम् | पठामः | वयं पठामः । |
| (छ) त्वम् | पठसि | त्वं पठसि । |
| (ज) युवाम् | पठथः | युवां पठथः । |
| (झ) यूयम् | पठथ | यूयं पठथ । |
7. कोष्ठकात् उचितं पदं स्वीकृत्य रिक्तस्थाने लिखन्तु —
यथा – तद्, स्त्रीलिङ्गम्, प्रथमा विभक्तिः, एकवचनम् → सा । (एषा/अहम्/सा)
8. उदाहरणमनुसृत्य उचितेन पदेन रिक्तस्थानं पूरयन्तु —
यथा – नायिका नृत्यति । (नृत्) (कर्ता के अनुसार धातु का लट्-लकार रूप लगाइए।)
अवधेयांशः & योग्यताविस्तरः (व्याकरण-तालिकाः)
1. सर्वनाम-पदानि (प्रथमा-विभक्तेः रूपाणि)
नामपद का मूलरूप ‘प्रातिपदिकम्’ कहलाता है (यथा – ‘रामः’ का मूल ‘राम’)। नीचे चार सर्वनाम-शब्दों के प्रथमा-विभक्ति के रूप दिए गए हैं।
तद् (वह / he, she, it)
| लिङ्गम् | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
|---|---|---|---|
| पुंलिङ्गम् | सः | तौ | ते |
| स्त्रीलिङ्गम् | सा | ते | ताः |
| नपुंसकलिङ्गम् | तत् | ते | तानि |
एतद् (यह / this)
| लिङ्गम् | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
|---|---|---|---|
| पुंलिङ्गम् | एषः | एतौ | एते |
| स्त्रीलिङ्गम् | एषा | एते | एताः |
| नपुंसकलिङ्गम् | एतत् | एते | एतानि |
अस्मद् (मैं / हम) तथा युष्मद् (तुम) – तीनों लिङ्गों में समान रूप
| शब्दः | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
|---|---|---|---|
| अस्मद् | अहम् | आवाम् | वयम् |
| युष्मद् | त्वम् | युवाम् | यूयम् |
2. शब्दरूपाणि (योग्यताविस्तरः – प्रथमा-विभक्तिः)
पाठ में प्रयुक्त कुछ शब्दों के एकवचन, द्विवचन एवं बहुवचन रूप ध्यानपूर्वक पढ़ें, समझें एवं स्मरण करें।
| शब्दः | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
|---|---|---|---|
| भारतीय | भारतीयः | भारतीयौ | भारतीयाः |
| धीर | धीरः | धीरौ | धीराः |
| शूर | शूरः | शूरौ | शूराः |
| जनसेवक | जनसेवकः | जनसेवकौ | जनसेवकाः |
| शुभचिन्तक | शुभचिन्तकः | शुभचिन्तकौ | शुभचिन्तकाः |
| बाल | बालः | बालौ | बालाः |
| निखिल | निखिलः | निखिलौ | निखिलाः |
| कामना | कामना | कामने | कामनाः |
| वासना | वासना | वासने | वासनाः |
| वञ्चना | वञ्चना | वञ्चने | वञ्चनाः |
| समराङ्गण | समराङ्गणम् | समराङ्गणे | समराङ्गणानि |
| शोभन | शोभनम् | शोभने | शोभनानि |
| नियत | नियतम् | नियते | नियतानि |
योग्यताविस्तर 3 — पृष्ठ 87 के व्यक्तियों की पहचान
चित्रों के नाम: सुभाषचन्द्र बोस, ए.पी.जे. अब्दुल कलाम, महर्षि अरविन्द, मदनमोहन मालवीय, स्वामी विवेकानन्द, रानी लक्ष्मीबाई, स्वामी दयानन्द सरस्वती, शिवाजी महाराज और शङ्कराचार्य। शिक्षक के साथ किसी एक व्यक्ति के जीवन में साहस, सेवा या धैर्य का एक उदाहरण खोजें; सभी के जीवन-वृत्त को एक जैसा न लिखें।
योग्यताविस्तर 4 — पुस्तक पृष्ठ 88 के स्तोत्र का पठन और अर्थ
चारों श्लोक पुस्तक से सस्वर पढ़ें। पहले नामों का सही उच्चारण शिक्षक से सुनें; फिर पंक्ति-पंक्ति स्मरण करें। स्तोत्र में साहित्यिक / परम्परागत पात्रों और ऐतिहासिक व्यक्तियों के नाम साथ हैं। सभी को एक ही प्रकार की ऐतिहासिक जीवनी का विषय न मानें।
| समूह | नाम और भाव का मार्गदर्शन |
|---|---|
| पहले दो श्लोक | अरुन्धती, अनसूया, सावित्री, जानकी, द्रौपदी, कण्णगी, गार्गी, मीरा, दुर्गावती, लक्ष्मीबाई, अहल्या, चन्नम्मा, रुद्रमाम्बा, निवेदिता और सारदा जैसे स्त्री-पात्रों / व्यक्तियों के प्रति सम्मान व्यक्त किया गया है। |
| तीसरा श्लोक | अगस्त्य, कम्बु, कौण्डिन्य, राजेन्द्र चोल, अशोक, पुष्यमित्र और खारवेल के नाम आते हैं। |
| चौथा श्लोक | रामकृष्ण, दयानन्द, रवीन्द्र, राममोहन, रामतीर्थ, अरविन्द और विवेकानन्द के नाम आते हैं। |
कुछ अर्थ: प्रणम्याः — सम्मान / प्रणाम के योग्य; मातृदेवताः — माता के समान आदरणीय; सुनीतिमान् — अच्छी नीति वाला; सुविक्रमा — उत्तम पराक्रम वाली। नाम का पूरा परिचय देने से पहले स्रोत जाँचें; इस कार्य में मुख्य अभ्यास सही पठन, अर्थ और स्मरण है।
परियोजनाकार्यम् — तीन कार्य
1. किसी एक महापुरुष का जीवन-वृत्त — नमूना: स्वामी विवेकानन्द
पुस्तक के विकल्प स्वामी विवेकानन्द, शिवाजी और राणा प्रताप हैं। नीचे एक नमूना है; दूसरे व्यक्ति को चुनें तो उसके तथ्य विश्वसनीय स्रोत से जाँचें।
स्वामी विवेकानन्दः महान् विचारकः आसीत्। तस्य जन्म १२ जनवरी १८६३ इति दिनाङ्के कलकत्तानगरे अभवत्। तस्य पूर्वनाम “नरेन्द्रनाथदत्तः” इत्यासीत्। सः श्रीरामकृष्णस्य शिष्यः आसीत्। १८९३तमे वर्षे सः शिकागोनगरे धर्मसभायां भाषणम् अकरोत्। सः जनसेवायाः महत्त्वं प्रतिपादितवान्।
हिन्दी भाव: विवेकानन्द विचारक और रामकृष्ण के शिष्य थे। उनका जन्म 12 जनवरी 1863 को कलकत्ता (आज कोलकाता) में हुआ। उनका पूर्व नाम नरेन्द्रनाथ दत्त था। उन्होंने 1893 में शिकागो की धर्मसभा में भाषण दिए और लोगों की सेवा का महत्त्व बताया। तथ्य-स्रोत: बेलूर मठ का जीवन-परिचय।
2. प्रथमा-बहुवचन पदों का संग्रह और दस वाक्य
गीत में मिलने वाले रूप: शूराः; धीराः; वीराः; गुणशालिनः; बलशालिनः; जयगामिनः; दृढमानसाः; गतलालसाः; प्रियसाहसाः; जनसेवकाः; अतिभावुकाः; शुभचिन्तकाः; ऊर्जस्वलाः; वर्चस्वलाः; अतिनिश्चलाः; गतभीतयः; धृतनीतयः; दृढशक्तयः; निखिलाः; विजयार्थिनः; बालाः। सन्धि के कारण गीत में शूरा वयं, गुणशालिनो जैसे रूप हैं; अलग पद लिखते समय शूराः, गुणशालिनः आदि लिखें।
- वयं शूराः स्मः।
- बालाः धीराः सन्ति।
- वीराः देशं रक्षन्ति।
- छात्राः गुणशालिनः सन्ति।
- क्रीडकाः बलशालिनः सन्ति।
- वयं दृढमानसाः स्मः।
- जनसेवकाः जनानां सेवां कुर्वन्ति।
- वयं गतलालसाः स्मः।
- वयं शुभचिन्तकाः स्मः।
- बालाः ऊर्जस्वलाः सन्ति।
ये दस नमूना वाक्य हैं; अन्य शुद्ध वाक्य भी स्वीकार्य हैं। धनकामना और वञ्चना गीत में एकवचन हैं, इसलिए बहुवचन-संग्रह में उन्हें बिना परिवर्तन शामिल न करें।
3. एक अन्य संस्कृत देशभक्ति-गीत — समूह कार्य
शिक्षक / पुस्तकालय से एक अन्य संस्कृत देशभक्ति-गीत चुनें। उसका शीर्षक, रचनाकार और स्रोत लिखें। पहले कठिन शब्दों के अर्थ समझें, फिर पंक्तियाँ समूहों में बाँटें और सामूहिक सस्वर वाचन करें। यह खोज और प्रस्तुति का कार्य है; इसका एक निश्चित लिखित उत्तर नहीं है।
अतिरिक्त प्रश्न (Extra Questions)
अतिरिक्त लघु प्रश्न — ClearStudy अभ्यास
1. इस गीत के रचनाकार कौन हैं? उनके विषय में संक्षेप में लिखिए।
2. गीत में ‘वयम्’ शब्द किनके लिए प्रयुक्त हुआ है?
3. हमारे हृदय में किन तीन दोषों का अभाव बताया गया है?
4. विजयार्थी बालक कहाँ जाते हैं और कैसे?
5. अन्तिम पद्य में परमात्मा से क्या प्रार्थना की गई है?
अतिरिक्त व्याख्यात्मक प्रश्न — ClearStudy अभ्यास
6. ‘शूराः वयं धीराः वयम्’ गीत का केन्द्रीय भाव अपने शब्दों में लिखिए।
7. पाठ के आरम्भ में आए संवाद का सार लिखिए तथा बताइए कि उससे क्या शिक्षा मिलती है।
8. इस गीत में कौन-कौन से गुण भारतीयों के बताए गए हैं? सोदाहरण लिखिए।
MCQ & अभिकथन-कारण
1. इस गीत के रचनाकार कौन हैं?
(क) कालिदासः
(ख) श्रीधर भास्कर वर्णेकरः
(ग) भर्तृहरिः
(घ) बाणभट्टः
2. कवि वर्णेकर का जन्म किस नगर में हुआ था?
(क) पुणे
(ख) मुम्बई
(ग) नागपुर
(घ) काशी
3. ‘वयम्’ शब्द गीत में किनके लिए प्रयुक्त हुआ है?
(क) केवल छात्रों के लिए
(ख) सभी भारतीयों के लिए
(ग) केवल सैनिकों के लिए
(घ) केवल आचार्य के लिए
4. इस गीत में कुल कितने पद्य हैं?
(क) तीन
(ख) चार
(ग) पाँच
(घ) छह
5. ‘जयगामिनः’ का अर्थ है—
(क) धन कमाने वाले
(ख) विजय की ओर बढ़ने वाले
(ग) भयभीत होने वाले
(घ) सोने वाले
6. तीसरे पद्य के अनुसार हमारे हृदय में क्या नहीं है?
(क) साहस
(ख) वञ्चना (कपट)
(ग) नीति
(घ) तेज
7. विजयार्थी बालक कहाँ जाते हैं?
(क) विद्यालयम्
(ख) समराङ्गणम्
(ग) उद्यानम्
(घ) देवालयम्
8. ‘गतभीतयः’ का अर्थ है—
(क) भयरहित
(ख) धनवान्
(ग) आलसी
(घ) दुःखी
9. अन्तिम पद्य में बालक किससे प्रार्थना करते हैं?
(क) राजा से
(ख) आचार्य से
(ग) परमात्मा (भगवन्) से
(घ) मित्र से
10. बालक परमात्मा से क्या माँगते हैं?
(क) धनम्
(ख) जयमङ्गलं परमोज्ज्वलम् (उज्ज्वल विजय एवं मंगल)
(ग) सुखम् एव
(घ) विश्रामम्
अभिकथन-कारण – नीचे अभिकथन (A) और कारण (R) दिए गए हैं। सही विकल्प चुनिए—
(क) A और R दोनों सही, R, A की सही व्याख्या है। (ख) A और R दोनों सही, पर R, A की सही व्याख्या नहीं। (ग) A सही, R गलत। (घ) A गलत, R सही।
1. अभिकथन (A): ‘शूराः वयं धीराः वयम्’ एक देशभक्ति-गीत है।
कारण (R): इस गीत में प्रत्येक भारतीय को शूर, वीर एवं धीर बताकर राष्ट्र-सेवा की प्रेरणा दी गई है।
2. अभिकथन (A): इस गीत के रचनाकार श्रीधर भास्कर वर्णेकर हैं।
कारण (R): वर्णेकर महोदय एक प्राचीन वैदिक ऋषि थे जिन्होंने ऋग्वेद की रचना की।
3. अभिकथन (A): हमारे हृदय में कपट (वञ्चना) नहीं है।
कारण (R): हम तेजस्वी, स्फूर्तिवान् एवं नीतिमान् हैं तथा विजय में अविचल रहते हैं।
4. अभिकथन (A): विजयार्थी बालक समराङ्गण में जाते हैं।
कारण (R): वे भयरहित, नीतिमान् एवं दृढ़-शक्ति से युक्त होकर विजय चाहते हैं।
5. अभिकथन (A): अन्तिम पद्य में परमात्मा से उज्ज्वल विजय एवं मंगल की प्रार्थना की गई है।
कारण (R): बालक परमात्मा को जगदीश, परमेश एवं सकलेश कहकर सम्बोधित करते हैं।
परीक्षा-सुझाव एवं सामान्य त्रुटियाँ
परीक्षा-सुझाव (Exam Tips)
- पाँचों पद्य कण्ठस्थ करें – पद्य-लेखन, रिक्तस्थान-पूर्ति एवं स्तम्भ-मेलन के प्रश्न प्रायः इन्हीं से आते हैं।
- शब्दार्थ (शूराः, धीराः, गतलालसाः, ऊर्जस्वलाः, समराङ्गणम्, देहि आदि) हिन्दी एवं अंग्रेज़ी दोनों में याद रखें।
- तद्, एतद्, अस्मद् एवं युष्मद् सर्वनामों के प्रथमा-विभक्ति के रूप तालिका सहित याद करें।
- ‘एकपदेन उत्तरम्’ वाले प्रश्नों में केवल एक उपयुक्त पद ही लिखें (जैसे – वयम्, दृढमानसाः)।
- वचन-परिवर्तन में एकवचन ↔ बहुवचन का ध्यान रखें (शूरः → शूराः, धीरः → धीराः)।
सामान्य त्रुटियाँ (Common Mistakes)
- कवि वर्णेकर को वैदिक ऋषि समझ लेना – वे आधुनिक संस्कृत-कवि थे।
- मात्रा एवं विसर्ग की अशुद्धि – गुणशालिनः, जयगामिनः, ऊर्जस्वलाः को शुद्ध लिखें।
- लट्-लकार में कर्ता के अनुसार क्रिया-रूप न लगाना (यथा – छात्रौ पठतः, वयं पठामः)।
- सर्वनाम-रूपों में लिङ्ग/वचन का मिलान न करना (तद् पुं. बहुवचन = ते, एतद् नपुं. बहुवचन = एतानि)।
- ‘समराङ्गणम्’ को स्त्रीलिङ्ग मान लेना – यह नपुंसकलिङ्ग शब्द है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
दीपकम् कक्षा 6 का पाठ 7 ‘शूराः वयं धीराः वयम्’ किस प्रकार का पाठ है और इसके रचनाकार कौन हैं?
यह एक देशभक्ति-गीत (पद्य पाठ) है, जिसमें पाँच पद्य हैं। इसके रचनाकार सुप्रसिद्ध आधुनिक संस्कृत-कवि श्रीधर भास्कर वर्णेकर हैं, जिनका जन्म नागपुर में हुआ था।
‘शूराः वयं धीराः वयम्’ का अर्थ क्या है?
इसका अर्थ है – ‘हम शूर (पराक्रमी) हैं, हम धीर (धैर्यवान्) हैं’। यह गीत प्रत्येक भारतीय के साहस, वीरता एवं श्रेष्ठ गुणों का गौरवपूर्ण वर्णन करता है।
इस गीत के अन्तिम पद्य में क्या प्रार्थना की गई है?
अन्तिम पद्य में बालक परमात्मा को जगदीश, परमेश, सकलेश एवं भगवन् कहकर प्रार्थना करते हैं कि हे परमात्मन्! हमें परम उज्ज्वल विजय एवं मंगल (जयमङ्गलं परमोज्ज्वलम्) प्रदान कीजिए।
पाठ्यपुस्तक संदर्भ: NCERT दीपकम्, कक्षा 6, पाठ 7, पृष्ठ 77–88; उपलब्ध प्रति का पुनर्मुद्रण 2026–27। गीत के रचयिता श्रीधर भास्कर वर्णेकर हैं। अतिरिक्त प्रश्न, नमूना परियोजनाएँ, व्याख्याएँ और चित्र ClearStudy के स्वतंत्र अध्ययन-सहायक हैं। आधिकारिक NCERT पुस्तक पोर्टल।
